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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; अतुल अरोरा</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>एक दहकते शहर की दास्तान</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 07:09:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अतुल अरोरा</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>

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		<description><![CDATA[धरती के अनगिनत दरारों से उफनती गर्म ज़हरीली गैसें, ज़मीन इतनी गर्म कि जूते के तले गल जायें, हवा साँस लेने के लिये नाकाफी। जैसे दोज़ख उतर आया हो धरा पर। सेंट्रालिया एक ऐसा शहर है जहाँ भूमीगत खदानों की ऐसी ही आग ने वहाँ के बाशिंदो से उनकी ही ज़मीन हड़प ली। आमुख कथा में पढ़िये सेंट्रालिया जा चुके <strong>अतुल अरोरा</strong> का लोमहर्षक आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/story-big-centralia.jpg" border="0" alt="सेन्ट्रालिया" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">य</div>
<p>ह किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा ही है। धरती के सीने पर उकेरी अनगिनत दरारों से उफनती गर्म ज़हरीली गैसें, ज़मीन इतनी गर्म कि आपके जूते के तले गल जायें, हवा साँस लेने के लिये नाकाफी। नज़ारा कुछ यों कि जैसे दोज़ख उतर आया हो धरा पर।</p>
<p>यह किसी फंतासी फिल्म की पटकथा नहीं, हक़ीकत है। यह है दुनिया भर में सेंकड़ों कोयला खदानों में लगी बेकाबू भूमीगत आग, जो बरसों पृथ्वी के गर्भ में सुलगती रहती है और इंसान और वनस्पति का पास फटकना नामुमकिन कर देती है। ऐसी ही एक जगह है अमरीका स्थित सेन्ट्रालिया।</p>
<p>सेन्ट्रालिया शहर 1941 में बसा था। कोयला खनन इसकी जीवन रेखा थी। लिथुआनिया, पोलैन्ड, इंग्लैड और जर्मनी से लोग यहाँ आकर बसे थे। करीब दो हजार बाशिंदो का यह शहर तब दरवाजे बिना ताले लगाये छोड़ने का आदी था। एक आम भारतीय कस्बे की तरह यहाँ भी लोगों को एक दूसरे के दुःख सुख में हाथ बँटाते देखा जा सकता था। हर सुबह खनिक खदान से बजने वाले हूटर की आवाज पर चल देते थे काम पर। खान में हर रोज़ वे, कार्बाइड लैंप वाले टोप पहने, ड्रिल से सूराख बनाते, उनमें डायनामाईट भरते और विस्फोट करके कोयला बाहर निकालते। यह कोयला फिर बाहर लैनकेस्टर, फिलाडेल्फिया और रेडिंग भेजा जाता ।</p>
<p>शहर की जिंदगी यूँ ही अलमस्त चल रही थी कि 1960 में आर्थिक मँदी का दौर आ गया। सारी कँपनियाँ एक एक कर बँद होती चली गईं। फिर, जैसी की कल्पना की जा सकती है, किसी मृतप्राय औद्योगिक शहर का जो हाल होता है, अशोचनीय घटनाक्रम होने लगे। अवैध कोयले के उत्खनन का काम शुरू हो गया। लोग अपने घर के आसपास या फिर किसी जगह जंगल में सुरंग बनाकर रस्सी के सहारे कोयला के भँडार तक पहुँच कर कोयला खोदते और कालाबाजार में बेच देते। यह न सिर्फ खतरनाक था बल्कि जिंदगी की गाड़ी चलाने के लिये नाकाफी भी था।
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin-top: 6px; margin-bottom: 6px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/centralia-before-after.jpg" border="0" alt="" hspace="6" vspace="6" width="454" height="364" align="middle" /></p>
<p>1962 में एक अनहोनी घटना घटी। किसी अवैध सुँरग में आग लग गयी। भूमिगत आग जलती रही, और फैलती रही। भूगर्भ विभाग ने कितने ही जगहों पर जमीन में सूराख किये, ताकि पता लगा सके कि आग कहाँ कहाँ फैली है और तापमान कितना है? लोगों द्वारा घर के तहखाने में असामान्य गर्मी की शिकायत पर कुछ लोगों को वहाँ से हटाया भी गया। अमूमन आग को बुझाने के सारे प्रयास व्यर्थ ही गये, चाहे वह सुँरग में पानी भरना हो या नाइट्रोजन का छिड़काव। 1000 डिग्री तक पहुँचा तापमान पानी को चुटकियों में भाप बनाकर उड़ा देता।</p>
<div id="pullQuoteR">आग को बुझाने के सारे प्रयास व्यर्थ गये, चाहे वह सुँरग में पानी भरना हो या नाइट्रोजन का छिड़काव।</div>
<p>14 फरवरी 1981 को सरकार की नींद तब टूटी जब एक घर के पिछवाड़े मैदान में मिट्टी धँसने से एक चार फुट गहरा और 150 फुट गहरा गड्ढा बन गया, उसमें गिरकर एक बच्चे की जान जाते जाते बची। बच्चा एक पेड़ की जड़ पकड़ कर किसी तरह लटका रहा। उसके भाईयों ने उसे खींच कर बाहर निकाला। यह घटना तब घटी जब स्थानीय जनप्रतिनिधि आग के नुकसान का जायजा लेने आये थे। वे इस लोमहर्षक घटना के चश्मदीद गवाह बन गये। इस घटना ने मीडिया का ध्यान खींचा और अंततः सरकारी मशीनरी हरकत में आयी।</p>
<p>इसके बाद इस आग को रोकने के इरादे से सरकार ने एक महत्वाकाँक्षी योजना बनायी। इसके अंतर्गत सारे निवासियों के घर सरकार खरीद लेती और कस्बे के चारों ओर एक 500 फुट गहरी खाई खोद दी जाती। पर 660 मिलयन डालर का खर्च और आग रूकने की कोई गाँरटी न होने की बाबत सरकार ने अपने बढ़े कदम खींच लिये। अब सरकार सेंट्रालिया की स्थिति निरंतर खतरनाक होते जाने के कारण सिर्फ वहाँ के निवासियों को एक एक कर वहाँ से हटाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रही।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: none repeat scroll 0% 50% #f4f4f4; width: 220px; float: left;">
<h3>कैसे लग जाती है खदानों में आग?</h3>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/bootleg-mine.jpg" border="0" alt=" " vspace="5" width="200" height="150" align="top" /> खदानों में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार 100 डिग्री तापमान के उपर जाने पर कोयला स्वयं ही प्रज्वलित हो उठता है, तो कई दफ़ा खदानों के प्रवेश के निकट बिजली गिरने से। आस्ट्रेलिया स्थित <strong>बर्निंग माउंटेन</strong> विश्व की सबसे पुरानी आग है जो 6000 सालों से लगातर जल रही थी। <em>बूटलेग</em> खनन को रोकने के लिये विस्फोट से खान उड़ाने के कारण भी कई बार आग लगी हैं। सेंट्रालिया जैसे क्षेत्रों में खदानों के पास कचरा जलाने से आग लगी।</p>
<p>ज़ाहिर है कि ऐसी आग के आसपास रहना खतरनाक होता है। तापमान अधिक रहता है और हवा में ज़हरीली गैस रहती है। इनसे उपजती ग्रीनहाउस गैसों के कारण पर्यावरण के लिये भी भारी खतरा होता है। अमरीका, चीन, इंडोनेशिया, रूस, भारत, यूरोप और अफ्रीका ऐसी आग से जूझते रहे हैं। वैज्ञानिक आजकल <em>रीमोट सेंसिंग सेटेलाईट</em> से ऐसी ज्वाला का पता लगाने की कोशिश करते हैं।</p>
</div>
<p>1991 तक महज़ चालीस पचास लोगों के अतिरिक्त सबके घर खरीद लिये गये और यहाँ का पोस्ट आफिस भी बँद कर दिया गया। पर हैरत की बात है कि इस भूमिगत आग के मुहाने पर बैठे मुठ्ठी भर लोग आज भी यह शहर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इनमें यहाँ का मेयर भी शामिल है। यह लोग कोई झक्की नहीं हैं। इन्होंने अपने पूरे समाज को तिल तिल खत्म होते देखा है। इन्होंने देखा है कि किस तरह हर घड़ी साथ रहने वाले यार दोस्त, सेन्ट्रालिया को बचाने के नाम पर बीसीयों कमेटी बनाते थे और फिर आपस में ही लड़ झगड़ सरकार के दबाव के आगे झुक जाते। इनका मानना है कि वर्तमान खान जो तकरीबन पचास साल से जल रही है, शायद सौ साल और जले। सरकार महज स्वास्थ्य विभाग के नोटिस दिखा दिखा कर निवासियों को वहाँ से हटाने करने में जुटी है। इन मु्ठ्ठीभर जुझारूओं को इस सरकारी अकर्मण्यता के नेपथ्य में करीब 420 लाख टन कोयला दिखता है जो वर्तमान खदानों से भी अधिक गहराई में दफ्न है। अगर सारे निवासी जगह छोड़ गये तो विस्थापन का पूरा पैसा बच जायेगा। लोगों का शक इस वजह से भी है कि अगर वाकई सरकार को इतना खतरा दिखता है इस शहर के नीचे, तो वह वहाँ से गुजरने वाली सड़क को क्यों नहीं बँद कर देती।</p>
<p>इस शहर की त्रासदी एक तकनीकी खामी के चलते आयी है, जैसा चेर्नोबिल या भोपाल में हुआ। पर सुनामी, चेर्नोबिल या भोपाल में आपदा सब पर एक साथ आयी, जिसने सारे निवासियो को एकजुट होने का मौका दिया उससे लड़ने का, पुनर्स्थापना का जज्बा दिखाने का। ऐसी आपादओं पर मीडिया की चौबीसो घँटे नज़र रहने की वजह से राहत और सहानुभूति की वर्षा भी होती है। पर सेंट्रालिया मे आपदा जमीन के नीचे है और धीरे धीरे फैल रही है।</p>
<p>कुछ ऐसा ही झरिया बिहार में हो रहा है। बस पैमाना अलग है। यहाँ सवाल अस्सी हजार परिवारों का है, 7500 करोड़ रूपये भी स्वीकृत हो गये हैं। पर मीडिया की निगाह से अछूते इस भारतीय सेंट्रालिया के निवासी भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की रस्साकशी देखने को मजबूर हैं।</p>
<p>मामला चाहे भारत जैसे विकासशील देश का हो या अमरीका जैसे विकसित देश का, सरकार अगर अकर्मण्य हो तो योजनायें फाईलों में ही दफ्न रह जाती हैं। ऐसी आग को पूर्णतः बुझाना नामुमकिन है क्योंकि जैसे जैसे ज़मीन पर दरारें उभरती हैं आक्सीज़न ज़मीन तक पहुँचने में कामयाब होने लगती है। पानी जैसे माध्यम भी नाकाफी सिद्ध हुये हैं। ऐसे में इलाके में रह रहे परिवारों का न्यायपूर्ण पुर्नवास ही एकमात्र समझदारी का हल है, जो सेंट्रालिया में किया भी गया, पर झरिया जैसे क्षेत्रों में अपाहिज सरकार के होते यह कदम लागू करना भी भूमीगत आग को बुझाने जितना ही कठिन है।</p>
<hr />
<h1>मीडिया ने तोड़ी सरकारी निद्रा</h1>
<div id="section-teaser"><a href="http://www.centraliaminefire.com/about.html" target="_blank"><strong>डेविड डेकॉक</strong></a> एक पत्रकार हैं और उन्होंने सेन्ट्रालिया पर व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनकी किताब <a href="http://www.amazon.com/gp/product/0595092705?ie=UTF8&amp;tag=nirantar-20&amp;linkCode=as2&amp;camp=1789&amp;creative=9325&amp;creativeASIN=0595092705">अनसीन डेंजर</a><img style="border: none !important; margin: 0px !important;" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=nirantar-20&amp;l=as2&amp;o=1&amp;a=0595092705" border="0" alt="" width="1" height="1" /> इस त्रासदी के कारणों और घटनाओं पर प्रकाश डालती है। पुरानी खदानों से लगी भूमीगत आग और सेन्ट्रालिया पर निरंतर ने डेविड से ईमेल पर साक्षात्कार लिया। प्रस्तुत है अंश।</div>
<p><strong> आमतौर पर ऐसी त्रासदी विकासशील देशों में होती हैं, अमेरिका में ऐसी घटना के बारे में सुनना बड़ा अजीब लगता है। आपका क्या सोचते हैं?</strong><br />
<img style="margin: 10px; border: 0pt none;" title="David DeKok" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/DavidDeKok.jpg" border="0" alt="David DeKok" hspace="5" vspace="5" width="112" height="128" align="left" />आप यह अवश्य गौर करें कि यह त्रासदी किस साल शुरु हुईः 1962 में। उस वक्त अमेरिका को आभास भी न था कि कोयले की परित्यक्त खदानों से गंभीर पर्यावरणीय समस्या उपज सकती है। बात अगर बीस पच्चीस साल पहले की होती तो सेनट्रालिया के नज़दीकी कोई कोयला कँपनी खुद ही ऐसी आग पर नियंत्रण पा लेती और कोई समस्या पैदा न होती। पर 1962 में पेनसिलवेनिया का एंथ्रेसाईट कोयला उद्योग मृतप्राय था। अतः न तो राज्य और ना ही केंद्र सरकार ने आग से लोहा लेने या आपदा प्रबँधन के लिये खास पैसा दिया।</p>
<p>एक और तथ्य यह है कि काफी समय तक, भले ही विकासशील देशों जैसा हाल न रहा हो, पेनसिल्वेनिया के कोयला क्षेत्र भी गरीब और शोषित रहे। न्यूयार्क व अन्य जगहों से आयी कोयला कंपनियों के लिये पेनसिल्वेनिया हमेशा से साधनों का उपनिवेश रहा। वे पैसा बनाने यहाँ आईं और फिर चलती बनीं।</p>
<div id="pullQuoteR">सरकारी उदासीनता से अधिक सुस्त नौकरशाही जिम्मेवार है</div>
<p><strong> क्या सरकारी उदासीनता ऐसी घटनाओं का प्रमुख कारण है?</strong><br />
मेरे ख्याल से सरकारी उदासीनता से अधिक सुस्त नौकरशाही जिम्मेवार है, &#8220;हमें चिंता तो है, पर हम भला क्या कर सकते हैं&#8221; वाला रवैया। अगर सेन्ट्रालिया के निर्वाचित सदस्य कार्यकुशल होते तो बात और होती, वे अफसरशाहों से काम करवा पाते। पर दिक्कत यही थी कि सेंट्रालिया के निर्वाचित प्रतिनिधि कोयला खनन और परित्यक्त खानों से होने वाली दिक्कतों और खतरों की समझ ही नहीं रखते थे। 1962 में सेन्ट्रालिया कृषि प्रधान इलाके का अकेला कोयला क्षेत्र था।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: none repeat scroll 0% 50% #edede4; width: 220px; float: right;">
<h3>आग दुश्मन, सरकार भी</h3>
<p>जनता के हित के निर्णयों में राजनैतिक अनिच्छा का क्या दुष्प्रभाव हो सकता है यह झरिया के कोयला खनिकों के 80 हज़ार परिवारों से पूछिये जिनके पुर्नवास की योजना को 7500 करोड़ रुपये के बजट आवंटन के बावजूद कैबिनेट की हामी की बाट जोहनी पड़ रही है। पूर्वी भारत में झरिया स्थित कोयला खदानों में धरती के गर्भ में सुलगती आग बरसों पुरानी समस्या है और यह शायद विश्व का सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाका है। पर मीडिया कि अरुचि से मामला कभी प्रकाश में नही आता।</p>
<p>दो साल पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीसीसीएल द्वारा शुरु झरिया एक्शन प्लान के 61 करोड़ के पायलट प्रोजेक्ट के तहत 900 सबसे ज़्यादा प्रभावित परिवारों का विस्थापन होना था। पर यह हो न सका। वजहात कुछ कुछ सेंट्रालिया जैसे ही थे, भारी खतरों के बावजूद लोग अपना आशियाना छोड़ने को तैयार नहीं थे। हैरत की बात यह कि विस्थापन के मामले में पैसा कोई मसला नहीं है, क्योंकि सभी कोला कंपनियाँ फंड में योगदान देने को राज़ी हैं, पर सारे कार्य में सरकारी भागीदारी है ही नहीं और यही फसाद की जड़ है। सन् 2012 तक 1850 हेक्टेयर ज़मीन पर विस्थापितों को बसाना है पर योजना में सरकारी अरुचि के होते कोई नहीं जानता यह कार्य कब तक होगा। इस बीच यह भूमीगत दावानल 370 लाख टन कोयला निगल चुका है और हर साल 20 लाख टन कोयला भस्म करता जा रहा है।</p>
</div>
<p><strong> आज सेन्ट्रालिया में कितने लोग बचे हैं? क्या विस्थापितों को कोई मुआवजा मिला?</strong><br />
1979 के उत्तरार्ध में, जब आग अपने निर्णायक और सबसे भयानक रूप में थी, करीब हजार निवासी थे, अब इस शहर में अब दस पँद्रह लोग ही रह गये हैं। यह लोग शहर की उस जगह रहते हैं जहाँ आग को अभी कई दशक लगेंगे पहुँचने में। जो आग से समीप हैं उनके घरों में तलघर नहीं है, जिससे वे जानलेवा गैसों से बचे रहते हैं। ज्यादातर बचे लोग ऐसे वृद्ध हैं जो इस उम्र में या तो विस्थापन का झँझट नहीं उठाना चाहते या फिर जिन्होंने विस्थापन का पुरजोर विरोध किया था।</p>
<p>1983 के बाद जो लोग विस्थापित हुये उन्हें सरकार से अच्छा मुआवजा मिला, शायद ये आपदा विस्थापन के इतिहास के सबसे अच्छे सौदे हैं। अपने सेन्ट्रालिया के घर के समान कोई घर या नया घर बनाने के लिये पर्याप्त पैसे मिले। हलाँकि 1983 के पहले जिनको मुआवजा मिला उन्हें वर्तमान घर की कीमत में खतरनाक जगह पर होने के कारण कमी कर दी गई। यह असंतोष का कारण भी रहा।</p>
<p><strong> भूमिगत आग एक आम समस्या है। क्या आप बता सकते हैं कि इसे बुझाने के क्या उपाय किये गये? उनमें से किसे सफलता मिली?</strong><br />
सेन्ट्रालिया अब भी जल रहा है। 1962 की गर्मियों में राज्य सरकार ने आग बँद करने के लिये शहर में खुदाई शुरू की पर काम पुरा होने से पहले बजट खत्म हो गया। उसके बाद से खान के बीच के हिस्सो में पत्थरों का चूरा व पानी डालकर या फिर फ्लाई एश, जो कि विद्युत उत्पादन संयंत्रों में जले कोयले से बनी महीन राख होती है, भरकर इसे रोकने के कई प्रयास हये। इस तरह से खड़ी रूकावटें कुछ समय तक आग को आगे बढ़ने से रोकती तो थीं पर रूकावटों के स्थिर होने पर आग नये हिस्सों मे पहुँच जाती है। 1983 में अमेरिकी खदान सर्वेक्षण विभाग ने एक अध्ययन से यह अनुमान लगाया कि ज़मीन से आग को पूर्णतः खोद निकालने के लिये तकरीबन 650 मिलियन डालर का खर्च होगा। पर इससे पूरा शहर तबाह करना पड़ता। अतः डालर देकर निवासियों को विस्थापित करना बेहतर समझा गया।</p>
<p>सेन्ट्रालिया में प्रयुक्त तरीकों को पेनसिल्वेनिया के अन्य खान आग में भी इस्तेमाल किया गया है। आश्रचर्यजनक बात यह है कि आग बुझाने के लिये पानी डालना एक व्यर्थ प्रयास है क्योंकि पानी को बरसों भरा जाना होता है, अन्यथा पत्थरों में मौजूद अवशिष्ट उष्मा आसानी से आग को फिर भड़का सकती है।</p>
<p><strong>क्या स्थानीय सरकार और निवासियों को आग के उत्सर्जन से निकलने वाली ग्रीनहाऊस गैसों, जहरीले धुयें और पर्यावरण को नुकसान की फिक्र है? </strong><br />
ऐसा कोई मुद्दा सेन्ट्रालिया में नहीं है क्योंकि आग बहुत कम समय के लिये जमीन के ऊपर रही है। मेरे ख्याल से भारत की स्थिति से यह काफी भिन्न है।</p>
<p><strong> ऐसा माना जाता है कि कैटरीना या त्सुनामी जैसी आपदाओं के राहत कार्य ज्यादा व्यवस्थित होते हैं और सेन्ट्रालिया जैसी अदृश्य आपदाऐं उपेक्षित रहती हैं। आपका क्या विचार है?</strong><br />
त्सुनामी, कैटरीना जैसी आपदाओं में सरकार व व्यक्तियों पर तत्परता से कार्य करने का दबाव होता है। इन आपदाओं के हृदय विदारक दृश्य जो लगातार टीवी पर दिखाये जाते हैं उन्हें भला कोई कैसे नकार सकता है? मज़े की बात है कि सेन्ट्रालिया को 1981 से वाकई सहायता मिलनी शुरु हुई जब टीवी पर खान की आग के दृश्य और वहाँ के रहवासियों के इसके खतरे की जानकारी की बात ज्यादा होने लगी। इसी साल बारह साल के लड़के के इस आग से बने गढ्ढे में गिरने से यह चर्चा शुरु हुई। पहले अकेला मैं ही इसे अखबारों के लिये कवर करता रहा। जब न्यूज चैनलों के हेलीकाप्टरों आने लगे तो सरकार ने ज़्यादा ध्यान देना शुरु किया।</p>
<p class="note"><strong>चित्रः</strong> अतुल अरोरा व डेविड डेकॉक, <strong>अतिरिक्त सामग्रीः</strong> देबाशीष चक्रवर्ती<br />
<strong>आभारः</strong> शशि सिंह &#8211; झरिया के विचार के लिये, विकिपिडिया, साईमन हैडलिंगटन</p>
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		<title>आखिर ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0505-nazariya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0505-nazariya#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 May 2005 07:09:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अतुल अरोरा</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>

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		<description><![CDATA[जब सेंकड़ों मस्तिष्क साथ काम करें तो जेम्स सुरोविकी के शब्दों में, &#34;भीड़ चतुर हो जाती है&#34;। गोया, इंसान को इंसान से मिलाने का जो काम धर्म को करना था वो टैग कर रहे हैं। निरंतर के संपादकीय में पढ़िये <strong>देबाशीष चक्रवर्ती </strong>और <strong>अतुल अरोरा</strong> का नज़रिया।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>संबंधों के साझे सेतु</h1>
<p><img hspace="2" vspace="2" border="0" align="right" alt="नज़रिया" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" />ब्लॉग पार्टिसिपेटरी वेब (अंर्तजाल पर भागीदारी) का सटीक उदाहरण है। अंर्तजाल के हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बढ़ते हस्तक्षेप के साथ ही सूचना के आदान प्रदान के तरीके साझे होते जा रहे हैं। जब सेंकड़ों हज़ारों मस्तिष्क एक साथ काम करें, जब नाना प्रकार के विचारों और योगदान का विलय हो जाये तो <a href="http://www.aaronsw.com/weblog/001315">जेम्स सुरोविकी</a> के शब्दों में, &quot;भीड़ चतुर हो जाती है&quot;। सोशियल बुकमार्किंग के इस नये दौर में यह बात चरितार्थ होने लगी है। विचारों की साझेदारी से अनायास ही संबंधों के सेतु बंधने लगे हैं। गोया, इंसान को इंसान से मिलाने का जो काम धर्म को करना था वो टैग कर रहे हैं।</p>
<p>जानकारी की जमावट और लोगों को जोड़ने का यह एक क्रांतिकारी माध्यम है और साथ ही मानवीय भावना का प्रतीक भी जो अराजकता से व्यवस्था की सृष्टि कर रहा है। निरंतर के मई 2005 अंक की आमुख कथा का विषय भला और क्या हो सकता था भला? <a href="http://www.nirantar.org/0505/nidhi">&quot;क्या आप टैगिंग करते हैं?&quot;</a> आपको कीवर्ड के साम्राज्य से न केवल परिचित कराने का प्रयास है वरन उसमें शामिल होने का खुला न्यौता भी।</p>
<p align="center"> <img hspace="5" height="284" width="313" vspace="5" border="0" align="middle" alt="टेकनोराती पर भारत की खोज" title="Searching India on Technorati" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/tag-editorial.jpg" /></p>
<p>टैगिंग बेईंतहां सफल हो कर अंर्तजाल पर नया अध्याय रचेगी या फिर अनगिनत अन्य क्रांतिकारी विचारों की तरह विस्मृति की गर्त में समा जायेगी इस प्रश्न का जवाब तो भविष्य ही दे सकता है। हम तो वर्तमान में ही जीते हैं न!</p>
<p>आपका मित्र,</p>
<p><strong><a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष</a></strong></p>
<p></p>
<hr width="50%" /></p>
<h1>आखिर ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</h1>
<p>कुछ माह पहले की बात है। आफिस में काम करते हुए यूनिकोड से संबद्ध एक प्रश्न पर अपने अमरीकी सहयोगी से विचार विमर्श कर रहा था। तभी मेरे सहकर्मी ने मुझे हिंदी का कोई अक्षर टाईप करके दिखाया जिससे मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये। तकनीक तो गजब की थी। अगर आपने अपने कंप्यूटर में शंकर दयाल शर्मा के जमाने से कोई अपडेट नही किया हो तो बात अलग है अन्यथा आजकल बिना किसी फोन्ट डाउनलोड किये आपके कंप्यूटर पर हिंदी, गुजराती, मराठी ही क्या दुनिया की कोई भी भाषा दिख सकती है। </p>
<p>यह स्वीकारते हुए मुझे कोई संकोच नहीं होता कि पिछले कुछ समय से मसरूफियत ने मुझे रेत में सर गड़ाये शतुरमुर्ग बना छोड़ा था। यूनिकोड, <a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/XML_Feed">क्षमल फीड</a>, ब्लॉग,<a href="http://codex.wordpress.org/Using_Permalinks">पर्मालिंक</a>, <a href="http://www.bloglines.com/">न्यूज़रीडर</a>, <a href="http://www.cruftbox.com/cruft/docs/trackback.html">ट्रैकबैक</a> जैसे शब्द कब तूफान की तरह आये और अंर्तजाल तकनीकी पर छा गये पता नही चला। पर कुछ ही महीनो में पकड़ फिर से मजबूत हो चली और परिचय हुआ ब्लॉग की विधा से। फिर मिला <a href="http://www.devanaagarii.net/hi/alok/blog/">नौ दो ग्यारह</a> और <a href="http://nuktachini.debashish.com/">नुक्ता चीनी</a> से और मैं भी कूद पड़ा <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com/">लाईफ ईन ए एच ओ वी लेन</a> को लेकर। कुल दस पंद्रह हिंदी ब्लॉग से शुरू हुई यात्रा आज पचास से अधिक ब्लॉग और इस ब्लॉगजीन तक आ पहुँची और सतत जारी भी है। पर अभी भी दूसरे शतुरमुर्गो को देखकर कोफ्त होती है जो पूछते हैं कि ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</p>
<p>वैसे गलती उनकी भी नहीं है। अंग्रेजी अखबारों की कटिंग चाय पिलाने वाले या &quot;मैने आज फलां किताब पढ़ी&quot; सरीखी हेडलाईन वाले चिट्ठों की भीड़ से अच्छे मोती चुनने की ज़हमत सिर्फ पढ़ने के शौकीन उठाना चाहते हैं। जब भी कोई शतुरमुर्ग तकनीकी के क्षेत्र में हलचल को देखकर कुछेक ब्लॉग देखने की ज़हमत उठाता भी है तो सरसरी तौर पर उसे आये दिन बेहतरीन टेम्पलेट बदलने वाले, परन्तु सामग्री के नाम पर भूसा परोसने वाले चिठ्ठाकारो की भरमार दिखती है। कभी सुना था कि दुनिया अपने गम से इतनी दुःखी है कि वह आपका दुःख सुनकर और दुःखी नही होना चाहती। इसलिए किसी को यह नही जानना कि आज आप ट्रैफिक में क्यों फँसे या फिर आपकी माशूका को कौन सी चाकलेट पसंद है या फिर आप परदेश में कितने नोस्टालजिक हो रहे हैं। ठीक इसी प्रकार किसी अखबार से कोई खबर उठाकर उस पर अपनी टिप्पणी जोड़ देना भी अधिक पाठक आकर्षित नही कर सकता।</p>
<p>अधिकांश यह नही जानते कि ब्लॉग सिर्फ डायरी नही है। बेशुमार तकनीकि, राजनैतिक, आर्थिक लेख इस विधा की ओर मुड़ चुके हैं या मुड़ रहे हैं। ब्लॉग वही सफल है जिनकी सामग्री पठनीय है। आप खोजी निगाह रखते हो तो आपको दूर नही जाना पड़ेगा। कम से कम आधा दर्जन ऐसे ब्लॉग है जो किसी भी अखबार के संपादकीय से ज्यादा मारक क्षमता रखते हैं। तकनीकी के क्षेत्र में भी आपको हर विधा के ब्लॉगर मिल जायेगें जो आये दिन अपने क्षेत्र में होने वाले नये अनुभव आपसे बाँटते हैं। ज्यादा ज़हमत उठाने से बचना हो तो सीधे पिछले दो साल के <a href="http://indibloggies.org/">इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार</a> देख लीजिए। आपको हर क्षेत्र के कुछ चुने हुए ब्लॉग देखने को मिलेंगे। जैसा कहा जाता है कि संतजनों की संगति में भी संत ही होते है अतः इस अवार्ड को पाने वाले या इनके उपविजेताओं के ब्लॉग पर आपको भूसा परोसने वाली कड़ियाँ भी कम ही मिलेंगी। इस अंक में साहित्यिक पत्रिका &quot;अभिव्यक्ति&quot; की <a href="http://www.nirantar.org/0505/vishesh">दास्तान</a> पढ़िये और सोचिए कि क्या आज से आठ साल बाद ऐसा ही कुछ निरंतर के लिए भी लिखा जायेगा?</p>
<p>आपका मित्र,</p>
<p><strong><a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल अरोरा</a></strong></p>
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<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser">साथ ही पढ़ें <a href="http://www.nirantar.org/0505/sampadakji">पत्र संपादक के नाम</a>। आप भी हमें patrikaa at gmail dot com पर पत्र भेज कर अपनी राय दर्ज करा सकते हैं।</div>
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