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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; अनूप शुक्ला</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>जापानी हायकू का उल्लेखनीय भावानुवाद</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 08:08:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Haiku]]></category>

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		<description><![CDATA[जापानी साहित्य की एक प्रमुख विधा हायकू तीन पंक्तियों में लिखी जाने वाली कविता है। कुल सत्रह अक्षरों में पूर्ण अर्थ संप्रेषित करना हायकू की कसौटी होती है। <strong>अनूप शुक्ला</strong> ने हाल ही में श्रीमती <strong>डा.अंजलि देवधर</strong> द्वारा किये मूल जापानी से अंग्रेजी में अनुदित 32 महत्वपूर्ण कवियों की 100 उत्कृष्ट हायकू कविताओं के हिंदी में उल्लेखनीय अनुवाद पढ़ा और काफी प्रभावित हुये।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="width:250px;float:right;padding:10px;margin:10px;background:#E5E5E5">
<h3>डा. अंजलि देवधर के जापानी -अंग्रेजी -हिंदी हायकू अनुवाद से कुछ हायकू</h3>
<p>लड़खड़ाती अनाथ गौरैया,<br />
        आओ और खेलो!<br />
        मैं हमेशा तुम्हारा साथी हूं।<br />
      <strong>  -कोबायासी इस्सा</strong>  </p>
<p>एक स्त्री<br />
        एक टब में नहाती हुई<br />
        एक कौए की चाह बन गई!<br />
      <strong>  -ताकाहामा कियोशी</strong>  </p>
<p>एक मक्खी बैठी<br />
        स्तन पर<br />
        जिसे सोता शिशु भूल गया चूसना।<br />
      <strong>  -हीनो सोजो</strong>  </p>
<p>टिमटिमाती बत्तियां<br />
        जुगनुऒं की<br />
        अल्प आयु की भविष्य-व्यक्ता हैं।<br />
      <strong>  -कावाबाता बोशा</strong>  </p>
<p>एक पतझड़ की सांझ<br />
        एक घंटा विश्राम का<br />
        एक झणिक जीवन में<br />
      <strong>  -योसा बुसान</strong>  </p>
<p>ओस की बूंद<br />
        बैठी एक पत्थर पर<br />
        एक हीरे के समान<br />
      <strong>  -कावाबाता बोशा</strong>  </p>
<p>गौरैया खेल रही<br />
        छुपा-छुपा<br />
        चाय के फूलों के बीच में।<br />
      <strong>  -कोबायाशी ईस्सा</strong>  </p>
<p>एक नया वर्ष आरम्भ हुआ<br />
        खिल जाने से<br />
        एक तुषारायित गुलाब के।<br />
      <strong>  -मिजुहारा शुओशी</strong> </p>
</p></div>
<p>
<div class=dropCap>प्र</div>
<p>त्येक भाषा के साहित्य में देशकाल और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधायें प्रचलित होती रही हैं। जापानी साहित्य की ऐसी ही एक प्रमुख विधा हायकू है। अपने छंद विधान के कारण हायकू विश्व की दूसरी भाषाऒं में भी प्रचलित हो रहे हैं। हिंदी में भी हायकू नव्यतम काव्य विधा के रूप में पर्याप्त लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। </p>
<p>हायकू को काव्य विधा के रूप में प्रचलित करने का श्रेय जाता है प्रमुख जापानी साहित्यकार मात्सुओ बासो (1644 &#8211; 1694) को। बासो से शुरू होकर हायकू जापनी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ और कालान्तर में विश्व साहित्य की निधि बन चुका है। </p>
<p>हायकू तीन पंक्तियों में 17 अक्षरों में लिखी जाने वाली कविता है। पहली पंक्ति में 5, दूसरी पंक्ति में 7 और तीसरी पंक्ति में पांच अक्षर होते हैं। कुल सत्रह अक्षरों में पूर्ण अर्थ संप्रेषित करना हायकू की कसौटी होती है। इस तरह हायकू गागर में सागर भरने की क्षमता की पहचान का पैमाना होता है। </p>
<p>जापानी कविता में हायकू काव्य में प्रमुखत: प्रक्रति से संबंधित भाव व्यक्त किये जाते रहे। हिंदी में भी हायकू कविता विधा में कवितायें लिखी जा रही हैं। मूल जापानी के हायकू के अनुवाद भी हिंदी में उपलब्ध हो रहे हैं जिसके द्वारा हायकू के बारे में जानकारी मिलती है। </p>
<p>जापानी कविता हायकू का ऐसा ही उल्लेखनीय अनुवाद का कार्य श्रीमती डा.अंजलि देवधर ने किया है। उन्होंने मूल जापानी से अंग्रेजी में अनुदित 32 महत्वपूर्ण कवियों की 100 उत्कृष्ट हायकू कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है। वसन्त, ग्रीष्म, पतझड़, शरद और नववर्ष की इन उत्कृष्ट हायकू कविताऒं का चयन और अंग्रेजी अनुवाद नगोया, जापान के प्रोफेसर युजुरु मियुरा ने किया है।</p>
<p>जापानी से अंग्रेजी में अनुवाद और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद टटल प्रकाशन अमेरिका द्वारा किया गया। </p>
<p>जापानी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने में इन हायकू कविताऒं के 5-7-5 का छ्न्द विधान का निर्वाह नहीं हो पाया भाषा भी थोड़ी क्लिष्ट हो गई लेकिन कविताऒं का भावानुवाद करने का कठिन कार्य करने के लिये डा.अंजलि देवधर करने के लिये बधाई की हकदार हैं। उसके इस कार्य से हिंदी भाषियों की जापानी काव्य विधा हायकू की जानकारी मिलना सम्भव हो सका। </p>
<p>डा. अंजलि देवधर ने अपनी पुस्तक को अपने पति डा.श्रीधर देवधर को आभार स्वरूप अर्पित किया है जिनकी दी धनराशि से यह पुस्तक छपी। उत्कृष्ट हायकू का हिंदी में भावानुवाद प्रस्तुत करके डा.अंजलि देवधर ने उल्लेखनीय काम किया है। </p>
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		<title>हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 08:07:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[मार्च 2006 में इन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारी की शुरुआत की और देखते ही देखते सबके मन को भा गये। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व है। कच्चा चिट्ठा में इस बार बमार्फ़त <strong>अनूप शुक्ला</strong> भेंट कीजिये <a href="http://udantashtari.blogspot.com/">उड़नतश्तरी</a> के लेखक <strong>समीरलाल </strong>से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://udantashtari.blogspot.com/">
<div class=dropCap>उ</div>
<p>ड़नतश्तरी</a> के लेखक समीर लाल की सक्रियता देखकर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि उन्होंने गये साल ही लिखना शुरू किया। हलके-फुल्के अंदाज़ में गहरी बात कह जाने वाले समीरजी अपनी बात कहने के नये-नये दिलकश अंदाज़ खोजते रहते हैं। चाहे वह गीता का सार हो या कबीर के दोहे, आधुनिक परिस्थितियों से जोड़कर वे बेहतरीन लेख लिखते रहते हैं। कुंडलिया किंग समीर ने चिट्ठाजगत को कुंडलिया से परिचित कराया और फिर धीरे से उसका पेटेंट मुंडलिया के नाम से करा लिया। पंकज के लालाजी का ज्ञान का प्रकाश ही था जिससे चकाचौंध होकर गिरिराज जोशी उनका शिष्यत्व ग्रहण करने के लिये बेताब हुये।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 3px 8px;" title="Sameer Lal" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/sameer-lal.jpg" border="0" alt="Sameer Lal" hspace="8" vspace="3" width="139" height="161" align="left" />मूलत: पूर्वी उत्तरप्रदेश (गोरखपुर) के वासी समीर की पैदाइश रतलाम की और ज्यादातर रिहाइश मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जबलपुर की है। आज के लोकप्रिय चिट्ठाकार समीरलाल में लेखन के कीटाणु बचपन से ही थे। उन दिनों को याद करते हुये समीरजी बताते हैं, &#8220;एक बार बचपन में कहानी लिखना शुरु किया था जब क्लास पाँचवीं में था शायद। जबलपुर से प्रकाशित &#8220;ज्योतिर्मिलन&#8221; मासिक के बाल विषेशांक में कहानियां प्रकाशित हुई और बाल साहित्यकार का पुरस्कार मिला जिसे घोषणा के तीन वर्ष उपरान्त प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के हाथों प्राप्त किया।&#8221; स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है।</p>
<div id="pullQuoteR">स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है</div>
<p>लेकिन स्कूल के दिनों के बाद शायद जीवन संघर्षों के कारण लिखना स्थगित रहा। इस बारे में समीरजी कहते हैं, &#8220;फिर कभी नहीं लिखा, बस आम युवकों की तरह कॉलेज की कापियों के आखिरी पन्नों पर कुछ शेरो शायरी और कवितायें लिखीं। पिछले एक वर्ष से नियमित लेख कवितायें, व्यंग्य की ओर पुनः रुझान हुआ जो चिट्ठों के माध्यम से गति प्राप्त करता गया और वही ऊड़न तश्तरी, ई-कविता और अनुभूति याहू ग्रुप के माध्यम से सबके सामने है।&#8221; आचार्य रजनीश को सुनने के शौकीन समीर को किताबें पढ़ने, पेंसिल-स्केचिंग करने और शास्त्रीय संगीत सुनने का भी शौक है। अंग्रेजी कवि राबर्ट फ्रॉस्ट इनके पसंदीदा कवि हैं जिनकी कई कविताऒं का आपने भावानुवाद भी किया है।</p>
<p>लेखन के अलावा कालेज के दिनों में अपने तमाम इतर अनुभवों की दास्तान बताते हुये समीर कहते हैं, &#8220;सी.ए. करने के दौरान बम्बई की छात्र राजनिति में सक्रिय रहा, हॉस्टल एसोसियेशन और छात्र संघ के महामंत्री, फिर बाद में, काँग्रेस में सक्रिय भूमिका रही। मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के औद्योगिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष, कमलनाथ जी के संयोजन में म.प्र. जनजागरण मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री, जबलपुर चार्टड एकाउन्टेन्ट एसोसियेशन के उपाध्यक्ष, जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स के ट्रेज़रार और उपाध्यक्ष भी रहा। इस दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय रोजगार मेलों का जबलपुर में आयोजन किया। राजनेताओं से संपर्क रखने का तब बहुत शौक था और साथ ही आचार्य रजनीश, महेश योगी, शंकराचार्य स्वरुपानन्द जी और स्वामी प्रज्ञानन्द जी आदि से व्यक्तिगत परिचय और उनकी विभिन्न संस्थाओं का ऑडिटर और सलाहकारी भी रहा।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, &#8220;अच्छा लिखा है। लिखते रहें।&#8221;</div>
<p>समीरलाल <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com">चिट्ठाचर्चा</a> में नियमित लिखते हैं, और जिस दिन ये लिखें उस दिन इस चिट्ठे के हिट्स की संख्या हनुमान की पूँछ बन जाती है। टिप्पणी करने के मामले में समीर बेहद उदार हैं, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, &#8220;अच्छा लिखा है। लिखते रहें।&#8221; आजकल कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करने वाले समीरलाल जी अपनी जमाऊ कविताऒं से अपना रंग जमाने लगे हैं और श्रोताऒं के बीच वे लोकप्रिय कवि हो गये हैं। पिछ्ले एक वर्ष में ही बफैलो, वाशिंगटन में कवि सम्मेलन और जबलपुर में कुछ काव्य गोष्ठियां और एकल काव्य पाठ का उन्हें मौका मिला।</p>
<p>समीरलालजी बम्बई से सी.ए. कर वापस गृहनगर जबलपुर में प्रैक्टिस करने लगे। 1999 में वे कनाडा आ गये, दोनों बेटों को १२वीं तक भारत में ही पढ़ाया ताकि वो अपनी संस्कृति को समझ सकें और उससे जुड़ सकें, दोनों अब कम्प्यूटर इंजीनियर हैं। खुद कनाडा आकर शेयर बजार के कोर्स कर पहले स्टाक एक्सचेंज पर यहां की एक बड़ी बैंक के लिये ट्रेडर रहे। न जाने कब तकनीक की तरफ रुझान हो गया। सब कुछ इन्टरनेट से ही सीखा, फिर माईक्रोसॉफ्ट एक्सेल एक्सपर्ट, एक्सेस एक्सपर्ट आदि के रास्ते चलते हुये आऊटलुक प्रोग्रामिंग में महारत हासिल की। अब विज़ुअल बेसिक डॉटनेट में सिद्धता के दम पर उसी बैंक में बतौर तकनीकी सलाहकार कार्यरत हैं। इसी बीच अमेरिका से ही अकाउंटिंग से संबंधित सी.एम.ए और प्रोजेक्ट मेनेंजमेंट में पीएमपी पूरण किया। संप्रति बैंक की विभिन्न मेन्यूल कार्यप्रणाली को आटोमेट करने के कार्य में सलाहकार हैं। स्पष्टतः समीर में लगातर नया ज्ञान, नया विज्ञान सीखने की ललक हैं।</p>
<p>मार्च 2006 में समीरलाल ने ब्लॉग लेखन की शुरुआत की और देखते ही देखते लोकप्रिय हो गये हैं। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं। मजाक करो तो मजाक सहने का माद्दा भी रखो का सिद्धांत मानने वाले समीर हास्य व्यंग्य के महारथी हैं लेकिन किसी का भी दिल दुखाना इनकी फितरत में नहीं है। एकाध बार तो अपनी पोस्ट तक यह सोचकर हटा ली कि किसी का दिल न दुखे। लेखन से मजाकिया और बिंदास से लगने वाले समीर को &#8220;लेखन शैली के विपरीत और व्यवसायिक मजबूरियों के अलावा स्वाभाव से शांत और गंभीर रहना पसंद है।&#8221; अपने स्वभाव के एक और पहलू का खुलासा करते हुये कहते है: &#8220;गुस्सा बहुत मुश्किल से ही आता है।&#8221; हिंदी चिट्ठाकारी को संभावनाशील मानने वाले समीरजी का विचार आगे चलकर भारत में ही बसने का है। फिलहाल भारत में कुछ ट्रस्टों से जुडे़ हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं।</div>
<p>ब्लॉग लेखन में पत्नी के सहयोग का जिक्र करते हुये समीरजी खुलासा करते हैं, &#8220;पत्नी का योगदान ही है कि पूर्ण खाली समय ब्लॉग और लेखन को देने का बिल्कुल बुरा नहीं मानना, तभी इतना समय देना संभव हो पाता है। बाज़ार से लेकर घर के सारे खुद ही कर लेती है। गायन में उनकी काफी रुचि है जो रियाज़ के अभाव में लगभग छूटा हुआ है। किताबें पढ़ने का शौक है मगर एम.ए. हिन्दी में होने के बावजूद भी लेखन में रुझान नहीं। उनका मानना है कि अगर दोनों ही यह करने लगे, तो घर चल चुका। बात तो पते की है, इसलिये हम इसे तुरंत मान लेते हैं।&#8221;</p>
<p>चार पांच घंटे से ज्यादा सोने को समय की बरबादी मानने वाले समीर ब्लॉग लेखन के अलावा तरकश की कोर टीम के सदस्य भी हैं। इसके अलावा अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, साहित्यकुंज, मुक्तक सागर पर रचनायें प्रकाशित हुई हैं। एक्सेल पर अंग्रेजी में ब्लॉग <a href="http://www.sameerlalcanada.blogspot.com/">टेक नोट एक्सचेन्ज</a> और वीबी डॉट नेट पर कई ऑनलाईन पत्रिकाओं में अनेकों लेख भी प्रकाशित। समीर टाईम्स के नाम से सन 2000 में एक वेबसाईट शुरु की जो कि आज भी सुचारु रुप से चल रही है। बस मौज मजे के लिये मगर हिट्स ठीक ठाक मिल जाती हैं।</p>
<p>बहुप्रतिभाशाली समीर को निरंतर लिखते रहने और आगे प्रगति करते रहने के लिये निरंतर टीम की हार्दिक शुभकामनायें।</p>
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		<title>हिन्दी समांतर कोश: एक विराट प्रयास</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 07:01:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Thesaurus]]></category>

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		<description><![CDATA[शब्दकोश से आप किसी भी शब्द का अर्थ जान सकते हैं। लेकिन यदि आप किसी सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश अपने हाथ खड़े कर देगा। ऐसे में आपको थिसारस की शरण में जाना होगा। <strong>अनूप शुक्ला</strong> बता रहे हैं अरविंद व कुसुम कुमार द्वारा २० साल के अथक परिश्रम से तैयार <strong>हिन्दी समांतर कोश</strong> के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img title="Samantar Kosh" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/samantar-kosh.jpg" border="0" alt="Samantar Kosh" hspace="5" vspace="5" width="231" height="301" align="right" /></p>
<div class="dropCap">आ</div>
<p>प किसी भी भाषा प्रयोग करते हों, शब्दकोश से अवश्य परिचित होंगे। शब्दकोश की सहायता से आप किसी भी शब्द का अर्थ जान सकते हैं।</p>
<p>आप कुछ पढ़ रहे हैं और कोई नया शब्द आपने पढ़ा जिसका अर्थ आपको नहीं पता तो आप अपने पास उपलब्ध शब्दकोश में उसका अर्थ देखकर लिखे हुये को समझ सकते हैं। लेकिन यदि आप कुछ लिख रहे हैं और अपने विचार को अभिव्यक्त करने के लिये किसी सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश आपकी सहायता नहीं कर पायेगा। शब्दकोश आपको किसी शब्द का अर्थ बता देगा लेकिन बात कहने के लिये अगर आप सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश अपने हाथ खड़े कर देगा।</p>
<p>ऐसे में आपको थिसारस की शरण में जाना होगा। हिंदी में थिसारस का पर्याय है &#8211; समांतर कोश। जानेमाने शब्दविद् अरविंद कुमार नें वर्षों की मेहनत कर इसी नाम से हिंदी के पहले थिसारस का प्रकाशन किया है। लेकिन &#8220;समांतर कोश&#8221; के बारे में बताने के पहले आपको थिसारस के बारे में और जानकारी दे दें।</p>
<h2><strong>थिसारस क्या है</strong></h2>
<p>थिसारस यूनानी शब्द थैजो़रस का हिंदीकरण है। इस का अर्थ ही है कोश। शब्दश: थिसारस भी एक तरह का शब्दकोश होता है क्योंकि इसमें शब्दों का संकलन होता है। वास्तव में थिसारस या समांतर कोश और शब्दकोश एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं। किसी शब्द का अर्थ जानने के लिये हम शब्दकोश का सहारा लेते हैं। लेकिन जब बात कहने के लिये हमें किसी शब्द की तलाश होती है, तो लाख शब्दों के समाए होने के बावजूद शब्दकोश हमें वह शब्द नहीं दे सकता, जब कि थिसारस यह काम बड़ी आसानी से कर सकता है।</p>
<h2><strong>कैसे काम करता है थिसारस</strong></h2>
<div id="pullQuoteR">समांतर कोश में किसी भी शब्द के अनेक विकल्प होते हैं। इस का अर्थ यह है कि आप किसी भी ज्ञात शब्द के सहारे किसी अज्ञात या विस्मृत शब्द तक तत्काल पहुंच सकते हैं।</div>
<p>समांतर कोश में किसी भी शब्द के अनेक विकल्प होते हैं। इस सीमित अर्थ में वह पर्याय कोश होता है। लेकिन इससे बहुत आगे जाकर वह हमें उस के विपरीत अर्थों वाले शब्दों तक, और हम चाहें तो उस से संबंधित अन्य समांतर शब्द समूहों तक ले जा सकता है। जैसे कि <em>विवाह</em> के साथ<em> विवाह विच्छेद</em> भी, और विवाह की<em> सगाई</em>,<em> घुड़चड़ी</em> आदि रस्मों तक भी। और क्योंकि विवाह एक संस्कार होता है, इसलिये <em>मुंडन</em>,<em> उपनयन</em> आदि सोलह संस्कारों तक भी। साथ ही विवाह गृहस्थ आश्रम का प्रवेश बिंदु है अतः <em>गृहस्थ आश्रम</em> के साथ साथ <em>संन्यास</em>,<em> वानप्रस्थ</em> और <em>ब्रह्मचर्य</em> आश्रमों तक भी। दो चार पन्ने ऊपर नीचे पलट कर आप <em>विवाह निष्ठा</em>, <em>अनिष्ठा</em>,<em> परनारी</em>,<em> परपुरुष</em> आदि शब्द समूहों की जानकारी हासिल कर सकते हैं, और <em>वेश्या</em>, <em>वेश्यालय</em>, <em>कुटनी</em> आदि की भी।</p>
<p>इस का सीधा अर्थ यह है कि आप किसी भी ज्ञात शब्द के सहारे किसी अज्ञात या विस्मृत शब्द तक तत्काल पहुंच सकते हैं।</p>
<div id="boxR">
<h2><strong>कैसे बना समांतर कोश</strong></h2>
<p>हिंदी के लिये उपयुक्त संदर्भ क्रम बनाने के लिये कोई समीचीन आधार नहीं था जिस पर समांतर कोश का ढांचा खड़ा किया जा सके। हिंदी के पहले थिसारस के लिये नयी जमीन तैयार करना आवश्यक था। पहले समांतर कोश का ढांचा रौजेट के अंग्रेज़ी थिसारस के आधार पर खड़ा करने की कोशिश की गयी। लेकिन अंग्रेज़ी के मुका़बले हिंदी थिसारस की आवश्यकतायें बिल्कुल अलग निकलीं। अंग्रेज़ी और हिंदी के भावों की बहुत सी परस्परतायें बिल्कुल अलग हैं। वहां एक शब्द से जो संदर्भ जुड़ते हैं वे हिंदी में नहीं बनते। इसलिये अंग्रेज़ी थिसारस का ढांचा हिंदी थिसारस के लिये अनुपयुक्त पाया गया। साथ ही अंग्रेज़ी में आम तौर पर एक वस्तु का एक ही नाम होता है। <em>आम</em> है तो उस के लिये बस एक <em>मैंगो</em> शब्द है और उस का एक तकनीकी नाम है लैटिन में <em>मांगीफेरा इंदीका</em>। लेकिन हिंदी में आप<em>आम</em> को कितने ही नामों से पुकार सकते हैं। यह हमारी भाषाऒं की विशेषता है जो हमें अपनी बात कहने के लिये बड़े रोचक ढंग देती है। लेकिन इसका एक परिणाम यह हुआ कि समांतर कोश का आकार अंग्रेज़ी के बड़े अंतरराष्ट्रीय संस्करण वाले थिसारसों से कई गुना बड़ा हो गया।</p>
<p>और फिर जब समांतर कोश के लिये अपने प्राचीन <strong>अमरकोश</strong> को आदर्श बनाने की बात सोची गयी तो थोड़े ही दिनों में मुंह मोड़ लेना पड़ा। वह अपनी किस्म का बेजोड़ ग्रंथ है, लेकिन वर्ण व्यवस्था के उत्कर्ष काल में बना था। उस में मानव क्रियाकलाप को वर्णों के आधार पर रखा गया है। बौद्धिक गतिविधि ब्राह्मण वर्ण के अंतर्गत, युद्ध और शस्त्रास्त्र क्षत्रिय वर्ण के साथ&#8230;। आज के भारत में इस प्रकार का वर्गीकरण एकदम अस्वीकार्य होगा।</p>
<p>इस तरह हिंदी का पहला थिसारस तैयार करने वालों के पास तरह तरह से हेरफेर कर नये ढांचों पर काम कर के देखने के अलावा कोई चारा न था। कम से कम पांच बार काम का ढांचा बदला गया। कामचलाऊ ढांचा बनते बनते करीब चौदह साल निकल गये। ये साल बेकार गये, ऐसा नहीं हुआ। इस दौरान शब्दों का अंकन कार्ड पर होता रहा। इसलिये सही ढांचे के अभाव में भी थिसारस के लिये शब्द संकलन तो चलता ही रहा। और यह 2,60,000 अभिव्यक्तियों से बडा हो गया था। इन कार्डों पर अंकित शब्द समूहों की पूरी खोज खबर रख पाना थिसारस के निर्माण में लगे लोगों की स्मरणशक्ति  और सामर्थ्य से बाहर हो गया। अत: उनको इसका कम्प्यूटरीकरण करना पड़ा। इससे न सिर्फ यह असंभव सा लगने वाला काम पूरा हो पाना संभव हो सका बल्कि समांतर कोश को बनाने में लगे लोगों का कम्प्यूटर की अद्भुत क्षमता से परिचय आरंभ हुआ और वे असंभव से सपने साकार होने लायक हो गये।</p></div>
<h2><strong>समांतर कोश का पहला संस्करण</strong></h2>
<p>कम्प्यूटरी करण के दौरान 2,60,000 शब्दों से बढ़ते-बढ़ते 5,40,000 से अधिक अभिव्यक्तियों का संकलन हो गया। उसमें हर कोटि के बहुविस्तार में जाने का प्रयास किया गया। मान लीजिये, <em>आकाश पिंड</em>। तो हर प्रकार के <em>आकाश पिंड</em> के लिये शब्द जमा हो गये। उसके बाद <em>तारा</em> कोटि के अंतर्गत पहले <em>तारामंडलों</em> के नाम, जहां तक संभव हो सका, हिंदी, अंग्रेज़ी और उनके तकनीकी लैटिन नाम भी। फिर हर तारा मंडल के अंतर्गत आने वाले तारों के नाम, हर <em>मंडल</em> के <em>योग तारे</em> का नाम, और यदि उपलब्ध हो तो उनके पर्यायवाची भी। या राशिचक्र में पहले राशिचक्र के अनेक पर्यायवाची और फिर राशियों के विविध समूहों के नाम, बाद में हर राशि के अंतर्गत उसके अपने पर्यायवाची, हिंदी, उर्दू, अरबी, लैटिन आदि नाम।</p>
<p><em>देवी देवताऒं</em> या <em>ईश्वर</em> के नामों को लें। हमारी भाषायें इनके पर्यायवाचियों से लदी-पड़ी हैं। स्वयं <em> ईश्वर</em> के<br />
हजारॊं नाम हैं। फिर ईश्वर संबंधी मान्यताऒं की कोटियां: जैसे<em> ब्रह्म,</em><em> साकार</em>, <em>निराकार</em>,<em> भगवान</em>,<em> पुरुष</em>,<em> हिरण्यगर्भ</em>, <em>अल्लाह</em>। इनके बाद<em> त्रिमूर्ति।</em> ब्रह्मा, विष्णु, महेश। अब महेश को लें। शिव के नामों की संख्या 2,317 है। और विष्णु के चौबीस अवतार, दशावतार राम, कष्ण&#8230;।</p>
<p>दैनिक जीवन में भाषा के आम उपभोक्ता को इतने विस्तार में जाने की आवश्यकता शायद ही कभी पड़ती हो। अत: समांतर कोश के पहले संक्षिप्त संस्करण में 1,60,850 अभिव्यक्तियों का संकलन तैयार किया गया है। इसमें अंग्रेज़ी आदि भाषाऒं के केवल वही शब्द रखे गये  हैं, जो बोलचाल का हिस्सा बन गये हैं या जिन से किसी नये हिंदी शब्द का संदर्भ स्पष्ट होता है।<br />
<23><strong>समांतर कोश का उपयोग कैसे किया जाय</strong></h2>
<p>समांतर कोश दो भागों में है। एक भाग है <strong>अनुक्रम खंड </strong>और दूसरा है <strong> संदर्भ खंड</strong>। अनुक्रम खंड में अकारादि क्रम में उन सभी शब्दों की सूची दी है जो कि समांतर कोश में शामिल हैं। आप अनुक्रम खंड में अपने भाव या विचार के निकटतम कोई भी शब्द खोजिये। इसके सामने इनका पता संख्याऒं में लिखा है। अब आप संदर्भ खंड खोजिये। यहां हर शीर्षक और उपशीर्षक की एक संख्या है। आप संदर्भ खंड में अनुक्रम खंड में लिखे पते को खोजिये और आप अपने मनचाहे शब्द तक पहुंच जायेंगे।</p>
<p>इस सब के लिये समांतर कोश यह मानकर चलता है कि आप को जिस भाव के लिये शब्द की तलाश है, उस से संबंधित या विपरीत कोई एक शब्द आपको जरूर याद होगा। मान लीजिये आप को निकाह शब्द की तलाश है, और आपको विवाह शब्द याद है। <strong>अनुक्रम खंड</strong> में खोज शब्द विवाह के नीचे कई गंतव्य हैं। उनमें से एक है <strong>विवाह 799.1</strong>। निकाह के लिये स्वभावत: आप संदर्भ खंड में इसी पते पर जायेंगे।</p>
<blockquote><p><strong>विवाह</strong><br />
गृहस्थाश्रम प्रवेश 235.8<br />
मैट्रिमनी- 798.33<br />
वर्जित दृश्य सूची-463.33<br />
विवाह- 799.1 &lt;=<br />
विवाह उत्सव- 799.2<br />
सोलह संस्कार सूची-798.3<br />
<strong>विवाह अनिष्ठा</strong><br />
विवाह अनिष्ठा- 806.1&lt;=</p>
<p><strong>विवाह अभिशून्यन</strong><br />
विवाह लोप- 804.11</p></blockquote>
<p>संदर्भ खंड में आप देखेंगे कि<strong> 799 </strong>शीर्षक ही <strong>विवाह</strong> का है। इसमें उपशीर्षक 1 में विवाह के 39 पर्याय हैं, जिन में से एक है निकाह।</p>
<blockquote><p>1. सं<strong> विवाह</strong>, अक़द, अटूट संबंध, अहद, ऊढ़ि, गँठजोड़, गठजोड़, गठबंधन, गाँठ, निकाह, परिणय, पाणिग्रह, पाणिग्रहण, पाणिबंध, फेरे, बरकाज, बियाह, ब्याह, ब्रह्मचर्यांत, मैरिज(अं), रिश्ता, लगन, लग्न, विवाह बंधन, विवाह संबंध, विवाह संस्कार, वैध यौन संबंध, शादी, संबंध, सप्तपदी, सहचर्या, सहबंधन, सात फेरे, सात वचन, साथ, साहचर्य, हाथ पकड़ाई.</p></blockquote>
<div id="boxL" style="background:#ffffff">
<h2><strong>लेखक परिचय</strong></h2>
<p><img title="Arvind-Kusum" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/arvind-kusum-kumars.jpg" border="0" alt="Arvind-Kusum" hspace="5" vspace="5" width="239" height="205" align="center" /></p>
<p><strong>अरविंद कुमार</strong> का जन्म उत्तर प्रदेश के नगर मेरठ में 17 जनवरी, 1930 को हुआ। 1943 में उनका परिवार दिल्ली आ गया। वे अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. हैं और माधुरी और सर्वोत्तम के प्रथम संपादक। पत्रकारिता में उन का प्रवेश सरिता (हिंदी) से हुआ। कई वर्ष कैरेवान ( अंग्रेज़ी) के सहायक संपादक रहे। कला, नाटक, और फिल्म समीक्षाऒं के अतिरिक्त उन की अनेक फुटकर कवितायें, लेख, कहानियां प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाऒं में प्रकाशित हुई हैं। शेक्सपीयर के जूलियस सीजर के काव्यानुवाद का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिये इब्राहिम अल्काजी के निर्देशन में हुआ। अरविंद कुमार ने सिंधु घाटी सभ्यता की पृष्ठभूमि में इसी नाटक का काव्य रूपान्तर भी किया है, जिस का नाम है &#8211; विक्रम सैंधव।</p>
<p><strong>श्रीमती कुसुम कुमार</strong> का जन्म 8 दिसम्बर 1933 को मेरठ में हुआ। वे बी.ए., एल.टी. हैं। दिल्ली के सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हिंदी और अंग्रेज़ी पढा़ती रही हैं। दोनों का विवाह 1959 में दिल्ली में हुआ।</div>
<h2><strong>हिंदी समांतर कोश से आगे की संभावनायें</strong></h2>
<p>हिंदी में समांतर कोश के निर्माण के दौरान कम्प्यूटर की क्षमताऒं से परिचित होने के कारण यह विलक्षण सपना देखा गया कि भारत की सभी भाषाऒं के शब्दों की 18 लड़ियों की एक भव्य मणिमाला तैयार की जाये। भारतमाता के गले की शोभा बनने वाली इस मणिमाला के सहारे हिंदी के समांतर कोश या किन्हीं भी दो या अधिक भाषाऒं के संयुक्त समांतर कोश बनाये जाने की योजना है। यह काम बहुत कठिन है लेकिन आज की कंप्यूट्रर की दुनिया में यह पूरी तरह संभव है। समांतर कोश बनाने वाले अरविंद कुमार और कुसुम कुमार का कहना है-</p>
<blockquote><p>हमारे पास उसकी योजना भी है, कार्यनीति भी। चाहिये बस एक विराट प्रयास, एक विराट सहयोग, और शुभकामनायें आप की ओर से और हर भाषा के उत्साही कर्मियों की ओर से।</p></blockquote>
<h2><strong>कैसे रचा गया समांतर कोश</strong></h2>
<p>हिंदी के प्रथम समांतर कोश के रचयिता अरविंद कुमार मुंबई में 1963 से फिल्म पत्रिका माधुरी के संपादक थे। धीरे-धीरे वे फिल्म पत्रकारिता से ऊब चुके थे और कुछ सार्थक करने को छ्टपटा रहे थे। अन्य भाषा कर्मियों की तरह उन के मन में भी अभिलाषा थी कि हिंदी में भी थिसारस हो।</p>
<p>26 दिसंबर, 1973 को सोते सोते उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य सूझा -समांतर कोश की रचना। आरंभिक तैयारी के बाद 19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदवरी नदी में स्नान करके उन्होंने अपनी कुसुम कुमार के साथ समांतर कोश पर काम करना शुरू किया। मुंबई में केवल सुबह शाम के श्रम से इसे पूरा न होते देख कर वे माधुरी को त्याग कर मई 1978 में सपरिवार दिल्ली पहुंचे और दोनों अपना पूरा समय इसी को देने लगे। दिल्ली की 1978 की बाढ़ से ग्रस्त होने पर वे सपरिवार गा़जियाबाद स्थानांतरित हो गये। जब आर्थिक स्थिति को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता आ पड़ी तो अरविंद कुमार ने 1980 में रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम का प्रथम संपादक होना स्वीकार कर लिया और पांच साल तक उसके साथ रहे।</p>
<p>समांतर कोश के कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया गाजियाबाद में 20 मार्च 1993 से आरंभ हुई और पहले संस्करण की पूर्ति बंगलौर में 11 सितंबर 1993 को हुई। लेखकद्वय के पास न तो कम्प्यूटर खरीदने के पैसे थे, न उस पर काम के लिये पेशेवर प्रोग्रामरों से प्रोग्राम लिखवा पाने के। इनके बेटे सुमीत ने पेशे से शल्यचिकित्स्क होते हुये भी अपने माता-पिता के उद्देश्य के प्रति निष्ठा से प्रभावित होकर इस कार्य में सहयोग के लिये कम्प्यूट्रर प्रोग्रामिंग सीखी, कंप्यूट्रर खरीदवाया, काम की कार्यविधि ( प्रोग्राम) लिखी, उसे चलाने के लिये आर्थिक संसाधन जुटाये और अंत में डाटा को पाठ में परिवर्तित करने की पेचीदा प्रक्रिया का विशिष्ट समाधान भी निकाला। बिना कंप्यूटरीकरण के समांतर कोश का बनना शायद संभव नहीं हो पाता।</p>
<p>20 वर्षों के अनथक प्रयासों और समर्पण से अंतत: समांतर कोश का निर्माण संभव हुआ और स्वतंत्रता दिवस की स्वर्णजयंती के अवसर पर प्रकाशित हुआ। इस महती कार्य को निरंतर का नमन!</p>
<div id="section-teaser">
<table border="0" width="90%" align="center">
<tbody>
<tr>
<td align="left"><strong>समांतर कोश कहां से प्राप्त करें:</strong></td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td><strong>संसोधन और सुझाव:</strong></td>
</tr>
<tr>
<td>1100 शीर्षक, 23,759 उपशीर्षक, 1,60,850 अभिव्यक्तियों वाले दो खंडों में 1768 पृष्ठसंख्या के पक्की जिल्द वाले समांतर कोश की कुल कीमत 600 रुपये है।</p>
<p>इसके प्रकाशक का पता है:<br />
निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया<br />
ए-5, ग्रीन पार्क,<br />
नयी दिल्ली- 110016.</td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td>आप यहां से पुस्तक मंगाने के लिये पत्राचार कर सकते हैं और समांतर कोश में किसी भी संसोधन, सुझाव के लिये निम्न पते पर लिख सकते हैं:</p>
<p>द्वारा श्रीमती मीता लाल,<br />
405, नीलगिरि अपार्टमेंट्स,<br />
अलकनंदा,<br />
नई दिल्ली &#8211; 110019.</td>
</tr>
<tr>
<td colspan="3" align="center"><strong><a href="http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&#038;Field=author&#038;String=Arvind%20Kumar%20Kusum%20Kumar" target="_blank">आनलाईन आर्डर करने की सीधी कड़ी</a></strong></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2168&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-nidhi-samantar-kosh/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>छोटे मियां सुभान अल्लाह -पंकज बेंगानी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-kachha-chittha-pankaj</link>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 06:51:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006kachha-chitthapankaj/</guid>
		<description><![CDATA[कच्चाचिट्ठा में परिचय पाईये <strong>तरकश </strong>के एक और प्रखर तीर, उदयीमान चिट्ठाकार <strong>पंकज बेंगानी</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img vspace="5" hspace="5" border="0" align="right" alt="पंकज बेंगानी" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/pankaj-baingani.jpg" /><a href="http://www.tarakash.com/mantavya/">पंकज बेंगाणी</a> उर्फ मास्साब के बारे में जब कुछ कहने की बात आती है तो अनायास यही मुंह से यही निकलता है बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह। </p>
<p>अभी हाल ही में अपने ब्लॉग जगत में प्रवेश की सालगिरह मनाने वाले पंकज बेंगानी का जन्म 25 नवम्बर 1978 को राजस्थान के बिदासर कस्बे में हुआ। 5 साल वहीं रहे और रेत में खेलते हुए दिन गुजारे। फिर पिताजी सब को लेकर सूरत आ गए। सब यानि माँ, संजय और पंकज। एक साल बाद छोटी बहन का जन्म हुआ।</p>
<p>         <!-- Ten Qustions START-->
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 5px; padding: 5px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; font-size: 1em; float: left; width: 175px; text-align: left">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉगलेखन की शुरुआत कैसे हुयी?</strong><br />  ब्लोग लिखना रवि कामदार की प्रेरणा का फल है। मै तो कुछ जानता ही नही था। उसीने समझाया और बताया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />  पहला ब्लॉग जीतूजी का मेरा पन्ना देखा, फिर भैया का जोगलिखी। </p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong><br />  ब्लोग नारद से देखता हुँ, अंग्रेजी के लिए देशी पंडित और इंटेटब्लोग भी देखता हुँ।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं मानीटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />  सीधा मोनिटर पर। कागज की जरूरत क्या है? </p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौनसे हैं?</strong><br />  पसन्दिदा चिट्ठे हैं उडनतस्तरी, मेरा पन्ना, जो कह ना सके, फुरसतिया, योर्स ट्रुली, और न्यूजमेन।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong><br />  नापसन्द चिट्ठे भी हैं पर नाम नही बता सकता।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br />  पहले बुरा लगता था जब टिप्पणी नही मिलती थी। अब बुरा नही लगता, क्योंकि शायद अब मुझे लोग जानने लग गए हैं।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />  मुझे अपनी सबसे अच्छी पोस्ट <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/01/blog-post_28.html">एक चिट्ठी स्पाईडरमेन के नाम</a> और <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/02/blog-post_28.html"> मुर्गीबाई की समाधी</a> लगती है</p>
<p><strong>सबसे खराब?</strong><br />  सबसे खराब पोस्ट <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/06/blog-post_29.html"> भगवान भी बिकते हैं</a>&quot; लगती है। </p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong><br /> सारा दिन नेट पर ही होता हुँ, क्लाइंटो से बात, ब्लॉगरों से बात, सेवा का काम, मेवा का काम, ई-पेपर पढना, डिजायनें खंगालना, स्रोत जुगाडना ,लडकीयों के वोलपेपर सेव करना (देखिए मैं इमानदार हुँ) बस चलता ही रहता है।</p>
</p></div>
<p>      <!-- Ten Qustions end-->
<p>पंकज ने अपनी पढाई गुजराती माध्यम में शुरू की। पाँचवी तक गुजराती में पढे़, फिर पिताजी शहर से थोडा दूर एक हिन्दी भाषी क्षेत्र में रहने आ गए तो फिर हिन्दी विद्यालय में दाखिला लिया और दसवीं तक हिन्दी माध्यम में पढा़ई की। दसवीं के बाद असम चले गये, मामाजी के पास। सूदुर पहाडी क्षेत्र सिलचर में। वहाँ अंग्रेज़ी माध्यम की कालेज में दाखिला लिया। कैरियर-वैरियर क्या होता है यह तो पता ही नही था। पारिवारिक रूप से व्यापारिक होनें के नाते इन्हें तो यही सिखाया जाता था कि बस पढाई खत्म करो और धन्धे में लग जाओ।</p>
<p>पर पंकज का मन कभी परिवार के परम्परागत व्यवसाय में नही था, ना तो पिताजी के कपडों के व्यवसाय में ना ही मामाजी के चाय के व्यवसाय में। अपनी रुचि रुझान तथा पढ़ाई और नौकरी के बारे में पंकज बताते हैं</p>
<blockquote><p>बचपन से फिल्मों और मीडिया क्षेत्र के प्रति अकल्पनीय रूझान था। मैं समझता हुँ मेरे अन्दर एक नैसर्गिक सोच थी ही विज्ञापन और मीडिया क्षेत्र की। उस दौर में मैं जिस तरह के समाचार चैनलों की कल्पना किया करता था वो आज वास्तव में है। मै फिल्म देखकर उसके हर पहलू पर किसी विशेषज्ञ की भाँति टिप्पणी कर सकता था। मुझे पता होता था कि कैमरा एंगल क्या होगा, स्क्रिप्ट में कहाँ तकलीफ है या एडिटिंग कैसे <br />
ुई। लोग पूछते थे कहाँ से सीखा? मैं कहता था कहीं से नहीं सब देख देख कर सीखा। फिर पढाई बीच में ही छोडकर अहमदाबाद आ गया। भैया पहले ही आ चुके थे। पढाई छोड देने का दुःख पहले भी नही था, आज भी नही है क्योंकि कॉमर्स की पढाई मुझे बकवास लगती थी, रूचि ही नहीं थी।</p>
<p>अहमदाबाद आकर मैंने अपनी रूचि का काम किया। अरेना मल्टीमीडिया में दाखिला लिया। मैं पहली ब्रांच के पहले विद्यार्थियों में था। अपने 2 साल के कोर्स में मै सिर्फ 6 महीने ही विद्यार्थी की भाँति पढा। फिर मुझे वहीं शिक्षक के रूप में नौकरी मिल गई। नतीजा यह हुआ की आगे की पढाई खुद ही करनी पडी। मैने अरेना में 3 साल नौकरी की। शिक्षक से सेंटर हेड जैसे शीर्ष पद पर पहुँचा। मैं पूरे भारत की अरेना की सभी शाखाओं में सबसे कम उम्र का हेड था। लेकिन थोडे समय के लिए ही, क्योंकि अन्दरुनी राजनीति से तंग आकर मैने नौकरी छोड दी।</p>
<p>वो मेरी जिन्दगी का सबसे कठिन पल था। मुझे 7000 रूपये मिलते थे। हमारा साइबर कैफे बन्द हो चुका था। कमाने का कोई जरिया नही था। छवि तो शुरू ही हुई थी और कोई ग्राहक नही था। मैने सिर्फ एक बार भैया से पूछा, नौकरी छोड दूं? और उन्होंने कहा, छोड दो! </p></blockquote>
<p>अपने भैया संजय बेंगानी, सरदार पटेल और नरेंद्र मोदी को अपना आदर्श मानने वाले पंकज मानते हैं कि भैया के विचारों का उन पर गहरा असर हुआ है। भैया का असर पंकज पर कुछ इस कदर था कि वे</p>
<blockquote><p>असम में उनके हिन्दी के लिए आन्दोलन के साथ बडे हुए और हिन्दी के प्रति प्रेम भी जागा। भैया ने ही किताबें पढने का शौक डाला। भैया की वजह से ही भगवान के प्रति सोच भी बदली। मैं कट्टर प्रभु भक्त था, रात को सोने से पहले हनुमान चालीसा बिना भूले पढता था।</p></blockquote>
<p>लेकिन अपने भैया को अपना आदर्श मानने वाले पंकज कुछ मामलों में उनके अंधभक्त नहीं हैं। जहां भैया ने समाज का सामना करते हुये प्रेमविवाह किया वहीं पंकज ने मां द्वारा पसंद की हुयी पत्नी का वरण किया और जैसा कि वे खुद कहते हैं</p>
<blockquote><p>भैया को पहले प्रेम हुआ था फिर विवाह किया, मेरा पहले विवाह हुआ फिर प्रेम प्रकरण चल रहा है।</p></blockquote>
<p>भैया संजय के जल्द गुस्सा आने-जाने वाले स्वभाव के विपरीत पंकज शांत स्वभाव के हैं और सरफिरे ग्राहकों से निपटने का काम वही करते हैं। भैया जहां एक ही ब्लॉग में सब कुछ लिखते हैं वहीं पंकज के <a href="http://www.tarakash.com/new2/index.php?option=com_newsfeeds&amp;catid=4&amp;Itemid=7">कई ब्लॉग</a> हैं जिसमें वे यदा-कदा लिखते रहते हैं और चित्र विज्ञापन पोस्ट करते रहते हैं।</p>
<p>संजय बेंगानी अपने छोटे भाई के बारे में बताते हैं</p>
<blockquote><p>मुझ से उलट पंकज शांत स्वभाव वाला हैं, वाद्ययंत्र बजा सकता हैं, गला भी ठीक-ठाक है, पर रेखाचित्र नहीं बना पाता।</p></blockquote>
<p>समूह ब्लॉग <a href="http://www.tarakash.com/new2/">तरकश</a> की शुरुआत के बारे में जानकारी देते हुये पंकज बताते हैं</p>
<blockquote><p>तरकश का विचार भैया का था। मेरे मित्र रवि कामदार की प्रेरणा से हमनें ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश किया। मैंने अपना अंग्रेजी ब्लॉग और भैया ने हिन्दी ब्लॉग शुरू किया। फिर भैया ने सोचा क्यों न एक यूनीक पहचान बनाई जाए और इस तरह हमने तरकश डॉट कॉम शुरू किया। मैं, भैया और रवि ने तरकश पर अपने अपने ब्लॉग लिखने शुरू किए। फिर हमने इसे नए रूप में लाने के बारे में सोचा। पर प्रोग्रामिंग का अति अल्प ज्ञान राह में रोडा था। पर ई-स्वामी की प्रेरणा से मैंने &quot;जूमला&quot; सिखना शुरू किया। फिर देबूदा, ई-स्वामी, विशाल पाहुजा जैसे दिग्गजों की मदद और एक अदम्य संकल्प के साथ तरकश को बना ही दिया। हिन्दी ब्लॉग जगत के कुछ और नामी गिरामी हस्तियों को भी तरकश के साथ जोडने का बीडा उठाया और समीरलाल, सागर नाहर, निधि और शुएब अब तरकश के लिए भी लिख रहे हैं और कई और जुडने वाले हैं। आगे की कई योजनाएँ हैं। हिन्दी ब्लॉग जगत मे हमारा सक्रिय योगदान जारी रहेगा। इसके अलावा तरकश के जैसा अंग्र<br />
ेजी संस्करण भी तैयार किया जा रहा है। तरकश में भी और कई अन्य विभाग आएंगे। </p></blockquote>
<p>हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और मारवाड़ी बोल सकने वाले पंकज को फिल्में व विज्ञापन देखने का, किताबें पढने का और पर्यटन का बहुत शौक है। इनका लक्ष्य छवि को भारत की अग्रणी डिजाइन कम्पनी बनाना और तरकश को एक अग्रणी हिन्दी संजाल बनाना है। हो सका तो फिल्म निर्देशन करना चाहेंगे।</p>
<p>निरंतर की टीम की कामना है कि पंकज अपने भैया को आदर्श मानते हुये, अपनी पत्नी के साथ प्रेम-प्रकरण में नित नये आयाम छूयें और तरकश तथा अपनी मीडिया कम्पनी छवि की शानदार सफलता के साथ फिल्म निर्देशन करें तथा इसके साथ-साथ अपने ब्लॉग में नियमित लेखन करते रहें।</p>
<hr width="100%" />
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		</item>
		<item>
		<title>राष्ट्ररंग डूबा ब्लॉगर &#8211; संजय बेंगानी</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Sep 2006 09:14:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चाचिट्ठा में इस बार मुलाकात कीजिये <strong>तरकश</strong> की संस्थापक तिकड़ी में से एक और प्रतिभाशाली चिट्ठाकार <strong>संजय बेंगानी</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/sanjay-baingani.jpg" border="0" alt="संजय बेंगानी" hspace="5" vspace="5" width="112" height="141" align="right" />हिंदी ब्लॉग जगत की अनेकानेक उपलब्धियों में से एक, <a href="http://www.tarakash.com/">तरकश</a> की परिकल्पना करने वाले और अपने सीमित तकनीकी ज्ञान के बावजूद अपनी परिकल्पना को साथियों की मदद से साकार रूप देने वाले, <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/">संजय बेंगानी</a> ने ब्लॉग लेखन इसी वर्ष जनवरी माह में शुरू किया जो कि उनका जन्म-माह भी है।</p>
<p>सात जनवरी, 1973 को राजस्थान के बिदासर कस्बे में जन्में संजय का बचपन राजस्थान में ही गुजरा। प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं पुरी की। बाद में 12 वर्ष की आयु में सूरत शहर आना हुआ। यहीं दसवीं तक की पढ़ाई गुजराती माध्यम में सरकारी स्कूल से पूरी की। बाद में असम चले गये जहाँ हिन्दी कॉलेज नहीं होने की वजह से अंग्रेजी में पढ़ाई शुरू की जो इनके रुझान बदलने की वजह से कभी पूरी नहीं हो पाई। तब अधिकतर समय पुस्तकालय में जो गुजरता था।</p>
<p><!-- Ten Qustions START--></p>
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 10px; padding: 10px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; font-size: 1em; float: right; width: 250px; text-align: left;">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉगलेखन की शुरुआत कैसे हुयी?</strong></p>
<p>चिट्ठा लिखने की शुरूआत एक वर्ष पहले हुई जब &#8216;रवि कामदार&#8217; ने मुझे &#8216;एक काम की चीज़&#8217; बताते हुए कुछ हिन्दी चिट्ठो के बारे में बताया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong></p>
<p>पहला ब्लोग कौन सा था यह तो याद नहीं इसलिए कह नहीं सकता, हाँ पहले-पहल जो ब्लॉग पढ़े वे &#8216;मेरा पन्ना&#8217;, नुक्ताचीनी, रविरतलामी का चिट्ठा, फुरसतिया थे। उस समय नई प्रविष्टियों की सूचना चिट्ठा-विश्व से मिलती या फिर विभिन्न गूगल ग्रुप से।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong></p>
<p>नारद पर दिन भर में कई बार चक्कर लगा आता हूँ, अब नारद ही नई प्रविष्टियों की सूचना पाने का माध्यम है।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं मानीटर पर या पहले कागज पर? </strong></p>
<p>सीधे लिखता हूँ, विचारों का प्रवाह बहता हैं, उंगलियाँ उन्हें टंकित करती जाती हैं।</p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौनसे हैं?</strong></p>
<p>वैसे तो मैं सारे चिट्ठे पढ़ता हूँ तथा टिप्पणी भी देने की कोशिश करता हूँ परंतु जिस दिन निम्न चिट्ठो पर कुछ नहीं लिखा जाता कुछ खोया खोया सा लगता हैं- मेरा पन्ना, उड़नतश्तरी, जो कह न सके, चिंतन, दस्तक, नुक्ताचीनी, रविरतलामी का चिट्ठा, फुरसतिया।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong></p>
<p>ऐसा कुछ याद तो नहीं।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong></p>
<p>टिप्पणी न मिलने पर लगता हैं या तो कोई पढ़ने आया ही नहीं या फिर जो लिखा हैं वह टिप्पणी करने लायक था ही नहीं। टिप्पणी न करने से अच्छा हैं आप आलोचना ही कर जाते, पता तो चले क्या गलत लिखा था। आप खाना बनाते समय नमक डालना भूल जाएं तब तारिफ तो कोई करेगा नहीं, पर कोई नमक मांगे ही नहीं तो खराब तो लगेगा ही न।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong></p>
<p>एक भी पोस्ट ऐसी नहीं जिसने पूरी संतुष्टि दी हो. लेकिन &#8216;भारत का बाप कौन&#8217; मेरे विचारो की सही अभिव्यक्ति थी।</p>
<p><strong>सबसे खराब?</strong></p>
<p>कई हैं, जिन पर एक भी टिप्पणी नहीं मिली।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong></p>
<p>अपने क्लाइंट्स से सम्पर्क में रहने के लिए, अपने व्यवसाय के लिए जानकारियाँ खंगालने के लिए, गपशप के लिए, ताजे समाचारों के लिए। दरअसल नेट बिना के जीवन की कल्पना नहीं कर सकता, हरदम आन-लाइन रहता हूँ।</p></div>
<p><!-- Ten Qustions end--></p>
<p>प्रखर राष्ट्र्वादी और <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=45">हठधर्मी</a> संजय अपने शुरुआती दिन याद करते हुये लिखते है</p>
<blockquote><p>अपनी किशोरावस्था में हम कोई बङी क्रांति करने के फिराक में रहते थे। कुर्ता-पायजामा हमारा ड्रेस कोड हुआ करता था और अंग्रेजी बोलने वाले को हम देशद्रोही से कम नहीं समझते थे।</p></blockquote>
<p>क्रांति की फिराक में रहने के परिणाम से ही जो सोच बनी वह यह थी</p>
<blockquote><p>जीवन के २०वें वर्ष में प्रवेश करते-करते लगने लगा था कि दुनिया को हम ही बदल कर रख देगें और इस काल में समानान्तर सिनेमा देखना खास पसंद करते थे।</p></blockquote>
<p>लेकिन इसके साथ ही जीवन से जुड़ी सच्चाइयां भी रहीं होंगी इसीलिये क्रांति के सपनों के साथ-साथ जीविका के बारे में भी सोच बनी और प्रयास भी हुये</p>
<blockquote><p>इसी दौरान व्यवसायिक गति-विधियों में हिस्सा लेने लगा था। यह ट्रेनिंग जैसा होता हैं। मेरा जन्म व्यापारी समाज में हुआ हैं इसलिए कैरियर का प्रश्न कभी सामने नहीं आया। अपना व्यवसाय करना हैं ऐसा शुरू से ही दिमाग में बैठा हुआ था। इसी सिलसिले में गुवाहाटी, सिलचर, जोधपुर, सूरत होता हुआ वर्तमान में अहमदाबाद में हूँ जहाँ हम दोनो भाई अपनी मीडिया कम्पनी चला रहे हैं।</p></blockquote>
<p>संजय अपने क्रांतिकारी विचारों को सामाजिक जीवन में भले अमली जामा न पहना पायें हों लेकिन व्यक्तिगत जीवन में इसकी भरपाई करने से नहीं चूके और 23 वर्ष की आयु में निधि के साथ प्रेम विवाह किया। प्रेम विवाह तो तब संस्कार के विरूद्ध माना जाता था। लेकिन इनकी शादी प्रेम विवाह थी, वो भी अंततः सभी की मर्ज़ी पा कर ही सम्भव हो सकी। यह प्रेम की ही कोमल भावनायें रहीं होंगी जिसने संजय के कवि रूप को भी <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=32">परवान</a> चढ़ाया और उन्होंने लिखा</p>
<blockquote><p>महक उठी फिज़ा कि गुलशन खिल उठे, हर फूल, हर कली में तुम हो तुम ही तुम हो।</p></blockquote>
<p>अपने प्रेम विवाह की परेशानियों की चर्चा करते हुये संजय ने अपने बच्चे को दी जाने वाली छूट की <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=7">घोषणा</a> अभी से कर दी है</p>
<blockquote><p>मैं अपने बच्चे को &#8216;लिव इन रिलेशनशिप&#8217; तक ही छूट देना चाहूँगा।</p></blockquote>
<p>नौ वर्ष की उम्र का पुत्र उत्कर्ष फिलहाल अपने पिता द्वारा उसको भविष्य में मिलने वाली छूट से बेखबर पढा़ई-लिखाई और कम्प्यूटर गेम में मस्त रहता है और आजकल अपना ब्लॉग भी शुरू कर दिया है, नाम है <a href="http://meriduniya.wordpress.com/">मेरी दुनिया</a>।</p>
<p>अपने चिट्ठा लेखन की शुरुआत की कहानी बताते हुये कहते है</p>
<blockquote><p>चिट्ठा लिखने की शुरूआत एक वर्ष पहले हुई जब &#8216;रवि कामदार&#8217; ने मुझे &#8216;एक काम की चीज़&#8217; बताते हुए कुछ हिन्दी चिट्ठो के बारे में बताया। लिखने-पढ़ने में भारी रूचि थी पर वर्तनियों की इतनी भूलें होती रही हैं की कभी कुछ छपने के लिए नहीं भेजा। पर चिट्ठा तो &#8220;अपना मैदान हैं और अपने घोड़े हैं&#8221;। फिर सभी चिट्ठाकार बन्धु लिखते रहने के लिए उकसाते भी रहे,तो लिखना जारी रहा।</p></blockquote>
<p>संजय की सोच उनके लेखन में साफ झलकती है। उनके सबसे अधिक चिट्ठे राष्ट्ररंग श्रेणी के हैं। साफगोई पसंद संजय का स्वभाव कुछ ऐसा है कि इनको गुस्सा बहुत जल्दी आता हैं, हालांकि उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाता हैं। सोच से नास्तिक, विचारधारा से दक्षिणपंथी संजय को कुतर्क बिल्कुल पसंद नहीं है। लिखना-पढ़ना, रेखाचित्र बनाना पसन्द करने वाले संजय को अपने बेसुरे गले और नाच-गा नहीं सकने का मलाल हैं।</p>
<p>हर काम के लिये सरकार का मुंह ताकने को गलत मानने वाले संजय का मत है कि लोकतंत्र श्रेष्ठ शासन व्यवस्था हैं। हमें विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता हैं और स्वतंत्रता है कल के सुनहरे सपनों को देखने की। कल के भारत को रचने में हमारी भूमिका भी हैं। जो हमें लोकतंत्र से प्राप्त हुई हैं। इस लिए हमें गर्व हैं अपने लोकतंत्र पर । फिलहाल संजय अपने अनुज पंकज के साथ <a href="http://www.chhavi.com">छवि</a> नामक मीडिया कंपनी चलाते हैं। छवि डिजायन और क्रिएटीव कम्पनी है। इसमें बेंगानी बंधु ब्रांड डिजायन करते हैं यानि कम्पनी का लोगो से लेकर सबकुछ, वेब डिजायन करते हैं,विज्ञापन डिजायन करते हैं, कोर्पोरेट प्रजंटेशन बनाते हैं।</p>
<p>निरंतर की तरफ़ से संजय को उनके निरंतर लेखन के लिये और तरकश तथा मीडिया कंपनी में लगातार उन्नति के लिये शुभकामनायें।</p>
<hr />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2186&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>निधि के लेखन का है अंदाज़ खास</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-nidhi</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-nidhi#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 06 Aug 2006 06:09:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806kachha-chitthanidhi/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>कच्चा चिट्ठा</strong> में परिचय कीजिये विचारों की अभिव्यक्ति को सर्वोपरि मानने वाली हरफनमौला चिट्ठाकार और <strong><a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">चिन्तन</a></strong> की रचयिता <strong>निधि  </strong>से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img width="115" vspace="3" hspace="3" height="155" border="0" align="right" title="Nidhi" alt="Nidhi" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/nidhi.jpg" />आम तौर पर महिला चिट्ठाकार अपनी कविताओं के लिये ख्याति पाती हैं लेकिन लकीर से हट कर काम करने के चक्कर में निधि ने शुरुआत से गद्य पर हाथ साफ किया। गद्य तक तो ठीक लेकिन इसके भी दो कदम आगे वे <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">&#8216;चिन्तन&#8217;</a> करने लगीं। लेकिन चिंतन तथा बिंदास बोलता हुआ गद्य लिखने का यह मतलब नहीं कि उन्होंने कवितायें लिखी ही नहीं। लिखीं और खूब लिखी-</p>
<blockquote><p>पन्नों पे रख के दिल को उनको दिखा दिया,<br />
   वो देख के बोले कि गज़ल अच्छी है ।</p></blockquote>
<p>आम तौर पर लोग कवितायें पढ़कर उदास हो जाते हैं लेकिन निधि अधिकतर कविता ही तब लिखती हैं जब वे उदास होती हैं-</p>
<blockquote><p>कभी कभी न जाने क्या होता है मुझको,<br />
   भरी भीड़ में पाती हूँ,<br />
   खुद को एकदम एकाकी।<br />
   दम घुटता सा पाती हूँ,<br />
   तब मैं खुली हवा में भी।<br />
   मिलती है भीगी सी,<br />
   पलकों की कोरें,<br />
   पाती हूँ अनजान कसक अपने दिल में।</p></blockquote>
<p>
<div id='pullQuoteR'>लेखन का माहौल निधि को विरासत में मिला। नानाजी, प्रख्यात साहित्यकार श्री परिपूर्णानन्द वर्मा के पुत्र तथा प्रख्यात राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार डा.सम्पूर्णानन्द के भतीजे हैं।</div>
<p>&nbsp;</p>
<p><a href="http://khulepanne.wordpress.com/">अमित कुलश्रेष्ठ</a> के प्रोत्साहन कम उकसावे पर ज्यादा अपना &#8216;चिन्तन&#8217; शुरू करने वाली निधि का जन्म 15 नवंबर 1979 में कानपुर में हुआ। आरंभिक शिक्षा नाना जी के पास रह कर बकेवर में तथा फिर आगरा में हुई और उसके पश्चात 1999 में दयालबाग विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. में दाखिला लिया। वहीं से भौतिकी तथा कम्प्यूटर में परास्नातक। वर्ष 2000 में आकाशवाणी, आगरा में आकस्मिक संचालक के रूप में चयन। पढ़ाई के साथ साथ &#8216;युववाणी&#8217; तथा कुछ अन्य कार्यक्रमों का संचालन। इसके बाद 2001 में एक अमेरिकन कंपनी में मेम्बर टेक्निकल स्टाफ़ के पद पर चयनित हो नोएडा आ गयी। वर्ष 2003 में साथ ही कार्यरत साथी अमित श्रीवास्तव से विवाह। शादी के पश्चात पति व ससुराल वालों के प्रोत्साहन से गायन पर भी ध्यान देना शुरू किया।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; width: 175px; float: right">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉग लिखना कैसे शुरू किया?</strong><br />
 देखादेखी। जब पता लगा हिंदी मे ब्लॉग लिखा जा सकता है तो प्रेरणा मिली। अंग्रेज़ी में डायरी लिख लिख के पक गये थे। सोचा हिंदी का ब्लॉग आज़माया जाये।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />
वैसे तो परेश मिश्रा का <a target="_blank" href="http://paresh.blogspot.com/">ब्लॉग</a> पर हिंदी में अमित का <a target="_blank" href="http://khulepanne.wordpress.com">भानुमती का पिटारा</a> सबसे पहले देखा।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखती हैं?</strong><br />
  नारद जी की दया है। इसके अलावा कुछ अपने और दूसरों के चिट्ठों पर की गयी टिप्पणी और कड़ियों को फॉलो करके भी देखे हैं।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखती हैं कंप्यूटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />
  सीधे की-बोर्ड पर चालू होते हैं। काग़ज़ पे लिखे ज़माना हुआ। कागज़ कलम सिर्फ़ महीने के राशन की लिस्ट बनाने के काम आता है अब <img src='http://www.nirantar.org/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /> </p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौन हैं? </strong><br />
  सभी पर कुछ न कुछ अच्छा है।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong><br />
  चिट्ठा नहीं पर कभी कभी कोई प्रविष्टी खराब लगती है। वह तब जब भाषा असभ्य हो या गलत बातों की पैरवी की गयी हो।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br />
  टिप्पणी न मिलने पर लगता है कि कहाँ कमी है यह बताने वाला कोई भी नहीं। अच्छाई सब लिखते हैं।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />
 वैसे तो सब ऐं वैं ही हैं। पर अतीत से जुड़ी पोस्ट पढ कर यादें ताज़ा हो जाती हैं औ साथ ही वह बहुत सच्चाई से लिखीं इसलिये वह मुझे अच्छे लगतीं हैं।</p>
<p><strong>और सबसे खराब?</strong><br />
  मैं अपनी हर पोस्ट में कमी निकाल सकती हूँ। सुधार की संभावनाएं तो असीमित हैं।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करती हैं?</strong><br />
  किताबें, गाने तथा नये रोचक सॉफ़्टवेयर डाउनलोड करने, तरह तरह की जानकारी ढूढँने के और नयी नयी चीज़ें सीखने के लिये।</p>
</p></div>
<p>अपनी रुचियों के बारे में गिनाते हुये निधि जब शुरु होती हैं तो बात लकीर से हटकर बनी फिल्मों, गायन, लेखन, मिट्टी के पुतले बनाना, अभिनय, रंगोली, पेन्टिंग, नृत्य फ़ोटोग्राफ़ी, खाना बनाना, प्राकृतिक जगहों पर भ्रमण और तकनीकी विषयों के बारे मे जानना-समझते तक जाती है। इनमें काफी कालेज के जमाने के शौक थे जिनके लिये तमाम पुरस्कार भी बटोरे। अभी इस सूची में चिट्ठाकारी, आयुर्वेद आदि-इत्यादि, वगैरह-वगैरह जुड़ते जा रहे हैं। गाने-बजाने का शौक तो बरकरार है। लेकिन पता चला है कि कभी डांस का भी शौक था जो अब अभ्यासाभाव में कभी-कभी <em>मटक लेने</em> तक सिमट गया है।</p>
<p>बचपन में काफी अंतर्मुखी रही निधि कक्षा 10 तक पुस्तकों तक सीमित रहीं। फिर गुरुओं तथा शुभचिंतकों के सराहना और प्रोत्साहन का परिणाम था कि अपनी कलाओं को दूसरों के समक्ष रखने के पहल की। उन्ही दिनों सर्वश्रेष्ठ छात्र और समाज सेवा के लिये मिले पुरुस्कारों ने आत्मविश्वास में और वृद्दि की। इसके बाद कॉलेज के दिनों में कोई क्षेत्र नहीं छोड़ा जहाँ पैर न पसारे हों। पढा़ई के क्षेत्र में निधि कक्षा के सर्वोत्तम विद्यार्थियों में भी रहीं।</p>
<p>जहां तक लेखन का सवाल है तो वो लेखन का माहौल निधि को विरासत में मिला। शुरू के दिनों में ननिहाल में रहीं। पूरा ननिहाल (निधि के नानाजी, प्रख्यात साहित्यकार श्री परिपूर्णानन्द वर्मा के पुत्र तथा प्रख्यात राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार डा.सम्पूर्णानन्द के भतीजे हैं) लेखन से जुड़ा रहा है इसलिये शायद लिखने की क्षमता प्रकृति प्रदत्त है। वर्ष 1991-92 में दो लेख &#8216;उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान&#8217; की पत्रिका &#8216;अतएव&#8217; में भी प्रकाशित हुए ।</p>
<p>जीवन के उतार-चढ़ाव के  बारे में बताते हुये निधि कहती हैं-</p>
<blockquote><p>1999 में मेरे एम.एस.सी. में दाखिला लेने के दो माह बाद ही पिताजी का आकस्मिक देहांत हो गया। इसी सदमें से 28 दिन के बाद नानी जी भी चल बसीं। घर से कोई सहयोग न था। मैं और मेरी छोटी बहन किसी तरह माँ और बुरी तरह से बिखरी ज़िन्दगी को सँभालने की कोशिश कर रहे थे। इस समय मेरा कोई मित्र भी मेरे पास न था। इसलिये भावों के अतिरेक को शब्दों में ढालना शुरू कर दिया। मेरी अधिकतर कवितायें मैने इसी समय लिखीं।</p></blockquote>
<p>लेखन को किसी भी तरह के भाषा-बंधनों में बांधने के बजाय विचारों की अभिव्यक्ति को सर्वोपरि मानने वाली निधि कभी-कभी बेसिर-पैर का हांकने से भी परहेज नहीं करतीं जिसका विचारों से कोई वास्ता नहीं होता:-</p>
<blockquote><p>
   आज कहते हो ज़िन्दगी को कम ये कर देगी,<br />
   शराब चीज़ बुरी है इसे पिया न करूँ,<br />
   खै़रख़्वाह उम्र तो घटती है साँस लेने से,<br />
   कल ना कह देना कि साँसे भी मैं लिया ना करूँ ।</p></blockquote>
<p>निधि का लेखन का अंदाज़ खास है। अपने अनुभवों के बारे में जब बताती हैं तो लगता है कि आखों देखा हाल सुना रही हैं। इनमें शामिल हैं मम्मी की हिदायतें, बड़े <em>वो</em> टाइप पतिदेव, गूगल देवता और आवारा आशिक की उड़ैया से लहालोट नायिका। पतिदेव का वर्णन पढ़ते हुये लगता है कि ये निधि का वो खिलौना है जिसमें वो उसकी अच्छाईयां निहारकर निहाल भी सकें तथा मीनमेख का माइक्रोस्कोप लगाकर यह भी कह सकें बड़े वो टाइप हैं हमारे पतिदेव। यह लेख पढ़ते समय लगता है कि किसी से उलाहना कर रही हों कि हमारे ये हमारे दिल का ख्याल नहीं रखते। तथा फिर हाले-दिल सुनाने को कहने पर कहे कि हाय दिल तो इन्हीं के पास है। संभाल के रखा है।</p>
<p>निधि की नायिकायें भी नायिकाओं टाइप ही हैं। एक हमउम्र दिलफेंक आवारा आशिक को दिल देने की बजाय दो बुजुर्गों (कुमार-मित्तल) की किताब में दिल लगाती हैं। ये नायिकायें खुद तो बिना कुछ किये दिलफेंक मजनुओं से येन-केन-प्रकारेण बचती हैं लेकिन जब खबर सुनती हैं कि किसी कन्या ने किसी मजनूं की उड़ैया कर दी तो दिल बाग-बाग हो जाता है। नायिकाओं को लगता है कि उनका बदला ले लिया गया। निधि जाने पहचाने वाक्य टाइप करने के बजाय अपने खुद के वाक्य गढ़ना भी बखूबी जानती हैं-</p>
<ul>
<li>सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती।</li>
<li>मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं।</li>
</ul>
<p>निधि की अभी तक के अपने अतीत के बारे में ही ज्यादातर लिखा है। इसमें उनके <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/06/15/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be/">बचपन</a> की <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/05/25/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a5%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a5%a9/">यादे</a> हैं, मम्मी के <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/06/15/%e0%a4%ae%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97/">डायलाग</a> और  पति से पहली <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/07/testing-2/">मुलाकात</a> से लेकर पांच सौ के छब्बीस पत्ते उड़ा देने के <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/14/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a5%87/">किस्से</a> हैं तथा कुछ सामयिक घटनाओं पर लेख हैं।</p>
<p>अपने व्यक्तित्व तथा स्वभाव के बारे में निधि खुलासा करती हैं:</p>
<blockquote><p>अपना खुद का बेहद उलझा हुआ व्यक्तिव मेरे लिये एक पहेली है। और खुद को समझना मेरे ही लिये चुनौती। शायद जीवन में घटी कुछ दु:खद घटनाओं की परीणीति हो ये। अगर कहूँ कि मैं काफ़ी डग्गेमार प्राणी हूँ तो ग़लत नहीं होगा। जब तक धकियाया न जाय कुछ नहीं करती। परंतु ईश्वर की कृपा से हमारे मित्र तथा पति देव बड़े हिम्मती हैं। सब लोगों को लगता है कि हम बहुत कुछ कर सकते हैं सो सब अपनी मर्ज़ी की दिशाओं में हमें ठेलने में लगे हैं। फिलहाल &#8216;की-बोर्ड&#8217; बजाना सीख रहें है तथा गायन का अभ्यास भी कर रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं कि लेखन नियमित करें।*</p></blockquote>
<p>निधि को पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ नौकरी करना फिलहाल रास नहीं आता। अपनी आगे की योजनाओं के बारे में निधि का कहना है:-</p>
<blockquote><p>आगे चल के अनाथ बच्चों और बुज़ुर्गों के लिये कुछ करना चाहती हूँ। कुछ भी कर ग़ुज़रने का हौसला तो है पर वो दिशा ढूँढ रही हूँ जहाँ मेरी आत्मा को तृप्ति मिले। बस यूँ समझ लीजिये कि मैं क्या हूँ और क्यूँ हूँ, एक पत्नी, बेटी, बहू के अतिरिक्त मेरी अपनी पहचान क्या है, अपने आप से मेरी क्या अपेक्षायें है तथा परिवार के अतिरिक्त अपने देश की उन्नति में मैं क्या योगदान दे सकती हूँ, इन्ही प्रश्नों का हल तलाश रही हूँ।#</p></blockquote>
<p>निधि का व्यक्तित्व हरफनमौला सा है। आशा है कि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ नियमित लेखन से भी जुड़ी रहेंगी तथा अपनी अतीत की यादें समेटने के साथ-साथ समकालीन विषयों पर अपने हाथ आजमायेंगी। निरंतर परिवार की तरफ से निधि को उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों व भविष्य की योजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने तथा अनवरत लेखन के लिये मंगलकामनायें।</p>
<hr width="100%" />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2184&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>बहुमुखी प्रतिभा वाले हैं झालिया नरेश</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-ashish</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-ashish#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:56:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806kachha-chitthaashish/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>कच्चा चिट्ठा</strong> में परिचय कीजिये दोस्तों के बीच झालिया नरेश या आमगाँव के ज़मींदार तथा चिट्ठाकारों के बीच चिरकुंवारे के रुप में जाने जाने वाले और लोकप्रिय चिट्ठे <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/"><strong>खाली-पीली</strong></a> के रचयिता <strong>आशीष श्रीवास्तव</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
<div style="float:left;padding:10px;margin:10px;"><img style="border: medium none" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/ashish_shrivastava.jpg" border="0" alt="आशीष श्रीवास्तव" align="left" /></div>
<p>दोस्तों के बीच झालिया नरेश या आमगाँव के ज़मींदार तथा चिट्ठाकारों के बीच चिरकुंवारे के रुप में जाने जाने वाले और लोकप्रिय चिट्ठे <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/"><strong>खाली-पीली</strong></a> के रचयिता <strong>आशीष श्रीवास्तव</strong> का जन्म 19 अक्टूबर, 1976 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अपने ननिहाल में हुआ। बचपन विदर्भ के पिछड़े क्षेत्र <strong>गोंदिया</strong> जिले की <strong>सालेकसा</strong> तहसील के एक गाँव <strong>झालिया</strong> में ऊधम-मस्ती करते हुये बीता।  प्राथमिक शिक्षा झालिया में और माध्यमिक शिक्षा दो किमी दूर <strong>कावराबांध</strong> गाँव में हुयी जहां पिताजी अध्यापक थे। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पास के कस्बे आमगाँव में हुयी। गोंदिया से संगणक प्रौद्योगिकी में अभियांत्रिकी स्नातक आशीष ने कॉलेज के दिनों में एक संगणक प्रशिक्षण केंद्र में अध्यापन कार्य भी किया। </p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; width: 175px; float: right">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉग लिखना कैसे शुरू किया?</strong><br />     रविजी का <a href="http://abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2004/blogs.htm">लेख</a> पढा था -अभिव्यक्ति पर। बस उसी के बाद चिठ्ठे पढना शुरू किया। कुछ दिनों बाद लगा कि चलो खुद भी लिखने की कोशिश करते है और शुरू हो गये। लिखने का कीड़ा पहले से था, अब डायरी से हटकर नेट पर आ गया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />     पहला ब्लॉग ठीक तरह से तो याद नहीं लेकिन शायद <a href="http://myjavaserver.com/~hindi/">चिठ्ठा विश्व</a> से शुरूवात की थी। शुरूवाती ब्लॉग में <a href="http://www.hindini.com/fursatiya">फुरसतिया</a>, <a href="http://www.hindini.com/ravi/">रवि जी</a>, <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">रमण कौल </a>और <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा नरेश</a> तथा <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल जी</a> के चिठ्ठे ही थे। बाद में <a href="http://www.akshargram.com/">अक्षरग्राम</a> और रमण जी की सूची से दायरा बढ़ता गया।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong><br />     <a href="http://www.akshargram.com/narad">नारद</a> का फ़ीड फायरफ़ोक्स के RSS प्लग-ईन में जोड़ दिया है, जो पूरे दिन मुझे हर नयी प्रविष्टि के बारे में बताता रहता है।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं कंप्यूटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />     मैं सीधे कंप्यूटर पर ही लिखता हूं, पेन से लिखना छूट गया है। कागज पर मेरी लिखावट तो <strong>&#39;आप लिखे खुदा बांचे&#39; </strong>की हालत में है।</p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौन हैं?</strong><br />     लगभग सभी। लेकिन <a href="http://www.hindini.com/fursatiya/">फुरसतिया</a> , <a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/">सुनील दीपक</a>, <a href="http://www.jitu.info/merapanna/">जीतू</a>, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल</a>, <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">रमण</a>प्रमुख है, इस सूची में। अब <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">निधि</a> भी शामिल हैं। <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा</a> का लिखना बंद करना अच्छा नही लगता है। कविताओं मे <a href="http://pratyaksha.blogspot.com/">प्रत्यक्षा</a> और <a href="http://anoopbhargava.blogspot.com/">अनूप भार्गव</a> पसंद आते हैं।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है ?</strong><br /> नहीं, ऐसा कोई चिट्ठा तो नही है लेकिन कुछ प्रविष्टियां अच्छी नही लगती है। विशेषत: जिसमें बिना सोचे-समझे, बिना ठोस तथ्यों के भावनात्मक रूप से अनाप-शनाप लिख दिया गया हो। उदाहरण के लिये भारत को इजराईल के जैसे व्यवहार करने की सलाह देने वाला चिठ्ठा।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br /> बुरा तो लगता है। लेकिन ये भी सच है कि जिस चिठ्ठे पर मैंने सबसे ज्यादा टिप्पणी की उम्मीद की उसी पर कम मिली और हल्के फुल्के ढंग से लिखे चिठ्ठों पर ढेर सारी।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />     सभी लेकिन ये दो चिठ्ठे अच्छे लगते है एक हल्के फुल्के मूड का और दूसरा गंभीर मूड का <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=12">एक क्वांरे की व्यथा</a> और <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=8">क्या इन्सान जानवरों से भी गया गुजरा हो गया है?</a>। ये मेरे दिल की एक ऐसी भड़ास है जिससे मैं बचना चाहता हूं लेकिन नहीं बच पाता हूं।</p>
<p><strong>और सबसे खराब?</strong><br />     <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=47">आदर्श प्रेमिका के गुण</a>। इस पर मुझे अच्छी खासी टिप्पणियां भी मिली लेकिन पहली बार मैंने इस प्रेम को माना। ये मेरे जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिससे मैं हमेशा कतराता रहा। इसका दूसरा भाग लिखने के बाद भी मैंने प्रकाशित नही लिया है।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong><br /> नेट तो मेरी रोजी रोटी का सवाल है। मैं एक वेबानुप्रयोग विशेषज्ञ हूं, गूगल देव का भक्त, जावा का मास्टर। जावा ऐसे भी मुक्त श्रोत के लिये जानी जाती है, जिसमें मेरी हर परेशानी का हल नेट पर ही होता है। चिट्ठों के अलावा मैं जावा फोरम में भी सक्रिय सदस्य हूं।</p>
</p></div>
<p>स्नातक होने के बाद शुरू हुयी यायावरी। पहली नौकरी मुंबई में, दूसरी दिल्ली, तीसरी गुडगाँव और चौथी चेन्नई में। इन सभी जगहों पर काम करते हुये दुनिया की भी सैर जारी रही। अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और मॉरीशस घूम (काम कर) आये</p>
<blockquote><p>अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं<br />     रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।</p></blockquote>
<p>स्वप्नदर्शी आशीष ने बचपन से ही ऊंचे सपने देखने शुरू कर दिये थे:</p>
<blockquote><p>सितारों से आगे जहाँ और भी हैं<br />     अभी इश्क़ में इम्तिहाँ और भी हैं<br />     तू शहीन है परवाज़ है काम तेरा<br />     तेरे सामने आसमाँ और भी हैं।</p></blockquote>
<p>विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले तथा बचपन में आर्य समाज, आर.एस.एस. (आमगाँव संघ का गढ़ है) से जुड़े रहे आशीष अब नास्तिक होते जा रहे हैं। राहुल सांकृत्यायन के जीवन से &#39;काफी प्रभावित&#39; आशीष का प्रिय &#39;नारा&#39; है:</p>
<blockquote><p>सैर कर दुनिया की गाफिल, ज़िंदगानी फिर कहां,<br />ज़िंदगानी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहां।</p></blockquote>
<p>आशीष के शौक गिने चुने ही है- पढना, संगीत सुनना और अपनी फटफटिया पर आवारागर्दी करना। कल्लो बेगम (उनका कम्प्यूटर) से प्यार अब ढलान पर है।</p>
<p>आशीष खुद के बारे में बताते हुये कहते हैं:</p>
<blockquote><p>दोस्तों में अच्छा खासा लोकप्रिय हूँ, या यूं कह लीजिये महफिलों की जान हूँ। जहां जाता हूँ वहाँ हंसी के फव्वारे छूटते रहते हैं। बदकिस्मती से लडकियां कुछ ज्यादा ही पसंद करती हैं। मेरे अच्छे दोस्तों में लडकियाँ ही ज्यादा है, फिर भी अब तक कंवारा हूँ।</p>
<p> मैं डार्विन के सिद्धांत &quot;सर्ववाईवल आफ द फिटेस्ट&quot; पर विश्वास करता हूँ। हर एक को जीवन के लिये संघर्ष करना पड़ता है, जो अपने आपको वातावरण के अनुकूल कर लेता है वही इस संघर्ष में विजयी होता है। मैं ज़माने के अनुसार ढलने की बजाये ज़माने को ढालने में विश्वास रखता हूँ। </p>
<p>     लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती<br />     हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।</p>
<p> डर लगता है असफलता से। निजी जीवन में जरूर कुछ असफलतायें झेली है लेकिन व्यवसायिक जीवन में अब तक असफलता नही देखी है। थोडा सा जिद्दी हूँ, थोडा गुस्सैल भी। अभिमान की हद तक स्वाभिमानी हूँ। देश और मातृभाषा के विरोध में कुछ भी सुनना पसंद नही। इस पर हमेशा लड़ते रहता हूँ।</p>
<p>     निज गौरव का नित ज्ञान रहे<br />     हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।<br />     सब जाय अभी पर मान रहे<br />     मरणोत्तर गुंजित गान रहे।<br />     कुछ हो न तजो निज साधन को<br />     नर हो न निराश करो मन को ।।</p></blockquote>
<p>आध्यात्म से लेकर क्वाँटम भौतिकी तक, गल्प विज्ञान से लेकर प्रेम कहानी तक सब कुछ पढ़ने के शौकीन आशीष को लिखने से ज्यादा पढ़ने का शौक है। कभी कभार <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/a/ashish_shrivastav/index.htm">तुकबन्दी</a> भी कर लेते हैं। अपने  लिखने के अंदाज के बारे में बताते हुये आशीष कहते हैं:</p>
<blockquote><p>लिखने का तो ऐसा है कि बस बिना सोचे जो मन में आया लिख लिया। जब भी कुछ सोच कर, योजना बनाकर किसी विषय पर लिखने की सोची, आज तक उसे लिख नही पाया। लोगों को अपनी बातों में बांधे रखने में मेरा जवाब नहीं है,<br />
 बिना किसी विषय के घंटों बोल सकता हूँ।</p></blockquote>
<p>जो मन में आया सो लिख दिया के साथ यह भी सच है कि आशीष अपनी अभिव्यक्ति की सड़क पर विचारों की फटफटिया दौड़ाते समय वर्तनी के स्पीड ब्रेकर की चिंता छोड़ <strong>&quot;लीखते रहाते हैं। जिवन में चुंकि बहुत कूछ करना है।&quot;</strong></p>
<div id='pullQuoteR'>आमतौर पर नायिकायें नायकों के प्रेम निवेदन ना-नुकुर के बाद स्वीकार करती रहीं हैं लेकिन इनके मामले में कुछ उल्टी हवायें बहीं। </div>
<p>ब्लॉगिंग की शुरुआत में <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=9">अमरिकी</a>  <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=7">प्रपंच</a> के बारे में बताना शुरू  करके आशीष प्रेम-प्रपंच के बारे में प्रवचन करते हुये <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=13">कन्या-पुराण</a> बाँचते रहे। सब लोगों को बताते रहे कि कितने अवसरों पर वो अपना कुंवारेपन का विकेट बचाये रहे। किसी भी कन्या द्वारा इनको अपने दिल का राजा बनाने की साजिश सूंघते ही आशीष ने झट से उसका गाडफादर, बोले तो फ्रेंड फिलासफर एंड गाइड, बनकर साजिश विफल कर दी। आमतौर पर नायिकायें नायकों के प्रेम निवेदन ना-नुकुर के बाद स्वीकार करती रहीं हैं लेकिन इनके मामले में कुछ उल्टी हवायें बहीं सो इन्होंने भी सरफिरेपन का बखूबी परिचय देते हुये लैला के <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=76">गाल लाल</a> कर दिये। इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा जब ये एक बार खुद <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=47">लटपटाये</a> तो समय और इसके संस्कारों ने इनको सफल नहीं होने दिया। तब से ये कुंवारेपन का झण्डा लहराते हुये घूम रहे हैं- नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे। हास्यव्यंग्य के <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=3">किस्से</a> सुनाते हुये आशीष अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा सुमन भी <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=87">अर्पित</a> करते रहते हैं। </p>
<p>बताने वाले बताते हैं कि <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=78">&#39;कल्लो बेगम&#39;</a> के पुराने आशिक आशीष का हाथ कम्प्यूटर पर काफी साफ है लेकिन अभी तक इस दिशा में हिंदी ब्लॉगिंग से संबंधित किसी भी उल्लेखनीय तकनीकी योगदान की जिम्मेदारी से आशीष हाथ झाड़ रखे हैं। शायद आगे कुछ जौहर दिखायें।</p>
<p>स्वप्नदर्शी, आत्मविश्वासी, बहुमुखी प्रतिभा वाले, उदारमना आशीष की कितनी ही ख़्वाहिशे हैं, कितने ही  सपने पूरे करने है:</p>
<blockquote><p>हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं, के हर ख्वाहिश पे दम निकले<br />     बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले</p></blockquote>
<p>निरंतर परिवार की तरफ से आशीष की हर ख्वाहिश, हर तमन्ना, हर सपना पूरा होने की हार्दिक मंगलकामनायें। कामना यह भी कि इनका लेखन निरंतर प्रवाहमान रहे तथा वे अंतर्जाल पर हिंदी के विकास में सक्रिय योगदान कर सकें।</p>
<hr />
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		<title>बमों को हमारे शून्य से गुणा कर दो</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:15:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806fursatiya/</guid>
		<description><![CDATA[पाकिस्तान न हों तो सैकडों वीररस के कवियों की दुकान बंद हो जाये। टेड़े सवालों के मेड़े जवाबों के साथ फिर हाज़िर हैं आपके फुरसतिया, <strong>अनूप शुक्ला</strong>। पढ़िये और आप भी <strong>पूछिये फुरसतिया से</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3>जीतेंद्र कह रहे हैं कि एड्स से बचने का सबसे आसान उपाय बताइए और एड़्स से बचाव के विज्ञापन का कोई सही आइडिया दीजिए।</h3>
<p>  <img src="http://www.nirantar.org/images/stories/fursatiya.gif" border="0" alt="Poochiye Fursatiya se" title="Poochiye Fursatiya se" hspace="2" vspace="2" width="127" height="125" align="right" />एड्स से बचने के लिये पहले जान लें कि एड्स होता क्या है? यह सभी को पता है कि एड्स से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अप्राकृतिक खुराफातें एड्स होने का मुख्य कारण हैं। खुराफातें बोले तो अप्राकृतिक यौन संबंध, एड्स रोगी से संक्रमण आदि एड्स से बचने के लिये जरूरी है कि खुराफात रहित जीवन जियें। अपने शरीर को अपना समझें, धर्मशाला समझने से बचें। दूसरा मुफीद उपाय यह है कि आप निरंतर &quot;निरंतर&quot; पत्रिका का पारायण करते रहें। इसमें शारीरिक एड्स से बचाव के उपाय तो बताये ही गये हैं। साथ ही साथ हर अंक की उत्कृष्ट सामग्री आपको मानसिक एड्स (दीवालियापन) से बचने में सहायक होगी। एड्स से बचाव के उपाय के रूप में कुछ नारे हो सकते है-
<ol>
<li>तुम हमें खुराफातें दो, हम तुम्हें एड्स देंगे।</li>
<li>अप्राकृतिक यौन संबंध बनायें, एड्स का उपहार पायें।</li>
<li>जीवन साथी से संबंध, एड्स की दुकान बंद।</li>
</ol>
<h3>पाकिस्तान परमाणु बमों की संख्या बढा रहा है, हिन्दुस्तान क्या करे?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>कल को पाकिस्तान न रहा तो हम किसके भरोसे जियेंगे? मियां अमरीका को भी दिल का दौरा पड़ जायेगा। कहां मिलेगा उनको इतना अच्छा स्टेपनी देश!</div>
</p>
<p>पाकिस्तान की डिलीवरी रात में हुई है। इसीलिये वह निशाचरों की तरह हरकतें पटकता है। पर पाकिस्तान के लोग हमारे देशवासियों की तरह ही सीधे-साधे हैं।  </p>
<p>दरअसल पाकिस्तान का होना हमारे लिये बहुत लाभदायक है। अब तक हम अपने देश में हो रही हर अव्यवस्था के लिये पाकिस्तान को दोष देकर सस्ते में छूट जाते हैं। कहीं दंगा हुआ, पाकिस्तान का हाथ है। नकली नोट मिले, सीमा पार से आये, विस्फोट हुआ- पाकिस्तान ने कराया। गनीमत है कि अपने नलों में पानी न आने की बात में अब तक हम विदेशी हाथ की बात नहीं सोच पाये हैं। गरज यह है कि हमें अपने देश में कोई भी होने वाली किसी भी अव्यवस्था के लिये पाकिस्तान का मुंह ताकना पड़ता है। </p>
<p>   <img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/fursatiya-bomb.jpg" border="0" alt="Bomb guna zero kitna?" title="Bomb guna zero kitna?" hspace="2" vspace="2" width="200" height="194" align="right" /> गोया कि पाकिस्तान न हो हम कहीं मुँह दिखाने लायक न रहें। बडे़-बडे़ घोटाले, भ्रष्टाचार के उफनाते नाले, देश को दो पैसों में बेचने वाले फिर किस भरोसे पनपेंगे? पाकिस्तान न हों तो सैकडों वीररस के कवियों की दुकान बंद हो जाये। फनफनाती जवानी वाले युवा जो पाकिस्तान को फूंक देने की सनसनाती सलाह देते हैं उनके सामने अभिव्यक्ति का संकट पैदा हो जाये। मैं तो यह सोचकर कांप जाता हूँ कि अगर कल को पाकिस्तान न रहा तो हम किसके भरोसे जियेंगे? हमारी तो हमारी, पाकिस्तान को कुछ हो गया तो मियां अमरीका को भी दिल का दौरा पड़ जायेगा। कहां मिलेगा उनको इतना अच्छा स्टेपनी देश!</p>
<p> जहां तक पाकिस्तान के परमाणु बम बनाते जाने की बात है तो भइये उसका जन्म ही घृणा की राजनीति से हुआ है। सो वो तो यह करेगा ही। जवाब में हमें जो करना है वह हमारे देश की सरकार करेगी। लेकिन बिना मांगी हमारी सलाह तो यह है कि शून्य के अविष्कारक देश होने के नाते जितने भी बम पाकिस्तान बनाये सबको शून्य से गुणा कर दो। परिणाम जीरो बटा सन्नाटा हो जायेगा।</p>
<h3>सागर चन्द नाहर का सवाल है कि भारत की आजादी को साठ वर्ष होने को हैं, परन्तु आज भी भारतीय पुरूष स्त्रियों के गुलाम क्यों है?</h3>
<p>  सागरजी अपने सच को सारे भारत के मर्दों पर थोपना ठीक नहीं। आप अपनी कहानी को सारे भारत के मर्दों की कहानी मानकर बड़ी नाइंसाफी कर रहे हैं। एक मर्द के अपनी पत्नी की गुलामी के आंकड़े सारे मर्दों के आंकड़े मानना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी बुद्धिमान, खूबसूरत महिला को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि सारी महिलायें बुद्धिमान होती हैं, सारी महिलायें खूबसूरत होती हैं, सारी बुद्धिमान महिलायें खूबसूरत होती हैं या फिर यह कि सारी खूबसूरत महिलायें खूबसूरत होती हैं। सच इन सबसे अलग हो सकता है। इसी तरह औरत-मर्द लोग गुलामी के बजाय बराबरी का रिश्ता भी कायम करने को हुड़क सकते हैं।</p>
<h3>आलोक हैरान हैं कि भारत सरकार ने <a href="http://hi.shunya.in/users/jungly/comment/list?article=960">एक लैप्टॉप प्रति बच्चा </a> वाली योजना नामञ्ज़ूर क्यों कर दी?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>भारत तो है ही एक नाराप्रधान देश। एक नारा दिया, देश का नाड़ा साल-दो साल उसी से कसा रहता है।</div>
</p>
<p>भारत तो है ही एक नाराप्रधान देश। एक नारा दिया, देश का नाड़ा साल-दो साल उसी से कसा रहता है। नेताजी ने कहा, &#39;तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा&#39;। लोगों ने ऐन आजादी के पहले दूसरों का खून बहाकर नेताजी की मांग पूरी कर दी। नेहरू जी बोले, &#39;आराम हराम है&#39;। लोगों ने कहा, &#39;आराम में बड़ी आराम है&#39;। इंदिरा जी बोलीं- &#39;गरीबी हटाओ&#39;। नौकरशाह बोले- &#39;गरीब हटाओ-गरीबी रेखा नीचे लाओ&#39;। नेता बोला -&#39;भ्रष्टाचार मिटाओ&#39;। दूसरा बोला,&#39; हमें भी खाने दो, तुम भी खाओ&#39;। अब तो जनता नारों से इतना ऊब चुकी है कि नेता कहता है, &#39;सरकार हटाओ&#39; तो जनता कहती है- &#39;भेजा मत खाओ, पांच साल बाद आओ&#39;।</p>
<p> तो भइये, प्रति बच्चा एक लैपटाप की योजना भी कुछ ऐसी ही थी। जब पता चला कि हर बच्चे को एक लैपटाप मिलेगा तो लोगों ने कहा हम और बच्चे पैदा करेंगे। इधर बच्चा पैदा करेंगे, उधर लैपटाप मिलेगा। इधर मिलेगा उधर बेंच लेंगे। दस हजार का लैपटाप पांच में तो निकल ही जायेगा। इस तरह योजना की घोषणा होते ही तमाम लोगों ने बच्चे के लिये प्रार्थनापत्र दे दिया। सरकार को कहीं से भनक लग गई। उसे लगा कि इससे एक तो देश पर अरबों खरबों बरबाद होंगे, दूसरे देश की जनसंख्या भ्रष्टाचार की तरह बेतहाशा बढ़ जायेगी। यही सब सोचते हुये उसने योजना वापस ले ली।</p>
<p> कुछ लोग कहते हैं कि योजना के निरस्त होने के पीछे किसी अनुवादक का है। अनुवाद के दौरान उसने भार्गव डिक्शनरी देखकर लैपटाप का अनुवाद किया गोद + लट्टू। बोला सरकार का विचार है कि हर पैदा हुये बच्चे को एक गोद मिलेगी तथा एक लट्टू। अब चूंकि गोद तो सरकार पहले से ही उपलब्ध कराती है तथा लट्टू की तरह तो हर भारतीय बच्चा नाचता है। सो जब दोनों जरूरतें पहले से ही पूरी की जा रही हैं तो फालतू में पैसा खर्च करके क्या फायदा? यही सोचकर सरकार ने घोषणा वापस ले ली। </p>
<h3>रमण पूछते हैं कि बॉलीवुड वाले जो हिन्दी की रोटी खाते हैं, हिन्दी बोलने से क्यों कतराते हैं?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>बेहतर अभिव्यक्ति के प्रयास में हीरोइन अपने पूरे शरीर को ही लैंग्वेज में झोंक देती है।</div>
</p>
<p>इसके पीछे आर्थिक मजबूरी मूल कारण हैं। असल में तीन घंटे के सिनेमा में काम करने के लिये हीरो-हीरोइनों को कुछेक करोड़ रुपये मात्र मिलते हैं। हिंदी फिल्मों में काम करते समय तो डायलाग लिखने वाला डायलाग लिख देता है वो डायलाग इन्हें मुफ्त में मिल जाते हैं सो ये बोल लेते हैं। एक बार जहां सिनेमा पूरा हुआ नहीं कि लेखक लोग हीरो-हीरोइन को घास डालना बंद कर देते हैं। इनके लिये डायलाग लिखना भी बंद कर देते हैं। अब इतने पैसे तो हर कलाकार के पास तो होते नहीं कि पैसे देकर जिंदगी भर के लिये डायलाग लिखा ले। पचास खर्चे होते हैं उनके। माफिया को उगाही देना होता है, पहली बीबी को हर्जाना देना होता है, एक फ्लैट बेच कर दूसरा खरीदना होता है। हालात यह कि तमाम खर्चों के बीच वह इत्ते पैसे नहीं बचा पाता कि किसी कायदे के लेखक से डायलाग लिखा सके। मजबूरी में वह न चाहते हुये भी अपने हालात की तरह टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी बोलने पर मजबूर होता है।</p>
<p> अब हिंदी चूंकि वह थोड़ी बहुत समझ लेता है लिहाजा उसे पता लग जाता है कि कितनी वाहियात बोल रहा है। लिहाजा वह घबराकर अंग्रेजी बोलना शुरू कर देता है। अंग्रेजी में यह सुविधा होती है चाहे जैसे बोलो, असर करती है। आत्मविश्वास के साथ कुछ गलत बोलो तो कुछ ज्यादा ही असर करती है। बोलचाल में जो कुछ चूक हो जाती है उसे ये लोग अपने शरीर की भाषा (बाडी लैन्गुयेज) से पूरा करते हैं। बेहतर अभिव्यक्ति के प्रयास में कोई-कोई हीरोइने तो अपने पूरे शरीर को ही लैंग्वेज में झोंक देती हैं। जिह्वा मूक रहती है, जिस्म बोलने लगता है। अब हिंदी लाख वैज्ञानिक भाषा हो लेकिन इतनी सक्षम नहीं कि ज़बान के बदले शरीर से निकलने लगे। तो यह अभिनेता हिंदी बोलने से कतराते नहीं। उनके पास समुचित डायलाग का अभाव होता है जिसके कारण वे चाहते हुये भी हिंदी में नहीं बोल पाते है। </p>
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		</item>
		<item>
		<title>नारियल का मिर्ची के साथ गठबंधन</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-fursatiya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-fursatiya#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 20:34:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=3026</guid>
		<description><![CDATA[बंगलौर में नारियल की चटनी में इतनी मिर्ची क्यों डालते हैं? तोगडिया जी हमेशा गुस्से मे क्यों रहते है? आग लगने पर ही पानी भरने की याद क्यों आती है? जब ये सवाल पूछे गये हैं फुरसतिया से तो भई जवाब भी मजेदार ही होंगे, फुरसतिया स्टाईल.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/askfursatiya.gif" alt="पूछिये फुरसतिया से" hspace="1" vspace="1" align="right" />घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?) </p>
<p>भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</p></div>
<p><strong><a href="http://ashishkachittha.blogspot.com/">आशीष</a> का सवाल है कि &#8220;बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया&#8221; कहावत का चलन कब से शुरु हुआ?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/rupees.jpg" alt="" hspace="8" vspace="4" width="180" height="113" align="left" />रुपये-पैसे के बारे में सारे सवाल के जवाब तो भैये कार्ल मार्क्स ही बता पायेंगे तुमको, या फिर पढ़ों &#8220;दास कैपिटल&#8221;। पर जितना अपन को पता है उससे यही बता सकते हैं कि जब से दुनिया को पता चला होगा कि  बाप-भाई के बिना तो काम चल सकता है लेकिन रुपये के बिना नहीं, तभी से यह मुहावरा चलन में आ गया होगा। वैसे भी बिना पैसे का बाप गधा समान माना जाता है जबकि पैसे वाले गधे को भी लोग बाप बनाने के लिये लपकते हैं। पैसा होगा तो कोई गधा भी बाप बनने की सारी प्रकियाओं को बाईपास कर दे,  जबकि पैसा न होने पर बाप बनने की सारी प्रकियाओं को पूरा करने के बाद भी लोग गधे बने रहते हैं। अगर यह सच न होता तो लोग अपने बाप-भाई को छोड़कर पैसा कमाने के लिये अपने घर से दूर गधों की तरह क्यों खटते?</p>
<p><strong><a href="=">आलोक</a> समझ नहीं पा रहे कि बंगलौर में नारियल की चटनी में इतनी मिर्ची क्यों डालते हैं?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">नारियल-मिर्च गठबंधन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुये बनाया गया है।</div>
<p>हुआ कुछ ऐसा भाई कि नारियल ने एक बार सोचा कि हम इतने लोगों की जीविका चलाते हैं देखें लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं। उसने एक मार्केट सर्वे कराया अपनी छवि के बारेमें जानने के लिये। जो रपट आई वो चौंकाने वाली थी। हर बुरे और कठोर आदमी के लोग कहते, &#8220;उसका व्यक्तित्व नारियल की तरह उपर से कठोर लेकिन अंदर से मुलायम है।&#8221; हर लगुये-भगुये को लोग कहते वह नारियल की तरह है। फिर क्या था, गुस्सा आ गया नारियल को। उसने मिर्ची के साथ गठबंधन कर लिया। यह सोचकर कि जहां नारियल पाया जाता है वहां मिर्ची भी बहुतायत में पायी जाती है। सो यह नारियल-मिर्च गठबंधन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुये बनाया गया है। अब बंगलौर चुँकि राजधानी है सो इस गठबंधन का असर सबसे ज्यादा वहीं दिखता है। अब गठबंधन के टिकाउपन का पता तो अपन को क्या उपरवाले को भी नहीं।</p>
<p><strong>झूठ सफेद होता है, लेकिन फिर झूठे का मुँह काला क्यों होता है?</strong></p>
<p>इसके जवाब जानने के लिए इतिहास की झरोखे से बाहर झांकना जरूरी है। पहले लोग जब झूठ बोलते थे तो उसकी सजा तय थी &#8211; कौवे से कटवाना। इधर आपने झूठ बोला उधर कौवा काट गया। इसीलिये यह गाना भी चल निकला &#8211; <em>झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो</em>। कौवे बड़ी ईमानदारी से यह काम करते थे। इधर किसी ने झूठ बोला नहीं कि उधर कौवे ने आकर काट लिया। बस यहीं से लफड़ा हो गया। कौवे की कार्य समर्पणता देखकर उसे ढेर सारे काम सौंप दिये गये। किसी अतिथि के आने की सूचना देना हो मुंडेर पर कौवा बोले, किसी अपशकुन की सूचना देनी हो तो कौवे की ड्यूटी, मतलब काम बेहद बढ़ गया। इधर आबादी बढ़ी तो लाज़मी है झूठ भी बढ़ा। उधर कौवे कम हो गये। आदमियों ने भले न अपनाया हो पर कौओं ने परिवार नियोजन पर ध्यान दिया। तो कौओं की संख्या काम के मुकाबले बहुत कम हो गयी। झूठे लोगों को काटने का काम पिछड़ता चला गया।</p>
<p>कुछ तकनीकी समस्यायें भी रहीं। लोग झूठ बोलकर इन्तजार करते कि कौवा आये काट जाये लेकिन कौवे आते नहीं। कहते, &#8220;सौ-पचास झूठ हो जायें तब बताना। एक साथ काट दूंगा आकर।&#8221; आधा झूठ तो युधिष्ठिर जैसे लोग बोल गये लेकिन कौवा आधा काटे कैसे? उधर नेता लोग देश सेवा के नाम पर काटे जाने के खिलाफ अदालती &#8216;स्टे&#8217; ले आये। इन सब समस्याओं के चलते यह तय किया कि झूठ बोलने पर काटने का &#8216;सिस्टम&#8217; पुराना है कुछ नया किया जाये। तो फिर यह तय हुआ कि &#8216;कलर कोडीफिकेशन&#8217; की तर्ज पर जो झूठ बोले उसका मुंह रंग दिया जाये जैसे किसी <a href="http://nuktachini.blogspot.com/2005/06/blog-post_08.html">गुणता निरीक्षण अनुभाग</a> में निरीक्षण करने के बाद वस्तुयें रंग दी जाती हैं। अब जैसा कि आप जानते और मानते है कि झूठ सफेद होता है तो यह तय किया गया कि झूठ बोलने वाले का मुंह काला कर दिया जाये ताकि &#8216;कलर कन्ट्रॉस्ट&#8217; के कारण झूठ दूर से दिख जाये। इसीलिये झूठे का मुँह काला होता है। कैसे सवाल हैं यार संपादक जी, जवाब देने के चक्कर में सौ झूठ हमें भी बोलने पड़ गये।</p>
<p><strong>आलोक फिर पूछते हैं कि विदेश से वापस आ के हिन्दुस्तानियों को अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के अलावा सब लोग बदतमीज़ क्यों लगते हैं?</strong></p>
<p>सवाल कुछ गड़बड़ लग रहा है, <a href="http://www.devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक महाशय</a>! होता दरअसल यह है कि जब कोई प्रवासी विदेश से घर आता है तो वह देखता है कि कौन उसके लिये रहने का बढ़िया इन्तजाम करता है, मुफ्त की गाड़ी, मय ड्रायवर (क्योंकि हिन्दुस्तान के रास्ते और गीयर वाली गाड़ी चलाना वह भूल चुका है) जुटा सके, प्रवास के हर खर्चे को छोटा-मोटा समझकर उसे भुगत सके। ऐसे लोगों को ही वह अपना दोस्त तथा रिश्तेदार समझता है। इसके उलट जो बिना किसी सुविधा की औकात के उसके आसपास किसी आशा में मंडराते रहते हैं उन्हें वह बदतमीज समझता है। वैसे इस बारे में मेरा छोटा लड़का कहता है कि जो जैसा होता वह दूसरों के बारे में वैसा ही सोचता है। पर यह सवाल काहे पूछ रहे हो आलोक भाई, आपको तो वापस आये काफी दिन हो गये!</p>
<p><strong>आग लगने पर ही पानी भरने की याद क्यों आती है?</strong></p>
<p>जब हमने यह प्रश्न <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा</a> से पूछा तो प्रतिप्रश्न किया गया, &#8220;आग लगने पर पानी की याद नहीं आयेगी तो क्या आग की याद आयेगी?&#8221;। हमें लगता है कि इसका जवाब भारतीय संस्कृति के गर्भ में छिपा है। भारतीय संस्कृति में संग्रह की प्रवृत्ति वर्जित मानी गई है। भगवान से आदमी केवल इतना मांगता है जितने में वो परिवार सहित खा ले और कोई अतिथि आ जाये तो उसको निपटा ले।</p>
<blockquote><p>साईं इतना दीजिये जामें कुटुम समाय,<br />
मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय।</p></blockquote>
<p>अब आग लगने के पहले पानी का इन्तजाम करना मतलब संग्रह की प्रवृत्ति। संस्कृति की अवमानना, संसाधनों का दुरुपयोग। पता चला कि आप पानी का इन्तजाम किये बैठे हो और आग है कि लग के ही नहीं दे रही। सारा इन्तजाम बेकार हो गया न! इसीलिये सुरक्षित तरीका यही यही है कि जब आग लगे तभी पानी का इन्तजाम किया जाये। फिर भी अगर किसी को बुरा लगता है इस दशा पर तो उसके लिये चुल्लू भर पानी काफी है जो कि किसी भी &#8216;बिसलरी&#8217; की बोतल में आ जायेगा। इसके अलावा ठेलुहा समुदाय के लोग इसलिये भी पहले से पानी का कोई इन्तजाम नहीं रखते क्योंकि उनको भरोसा होता है कि जब भी आग लगेगी वो <a href="http://theluwa.blogspot.com/2004/09/blog-post.html">राग मल्हार</a> गाकर पानी बरसवा लेंगे-<em>आग लगी हमरी झोपड़िया में हम गायें मल्हार।</em></p>
<p><strong>फ़ौलादी सिंह पे हिन्दी पिक्चर क्यों नहीं बन रही है?</strong></p>
<p><em>वन्स अपान अ टाइम</em> हम छात्रावस्था में छात्रावास में टेलीविजन देख रहे थे, चित्रहार चल रहा था। कोई हीरोईन टाइप की महिला डान्सरत थी। किसी ने सवाल उछाला, &#8220;ये कौन हीरोईन है?&#8221;  हमारे एक दोस्त ने मासूमियत से जवाब दिया, &#8220;पता नहीं यार, आजकल मैं हीरोईनों के टच में नहीं हूँ।&#8221; तो भैया, हम भी आजकल फौलादी सिंह के टच में नहीं हैं। इसलिये फौलादी सिंह के बारे में जानने के लिये हम अपनी सुपुत्र की शरण में गये। उसने बताया कि फौलादी सिंह के बारे में अभी तक हालीवुड में कोई पिक्चर नहीं बनी। अब जब हालीवुड में नहीं बनी तो बालीवुड में कैसे बनेगी! अगर सही में हिंदी में पिक्चर बनवाना है फौलादी सिंह पर तो पहले अंग्रेजी में कोई ऊलजलूल पिक्चर बनावायी जाये उसपर उसके बाद हिंदी में उसकी नकल की जाये। सीधे-सीधे हिंदी में फौलादी सिंह पर पिक्चर बनाना तो हिंदी फिल्म निर्माण प्रक्रिया का सरासर उल्लंघन होगा।</p>
<p><strong><a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्द्र</a> का सवाल है कि तोगडिया जी हमेशा गुस्से मे क्यों रहते है?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">परशुराम, दुर्वासा, शिव शंकर आदि लोग अपने इंस्टैंट कोप के कारण प्रसिद्ध रहे हैं।</div>
<p>भइया <a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्दर</a>, हमें पता नहीं कि ये तोगड़िया जी कौन हैं, क्या करते हैं पर जब उनके बारे में सवाल पूछा जा रहा है तो लगता है कि कोई बड़े आदमी ही होंगे-हाकिम-हुक्काम टाइप। जहां तक गुस्से की बात है तो भारतीय संस्कृति में गुस्सा बड़ी &#8216;कूल&#8217; चीज माना जाता रहा है। ससुराल में दामाद का गुस्सा, सास का बहू पर गुस्सा, अमीर घर की लड़की का ससुराल वालों पर गुस्सा तो लोग जानते-भोगते ही हैं। इतिहास में भी परशुराम, दुर्वासा, शिव शंकर आदि लोग अपने इंस्टैंट कोप के कारण प्रसिद्ध रहे हैं। पुराने समय में मनमाफिक काम न होने पर गुस्सा करने का रिवाज था। जैसे गोस्वामी तुलसीदास ने बताया भी:</p>
<blockquote><p>विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत,<br />
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत।</p></blockquote>
<p>तो रामचन्द्र जी ने तीन दिन तक प्रार्थना का &#8216;रूट फालो&#8217; करने के बाद भी काम न होने पर गुस्से पर &#8216;स्विचओवर&#8217; किया। पर अब जमाना बहुत तेज हो गया है। तीन दिन बहुत होता है, बड़े लोग तड़ से गुस्सा कर देते हैं। पर अगर गुस्से का कारण जानना हो तो जैसा श्रीलाल शुक्ल जी बताते हैं-</p>
<blockquote><p>&#8220;इन हाकिम लोगों को पचास तरह की बीमारियां होती हैं। कब्ज, गैस, डायबिटीज, दुष्चिन्ता, नामर्दी, बवासीर आदि। इनका हाजमा दुरुस्त नहीं रहता। चिड़चिड़े हो जाते हैं और ऊलजलूल हरकतें करते हैं। वास्तव में अपने को कोस रहे होते हैं। तो ऐसे में इनसे डरना नहीं चाहिये और जब ये लोग गुस्सा कर रहे हों तो चुपचाप सोचना चाहिये कि कैसे इन्हें बुत्ता दिया जाये।&#8221;</p></blockquote>
<p>तो मुझे यही लगता है कि आपके तोगड़ियाजी को कुछ यही समस्यायें होंगी जो श्रीलाल शुक्लजी ने बताईं। लोग यह भी कहते हैं कि गुस्सा करने वाले के दिमाग में कोई माईक टाईसनी वायरस घुस जाता है और गुस्सेल प्राणी हरसंभव ऊलजलूल हरकतें करता है।</p>
<p><strong>वाजपेयी जी की जबान बार-बार फिसल क्यों जाती है?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/vajpayee.gif" alt="" hspace="8" vspace="4" width="100" height="106" align="left" />हर आदमी जिंदगी में कभी न कभी फिसलता जरूर है। यह नियम है। वाजपेयी जी विद्वान हैं, संयमी हैं। बचपन, जवानी में कभी नहीं फिसले। पर अब बुजुर्गियत में भी वाजपेयी जी जिंदगी के नियमों का उल्लंघन नहीं करते। लिहाजा फिसलन के सार्वभौमिक सिद्धान्त का पालन करते हैं। वाजपेयी जी के व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू उनकी भाषण कला है जो कि जबान से संचालित होती है। इसीलिये फिसलन के नियम का पालन करने में वह फिसल जाती होगी। इसलिये आप भी कहीं फिसलना चाहते हो अभी फिसल लो। बाद में मजबूरी की फिसलन में वो मजा कहां!</p>
<h2>और अंततः</h2>
<p><strong>हिन्दी चिट्ठाकार फुरसतिया से सवाल पूछने मे झिझकते क्यों है?</strong></p>
<p>यार <a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्दर</a>, तुम कहते हो लोग फुरसतिया से जवाब पूछने में झिझकते क्यों हैं? उधर कुछ <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">भाई लोग</a> तकादा करते हुये पूछते हैं, &#8220;फुरसतिया को जवाब देने की फुरसत क्यों नहीं मिलती?&#8221;। <a href="http://apniduniya.blogspot.com/">कोई कहता</a> है कि बहुत मेहनत लगती होगी जवाब देने में वहीं भाई लोग कहते हैं कि उतना मजा नहीं आया इस बार। जब मैं सोचता हूँ तो हर एक के सवाल सही लगते है। बहरहाल सवाल पूछने में झिझक के कुछ कारण जो मुझे लगते हैं वे हैं</p>
<ul>
<li>लोग यह मानते हैं कि जो सवाल वो सोच रहे हैं वो टेलीपैथी से फुरसतिया तक पहुंच जायेंगे तो बेकार टाइप करने तथा ई-मेल की जहमत क्यों उठाई जाये?</li>
<li>कुछ लोग यह मानते हैं कि जो सवाल उनके मन में उठ रहे हैं उनका जवाब देना फुरसतिया के बस की बात नहीं।</li>
<li>कुछ संकोची यह मानते हैं कि उनके सवाल पढ़कर लोग हंसेंगे।</li>
<li>कुछ लोग कहते हैं कि पहले वाले जवाब तो मिले नहीं, नये सवाल क्यों पूछें जायें?</li>
<li>जो इस किसी में शामिल नहीं हैं उनके दिमाग की उत्सुकता, कौतूहल तथा चुहल वाला हिस्सा सुन्न पड़ गया है। उनको किसी डाक्टर झटका की अविलम्ब जरूरत है।</li>
</ul>
<p class="note">फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &#8220;<a href="http://fursatiya.blogspot.com">फुरसतिया</a>&#8221; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &#8220;पूछिये फुरसतिया से&#8221; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=3026&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>जुलाई का कच्चा चिट्ठा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-kaccha-chittha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-kaccha-chittha#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 20:06:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चा चिट्ठा में आपकी मुलाकत कराते हैं चिट्ठामंडल के सदस्यों से. इस बार मिलिये चिट्ठाकार अतुल अरोरा और कवियित्री दीपा जोशी से.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>अतुल अरोरा</h1>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/profile.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" align="left" />
<div class="dropCap">ज्व</div>
<p>लंत मुद्दों की पीड़ा, गुदगुदाते पलों की ठिठौली और कभी-कभी खामखाँ के चिंतन मनन के संकलन &#8211; <a href="http://rojnamcha.blogspot.com">रोजनामचा</a> तथा एक अप्रवासी भारतीय के अमेरिका प्रवास के रोचक संस्करणों के संकलन &#8211; <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com">लाइफ इन एच ओ वी लेन </a>के लेखक अतुल अरोरा को उनके दोस्त व प्रशंसक सौ फीसदी कथाकार तथा अव्वल दर्जे का गप्पबाज मानते हैं।</p>
<p>७ मई, १९७० को कानपुर में जन्में और पले‍-बढ़े अतुल ने पी.एन कालेज कानपुर से बी.एस.सी. के उपरांत एच.बी.टी.आई. से संगणक प्रयोग में निष्णात (मास्टर आफ कंप्यूटर एप्लीकेशन) की उपाधि प्राप्त की। आरंभिक कुछ साल लखनऊ व कानपुर में काम करने के पश्चात इस शाकाहारी, यूपी वाले खत्री ने रुख किया अमेरिका का। संप्रति वे फिलाडेल्फिया में कार्यरत हैं, अपना समय अपनी जीवनसंगिनी, बच्चों और लेखन, फोटोग्राफी जैसे अपने शौकों में बाँटते हैं। लेखन के अलावा अतुल को शौक है सिनेमा (खास तौर पर पुरानी हिन्दी फिल्मों का) और भ्रमण का।</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/atul.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" align="right" />किस्सागोई में अतुल को महारत हासिल है। आमजीवन की घटनाओं से लिखने का मसाला उठाकर उसमें चिकाईबाजी की छौंक लगाकर लज़ीज लेखन के रूप में पेश करने का हुनर अतुल को बखूबी आता है। हिंदी चिट्ठाजगत के सबसे चर्चित लेख अगर टटोलें जायें तो उसमें अतुल के हाल आफ फेम के सारे लेख तो होंगे ही चाहे वे <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/10/blog-post_14.html">असली प्रवासी</a> होने का , <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/11/blog-post_02.html">लिटमस टेस्ट</a> हों, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/11/blog-post_16.html"> डॉ झटका</a> हों, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/12/blog-post_13.html">कुत्ते की पहचान</a> का संकट हो, <a>भैंस का दर्द हो</a> या <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2005/05/blog-post_17.html">राजा का बाजा</a>। तकनीकी तौर पर भी अतुल का हाथ तंग नहीं है। नई-नई खुराफातें करते रहते हैं। स्वाभाव से संस्कारी बालक के सारे गुण होने के बावजूद अतुल अपने जिस गुण का झंडा खुद फहराते रहते हैं वह है इनका गुस्सा। वास्तव में अतुल को लेखन और गुस्सा विरासत में मिला है। इनके पिताजी श्री नाथ अरोराजी मशहूर जनवादी लेखक हैं। संयोग कुछ ऐसा भी हुआ है कि अभिव्यक्ति के <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/1purane_ank/2005/02_16_05.html">एक अंक में</a> कथाकार पिता की कहानी (<a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2005/upahar/upahar1.htm">उपहार</a>) तथा चिट्ठाकार पुत्र के संस्मरण <a href="http://www.akshargram.com/2005/02/22/184">साथ-साथ</a> छपे।</p>
<p>अतुल गुस्से को मर्दों का गहना मानते हैं। तथा गाहे-बगाहे यह गहना <a href="http://akshargram.com/2005/01/05/132/#comments">धारण करते</a> रहते हैं। विज्ञान की भाषा में कहा जाये तो अतुल की &#8220;विशिष्ट उष्मा&#8221; बहुत कम है। बहुत जल्द हत्थे से उखड़ते हैं पर उससे जल्द ही ठंडे हो जाते हैं। दोस्तों से लंबे समय तक नाराज न रह पाना इनकी बहुत बड़ी कमजोरी है। हिंदी ब्लॉग जगत की हर उल्लेखनीय गतिविधि से अतुल सक्रिय रूप से जुड़ रहे। इन उपलब्धियों में सारी कहा-सुनी, उठा-पटक  भी शामिल हैं। नवीनतम हरकत रही प्रथम भारतीय चिट्ठाकार सम्मेलन, जिसे बताने की <a href="http://www.akshargram.com/2005/06/11/439/"> हड़बड़ी</a> में अतुल अपनी सारी किस्सा गोई भूल गये। लिखने की बात पर उनकी कलम रुंध गई तथा काम संभाला रमणकौल ने &#8211; <a href="http://www.kaulonline.com/chittha/?p=50"> इधर-उधर कर</a> के ।</p>
<p>स्वभाव से सकारात्मक रुख वाले अतुल मेहनती है तथा अपना लक्ष्य हासिल करने में मेहनत से जी नहीं चुराते वहीं दोस्तों पर भरोसा और प्यार इतना करते हैं कि गाहे-बगाहे अपने जिम्मे के काम दोस्तों  को करने के लिये छोड़ देते हैं। अपने बारे में अफवाहें फैलाने में भी पीछे नहीं रहते अतुल, उनमें से एक यह है कि इनको <a href="http://tatkaal.blogspot.com/2005/02/blog-post_20.html">हिंदी ठीक से नहीं</a> आती। इस अफवाह का दंड भी इनके प्रशंसको ने पहले ही दे दिया था जब इन्हें हिंदी के लिये <a href="http://www.indibloggies.org/results-2004">इंडीब्लॉगीज़ अवार्ड</a> से नवाज़ा था।</p>
<p>आम हिंदुस्तानियों की तरह अतुल अपनी पत्नी को अपने से ज्यादा <a href="http://merapanna.blogspot.com/2004/12/blog-post_110317668205122127.html#comments"> समझदार</a> मानते हैं पर करते अपने मन की हैं (?)। अतुल तहज़ीब-पसंद इतने हैं कि चुहल भी <a href="http://hindini.com/eswami/?p=14#comments">बताकर</a> करते हैं। तमाम आम प्रवासी की तरह देश की तमाम खामियां देखकर दुखी रहते हैं, मन बहुत बेचैन होता है मातृभूमि में आने का पर हालात पर बस नहीं। देश-दुनिया में बसे अतुल के प्रशंसक दोस्त इनको लगातार बेहतर लिखते देखना चाहते हैं। हम भी उनमें से हैं। तमाम शुभकामनाओं के साथ!</p>
<hr />
<h1>दीपा जोशी</h1>
<p>दीपा जोशी ने अपना चिट्ठा-<a href="http://deepshikha70.blogspot.com/">अल्पविराम</a>, पिघलते एहसासों में प्रेम का इतिहास खोजते हुये शुरु किया:</p>
<blockquote><p>इन पिघलते एहसासों ने रचा<br />
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास।</p></blockquote>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/deepa_joshi.gif" border="0" alt="" hspace="4" vspace="2" align="right" />संगीत तथा गुनगुनाना शौक है दीपा जोशी का। अन्य रुचियाँ हैं- संगीत, कला, साहित्य तथा दर्शन। साहित्य में भी कविता में ज्यादा मन रमता है। ७ जुलाई, १९७० को दिल्ली में जन्मी, पली-बढ़ी, पढ़ी-लिखी दीपा जोशी ने &#8216;माँ&#8217; शीर्षक से पहली कविता जब लिखी तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। फिलहाल दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत दीपा, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम-हिन्दी में सृजनात्मक लेखन में अध्ययनरत हैं।</p>
<p>कला व शिक्षा में स्नातक दीपा जोशी की रचनायें गृहशोभा, सरिता, उत्तरांचल पत्रिका व दैनिक जागरण के नजरिया स्तंभ में छपती रहीं हैं। वेब पत्रिकाओं <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/d/deepa_joshi/index.htm">अनुभूति</a>, <a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/DeepaJoshi/aai_hholi_aai.htm">साहित्यकुंज,</a><a href="http://www.kaavyaalaya.org/">काव्यालय</a>, <a href="http://www.nirantar.org/0505-vatayan-kavita">निरंतर</a> व पोयट्री डॉट काम पर कवितायें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीपा की कविताओं में विविध रंग समाहित हैं, जिनमें हास्य है, उल्लास है तथा प्रेमानुभूति भी। प्रेमानुभूति के लिये दीपा को विलगाव, व्यथा का रास्ता ज्यादा रास आता लगता है, जैसे</p>
<blockquote><p><a href="http://www.nirantar.org/0505-vatayan-kavita">खो गए</a> ओ घन कहाँ तुम<br />
हो कहाँ किस देश में पथरा गई कोमल धरा<br />
चिर विरह की सेज में।</p></blockquote>
<p>या फिर</p>
<blockquote><p>मिलन की चाह में<br />
जुदाई का<br />
अपना है मजा<br />
ये अलग बात है<br />
सब माने इसे सजा।</p></blockquote>
<p>या</p>
<blockquote><p><a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/d/deepa_joshi/shraddhanjali.htm">वो कल</a> की ही तो बात है<br />
नहीं बिछड़ा था<br />
जब तुम्हारा व मेरा साथ।</p></blockquote>
<p>पर कभी मिलन की आस से मन <a href="http://deepshikha70.blogspot.com/">उल्लास</a> से भी भर जाता है:-</p>
<blockquote><p>आयी होली आयी<br />
बजने लगे<br />
उमंग के साज<br />
इन्द् धनुषीय रंगों से<br />
रंग दो<br />
पिया आज</p></blockquote>
<p>हिंदी पखवाड़े में वाद-विवाद, भाषण तथा काव्यपाठ प्रतियोगिताओं में विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित खुशनुमा क्षणों को दीपा जोशी ने सुरुचिपूर्ण तरीके से <a href="http://www.freewebs.com/deepshikha/poetrycom.htm">सहेजा</a> है। नियमित तथा सार्थक लेखन के लिये दीपा जोशी को शुभकामनायें।</p>
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