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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; रमण कौल</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>मुझे है आस कल की&#8230;</title>
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		<pubDate>Thu, 05 Oct 2006 06:26:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Kashmir]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>डॉक्टर कुलदीप सुंबली &#34;अग्निशेखर&#34;</strong> के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं -- कवि, लेखक, विचारक और विस्थापित कश्मीरियों के नेता। पनुन कश्मीर, जिसके वे अगुआ रहे हैं, को वे सेक्युलरिज़्म की नर्सरी मानते हैं। निरंतर संपादक <strong>रमण कौल</strong> ने जम्मू में अग्निशेखर से साहित्य, पनुन कश्मीर जैसे अनेक विषयों पर चर्चा की। <strong>संवाद </strong>स्तंभ में पढ़िये अग्निशेखर का साक्षात्कार।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="border: 1px solid #adadad; margin: 5px; padding: 5px; background-color: #ffffff; font-size: 1em; color: black">
<p><img width="135" vspace="3" hspace="3" height="113" border="0" align="right" alt="संवाद" title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.jpg" /><strong>डॉक्टर कुलदीप सुंबली (अग्निशेखर) </strong>संभवतः न कश्मीर की राजनीति में परिचय के मोहताज हैं, न हिन्दी साहित्य में। हाँ, उन से बात करते समय यह समझ में नहीं आता कि उन के व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं के बीच की रेखा कहाँ है।</p>
<p>अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में जब अग्निशेखर कश्मीर विश्वविद्यालय में हिन्दी में पी.एच.डी. कर रहे थे, तो उन्होंने शायद सोचा ही न होगा कि नियति उन को नेतृत्व की इस दिशा में धकेल देगी। फिर अस्सी का दशक समाप्त होते होते, कश्मीर घाटी में इनक़लाब सा आ गया &#8212; तथाकथित आज़ादी का इनक़लाब। वर्षों से कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद का जो लावा उबल रहा था, वह ज्वालामुखी बन कर फूट पड़ा। कुछ दिनों के लिए, कुछ शहरों में, लग रहा था कि अलगाववादी अपने मक़सद में कामयाब हो गए हैं। मस्जिदों के लाउड-स्पीकरों से, उर्दू अखबारों में छपी सूचनाओं से एक ही आवाज़ आ रही थी &#8211; रलिव या गलिव, (हमारे साथ) मिलो या मरो। ऐसे में कश्मीरी हिन्दू और अन्य भारतवादी आतंक के घेरे में आ गए। कुछ लोगों को निशाना बनाया गया, जिन में गणमान्य लोग भी थे और साधारण लोग भी। कई गाँव के गाँव ऐसे में एथ्निक क्लीन्सिंग की भूमिका बनाए गए, ताकि बाकी भारतवादियों को सबक मिले। लाखों लोगों का एक पूरा समुदाय, जो पीढ़ियों से कश्मीर के अतिरिक्त किसी घर को नहीं जानता था, समूल उखाड़ फेंका गया। </p>
<p>कश्मीरियों के लिए यह अनुभव संभवतः विभाजन के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों या तालिबान द्वारा अफ़गानिस्तान से भगाए गए हिन्दुओं से कम नहीं था, पर यह इस दृष्टि से भिन्न था कि जहाँ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से भागे हिन्दुओं को शरणार्थी मान कर मुआवज़ा दिया गया, कश्मीरियों को कभी शरणार्थी नहीं माना गया क्योंकि कश्मीर तो अभी भी भारत का &quot;अटूट अंग&quot; था। कश्मीरियों की वर्तमान पीढ़ी के लिए विस्थापन जीवन भर की वेदना बन गया। इन्हीं लाखों विस्थापितों में अग्निशेखर के परिवार ने भी जम्मू में आकर डेरा डाला। परन्तु व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद, पारिवारिक त्रासदियों के बावजूद, बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के उन्होंने अपने अधिकार के लिए लड़ने का निश्चय किया। तभी अपने कुछ युवा मित्रों के साथ वे राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में पनुन कश्मीर (अपना कश्मीर) के कन्वीनर के रूप में अवतरित हुए। पनुन कश्मीर का नारा था, &quot;असि छु तरुन कश्मीर&quot; यानी, हमें (वापस अपने) कश्मीर जाना है। पिछले डेढ़ दशक में उन का संघर्ष कई मरहलों से गुज़रा, और मंज़िल अभी भी दूर है।</p>
<p>अग्निशेखर का इस बीच साहित्य का भी मनन होता रहा। तीन कविता संग्रह छपे &#8211; &quot;किसी भी समय&quot;, &quot;मुझ से छीन ली गई मेरी नदी&quot;, &quot;काल वृक्ष की छाया में&quot;। एक कहानी पर <a href="http://www.tribuneindia.com/2004/20040507/cth2.htm#6">फिल्म भी बनी</a>, उस फिल्म में कैमियो रोल भी किया। हाल में उन्हें <strike>छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिष्ठित</strike> सूत्र सम्मान से पुरस्कृत किया गया। वे वेब पत्रिका <a target="_new" href="http://www.kritya.in/">कृत्या</a> के <a target="_new" href="http://www.kritya.in/0205/hn/who_we_are.html">सम्पादक मंडल</a> में भी शामिल हैं। हाल में निरंतर संपादक दल के सदस्य <strong>रमण कौल</strong> को जम्मू में अग्निशेखर से मिलने का मौका मिला। प्रस्तुत हैं निरन्तर के लिए उन के साथ किए गए एक विशेष साक्षात्कार के कुछ अंश।</p>
</p></div>
<p>
    <strong>आप के सार्वजनिक जीवन के कई पहलू दिखाई देते हैं &#8212; कवि, लेखक, विचारक और विस्थापित कश्मीरियों के नेता। क्या इन सब पहलुओं में आप को किसी विरोधाभास का सामना करना पड़ता है?</strong>   </p>
<p>      <img vspace="5" hspace="8" border="0" align="left" title="Agnishekhar" alt="Agnishekhar" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/agnishekhar.jpg" />कविता रच रहा हूँ, तो जी रहा हूँ। इस में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। मेरी कविता का केन्द्रीय संवेदन निर्वासन, विस्थापन, निष्कासन है, और यही मेरे जीवन की संवेदना हो गई है। इसी से मुक्ति की कामना, प्रतिरोध का संघर्ष हम छेड़े हुए हैं, जिस में मैं अग्रणी रूप से सक्रिय हूँ और चाहता हूँ कि जिन के साथ हम घाटी में जी रहे थे वे सभी सांस्कृतिक जीवन मूल्य पुनः बहाल हों, सद्भाव हो और धर्म जाति या मौलिक विचारधारा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। मुख्यतः पनुन कश्मीर सूक्ष्म स्तर पर यही एक स्वप्न लेकर चलता है। हालाँकि इसकी स्थूल व्याख्याएँ अलग अलग तरह से की जाती हैं। पनुन कश्मीर मेरे लिए सेक्युलरिज़्म की नर्सरी है, जिस में हम इन्हीं जीवन मूल्यों की पनीरी बचाए हुए हैं। आज कश्मीर घाटी में अलगाव और धर्म के आधार पर एक विखंडन की प्रतिक्रिया अपने हिंस्र और बर्बर रूप में चल रही है। मेरे लिए दो ही रास्ते हैं। या तो पराजय स्वीकार कर अपना जीवन यापन करना, या पलट कर इस सब से लड़ना। शब्द और कर्म दोनों से। कबीर, मेरे आदर्श कवि के हवाले से</p>
<blockquote><p>सुखिया सब संसार है खावै और सोवै <br />
     दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै</p></blockquote>
<p> मेरे जागने और मेरे दुख में जहाँ निविड़ एकान्त, उदास कर देने वाली चुप्पी है वहीं भविष्य में आस्था रखने वाले ऐसे तमाम विस्थापित संस्कृति कर्मी, बुद्धिजीवी, संघर्ष-चेतना से संपन्न राजनीतिक कार्यकर्त्ता व शरणार्थी शिविरों में घुट घुट कर सांस ले रही आम जनता की भागीदारी रही है, जो आज के छद्म और क्षुद्र स्वार्थों के युग में अकेला पड़ते हुए भी संबल देती है। कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्ति हैं</p>
<blockquote><p>मुझे प्राप्त है जनता का बल <br />
     वो बल मेरी कविता का बल <br />
     मैं उस बल से शक्ति प्रबल से  <br />
     एक नहीं सौ साल जियूँगा।</p></blockquote>
<p> इसीलिए मैंने उन तमाम अपने प्रिय प्रगतिशील कवियों, रचनाकारों बुद्धिजीवियों की परवाह नहीं की जो मेरे विस्थापन और (इस) जीनोसाइड पर चुप रहे। यह टीस मुझे अन्दर ही अन्दर सालती रही है। अभिव्यक्ति के सारे खतरे लगातार उठाते हुए चरम यातना के क्षणों में भी मेरी आस्था, मेरा सौन्दर्य मरा नहीं। प्रतिक्रिया वादी बना नहीं अपितु एक अद्भुत दीप्ति से चमक उठा है, जो कि एक संघर्ण रत रचनाकार से अपेक्षित होता है। मैं पाबलो नेरूदा, बरतोत ब्रेख़्त से ले कर क़ाज़ी नज़रुल इसलाम से निराला तक कवियों से प्रेरित व्यक्ति हूँ। </p>
<p>      <strong>पनुन कश्मीर की उत्पत्ति कैसे हुई? इसे कई लोग उतना ही सांप्रदायिक मानते हैं जितना कश्मीर का मुस्लिम अलगाववाद। आप का इस के विषय में क्या कहना है?</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>अलग होमलैंड की मांग साम्प्रदायिक नहीं धर्म-निरपेक्ष है। साम्प्रदायिक तो समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक हैं।</div>
<p> मैं पनुन कश्मीर का स्वप्न दर्शी हूँ। मैंने अपने चन्द मित्रों के साथ इस को सोचा, बुना और खड़ा किया। इस में कश्मीरी विस्थापितों के उन तमाम अधिकारों की आग्रहपूर्वक बात की जो उन से छिन चुके थे, भूमि की बात की, अनुभवों की बात की। भविष्य की अपने लिए शासन की बात की, भारतीय संविधान की निर्बाध बहाली की बात की, इसीलिए होमलैंड के साथ केन्द्र शासित क्षेत्र की बात की, जहाँ वे सब लोग निश्शंक और निर्भय हो कर सम्मान के साथ रह सकें जिन का विश्वास भारतीय लोकतन्त्र और धर्म-निरपेक्षता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता में हो। चूँकि कश्मीर में धर्म-निरपेक्षता की धज्जियाँ उड़ाई गई हैं, सह-अस्तित्व को नकारा गया है, अतः वहाँ के मूल नागरिक होने के नाते हमारा अधिकार बनता है कि हम वहाँ जा कर अपने रंग-ढंग से रह सकें। इसीलिए हम ने अलग होमलैंड की मांग की। यह मांग साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि धर्म-निरपेक्ष है। जबकि समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक साम्प्रदायिक हैं। इसीलिए मैंने कहा पनुन कश्मीर धर्म-निरपेक्षता की नर्सरी है। </p>
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 5px; padding: 5px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; font-size: 1em; float: right; width: 205px; text-align: left">
<h1>कांगड़ी</h1>
<h3>डॉ अग्निशेखर की एक कविता</h3>
<p><img width="201" vspace="5" hspace="2" height="240" border="0" alt="Kangri" title="kangri" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/Kangri.gif" /></p>
<p>जाड़ा आते ही वह उपेक्षिता पत्नी सी<br />
   याद आती है<br />
   अरसे के बाद हम घर के कबाड़ से<br />
   उसे मुस्कान के साथ निकाल लाते हैं<br />
   कांगड़ी उस समय <br />
   अपना शाप मोचन हुआ समझती है<br />
   उस की तीलियों से बुनी<br />
   देह की झुर्रियों में<br />
   समय की पड़ी धूल<br />
   हम फूँक कर उड़ाते हैं<br />
   ढीली तीलियों में कुछ नई तीलियाँ भी डलवाते हैं।</p>
<p>वह समझती है<br />
   कि दिन फिरने लगे हैं<br />
   हम देर तक रहने वाले कोयले पर <br />
   उस में आंच डालते हैं<br />
   धीरे धीरे उत्तेजित हो कर <br />
   फूटने लगता है उस की देह से संगीत<br />
   जिसे अपनी ठंड की तहों में<br />
   उतारने के लिए हम<br />
   उसे एक आत्मीयता के साथ <br />
   अपने चोगे के अन्दर वहशी जंगल में लिए फिरते हैं।</p>
<p>और जब रात को बुझ जाती है कांगड़ी<br />
   हम अनासक्त से हो कर <br />
   उसे सवेरे तक <br />
   अपने बिस्तर से बाहर कर देते हैं<br />
   कांगड़ी अवाक् देखती है हमें रात भर <br />
   आदमी हर बार <br />
   ज़रूरत के मौसम में उसे फुसलाता है<br />
   परन्तु नहीं सोचता कभी वह<br />
   उलट कर उस के बिस्तर में<br />
   भस्म कर जाएगी सदा की बेहूदगियाँ।</p>
</p></div>
<p>       <strong>पनुन कश्मीर के मार्गदर्शन मांगपत्र में मांग की गई है कि वितस्ता (झेलम) के पूर्व एवं उत्तर का भाग एक केन्द्र शासित प्रदेश रूप में बनाया जाए और वहाँ कश्मीरी हिन्दुओं को बसाया जाए। क्या आप को यह सुझाव व्यावहारिक लगता है?</strong>   </p>
<p> पिछले लगभग दो दशकों से विश्व का भू-राजनैतिक घटनाक्रम जिस तेज़ी के साथ स्थापित मानचित्र बदलता हुआ चला है उसे देखते हुए क्या मैं आप से पूछूँ कि क्या सोवियत रूस का टूटना संभव था? टूट कर नए देशों का बनना, बर्लिन की दीवार का गिरना? इसी तरह आज़ाद कश्मीर में पाकिस्तान का बनना, अलग इस्लामी गणतन्त्र का बनना? कश्मीर को वहाँ के मूल निवासी हिन्दुओं से विहीन करना संभव है, तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए चंडीगढ़ सरीखा एक विशाल गृहराज्य बनना संभव क्यों नहीं? यह दरअसल एक राष्ट्रीय मुद्दा है, संकीर्ण और कश्मीरी पंडितों तक सीमित नहीं। </p>
<p> कश्मीर के मुद्दे का अन्तिम निदान कब और कैसे होगा, आज की तारीख में उस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जब भी ऐसा होगा, उस समय हमारे भू-राजनैतिक अधिकारों की अनदेखी घातक सिद्ध होगी। कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं का वापसी कश्मीरियत की वापसी है, उसकी परंपरा की वापसी है, उसकी विरासत की वापसी है, और इसे वृहत् भारतीय सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में देखें तो यह हमारे जीवन मूल्यों की वापसी है। </p>
<p>      <strong>आप के लेखन और कविता में किसी और चीज़ से अधिक अपने सामुदायिक निष्कासन की छाप क्यों दिखती है?</strong>   </p>
<p> दुर्भाग्य से निर्वासन हमारी नियति बन गई है। यह निर्वासन देश विभाजन के बाद की सब से बड़ी मानवीय त्रासदी है। इसने एक जीवन्त और उज्जवल संस्कृति को धूल फांकने पर विवश किया है और उसके रेशे रेशे को बिखेर दिया है। और नई चुनौतियों, नए अनुभवों और नए वस्तुसत्य को सामने ला खड़ा किया है। यह वस्तुसत्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक वस्तुसत्य से जोड़ता है। आप हमारे निर्वासन में लिखे गए साहित्य में कई चौंका देने वाली समानताएँ देखेंगे। (आप इसे) यहूदी साहित्य में विस्थापन के साथ, फिलिस्तीनी साहित्य में दुर्द्धर्श आकांक्षा के साथ, अश्वेत साहित्य में आए नस्ल भेद के साथ, अरबी साहित्य विशेषकर सीरिया में 1967 की अरब पराजय के बाद की मानसिकता के साथ, मिला कर देख सकते हैं। </p>
<p> आप यहूदा आमिखाई, महमूद दरवेश, इब्बार रब्बानी, बेंजामिन मोलोइस जैसै अनेक प्रतिनिधि कवियों को पढ़िए, यह वस्तु सत्य भारतीय साहित्य में एक नया अध्याय है। इसे आप लाख चाहें झुठला नहीं सकते। कब तक झुठलाएँगे? </p>
<p>      <strong>कश्मीर के अल्पसंख्यक समुदाय में हमेशा से ही कारगर नेतृत्व का संकट रहा है। ऐसे में पनुन कश्मीर ने इस समुदाय के इतिहास में एक नया युग आरंभ किया था। फिर एक बड़े जन समर्थित आन्दोलन का स्थान एक विभाजित संगठन ने ले लिया। ऐसा क्यों हुआ?</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं भी सक्रिय हो जाते हैं।</div>
<p>हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं के अतिरिक्त कुछ बाहरी हाथ भी सक्रिय हो जाते हैं। वे तमाम शक्तियाँ भी सक्रिय हो जाती हैं जो आप को अपना शत्रु मानने लगती हैं। पनुन कश्मीर जब पहली बार टूटा (1993 में) तो उस में संघ के कार्यकर्त्ताओं की भूमिका थी। उन की समझ से पनुन कश्मीर और जे.के.एल.एफ. में कोई अन्तर नहीं था। इसलिए अग्निशेखर के नेतृत्व से आशंकित हो कर कुछ लोगों ने जो प.क. में सक्रिय थे, यह कर दिखाया। दूसरी बार 1996 में कुछ और साथियों ने कुंठाओं, पूर्वाग्रहों तथा महत्वाकांक्षाओं के चलते हम से विदा ली और अपनी अलग दुकान खोल ली। सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना संपन्न अग्निशेखर के नेतृत्व में खालिस राजनीतिक एजेंडा चलाना उन्हें कारगर नहीं लगा। मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में कहूँ तो साहित्य राजनीति की मशाल होती है। मुझे इस का उलट मंज़ूर नहीं था। जिस तरह का आन्दोलन हम चला रहे हैं, उस की अनिवार्यता है कि वह आम जनता से जुड़े और उस की दैनन्दिन समस्याओं से जुड़े, सांस्कृतिक आकांक्षाओं से जुड़े और उन से अपने राजनैतिक मुद्दे के लिए बल संचय करे। </p>
<p> मैं पारदर्शिता, आधारितभूत संरचना और जवाबदेह संगठनात्मक ढ़ांचे में विश्वास रखता हूँ, इसलिए भी टूटा। जहाँ तक एकीकरण की बात है, मैं ने भी अपनी ओर से तथा अपने साथियों की ओर से (अपने धड़े को) एक साल तक भंग किया, और बिना शर्त किसी भी भावी प्रारूप और नेतृत्व के लिए स्वयं को समर्पित रखा। अभी तक एकीकरण नहीं हो पाया है, परन्तु प्रसिद्ध कवि दीना नाथ नादिम के शब्दों में</p>
<blockquote><p>मुझे है आस कल की<br />
     कल प्रज्वलित होगी दुनिया।</p></blockquote>
<p>       <strong>आप की लिखी कहानी &quot;मेरी ज़मीन&quot; पर एक फिल्म <a target="_new" href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/419243.cms">शीन</a> का निर्माण हुआ, जो ज़्यादा नहीं चली। इस फिल्म ने आप की कहानी और आप के समुदाय की कहानी के साथ कितना न्याय किया?</strong>   </p>
<p> शीन मेरी कहानी पर बनी, पर बॉलीवुड की अब तक की सब से खराब फिल्मों में से एक है। एक साहित्यकार के नाते अपनी कहानी पर फिल्म बनने की प्रक्रिया में मेरे जो अनुभव हैं, वे प्रेमचन्द, अमृतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु, आदि से भिन्न नहीं हैं। वास्तव में साहित्य और फ़िल्म का आत्मीय संबन्ध और संवाद आज तक बना ही नहीं। साहित्य जहाँ एक स्वायत्त एकक है जहाँ साहित्यकार और उस का सृजन होता है, वहीं फिल्म एक ऐसा समुद्र है जहाँ तरह तरह की कला विधाएँ आ कर जा मिलती हैं। एक कुशल अनुभवी और दृष्टिसंपन्न निर्देशक ही सफल रूप से इन सब का समावेश कर सकता है। फिल्म माध्यम ही निर्देशक का है। हालाँकि मैं महेश भट्ट, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह की अपनी कहानी को ले कर उन की राय से बहुत उत्साहित था। महेश भट्ट का तो कहना था कि अगर <a target="_new" href="http://www.hindu.com/mp/2004/04/06/stories/2004040600640100.htm">अशोक पंडित</a> मेरी कहानी को सही ढ़ंग से फिल्मा सके तो यह <a target="_new" href="http://www.festival-cannes.org/">कान</a> तक में जा सकती है। खैर छोड़िए&#8230;   </p>
<p>      <strong>कश्मीर के विषय में हुई बैठकों आदि में आप का वास्ता इस मसले से जुड़े नेताओं से पड़ा है, और आप बता रहे थे कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति के साथ भी आप का सीधा सामना हुआ है। उस के विषय में बताएँ।</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>मुशर्रफ बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं।</div>
<p>जहाँ तक मुशर्रफ साहब की बात है, वे बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं। वे शान्ति बातचीत की बात भी करते हैं, अपनी धरती को आतंकवादियों द्वारा इस्तमाल नहीं करने देने की बात भी करते हैं, और इस के विपरीत आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर, मूलभूत संरचना बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाते हैं। कश्मीर के मामले में खुल्लमखुल्ला दख़लअन्दाज़ी करते हैं और वज़ीरिस्तान में अपने लोगों पर बम वर्षा पर भारत के टिप्पणी करने पर इस्लामाबाद से डाँट लगाते हैं, &quot;India should mind its own business&quot;. उन्होंने विश्व बिरादरी में वर्दी में होने को बावजूद अपनी एक प्रगतिशील और लचक वाली छवि गढ़ ली है, और self rule, demilitarization और joint control जैसे नए शगूफे छोड़ कर पुरानी ही शराब को नई बोतलों में पेश किया है। मेरी आगरा सम्मेलन के दौरान प्रधान मन्त्री के महाभोज में उन के साथ मुठभेड़ हुई है। मैं ने उन्हें कश्मीर की विनाश लीला, कश्मीरी पंडितों के निष्कासन और जीनोसाइड के लिए सीधे ज़िम्मेदार ठहराया था और आस पास खड़े सभी दिग्गज नेता (वाजपेयी जी, आडवाणी, मुलायम सिंह जी, आदि) दंग रह गए थे। तब परवेज़ मुशर्रफ ने स्थिति को संभालते हुए कहा था, &quot;कुछ तो करना होगा&#8230;, कुछ तो करना पड़ेगा भई&#8230;&quot;।</p>
<hr width="100%" size="2" />
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		</item>
		<item>
		<title>एड्स से कैसे बचा जाए</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-se-bachaav</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-se-bachaav#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:05:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[Prevention]]></category>

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		<description><![CDATA[एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य स्रोत हैं - यौन संबंध, रक्त द्वारा तथा माँ से शिशु को संक्रमण। यानी एड्स से कोई भी सुरक्षित नहीं। पर क्या एड्स से बचा जा सकता है? जी बिल्कुल! बचाव के तरीके जानने के लिये पढ़ें <strong>रमण कौल</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स से बचाव की बात करने से पहले इस बात पर एक और नज़र डाली जाए कि यह बीमारी फैलती कैसे है। एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य कारण हैं &#8211; यौन द्वारा, रक्त द्वारा, माँ-शिशु संक्रमण द्वारा। अब करते हैं बचाव की बात।</p>
<h1>यौन द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p>आप यौन द्वारा एचआइवी के शिकार न बनें, इस के लिए आप को इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>यदि आप अविवाहित हैं या आप का कोई स्थाई और विश्वसनीय यौन संगी नहीं है तो सेक्स को जितना हो सके, जब तक हो सके, टालना बेहतर है।</li>
<li>सेक्स साथियों में बदलाव न करें तो बेहतर है। एक वफ़ादार साथी से नाता रखें और उस से वफ़ा करें, यानी उसी से सेक्स करें।</li>
<li>यदि आप के पास अपने या अपने साथी के एचआइवी रहित होने का सौ प्रतिशत प्रमाण नहीं है तो सेक्स के समय कंडोम (जैसे निरोध, कोहिनूर, आदि) का प्रयोग करें &#8211; नियमित रूप से और सही विधि से।</li>
</ul>
<p><img title="Use Condom" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-1.jpg" border="0" alt="Use Condom" hspace="3" vspace="3" width="155" height="119" align="right" />बाज़ार में पुरुषों के प्रयोग हेतु कंडोम मिलते हैं, और स्त्रियों के प्रयोग हेतु भी। पुरुषों वाले कंडोम अधिक प्रचलित भी हैं और अधिक उपलब्ध भी &#8212; इस कारण यहाँ हम उन्हीं की बात करेंगे। यदि आप को इस बात की संभावना लगती है कि आप का किसी से यौन संबन्ध होने की संभावना है तो अपने पास कंडोम अवश्य रखें। किसी से सेक्स के लिए राज़ी होने से पहले उसे कंडोम प्रयोग के लिए राज़ी कर लें। कंडोम प्रयोग करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है</p>
<ul>
<li>पैकेट खोलते समय ध्यान से खोलें। आप के नाखून से कंडोम में छेद हो सकता है। छेद वाला कंडोम प्रयोग करना कंडोम प्रयोग न करने के बराबर है।</li>
<li>कंडोम को शिश्न पर चढ़ाने से पूर्व उसे पूरा न खोलें। उस का आगे का सिरा दबाएँ ताकि उस में हवा न फंसी रहे, उस के बाद उसे शिश्न पर चढ़ाते हुए पूरी तरह खोलें। कुछ चित्र <a href="http://www.rubbertree.org/condom.html" target="_new">यहाँ</a> देखें</li>
<li>यौन क्रिया पूरी होने पर शिश्न की अनुत्तेजित स्थिति आने से पहले ही कंडोम को सावधानी से उतारें, और सावधानी से फेंकें, ताकि द्रव्य इधर उधर न गिरे और किसी के संपर्क में न आए। कंडोम को कभी भी पुनः प्रयोग न करें।</li>
</ul>
<h1>रक्त द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Blood transfusion" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-2.jpg" border="0" alt="Blood transfusion" hspace="3" vspace="3" width="108" height="111" align="left" />रक्तदान के समय एड्स का संक्रमण न हो इस के लिए रक्तदाता के खून की जाँच होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि रक्त लेने और देने के लिए जिन सूइयों का प्रयोग हो रहा है, वे नई हों और अप्रयुक्त हों। चूँकि रक्त-आधान अस्पतालों या प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा ही किया जाता है, आज के युग में रक्तदान के द्वारा असावधानी होने पर एचआइवी का संक्रमण होने की संभावना कम है &#8212; ऐसा हो तो घोर अपराध ही कहा जाएगा।</p>
<p><img title="Use of Syringes" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-3.jpg" border="0" alt="Use of Syringes" hspace="3" vspace="3" width="156" height="103" align="right" />रक्त द्वारा संक्रमण होने की अधिक संभावना तब रहती है जब रोगी, या उस के साथी स्वयं गलत तरीके से सूइयों का प्रयोग करते हैं और उन की अदला बदली करते हैं। आम तौर पर ऐसा तब होता है जब इंजेक्शन द्वारा नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले जूठी सूइयों का प्रयोग करते हैं। स्वास्थ्य कर्मचारियों, जो कई रोगियों के बीच काम करते हैं, के लिए भी रक्त द्वारा रोग संक्रमण का खतरा बना रहता है। यदि आप स्वयं को या दूसरों को इंजेक्शन द्वारा दवाइयाँ दे रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें</p>
<ul>
<li>हर बार नई, अप्रयुक्त या संक्रमण रहित सूई का प्रयोग करें।</li>
<li>एक व्यक्ति पर प्रयोग की गई सूई दूसरे व्यक्ति पर प्रयोग न करें।</li>
<li>इंजेक्शन करते समय संपर्क संबन्धी सावधानियाँ बरतें, जैसे फेंके जाने वाले दस्ताने पहनना, इंजेक्शन से पहले और बाद में साबुन और पानी से हाथ धोना, आदि।</li>
</ul>
<h1>माँ-शिशु संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Pregnant Woman" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-4.jpg" border="0" alt="Pregnant Woman" hspace="3" vspace="3" width="34" height="80" align="right" />यदि एक एच॰आइ॰वी॰ युक्त स्त्री गर्भवती हो जाती है तो नवजात शिशु के संक्रमित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है &#8212; यह संक्रमण गर्भ, प्रसव या स्तनपान द्वारा हो सकता है। एचआइवी युक्त स्त्रियाँ एचआइवी युक्त शिशुओं को न जनें, इस के लिए इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>अवांछित गर्भ को टाला जाए, जिस के लिए कंडोम और अन्य गर्भ निरोधक साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।</li>
<li>गर्भ और प्रसव के दौरान माता को एंटीरेट्रोवाइरल दवाइयाँ दी जाएँ, जिस से शिशु के संक्रमित होने का खतरा कम हो जाता है।</li>
<li>यदि अन्य हालात इजाज़त दें ते शिशु का जन्म सी-सेक्शन द्वारा कराया जाए। इस से माता के द्रव्यों से बच्चे का संपर्क कम हो जाता है और संक्रमण का खतरा भी।</li>
<li>यदि अन्य स्वीकार्य विकल्प उपलब्ध हों, तो शिशु को स्तनपान न कराया जाए।</li>
</ul>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; width: 99%;">
<h1>जानकारी ही बचाव है!</h1>
<h3>एड्स है क्या?</h3>
<p>एड्स शब्द बना है एक्वार्यड इम्यूनो डेफिशियेन्सी सिन्ड्रोम से और इसका कारण होता है एक अतिसूक्ष्म कीटाणू ह्यूमन इम्यूनोडेफीशीयेन्सी सिन्ड्रोम यानि एचआईवी। एड्स स्वयं कोई बीमारी नही है पर एड्स से पीड़ित मानव शरीर संक्रामक बीमारियों, जो कि बैक्टीरिया और वायरस आदि से होती हैं, के प्रति अपनी प्राकृतिक प्रतिरोधी शक्ति खो बैठता है क्योंकि एचआईवी रक्त में मौजूद प्रतिरोधी पदार्थ लिफ्मोसाईट्स पर हमला करता है। एड्स पीड़ित के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता के क्रमशः क्षय होने से कोई भी अवसरवादी संक्रमण, यानि आम सर्दी जुकाम से ले कर टी.बी. जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं।</p>
<h3>क्या एड्स का इलाज संभव है ?</h3>
<p>ऐसी दवाईयाँ अब उपलब्ध हैं जिन्हें ए.आर.टी यानि एंटी रेट्रोवाईरल थेरपी दवाईयों के नाम से जाना जाता है। सिपला की ट्रायोम्यून जैसी यह दवाईयाँ महँगी हैं, प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 15000 रुपये होता है, और ये हर जगह आसानी से भी नहीं मिलती। इनके सेवन से बीमारी थम जाती है पर समाप्त नहीं होती। अगर इन दवाओं को लेना रोक दिया जाये तो बीमारी फ़िर से बढ़ जाती है, इसलिए एक बार बीमारी होने के बाद इन्हें जीवन भर लेना पड़ता है। अगर दवा न ली जायें तो बीमारी के लक्षण बढ़ते जाते हैं और एड्स से ग्रस्त व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है।</p>
<div id="pullQuoteR">सिपला जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा।</div>
<p>एक अच्छी खबर यह है कि सिपला और हेटेरो जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये शीघ्र ही पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा (सिपला इसे वाईराडे के नाम से पुकारेगा)। इन्हें यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से भी मंजूरी मिल गई है। इन दवाईयों पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 1 लाख रुपये होगा, संबल यही है कि वैश्विक कीमत से यह 80-85 प्रतिशत सस्ती होंगी।</p>
<h3>एड्स कैसे फैलता है ?</h3>
<p>एचआईवी केवल एक मानव से दूसरे मानव को फैल सकती है। पीड़ित व्यक्ति के शरीर के सभी द्रव्यों जैसे रक्त, स्तनदुग्ध, वीर्य, आदि में फैल जाता है। कोई अन्य व्यक्ति अगर इन द्वव्यों के संपर्क में आता है तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। यह वायरस स्वस्थ त्वचा को पार नहीं कर सकता इसलिए बाहरी शरीर से संपर्क में आने पर इससे कुछ खतरा नहीं होता। इसके फैलने का सबसे आसान तरीका है यौन संपर्क। इसके अतिरिक्त संक्रमित व्यक्ति का रक्त किसी और को देने से, संक्रमित सुई या सिरिंज का इस्तेमाल करने से और संक्रमित माँ के दूध से उसके बच्चों में भी फैल सकता है।</p>
<h3>एड्स के लक्षण क्या हैं ?</h3>
<p>एचआईवी शरीर में प्रवेश के बाद धीरे धीरे फैलना शुरु करता है। जब वायरस की मात्रा शरीर में बहुत बढ़ जाती है, उस समय बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। एड्स के लक्षण प्रकट होने में आठ से दस साल या अधिक भी लग सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को, जिसके शरीर में एड्स का वायरस हों पर एड्स के लक्षण प्रकट न हुए हों, एचआईवी पॉसिटिव यानि एचआईवी वायरस सहिक कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति भी एड्स फैला सकते हैं।</p>
<p>एड्स के लक्षण बहुत विभिन्न तरह के हो सकते हें, क्योंकि शरीर में कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है, इसलिए विभिन्न संक्रामक बीमारियाँ हो सकती हैं, हर संक्रामक बीमारी के अपने लक्षण होते हैं। एड्स के प्रमुख लक्षण हैं वजन में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी और एक माह से ज़्यादा से चल रहा बुखार या डायरिया। अप्रधान संकेतों में एक महीने से ज्यादा लगातार चल रही खाँसी, खुजली वाली त्वचा की बीमारियाँ, बार बार होती दाद, मुँह और गले में छाले आदि शामिल हैं। एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने हेतु मुख्यतः एंज़ाइम लिंक्ड इम्यूनोएब्ज़ॉर्बेंट एसेस यानि एलिसा टेस्ट किया जाता है।</p>
<h3>किसको एड्स का खतरा अधिक है?</h3>
<p>खतरा सभी को है पर किशोरवयः व नौजवान लोगों को खतरा अधिक है क्योंकि आम तौर पर इस उम्र में यौन और नशीले पदार्थों जैसे नये अनुभवों की तलाश अधिक रहती है। युवाओं में एक अन्य वर्ग है जिनको एड्स का खतरा अधिक है, वह है यौन कर्मियों का, यानि वे लोग जो वेश्यावृत्ति से जुड़े हैं। अनुमानतः भारत में करीब 20 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें से 20 प्रतिशत 15 वर्ष से कम आयु के हैं और 50 प्रतिशत 18 वर्ष से भी कम आयु के हैं।</p></div>
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		</item>
		<item>
		<title>आइए वर्डप्रेस अपनाएँ – भाग 2</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2005 15:42:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=2910</guid>
		<description><![CDATA[रमण कौल के लेख के दूसरे भाग में जानें ब्लागर से वर्डप्रेस में ब्लाग आयातित करना, थीम परिवर्तन और प्लगइन संस्थापन]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">वर्डप्रेस पर <a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a> के लेख का यह दूसरा भाग है। लेख के इस भाग में हम आप को बताएँगे कि आप ब्लॉगर से बनाई प्रविष्टियाँ वर्डप्रेस में कैसे आयातित कर सकते हैं। इस के इलावा बात करेंगे थीम परिवर्तन की, प्लग-इन इन्सटॉल करने की और कार्यान्वित करने की। आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्‍त कर सकते हैं इस लेख के अन्त में टिप्पणी के रूप में या patrikaa एट gmail डॉट कॉम पर सम्पादक को लिखे पत्र के रूप में।</div>
<p><img class="alignleft" style="margin: 1px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="निधि" hspace="1" vspace="1" width="135" height="140" align="right" /><span style="font-size: large;">पि</span>छले अंक में <a href="http://nirantar.org/0605-nidhi">आपने पढ़ा</a> कि वर्डप्रेस को क्यों चुनें, और कैसे स्थापित करें। संभावना है कि आप ने अपना नया चिट्ठा वर्डप्रेस पर स्थापित करने के बारे में विचार किया होगा। यदि आप पहले से किसी चिट्ठे का प्रबन्धन कर रहे हैं (ब्लॉगस्पॉट या किसी अन्य तन्त्र पर) और यदि वर्डप्रेस के कई गुणों के चलते आपने उसे प्रयोग करने का निश्चय कर लिया है तो एक समस्या यह रहेगी कि पुरानी प्रविष्टियों का क्या किया जाए। एक विकल्प तो यह है कि आप पुरानी प्रविष्टियाँ पुराने स्थान पर ही रहने दें और वर्डप्रेस नई प्रविष्टियों के साथ आरंभ करें। या फिर यदि आप चाहते हैं कि पुरानी प्रविष्टियों को वर्डप्रेस पर लाया जाए तो आगे पढ़ें।</p>
<h2>प्रविष्टियों का ब्लॉगर से वर्डप्रेस पर स्थानान्तरण</h2>
<p>वर्डप्रेस के नए संस्करण के साथ एक PHP स्क्रिप्ट है जो ब्लॉगर से प्रविष्टियों को वर्डप्रेस में आयातित करने के लिए बनाई गई है। जब आप ने वर्डप्रेस को अपने सर्वर पर स्थापित किया तो उस के साथ यह फाइल भी स्थापित हो गई है।  इस फाइल का नाम है import-blogger.php और यह आपके सर्वर के /wp-admin/ फोल्डर में रखी हुई है। यानी, यदि आप का चिट्ठा www.xyz.com/blog पर है तो यह स्क्रिप्ट चलाने के लिए आप को अपने ब्राउज़र में http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php पर जाना पड़ेगा। पर अभी नहीं। पहले आप को कुछ काम अपने ब्लॉगर पर करना है। घर बदलने से पहले सामान पैक करेंगे या नहीं? नहीं करेंगे तो सामान टूटी फूटी हालत में पहुँचेगा।</p>
<h2>ब्लागर पर प्रविष्टियों की &#8220;पैकिंग&#8221; और नई जगह भेजना</h2>
<p>हमें करना यह है कि अपने प्रविषटियों से सम्बन्धित सारी सूचनाएँ, यानी तारीख, मसौदा, आदि एक ऐसी सारणी के आकार में बनानी है जिसे वर्डप्रेस समझ सके। हम ब्लॉगर को यह निर्देश देंगे कि यह सारणी हमारे सर्वर पर छाप दे। इस के लिए निम्नलिखित निर्देशों का पालन करें</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/bl1.jpg" alt="" hspace="1" vspace="1" width="428" height="496" align="right" /></p>
<ul>
<li>अपने ब्लॉगर के खाते में लॉग-इन कीजिए।</li>
<li>अब अपने चिट्ठे का नियन्त्रण पटल खोल कर Settings, Publishing पर क्लिक करें। फिर Switch to FTP को चुनें।</li>
<li>अगले पन्ने पर आप को उस बेब सर्वर का पता देना पड़ेगा जिस पर आप ने अपना वर्डप्रेस चिट्ठा स्थापित किया है। उदाहरणतः xyz.com/blog/ । सारी सूचनाएँ भरने के बाद Save Settings पर क्लिक करना न भूलें। नीचे दिए सारे बदलाव पूरे करने से पहले Republish पर क्लिक न करें।</li>
<li>अब Formatting पर क्लिक करें। Date language यदि आप ने हिन्दी रखी हुई है तो उसे English US में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में अन्तिम विकल्प)। इस के अतिरिक्त Timestamp format को mm/dd/yyyy hh:mm:ss AM/PM प्रारूप में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में पहला विकल्प)। फिर Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>Archiving पर जा कर Archive Frequence को Monthly कर दें (यदि पहले से नहीं है)। Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Templates पर जाएँ। यहाँ आप भारी बदलाव करने जा रहे हैं इसलिए पहले अपने टेंपलेट के मसौदे को किसी टेक्सट फाइल में कॉपी कर के किसी सुरक्षित जगह पर संचित करें। अब ब्लॉगर पर अपने टेंपलेट का सारा मसौदा हटा कर केवल नीचे दी हुई पंक्ति उस में डाल दें,&lt;$BlogItemDateTime$&gt;|||&lt;$BlogItemAuthorNickname$&gt;|||&lt;$BlogItemBody$&gt;|||&lt;$BlogItemNumber$&gt;|||&lt;$BlogItemSubject$&gt;और Save Template Changes पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Republish पर क्लिक करें। यह काम सफलतापूर्वक होने का अर्थ है कि आप का लगभग सारा काम हो गया है, यानी सामान पैक हो कर नई जगह पहुँच गया है। अब खोलने और सजाने भर की देर है।</li>
<li>अपने सर्वर पर FTP के द्वारा जा कर सुनिश्चित करें कि आप की फाइलें पहुँच गई हैं। उन के नाम कुछ इस तरह होंगे &#8211; 2005_01_01_wordpress.php। यदि आप को ऐसी कोई फाइल नहीं दिखती तो आप को यह सारा काम दोबारा करना पड़ेगा।</li>
</ul>
<h2>वर्डप्रेस पर प्रविष्टियों का आयात</h2>
<p>बाकी का काम आसान है। अपने ब्राउज़र में नीचे दी गई पंक्‍ति टाइप कर के चला दें</p>
<pre>http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php</pre>
<p>आप की प्रविष्टियाँ आप के वर्डप्रेस चिट्ठे में आयातित हो जाएँगी।</p>
<p>यह कार्य सफलता के साथ हो जाने पर आप चाहें तो ब्लॉगर पर जाकर आप वहाँ किए गए बदलाव पलट सकते हैं ताकि आप का ब्लॉगर चिट्ठा भी ज़िन्दा रहे।</p>
<p>एक बात और, ऊपर बताई गई import-blogger.php फाइल वर्डप्रेस की अधिकृत स्क्रिप्ट फाइल है और यह फाइल यह लेख लिखे जाने के समय तक प्रविष्टियाँ तो ब्लॉगर से वर्डप्रेस में आयातित करती है, पर टिप्पणियाँ नहीं। यदि आप के चिट्ठे पर बहुत अधिक टिप्पणियाँ हैं और आप उन्हें बिना अधिक मेहनत किए आयातित करना चाहते हैं तो <a href="http://www.skeltoac.com/2005/03/12/from-blogger-to-wordpress-2/">ऍण्डी स्केल्टन</a> की तरकीब का इस्तेमाल करें। उम्मीद है वर्डप्रेस के अगले संस्करण में यह कार्यशीलता भी जुड़ जाएगी।</p>
<h2>वर्डप्रेस में अभिकल्प परिवर्तन यानी नई थीम लगाना</h2>
<p>अब सामान नए घर में आ गया तो शायद आप कुछ साज-सजावट की सोच रहे होंगे। वर्डप्रेस में विभिन्न डिज़ाइनों या थीमों को कार्यान्वित करना काफी आसान है। थोड़ी सी मेहनत है तो वह है थीम ढ़ूढने और डाउनलोड-अपलोड करने में। सब से पहले देखें कि पहले से उपस्थित थीम को कैसे कार्यान्वित किया जाए।</p>
<p>अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित अभिकल्पों की सूची मिल जाएगी। सक्रिय अभिकल्प के सामने लिखा होगा &#8220;सक्रिय अभिकल्प&#8221; और शेष अभिकल्पों के सामने लिखा होगा &#8220;चुनें&#8221;। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। पृष्ठ के ऊपर जालस्थल देखें पर क्लिक करें और देखें कि यह अभिकल्प आप के चिट्ठे पर कैसा लगता है। चाहें तो वापस जा कर कोई और अभिकल्प चुन सकते हैं।</p>
<p>वर्डप्रेस के इंस्टालेशन के साथ केवल दो या तीन अभिकल्प आते हैं, इसलिए यदि आप को कोई और अभिकल्प प्रयोग करना है तो वह आप को अलग से इन्सटाल करना पड़ेगा। वर्डप्रेस का आधिकारिक थीम पृष्ठ <a href="http://wordpress.org/extend/themes/">यहाँ</a> है। जो थीम आप को अच्छी लगे, उस के &#8220;डाउनलोड&#8221; पर क्लिक कीजिए। ज़िप फाइल को खोल कर जो फोल्डर बनेगा, उसे ज्यों का त्यों अपने सर्वर के wp-content/themes/ फोल्डर में अपलोड कर दीजिए। अब आप वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँगे, और &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करेंगे तो आप को उपस्थित अभिकल्पों की सूची में नया अभिकल्प भी नज़र आएगा। इसे &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक कर के आप सक्रिय कर सकते हैं।</p>
<p>यदि वर्डप्रेस के आधिकारिक थीम पृष्ठ पर दिए गए अभिकल्प आप को काफी नहीं लगते, तो <a href="http://codex.wordpress.org/Using_Themes/Theme_List">यहाँ</a>, <a href="http://www.alexking.org/index.php?content=software/wordpress/themes.php">यहाँ</a>, <a href="http://themes.wordpress.net/theme-viewer.php">यहाँ</a> और <a href="http://www.bloggingpro.com/wordpress-theme-gallery/">यहाँ</a> देखिए, या फिर <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+themes">गूगल भैया</a> से पूछिए।</p>
<h2>वर्डप्रेस में प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन</h2>
<p>वर्डप्रेस में अतिरिक्त कार्यशीलता प्लग-इन के माध्यम से जोड़ी जाती है। एक प्लग-इन जो बहुत लाभदायक है वह है &#8220;स्पैम-कर्मा&#8221;। यदि आप के चिट्ठे के ऊपर टिप्पणियों द्वारा लोग अपना जुए का या सेक्स का कारोबार बढाना चाहते हैं तो आप को कोई तो हथियार चाहिए उन्हें रोकने के लिए। प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन थीम के स्थापन और कार्यान्वयन जैसा ही है। अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्लग-इन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित प्लग-इन्ज़ की सूची मिल जाएगी। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;सक्रिय करें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। नए प्लग इन खोजने और डाउनलोड करने के लिए <a href="http://wordpress.org/extend/plugins/">यहाँ</a>, <a href="http://codex.wordpress.org/Plugins">यहाँ</a>, <a href="http://www.bloggingpro.com/archives/category/wordpress-plugins/">यहाँ</a> जाएँ या <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+plugin">गूगल</a> से पूछें।</p>
<p class="note">यह लेख 2005 में लिखा गया था और नवीनतम वर्डप्रेस हेतु लागू नहीं होता. अब वर्डप्रेस में आयात प्रक्रिया काफी कम कष्टकर और सरल कर दी गई है. &#8211; संपादक</p>
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		</item>
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		<title>भारतीय समाज और भ्रष्टाचार</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-nazariya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nazariya#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 19:57:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[Internet]]></category>

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		<description><![CDATA[क्या भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे? अन्तर्जाल पर किसका वर्चस्व रहेगा गुंडों मवालियों का या उनका जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं? इन दोनों मुद्दों पर पढ़ें निरंतर के जुलाई २००५ अंक की संपादकीय राय.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">क्या</div>
<p>भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? और क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे?</p>
<p><img src="http://nirantar.org/images/stories/editorial.gif" border="0" alt="नज़रिया" hspace="4" vspace="3" align="left" />दो नम्बर के पैसे पर थोड़ा लगाम कसने के उद्देश्य से, वर्ष 2005 के वित्त विधेयक में, हर 10000 रुपए की नक़द निकासी पर दस रुपए का कर जब वित्त मंत्री पी। चिदम्बरम ने लगाना चाहा, तो हर तरफ हल्ला मच गया। सदन में चिल्ल-पों के बीच वित्त मंत्री ने इस कर को यह कह कर उचित ठहराने की भी कोशिश की कि एटीएम की कतार में लगने से बचने के लिए आप उसके दरबान को यूँ ही दस रुपए देते हैं।</p>
<p>वित्त मंत्री की यह बात परोक्ष रूप से इस बात का इशारा करती है कि भ्रष्टाचार और घूसखोरी आम भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। अब अगर वे चाहें तो भी इससे निजात नहीं पा सकते। भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी  सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।</p>
<div id="pullQuoteR">भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।</div>
<p>गुरचरण दास ने दैनिक भास्कर के अपने कॉलम में अभी-अभी ही अपने एक मित्र का किस्सा बयान किया है। उनका वह अनिवासी भारतीय मित्र अमेरिका के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है, जहाँ कि कई नोबल पुरस्कार प्राप्त फैकल्टीज़ भी हैं। उस मित्र ने भारत और भारतीय विद्यार्थियों की सेवा के लिए उस विश्वविद्यालय की एक शाखा भारत में खोलनी चाही। इसके लिए उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालय एसोसिएशन को अर्जी दी। जाहिर है, अर्जी का कोई जवाब उन्हें नहीं मिला। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अधिकारियों के साथ उनकी बैठक का नतीजा रिश्वत की मांग के रूप में सामने आया। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय में उनका आवेदन धूल मिट्टी खाता रहा। हार कर उनके मित्र ने चीन में उस यूनिवर्सिटी का कैंपस खोलने का निश्चय किया है, और कहा है कि भारत से कोई आशा नहीं की जा सकती।</p>
<p>भारत से कोई आशा क्यों नहीं की जा सकती? बिलकुल की जा सकती है। बस, आपको इसके लिए भ्रष्ट होना पड़ेगा। रिश्वतखोरी अपनानी होगी। अगर गुरचरण दास के वह मित्र रिश्वत बांट देते तो उनके यूनिवर्सिटी का कैंपस भारत में फल-फूल रहा होता। भारत में बाढ़ राहत के नाम से जारी करोड़ों रुपयों से अपने लिए बंगले और प्रापर्टी खरीदने वाले आईएएस अफसर एशियन हीरो के पुरस्कार से नवाज़े जाते हैं। ग़रीब गुरबों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के  मात्र 100 रूपये प्रति महीने दी जाने वाली राशि को भी भ्रष्ट भारतीय अधिकारी और कर्मचारी गबन करते हैं। परीक्षा के परचे फिर से जाँचने में धांधली कर रुपए कमाते हैं। अपने कुनबे को मस्टररोल पर रख कर शासन को चूना लगाते हैं। रक्षा सौदों में रशियन भाषा को दोष देते हुए खरीदी आदेशों में एक शून्य बढ़ा कर हजार का माल लाख में खरीद लिया जाता है। मंत्री पुत्र की शादी के लिए अफसरों से अवैध वसूली की जाती है। </p>
<p>कुल मिलाकर यहाँ भारत में हर संभावित स्थल से, हर संभावित भ्रष्ट तरीके से जब रूपया आसानी से कमाया जा सकता है तो फिर, भारत से आशा क्यों नहीं की जा सकती? भारत ने बहुतों की आशाओं को पूरा किया है। और कर रहा है। यही वजह है कि भारत में जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा छूटा नहीं है, जहाँ भ्रष्टाचार ने अपने कदम नहीं रख छोड़े हों। भ्रष्टाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इसे आप नकार नहीं सकते। स्थिति यह है कि इसके बगैर, संभवत: आपका जीवन असंभव नहीं, तो अति कठिन तो है ही।</p>
<p>पर, क्या हमें यह यथा स्थिति स्वीकारनी चाहिए? कतई नहीं। आज भारतीय समाज के लिए एक और स्वतंत्रता आंदोलन की, एक और सम्पूर्ण क्रांति की ज़रूरत है। भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने की, स्वस्थ और स्वच्छ समाज को फिर से रचने की, आज घोर ज़रूरत है। सोन चिरैया को वापस उसके घरौंदे में ला बिठाने का समय आ चुका है। इस आंदोलन का बिगुल बजाया जाना चाहिए। आइए उम्मीद करें, और यह प्रार्थना भी, कि भारत में गांधी सा कोई महात्मा शीघ्र अवतरित हो। जो इस नए स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात कर भारतीयों की जड़ को जकड़ चुके भ्रष्टाचार से स्वतंत्रता दिलाए।</p>
<p>आमीन</p>
<p class="note">लेखक <a href="http://hindini.com/ravi">रविशंकर श्रीवास्तव</a> निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।</p>
<h2>कितनी स्वतंत्रता हो सामुदायिक अंतर्जाल पर</h2>
<div class="dropCap">अं</div>
<p>ग्रेज़ी की कहावत है, &#8220;टू मैनी कुक्स स्पॉइल द ब्रॉथ&#8221;, यानी एक ही व्यंजन को बनाने के लिए कई लोगों को लगा दिया जाए तो उस का बुरा हाल ही होगा। शायद यही हुआ लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ के विकिटोरिल प्रयोग के साथ, जो बड़ी धूम से शुरू तो हुआ पर कुछ दिनों में ही बन्द हो गया।</p>
<p>&#8220;ब्लॉग&#8221; की तरह &#8220;विकी&#8221; भी इंटरनेट पर अपेक्षाकृत नया शब्द है। हवाइयन भाषा के शब्द विकी-विकी, जिस का अर्थ है जल्दी-जल्दी, से लिया गया यह शब्द &#8220;विकी&#8221; अन्तर्जाल पर एक और क्रान्ति का वाहन बन गया है। विकी साइट ऐसी साइट होती है, जिसे आप न सिर्फ पढ़ सकते हैं, बल्कि बड़ी आसानी से बदल भी सकते हैं। यानी आप किसी विकी साइट पर कोई लेख पढ़ते हैं और उस पर दी गई सूचना आप को अपर्याप्‍त लगती है, या त्रुटिपूर्ण लगती है, तो बजाय लेख के लेखक को लिखने के आप स्वयं लेख को बदल ड़ालते हैं। इस तरह का तन्त्र साझे प्रकल्पों के लिए बहुत बड़ा वरदान है, जिस में कई लोग संसार के विभिन्न कोनों में बैठ कर एक ही लेख को मिल कर पूरा कर सकते हैं। विकी के सफल प्रयत्‍नों में मुख्य है <a href="http://hi.wikipedia.org">विकिपीडिया</a>, जो एक बहुभाषीय ज्ञानकोष है, <a href="http://hi.wiktionary.org">विकशनरी</a> जो एक बहुभाषीय शब्दकोष है, <a href="http://en.wikinews.org/wiki/Main_Page">विकीन्यूज़</a>, जहाँ आप समाचार लिख सकते हैं। <a href="http://wikipedia.sourceforge.net/">मीडियाविकी</a>, जो कई विभिन्न विकी प्रकल्प बनने में सहायक हैं, का नारा है &#8220;..क्योंकि विचारों को चाहिए आज़ादी&#8221;।</p>
<div id="pullQuoteR">हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं</div>
<p>पर जहाँ स्वतन्त्रता है, वहाँ स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वाले भी हैं। पिछले दिनों अमरीका के एक प्रमुख समाचार पत्र लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ ने एक निराला प्रयोग किया, और उस का नाम रखा विकिटोरियल यानी विकी सम्पादकीय। यह अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ के उप-सम्पादक माइकल न्यूमैन के दिमाग़ की उपज थी। उन के अनुसार उद्देश्य था इंटरनेट पर अखबार के पाठकों को मौका देना &#8220;साझे ढ़ंग से सत्य की खोज&#8221; का। इस के अन्तर्गत, पत्र के सम्पादकीय को खुला छोड़ा गया ताकि पाठक उसे बदल सकें। सम्पादकीय की मूल प्रति तो अपने स्थान पर रही, पर उस की एक और प्रति रखी गई लोगों की छेड़छाड़ के लिए। जैसा अपेक्षित था, सम्पादकीय के मूल स्वरूप की पहचान समाप्‍त होने में देर नहीं लगी। लगभग एक हज़ार पाठकों ने सम्पादकीय को बदलने के लिए रजिस्टर किया। कुछ ने विभिन्न शब्दों पर कड़ियाँ जोड़ीं, एक ने तो सम्पादकीय को ही आधा कर दिया। पर ज़ोर का झटका तब लगा जब कुछ पाठकों ने अश्लील चित्र ड़ालने शुरू कर दिए। हार कर अखबार ने विकिटोरियल को &#8220;अस्थाई रूप से&#8221; <a href="http://www2.latimesinteractive.com/wiki/index.php/Wikitorial">बन्द कर दिया</a>, उन लोगों का धन्यवाद देते हुए जिन्हों ने सही मानसिकता के साथ इस प्रयोग में भाग लिया। हम तो यही गुनगुना सकते हैं कि, &#8220;&#8230;यह तो होना ही था&#8221;।</p>
<p>आज़ादी की राहें खोलने वालों और आज़ादी का ग़लत फायदा उठाने वालों का यह चूहे-बिल्ली का खेल तो सदियों से चलता आया है और आगे भी चलता रहेगा। यदि आप घर में खुली हवा आने के लिए खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ना चाहते हैं तो जल्द ही चोर-लुटेरों का ड़र आप को मजबूर करेगा सींखचे लगाने के लिए, या फिर खिड़की-दरवाज़े बन्द करने के लिए। अन्तर्जाल पर वाइरस, वर्म, स्पैम, पॉर्न, स्पाइवेयर यह सब इसी बीमारी के लक्षण हैं। पर हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं, नए सॉफ्टवेयर बनाते हैं और चोर उचक्कों की नाक में दम करने के लिए भी नए तन्त्र बनाते हैं। आशा है विकिटोरियल की खिड़की फिर खुलेगी, सींखचे लगने के बाद ही सही।
<p class="note">लेखक <a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a> निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।</p>
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		<title>आइए वर्डप्रेस अपनाएँ</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 08:08:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

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		<description><![CDATA[यदि आपके पास अपना जालस्थान या वेबस्पेस उपलब्ध है तो आप अपने ब्लॉग को एक ऐसे ब्लॉगिंग तंत्रांश पर स्थापित कर सकते हैं जिसके दीवाने दुनिया भर में हैं। निरंतर के वर्डप्रेस विशेषाँक के अन्तर्गत प्रस्तुत है रमण कौल का आलेख जिसकी मदद से आप वर्डप्रेस पर अपना चिट्ठा शुरू करने की चाहत को मूर्त रूप दे सकते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="padding: 0px 5px 5px; margin-top: 0px;">यदि आपके पास अपना जालस्थान या वेबस्पेस उपलब्ध है तो आप अपने ब्लॉग को एक ऐसे ब्लॉगिंग तंत्रांश पर स्थापित कर सकते हैं जिसके दीवाने दुनिया भर में हैं। निरंतर के वर्डप्रेस विशेषाँक के अन्तर्गत प्रस्तुत है यह हल्का फुल्का आलेख जिसकी मदद से आप वर्डप्रेस पर अपना चिट्ठा शुरू करने की चाहत को मूर्त रूप दे सकते हैं। आपके समस्त प्रारंभिक प्रश्‍नों का उत्तर देने का प्रयास कर रहा है <a href="http://idharudharki.kalusa.org/">रमण कौल</a> के रोचक लेख का पहला भाग।</div>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/wp-special.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="150" height="75" align="right" /></p>
<div class="dropCap">व</div>
<p>र्डप्रेस ने बहुत अल्प समय में ही मूवेबल टाईप के विकल्प के रूप में प्रसिद्धि हासिल की है। निरंतर का यह विशेषांक इसी ब्लॉगिंग तंत्र पर केंद्रित है तो कुछ बात तो होगी इस में। जब वर्डप्रेस पर अपना ब्लॉग बनाने या स्थानांतरित करने की बात हो तो अक्सर लोगों का यही सवाल होता है, &#8220;जनाब! मेरा चिट्ठा तो अच्छा खासा ब्लॉगर पर चल रहा है। हम भला क्यों वर्डप्रेस अपनाऊँ?&#8221; यह आपत्ति एकदम उचित है, और हम यहाँ कोई धर्म-परिवर्तन का पाठ नहीं पढ़ाने जा रहे। यहाँ तो हम आप को वर्डप्रेस क्या है, यह बतायेंगे, साथ ही करेंगे इस की ब्लॉगर जैसे यन्त्रों से तुलना, विवेचना करेंगे वर्डप्रेस के फायदे &#8211; नुकसान के बारे में और विस्तार से जानेंगे कि वर्डप्रेस का प्रयोग कैसे करना चाहिये।</p>
<h2>वर्डप्रेस क्यों?</h2>
<p>यह जानने कि लिये आइए पहले हिन्दी चिट्ठा जगत के कुछ आँकड़ों पर दृष्टिपात करें। इस पंक्तियों के लिख जाते समय हिन्दी चिट्ठा जगत में <a href="http://www.myjavaserver.com/%7Ehindi">पचपन से अधिक</a> हिन्दी चिट्ठे हैं और केवल पाँच-सात को छोड़ कर शेष सभी <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a> की मुफ़्त मेहमान नवाज़ी का फायदा उठा रहे हैं, यानी उन को इस जालस्थल पर  निःशुल्क होस्टिंग की सुविधा मिली है। बाक़ी <a href="http://www.akshargram.com/">पाँ</a><a href="http://idharudharki.kalusa.org/">च</a><a href="http://hindini.com/ravi">-</a><a href="http://jitu.info/merapanna">सा</a><a href="http://hindi.pnarula.com/haanbhai">त</a> <a href="http://hindini.com/hindini">चि</a><a href="http://hindini.com/fursatiya">ट्ठे</a> चिट्ठाकारों के अपने अपने जालस्थान पर हैं और वे सभी वर्डप्रेस का ही प्रयोग करते हैं। यह दीगर बात है कि वर्डप्रेस वाले चिट्ठाकारों ने भी शुरुआत ब्लॉगर से ही की थी। मोटे तौर पर यही बात अँग्रेज़ी चिट्ठा जगत के बारे में भी कही जा सकती है, अन्तर केवल इतना है कि वहाँ चिट्ठों की संख्या भी बहुत अधिक है, और चिट्ठा-यन्त्रों की संख्या भी।</p>
<p>इन आँकडों से संभवतः आपको यह अंदाज़ा लग गया होगा कि ब्लॉगर चिट्ठा बनाने का सब से सरल और लोकप्रिय तरीका है। और, ब्लॉगिंग की दुनिया में आने पर हम सब का पहला ठिकाना अक्सर ब्लॉगर ही होता है। अब प्रश्न यह बनता है कि यदि ब्लॉगर से सारा काम हो रहा है, फिर यह वर्डप्रेस वाले किस बात की रट लगाए हुए हैं? आइए पता लगाते हैं।</p>
<p>ऐसा नहीं कि यही दो यन्त्र हैं चिट्ठाकारी के। यदि आप के पास अपना जालस्थान यानि वेबस्पेस नहीं है तो आप को चुनना पड़ेगा कोई वेब-आधारित यन्त्र, जिन के जालस्थल पर जा कर रजिस्टर करना होता हैं और फिर ब्लॉग बनाया जा सकता है। इनमें से <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a>, <a href="http://360.yahoo.com/">याहू-३६० डिग्रीज़</a>, <a href="http://blogs.rediff.com/">रेडिफ ब्लॉग</a>, <a href="http://www.livejournal.com/">लाईव जर्नल</a>, <a href="http://o3.indiatimes.com/">इंडियाटाईम्स ब्लॉग्स</a>, <a href="http://spaces.msn.com/">एम.एस.एन स्पेसेस</a>, ब्लॉग ड्राईव, <a href="http://www.jroller.com/">जे रोलर</a> आदि मुफ्त सुविधायें हैं। <a href="http://www.typepad.com/">टाइप पैड</a> और <a href="http://www.xanga.com/">ज़ांगा</a> जैसे कुछ सब्सक्रिप्शन आधारित ब्लॉग तंत्र भी हैं जहाँ ब्लॉग बनाने के लिये फीस देनी पड़ती है। यदि आप के पास अपना जालस्थान (वेबस्पेस) है तो आप के विकल्प बढ़ जाते हैं, जैसे <a href="http://www.wordpress.org/">वर्डप्रेस</a>, <a href="http://www.movabletype.org/">मूवेबल टाइप</a>, <a href="http://www.pebble.org/">पेबल</a>, आदि। ये आप को अपने सर्वर पर स्थापित करने पड़ते हैं और फिर आप को अपनी साइट से ही प्रबन्धित करने पड़ते हैं।</p>
<h2>वर्डप्रेस क्या है?</h2>
<div>वर्डप्रेस पी.एच.पी और माई एस.क्यू.एल प्रोग्रामिंग भाषाओं पर आधारित एक ब्लॉग तंत्रांश है।</div>
<p>वर्डप्रेस <a href="http://www.php.net/">पी.एच.पी</a> और <a href="http://www.mysql.com/">माई एस.क्यू.एल</a> प्रोग्रामिंग भाषाओं पर आधारित एक ब्लॉग तंत्रांश है, और <a href="http://cafelog.com/">b2/cafelog</a> का उत्तराधिकारी है। वर्डप्रेस की स्थापन फाईल आप को <a href="http://wordpress.org/">वर्डप्रेस के जालस्थल</a> से <a href="http://wordpress.org/download/">डाउनलोड</a> कर अपनी साइट पर इन्सटॉल करना पड़ता है। यह चलने में काफी तेज़ है और स्थापित करने में और सीखने में आसान। मुक्त सूत्री (ओपन सोर्स) होने के कारण निजी और व्यावसायिक प्रयोग, दोनों के लिए पूर्णतः निःशुल्क भी है। हज़ारों विकास-कर्ताओं और प्रयोक्ताओं ने वर्ष 2001 से लगातार मेहनत कर के इसे बनाया है, और अभी भी इसे विकसित कर रहे हैं और बेहतर बना रहे हैं। इसमें आप-हम जैसे प्रयोक्ता भी योगदान देते हैं। हाल ही में कुछ हिन्दी प्रयोक्ताओं ने वर्डप्रेस का हिन्दीकरण पूरा किया। मुक्त सूत्री होने का यह भी लाभ है कि कोई भी इसे बेहतर बना सकता है, इस में थीम (अभिकल्पों) और प्लग-इन के माध्यम से नई क्षमताएँ जोड़ सकता है।</p>
<p>वर्डप्रेस में किसी भी उन्नत ब्लॉग यन्त्र की सभी सुविधाएँ मौजूद है (जैसे कि टिप्पणी मध्यस्थता, ट्रैकबैक, पिंगबैक, क्षमल फीड, ब्लॉग रोल, आदि) और कई मामलों में अन्य यन्त्रों से बेहतर है। अपनी प्रविष्टियों से बाहर आप पृष्ठ भी बना सकते हैं, जो आप के ब्लॉग के खाके पर ही आधारित होंगे। अपने पृष्ठों और प्रविष्टियों के लिए आप मनचाहे, सरल URL चुन सकते हैं।</p>
<p>वर्डप्रेस जब शुरू हुआ तो इस में खाकों और अभिकल्पों की कमी थी। फिर <a href="http://binarybonsai.com/kubrick/%22">कुब्रिक</a>, <a href="http://www.brokencode/manji/">मांजी</a> जैसे अभिकल्प आए। और अब तो जैसे अभिकल्पों की बाढ़ सी आ गई है। हाल ही में <a href="http://www.alexking.org/">ऍलेक्स किंग</a> ने अपने चिट्ठे पर वर्डप्रेस अभिकल्प प्रतियोगिता का आयोजन किया, और देखते देखते नए डिज़ाइन बनाने की होड़ लग गई। प्रतियोगिता समाप्‍त होते होते <a href="http://www.alexking.org/index.php?content=software/wordpress/themes.php">135 नई थीमें</a> वर्डप्रेस में जुड़ गईं। अभी थीम प्रतियोगिता के अंगारे ठंडे भी नहीं हुए थे कि <a href="http://mindfulmusings.net/weblog/">मार्क घोष</a> ने <a href="http://weblogtoolscollection.com/archives/2005/04/04/wordpress-plugin-competition/">प्लग-इन और मॉड</a> (सुधार) प्रतियोगिता की घोषणा कर दी। वर्डप्रेस की तो जैसे चांदी ही हो गई।</p>
<h2>अन्य यन्त्रों से वर्डप्रेस की तुलना</h2>
<p>आइए अब तुलना कर के देखें कि ब्लॉग यन्त्रों का कथित राजा वर्डप्रेस वेब-आधारित मुफ्त ब्लॉग यन्त्रों के शहंशाह ब्लॉगर के सामने टिक पाता है कि नहीं।</p>
<h3>अच्छाइयाँ</h3>
<ul>
<li>ब्लॉगर की तुलना में वर्डप्रेस से आप को अपने ब्लॉग पर अधिक नियन्त्रण मिलता है।</li>
<li>वर्डप्रेस प्रयोग करेंगे तो आप को अपने चिट्ठे पर विज्ञापन या बैनर डालना है कि नहीं, यह आप पर निर्भर करता है। ब्लॉगस्पाट यूँ तो मुफ्त है, पर आपके चिट्ठे के ऊपर अपना पट्टा डाल देता है (पहले यह पट्टा विज्ञापन बैनर हुआ करता था)।</li>
<li>वर्डप्रेस का ऑनलाइन ऍडिटर काफी सरल है। कोई भी नई प्रविष्टि लिखने, या कोई भी सेटिंग बदलने के बाद आप को अपना ब्लॉग पुनर्प्रकाशित (republish) नहीं करना पड़ता। नई प्रविष्टि या कोई भी परिवर्तन संचित करते ही सक्रिय हो जाते हैं। यदि आप के चिट्ठे में कई प्रविष्टियाँ हैं, और आप का इंटरनेट कनेक्शन तेज़ नहीं है तो इस गुण से बहुत अन्तर पड़ सकता है।</li>
<li>अन्य सर्वर-आधारित सॉफ्टवेयरों की अपेक्षा वर्डप्रेस सर्वर पर कम जगह घेरता है।</li>
<li>आप अपनी प्रविष्टियों को श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं, जिससे खोज में आसानी होती है। श्रेणियों बहुस्तरीय भी हो सकती हैं, यानी श्रेणी के नीचे उपश्रेणी। इस से आप अपनी प्रविष्टियों को बेहतर तरीक़े से व्यवस्थित कर सकते हैं।</li>
<li>वर्डप्रेस का अभिकल्प माड्यूलर है, यानी आप विभिन्न भागों को सरलता से जोड़-घटा सकते हैं। जैसे आप कैलेण्डर, लेखक सूचना, आदि को मन मुताबिक रख सकते हैं या हटा सकते हैं। विभिन्न वैकल्पिक अभिकल्पों या प्लग-इन को चुटकी में सक्रिय या निष्क्रिय कर सकते हैं।</li>
<li>अब हिन्दी में उपलब्ध होने के कारण आप को खाके के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ नहीं करनी पड़ेगी, जो ब्लॉगर के हिंदीकरण के लिये करनी पड़ती है।</li>
<li>वर्डप्रेस में तेज़ी से सुधार हो रहे हैं। यही लेख यदि हम दो तीन महीने पहले लिख रहे होते तो शायद बुराइयों की सूची थोड़ी सी और लम्बी होती। हाल में ही हुए बदलाओं से टिप्पणियों के स्पैम की बीमारी काफी हद तक नियन्त्रण में आ गई है। अभिकल्पों की जो कमी थी वह भी समाप्त हो गई है। मुक्त सूत्री होने के कारण आप भी कुछ जोड़ना-घटाना या बदलना चाहें तो संभव है ही।</li>
</ul>
<h3>बुराइयाँ</h3>
<ul>
<li>सब से पहली और ज़रूरी बात, यदि आप के पास अपना जालस्थान (वेबस्पेस) नहीं है तो वर्डप्रेस आप के किसी काम का नहीं। इसको चलाने के लिए अपने सर्वर की आवश्यकता है, जिस में माई एस.क्यू.एल और पी.एच.पी की सुविधा होना ज़रूरी है।</li>
<li>वर्डप्रेस प्रयोग करने के लिए आप को ब्लॉगर के मुकाबले कुछ अधिक तकनीकी ज्ञान की आवश्यकता है। शुरू में माई एस.क्यू.एल डाटाबेस बनाना पड़ता है (जो जितना ड़रावना लगता है, उतना है नहीं)। साथ ही जालस्थल बनाने वाली मूल बातों का ज्ञान होना चाहिए, जैसे FTP, HTML, आदि। पी.एच.पी का ज्ञान हो तो सोने पे सुहागा।</li>
</ul>
<h2>वर्डप्रेस कहाँ से लें, कैसे स्थापित करें?</h2>
<p>यदि आप ने निश्चय कर लिया है अपना ब्लॉग बसेरा वर्डप्रेस पर ही बसाने का, तो निश्चित ही आप ने एक वेब-होस्ट चुन लिया होगा, अपना डोमेन रजिस्टर कर लिया होगा और आप के पास फाइलें अपने सर्वर पर ऍफटीपी द्वारा चढ़ाने की सुविधा भी होगी। वेबहोस्ट चुनते समय यह निश्चित कर लें कि पी.एच.पी (4.1 या बाद का वर्जन) और माइसीक्वेल (3.23.23 या बाद का वर्जन) की उस पर सुविधा प्राप्त है। यदि नहीं है तो वैसे भी ऐसे गए गुज़रे होस्ट को अलविदा कहने का समय है।</p>
<ul>
<li><strong>कदम 1 : माइसीक्वेल डाटाबेस का निर्माण</strong><br />
सब से पहले अपने सर्वर पर एक माइसीक्वेल डाटाबेस बनाएँ। उसमें अपने नाम से एक प्रयोक्ता नाम और कूटशब्द बनाएँ। (अक्सर आपके सर्वर के कंट्रोल पेनल में यह सुविधा मिलती है, अन्यथा अपनी होस्ट कंपनी से पूछें।)</li>
<li><strong>कदम 2 :  वर्डप्रेस का डाउनलोड</strong><br />
वर्डप्रेस का नवीनतम संस्करण (इन पंक्तियों के लिखे जाते समय, 1.5.1) <a href="http://wordpress.org/download/">यहाँ</a> से डाउनलोड करें, और अपने कंप्यूटर पर किसी मनचाहे फोल्डर में अनज़िप कर दें।</li>
<li><strong>कदम 3: फाइलों को बदलना</strong><br />
अनज़िप की गई फाइलों में <span style="font-family: courier;">wp-config-sample.php</span> को नोटपैड या अन्य किसी टेक्स्ट-ऍडिटर में खोल कर पहले कदम में बनाया प्रयोक्ता नाम और कूटशब्द भरें, और पंक्‍ति <span style="font-family: courier;">define (&#8216;WPLANG&#8217;, &#8216; &#8216;);</span> को <span style="font-family: courier;">define (&#8216;WPLANG&#8217;, &#8216;HI&#8217;);</span> में बदलें। यह वर्डप्रेस को बताएगा कि आप इसे हिन्दी में प्रयोग करना चाहते हैं। अब इस फाइल को <span style="font-family: courier;">wp-config.php</span> नाम से संचित करें। वर्डप्रेस हिन्दी में काम करे, इस के लिए आप को एक और फाइल की ज़रूरत है, वह है <span style="font-family: courier;">&#8220;hi.mo&#8221;</span>। इस फाइल को <a href="http://pnarula.com/files/hi.mo">यहाँ</a> से डाउनलोड करें और इसे <span style="font-family: courier;">&#8220;/wp-includes/languages&#8221;</span> नाम के फोल्डर में डाल दें।</li>
<li><strong>कदम 4 : अपलोड</strong><br />
अब सारी फाइलों को अपने सर्वर पर चढ़ा दें। यदि आप के जालस्थल का पता http://www.xyz.com है और आप अपने ब्लॉग का पता http://www.xyz.com/myblog रखना चाहते हैं, तो सारी फाइलों को अपने सर्वर पर <span style="font-family: courier;">/myblog</span> फोल्डर में चढ़ा दें।</li>
<li><strong>कदम 5 : समाप्‍त, अर्थात् शुभारम्भ</strong><br />
अपने ब्राउज़र में http://www.xyz.com/blog/wp-admin/install.php पर जाएँ, वहाँ आप को नया <span style="font-family: courier;">admin</span> कूटशब्द मिलेगा जिसे आप बाद में बदल सकते हैं। बस आप का वर्डप्रेस ब्लॉग यन्त्र तैयार है। आगे का रास्ता आप को स्वयं मिल जाएगा। अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाइए और लिखना शुरू कीजिए।</li>
</ul>
<p class="note">लेख के <a href="http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01">दूसरे भाग</a> में हम आप को बताएँगे कि आप ब्लॉगर या किसी और ब्लॉग यन्त्र से बनाई प्रविष्टियाँ वर्डप्रेस में कैसे आयातित कर सकते हैं। इस के इलावा बात करेंगे थीम परिवर्तन की, प्लग-इन इन्सटॉल करने की और कार्यान्वित करने की।</p>
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