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लाल परी - भाग 3

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प्रत्यक्षा सिन्हा
  

(गतांक से जारी)

सामने हॉल की घड़ी अपनी सुई आगे निर्ममता से खिसकाती जा रही थी। डेडलाईन डेडलाईन, केया की कटारी चल रही थी। नये पालिश्ड नाखुनों को अदा से लिपस्टिक्ड होठों से फूँकते हुये केया गुनगुनाई।

अरु ने गहरी साँस ली, नोटपैड और पेन उठाया और चल पडी बग्गा बाबा की शरण में। बग्गा बाबा, यूनीवर्सल बाबा थे, माने बुजुर्ग मददगार भीष्म पितामह। हर ऑफिस में किसी ऐसी शख्सियत की वेकेंसी हमेशा रहती है जो नये नवेले (और खासकर नयी नवेली) रंगरूटों को ऑफिस के मर्फी नियम समझाने का महत्त्वपूर्ण काम अंजाम देते हैं। बग्गा बाबा अरु की समस्या सुन मुस्काये। आखिर निर्वाण प्राप्ति कर चुके थे। एक प्रभामंडल सिर के चारों ओर नाच गया। आँखें मून्दी और उवाचे, "कैफेटेरिया चलो"।

लाल परीअरु की साँस अब जा कर थमी। कैफेटेरिया बग्गा बाबा का धर्मस्थल था। यहीं उनकी बुद्धि अपने तीक्ष्णतम बेस्ट पर होती थी। काली नीबू चाय की पहली घूँट पर कितने रंगरूटों की समस्या का निदान हुआ है, इस ऑफिस फोकलोर की कुँजी सबसे पहले रंगरूटों को थमाई जाती थी।

चाय खत्म की गई खरामा खरामा। एक चीज़ सैंडविच भी नष्ट किया गया। अरु केया की भेदी नज़रों को अनदेखा करते सीट पर लौटी। पिछले महीने की रिपोर्ट निकाली, एक्सेल पर अंको को एक्स्ट्रापोलेट किया। जहाँ मर्ज़ी हुई वहाँ टिक टैक टो खेलते हुये कहीं पाँच तो कहीं दस प्रतिशत का इज़ाफा किया। शीट पर रंगों की बौछार की, कहीं हाईलाईट किया, कहीं रंग बदला, कहीं फॉंट बडा किया, कहीं इटैलिक्स की और कहीं बोल्ड। ये खेल खेलने का समय था। डेडलाईन के  डेथलाईन होने में अभी दस मिनट का समय और था।

ठीक पाँच मिनट पहले खिर्के को रिपोर्ट मेल की। फिर एहसान जताते हुये एक हार्ड कॉपी भी उसकी मेज़ पर पटक आई। रिडिफमेल पे लॉग इन किया,
"केडी केडी कहाँ हो? आज बहुत बॉस ने परेशान किया"
"गोली मार दो उसे", केडी का जवाब दनदनाता हुआ आया।
"मैं भी अपने सहयोगी से परेशान हूँ, काश लाल परी तुम मेरे ऑफिस में होती..."
"तो"
"तो क्या"
"बुला लो अपने यहाँ", लाल परी इठलाई
"फिर हम हर वक्त आपको निहारा करें"
"अच्छा अभी काम है, फिर बात करता हूँ", केडी गायब। डू नॉट डिस्टर्ब का बोर्ड लटका कर फूट गया। अरु की भड़ास दिल में ही रह गई।

कोई बहुत बड़ी चीज़ बस उसकी मुट्ठी के सूत भर बाहर की दूरी पर हवा में तैर भर रही थी। बस किसी खास मौसम, किसी खास वक्त पर उसके हाथ आने ही वाली थी।

लंच टाईम हो चला था। नैना और अरु कैफ़े में अपनी कोने वाली टेबल पर विराजमान पाई गईं। खाना कम खाया गया और केया खिर्के जोड़ी को गालियाँ ज्यादा दी गईं। इससे हाज़मा सुधरता है ऐसा ज्ञानी लोग सदियों से कहते आ रहे हैं। सादे खाने में मिर्च मसाले की तरह बग्गा बघार दी गई और खाना खत्म होते होते अरु का मिजाज़ पूरी तरह नैना के मिजाज़ के समानान्तर आ चुका था। यहाँ काम करते करते विज्ञान की कई मूल नियमों की प्रैक्टिकल सत्यता से अरु रोज़ वाकिफ़ हो रही थी। वो दिन दूर नहीं था जब न्यूटन की तरह कोई सेब उसके सिर पर गिर कर कोई सिद्धांत साबित करवा लेता या फ़िर कोई यूरेका उसके होठों से उच्चारित होने होने को रह जा रहा था। कोई बहुत बड़ी चीज़ बस उसकी मुट्ठी के सूत भर बाहर की दूरी पर हवा में तैर भर रही थी। बस किसी खास मौसम, किसी खास वक्त पर उसके हाथ आने ही वाली थी। पर तब तक उसका एहसास भर भी काफ़ी था समय को आगे बढ़ाने के लिये।

लंच के आधे घंटे बाद खिर्के झाँक गया, "मैम ज़रा आईये केबिन में"।

खिर्के फोन पर व्यस्त था पर सामने रिपोर्ट पड़ी थी। लाल पेन से अंकों को बडे प्रेम से बार बार घेरा गया था। अरु बैठ गई। खिर्के की बात जारी थी। अरु ने खुर्दबीन लगाई। फोकस मोडा खिर्के की तरफ। आश्चर्य कि खिर्के था तो हैंडसम पर बडी कोशिश करता था खड़ूस दिखने के लिये। चेहरे पर भृकुटि हमेशा तनी रहती, खासकर अरु के सामने। अगले आधे घंटे में उसने अरु के इस विश्वास को फेवीकोली मजबूती देते हुये रिपोर्ट को तहस नहस कर डाला। इस भयंकर विध्वंस के बाद अरु पस्तहाल। लाईफ इज़ नॉट फेयर।

गनीमत था कि अगला दिन शनिवार था, मतलब छुट्टी। पर अभी हॉल में लोग छोटे छोटे ग्रुप्स में बँटे हुये थे। सबसे बड़े ग्रुप को प्रिसाईड कर रहे थे बग्गा, बग्गा बाबा। अरु को देख थंब्स अप का साईन दिया। खिर्के की झाड़ अभी ताज़ा थी सो अरु ने तवज्जो नहीं दी। केया जतीन के साथ व्यस्त थी। शायद आज के मीटिंग की व्यथा कथा पर जुगाली चल रही थी।

शाम मूड ठीक करने अरु शॉपिंग चल पडी। सिटी मॉल जाकर याद आया कि केडी से मिलने का समय आज का ही था। ग्राउंड फ्लोर पर बरिस्ता को नज़र अंदाज़ करते हुये लाईफ स्टाईल में घुस गई। टीशर्ट, कुर्ता, शीशे के बोल्स, टेबल मैट्स, अल्ल्म गल्ल्म खरीद कर अपने मिज़ाज़ का पारा संतुलित किया। नीचे आई। बरिस्ता को बाईपास करते हुये कॉफी कैफे डे में घुस गई। फर्न और पाम की झाडियों की ओट में पड़े सोफे पर बैठ गई। बड़ी धुकधुकाहट हो रही थी।

एक फूलदार शर्ट दिख रहा था, फ्रेंचकट दाढ़ी, बरमुडाज़, गोरा भभूका रंग। कहीं यही कूल ड्यूड तो नहीं।

क्या बरिस्ता एक बार देख आऊँ। समय, सात बज रहे थे। शायद केडी हो अब भी, शायद न हो। अरु जिस जगह बैठी थी वहाँ से बरिस्ता का एक कोना दिख रहा था। हॉट बटर्ड कॉफी ऑर्डर किया ऐपल पाई स्लाईस के साथ। स्टैंड पर से इवनिंगर उठाया और पढने का बहाना करते हुये अकेलापन छुपाया। एक फूलदार शर्ट दिख रहा था, फ्रेंचकट दाढ़ी, बरमुडाज़, गोरा भभूका रंग। कहीं यही कूल ड्यूड तो नहीं। या फिर कुर्ता जींस कोल्हापुरी वाला भी हो सकता है। एक टेबल और दिख रहा था। गोलमटोल, गोरा नारा, शरीफ़ शरीफ़। पर ना ना। आखिर कौन है कूल ड्यूड? लगता है बाहर जाकर बरिस्ता का एक चक्कर लगाना ही पड़ेगा। हो सकता है कोने पर जो अधेड़ अंकल जी, खिचड़ी बालों वाले दिख रहे हों वही कूल ड्यूड के खाल में छिपे मेमने हों।

अरु सोच विचार में डूबने उतराने का प्रैक्टिस कर ही रही थी कि अचानक सामने एक हैंडसम आदमी बैठ गया। स्टाईलिश लाल प्रोवोग की स्वेटर और स्टोनवाश्ड जीन्स। सोफ़े पर अधलेटा बैठा, हाथ में किताब। जब तक उसका ऑर्डर आता, पढ़ता रहा। अरु ने किताब की टाईटल देखने की कोशिश की, 'द मन्क हू सोल्ड द फ़ेरारी'। हुम्म्म, माल है माल। चेहरा पहचाना लग रहा था। शायद कोई टीवी ऐक्टर। अरु ने दोबारा ध्यान से देखा। डबल टेक !!! (क्रमशः)


ढम्म्म ढम्म्म्म।

नगाड़े ही नगाड़े बज उठे। आखिर कौन था ये शख्स जिसने अरु को हैरत में डाल दिया ? कद्रदान, मेहरबान, ज़रा दिमाग पर ज़ोर डालिये, चलिये न भी डालिये ये काम हम कर डालेंगे,पर हुज़ूर एक इशारा तो करें...रहस्य पर से पर्दा उठना तो है या फ़िर पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ, पर्दा जो उठ गया तो भेद खुल जायेगा, तो...पर्दे में रहने दो पर्दा न उठाओ।


प्रत्यक्षा सिन्हा
About the author:
जन्म: 26 अक्तूबर 1963 को गया, भारत में।
सम्प्रति: प्रबंधक वित्त, पॉवरग्रिड आफ इंडिया लिमिटेड, गुड़गांव में कार्यरत।
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टिप्पणियाँ (1)add
लालपरी 3
written by पीयूष on फ़रवरी 19, 2007

कहानी की कसम यार अब तो खपाऊ लग रही है ये स्टोरी कुछ मसाला बढ़ाओ प्रभू , और थोड़ा पाठकों को भी रिप्लाई किया कीजिये………। अभी मिर्ची और लगाईये लेकिन पर्दा मत उठाईये…। थोड़ा कूल ड्यूड के बारे में बताईये और इस खिर्के का हवा पानी ठीक कीजिये

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