<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; रविशंकर श्रीवास्तव</title>
	<atom:link href="http://www.nirantar.org/author/raviratlamigmail-com/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.nirantar.org</link>
	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>अमृता इमरोज़: रूहानी रिश्तों की बयानी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:33:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Amrita Pritam]]></category>
		<category><![CDATA[Imroz]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0708vatayansamikshaamrita-imroz/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>उमा त्रिलोक</strong> ने अपनी किताब में इमरोज़ और अमृता की रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को तो खूबसूरती से अभिव्यक्त किया ही है, साथ ही अमृता प्रीतम के जीवन के आखिरी लम्हों को भी अपनी कलम से बख़ूबी बटोरा है। पढ़िये पुस्तक अमृता इमरोज़ की <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> व <strong>रंजना भाटिया</strong> द्वारा समीक्षायें।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="boxR" style="width:225px">
<h2>एक आज़ाद रुह जिस्मानी पिंजरे से निकल, फ़िर आज़ाद हो गई</h2>
<div class="dropCap">उ</div>
<p>मा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इसलिए अच्छा नही लगा की यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली कवियित्री अमृता के बारे में लिखी हुई है, यह पुस्तक मेरे लिये इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथों से हस्ताक्षर करके मुझे दी।  उमा त्रिलोक ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हें हैं, साथ ही उन्होने इस में उन पलों को भी समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखिरी लम्हे थे।  उन्होंने उस रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को अपनी कलम से बख़ूबी बटोर लिया है।</p>
<div id="pullQuoteR" style="margin-bottom:15px;margin-top:5px;">उमा त्रिलोक के लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं व नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती।</div>
<p>मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्ज़ को रुह से महसूस किया। उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं।  उनके लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं और नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती है।</p>
<p>उमा की अमृता से हर भेंट रिश्तों की दुनिया का एक नया सफर होता। इस किताब में अमृता का अपने बच्चों के साथ व इमरोज़ का उनके बच्चों से रिश्ता भी बखूबी बयां किया गया है। उमा उनसे आखरी दिनों में तब मिलीं जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थीं। ऐसे में उमा, जो एक रेकी हीलर भी हैं, को अमृता  के साथ रहने का मौका मिला। उन्होंने अपने अंतिम दिनों की इमरोज़ के लिए लिखी कविता &#8220;मैं तेनु फेर मिलांगी&#8221; का अंग्रेज़ी अनुवाद करने की बात कही।  उन आखिरी लम्हों में इमरोज़ के भावों को उन्होंने बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है।  उमा ने सही लिखा है कि प्यार में मन कवि हो जाता है। वह कविता को लिखता ही नहीं, कविता को जीता है। शायद तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आज़ाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई।</p>
<p>अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों को यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है। और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं।</p>
<p class="note"><strong>समीक्षक &#8211; रंजना भाटिया</strong></p>
</div>
<div id="boxL" style="background: #ffffff;">
<p align="center"><img title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-Imroz-Book-Details.jpg" border="0" alt="Amrita Imroz" hspace="2" vspace="2" align="middle" /></p>
</div>
<div class="dropCap">ज</div>
<p>ब-जब भी दो विलक्षण प्रेमियों की बातें लिखी जाती हैं, तो आख्यान में एक अलग तरह का आवेग पाठक के मन में आ ही जाता है। उमा त्रिलोक की संस्मरणात्मक किताब अमृता इमरोज़ भी कुछ ऐसी ही है। इस किताब को पढ़ते हुए पाठक प्रेम और प्यार के दिव्य प्रकाश को अनुभव सा करने लगता है।</p>
<p><img title="Book Review" src="http://www.nirantar.org/images/stories/vaatayan_samiksha.gif" border="0" alt="Book Review" width="135" height="140" align="right" style="margin:20px" />उमा ने अमृता से अपने सान्निध्य के बारे में इस पुस्तक में अति विस्तार से लिखा है &#8211; कैसे उनके मन में अमृता से मिलने की इच्छा हुई, कैसे वे उनसे पहली दफ़ा मिलीं, और फिर कैसे उनसे नियमित, निरंतर मिलते रहने का सिलसिला शुरू हुआ। पुस्तक में उन्होंने अमृता &#8211; इमरोज़ के प्यार, उनके सरल, सुलझे व्यक्तित्व का तरतीबवार वर्णन किया है। एक अंश -</p>
<blockquote><p>एक बार मैंने इमरोज़ जी से पूछा, “आप जानते थे कि अमृता जी साहिर को प्यार करती थीं और फिर साजिद पर भी स्नेह रखती थीं। आपको कैसा लगता था?”</p>
<p>मेरे इस सवाल पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले, “मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। एक बार अमृता ने मुझसे कहा कि अगर वह साहिर को पा लेतीं तो मैं उसे नहीं मिलता। तुम्हें मालूम है, मैंने क्या कहा? मैंने कहा, ‘तुम मुझे तो जरूर ही मिलतीं, चाहे मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकालकर ही क्यों न लाना पड़ता।’ जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते की मुश्किलों को नहीं गिनते।” थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने अपने अनोखे अंदाज में हौले से कहा, “तुम्हें पता है, जब मैं मुम्बई जा रहा था तब मुझे ही अमृता ने अपनी किताब साहिर को देने के लिए दी थी और मैं खुशी खुशी ले गया था”</p>
<p>फिर कुछ ठहरकर, कुछ सोचते हुए इमरोज़ ने कहा, “मुझे मालूम था अमृता साहिर को कितना चाहती थी, लेकिन मुझे यह भी बख़ूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था।” <em>(पृष्ठ &#8211; 43)</em></p></blockquote>
<p>अमृता-इमरोज के बीच उनके डिवाइन लव यानी ईश्वरीय प्रेम के वर्णन को बहुत ही सहज ढंग से बयान करने में उमा सफल रही हैं। उन्होंने काफी सारा वक्त अमृता इमरोज़ के साथ बिताया है और उन पलों को बड़ी खूबसूरती से, बड़ी बारीकी से वर्णन किया है।</p>
<p><img title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-and-Imroz.jpg" border="0" alt="Amrita Imroz" style="align:left;margin:15px;"  align="left"/>कहीं कहीं उमा एकल-बयानी करती भी दिखाई देती हैं। मैं अमृता जी से ऐसे मिली, मैं अमृता जी को इस तरह ले कर गई, एक दिन जब मैं अमृता के यहाँ थी&#8230;इत्यादि। अमृता इमरोज के बारे में इतना ज्यादा लिखा और छापा जा चुका है कि उनके जीवन का कोई पहलू पाठकों से अनछुआ सा नहीं रह गया है। वैसे भी अमृता-इमरोज ने बिंदास, पारदर्शी जीवन जिया है। लेखिका यहाँ पर सिर्फ अपने एकपक्षीय अनुभवों को बयान करती दीखती हैं। हाँ, उन्होंने अमृता-इमरोज के साथ अपने संस्मरण, उनसे बातचीत, उनके विचारों को भी पर्याप्त स्थान दिया है।</p>
<p>पुस्तक की भाषा सरल, पठनीय है। परंतु भाषा प्रवाह व कथ्य पाठकों को बाँध रखने में सक्षम प्रतीत नहीं होता। छोटे छोटे ढेरों अध्याय से पठन में निरंतरता नहीं बन पाती। संस्मरण लिखते समय अमृता का विशाल व्यक्तित्व लेखिका पर हावी रहा है और वे अपनी भाषा में से अमृता के प्रति आदरसूचक प्रतीकों को जरा ज्यादा ही प्रयोग करती दिखाई देती हैं जो त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है। अमृता के प्रति आदरभाव को नकारा नहीं जा सकता, मगर जब बात संस्मरण लिखने की आती हो तो ‘थर्ड पर्सन’ रूप में लिखा गया पाठ निःसंदेह ज्यादा सहज रहता है।</p>
<p>कुल मिलाकर किताब अमृता के प्रशंसकों के लिए संग्रहणीय है। 120 रुपए मूल्य की 130 पृष्ठों की किताब की साज सज्जा, प्रस्तुतिकरण आकर्षक है।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2160&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मैं बोरिशाइल्ला :  भीड़ से अलग</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-borishailla</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-borishailla#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:30:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Bangladesh]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0708vatayansamikshaborishailla/</guid>
		<description><![CDATA[बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित &#34;मैं बोरिशाइल्ला&#34; <strong>महुआ माजी</strong> का पहला उपन्यास है जो चर्चित भी हुआ और सम्मानित भी। <strong>रवि </strong>कहते हैं&#160; कि थोड़ा बोझिल होने के बावजूद यह अलग सा उपन्यास अपने प्रामाणिक विवरण के कारण बांग्ला जनजीवन को जानने समझने वाले और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को दिलचस्प लगेगा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">म</div>
<p>हुआ माजी का उपन्यास &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221; बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित है। महुआ माजी ने इस उपन्यास को कई वर्षों के शोध उपरांत लिखा है और प्रामाणिक इतिहास लिखा है। यह उपन्यास बहुत ही कम समय में खासा चर्चित हुआ है और इस कृति को सम्मानित भी किया गया है। इस उपन्यास के अजीब से नाम के बारे में स्पष्टीकरण देती हुई महुआ, उपन्यास के अपने प्राक्कथन में कहती हैं -</p>
<div id="boxR" style="width:150px">
<h2>समर्थ उपस्थिति</h2>
<p><strong>महुआ माजी</strong> द्वारा बांग्‍लादेश के मुक्ति संग्राम की पृष्‍ठभूमि पर 2006 में लिखा &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221;, उनका पहला ही उपन्‍यास है पर इससे उन्होंने साहित्य संसार में समर्थ रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज की। महुआ समाजशास्‍त्र में पीएचडी हैं। उनकी लिखी अनेक कहानियां विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। &#8220;मैं बोरिशाइल्‍ला&#8221; को पाठकों और समीक्षकों की काफी प्रशंसा मिलने के बाद इसके अंग्रेजी और बांग्ला में अनिवादित किये जाने की खबरें हैं। महुआ को 2007 में इस उपन्यास के लिये अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से भी सम्मानित किया गया।</div>
<blockquote><p>“&#8230;जिस तरह बिहार के लोगों को बिहारी तथा भारत के लोगों को भारतीय कहा जाता है, उसी प्रकार बोरिशाल के लोगों को यहाँ की आंचलिक भाषा में बोरिशाइल्ला कहा जाता है। उपन्यास का मुख्य पात्र केष्टो, बोरिशाल का है। इसीलिए वह कह सकता है &#8211; मैं बोरिशाइल्ला।”</p></blockquote>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mahua Maji" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mahua_maji.jpg" border="0" alt="Mahua Maji" hspace="5" vspace="5" width="151" height="168" align="middle" />जैसा कि उपन्यास के द्वितीय शीर्षक पृष्ठ पर अंकित है &#8211; यह उपन्यास बांग्लादेश के अभ्युदय की महागाथा है। 1948 से लेकर 1971 तक के ऐतिहासिक तथ्यों, पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा बांग्लादेशी जनता पर किए अत्याचारों की घटनाओं तथा मुक्तिवाहिनी के संघर्ष गाथाओं को महुआ माजी ने इस उपन्यास के कथा सूत्र में पिरोया है। एक बानगी देखें -</p>
<blockquote><p>&#8220;&#8230;इसी तरह एक बार मैं सब्जियाँ खरीदने बाजार गया। एक सब्जीवाला शिमला मिर्च, जिसे वहां के लोग बोम्बाइया लौंका कहा करते थे, बेच रहा था। मुझे देखकर सब्जीवाले ने जोर से आवाज दी, &#8220;बोम्बाइया लौंका ले जाइए बाबू।&#8221; बाज़ार में घूमते एक सैनिक के कानों तक जैसे ही बोम्बाइया यानी बम्बइया शब्द पहुँचा, उसने सब्जी वाले की पीठ पर एक भरपूर बेंत मारी और चिल्लाते हुए कहा, &#8220;इंडिया से मिर्च मंगाता है? यहां पाकिस्तान में पैदा नहीं कर सकता?&#8221;</p></blockquote>
<blockquote><p>&#8230; अयूबशाही शासनकाल में भारत की मुहर लगी हुई कोई भी चीज रखना जुर्म माना जाता था। सैनिक घर-घर की तलाशी लेते थे। एक दिन जब हमारे घर में सेना के जवान भारतीय सामानों की जांच करने घुस आए तब मेरी मां को उनके अत्याचार के डर से भारत से मंगाई गई अपनी सिन्दूर की डिबिया को, यह जानते हुए भी कि सुहागन के लिए सिन्दूर पानी में फेंकना अपशगुन होता है, मजबूरन उठाकर खिड़की से बाहर फेंकना पड़ा था&#8230;इस बीच अयूब खान ने यह फरमान जारी कर दिया था कि पाकिस्तान के हर घर में उनकी तस्वीर टाँगना अनिवार्य है। जांच के दौरान जिनके घर में उनकी तस्वीर टंगी हुई नहीं मिलती थी, कड़ी सज़ा दी जाती&#8230;” (पृ 141-142)</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mei Borishailla" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mei-borishailla.jpg" border="0" alt="Mei Borishailla" hspace="5" vspace="5" width="237" height="358" align="left" />जैसा कि ऊपर दिए उद्धरण में स्पष्ट है, उपन्यास की भाषा अत्यंत साधारण है, और समूचे उपन्यास में कहीं भी कोई भाषाई शिल्प नमूदार नहीं होता। कथन में प्रवाह नहीं है, और उपन्यास घटना-प्रधान होते हुए भी आमतौर पर बोझिल-सा बना रहता है। इसके कई खण्ड घोर अपठनीय ही बने रहते हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर उपन्यास पाठक को लगातार बांधे रखने में अक्षम ही रहता है। जाहिर है उपन्यास के ताने-बाने को और कसावदार बुना जा सकता था। दरअसल लेखिका ने मुक्ति संग्राम के दिनों में पाकिस्तानी सैनिकों तथा उर्दूभाषी नागरिकों द्वारा बांग्लाभाषियों पर किए गए अत्याचारों तथा मुक्तिवाहिनी के कार्यों के बहुत प्रामाणिक विवरण देने के लोभ में उपन्यास को बिखरा सा दिया है। घटना प्रधान कथानक में सस्पेंस का सर्वथा अभाव भी आगे पढ़ने में जिज्ञासा बनाए रखने में मदद नहीं करता।</p>
<p>जो भी हो, 400 पृष्ठों की यह किताब बांग्ला जन जीवन को निकट से जानने समझने वाले, बांग्लादेश के इतिहास में रुचि रखने वाले उत्सुक लोगों के लिए निःसंदेह दिलचस्प रहेगी। और, आम हिन्दी उपन्यासों की तर्ज पर यह मात्र विचारों व कल्पना की निपट-बयानी नहीं है। क्योंकि यह पारिवारिक, ग्रामीण जन-जीवन या दलित-विमर्श जैसी कहानी नहीं है संभवतः इसीलिए यह भीड़ से अलग भी है। पाठक अगर हिन्दी उपन्यासों में अगर कुछ नया सा पढ़ना चाहते हैं तो मैं बोरिशाइल्ला अवश्य पढ़ें।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2159&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-borishailla/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सफल-असफल बनने की सत्य तथाकथा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-vyangya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-vyangya#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:24:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0708vatayanvyangya/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>रवि रतलामी </strong>सफ़ल बनना चाहते थे, महान बनना चाहते थे। और खोजते खोजते उनका हाथ वो नुस्ख़ा लग ही गया जिससे वे महान ही नहीं, महानतम बन गये। तो देर किस बात की? आप भी बन जाइये उन के अनुयायी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center"><img title="Vynagya" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-vyangya.jpg" border="0" alt="Vynagya" hspace="3" vspace="3" width="490" height="275" /></div>
<div class="dropCap">जी</div>
<p>वन के चार दशक गुजार लेने के बाद पीछे मुड़कर जब मैंने देखा तो पाया कि मैं सफल तो कतई नहीं कहलाऊंगा। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के कोई खास झंडे गाड़े हों, जब मुझे दिखाई नहीं दिया तो मैं उदास हो गया। इसी उदासी में मैं टहलने निकल गया। सोचा था इस उदासी को गायों-गोल्लरों, ट्रैफ़िक और धूल भरी सड़कों में उड़ाकर आ जाऊंगा। वैसे भी, ऑटो-टैम्पो और सड़क के दोनों ओर रेहड़ी-खोमचे-ठेलों की भीड़ के बीच यदि आप सकुशल एक दो किलोमीटर की यात्रा बिना ठुके-ठोंके सप्रयत्न कर आएं, तो आपकी उदासी यकीनन कई दिनों के लिए छूमंतर हो जाएगी।</p>
<p>सड़क में एक सांड के सींग से बचने की कोशिश में मैं सीधे एक फेरी वाले के ठेले के ऊपर जा गिरा। वो कुछ सज्जन किस्म का आदमी था जिसने मुझे पलट कर गालियाँ नहीं दीं और मुझे तत्परता से उठाया। मेरी भी सज्जनता कुछ जागी और मैं ठेले पर विक्रय के लिए रखी सामग्रियों को उचटती निगाह से देखने लगा। वो किताब की दुकान थी। तमाम तरह की किताबें विक्रय के लिए उपलब्ध थीं। उन सबमें सबसे ऊपर एक किताब का चमकीला शीर्षक चमक रहा था &#8211; &#8220;उठो महान बनो&#8221;।</p>
<div id="pullQuoteR">जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है।</div>
<p>आह! यही तो मैं खोज रहा था। मैं सफल बनना चाह रहा था, महान बनना चाह रहा था। जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है। कांपते हाथों से मैंने उस किताब को उठाया। डरते डरते उसकी कीमत देखी &#8211; कहीं यह हजारों में न हो &#8211; महान बनाने वाली महान किताब कहीं कीमत में भी महान न हो। कीमत से तसल्ली हुई। वो जेब पर बहुत भारी नहीं हो रही थी। मैंने तत्काल उसे खरीद लिया और सीधे घर की ओर वापस लपका।</p>
<p>अब मेरे महान बनने में चंद लमहों की ही देरी थी। किताब का आद्योपांत पाठन करना था। चंद बातों को जीवन में उतारना था और बस हो गया। लौटते समय मेरे कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कल्पना में मैंने देखा कि मैं महान से महानतम बन गया हूं और तमाम दुनिया के लोग मेरे अनुयायी बन गए हैं और मेरे जयकारे लगा रहे हैं। घर आकर मैंने बीवी की ओर हिकारत भरी नजरों से देखा कि वो हमेशा मुझे मेरी औकात से कम आंका करती है, मेरी असफलताओं पर टोकती रहती है, मेरे निठल्लेपन के ताने कसती रहती है, अब देखना &#8211; तेरा वही निठल्ला पति देखते देखते ही कैसे महान बनता है।</p>
<p>नहा-धोकर, किताब में धूप-बत्ती देकर उसका पारायण प्रारंभ किया। आंखें मुंद रही थीं, सिर भारी हो रहा था, मुँह से उबासी दूर हो नहीं रही थी, मगर मैं किताब पढ़ता रहा। इतनी गंभीरता से तो मैंने अपने बोर्ड के इम्तिहान की पढ़ाई भी नहीं की थी। मगर यहाँ मामला महान बनने का जो था। सो गुंजाइश ही नहीं थी। अठारह घंटे छत्तीस मिनट में किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ गया। इस बीच कोई छब्बीस कप कॉफ़ी के उदरस्थ कर लिए और बीबी के छः ताने और स्मित हास्य के कोई आठ वार भी झेल लिए। किताब को मैंने पूरा पढ़ लिया था। उठो महान बनो। अब मैं उठ सकता था। मैं उठा और सीधे बिस्तरे पर जा गिरा। उसके बाद दो दिनों तक सोता रहा।</p>
<p>उठो महान बनो नाम की किताब पढ़ने के महीनों बीत जाने के बाद भी मुझे मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैंने तो उसमें बताए तौर तरीकों को अपने ऊपर ओढ़ने आजमाने की ईमानदार कोशिश की थी। मगर महानता शायद मुझसे कोसों दूर थी। या इस शब्द से मेरा छत्तीस का आंकड़ा था। मैं फिर से गहन उदासी के दौर में फंस गया था।</p>
<p>मैं एक बार फिर उदासी दूर करने घूमने निकला तो अपने आपको उसी किताब दुकान पर पाया। इस दफ़ा सबसे ऊपर एक किताब चमकती दिखाई दे रही थी &#8211; &#8220;बेस्ट सेलर &#8211; कैसे पाएं सफलता।&#8221; वल्लाह! क्या किताब है। एकदम सही। सही समय पर सही किताब मिली मुझे। मैं अब तक हर क्षेत्र का असफल आदमी सफलता ही तो चाहता था। मुझे लगा कि दुनिया का हर सफल आदमी इस किताब में से होकर निकला है। और अब मेरी बारी है। मैंने अपनी जेब कुछ ढीली की और इस किताब को ले आया।</p>
<div id="pullQuoteR">मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज-ब-रोज, उसी रफ़्तार से, कम होती रहीं।</div>
<p>इस दफ़ा मैंने इस किताब के हर हिस्से को गौर से पढ़ा। ये नहीं कि अखंड-रामायण पाठ की तरह एक बैठक में पढ़ मारा। मैंने नोट्स बनाए, सूत्रों को, वाक्यांशों को रटा। मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज ब रोज कम होती रहीं &#8211; उसी रफ़्तार से। उनमें भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और मेरी सफलता में भी बाल बराबर फर्क नजर नहीं आया। मैं फिर निराश हो गया।</p>
<p>निराशाओं के ऐसे दौर आते रहे और मैं अपनी निराशा दूर करने सड़क नापता रहा, सांड के सींग खाता रहा, और किताब दुकान पर गिरता रहा। वहां से अपने आपको बदलने के लिए, सफल होने के लिए, धनी बनने के लिए, स्मार्ट बनने के लिए, सुखी बनने के लिए, व्यवहार कुशल बनने के लिए तमाम किताबें लाता रहा, और पढ़ता रहा। मगर परिस्थितियों को नहीं बदलना था सो नहीं बदलीं। मेरे घर के दरवाजे की दिशा दक्षिण की ओर थी और वो भी वैसी ही बनी रही।</p>
<p>घोर निराशा में मैंने इन सारी किताबों को एकत्र किया और उस दुकान में वापस फेंकने के लिए ले गया। मैंने किताबों का गट्ठर उसके ठेले पर दे मारा। मारे क्रोध के मेरा माथा भन्ना रहा था मैं उसे क्रोध में कुछ बोलता &#8211; कि वो कैसी अनुपयोगी, बेकार, रद्दी अप्रभावी किताबें बेचता है &#8211; सामने एक नई नवेली चमचमाती किताब पर मेरी नजर पड़ी। किताब का नाम था &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जिओ&#8221;। आह! तो ये है अल्टीमेट, अंतिम किताब। मेरा गुस्सा काफूर हो गया। मैंने तत्काल उसे खरीदा और प्रसन्न मन घर वापस आया।</p>
<p>मेरी निराशा दूर हो चुकी है। हमेशा के लिए। ऐसा नहीं है कि मैंने किताब का पाठ कर लिया है और उसे पूरा पढ़ लिया है और उसके उपदेशों को जीवन में उतार लिया है। दरअसल, जब भी मैं उसे पढ़ने के लिए उठाता हूं, और उसका शीर्षक पढ़ता हूँ, मेरी सारी दुश्चिंताएं हवा में विलीन हो जाती हैं। मैं सारी चिंता वहीं छोड़ देता हूं &#8211; उस किताब को पढ़ने की चिंता को भी और मैं सुख से जीने लग जाता हूं। किताब को मैंने अपने इबादतगाह में सबसे ऊपर रख दिया है और इसका शीर्षक ही मुझे रोज-ब-रोज, हर वक्त प्रेरित करता रहता है। यह वो किताब है &#8211; ओह माफ कीजिए, यह किताब का वो शीर्षक है, जिसने मेरे जीवन में सर्वाधिक प्रभाव डाला है। जय हो।</p>
<p>मैं सफल हो गया हूँ। मैं महान हो गया हूँ। मैं धनवान, अरबपति हो गया हूँ &#8211; क्योंकि अब मैं इन बातों के लिए कतई कोई चिंता नहीं करता।</p>
<p>आप बताएं, क्या आप चिंता करते हैं? यदि हाँ, तो मेरी सलाह मानें &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जियो&#8221; नाम की यह किताब खरीद लाएं। पढ़ने व आत्मसात करने के लिए नहीं, उसकी पूजा करने के लिए &#8211; जैसे कि मैं करता हूं।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2158&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-vyangya/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मोबाइल फ़ोन तेरे कितने रूप?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-tech-dirgha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-tech-dirgha#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:54:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[टैक दीर्घा]]></category>
		<category><![CDATA[Banking]]></category>
		<category><![CDATA[Mobile]]></category>
		<category><![CDATA[SMS]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/%e0%a4%ae%e0%a5%8b%e0%a4%ac%e0%a4%be%e0%a4%87%e0%a4%b2-%e0%a4%ab%e0%a4%bc%e0%a5%8b%e0%a4%a8-%e0%a4%a4%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%a8%e0%a5%87-%e0%a4%b0%e0%a5%82/</guid>
		<description><![CDATA[मोबाइल फ़ोन डिजिटल कैमरा, एमपी3 प्लेयर, एफ़एम रेडियो के पर्याय तो थे ही। अब आप इसका इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड के विकल्प के रूप में भी कर सकते हैं।<strong> रवि रतलामी</strong> बता रहे हैं&#160; दो इसी तरह की सेवाओं के बारे में,&#160; पहला एसएमएस आधारित <strong>पे-मेट </strong>तथा दूसरा मोबाइल एप्लीकेशन आधारित <strong>एम-चेक</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">मो</div>
<p>बाइल फ़ोन का इस्तेमाल अब महज फोन करने के लिए तो नहीं रह गया है। एकदम प्रारंभिक स्तरों के सेलफ़ोनों में भी अंतर्निर्मति कैमरा, एमपी3 प्लेयर, एफ़एम रेडियो इत्यादि की सुविधाएँ तो मिल ही रही हैं, उच्च स्तर के मोबाइल फ़ोन तो संपूर्ण इंटरनेट इनेबल्ड, मल्टीमीडिया कम्प्यूटरों से कम नहीं हैं जिनमें आप अपने ऑफिस के भी तमाम काम निपटा सकते हैं। मोबाइल फ़ोन में हाल ही में एक और विशेषता जोड़ी गई है &#8211; आप इसका इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड के विकल्प के रूप में बखूबी, आसानी से और ज्यादा सुरक्षित तरीके से कर सकते हैं।</p>
<p>क्रेडिट कार्ड के जरिए इंटरनेट पर सौदे हमेशा ही खतरे में बने रहते थे। तमाम तरह के ट्रोजन व की-लॉगर्स, फ़िशिंग साइटें हर साल ग्राहकों व क्रेडिट कार्ड कम्पनियों को करोड़ों का चूना लगाती रही हैं, और इनमें साल-दर-साल वृद्धि होती रही है। अब इन सौदों को मोबाइल फ़ोन के जरिए एक अतिरिक्त द्वितीय स्तरीय प्रमाणीकरण की व्यवस्था की जाकर सुरक्षा को और पुख्ता बनाए जाने की कोशिशें की जा रही हैं। वर्तमान में इस हेतु दो तरह की तकनीक काम में लाई जा रही है &#8211; एक तो एसएमएस आधारित तकनीक पे-मेट तथा दूसरी मोबाइल एप्लीकेशन आधारित तकनीक एम-चेक।</p>
<hr />
<h1>पे मेट: SMS से सुरक्षित खरीदारी</h1>
<p><a href="http://www.paymate.co.in" target="_blank"><img title="PayMate" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/pay-mate.jpg" border="0" alt="PayMate" hspace="5" vspace="5" width="350" height="229" align="right" /></a> <a href="http://www.paymate.co.in" target="_blank">पे-मेट</a> एसएमएस आधारित सेवा है जो आपके मोबाइल फ़ोन को एक अत्यंत सुरक्षित क्रेडिट कार्ड के रूप में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। हालांकि अभी इसके द्वारा दी जा रही <a href="http://www.paymate.co.in/merchants.asp" target="_blank">सेवाओं की संख्या</a> कम है, परंतु भविष्य में इसके व ऐसे ही अन्य सेवाओं के आने की पूरी संभावना है। पे-मेट का इस्तेमाल आसान है। यदि आपके पास सिटीबैंक का क्रेडिट कार्ड है तो 2484 पर एसएमएस संदेश &#8211; PayMate भेजें। आपको कॉलबैक किया जाएगा व आपके मोबाइल को पंजीकृत कर लिया जाएगा। जब आप पे-मेट के साथ सक्रिय व्यापारिक संस्थान से कोई खऱीदारी करते हैं तो आपको भुगतान हेतु वह संस्था आपको एक रेंडम जनरेटेड अल्फ़ा कोड के साथ आपके मोबाइल पर एक एसएमएस संदेश भेजती है। आपको उस संदेश को अपने पिन संख्या (गुप्त पासवर्ड) के साथ जवाब देना होता है। बस। और इस तरह सुरक्षित भुगतान हो जाता है। चूंकि यह सारा कार्य स्वचालित कमप्यूटरों द्वारा होता है और आपके संदेशों को कोई जीवित व्यक्ति नहीं पढ़ता और यह आपके पंजीकृत मोबाइल फ़ोन के जरिए ही होता है अतः यह अत्यंत सुरक्षित होता है।</p>
<p>भले ही पे-मेट के जरिए भुगतान को सुरक्षित माना गया है फिर भी आप इसके जरिए प्रति सौदे पाँच हजार रुपए तथा प्रति चौबीस घंटे में दस हजार रुपए से अधिक का भुगतान नहीं कर सकते। अतः यह सेवा अभी सिर्फ छोटे मोटे सौदों के लिए ही है और इसी वजह से इसके लोकप्रिय होने में समय लगेगा।</p>
<hr />
<h1>एम-चेक: मोबाइल बना क्रेडिट कार्ड</h1>
<p><a href="http://www.mchek.com" target="_blank"><img title="MChek" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/mchek.jpg" border="0" alt="MChek" hspace="5" vspace="5" width="350" height="211" align="right" /></a> <a href="http://www.mchek.com" target="_blank"> एम-चेक</a> आपके क्रेडिट कार्ड के अस्तित्व को खत्म करने की संभावनाएँ लेकर आया है। परंतु यह उन्हीं उच्च वर्ग के मोबाइल फ़ोनों में काम में आ सकेगा जिसमें अतिरिक्त मोबाइल एप्लीकेशन संस्थापित करने की सुविधा होगी। अगर एम-चेक जैसी सेवाएँ लोकप्रिय होंगी तो बहुत संभव है कि भविष्य में मोबाइल फ़ोन ऐसे अनुप्रयोगों के साथ ही जारी हों। हालाकि यह भी आपके इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन में द्वितीय स्तरीय सुरक्षा प्रदान करता है, परंतु फिर भी, मोबाइल वायरस भी इस मोबाइल एप्लीकेशन को निशाना बना सकते हैं, और सुरक्षा में सेंध लगा सकते हैं।</p>
<p>एम-चेक का इस्तेमाल भी बहुत आसान है। आपको अपने मोबाइल फ़ोन को एम-चेक के लिए अपने बैंकर से पंजीकृत करवाना होगा और अपने मोबाइल में एम-चेक अनुप्रयोग संस्थापित करना होगा। फिर जहाँ भी आप ऑनलाइन खरीदारी करते हैं, या व्यावसायिक संस्थान में खरीदारी करते हैं, वहाँ क्रेडिट कार्ड से भुगतान के लिए नंबर के स्थान पर आपके मोबाइल के एम-चेक अनुप्रयोग द्वारा रेंडम जनित पास कोड को डालना होगा। बस। चूंकि आपके मोबाइल में संस्थापित एम-चेक अनुप्रयोग हर बार नया पास कोड देता है, अतः यह कोड सिर्फ एक ही सौदे के लिए काम में आता है, और इस तरह से क्रेडिट कार्ड नंबर चुरा कर धोखा करने वालों के मंसूबे नाकाम कर देता है। अच्छी बात यह है कि इसके प्रयोग के लिये आपको कोई अनुप्रयोग डाउनलोड नहीँ करना होता और न ही सिम में कोई परिवर्तन लगता है</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2202&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-tech-dirgha/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पिप्पी के मोज़ों में कबाड़ से जुगाड़</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-vatayan-samiksha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-vatayan-samiksha#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:48:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[Eklavya]]></category>
		<category><![CDATA[NBT]]></category>
		<category><![CDATA[Toys]]></category>
		<category><![CDATA[Tulika]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507vatayansamiksha/</guid>
		<description><![CDATA[पुस्तक समीक्षा में <strong>रवि रतलामी</strong> व <strong>देबाशीष</strong> लाये हैं बच्चों के लिये नायाब पुस्तकें जिनमें शामिल हैं खेल खेल में विज्ञान सिखाने वाली &#34;कबाड़ से जुगाड़&#34; तथा &#34;जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़&#34;, ज्ञानवर्धक पुस्तकें&#160; &#34;खिलौनों का खज़ाना&#34; और &#34;नज़र का फेर&#34; तथा कथा कहानी के शौकीनों के लिये &#34;समंदर और मैं&#34; तथा &#34;पिप्पी लंबेमोज़े&#34;।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>निरंतर की पुस्तक समीक्षा स्तंभ में हम इस अंक की भावना के अंतर्गत कुछ ऐसी नायाब पुस्तकें प्रस्तुत कर रहे हैं जो निश्चित ही भारत की नौनीहाल को समृद्ध करेंगी। यहाँ विभिन्न प्रकाशकों की इन पुस्तकों की समीक्षा नहीं वरन् परिचय दे रहे हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Joy of making Indian toys" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/joy-of-making-indian-toys.jpg" border="0" alt="Joy of making Indian toys" hspace="10" vspace="5" width="182" height="250" align="right" />पहले बात दो ऐसी एक्टीविटी पुस्तकों की जो कम कीमत में, या कहें तो बिना कीमत में, खिलौने बनाना सिखाती हैं, ऐसे खिलौने जिन्हें बच्चे बेफिक्र हो जोड़ व तोड़ सकें। घरेलू खिलौनों द्वारा बच्चों में विज्ञान के प्रसार के लिये इन पुस्तकों के लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कार व ख्याति मिली है। ये खिलौने सामान्य चीजों से बने हैं, पर इस कारण से इन्हें फैक्टरियों में निर्मित महंगे खिलौनों से दोयम न समझें। क्योंकि ये खिलौने प्रयोग और रचनात्मकता की जो भावना जगाते हैं वह अद्वितीय है, साथ ही इनमें से कई विज्ञान के नियमों को सरलता से समझाने में भी काम आ सकते हैं।</p>
<p>भारत में ऐसे खिलौनों के प्रयोग की पुरानी संस्कृति रही हैं पर दुःख की बात है कि महंगे खिलौनों की बहुतायत से ये भुलाये जा रहे हैं। हमारे पारंपरिक खिलौनों से बच्चे स्वयं कुछ करते हुए सीखते हैं &#8211; और इस तरह का उनका अर्जित ज्ञान स्थायी होता है। इन पुस्तकों में दिए गए क्रियाकलापों तथा व्यावहारिक ज्ञान के लिए किसी तरह के खर्चीले साधनों की आवश्यकता नहीं होती और रोज़ाना इस्तेमाल में आने वाली चीजें और आमतौर पर बेकार हो चुकी वस्तुएं जैसे कि बोतलों के ढक्कन, स्ट्रॉ, अख़बारी काग़ज, पैकिंग के पुस्टे इत्यादि की सहायता से ज्ञान-विज्ञान की बातें आसानी से समझाने का प्रयास किया जाता है।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/kabaad-sejugaad.gif" border="0" alt=" " hspace="10" vspace="5" width="193" height="176" align="left" />पहली पुस्तक भोपाल की संस्था <strong>एकलव्य</strong> द्वरा प्रकाशित <strong>कबाड़ से जुगाड़ &#8211; Little Science : विज्ञान के कुछ सस्ते सरल और रोचक खिलौने</strong>। पुणे स्थित<strong> अरविंद गुप्ता </strong>अपने इस प्रयोग के लिये विख्यात हैं। वे बेकार हो चुकी दैनिक प्रयोग की वस्तुओं के जरिए वैज्ञानिक खिलौने बनाने में सिद्धहस्त हैं। इस पुस्तक में चित्रमय विधियों द्वारा ये सिखाया गया है। उदाहरण के लिए इसमें कैमरा फ़िल्म की प्लास्टिक की डिब्बी, प्लास्टिक की थैली, साइकिल की स्पोक, टूटी चप्पल की रबर शीट के टुकड़े तथा रबर या प्लास्टिक के पाइप के जरिए पानी के पम्प बनाने की आसान विधि बताई गई है। इस चित्रमय विधि को पढ़कर बच्चे आसानी से स्वयं ही अपना एक पानी का पम्प बना सकते हैं और जान सकते हैं कि पानी का पम्प आखिर कैसे काम करता है। यह पुस्तक द्विभाषी है &#8211; यानी अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में है जिससे इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। 70 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य है मात्र 20 रुपये (ISBN क्रं 81-87171-03-0, संस्करण 2002, चित्र अविनाश देशपांडे)। ये पुस्तक विद्या आनलाईन पर <a href="http://www.vidyaonline.net/download/LITTLESCIENCE.pdf" target="_blank">पीडीएफ प्रारूप में</a> मुफ्त भी उपलब्ध है।</p>
<p>दूसरी पुस्तक है <strong>नेशनल बुक ट्रस्ट</strong> द्वारा प्रकाशित <strong><em>जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़</em></strong>। इसके लेखक <strong>सुदर्शन खन्ना</strong> नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन, अहमदाबाद में काम करते हैं। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक में 101 हस्तनिर्मित खिलौने हैं जो खेल खेल में विज्ञान भी सिखाते हैं। 125 पृष्ठों की इस पुस्तक की छपाई उम्दा है व चित्र बेहतरीन। इसकी कीमत है 40 रुपये तथा इसे आप नेशनल बुक ट्रस्ट की वेबसाईट से भी <a href="http://www.nbtindia.org.in/BookDetail.asp?Book_ID=2903" target="_blank">खरीद सकते हैं</a> (ISBN क्रं 81-237-2244-3)। नीचे दिये चित्र में आप इसी पुस्तक में दी गई कलाबाज़ कैप्सूल बनाने की विधि पढ़ सकते हैं (विवरण अंग्रेज़ी से अनुवादित है)। पुस्तक का <a href="http://www.nbtindia.org.in/BookDetail.asp?Book_ID=3038" target="_blank">हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध</a> है पर उसकी कीमत 90 रुपये है। हिन्दी अनुवाद अरविंद गुप्ता का ही किया हुआ है।</p>
<hr />
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Acrobat Capsule" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/Acrobat_Capsule.jpg" border="0" alt="Acrobat Capsule" width="490" height="376" align="middle" /></p>
<hr />
<div id="pullQuoteR">खेल खेल में विज्ञान से जुड़ी किताबों के अलावा अरविंद गुप्ता ने ढ़ेरों अन्य पुस्तकों को अंतर्जाल पर मुफ्त उपलब्ध कराया है जिनमें हिन्दी व मराठी पुस्तकें भी शामिल हैं। <a href="http://arvindguptatoys.com/" target="_blank">उन के जालस्थल</a> पर नज़र डालें और उन्हें धन्यवाद कहें।</div>
<p>एकलव्य का एक और प्रकाशन है &#8211; <strong>खिलौनों का खज़ाना Toy Treasures</strong>। इसमें जापानी ओरिगामी विधि से यानी काग़ज के टुकड़ों को काट-जोड़-चिपका कर इत्यादि तरीके से दर्जनों खिलौनों को कैसे बनाना यह बताया गया है। आसान सी उड़ने वाली मछली हो या जटिल बातूनी कौआ &#8211; चित्रों के जरिए इन्हें बनाने का तरीका बड़ी स्पष्टता से समझाया गया है। इसके लेखक भी अरविंद गुप्ता हैं। यह पुस्तक भी हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में छपी है। (ISBN क्रं 81-87171-37-5, पृष्ठ संख्या 36, मूल्य &#8211; रू 20/-, संस्करण 2001) ये पुस्तक <a href="http://www.vidyaonline.net/download/ToyTreasure.pdf" target="_blank">पीडीएफ प्रारूप में </a> मुफ्त भी उपलब्ध है।</p>
<p>केवल 8 रुपए मूल्य की एक और पुस्तक है &#8211; <strong>नज़र का फेर &#8211; दृष्टिभ्रम के खेल</strong>। आओ माथा पच्ची करें श्रेणी की यह आठवीं पुस्तक है। इस छोटी सी पुस्तिका में दृष्टिभ्रम पैदा करने वाले ड्राइंग, रेखांकनों, रेखाचित्रों व कलाकृतियों को समेटा गया है। इनके जरिए बच्चे द्वि-त्रिआयाम के बारे में तो समझते ही हैं, कलाकृति के पर्सपेक्टिव को शीघ्र समझ सकते हैं (ISBN क्रं 81-87171-58-8, पृष्ठ संख्या 20, संस्करण 2004)।</p>
<p>और अंत में बात चैन्नई स्थित<strong> तुलिका प्रकाशन</strong> द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों की।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Samandar Aur Mein" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/samandar-aur-mein.jpg" border="0" alt="Samandar Aur Mein" hspace="10" vspace="5" width="200" height="200" align="right" /><strong>समंदर और मैं</strong> संध्या राव की मूल अंग्रज़ी पुस्तक का बढ़िया हि्न्दी अनुवाद है। ये एक ऐसे लड़के की कहानी है जो दिसंबर 2004 में आये सुनामी से प्रभावित हुआ पर शायद ये ऐसे किसी भी बालक की कहानी हो सकती है को प्रकृति की गोद में पल बढ़ रहा हो। पुस्तक में मनमोहक स्थिर चित्र हैं, रेत शंख और तट रेखा के रंग क्रेयान से मिलकर मानों उस मर्म पर मरहम लगाते हैं जिनका इस त्रासदी में सब कुछ सागर की गर्त में समा गया।</p>
<p>ये कहानी भले गमग़ीन करती है पर अच्छी बात ये है कि पुस्तक का रुख आशावादी और प्रेरणास्पद है। चित्रों से शायद क्रंकीट के जंगलों में रहते बच्चे नौका, पानी, रेत और समंदर के संबंधों को समझ सकें और प्रकृति का सम्मान करना सीखें। पुस्तक की भाषा कई जगह अस्पष्ट है पर छपाई बेहतरीन है। छ वर्ष या ज्यादा उम्र के बच्चों पर केंद्रित ये 24 पृष्ठ के इस पुस्तक की कीमत है 100 रुपये। चिकने कागज़ की छपाई के लिहाज़ से न देखें तो कीमत ज़्यादा तो है। (ISBN क्रं 81-8146-114-2)</p>
<p><a href="http://www.tulikabooks.com/classics.htm#pippi" target="_blank"><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Pippi Lambemoje" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/pippi-lambe-moje.jpg" border="0" alt="Pippi Lambemoje" hspace="10" vspace="5" width="154" height="200" align="left" /></a><a href="http://www.tulikabooks.com/classics.htm#pippi" target="_blank"><strong>पिप्पी लंबेमोज़े</strong></a> ऐस्ट्रिड लिंडग्रन की नामचीन स्वीडिश पुस्तक पिप्पी लाँगसट्रम्प का<strong> संध्या राव</strong> द्वारा किया हिन्दी अनुवाद है। ऐस्ट्रिड का भारत के लिये भले नया नाम हों पर उनकी कम ही किताबें हैं जिन पर फिल्म नहीं बनीं। स्वीडन में छोटे बड़े सभी उनकी रचनाओं को पसंद करते रहे हैं। सरल भाषा, उम्दा विचार, हंसी मजाक और गंभीरता, ऐस्ट्रिड के लेखन में ये सभी रंग प्रचुरता से मिलते हैं। वे मानतीं थीं कि वे सिर्फ बच्चों के लिये ही लिखना चाहती हैं क्योंकि सिर्फ बच्चे ही पढ़ते समय चमत्कार कर सकते हैं।</p>
<p>ये पुस्तक ऐस्ट्रिड ने अपनी बीमार बेटी को कहानियाँ सुनाने के लिये लिखी। किताब से न केवल पुराने स्वीडन की संस्कृति का पता चलता है बल्कि ये भी कि पिप्पी बच्ची होने पर भी कितनी स्वतंत्र है। साठ साल पहले लिखी ये किताब आज भी बड़ी सार्थक है, भले ही भारतीय पाठक कई बातों को पचा ना पायें। 50 रुपये की इस किताब में 102 पेज हैं और अनेक सुंदर रेखांकन हैं (ISBN क्रं 81-86895-91-4)।</p>
<table border="0" width="90%" align="center">
<tbody>
<tr>
<td colspan="5" align="center">
<h3>प्रकाशकों से संपर्क की जानकारी</h3>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>एकलव्य</strong><br />
ई-7, एचआईजी 453,<br />
अरेरा कॉलोनी,<br />
भोपाल &#8211; 462016.</td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>नैशनल बुक ट्रस्ट</strong><br />
ए-5, ग्रीन पार्क,<br />
नई दिल्ली &#8211; 110016.<br />
<a href="http://www.nbtindia.org.in" target="_blank">http://www.nbtindia.org.in</a></td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>तुलिका पब्लिशर्स</strong><br />
13 पृथ्वी एवैन्यू,<br />
अभिरामपुरम, चैन्नई &#8211; 600018.</p>
<p><a href="http://www.tulikabooks.com" target="_blank">http://www.tulikabooks.com</a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2147&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-vatayan-samiksha/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>टेरापैड: ब्लॉगिंग से आगे की सोच?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:43:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[टैक दीर्घा]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507tech-deerghaterrapad/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>टेरापैड</strong> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। जानिये <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> क्या कहते हैं इस नये ब्लॉग प्लैटफॉर्म के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शायद नहीं। या शायद हाँ। चिट्ठाकारों के लिए अब बहुत से अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं और इनमें नित्य प्रति इजाफ़ा होता जा रहा है। एक नया,  आल-इन-वन किस्म का ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म &#8211; टेरापैड जारी किया गया है जो कि न सिर्फ मुफ़्त है (यदि आप विज्ञापनों से नहीं चिढ़ते हैं तो, चूंकि इसकी मुफ़्त सेवा विज्ञापन समर्थित है), ढेरों अन्य सुविधाओं से भी लेस है।</p>
<p><a href="http://www.terapad.com" target="_blank"><img title="Terapad" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/terapad.jpg" border="0" alt="Terapad" hspace="6" vspace="5" width="350" height="235" align="right" /> टेरापैड</a> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। यदि आप टेरापैड के जरिए अपना चिट्ठा लिखने की सोच रहे हैं तो आपको प्रमुखतः इसमें निम्न अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी जो अन्य ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म में अनुपलब्ध हैं:</p>
<ul>
<li>पेपॉल रेडी शॉप &#8211; इसका अर्थ है, आप अपने ब्लॉग को ई-बे जैसा शॉपिंग माल मिनटों में बना सकते हैं।</li>
<li>पूरा सीएसएस नियंत्रण &#8211; माने कि बोरिंग ब्लॉगर व सीमित वर्डप्रेस टैम्प्लेटों से पूरा छुटकारा। आप अपने ब्लॉग को मनचाहा रूपाकार दे सकते हैं।</li>
<li>प्रोब्लागिंग औजार- (ये क्या है भई? हमें भी नहीं पता)</li>
<li>WTSIWYG संपादन सुविधा &#8211; यह तो सभी में है, परंतु इसमें यह उन्नत किस्म का है।</li>
<li>सामग्री प्रबंधन &#8211; आप अपने चिट्ठा पोस्टों के अतिरिक्त भी अन्य सामग्री डाल सकते हैं।</li>
<li>समाचार व आरएसएस फ़ीड जोड़ सकते हैं (यह कोई नई सुविधा नहीं है)</li>
<li>इमेज गैलरी</li>
<li>पाठकों की आवाजाही पर निगाह &#8211; (यह तो सबसे जरूरी वस्तु है)</li>
<li>परिचर्चा फोरम (वाह! क्या बात है)</li>
<li>नौकरी तथा कर्मकुण्डली खोज- बेरोजगारों के लिए बढ़िया है।</li>
<li>कैलेण्डर</li>
<li>मुफ़्त मासिक 10 गीबा बैंडविड्थ  /  तथा कुल 2 गीबा डाटा</li>
</ul>
<p>चलिए अब कुछ खामियों की बातें भी करें। वैसे तो कुछेक ही हैं, पर हैं तो :</p>
<p>एक ही स्थल पर बहुत सी चीजें एक आम चिट्ठाकार के लिए अनावश्यक ही होंगी। इसका इंटरफ़ेस अनावश्यक रूप से अव्यवस्थित है और सारा मामला घालमेल प्रतीत होता है। इसका यूजर इंटरफेस छोटे-छोटे कार्यों के लिए अवांछित नेविगेशन मांगता है जो खीझ भरा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आपको नया ब्लॉग पोस्ट बनाने के लिए कड़ी तब तक दिखाई नहीं देती जब तक कि आप कोई श्रेणी बना कर उसे क्लिक नहीं करते! कौन नया चिट्ठाकार इसे समझ सकेगा भला?</p>
<p>एक नया व्यापारिक जोखिम जिसे गूगल खरीद लेगा? बहुत संभव है, परंतु फिर इसके उपयोक्ता आधार को करोड़ों में भी तो पहुँचना चाहिए। संभावना तो कम ही नजर आती है!</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2201&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>लड़कर वही निर्मल ज़माना लाना होगा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 07:54:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Bahuguna]]></category>
		<category><![CDATA[Chipko]]></category>
		<category><![CDATA[Dams]]></category>
		<category><![CDATA[Prohibition]]></category>
		<category><![CDATA[Tihri]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1206samvaadbahuguna/</guid>
		<description><![CDATA[पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता <strong>सुंदरलाल बहुगुणा</strong> पिछले दिनों जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर व्याख्यान देने रतलाम आये। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण न अन्य विषयों पर <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने उनसे बातचीत की। संवाद में प्रस्तुत है उसी वार्तालाप के अंश।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
<div id="section-teaser"><img title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.jpg" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" width="135" height="113" align="right" />पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता <strong>सुंदरलाल बहुगुणा</strong> पिछले दिनों रतलाम प्रवास पर थे। जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर उनका व्याख्यान था। इस दौरान उन्होंने पर्यावरण डाइजेस्ट नामक पत्रिका के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण भी किया तथा जालघर की अपने तरह की अकेली व पहली चिट्ठा-पत्रिका निरंतर का अवलोकन भी किया। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण विषयों पर सुंदरलाल बहुगुणा से खास बातचीत की निरंतर के वरिष्ठ संपादक <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने। संवाद में प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश:</div>
</p>
<div class="wp-caption aligncenter" style="width: 510px"><img style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" title="चित्र में रविशंकर बहुगुणा को निरंतर का अंक दिखाते हुये। एकदम दायें बैठे हैं पर्यावरण पत्रिका के संस्थापक खुशाल सिंह।" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/story-big-bahuguna.jpg" border="0" alt="सुंदरलाल बहुगुणा" vspace="5" width="500" height="269" align="middle" /><p class="wp-caption-text">चित्र में रविशंकर बहुगुणा को निरंतर का अंक दिखाते हुये। एकदम दायें बैठे हैं पर्यावरण पत्रिका के संस्थापक खुशाल सिंह।</p></div>
<p><strong>आप चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे हैं। कश्मीर से कोहिमा तक वन को बचाने के लिए आपने गंभीर आंदोलन चलाए हैं। अपनी इस यात्रा के बारे में कुछ प्रकाश डालेंगे?</strong></p>
<p>मनुष्य प्रकृति को अपनी निजी संपत्ति मानने की भूल कर बैठा है तथा इसके अंधाधुंध दोहन की वजह से संसार में अनेक विसंगतियाँ और समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। प्रकृति के असंतुलन से मौसम का चक्र ही बदल गया है नतीजतन दुनिया के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप बढ़ चला है। प्रकृति को बचाने के लिए प्रकृति को प्रकृति के पास वापस रहने देने के लिए ही चिपको आंदोलन की सर्जना की गई थी। संतोष की बात यह है कि देश में ही नहीं तमाम विश्व में इस मामले में जागृति आई है। वृक्षों को काटने के बजाए वृक्षों की खेती करना जरूरी है यह बात बड़े पैमाने पर महसूस की जा रही है और इस क्षेत्र में प्रयास भी किए जा रहे हैं।</p>
<p><strong> टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए आपका दो दशकों का लंबा, गहन आंदोलन भी फलीभूत नहीं हो पाया। आपका यह आंदोलन असफल क्यों हो गया?</strong></p>
<p>ऐसा मानना तो अनुचित होगा। जन जागृति तो आई है कि बड़े बाँध नहीं बनेंगे। बड़े बाँध स्थाई समस्याओं के अस्थाई हल हैं। नदी का पानी हमेशा प्रवाहमान रहता है। बाँध कुछ समय बाद गाद से भर जाते हैं और मर जाते हैं। दूसरी बात यह है कि बाँध जिंदा जल को मुर्दा कर देते हैं। पानी के स्वभाव पर अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई है कि रुके हुए जल में मछलियों व अन्य जीव जंतुओं, जिनका जीवन प्रवाहमान पानी के अंदर होता है उनके स्वभाव में विपरीत व उलटे परिवर्तन हुए हैं। बड़े बाँध एक दिन अंततः सर्वनाश का ही कारण बनेंगे।</p>
<p><strong> परंतु इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि बड़े बांधों के निर्माण के पीछे नदियों के जल की विस्तृत क्षेत्र में वितरण की भावना होती है तथा पर्यावरण अनुकूल जल विद्युत निर्माण का उद्देश्य होता है?</strong></p>
<p>यह भी एक दुष्प्रचार है। भारत जैसे जनसंख्या बहुल देश में जहाँ प्राकृतिक संसाधन जैसे कि वर्षा का जल व सौर ऊर्जा बहुलता से मिलते हैं इनका इस्तेमाल चहुँ ओर जल तथा विद्युत उत्पादन-वितरण के लिए बखूबी किया जा सकता है। भारत में प्रायः हर क्षेत्र में वर्षा इतनी होती है कि हर गांव में हर कस्बे &#8211; मुहल्ले में तालाब बना कर वर्षा का जल रोका जा सकता है और इससे पानी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इसी तरह सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में किया जा सकता है।</p>
<p>एक मजेदार वाकया आपको सुनाता हूँ। एक बार मैं नार्वे गया। वहाँ जब मैं पहुँचा तो देखा कि सभी घरों में ताले लगे हैं, और शहर में कोई नहीं है। मुझे लगा कि क्या मैं गलत समय पर आ गया या हूँ। परंतु मुझे बताया गया कि यहाँ धूप बहुत कम खिलती है लिहाजा लोग बाग़ समुद्र किनारे धूप स्नान के लिए गए हुए हैं। भारत में बारिश के चार महीनों को छोड़ दें तो यहाँ धूप का अकाल कभी नहीं रहता। यह प्राकृतिक, अक्षय ऊर्जा है। पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा है। इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता। आप देखेंगे कि जब अंधाधुंध दोहन के कारण पृथ्वी के संसाधन समाप्त हो जाएंगे तो अंततः यही अक्षय ऊर्जा ही काम आएगी। मनुष्य को अभी से चेत जाना चाहिए।</p>
<div id="pullQuoteR">ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। ग्राम स्वराज के इस उद्देश्य को अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा</div>
<p><strong> आप विनोबा जी के ग्राम स्वराज आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं। आज की पीढ़ी यह सब भूल चुकी है। वर्तमान पीढ़ी के लिए ऐसे आंदोलनों की सार्थकता आप महसूस करते हैं?</strong></p>
<p>विनोबा जी के ग्राम स्वराज योजना में भी शाश्वत सत्य का अनुष्ठान किया गया है। ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। यही ग्राम स्वराज का उद्देश्य था और इसे अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा।</p>
<p>आज हम भारत की मिट्टी के उपजाऊपन को निर्यात कर रहे हैं। खेतों की मिट्टी अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग के कारण नशेबाज हो गई है। खेत मरूस्थल बनते जा रहे हैं। खेतों में इंडस्ट्री की तरह उत्पादन लिया जा रहा है। अंततः धरती बांझ हो जाएगी। हमें इससे बचना है तो वृक्षों की खेती शुरू करनी होगी। धरती की गोद में वृक्ष सदाबहार रहेंगे तो उनसे प्राप्त वनोपजों से पर्यावरण स्वच्छ तो रहेगा ही, सर्वत्र प्रचुरता में पानी, भोजन व वस्त्र भी सुलभ हो सकेंगे।</p>
<p><strong> आपने बहुत भ्रमण किया है और अपने विचारों को तमाम क्षेत्रों में रखा है। लोगों में आपके विचारों के प्रति किस तरह की भावना जाग्रत हुई है, क्या आपके इन विचारों को मान्यता मिली है?</strong></p>
<p>चिपको आंदोलन उत्तर भारत में हिमालय से शुरू हुआ और दक्षिण में कर्नाटक तक पहुँच गया। वहाँ इसका नाम पिक्क हो गया है। तो इन विचारों को मान्यता तो चहुँ ओर मिली ही है।</p>
<p><strong> बहुत समय से देश की कुछ बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में बातें की जा रही हैं &#8211; गंगा-कावेरी जैसी योजना के बारे में आपके क्या विचार हैं?</strong></p>
<p>यह भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। देश की नदियों को जोड़ना मूर्खतापूर्ण कदम होगा। लाभ के बजाए हानि ही ज्यादा होगी। नदियों का जलस्तर घटेगा व नदी अपनी स्वयं की शुद्ध करने की शक्ति खो देगी। एक नदी प्रदूषित होने पर वह सारी नदियों को प्रदूषित करेगी। इसे रोकने के लिए, लोकशक्ति जागृत करने के लिए हिमालय से कन्याकुमारी तक पदयात्राएँ करने की आवश्यकता है।</p>
<div id="pullQuoteR">हमारी न्यायपालिका काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। न्यायपालिका ने सरकार को कई संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर किया है।</div>
<p><strong> बड़े बाँध और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर राज्य व केंद्र की सरकारों की भूमिका पर अकसर सवाल उठाए जाते रहे हैं। आप इन्हें कहाँ तक उचित समझते हैं?</strong></p>
<p>यह तो सर्वविदित है कि राज्य अपने अल्पकालिक लाभ के लिए कार्य करते हैं। परंतु खुशी की बात यह है कि हमारी न्यायपालिका बहुत मजबूत है, काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। बहुत से मामलों में न्यायपालिका ने सरकार को इन संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर भी किया है।</p>
<p><strong> आपके पश्चात इस आंदोलन की गति क्या होगी?</strong></p>
<p>यह कतई जरूरी नहीं है कि आंदोलन, चलाने वाले के जीवनकाल में सफल हो जाए। मनुष्य तो नाशवान है। परंतु सत्य हमेशा शाश्वत रहता है। इटरनल ट्रुथ, शाश्वत सत्य तो अमर रहेगा।</p>
<p><strong> उत्तरांचल में आपने व आपकी पत्नी ने नशाबंदी के लिए भी बहुत कार्य किए। आज जब आधुनिक समाज में मद्यपान को सामाजिक उन्नति का प्रतीक समझा जाने लगा है तब नशाबंदी की अवधारणा कहाँ तक उचित प्रतीत होती है?</strong></p>
<p>यह सामाजिक उन्नति तो नहीं, सामाजिक अवनति है। कोई भी नशा उन्नति की ओर नहीं ले जा सकता यह तो तय है। हमारे प्रयासों से हिमाचल के तमाम जिलों में जागरूकता फैली है। चिपको आंदोलन के कारण वनों की कटाई पूर्णतः बन्द है। पाँच जिलों में संपूर्ण मद्यनिषेध अपनाया गया है। ये बातें कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।</p>
<p>मैं फिर कहूंगा कि सत्य हमेशा जिन्दा रहता है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि आज मैं जिंदा हूँ। वन माफिया और शराब माफिया ने मेरे जीवन को समाप्त करने के बहुत से कुचक्र चले। एक बार मुझे गंगा में डुबो दिया गया था। इस तरह की समस्याएँ हर आंदोलनकारी के जीवन में तो आती ही हैं। परंतु हार अंततः असत्य की ही होती है।</p>
<p><strong> निरंतर के पाठकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?</strong></p>
<p>हमारे समय स्वच्छ जल, पवित्र धरती और निर्मल आकाश (वायु) था। उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है और सर्वनाश फैलाया है। आज सभी प्रदूषण के शिकार हैं। समस्या गंभीर होती जा रही है। हमें लड़कर नया जमाना लाना होगा, जो वही, पुराना &#8211; स्वच्छ, पवित्र और निर्मल था। युद्ध तो छेड़ना ही होगा। और यही उपयुक्त समय है।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2120&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>विकिलीक्स बतायेगा पर्दे के पीछे का सच</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1206-tech-deergha-wikileaks</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1206-tech-deergha-wikileaks#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 07:51:07 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[टैक दीर्घा]]></category>
		<category><![CDATA[Classified]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Wikileaks]]></category>
		<category><![CDATA[Wikipedia]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1206tech-deerghawikileaks/</guid>
		<description><![CDATA[नये स्तंभ <strong>टेक दीर्घा</strong> में <strong> रवि रतलामी</strong> बता रहे हैं विकिपीडिया की तर्ज पर प्रारंभ, पर उससे काफी अलाहदा, एक नये और अनोखे प्रकल्प <strong>विकिलीक्स</strong> के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>तमाम विश्व के हर क्षेत्र के स्वयंसेवी सम्पादकों के बल पर मात्र कुछ ही वर्षों में विकिपीडिया आज कहीं पर भी, किसी भी फ़ॉर्मेट में उपलब्ध एनसाइक्लोपीडिया में सबसे बड़ा, सबसे वृहद एनसाइक्लोपीडिया बन चुका है। कुछेक गिनती के उदाहरणों को छोड़ दें तो इसकी सामग्री की वैधता पर कहीं कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा। इसी की तर्ज पर एक नया प्रकल्प प्रारंभ किया जाने वाला है <a href="http://www.wikileaks.org" target="_blank">विकिलीक्स</a> ।</p>
<div id="pullQuoteR">विकिलीक्स में हर किस्म के, बिना सेंसर किए, ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ शामिल किये जा सकेंगे जिन्हें सरकारें और संगठन अपने फ़ायदे के लिए आम जन की पहुँच से दूर रखती है।</div>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 3px 8px;" title="Wikileaks" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/wikileaks.gif" border="0" alt="Wikileaks" hspace="8" vspace="3" width="110" height="246" align="left" />विकिलीक्स तकनीक में तो भले ही <a href="http://www.wikipedia.org" target="_blank">विकिपीडिया</a> के समान है &#8211; विकि आधारित तंत्र पर कोई भी उपयोक्ता इसमें अपनी सामग्री डाल सकेगा, परंतु इसकी सामग्री पूरी तरह अलग किस्म की होगी। इसमें हर किस्म के, बिना सेंसर किए, ऐसे गोपनीय दस्तावेज़ शामिल किये जा सकेंगे जिन्हें सरकारें और संगठन अपने फ़ायदे के लिए आम जन की पहुँच से दूर रखती हैं। यही विकिलीक्स का मूल सिद्धान्त है।</p>
<p>विकिलीक्स में कोई भी उपयोक्ता ऐसे दस्तावेज़ों को मुहैया करवा सकता है। विकिपीडिया के विपरीत जहाँ उपयोक्ताओं के आईपी पते दर्ज किए जाते हैं, विकिलीक्स में क्रिप्टोग्रॉफ़िक तकनॉलाजी के जरिए इसके उपयोक्ताओं के पूरी तरह अनाम व अचिह्नित बने रहने की पूरी गारंटी दी जा रही है। जाहिर है, बहुत से दस्तावेज़ जिन्हें आम जनता तक पहुँचना चाहिए, परंतु गोपनीयता कानूनों, दंड और कानूनी कार्यवाही के भय से दबे और छुपे रह जाते हैं निश्चित रूप से आम पाठक तक प्रचुरता में पहुंचेंगे।</p>
<p>विकिलीक्स को अभी आम जन के लिए प्रारंभ नहीं किया गया है, मगर इसकी भावी लोकप्रियता का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ इसकी सूचना मात्र से ही इसे 12 लाख गोपनीय दस्तावेज़ विभिन्न स्रोतों से उपलब्ध कराए जा चुके हैं।</p>
<p>ऐसी आशंका भी निर्मूल नहीं कि विकिलीक्स का इस्तेमाल ग़लत कार्यों के लिए भी हो सकता है। राजनीतिक दल, संगठन व व्यक्ति एक दूसरे की पोल खोलने व ब्लेकमेल करने के अस्त्र के रूप में इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। गोपनीय दस्तावेज़ों की असलियत पर प्रश्न चिह्न भी बना रहेगा। पर सचाई यह है विकिपीडिया की विश्वसनीयता पर भी शुरूआती दिनों में प्रश्नचिह्न लगाए जाते रहे थे। गोपनीय दस्तावेज़ों के विकिलीक्स पर उपलब्ध होते ही इसकी सत्यता तथा इसकी आलोचना-प्रत्यालोचना संगठनों व सरकारों द्वारा तो की ही जा सकेगी, मतभिन्नता रखने वाले विभिन्न समूहों द्वारा भी इनका विश्लेषण खुलेआम किया जा सकेगा ऐसे में इस तरह के प्रयोग की बातें बेमानी ही होंगी &#8211; ऐसा विकिलीक्स का मानना है।</p>
<p>विकिलीक्स का शुभारंभ फरवरी या मार्च 2007 को प्रस्तावित है। देखते हैं इंटरनेट पर सैद्धांतिक अवज्ञा की यह गांधीगिरी क्या गुल खिलाती है!</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2199&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1206-tech-deergha-wikileaks/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>स्पाउस &#8211; शादी का सच: दुहराया वक्तव्य</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-samiksha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-samiksha#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 06:56:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Marriage]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006vatayansamiksha/</guid>
		<description><![CDATA[शोभा डे की अंग्रेज़ी पुस्तक का हिन्दी अनुवाद पढ़कर <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> चुहल करते हैं कि &#8216;स्पाउस&#8217; पढ़कर अपना वैवाहिक रिश्ता सुधारने के बारे में सोचने से तो अच्छा है कि उस पैसे से मियाँ-बीवी कोई फ़िल्म देख अपनी शाम सुहानी बना लें।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">पें</div>
<p>गुइन इंडिया द्वारा शोभा डे की अंग्रेज़ी पुस्तक &lsquo;स्पाउस<img width="200" vspace="5" hspace="5" height="265" border="0" align="right" title="स्पाउस" alt="स्पाउस" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/spouse-cover.jpg" />&rsquo; का हिन्दी अनुवाद अभी हाल ही में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद वैसे तो ठीक-ठाक है, परंतु साफ़ झलकता है कि पुस्तक एक &lsquo;अनुवाद&rsquo; ही है। 150 रुपयों की पुस्तक को पेंगुइन ने बढ़िया गेटअप और अच्छे, मित्रवत्-पठन प्रारुप में जारी किया है। काग़ज रिसायकल्ड लगता है, मगर है उम्दा श्रेणी का।</p>
<p> रहा सवाल पुस्तक की &lsquo;सामग्री&rsquo; का, तो डेल कॉर्नेगी और दीपक चोपड़ा के लिखे व्यक्ति-सुधार वाले पुस्तक जब लाखों में बिक सकते हैं, तो शोभा डे की विवाह-सुधार की पुस्तक क्यों नहीं। शायद यही कारण रहा होगा शोभा डे के पास इस पुस्तक को लिखने का &#8211; जिनका अपना खुद का प्रथम विवाह घोर असफल रहा था।</p>
<p>   स्पाउस के हर पृष्ठों पर आपको प्रवचन मिलेंगे। अपने प्राक्कथन में ही शोभा डे खुद की कहानी कुछ यूँ लिखती हैं-<br />
<blockquote>&ldquo;सालों पहले, डे (शोभा की दूसरी शादी के, वर्तमान पति) ने एक बार कहा था कि सलवार-कमीज़ एकदम रसहीन पोशाक है। &lsquo;यह तुम पर कोई असर नहीं छोड़ती,&rsquo; एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए निकलने के कुछ पल पहले उन्होंने इसे ख़ारिज करते हुए कहा। फिर क्या था! मैं तुरंत अपने कमरे में गई और साड़ी पहन आई। उस दिन के बाद मैंने सलवार-कमीज़ नहीं पहनी! हमारे मित्र अजीब बात मानते हैं। वे अकसर इस &lsquo;विरोधाभास&rsquo; पर टिप्पणी करते हैं कि वे मुझ जैसी महिला से यह उम्मीद नहीं करते कि मैं पुरुषों की इस पसंद से इत्तफ़ाक रखूं कि उनकी पत्नी को कैसा लगना चाहिए। सच कहूँ तो, उनकी &lsquo;हैरानी&rsquo; से मुझे हैरानी होती है! मेरे खयाल से ऐसा करना तो बहुत स्वाभाविक बात है। और इसमें कोई शर्मिंदगी भी नहीं है। अहम की लड़ाइयों को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए सहेज कर रखें। एक सलवार-कमीज़ के लिए अपनी शाम बर्बाद न करें।&rdquo;</p></blockquote>
<p>
<div id='pullQuoteL'>ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है &#8211; सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के</div>
<p> यह बात तो हर पति-पत्नी को मालूम होती है। परंतु शामें इसी तरह की बहुत सी अन्य छोटी-छोटी बातों से ही बर्बाद होती रहती हैं। रिश्ते किसी किताब में लिखे नियमों व उसमें दर्शाए गए उदाहरणों से नहीं बनते-बिगड़ते। अगर ऐसा होता तो हर विवाह बंधन आदर्श बंधन होता चूँकि इस तरह की सैकड़ों किताबें बाजार में पहले भी बिकती रही हैं। विवाह बंधन के समय ही पति-पत्नी को एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध और दयालु रहने की कसमें खिलाई जाती हैं। परंतु विवाह टकराव का दूसरा नाम बन जाता है। यही वजह है कि तमाम विश्व में समाज सुधारकों, वैवाहिक-परामर्शदाताओं का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ा।</p>
<p> शोभा एक कदम आगे जाकर आपको सीधे-सीधे उपदेश देने लगती हैं। पूरी किताब में ऐसे फूहड़ उपदेशों की भरमार है। कुछ उपदेश आपकी खातिर उद्घृत करते हैं, और कोष्ठक में शोभा से स्पष्टीकरण मांगते हैं -</p>
<ul>
<li>अगर लड़ना ही है, तो कायदे से लड़ें। (कायदा पारिभाषित करेंगी शोभा जी?)</li>
<li>झगड़ा साफ़ और उसी मुद्दे पर हो। (झगड़ा गंदा भी होता है, या गंदा ही होता है? झगड़ा साफ़ भी होता है यह तो अब पता चला। चलिए, आपकी दूसरी राय मान लेते हैं कि झगड़ा जब चालू करेंगे तो पुरखों की बातों को फिर शामिल नहीं करेंगे!)</li>
<li>मुद्दों को उलझाएँ नहीं। झगड़ा पैसों को लेकर है, तो उसे पैसों पर ही रखें। बच्चों, सास-ससुर, कुत्ते या पड़ोसियों को इसमें न घसीटें। (ऊपर की पंक्ति में दी गई समझाइश अस्पष्टथी अतः यह पंक्ति वैसे भी जरूरी थी!) </li>
<li>मन में एक रूपरेखा बना लें और एजेंडे के अनुसार ही चलें। एक झगड़े में उतनी ही बात तय हो सकती है। (आह! क्या बात है। पति-पत्नी का झगड़ा पति-पत्नी का नहीं, भारत-पाकिस्तान का हो गया। योजना बनाओ, प्लान बनाओ, एजेंडा<br />
 बनाओ फिर झगड़ो। वाह! शोभा जी वाह! क्या बात है। आपकी मौलिक विचारधारा के कायल हो गए हम।)</li>
<li>झगड़ा पूरा निबटाएँ &#8211; कुछ अनकहा न छोड़ें। कोई नतीजा निकलने तक झगड़ा करें, फिर वह किसी के भी पक्ष में क्यों न हो। (वाह! पति-पत्नी के आपसी रिश्ते सुधारने के लिए एक और मौलिक तरीका। झगड़ा तभी बंद करें जब किसी एक का सिर न फूट जाए या पत्नी मायके न चली जाए या पति पता नहीं क्या कर ले!)</li>
<li>अपने झगड़ों की योजना बनाएँ, यह मुश्किल तो है, पर असंभव नहीं। (हा हा हा &#8230; झगड़ों की योजना&#8230; सचमुच शोभा जी, आदमी अगर ठान ले तो कुछ भी संभव नहीं। परंतु यहाँ अच्छा होता कि आप अपनी कुछ योजनाओं की रूपरेखा उदाहरण स्वरूप देतीं, तो पाठकों का भला होता। वे दुनिया की एक नई तकनीक, एक नया विषय सीख लेते!)</li>
<li>झगड़ों को निजी रखें। सबके बीच झगड़ने से बुरा कुछ नहीं हो सकता।</li>
<li>अपने नियम तय कर लें और कभी भी मर्मस्थल पर चोट न करें। (परंतु आपने अभी ऊपर कहा है कि झगड़ा पूरा होते तक, परिणाम मिलते तक करें &#8211; यह दुहरी बात क्यों?)</li>
<li>जरूरी हो तो रोएँ। आँसुओं को रोकना बेमानी है- किसलिए रोकें? (जरूरी? कैसे पता पड़ेगा कि अब रोना जरूरी है? कोई नियम कायदा कानून है क्या?)</li>
<li>कभी आपा न खोएँ। बेकाबू होते ही आप अस्पष्ट और तर्कहीन हो जाते हैं। आपका पक्ष भी कमजोर हो जाता है।</li>
<li>जब नियंत्रण खोने का खतरा हो, तो गिनती करें या कोई मंत्र पढ़ने लगें। जरूरी नहीं है कि कुछ धार्मिक मंत्र-प्रार्थना ही हो। पहाड़ा पढ़ सकते हैं। मूल बात यह है कि आप अपना ध्यान झगड़े से हटा कर किसी और चीज़ पर लगाएँ। (और, सामने वाले को जीतने का भरपूर मौका दे दें?)    </li>
</ul>
<p>  जाहिर है, ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है &#8211; सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के?</p>
<p> पर उपदेश कुशल बहुतेरे। &lsquo;उपदेश&rsquo;, &lsquo;कायदे&rsquo; का भी तो हो! &lsquo;स्पाउस&rsquo; पढ़कर अपना वैवाहिक रिश्ता सुधारने के बारे में सोचने से तो अच्छा है कि उस पैसे से मियाँ-बीवी कोई फ़िल्म देख आएँ और कम से कम अपनी एक शाम तो सुहानी बना ही लें।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2137&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-samiksha/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>इंटरनेट बुराइयों की जड़ है!</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-vyangya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-vyangya#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 06:55:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Internet]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006vatayanvyangya/</guid>
		<description><![CDATA[अगर इंटरनेट नहीं होता तो सैकड़ों फ़िशर्स, स्पैमर्स, वायरस लेखक तो भूखे ही मर जाते। हैकरों और क्रैकरों का क्या होता। पॉर्न इंडस्ट्री कहां जाती? पढ़िये<strong> रविशंकर श्रीवास्तव </strong>की गुगदुगाने वाली रचना!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img width="500" vspace="5" height="250" border="0" alt="Internet" title="Internet" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/story-big-vyangya.jpg" /></p>
<p>मैं अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। तब इंटरनेट नहीं था, ईमेल नहीं था (और न ही पॉर्न साइटें थीं)। आज के शोध छात्रों के विपरीत, मुझे अपनी परियोजना फ़ाइलों को पूरा करने के लिए विद्यालय के ग्रंथालय तक नित्य दौड़ लगानी होती थी, सैकड़ों भारी भरकम पुस्तकों को उठापटक कर हजारों पृष्ठों में से मसाला खोजना होता था, टीप लिख-लिख कर रखना होता था, अपने प्रोफ़ेसर के साथ घंटों बैठकर दिमाग खपाकर प्रत्येक महत्वपूर्ण बात को दुबारा-तिबारा ढूंढ ढांढ कर लिखना होता था।</p>
<p> तब अगर आज की तरह मेरे पास इंटरनेट होता तो मुझे कहीं जाने की जरूरत ही नहीं होती। मैं अपने शोध विषय के कुछ शब्दों को लेकर गूगल पर कुछ खोजबीन करता और कम्प्यूटर तंत्र की सबसे बढ़िया ईजाद &#8211; &lsquo;नक़ल कर चिपका कर&rsquo; यानी कि कॉपी/पेस्ट के जरिए देखते ही देखते मेरा बेहतरीन, तथ्यपरक, मौलिक शोध ग्रंथ तैयार हो जाता। किसी तरह की कोई झंझट नहीं होती। आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास इंटरनेट है। गूगल है।</p>
<div id='pullQuoteR'>आज के शोधार्थियों को तो आधुनिक युग का आशीर्वाद मिला हुआ है। आज उनके पास गूगल है।</div>
<p> मैं किसी सूरत अपने पुराने दिनों को याद नहीं करना चाहता। पुराने दिनों में चिट्ठियों को बड़े ही सोचविचार कर लिखना होता था, दो चार बार तो उन्हें पढ़ना होता था और फिर आवश्यक बदलाव कर, डाकटिकट चिपकाकर उन्हें पोस्ट करना होता था। क्या पता किसी चिट्ठी में गलत भाषा या कुछ गलत लिख लिखा गया हो और सामने वाले को समस्या हो जाए? डाक के डब्बे के मुँह पर डालते समय भी अगर मुझे कुछ याद आता था तो वह पत्र फाड़ कर नए सिरे से फिर से अच्छी भाषा में अच्छी बात लिख कर चिट्ठी भेजता था। कई ख़तों से इत्र की खुशबु आती थीं जो सामने वाले अपना अभिन्न समझ कर पत्र में खुशबू लगाकर मुझे भेजते थे, परंतु उन्हें यह नहीं पता होता था कि मुझे हर किस्म के इत्र से एलर्जी है। मैं पत्रों के जरिए फैलने वाले एंथ्रेक्स किस्म के वायरस जन्य बीमारियों तथा बढ़ते आतंकवाद के चलते पार्सल बम के फोबिये से भी ग्रसित था। धन्य है इंटरनेट। इसने मेरी सारी समस्या का समाधान कर दिया है।</p>
<p> अब तो मुझे अपना पत्र लिखने और पत्र का प्रत्युत्तर देने के लिए लिफ़ाफ़े और डाकटिकट तो क्या, सोचने की जरूरत ही नहीं होती। अब मैं अपने कम्प्यूटर के ईमेल क्लाएंट पर &lsquo;जवाब भेजें&rsquo; बटन को क्लिक करता हूँ, एसएमएस जैसी संक्षिप्त किस्म की नई, व्याकरण-वर्तनी रहित, स्माइली संकेतों युक्त भाषा में संदेशों को लिखता हूँ, और &lsquo;भेजें&rsquo; बटन को क्लिक कर देता हूँ। मेरा ईपत्र दन्न से सामने वाले के कम्प्यूटर पर हाजिर हो जाता है।</p>
<p> वैसे भी, स्पैमों की मार से मर चुके &lsquo;बेचारे&rsquo; सामने वाले के पास आपके ईपत्र की भाषा और वर्तनी के बारे में सोचने का वक्त ही कहाँ होता है! वह आपके ईपत्र को पढ़ ले यही आपके लिए बहुत है। पहले मैं पत्र लिखने में कोताही करता था। तमाम झंझटें थीं। पत्र लिखो, सुधारो, लिफ़ाफ़े में डालो, चिपकाओ, टिकट चिपकाओ, लाल डिब्बे में डालो। अब ईपत्र तो मुफ़्त में उपलब्ध है बिना झंझट। लिहाजा हर संभव ईपत्र को अपने सभी जानने वालों को अग्रेषित करता रहता हूँ। मेरे इस काम में कुछ वायरस भी मेरा हाथ बटाते हैं जो मेरे नाम से कई परिचितों-अपरिचितों को अपनी ही प्रतिकृति युक्त ईपत्र भेजते रहते हैं।</p>
<p> अहा! इंटरनेट। जीवन आज से पहले इतना आसान कभी नहीं था। पहले मुझे अपने दोस्तों रिश्तेदारों के यहाँ उनसे मिलने &#8211; जुलने &#8211; बोलने &#8211; बताने &#8211; खेलने &#8211; गपियाने हेतु आवश्यक रूप से जाना होता था। कितना कष्टप्रद होता था भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़कों पर से गुजर कर अपने अनन्य के पास जाना<br />
 उन तक पहुँचते-पहुँचते सारा उत्साह ठंडा हो जाता था और मन में अपराध बोध-सा आ जाता था कि ऐ अनन्य मित्र हमने तेरी खातिर कितने कष्ट सहे! परंतु अब तो मुझे सिर्फ इंटरनेट से जुड़ा एक अदद कम्प्यूटर और एक वेबकैम चाहिये बस। अब मैं अपने ही कयूबिकल से ही विश्व के किसी भी कोने से किसी भी व्यक्ति से रूबरू बात कर सकता हूँ, उसके साथ रूबरू शतरंज खेल सकता हूँ और अगर सामने वाला दोस्त राज़ी हो तो कुछ दोस्ती यारी और प्यार रोमांस की भी बातें कर सकता हूँ &#8211; और यह सारा कुछ अपने कम्प्यूटर के कुंजीपट से! मैं एक साथ, चैट और मैसेंजर के जरिए दर्जनों लोगों से, दर्जन भर अलग अलग विषय पर, जो दर्जन भर अलग अलग जगह से होते हैं, एक ही समय में एक साथ बात कर सकता हूँ। और देश-काल-भाषा-संस्कृति और समय की सीमा से परे बातें करते रह सकता हूँ।</p>
<div id='pullQuoteR'>मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ।</div>
<p> यहाँ तक कि मैं तो अपने पड़ोसी से भी इंटरनेट चैट के जरिए बात करना पसंद करता हूँ। जब मैं अपनी कुर्सी पर बैठकर आराम से चाय के घूँट सुड़कता हुआ चैट के जरिए लोगों से बातें कर सकता हूँ तो फिर इसके लिए उनके पास जाकर बात करने की आवश्यकता ही क्या है? इसी तरह से अब जब मैं अपने घर से इंटरनेट के जरिए पिज्जा हट से घर पर ही पिज्जा मंगवा सकता हूँ &#8211; तो क्या मैं बेवकूफ हूं जो इसे खरीदने के लिए चार मोहल्ला पार कर भीड़-धूल-गड्ढे भरी सड़क पार कर पिज्जा खरीदने पिज्जा हट जाऊँ? हट!</p>
<p>इंटरनेट उपयोक्ता के रूप में मैं अपने आपको एलीट श्रेणी यानी कि &#8211; उस श्रेष्ठी वर्ग में गिनता हूँ &#8211; जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं। विश्व में अब दो ही किस्म के लोग हैं &#8211; एक जो इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं और दूसरे जो इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते हैं। प्रगतिशील, समृद्ध, श्रेष्ठी वर्ग इंटरनेट का इस्तेमाल करता है। गरीब फ़ूहड़ इंटरनेट इस्तेमाल नहीं करता है। इंटरनेट के जरिए मेरे कम्प्यूटर स्क्रीन पर तमाम विश्व की ताज़ा जानकारियाँ उपलब्ध होती हैं और विश्व के ताज़ा समाचार मेरी उंगलियों पर रहते हैं। अपने कुंजीपट के कुछ कुंजियों को दबाने की देर होती है बस। धन्यवाद इंटरनेट।</p>
<p> इंटरनेट के जरिए जब आप सही में वैश्विक हो जाते हैं, तो फिर आपको ये छोटे मोटे बेकार के घरेलू या आसपड़ोस की घटनाओं से क्या लेना देना। इज़राइल की गाज़ा पट्टी पर ताज़ा हमले और ओसामा के नए वक्तव्य के समाचार ज्यादा महत्वपूर्ण हैं बजाए इस समाचार के कि पड़ोस के सूने मकान में पिछली देर रात तब चोरी हो गई जब मैं चैट में व्यस्त था। वैसे, कुछ खटपट की आवाजें मैंने भी सुनी थीं, परंतु उससे मुझे क्या &#8211; भई, यह तो स्थानीय पुलिस का काम है खोजबीन करे और चोरों को पकड़े। और, वैसे भी, मुझे तो अपने पसंदीदा चिट्ठों को पढ़ना था, ढेरों ईपत्रों का जवाब देना था और कुछ चिट्ठों पर टिप्पणियाँ करनी थीं &#8211; कुछ चिट्ठाकार टिप्पणियाँ नहीं करने से नाराज से चल रहे दीखते हैं।</p>
<p> इंटरनेट ने लाखों लोगों को लाखों तरीकों से रोजगार दिया हुआ है। अगर इंटरनेट नहीं होता तो सैकड़ों फ़िशर्स, स्पैमर्स, वायरस लेखक तो भूखे ही मर जाते। हैकरों और क्रैकरों का क्या होता। पॉर्न इंडस्ट्री कहां जाती? इंटरनेट &#8211; तेरा भला हो, तूने आधी दुनिया को भूखे मरने से बचा लिया। अगर हैकर्स और क्रैकर्स नहीं होते तो दुनिया में पायरेसी कहाँ होती और पायरेसी नहीं होती तो दुनिया में कम्प्यूटर और इंटरनेट का नामलेवा भी नहीं होता &#8211; यह मात्र अभिजात्य वर्ग की रखैल माफ़िक बन रहती। धन्यवाद इंटरनेट। तमाम तरह के कीज़ेन व क्रेक के जरिए मेरे कम्प्यूटर में लाखों रुपयों के सॉफ़्टवेयर संस्थापित हैं &#8211; भले ही उनकी आवश्यकता मुझे हो या न हो &#8211; मैं और मेरा कम्प्यूटर सॉफ़्टवेयर के मामले में अमीर तो हैं ही! अगर इंटरनेट नहीं होता तो<br />
 मैं विश्व के बहुत से महान सॉफ़्टवेयर जिनमें ऑडियो वीडियो सीडी नक़ल करने के औजार व कम्प्यूटर खेल इत्यादि भी सम्मिलित हैं, का इस्तेमाल ही नहीं कर पाता।    </p>
<div id='pullQuoteR'>इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है।</div>
<p>इंटरनेट ने दुनिया को मनोरंजन युक्त जानकारियों का नया, नायाब माध्यम दिया है। हजारों लाखों पॉर्न साइटों के जरिए आप चीन और चिली की सभ्यता के प्रेम-प्यार के आचार-व्यवहार-बर्ताव का बढ़िया और बारीकी से अध्ययन कर सकते हैं। इंटरनेट तो महान समाजवादी है। यह सबको समान रूप से न सिर्फ देखता है, बल्कि सबको समान बनने बनाने का अवसर देता है। आप इंटरनेट से हर चीज मुफ़्त में पा सकते हैं &#8211; एमपी3&nbsp; से लेकर वीडियो तक। और यदि कोई चीज मुफ़्त नहीं मिल रही हो तो उसे मुफ़्त करने का क्रैक चुटकियों में पा सकते हैं। इंटरनेट इज़ अ ग्रेट लेवलर।<br /> 
<p> ले दे कर अभी तीन-चार साल ही हुए हैं मुझे इंटरनेट का इस्तेमाल करते हुए और मैं तो इसके पीछे पागल हो रहा हूँ। मैं भोजन के बगैर कुछ दिनों तक जी लूंगा, पानी के बगैर कुछ घंटों जी लूंगा, शायद हवा के बिना भी कुछ मिनट टिक जाउं। परंतु इंटरनेट के बगैर, एक पल भी नहीं! इंटरनेट तो अब मेरी मूलभूत आवश्यकता में शामिल हो गया है। भोजन, पानी और हवा की सूची में पहले पहल अब इंटरनेट का नाम आता है।</p>
<p> और आप चाहते हैं कि मैं कहूँ &#8211; इंटरनेट बुराइयों की जड़ है? माफ़ कीजिएगा महोदय, मेरे विचार आपसे मेल नहीं खाते। बिलकुल मेल नहीं खाते!</p>
<hr width="100%" />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2136&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-vatayan-vyangya/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

