सुक्खी जैसा कोई नही छापें ई-मेल
प्रयोक्ता का मुल्यांकन: / 0
बेकारअति उत्तम 
इस के लेख़क हैं जीतेंद्र चौधरी   

हास परिहासजितेन्द्र के बचपन के दोस्त सुक्खी बहुत ही सही आइटम हैं। उनकी जिन्दगी में लगातार ऐसी घटनायें होती रहती हैं जो दूसरों के लिये हास‍-परिहास का विषय बन जाती है। इस अंक से हम नजर डालते रहेंगे सुक्खी के जीवन में घटी कुछ घटनाओं पर।

 

Sukkhi jaisa koi nahi

 

एक बार सुक्खी ने अपनी गर्लफ्रेन्ड से कहा, रात को मेरे बिठूर वाले फार्महाउस पर आ जाना, वहाँ कोई नही होगा। गर्लफ्रेन्ड ने सोचा चलो अच्छी डेट है। वो वहाँ पहुँची और सचमुच वहाँ कोई नही था। सुक्खी भी नही।


हम लोग भारत की बढती आबादी पर एक जगह लेक्चर सुनने गये थे, सुक्खी को भी हमने साथ ले लिये, एक वक्ता बढती जनसंख्या पर भाषण दे रहा था,
 

"भारत में हर दस सेकन्ड एक औरत एक बच्चे को जन्म देती है"

अचानक सुक्खी ने चिल्ला कर बीच मे टोका "हमें इस औरत को ढूँढकर उसे ऐसा करने से रोकना चाहिये"


सुक्खी ने परिवार नियोजन में कभी विश्वास नही किया, अब करे भी क्यों बाकी कोई काम भी तो नही था बेचारे के पास, चलिये सुनिये
सुक्खी को जुड़वाँ बच्चे हुए, नाम रखा "टिन" और "मार्टिन"
फिर जुड़वां बच्चे हुए, इस बार नाम रखे "पीटर" और "रिपीटर"

फिर हुए, इस बार नाम रखे "मैक्स" और "क्लाइमैक्स"
फिर जुड़वां हुए, इस बार नाम रखे "टायर्ड" और "रिटायर्ड"


आजकल सुक्खी तो बस अपने प्राइम मिनिस्टर मनमोहन सिंह के ही राग अलापता रहता है, हम लोगों ने एक दिन सुक्खी को छेड़ते हुए पूछा,
"सुक्खी भाई! ये बता कि अपने मनमोहन सिंह जी शाम को ही क्यों टहलने जाते हैं, सुबह क्यों नही?"
सुक्खी दाढ़ी खुजाते हुए बोला
"सिम्पिल है यार! अपने मनमोहन पी.एम हैं, ए.एम थोड़े ही हैं।"

ये जो है ज़िंदगीः रजनीश कपूर

ये जो है ज़िंदगी


जीतेंद्र चौधरी
About the author:
जीतेंद्र चौधरी कुवैत में रहते हैं और लोकप्रिय हिंदी ब्‍लॉगर हैं। जीतू सॉफ्टवेयर और तकनीकी मार्केटिंग से जुड़े हैं लेकिन उनके मेरा पन्‍ना ब्‍लॉग पर कंप्‍यूटर की तकनीकी जानकारी से लेकर भारत के गांव तक की बातें पढ़ने को मिल जाती है। इसके अलावा जीतू हिंदी चिट्ठों के एग्रीगेटर नारद के संचालक हैं।
Read More >>
टिप्पणियाँ (1)add
आकार दोगुना हो
written by Anonymous on जून 11, 2008

सचमुच सुक्खी जैसा कोई नहीं| यह साबित कर दिया है जीतू भाई ने| कार्टून चित्र का डिफ़ॉल्ट आकार दोगुना होना चाहिए| मेरे जैसे चश्माधारियों को बहुत तक़लीफ़ होती है| कम से कम जितनी लंबी आड़ी रेखा है, उतना तो बढ़ाया जा सकता है|


password
 

 

   
Click here to lend your support to: Nirantar and make a donation at www.pledgie.com !

कुछ खोज रहे हैं?

विशेष आकर्षण

कोई भला चिट्ठा क्यों लिखना चाहेगा?
कोई भला चिट्ठा क्यों लिखना चाहेगा?
चिट्ठाकारी आसान है और नियमित चिट्ठा लेखकों को पुस्तक प्रकाशन के अनुबंध या स्वतंत्र लेखन कार्य द्वारा अर्थलाभ मिलना भी कोई असंभव काम नहीं है। सारांश में पढ़ें बिज़ स्टोन की पुस्तक "हू लेट द ब्लॉग्स आउट" से एक चुने हुये लेख "वाई वुड एनीवन वाँट टू ब्लॉग?" का रमण कौल द्वारा किया हिन्दी रूपांतर।
Read More >>

कौन है ऑनलाइन

लेखकों के लिये सूचना

क्या आप निरंतर के लिये लिखना चाहते हैं? तो आज ही "निरंतर मित्र" समूह के निःशुल्क सदस्य बनें!

ईमेल पता भरें:

कॉपीराईट संबंधी सूचना

निरंतर पर प्रकाशित सामग्री को अंतर्जाल पर पुनर्प्रकाशित नहीं किया जा सकता। प्रिंट प्रकाशनों हेतु (यदि अन्यथा इंगित न किया गया हो तो) निम्नलिखित नियम लागू होते हैं। संशय की स्थिति में हमसे patrikaa at gmail dot com पर संपर्क करें।
Creative Commons License