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	<title>Comments on: खुद को पत्नी माना ही नहीं कभी</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>By: Bharat Bhardwaj</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee#comment-335</link>
		<dc:creator>Bharat Bhardwaj</dc:creator>
		<pubDate>Thu, 08 May 2008 08:18:03 +0000</pubDate>
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		<description>चुसे आम से चेहरे वाली लेखिका मैञेयी पुष्पा पत्नी पद को गाली और प्रेमिका पद को सिंहासन समझती है। जबकि पति के पैसे पर संपादकों को कृतार्थ करती है। महुआ माजी को बदचलन कहती है,खुद भी तो पुरस्कार के लिए बुङ्ढे राजेन्द्र यादव ........खुद को महान, चिञा मुदगल, ममता जी के आगे यह स्तरहीन है, मस्तराम का फीमेल संस्करण। राजेन्द्र यादव को मरने दो इसे टके के भाव कोई नहीं पूछेगा.</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>चुसे आम से चेहरे वाली लेखिका मैञेयी पुष्पा पत्नी पद को गाली और प्रेमिका पद को सिंहासन समझती है। जबकि पति के पैसे पर संपादकों को कृतार्थ करती है। महुआ माजी को बदचलन कहती है,खुद भी तो पुरस्कार के लिए बुङ्ढे राजेन्द्र यादव &#8230;&#8230;..खुद को महान, चिञा मुदगल, ममता जी के आगे यह स्तरहीन है, मस्तराम का फीमेल संस्करण। राजेन्द्र यादव को मरने दो इसे टके के भाव कोई नहीं पूछेगा.</p>
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		<title>By: ragini</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee#comment-333</link>
		<dc:creator>ragini</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 02:17:03 +0000</pubDate>
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		<description>अभी आउटलुक साप्ताहिक में होली पर गीता श्री ने आजकल के हिन्दी साहित्य का मुखौटा उतार दिया। वहां स्त्री विमर्श के नाम पे यही हो रहा है। महुआ मांझी साहित्य की मल्लिका शेरावत बन गई है। राजेन्द्र यादव की सखि मैत्रेयी पुष्पा गाय नहीं लोमडी है। ये साहित्य का परिदृश्य इतना खराब कर चुकी हैं कि कोई भली लेखिका यहां नाम नहीं पा सकती। संपादक, प्रकाशक लेखिकाओं को सेक्स ऑबजेक्ट समझते हैं। राजकमल से छपने वाली हर लेखिका की यही विडंबना है। यह सच एक नंगा सच है। जिसे कोई ब्लॉग ही उघाङ सकता है। रागिनी गुप्त</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>अभी आउटलुक साप्ताहिक में होली पर गीता श्री ने आजकल के हिन्दी साहित्य का मुखौटा उतार दिया। वहां स्त्री विमर्श के नाम पे यही हो रहा है। महुआ मांझी साहित्य की मल्लिका शेरावत बन गई है। राजेन्द्र यादव की सखि मैत्रेयी पुष्पा गाय नहीं लोमडी है। ये साहित्य का परिदृश्य इतना खराब कर चुकी हैं कि कोई भली लेखिका यहां नाम नहीं पा सकती। संपादक, प्रकाशक लेखिकाओं को सेक्स ऑबजेक्ट समझते हैं। राजकमल से छपने वाली हर लेखिका की यही विडंबना है। यह सच एक नंगा सच है। जिसे कोई ब्लॉग ही उघाङ सकता है। रागिनी गुप्त</p>
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		<title>By: shilpi</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee#comment-334</link>
		<dc:creator>shilpi</dc:creator>
		<pubDate>Tue, 22 Apr 2008 02:16:38 +0000</pubDate>
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		<description>रागिनी का कहना सही है। हिन्दी जगत में लेखिकाओं के सामने वरिष्ठ मैत्रेयी का उदाहरण हो जो राजेन्द्र यादव की प्रेमिका बन कर हिन्दी में रानी मधुमक्खी का सा मजा उठाती है। तमाम पुरस्कार हथियाती है तो महुआ मांझी जैसी अति महत्वाकांक्षी औरतें क्यों पीछे रहें, जो साहित्य के बारे में विचार शून्य है। पंखुरी उसी के पदचिन्हों पर है अपने तलाक की गाथा किश्तों में लिख कर महान लेखका बनने की चाह में पोपले परमानंद को गाडफादर बना रही है। हिन्दी कथाजगत की नंगई की ईसी जगत में सबको खबर है।</description>
		<content:encoded><![CDATA[<p>रागिनी का कहना सही है। हिन्दी जगत में लेखिकाओं के सामने वरिष्ठ मैत्रेयी का उदाहरण हो जो राजेन्द्र यादव की प्रेमिका बन कर हिन्दी में रानी मधुमक्खी का सा मजा उठाती है। तमाम पुरस्कार हथियाती है तो महुआ मांझी जैसी अति महत्वाकांक्षी औरतें क्यों पीछे रहें, जो साहित्य के बारे में विचार शून्य है। पंखुरी उसी के पदचिन्हों पर है अपने तलाक की गाथा किश्तों में लिख कर महान लेखका बनने की चाह में पोपले परमानंद को गाडफादर बना रही है। हिन्दी कथाजगत की नंगई की ईसी जगत में सबको खबर है।</p>
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