<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; आमुख कथा</title>
	<atom:link href="http://www.nirantar.org/category/aamukh-katha/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.nirantar.org</link>
	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>असली भारत के लिये असली शिक्षा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-cover-yashpal</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-cover-yashpal#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:58:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Education]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507coveryashpal/</guid>
		<description><![CDATA[हमारी शिक्षा पद्धति में बच्चे भारी बैग लिये फिरते हैं, जोर रहता हैं रटन विद्या और परीक्षाओं पर। यहाँ पाठ्यक्रम में बाहर से अर्जित ज्ञान, हुनर और काबलियतों को स्थान नहीं मिलता। शिक्षाविद व राष्ट्रीय शोध <strong>प्रोफेसर यश पाल</strong> मानते हैं कि आधुनिक औपचारिक शिक्षा तंत्र में प्रकृति और जीवन से सीखे हुनर को शामिल करना भी ज़रूरी है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center">
<p style="text-align: center;"><img class=" aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Photo by Akshay Mahajan" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/story-big-yashpal.jpg" border="0" alt="Photo by Akshay Mahajan" width="500" height="250" /></p>
</div>
<div class="dropCap">मे</div>
<p>रे लेख का शीर्षक ज़रा कठोर है। थोड़ा अक्खड़ भी। इसका मंतव्य यह है कि कुल मिलाकर हमारी शिक्षा पद्धति वास्तविक भारत की ज़रूरत मुताबिक ढली नहीं है और यह कि जो शिक्षा हम दे रहें हैं वह काफी हद तक कर्मकाण्डी और यथार्थ से परे है।</p>
<p>हमारे जैसी विशाल और विस्तृत प्रणाली के लिये ये शायद एक और गैर जिम्मेदाराना सामान्यीकरण लगे। मैं इस तथ्य से वाकिफ हूँ कि हम कुछ असाधारण लोगों की भी रचना करते हैं पर मेरा विचार है कि प्रणाली चाहे कैसी भी हो कुछ असाधारण लोग तो यूँ भी तैयार हो ही जाते हैं, ज़्यादातर किसी औपचारिक तंत्र के प्रयोग के बिना। 95 करोड़ के देश में हम कड़ी और कष्टकर छंटाई के द्वारा भी कुछ हजार लोगों को ही चुन पाते हैं। इंजीनियरिंग के प्रशिक्षण के उपरांत इनमें से भारी संख्या में लोग विदेश चले जाते हैं और वहाँ सफलता भी प्राप्त करते हैं। यह तथ्य यही साबित करता है कि हमारी कुछ संस्थाओं में हर किसी को नष्ट करने में हम पूर्णतः सफल नही हो सके।</p>
<div id="pullQuoteR">हायर सेकेंडरी परीक्षा में बैठने वाले 100 छात्रों में से हर साल 50 से भी कम पास होते हैं। यही साल दर साल चलता रहता है।</div>
<p>सार्विक प्राथमिक शिक्षा देने से तो हम कोसों दूर हैं। हम मौजूदा शालाओं जैसी ढेरों और शालायें खोल भी दें तो यह हालात खास बदलने नही वाले बशर्ते हम साथ साथ हमारी शिक्षण और ज्ञान तंत्र तथा शाला के अपने पास पड़ोस से संबंधों में प्रबल बदलाव लायें। इसके कारणों की चर्चा निम्नलिखित है।</p>
<p>कक्षा 1 में दाखिल होने वाले 50 प्रतिशत बच्चे कक्षा 5 तक और 25 प्रतिशत बच्चे कक्षा 8 तक आते आते स्कूल छोड़ देते हैं। केवल 5 से 10 प्रतिशत ही हाई स्कूल पास करते हैं और बमुश्किल 1 या 2 प्रतिशत बारहवीं पास कर पाते हैं। हायर सेकेंडरी परीक्षा में बैठने वाले 100 छात्रों में से हर साल 50 से भी कम पास होते हैं। यही साल दर साल चलता रहता है।</p>
<p>जब भी हम इन आंकड़ों को देखते हैं, अपने शिक्षों पर दोषारोपण करने और स्कूलों में सेवाओं की खराब स्थिति, माता पिता की उदासीनता, खराब पाठ्य पुस्तकों वगैरा वगैरा को कोसने लगते हैं। छात्रों के लिये अनिवार्य हो गया है कि अच्छे अंक पाने के लिये वे महंगे ट्यूशन व कोचिंग कक्षायें जायें। आपके माता पिता का मालदार और शिक्षित होना काम आता है। अगर वे अंग्रेजी बोल सके तो क्या कहनें।</p>
<p>मेरी यही धारणा है कि ये सभी एक गहरी गलती के लक्षण हैं। 3 वर्ष पूर्व मानव संसाधन मंत्रालय द्वारा गठित एक कमेटी ने एक रपट दाखिल की थी जिसका शीर्षक था &#8220;लर्निंग विदाउट बर्डन&#8221; यानि &#8220;बिना बोझ की पढ़ाई&#8221;। इस कमेटी का अध्यक्ष मैं था। मंत्री जी चर्चा में रहे एक मसले, स्कूल बैगों के बढते वजन, से चिंतित थे।</p>
<p>इस रपट की अनेक बैठकों तथा सेमिनारों में व्यापक चर्चा हुई है, शिक्षा पर सेंट्रल एडवाइजरी कमेटी ने इस पर चर्चा के बाबत खास गोष्ठी की है। स्कूलों तथा शिक्षकों की संस्थाओं ने इस पर चर्चा और सेमिनार के आयोजन किये। संसद में इसके कार्यन्व्यन पर सवाल पूछे गये हैं और एन.सी.आर.टी में इस बाबत एक विशेष मॉनीटरिंग प्रकोष्ट की भी स्थापना की गई। फिर भी शालाओं की कार्यपद्धति में कोई स्पष्ट बदलाव नही दिखता। ज्यादातर बच्चे अभी भी भारी बैग लिये फिरते हैं। पाठ्यक्रमों में संशोधन नही हुए, कब क्या पढ़ाना है यह निर्णय लेने के लिये शिक्षकों को अधिक अधिकार नही दिये गये, रटन विद्या पर जोर कम नहीं हुआ, विषय को समझने पर जोर नहीं है और एक छात्र के जीवन में अब भी परीक्षायें, टेस्ट और स्पर्धाओं का बोलबाला है।</p>
<div id="pullQuoteR">ज्यदातर बच्चे यह मानते हैं कि ज्ञान दो तरह के होता है एक, जिसका असल ज़िंदगी से वास्ता है और दूसरा, जो स्कूल में अर्जित होता है।</div>
<p>कुछ लोग ये तर्क देंगे कि सीखना हमारे मिज़ाज के ही मुताबिक नहीं, कि हम एक निकृष्ठ प्रजाति है और ये कि हम केवल प्रशिक्षण के ही लायक है, ऐसा प्रशिक्षण जिसका पैकेज किसी ने पहले से ही तैयार कर रखा हो। ये भी कहा जा सकता है कि हमारे अधिकांश बच्चे जड़मति हैं और और उनके रहन सहन का तरीका ऐसी चीजों में अरूचि पैदा करता है जो सैद्धांतिक (एकेडेमिक) या वैचारिक (कनसेप्चुयल) हों। ये भी तर्क दिया जा सकता है कि ये सब जानते हुये ही हमारे शिक्षक और परीक्षण संस्थायें रटन विद्या पर जोर देते हैं।</p>
<p>जैसे ही हम रटन विद्या का विषय की समझ से साम्य करने लगते हैं हम ये निष्कर्ष निकालने लगते हैं कि शिक्षा का बच्चे की वातावरण की खासियत या ऐसे सवाल जवाबों से कोई नाता नहीं है जो बच्चा स्कूल से बाहर ग्रहण या प्रतिपादित करता है। बेशक हमारे अध्ययन से भी यही पता चला कि ज्यादातर बच्चे यह मानते हैं कि ज्ञान दो तरह के होता है एक, जिसका असल ज़िंदगी से वास्ता है और दूसरा, जो स्कूल में अर्जित होता है। बच्चों के एक बड़े तबके को समझने (कॉम्प्रिहेन्शन) के बिना सीखना बोझ सा लगता है और अगर माता पिता का दबाव ना हो या फिर उन्हें असाधारण शिक्षक और घर में पढ़ाई के उत्तम वातावरण का सौभाग्य प्राप्त ना हो तो वे स्कूल छोड़ देते हैं।</p>
<p>मुझे कई दफ़ा यह हैरत होती है कि जीवन से शिक्षा को अलग करने कि यह आदत कहीं हमारा सांस्कृतिक लक्षण तो नहीं जो हमें अपने अतीत से मिला हो। उँची जाति की शिक्षा की ब्राह्मण परंपरा में हम जीवन को अनेक मियादों में बाँटते हैं जिनमें से एक वक्त ऐसा होता है जब हम केवल ज्ञान अर्जित करते थे और शेष सारा जीवन युवावस्था की इसी सीख के सहारे यापन होता था। इसके सापेक्ष हमारे समाज ने विश्व और अनुभव से सीखने के महत्व को पहचाना और इसलिये उसके अधिकांश बच्चों को स्कूल से अलग रखा गया।</p>
<div id="pullQuoteR">औपचारिक शिक्षा की हमारे समाज में निहित यह प्रवृत्ति 19वीं सदी में मैकॉले की शिक्षा पद्धति से दृढ़ हुई जहाँ शिक्षा का उद्देश्य जीवन से संलाप नहीं बल्कि ऐसे हुनर सीखना था जिसमें हम दूसरों की बनाई मशीनों में फिट होकर उनको फायदा पहुँचा सकें।</div>
<p>शालेय जीवन का प्रयोजन शारीरिक श्रम के बिना जीवनयापन तथा जीवन की जद्दोजहद से दूरी बनाये रखना था। यह संभव है कि औपचारिक शिक्षा की हमारे समाज में निहित यह प्रवृत्ति 19वीं सदी में मैकॉले की शिक्षा पद्धति से दृढ़ हुई हो जहाँ शिक्षा का उद्देश्य जीवन से संलाप नहीं बल्कि ऐसे हुनर सीखना था जिसमें हम दूसरों की बनाई मशीनों में फिट होकर उनको फायदा पहुँचा सकें। चुनौतियों के अभाव में हमारी शिक्षा पद्धति ने श्रेष्ठता मापने के ऐसे मापदंडों का प्रयोग किया है जो या तो विदेशों से उधार ली गई हैं या फिर कुल प्राप्तांकों में आधे से भी कम प्रतिशत के आधार पर अंतर करने जैसे बेसिरपैर के पैमाने। ये तो हमारे युवाओं के लचीलेपन की दाद देनी होगी कि इनमें से कुछ के व्यक्तित्व हमेशा के लिये नष्ट होने से बच जाते हैं। पर कई ऐसे जिनमें तेज़ अनुबोधक (परसेप्टिव) शक्तियाँ या असाधारण सर्जनात्मक काबलियते थीं या तो असफल हो जाते हैं या फिर पढ़ाई छोड़ देते हैं।</p>
<p>भारत की पहचान बनाने वाली अधिकांश चीजें ऐसे लोगों द्वारा बनाई और संजोई गई हैं जिन्होंने औपचारिक शिक्षा तंत्र के बाहर से हुनर, संवेदनशीलता व शिल्प कौशल ग्रहण किये। हमारे समाज में ज़्यादातर हुनर प्रयोग व अवलोकन द्वारा सीखे जाते हैं। मैं यह नहीं कहता कि हमें बस ऐसे ही लोग चाहिये। हमें नई सामग्री, नई तकनीक, कंप्यूटर तथा सूचना आधार की बिल्कुल ज़रूरत है। पर मैं इस बात पर ज़ोर देना चाहता हूँ कि ज़मीन से जुड़े और हाथों से काम करने वालो लोगों को हमारी औपचारिक शिक्षा तंत्र से दूर रखकर हमने बहुत बड़ी बेवकूफी की है। हम अपने पाठ्यक्रम में बाहर से अर्जित ज्ञान, हुनर और काबलियतों को स्थान ही नहीं देते।</p>
<p>कई मौकों पर जब मैनें आयातित तकनीक से प्रभावित नौकरशाहों से ये ज़िक्र किया तो उन्होंने मुझ पर मुल्क के आधुनिकीकरण में बाधा डालने का आरोप जड़ दिया। मैं यही कहूंगा कि हमें शीघ्र ही हमारी शिक्षण संस्थाओं में दी जा रही पृथक और बंजर know why में वास्तविक काम और समाज की परंपराओं से अर्जित know how को मिलाने का यत्न करना चाहिये। केवल तभी हम उच्च योग्यता वाले आविष्कर्ताओं, इंजीनियरों तथा वैज्ञानिकों का निर्माण कर पायेंगे। और वास्तविक आधुनिकीकरण भी ऐसे ही होगा।</p>
<p class="note"><em>तहलका में पूर्व प्रकाशित <a href="http://www.tehelka.com/story_main29.asp?filename=op050507Real_Education.asp" target="_blank">इस अंग्रेज़ी लेख</a> का हिन्दी अनुवाद किया है देबाशीष चक्रवर्ती ने। पूर्वानुमति से प्रकाशित। छायाः <a href="http://trivialmatters.blogspot.com">अक्षय महाजन</a></em></p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2112&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-cover-yashpal/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>शिक्षा में आईसीटीः वक्त का तकाज़ा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-cover-ict</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-cover-ict#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:56:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अतानु  दे</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Education]]></category>
		<category><![CDATA[ICT]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507coverict/</guid>
		<description><![CDATA[दस लाख पाठशालायें जहाँ 90 फीसदी बच्चे 12वीं तक स्कूल ही छोड़ देते हैं। सालाना 3,50,000 स्नातक जिनमें महज 15 फीसद ही नौकरी के लायक होते हैं। केवल मुट्ठी भर लोगों के लिये ही शानदार काम कर रहे हमारे शिक्षा तंत्र में सुधार कैसे लाया जाये बता रहे हैं शिक्षाविद व अर्थशास्त्री <strong>अतानू दे</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>नोबल पुरस्कार विजयी एक अर्थशास्त्री के एक कथन कि भावानुवाद करें तो, &#8220;एक बार अगर आप भारतीय शिक्षा की बात करें तो आप कुछ और सोच ही नहीं सकते। यह विषय आप में विस्मय, क्रोध, नैराश्य, आशा और गहरा दुःख भर देता है।</p>
<p>भारत में पाठशालाओं की संख्या विस्मयकारी है, अनुमानतः दस लाख से ज्यादा, पर यह बेहद निराशाजनक बात है कि 90 प्रतिशत से भी ज्यादा भारतीय बच्चे 12वीं कक्षा तक पहुँचते पहुँचते स्कूल छोड़ देते हैं। जो बच्चे कॉलेज तक जा पाते हैं उनमें से भी कुछ ही बच्चे स्नातक बन पाते हैं।</p>
<p>हर साल कॉलेजों से स्नातक बननें वालों की 350000 की संख्या प्रभावोत्पादक है फिर भी हमारे महाविद्यालयों की गुणवत्ता इतनी निराशाजनक है कि हमारे स्नातकों में से महज 15 प्रतिशत ही नौकरी के लायक होते हैं। दुखद बात है कि जी.डी.पी का तकरीबन 8 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करने के उपरांत भी, यह तंत्र देश की अधिकांश जनता के लिये पूर्णतः असफल साबित हुआ है और फिर भी हम हमारे बेहद सफल एन.आर.आई का ज़िक्र सुनते हैं जो आई.आई.टी जैसे हमारे सर्वोत्कृष्ट संस्थानों के पूर्वस्नातक रहें। जाहिर तौर पर इस तंत्र ने मुट्ठी भर लोगों के लिये जितना शानदार काम किया है, देश के बहुसंख्य लोगों के लिये यह उतना ही त्रासिक सिद्ध हुआ है।</p>
<div id="pullQuoteR">प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा का आरंभ इसकी व्यवस्था में सरकार के सम्मिल्लित होने से हो जाता है। सार्विक प्राथमिक शिक्षा जैसी महत्त्वपूर्ण गतिविधि को भ्रष्ट और अयोग्य नौकरशाहों के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता।</div>
<p>इस तंत्र की असफलता की जड़ में जाने के लिये हमें शुरुवात से शुरु करना होगा। प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा का आरंभ इसकी व्यवस्था में सरकार के सम्मिल्लित होने से हो जाता है। सार्विक प्राथमिक शिक्षा जैसी महत्त्वपूर्ण गतिविधि को भ्रष्ट और अयोग्य नौकरशाहों के भरोसे छोड़ा नहीं जा सकता। आज की तारीख में निजी क्षेत्र को शिक्षा से मुनाफ़ा कमाने के लिये इजाज़त नहीं है। केवल मुनाफ़े का बारे में न सोचने वाली ट्रस्ट को शिक्षा क्षेत्र के् प्रवेश की अनुमती है। शिक्षा पर नियंत्रण हेतु काफी कड़े कानून और नियम हैं। अगर आप शिक्षा पर पैसे लगाते हैं तो उससे कमाई के बारे में भूल जायें। इन नो प्रॉफ़िट संस्थानों को भ्रष्टाचार से भी परेशानी होती है। अगर वास्तव में एक खरे उत्पाद का दक्षता पूर्ण प्रदाय करना है तो प्रतिस्पर्धा और निजी क्षेत्र कि भागीदारी ही एकमात्र विकल्प है, वह भी केवल प्राथमिक शिक्षा ही नही वरन शिक्षा के हर स्तर पर।</p>
<p>यह सच है कि निजी क्षेत्र उन्हीं सेग्मेंट्स को सेवा प्रदत्त करेगा जिनमें वाजिब कीमत देने कि कुव्वत है। यहाँ पर सरकार की भूमिका होनी चाहिये कि वह ऐसे लोगों को आर्थिक मदद दे जो यह खर्च उठाने का सामर्थ्य नहीं रखते। यहाँ &#8220;प्रतिस्पर्धा&#8221; महत्त्वपूर्ण शब्द है।‍‍‍‍‍‍ निजी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को केवल इजाजत ही नहीं बल्कि बढ़ावा मिलना चाहिए। केवल प्रतियोगिता के बल पर ही हर किसी के लिये शिक्षा सुलभ करने का महती कार्य पूर्ण करना संभव है।</p>
<p>निजी और सार्वजनिक क्षेत्र की कार्य शैली में कई असमानतायें हैं। निजी क्षेत्र के संस्थानों पर बजट का कड़ा दबाव रहता है और उन्हें मुनाफा भी कमाना होता है। और उन्हें मुनाफा भी तभी हो सकता जब उनके द्वारा प्रदत्त सेवा से फायदे लागत से ज्यादा हों। निजी क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा से यह मुनाफा भी मामूली नही रहता।</p>
<p>प्रतिस्पर्धात्मक माहौल में बचे रहने के लिये निजी क्षेत्र &#8220;इन्नोवेशन&#8221; यानी अभिनव परिवर्तन लाने को विवश हो जाती है। शिक्षा के क्षेत्र में अभिनव परिवर्तन की सख़्त दरकार हैं और जब तक सरकार इसमें शामिल है यह तत्व नदारद ही रहेगा। आमतौर पर मोनोपोली यानी एकाधिकार संस्थानों के पास अभिनव परिवर्तन करने का कोई कारण नही होता और यह सैधान्तिक रूप से असंभव है कि ऐसे संस्थान इनोवेट करें। जब तक शिक्षा पर सरकार का एकाधिकार बरकरार रहेगा, अभिनव परिवर्तन की उम्मीद रखना बेमानी होगा।</p>
<p>तो पॉलिसी का नुस्ख़ा बड़ा सीधा सा है। <strong>पहलाः </strong>शिक्षा क्षेत्र को स्वाधीन करें और निजी क्षेत्र की भागीदारी और स्पर्धा को बढावा मिले। <strong>दूसराः</strong> सार्विक शिक्षा हेतु सेकेन्डरी स्कूल स्तर तक जरूरतमन्द छात्रों को आर्थिक सहायता दी जाय। <strong>तीसराः</strong> उच्च शिक्षा की पात्रता रखने वाले छात्रों को ऋण सहायता दी जाय और चौथाः जो उच्च शिक्षा की पात्रता नहीं रखते उन्हें व्यावसायिक शिक्षा के विकल्प मुहैया हों। निजीकरण के मामले में अमरीका काफी सफल रहा, वहाँ के सबसे लोकप्रिय विश्वविद्यालय निजी क्षेत्र से हैं। स्टैनफॉर्ड जैसे ये संस्थान पूर्णतः पेशेवर तरीके से चलाये जाते हैं और मुनाफ़ा भी कमाते हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">समय आ गया है कि पुस्तकों को सस्ते विकल्पों जैसे डिजिटल प्रारूप से बदला जाये। ज्ञान महज़ टेक्सटुअल न होने से पठन सामग्री और भी समृद्ध हो सकती हैं। अब आडियो, विडियो, टेक्सट और ग्राफिक्स के रूप में हाईपरलिंक्ड मसौदे का निर्माण संभव है।</div>
<p>शिक्षा क्षेत्र में सबसे उचित अभिनव परिवर्तन होगा इंफॉर्मेशन एंड कम्यूनिकेशन टेक्नोलॉजी टूल्स (आई.सी.टी) का यानी सूचना तथा कम्युनिकेशन तकनीकी टूल्स का प्रयोग। आई.सी.टी में हाल के दिनों में अपूर्व प्रगति हुई हैं। शिक्षा को किसी भी और क्षेत्र की बजाय आई.सी.टी से ज्यादा फायदा मिल सकता है क्योंकि इससे गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की लागत में कमी लाई जा सकती है। शिक्षा में आई.सी.टी का प्रयोग उतना ही परिवर्तनकारी  होगा जितना की शिक्षा के पहले आंदोलन में पुस्तकों की खोज रही। आई.सी.टी OLTP बच्चों को लेपटॉप से महंगे खिलौने देने के मुकाबले ज्यादा विस्तारित तकनीक और औजारों का समुच्य है।</p>
<p>पुस्तकों की खोज से शिक्षा के खर्च में कमी आई क्योंकि ये समय और दूरी के नियमों को लांघकर जानकारी दे पाते थे और इनको पुर्नउत्पादन करना भी सस्ता पड़ता था। एक ऐसे तंत्र कि तुलना में जहाँ इंसानों को ज्ञान के प्रसार में सीधे शामिल होना पड़ता था, किताब एक अभिनव परिवर्तन था। अब समय आ गया है कि पुस्तकों को अधिक सस्ते विकल्पों जैसे डिजिटल प्रारूप से बदला जाये। डिजिटल जानकारी की पुस्तकों के मुकाबले अनेकों फायदों में से एक यह है कि ज्ञान महज़ टेक्सटुअल यानि न शाब्दिक न  होने से पठन सामग्री और भी समृद्ध हो सकती हैं। अब आडियो, विडियो, टेक्सट और ग्राफिक्स के रूप में हाईपरलिंक्ड मसौदे का निर्माण संभव है।</p>
<p>यह अंदाज़ा लगाना मुशकिल नही कि आई.सी.टी के प्रयोग से शिक्षा में परिवर्तन आएगा। इससे बड़े व्यावसायिक फायदों की संभावनाएं तो हैं ही, एक अच्छा काम करने का मौका भी है। कल्पना की कोई सीमा नही होती।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2111&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-cover-ict/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>बुलबुले के घर?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1206-cover-indian-property-bubble</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1206-cover-indian-property-bubble#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 13:17:33 +0000</pubDate>
		<dc:creator>जगदीश भाटिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Bubble]]></category>
		<category><![CDATA[Economics]]></category>
		<category><![CDATA[Property]]></category>
		<category><![CDATA[Real Estate]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1206coverindian-property-bubble/</guid>
		<description><![CDATA[क्या भारतीय प्रॉपर्टी बाज़ार की कीमतों में अव्यावाहारिक उछाल बाजार में मांग और पूर्ति के नियमों पर आधारित है, या फिर एक फूलते बुलबुले का हिस्सा है जो जब भी फटे तबाही ही बरपा करेगा? आमुख कथा में <strong>जगदीश भाटिया</strong> और <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong> के खोजी आलेख को पढ़िये और निर्णय लीजिये।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 3px; margin-bottom: 3px;" title="Real Estate Bubble" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/story-big-real-estate.jpg" border="0" alt="Real Estate Bubble" hspace="2" vspace="3" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">&#8220;य</div>
<p>दि आपने होम लोन लिया है तो आप को आयकर में काफी छूट मिल सकती है, आज के समय में कर्ज़ लेकर घर लेना बहुत ही फायदेमंद हो सकता है।&#8221; कल जब मैं अपने काम के सिलसिले मैं श्रीमति नायर (बदला हुआ नाम) से मिला तो उन्हें सलाह दे रहा था। श्रीमति नायर दिल्ली के नजदीक गुड़गांव में रहती हैं तथा वहीं स्थित एक बड़ी सूचना प्रोद्योगिकी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं। मेरा काम लोगों को टैक्स नियोजन और बेहतर निवेश के विकल्पों के बारे परामर्श देने का है। &#8220;आप यदि घर के लिये लोन लेते हैं तो एक वित्त वर्ष में आपके द्वारा होमलोन पर दिये गये ब्याज पर आप धारा 24(b) के अंतर्गत डेढ़ लाख रुपये तक तथा मूलधन की अदायगी पर धारा 80(c) के अंतर्गत एक लाख रुपये तक कर योग्य आय में कटौती के हकदार होते हैं&#8221;, मैंने उन्हें बताया।</p>
<p>&#8220;हम खोज में लगे हैं भाटिया साहब, मगर कोई भी मनपसंद मकान एक डेढ़ करोड़ से कम दाम में उपलब्ध ही नहीं है।&#8221; मायूस हो कर श्रीमति नायर ने कहा।</p>
<div id="pullQuoteR">शहर चाहे गुड़गांव हो या बंगलूर, पुणे या हैदराबाद। प्रॉपर्टी की कीमतें पिछले तीन सालों में दो से तीन गुनी बढ़ गई हैं।</div>
<p>श्री नायर भी एक अन्य बड़ी आईटी कंपनी में ही प्रोजेक्ट मैनेजर हैं मगर पति पत्नी दोनों मिल कर भी अपनी ही पसंद का घर ले पाने में असमर्थ हैं। लगभग यही कहानी आज कई घरों में देखी जा सकती है। शहर चाहे गुड़गांव हो या बंगलूर, पुणे या हैदराबाद। प्रॉपर्टी की कीमतें पिछले तीन सालों में दो से तीन गुनी बढ़ गई हैं और इस तेज़ी में ठहराव के कोई संकेत नहीं दिख रहे। तो हैरत नहीं होनी चाहिये अगर आपको पुणे के कोरेगाँव पार्क इलाके में ब्रोकर एक करोड़ का बंगला दिखाये। हाल ही <a href="http://www.mumbaipropertyexchange.com/newsdetail.asp?news=225" target="_blank">खबर</a> के अनुसार दक्षिणी मुंबई में समुद्र की ओर मुंह बाये एक अपार्टमेंट 63,000 रुपये प्रति वर्गफुट के दर से बिकी, इसने तो न्यूयॉर्क की कीमत को भी धोबी पछाड़ दे दिया। मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता और चैन्नई जैसे महानगरों में कीमतें हर साल 30 से 40 प्रतिशत बढ़ती रही हैं। नीम चढ़े करेले की तर्ज़ पर होम लोन की ब्याज़ दरों में भी लागातार और बेलगाम बढ़त होती जा रही है, यह रपट प्रकाशित होने के कुछ दिन पहले ही, वित्त मंत्री की सारकारी बैंकों को कर्ज़ दरों पर नियंत्रण रखने की सलाह को लगभग मुंह चिढ़ाते हुये एक निजी बैंक ने अपनी होम लोन की ब्याज़ दर में 1 प्रतिशत की बढ़त की घोषणा कर दी। जनवरी 2007 में महंगाई दर अपने चरम पर है।</p>
<h1>क्या ये बुलबला है या&#8230;</h1>
<p>क्या प्रॉपर्टी की कीमतों में यह अव्यावाहारिक उछाल बाजार में मांग और पूर्ति के नियमों पर आधारित है, या फिर सारी मांग और बढ़ती कीमतें एक फूलते बुलबुले का हिस्सा है जो जब भी फटे तबाही ही बरपा करेगा। वित्त सलाहकार <strong>संदीप शानबाग</strong> कहते हैं, &#8220;यह विश्वास से कह सकना तो मुश्किल है कि यह <em>रीयल एस्टेट बबल</em> है या नहीं क्योंकि ज़मीन सीमित रूप से उपलब्ध है जबकि बढ़ती जनसंख्या के चलते उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ रही है, ऐसे में भूसंपत्ति निवेश में बढ़त तो जारी रहेगी।&#8221;</p>
<div style="margin: 10px; padding: 10px; background: #e5e5e5 none repeat scroll 0% 0%; width: 250px; float: right;">
<h1 style="text-align: center;">बुलबुला रे बुलबुला</h1>
<div style="text-align: center;"><img title="Bubble" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/bubble.gif" border="0" alt="Bubble" hspace="8" vspace="3" width="175" height="174" align="middle" /></div>
<p><em><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Real_estate_bubble" target="_blank">रीयल एस्टेट बबल</a></em> या <em>प्रॉपर्टी बबल</em> या <em>हाउसिंग बबल</em> स्थानीय व वैश्विक भूसंपत्ति बाजार में समय समय पर बनता रहता है। साबुन के बुलबुले के समान ही ये बबल भी तेज़ी से बनते हैं, भूसंपत्ति और मकानों की कीमतों में तेज़ बढ़त होती है। जब इस वृद्धि को कुल आय और अन्य आर्थिक तत्वों के मुकाबले बनाये रखना असंभव हो जाता है तो फिर कीमतें धाराशायी होने लगती हैं, जिसे हाऊस प्राईस क्रैश या मार्केट करेक्शन कहा जाता है। किसी भी ऐसे बुलबुले का पता अक्सर इस ध्वंस के बाद ही पता चल पाता है। हालांकि ऐसे बुलबुले का धमाका स्टाक बाजार जैसा तेज़ नहीं होता, क्योंकि लोग भूसंपत्ति बेचना बंद कर देते हैं। अगर महंगाई दर कम रहे तो कीमतें एकदम से नीचे भी गिर सकती हैं अन्यथा ये 3 से 5 सालों तक जस की तस बनी रहती हैं।</p>
<p>इकॉनामिस्ट पत्रिका ने &#8220;मकानों की कीमतों में विश्वव्यापी बढ़त को इतिहास का सबसे बड़ा बुलबुला&#8221; <a href="http://www.economist.com/opinion/displaystory.cfm?story_id=4079027" target="_blank">करार दिया है</a> । ऐसे बुलबुलों की उपस्थिति अमरीका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, चीन जैसे देशों के अलावा भारत में भी होना माना गया है। अमरीकी बाजार में सन 2001 से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/US_property_bubble" target="_blank">हाउसिंग बबल</a> का होना माना गया है, खास तौर पर कैलिफॉर्निया, फ्लोरिडा और न्यूयॉर्क जैसे घनी आबादी वाले क्षेत्रों में। अमेरिकी बुलबुले के होने के नेपथ्य में जिन कारणों का होना माना जाता है उनमें प्रमुख है घर खरीदने का उन्माद, यह धारणा कि गृहसंपत्ति बिना जोखिम का लाभप्रद निवेश है, मीडिया में भूसंपत्ति की लोकप्रियता. कम ब्याज़ दर और 2000 में स्टॉक व डॉटकॉम बुलबुले के फूटने के बाद स्टॉक में निवेश से डर जैसे कारण। यदि आप तुलना करें तो काफी सारे कारण आपको भारतीय परिस्थितियों से मिलते जुलते लगेंगे। कोरिया में एशियाई वितंतिय संकट के तुरंत बाद मकानों की की मतों में 45 प्रतिशत तक गिरावट आ गई। हाँगकाँग में भी 1998 महंगे घरों की कीमतों में 58 प्रतिशत गिरावट आई थी।</p>
<p>बुलबुले केवल भूसंपत्ति बाजार में ही नहीं अन्य क्षेत्रों में भी देखे गये हैं, जैसे कि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dot-com_bubble" target="_blank">डॉटकॉम बबल</a> जिसमें 1995-2001 के दौरान इंटरनेट क्षेत्र की कंपनियों की स्टॉक कीमतों में अभूतपूर्व बढ़त देखी गई। इस दौरान वेन्चर कैपीटल की बदौलत डॉटकॉम कंपनियां कुकुमुत्तों के तरह उगीं। 2001 में अमेरिका आनलाउन द्वारा विश्व की सबसे बड़ी मीडिया कंपनी टाईम्स वार्नर के अधिग्रहण के बाद जब ये बुलबुला फूटा तो जाने कितनी कंपनियां रातों रात दिवालियां हो गईं और न जाने कितने ही सूचना प्रोद्योगिकी कर्मचारियों, जिनमें एचवन वीसा पर गये अनेक भारतीय भी शुमार थे, को अगली सुबह पिंक स्लिप थमा दी गई।</p>
<p>गत वर्ष 2006 में अंतर्जाल की दुनिया में कई बदलाव आये। वेब २ के पदचाप सुनाई देने लगे हैं। पर यूट्यूब के गूगल और स्काईप के ईबे जैसे अनेकों अधिग्रहण के पश्चात दबे शब्दों में कहा जाता है कि कहीं कथित वेब 2.0 एक नये बुलबुले के बनने का संकेत न हो।</p>
</div>
<p>यह सच है कि पारंपरिक रूप से भारतीय भौतिक संपत्ति जैसे जमीन और सोने में निवेश करना पसंद करते रहे हैं पर क्या किसी प्रगतिशील अर्थव्वस्था के लिये आसमान छूती भूसंपत्ति दर अच्छी बात है? कई यह मानते हैं कि भूसंपत्ति और भूनिर्माण मे तेज़ी का मुख्य कारण है अप्रवासी भारतीयों के निवेश का अंतर्वाह और काले धन का प्रादुर्भाव। 2005 में अप्रवासी भारतीयों का कुल निवेश 90,000 करोड़ रुपये था। संदीप सहमती जताते हैं, &#8220;भारतीय बाजार में प्रवासी व अप्रवासी भारतीय दोनों ही अपने प्रयोग के लिये नहीं बल्कि निवेश के रूप में भूसंपत्ति खरीद रहे हैं। इस नकली माँग की वजह से असल उपभोक्ता को निचुड़ना पड़ रहा है।&#8221; कई भवन निर्माता तथा इस व्यावसाय में लगी कंपनियों के अधिकारी स्वीकार करते हैं कि जमीन की कीमतें वास्तविक नहीं हैं।</p>
<p><a href="http://meghraj.com" target="_blank">ट्रैमल क्रो मेघराज प्रॉपर्टी कंसलटेंट्स</a> के प्रबंध निदेशक <strong>अनुज पुरी</strong> मानते हैं कि दक्षिणी मुंबई के नरिमन पाईंट व वर्ली, तथा नवी मुंबई में अधिमुल्यन के संकेत हैं पर यह स्वीकारने को तैयार नहीं कि यह बुलबुले के चिन्ह हैं। वे तो यहाँ तक कहते हैं कि माँग के अनुपात में ही कीमतें बढ़ रही हैं न कि निवेशकों या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Speculation" target="_blank">स्पेक्यूलेशन</a> की वजह से। पर इंडीयन एक्सप्रेस की <strong>सुचेता दलाल</strong> ने अपने <a href="http://www.suchetadalal.com/articles/display/80/2322.article" target="_blank">हालिया लेख</a> में ऐसे सभी विशेषज्ञों की राय को खारिज करते हुये स्पष्ट लिखा कि भारतीय रियेलटी बाज़ार में खतरनाक बुलबुले के सारे संकेत हैं। उन्होंने आशंका जताई है कि भूसंपत्ति तथा शेयर बाजार की कीमतों में बेतुके उफान के नेपथ्य में लोगों की मिलीभगत और निहित स्वार्थ है।</p>
<div id="pullQuoteR">इंडीयन एक्सप्रेस की <strong>सुचेता दलाल</strong> ने आशंका जताई है कि भूसंपत्ति तथा शेयर बाजार की कीमतों में बेतुके उफान के नेपथ्य में मिलीभगत और निहित स्वार्थ है।</div>
<p>रीयल एस्टेट का बाजार का स्पेक्यूलेटिव यानी अटकलबाजी पर आधारित हो जाना निश्चित ही खतरनाक है। जो लोग केवल निवेश करने के लिये तथा बाद में ऊंची कीमतें हासिल करने के लिये प्रापर्टी खरीद रहे हैं वे लोग कीमतें बढ़ने पर इनको बेचेंगे ही। उस हालत में यह बुलबुला अवश्य फूटेगा। ऐसे कई और कारण दृष्टव्य होते हैं जिससे ये कीमतें दीर्घकालिक योजना में व्यवाहरिक नहीं लगती। सामान्य खरीददार के मामले में यदि किराये के लिहाज़ से देखें तो मकान की कीमतों के मुकाबले भाड़ा काफी कम है। तिस पर जोखिम काफी है, लोग मकान की कुल कीमत का 80 फीसदी तक हिस्सा गृह रृण से अदा करते हैं। फर्ज़ करें कि बैंक की ब्याज दर में सहसा भारी बढ़त हो जाये या भूसंपत्ति की कीमतें में भारी गिरावट आ जाये या फिर खरीददार की तनख्वाह ही कम हो जाय तो कई घरों के बजट औंधे मुंह जा गिरेंगे।</p>
<p>पुणे जैसे शहरों में शहर के केंद्र से काफी दूर बसे इलाकों में भूसंपत्ति अमरीका के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Urban_sprawl" target="_blank">सबअर्बन स्प्रॉल</a> या <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Exurb" target="_blank">एक्ज़र्ब</a> की तर्ज पर एनेक्स जैसे जुमले जोड़ कर काफी कम दामों में बेचे गये, और बेचे जा रहे हैं, कारक है <em>इंफ्रास्ट्रक्चर</em> और आवागमन के साधनों का अभाव। अनुमान लगायें कि अगले पाँच सालों में यह अभाव दूर हो जाये तो शहर के केंद्र में रहने वाले असंख्य लोग जो कई गुना अधिक भाड़ा देकर रहते आये हैं शर्तिया इन बाहरी इलाकों में स्थानांतरित होना पसंद करेंगे और प्रॉपर्टी की कीमतें पाताल का रूख करेंगी।</p>
<p>ये सारे अनुमान किताबी भले लगें पर ये एक अनियंत्रित बाजार की ओर संकेत करते हैं जिसका उंट करवट बदले तो कई परिवारों के जीवन में तूफान और अशांति ला सकता है।</p>
<h1>रेगुलेटर की कमी</h1>
<div id="pullQuoteR">जिस प्रकार शेयर बाजार पर सेबी नज़र रखती है, हाऊसिंग उद्योग में भवन निर्माताओं, कंपनियों और दलालों को नियंत्रित करने के लिये कोई सरकारी प्राधीकरण नहीं है।</div>
<p>हाऊसिंग उद्योग में सबसे बड़ी कमी किसी भी प्रकार के रेगुलेटर या नियामक का न होना है। जिस प्रकार शेयर बाजार पर सेबी नज़र रखती है उसी प्रकार हाऊसिंग उद्योग में कार्यरत भवन निर्माताओं, कंपनियों और दलालों को नियंत्रित करने के लिये अलग से कोई सरकारी अथॉरिटी (प्राधीकरण) नहीं है। कोई भी एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बना कर जमीन अथवा मकान बेचने के लिये ग्राहकों से पैसे वसूलना शुरू कर सकता है। ग्राहक के पास यह जानने का कोई साधन नहीं होता है कि जो कंपनी प्रापर्टी के लिये पैसे वसूल रही है वह जाली तो नहीं है। कंपनी क्या वास्तव में उस प्रापर्टी को बेचने कि अधिकारी है? कंपनी जितनी प्रापर्टी बेच सकती है कहीं उससे अधिक बुकिंग तो नहीं कर रही? जो कीमतें वो वसूल कर रही है वह उचित हैं या नहीं?</p>
<p>इसी प्रकार दलालों पर भी नियंत्रण बहुत आवश्यक है। दलालों की कीमतें तथा सेवा शुल्क निर्धारित करने चाहियें। दलाल अमूमन 2% से लेकर 4% तक शुल्क लेते हैं जो कि बहुत अधिक है। तिस पर ज्यादातर दलाल न तो पेशेवर होते हैं और न ही कानूनों के जानकार। एक बार सौदा पट जाने के बाद ये लोग अपनी जिम्मेदारी से भी हाथ खींच लेते हैं। दलालों का न तो कोई पंजीकरण होता है और न ही कोई प्रशिक्षण। कई बार कई स्थानों पर भवन निर्माता माफिया काम करता है और इनको राजनैतिक संरक्षण भी प्राप्त होता है।</p>
<p>संदीप शानबाग मानते हैं कि रीयल एस्टेट का क्षेत्र लगभग अनियंत्रित है। उनका कहना है, &#8220;बेईमान तत्वों को इस समीकरण से दरकिनार करने का एकमात्र तरीका है कि खरीददार निर्माण की गुणवत्ता और निर्माता के रसूख़ और पिछले कार्य का ध्यान रखें। एचडीएफसी जैसी हाउसिंग फाईनैंस कंपनियाँ अच्छे बिल्डरों की परियोजनाओं को ही समर्थन देती हैं। फिर भी कोई परेशानी में फंस जायें तो न्यायालय की शरण में जाने के अलावा कोई चारा नहीं होता। और हमारी कानून व्यवस्था की रफ़्तार को देखते हुये इलाज से बेहतर उपाय है, बचाव।&#8221;</p>
<h1>केवल बड़ी ईकाईयों का निर्माण</h1>
<div id="pullQuoteR">निजी भवन निर्माता अधिक लागत वाले लग्जरी आपार्टमेंट बनाने में ज्यादा रुची दिखा रहे हैं तथा मध्यमवर्ग की जरूरतों को अनदेखा कर रहे है।</div>
<p>मकानों अथवा रिहाइशी इकाइयों का निर्माण स्थानीय सामाजिक अथवा आर्थिक आवश्यकताओं का ध्यान न रख कर केवल निजी फायदों तथा वित्तीय लाभ को देख कर बनाये जाते हैं। यहां तक कि विभिन्न शहरी विकास प्राधिकरण भी अपनी इन जिम्मेदारियों को नहीं समझते। शहरों में जहां स्लम तथा झुग्गी झोपड़ियों की समस्या है वहां भी ये प्राधिकरण छोटी इकाइयों का निर्माण कर सस्ते घर उपल्ब्ध करवाने में नाकाम रही हैं। सरकारी मास्टर प्लानों में भी यह दूरदर्शिता देखने को नहीं मिलती है। जहां कुछ एक छोटी इकाइयां बनायी जाती हैं उन्हे बिचौलिये हथिया लेते हैं और वास्तविक जरूरतमंद तक यह नहीं पहुंच पातीं।</p>
<p>निजी भवन निर्माता भी अधिक लागत वाले लग्जरी आपार्टमेंट बनाने में ज्यादा रुची दिखा रहे हैं तथा मध्यमवर्ग की जरूरतों को अनदेखा कर रहे है। इसका नतीजा यह हो रहा है कि लग्जरी इकाइयां तो कम बिक रही हैं पर अधिक बन रही हैं तथा मध्यम श्रेणी की इकाइयां कम बन रही हैं और उनकी मांग अधिक है, नतीजा कीमतों में अनाप शनाप बड़ोत्तरी। निम्न वर्ग के लिये निजी भवन निर्माता कुछ बनायेंगे इसकी तो हम उम्मीद भी नहीं कर सकते। <a href="http://indianeconomy.org" target="_blank">इंडियन इकॉनॉमी ब्लॉग</a> में सहलेखक<strong> अर्जुन स्वरूप</strong> बताते हैं कि आवासी और व्यवसायिक प्रॉपर्टी में <em>ज़ोनिंग</em> (यानि किस स्थान पर किस किस्म की इमारत बने इस का बंटवारा) भी एक बड़ी समस्या है, ज़्यादातर जगहों पर आवासी ज़मीन पर व्यावसायिक इमारत सब नियमों को ताक पर रख खड़ी कर दी जाती है और इससे कीमतें और बढ़ती हैं।</p>
<h1>कागजी कार्यवाही में सुधारों की जरूरत</h1>
<p>यदि आपने फिल्म &#8216;खोसला का घोसला&#8217; देखी हो तो जाना होगा कि किस प्रकार भ्रष्टाचार और मिलीभगत के चलते प्रापर्टी के कागजों में फर्जीवाड़ा करके दूसरों की प्रापर्टी हथिया ली जाती है। इस क्षेत्र में जल्द से जल्द सुधार लाने की आवश्यकता है। कभी काले पैसे के लेनेदेन को छिपाने के लिये तो कभी रजिस्ट्रेशन फीस को बचाने के लिये वास्तविक कीमत से कहीं कम की <em>सेल डीड</em> बनाई जाती है। हैरानी तो इस बात की है कि लोन देने वाले बैंक भी जानते हैं कि प्रापर्टी की खरीददारी में भुगतान काले तथा सफेद धन दोनों में अलग अलग किया जाता है। प्रापर्टी की वास्तविक कीमत कुछ और होती है तो कागजों पर कुछ और। जिन क्षेत्रों में <em>पॉवर ऑफ अटार्नी</em> पर प्रापर्टी के सौदे होते हैं वहां का तो भगवान ही मालिक है।</p>
<h1>आर्थिक सामर्थ्य के बदलते समीकरण</h1>
<div id="pullQuoteR">नया उपभोक्ता वर्ग भूसंपत्ति की कीमतों को पूँजीनिवेश न मानकार केवल ईएमआई और कर्ज़ के पैमाने पर ही तौलता है।</div>
<p>निरंतर ने भूसंपत्ति से संबंधित सवाल <a href="http://globaleconomydoesmatter.blogspot.com/2007/01/property-bubble-in-india.html" target="_blank">ग्लोबल इकॉनामी मैटर्स</a> के दल के सामने भी रखा। स्पेन के <a href="http://www.edwardhugh.net" target="_blank">एडवर्ड ह्यू</a> भी बुलबुले की बात से सहमत नहीं। पर उनके दल के वेंकट ने बड़ी रोचक बात सामने रखी वह थी एक नये उपभोक्ता वर्ग के उदय की। हम हमेशा परंपरागत उपभोक्ताओं की बात सोचते हैं पर यह नया वर्ग भूसंपत्ति की कीमतों को पूँजीनिवेश न मानकार केवल ईएमआई और कर्ज़ के पैमाने पर ही तौलता है। कुछ यही कारण <em>आटोमोबील</em> क्षेत्र में देखा गया जहाँ महँगी गाड़ियाँ, भले कर्ज़ के भरोसे हो, ज़्यादा बिक रही हैं। कुछ ऐसा ही हाल भारतीय रीयल एस्टेट का भी हो चला है, आम पहुँच के मकानों की बनिस्बत <em>डीलक्स</em> व <em>सुपर डीलक्स</em> निर्माण हो रहे हैं। एहडीएफसी के चेयरमैन <a href="http://www.ft.com/cms/s/80ecca54-af00-11db-a446-0000779e2340.html" target="_blank">दीपक पारेख ने भी कहा</a> , &#8220;रीयल एस्टेट का वास्ता वाजिब कीमतों से होना ही चाहिये, एक या दो करोड़ के घर बनाने का क्या लाभ जब लोगों के पास कीमतें अदा करने लायक संपदा ही न हो&#8221;।</p>
<h1>क्या सुधार होगा?</h1>
<p>यह सवाल तो सभी की ज़बां पर है। क्या कीमतों में यह आतिशी बढ़त कम होगी? क्या कीमतें भी कम होंगी? अनुज पुरी का जवाब काफी प्रत्याशित है कहते हैं कि कीमतों की वृद्धि में कमी तभी आ सकेगी जब निर्माण माँग से टक्कर ले सकें। वेंकट कहते हैं, &#8220;हमें इसकी परवाह नहीं होनी चाहिये क्योंकि भारत की जीडीपी बढ़त बढ़िया है और लोगों की आय में कमी के कोई संकेत नहीं दिखते। ऐसे में वाजिब कीमत का सवाल कोई पूछ नहीं रहा, जब तक <em>पार्टी</em> चल रही है मौज करो।&#8221;</p>
<p>दीपक पारेख के हालिया बयान से यह बात सामने आई थी कि बाजार में कुछ सुधार होगा। बैंक परेशान हैं क्योंकि जमा के मुकाबले कर्ज़ की बढ़त तेज़ है और यह कारण बन रहा है ब्याज़ दरों मे बढ़त का जिससे भारत की अरथव्यवस्था की रफ़्तार भी धीमी होगी। तो विशेषज्ञों की राय मानी जाय तो भूसंपत्ति बाजार में गिरावट तो नहीं पर जल्द ही स्थिरता जरूर आयेगी। पर <a href="http://indianeconomy.org/2006/12/19/the-indian-productivity-miracle/" target="_blank">ऐसे लोग</a> भी हैं जो यह मानते हैं कि लंबी रेस में भारतीय अर्थव्यवस्था को ऐसी स्थिति से कोई खतरा नहीं।</p>
<p>प्रापर्टी के बजार में आम उपभोक्ता शहरी विकास प्राधिकरणॊं मे व्याप्त भ्रष्टाचार तथा भवन निर्माताओं, भूमाफिया तथा उनके राजनैतिक आकाओं की मिलीभगत से त्रस्त है। तिस पर बाजार में तांडव करती कीमतें आग में घी का काम कर रही हैं। मकान की खरीद में सारी उम्र की कमाई और जिंदगी भर के सपने लगते हैं। ध्यान रहे कहीं आपके सपने बाजार की टेढ़ी और निर्दयी चाल के नीचे कुचले न जायें।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2110&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1206-cover-indian-property-bubble/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>4</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>एक दहकते शहर की दास्तान</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-cover-centralia</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-cover-centralia#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 07:09:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Centralia]]></category>
		<category><![CDATA[Coal]]></category>
		<category><![CDATA[Coal Mine]]></category>
		<category><![CDATA[Jharia]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Underground Fire]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006covercentralia/</guid>
		<description><![CDATA[धरती के अनगिनत दरारों से उफनती गर्म ज़हरीली गैसें, ज़मीन इतनी गर्म कि जूते के तले गल जायें, हवा साँस लेने के लिये नाकाफी। जैसे दोज़ख उतर आया हो धरा पर। सेंट्रालिया एक ऐसा शहर है जहाँ भूमीगत खदानों की ऐसी ही आग ने वहाँ के बाशिंदो से उनकी ही ज़मीन हड़प ली। आमुख कथा में पढ़िये सेंट्रालिया जा चुके <strong>अतुल अरोरा</strong> का लोमहर्षक आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/story-big-centralia.jpg" border="0" alt="सेन्ट्रालिया" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">य</div>
<p>ह किसी भयानक दुःस्वप्न जैसा ही है। धरती के सीने पर उकेरी अनगिनत दरारों से उफनती गर्म ज़हरीली गैसें, ज़मीन इतनी गर्म कि आपके जूते के तले गल जायें, हवा साँस लेने के लिये नाकाफी। नज़ारा कुछ यों कि जैसे दोज़ख उतर आया हो धरा पर।</p>
<p>यह किसी फंतासी फिल्म की पटकथा नहीं, हक़ीकत है। यह है दुनिया भर में सेंकड़ों कोयला खदानों में लगी बेकाबू भूमीगत आग, जो बरसों पृथ्वी के गर्भ में सुलगती रहती है और इंसान और वनस्पति का पास फटकना नामुमकिन कर देती है। ऐसी ही एक जगह है अमरीका स्थित सेन्ट्रालिया।</p>
<p>सेन्ट्रालिया शहर 1941 में बसा था। कोयला खनन इसकी जीवन रेखा थी। लिथुआनिया, पोलैन्ड, इंग्लैड और जर्मनी से लोग यहाँ आकर बसे थे। करीब दो हजार बाशिंदो का यह शहर तब दरवाजे बिना ताले लगाये छोड़ने का आदी था। एक आम भारतीय कस्बे की तरह यहाँ भी लोगों को एक दूसरे के दुःख सुख में हाथ बँटाते देखा जा सकता था। हर सुबह खनिक खदान से बजने वाले हूटर की आवाज पर चल देते थे काम पर। खान में हर रोज़ वे, कार्बाइड लैंप वाले टोप पहने, ड्रिल से सूराख बनाते, उनमें डायनामाईट भरते और विस्फोट करके कोयला बाहर निकालते। यह कोयला फिर बाहर लैनकेस्टर, फिलाडेल्फिया और रेडिंग भेजा जाता ।</p>
<p>शहर की जिंदगी यूँ ही अलमस्त चल रही थी कि 1960 में आर्थिक मँदी का दौर आ गया। सारी कँपनियाँ एक एक कर बँद होती चली गईं। फिर, जैसी की कल्पना की जा सकती है, किसी मृतप्राय औद्योगिक शहर का जो हाल होता है, अशोचनीय घटनाक्रम होने लगे। अवैध कोयले के उत्खनन का काम शुरू हो गया। लोग अपने घर के आसपास या फिर किसी जगह जंगल में सुरंग बनाकर रस्सी के सहारे कोयला के भँडार तक पहुँच कर कोयला खोदते और कालाबाजार में बेच देते। यह न सिर्फ खतरनाक था बल्कि जिंदगी की गाड़ी चलाने के लिये नाकाफी भी था।
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="margin-top: 6px; margin-bottom: 6px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/centralia-before-after.jpg" border="0" alt="" hspace="6" vspace="6" width="454" height="364" align="middle" /></p>
<p>1962 में एक अनहोनी घटना घटी। किसी अवैध सुँरग में आग लग गयी। भूमिगत आग जलती रही, और फैलती रही। भूगर्भ विभाग ने कितने ही जगहों पर जमीन में सूराख किये, ताकि पता लगा सके कि आग कहाँ कहाँ फैली है और तापमान कितना है? लोगों द्वारा घर के तहखाने में असामान्य गर्मी की शिकायत पर कुछ लोगों को वहाँ से हटाया भी गया। अमूमन आग को बुझाने के सारे प्रयास व्यर्थ ही गये, चाहे वह सुँरग में पानी भरना हो या नाइट्रोजन का छिड़काव। 1000 डिग्री तक पहुँचा तापमान पानी को चुटकियों में भाप बनाकर उड़ा देता।</p>
<div id="pullQuoteR">आग को बुझाने के सारे प्रयास व्यर्थ गये, चाहे वह सुँरग में पानी भरना हो या नाइट्रोजन का छिड़काव।</div>
<p>14 फरवरी 1981 को सरकार की नींद तब टूटी जब एक घर के पिछवाड़े मैदान में मिट्टी धँसने से एक चार फुट गहरा और 150 फुट गहरा गड्ढा बन गया, उसमें गिरकर एक बच्चे की जान जाते जाते बची। बच्चा एक पेड़ की जड़ पकड़ कर किसी तरह लटका रहा। उसके भाईयों ने उसे खींच कर बाहर निकाला। यह घटना तब घटी जब स्थानीय जनप्रतिनिधि आग के नुकसान का जायजा लेने आये थे। वे इस लोमहर्षक घटना के चश्मदीद गवाह बन गये। इस घटना ने मीडिया का ध्यान खींचा और अंततः सरकारी मशीनरी हरकत में आयी।</p>
<p>इसके बाद इस आग को रोकने के इरादे से सरकार ने एक महत्वाकाँक्षी योजना बनायी। इसके अंतर्गत सारे निवासियों के घर सरकार खरीद लेती और कस्बे के चारों ओर एक 500 फुट गहरी खाई खोद दी जाती। पर 660 मिलयन डालर का खर्च और आग रूकने की कोई गाँरटी न होने की बाबत सरकार ने अपने बढ़े कदम खींच लिये। अब सरकार सेंट्रालिया की स्थिति निरंतर खतरनाक होते जाने के कारण सिर्फ वहाँ के निवासियों को एक एक कर वहाँ से हटाने के अतिरिक्त कुछ नहीं कर रही।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: none repeat scroll 0% 50% #f4f4f4; width: 220px; float: left;">
<h3>कैसे लग जाती है खदानों में आग?</h3>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/bootleg-mine.jpg" border="0" alt=" " vspace="5" width="200" height="150" align="top" /> खदानों में आग लगने के कई कारण हो सकते हैं। कई बार 100 डिग्री तापमान के उपर जाने पर कोयला स्वयं ही प्रज्वलित हो उठता है, तो कई दफ़ा खदानों के प्रवेश के निकट बिजली गिरने से। आस्ट्रेलिया स्थित <strong>बर्निंग माउंटेन</strong> विश्व की सबसे पुरानी आग है जो 6000 सालों से लगातर जल रही थी। <em>बूटलेग</em> खनन को रोकने के लिये विस्फोट से खान उड़ाने के कारण भी कई बार आग लगी हैं। सेंट्रालिया जैसे क्षेत्रों में खदानों के पास कचरा जलाने से आग लगी।</p>
<p>ज़ाहिर है कि ऐसी आग के आसपास रहना खतरनाक होता है। तापमान अधिक रहता है और हवा में ज़हरीली गैस रहती है। इनसे उपजती ग्रीनहाउस गैसों के कारण पर्यावरण के लिये भी भारी खतरा होता है। अमरीका, चीन, इंडोनेशिया, रूस, भारत, यूरोप और अफ्रीका ऐसी आग से जूझते रहे हैं। वैज्ञानिक आजकल <em>रीमोट सेंसिंग सेटेलाईट</em> से ऐसी ज्वाला का पता लगाने की कोशिश करते हैं।</p>
</div>
<p>1991 तक महज़ चालीस पचास लोगों के अतिरिक्त सबके घर खरीद लिये गये और यहाँ का पोस्ट आफिस भी बँद कर दिया गया। पर हैरत की बात है कि इस भूमिगत आग के मुहाने पर बैठे मुठ्ठी भर लोग आज भी यह शहर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इनमें यहाँ का मेयर भी शामिल है। यह लोग कोई झक्की नहीं हैं। इन्होंने अपने पूरे समाज को तिल तिल खत्म होते देखा है। इन्होंने देखा है कि किस तरह हर घड़ी साथ रहने वाले यार दोस्त, सेन्ट्रालिया को बचाने के नाम पर बीसीयों कमेटी बनाते थे और फिर आपस में ही लड़ झगड़ सरकार के दबाव के आगे झुक जाते। इनका मानना है कि वर्तमान खान जो तकरीबन पचास साल से जल रही है, शायद सौ साल और जले। सरकार महज स्वास्थ्य विभाग के नोटिस दिखा दिखा कर निवासियों को वहाँ से हटाने करने में जुटी है। इन मु्ठ्ठीभर जुझारूओं को इस सरकारी अकर्मण्यता के नेपथ्य में करीब 420 लाख टन कोयला दिखता है जो वर्तमान खदानों से भी अधिक गहराई में दफ्न है। अगर सारे निवासी जगह छोड़ गये तो विस्थापन का पूरा पैसा बच जायेगा। लोगों का शक इस वजह से भी है कि अगर वाकई सरकार को इतना खतरा दिखता है इस शहर के नीचे, तो वह वहाँ से गुजरने वाली सड़क को क्यों नहीं बँद कर देती।</p>
<p>इस शहर की त्रासदी एक तकनीकी खामी के चलते आयी है, जैसा चेर्नोबिल या भोपाल में हुआ। पर सुनामी, चेर्नोबिल या भोपाल में आपदा सब पर एक साथ आयी, जिसने सारे निवासियो को एकजुट होने का मौका दिया उससे लड़ने का, पुनर्स्थापना का जज्बा दिखाने का। ऐसी आपादओं पर मीडिया की चौबीसो घँटे नज़र रहने की वजह से राहत और सहानुभूति की वर्षा भी होती है। पर सेंट्रालिया मे आपदा जमीन के नीचे है और धीरे धीरे फैल रही है।</p>
<p>कुछ ऐसा ही झरिया बिहार में हो रहा है। बस पैमाना अलग है। यहाँ सवाल अस्सी हजार परिवारों का है, 7500 करोड़ रूपये भी स्वीकृत हो गये हैं। पर मीडिया की निगाह से अछूते इस भारतीय सेंट्रालिया के निवासी भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की रस्साकशी देखने को मजबूर हैं।</p>
<p>मामला चाहे भारत जैसे विकासशील देश का हो या अमरीका जैसे विकसित देश का, सरकार अगर अकर्मण्य हो तो योजनायें फाईलों में ही दफ्न रह जाती हैं। ऐसी आग को पूर्णतः बुझाना नामुमकिन है क्योंकि जैसे जैसे ज़मीन पर दरारें उभरती हैं आक्सीज़न ज़मीन तक पहुँचने में कामयाब होने लगती है। पानी जैसे माध्यम भी नाकाफी सिद्ध हुये हैं। ऐसे में इलाके में रह रहे परिवारों का न्यायपूर्ण पुर्नवास ही एकमात्र समझदारी का हल है, जो सेंट्रालिया में किया भी गया, पर झरिया जैसे क्षेत्रों में अपाहिज सरकार के होते यह कदम लागू करना भी भूमीगत आग को बुझाने जितना ही कठिन है।</p>
<hr />
<h1>मीडिया ने तोड़ी सरकारी निद्रा</h1>
<div id="section-teaser"><a href="http://www.centraliaminefire.com/about.html" target="_blank"><strong>डेविड डेकॉक</strong></a> एक पत्रकार हैं और उन्होंने सेन्ट्रालिया पर व्यापक रिपोर्टिंग की है। उनकी किताब <a href="http://www.amazon.com/gp/product/0595092705?ie=UTF8&amp;tag=nirantar-20&amp;linkCode=as2&amp;camp=1789&amp;creative=9325&amp;creativeASIN=0595092705">अनसीन डेंजर</a><img style="border: none !important; margin: 0px !important;" src="http://www.assoc-amazon.com/e/ir?t=nirantar-20&amp;l=as2&amp;o=1&amp;a=0595092705" border="0" alt="" width="1" height="1" /> इस त्रासदी के कारणों और घटनाओं पर प्रकाश डालती है। पुरानी खदानों से लगी भूमीगत आग और सेन्ट्रालिया पर निरंतर ने डेविड से ईमेल पर साक्षात्कार लिया। प्रस्तुत है अंश।</div>
<p><strong> आमतौर पर ऐसी त्रासदी विकासशील देशों में होती हैं, अमेरिका में ऐसी घटना के बारे में सुनना बड़ा अजीब लगता है। आपका क्या सोचते हैं?</strong><br />
<img style="margin: 10px; border: 0pt none;" title="David DeKok" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/DavidDeKok.jpg" border="0" alt="David DeKok" hspace="5" vspace="5" width="112" height="128" align="left" />आप यह अवश्य गौर करें कि यह त्रासदी किस साल शुरु हुईः 1962 में। उस वक्त अमेरिका को आभास भी न था कि कोयले की परित्यक्त खदानों से गंभीर पर्यावरणीय समस्या उपज सकती है। बात अगर बीस पच्चीस साल पहले की होती तो सेनट्रालिया के नज़दीकी कोई कोयला कँपनी खुद ही ऐसी आग पर नियंत्रण पा लेती और कोई समस्या पैदा न होती। पर 1962 में पेनसिलवेनिया का एंथ्रेसाईट कोयला उद्योग मृतप्राय था। अतः न तो राज्य और ना ही केंद्र सरकार ने आग से लोहा लेने या आपदा प्रबँधन के लिये खास पैसा दिया।</p>
<p>एक और तथ्य यह है कि काफी समय तक, भले ही विकासशील देशों जैसा हाल न रहा हो, पेनसिल्वेनिया के कोयला क्षेत्र भी गरीब और शोषित रहे। न्यूयार्क व अन्य जगहों से आयी कोयला कंपनियों के लिये पेनसिल्वेनिया हमेशा से साधनों का उपनिवेश रहा। वे पैसा बनाने यहाँ आईं और फिर चलती बनीं।</p>
<div id="pullQuoteR">सरकारी उदासीनता से अधिक सुस्त नौकरशाही जिम्मेवार है</div>
<p><strong> क्या सरकारी उदासीनता ऐसी घटनाओं का प्रमुख कारण है?</strong><br />
मेरे ख्याल से सरकारी उदासीनता से अधिक सुस्त नौकरशाही जिम्मेवार है, &#8220;हमें चिंता तो है, पर हम भला क्या कर सकते हैं&#8221; वाला रवैया। अगर सेन्ट्रालिया के निर्वाचित सदस्य कार्यकुशल होते तो बात और होती, वे अफसरशाहों से काम करवा पाते। पर दिक्कत यही थी कि सेंट्रालिया के निर्वाचित प्रतिनिधि कोयला खनन और परित्यक्त खानों से होने वाली दिक्कतों और खतरों की समझ ही नहीं रखते थे। 1962 में सेन्ट्रालिया कृषि प्रधान इलाके का अकेला कोयला क्षेत्र था।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: none repeat scroll 0% 50% #edede4; width: 220px; float: right;">
<h3>आग दुश्मन, सरकार भी</h3>
<p>जनता के हित के निर्णयों में राजनैतिक अनिच्छा का क्या दुष्प्रभाव हो सकता है यह झरिया के कोयला खनिकों के 80 हज़ार परिवारों से पूछिये जिनके पुर्नवास की योजना को 7500 करोड़ रुपये के बजट आवंटन के बावजूद कैबिनेट की हामी की बाट जोहनी पड़ रही है। पूर्वी भारत में झरिया स्थित कोयला खदानों में धरती के गर्भ में सुलगती आग बरसों पुरानी समस्या है और यह शायद विश्व का सबसे बुरी तरह प्रभावित इलाका है। पर मीडिया कि अरुचि से मामला कभी प्रकाश में नही आता।</p>
<p>दो साल पहले सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी बीसीसीएल द्वारा शुरु झरिया एक्शन प्लान के 61 करोड़ के पायलट प्रोजेक्ट के तहत 900 सबसे ज़्यादा प्रभावित परिवारों का विस्थापन होना था। पर यह हो न सका। वजहात कुछ कुछ सेंट्रालिया जैसे ही थे, भारी खतरों के बावजूद लोग अपना आशियाना छोड़ने को तैयार नहीं थे। हैरत की बात यह कि विस्थापन के मामले में पैसा कोई मसला नहीं है, क्योंकि सभी कोला कंपनियाँ फंड में योगदान देने को राज़ी हैं, पर सारे कार्य में सरकारी भागीदारी है ही नहीं और यही फसाद की जड़ है। सन् 2012 तक 1850 हेक्टेयर ज़मीन पर विस्थापितों को बसाना है पर योजना में सरकारी अरुचि के होते कोई नहीं जानता यह कार्य कब तक होगा। इस बीच यह भूमीगत दावानल 370 लाख टन कोयला निगल चुका है और हर साल 20 लाख टन कोयला भस्म करता जा रहा है।</p>
</div>
<p><strong> आज सेन्ट्रालिया में कितने लोग बचे हैं? क्या विस्थापितों को कोई मुआवजा मिला?</strong><br />
1979 के उत्तरार्ध में, जब आग अपने निर्णायक और सबसे भयानक रूप में थी, करीब हजार निवासी थे, अब इस शहर में अब दस पँद्रह लोग ही रह गये हैं। यह लोग शहर की उस जगह रहते हैं जहाँ आग को अभी कई दशक लगेंगे पहुँचने में। जो आग से समीप हैं उनके घरों में तलघर नहीं है, जिससे वे जानलेवा गैसों से बचे रहते हैं। ज्यादातर बचे लोग ऐसे वृद्ध हैं जो इस उम्र में या तो विस्थापन का झँझट नहीं उठाना चाहते या फिर जिन्होंने विस्थापन का पुरजोर विरोध किया था।</p>
<p>1983 के बाद जो लोग विस्थापित हुये उन्हें सरकार से अच्छा मुआवजा मिला, शायद ये आपदा विस्थापन के इतिहास के सबसे अच्छे सौदे हैं। अपने सेन्ट्रालिया के घर के समान कोई घर या नया घर बनाने के लिये पर्याप्त पैसे मिले। हलाँकि 1983 के पहले जिनको मुआवजा मिला उन्हें वर्तमान घर की कीमत में खतरनाक जगह पर होने के कारण कमी कर दी गई। यह असंतोष का कारण भी रहा।</p>
<p><strong> भूमिगत आग एक आम समस्या है। क्या आप बता सकते हैं कि इसे बुझाने के क्या उपाय किये गये? उनमें से किसे सफलता मिली?</strong><br />
सेन्ट्रालिया अब भी जल रहा है। 1962 की गर्मियों में राज्य सरकार ने आग बँद करने के लिये शहर में खुदाई शुरू की पर काम पुरा होने से पहले बजट खत्म हो गया। उसके बाद से खान के बीच के हिस्सो में पत्थरों का चूरा व पानी डालकर या फिर फ्लाई एश, जो कि विद्युत उत्पादन संयंत्रों में जले कोयले से बनी महीन राख होती है, भरकर इसे रोकने के कई प्रयास हये। इस तरह से खड़ी रूकावटें कुछ समय तक आग को आगे बढ़ने से रोकती तो थीं पर रूकावटों के स्थिर होने पर आग नये हिस्सों मे पहुँच जाती है। 1983 में अमेरिकी खदान सर्वेक्षण विभाग ने एक अध्ययन से यह अनुमान लगाया कि ज़मीन से आग को पूर्णतः खोद निकालने के लिये तकरीबन 650 मिलियन डालर का खर्च होगा। पर इससे पूरा शहर तबाह करना पड़ता। अतः डालर देकर निवासियों को विस्थापित करना बेहतर समझा गया।</p>
<p>सेन्ट्रालिया में प्रयुक्त तरीकों को पेनसिल्वेनिया के अन्य खान आग में भी इस्तेमाल किया गया है। आश्रचर्यजनक बात यह है कि आग बुझाने के लिये पानी डालना एक व्यर्थ प्रयास है क्योंकि पानी को बरसों भरा जाना होता है, अन्यथा पत्थरों में मौजूद अवशिष्ट उष्मा आसानी से आग को फिर भड़का सकती है।</p>
<p><strong>क्या स्थानीय सरकार और निवासियों को आग के उत्सर्जन से निकलने वाली ग्रीनहाऊस गैसों, जहरीले धुयें और पर्यावरण को नुकसान की फिक्र है? </strong><br />
ऐसा कोई मुद्दा सेन्ट्रालिया में नहीं है क्योंकि आग बहुत कम समय के लिये जमीन के ऊपर रही है। मेरे ख्याल से भारत की स्थिति से यह काफी भिन्न है।</p>
<p><strong> ऐसा माना जाता है कि कैटरीना या त्सुनामी जैसी आपदाओं के राहत कार्य ज्यादा व्यवस्थित होते हैं और सेन्ट्रालिया जैसी अदृश्य आपदाऐं उपेक्षित रहती हैं। आपका क्या विचार है?</strong><br />
त्सुनामी, कैटरीना जैसी आपदाओं में सरकार व व्यक्तियों पर तत्परता से कार्य करने का दबाव होता है। इन आपदाओं के हृदय विदारक दृश्य जो लगातार टीवी पर दिखाये जाते हैं उन्हें भला कोई कैसे नकार सकता है? मज़े की बात है कि सेन्ट्रालिया को 1981 से वाकई सहायता मिलनी शुरु हुई जब टीवी पर खान की आग के दृश्य और वहाँ के रहवासियों के इसके खतरे की जानकारी की बात ज्यादा होने लगी। इसी साल बारह साल के लड़के के इस आग से बने गढ्ढे में गिरने से यह चर्चा शुरु हुई। पहले अकेला मैं ही इसे अखबारों के लिये कवर करता रहा। जब न्यूज चैनलों के हेलीकाप्टरों आने लगे तो सरकार ने ज़्यादा ध्यान देना शुरु किया।</p>
<p class="note"><strong>चित्रः</strong> अतुल अरोरा व डेविड डेकॉक, <strong>अतिरिक्त सामग्रीः</strong> देबाशीष चक्रवर्ती<br />
<strong>आभारः</strong> शशि सिंह &#8211; झरिया के विचार के लिये, विकिपिडिया, साईमन हैडलिंगटन</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2109&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-cover-centralia/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पल में कोला, पल में तमाशा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-nazariya-cola-debate</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-nazariya-cola-debate#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 12:36:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अफ़लातून देसाई</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Cola]]></category>
		<category><![CDATA[CSE]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006nazariyacola-debate/</guid>
		<description><![CDATA[कोला में कीटनाशक पाये जाने के बाद कोई कहता है कि एमएनसी विकासशील देशों में निम्नतर स्वास्थ्य मानक चलने देतीं हैं, तो कोई एनजीओ पर शक करता है। क्या &#34;एकीकृत खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम&#34; द्वारा आनुवांशिक इंजीनियरिंग से विकसित खाद्य पदार्थों के भारतीय बाजारों में प्रवेश के चोर दरवाजे खुल गये हैं? पढ़िये <strong>अफलातून देसाई</strong> और <strong>अर्जुन स्वरूप</strong> की रोचक <strong>बहस</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/story-big-coke.jpg" border="0" alt="Coke Debate" vspace="5" /></p>
<table border="0" cellspacing="2" cellpadding="2" width="100%">
<tbody>
<tr>
<td style="width: 48%;" align="left" valign="top">
<h2>खाद्य निरंकुशता की ओर</h2>
</td>
<td style="width: 4%;"></td>
<td style="width: 48%;" align="left" valign="top">
<h2>सी.एस.ई की गड़बड़ाईं प्राथमिकतायें</h2>
</td>
</tr>
<tr>
<td align="left" valign="top">
<h4>अफ़लातून देसाई</h4>
</td>
<td></td>
<td align="left" valign="top">
<h4>अर्जुन स्वरूप</h4>
</td>
</tr>
<tr>
<td align="left" valign="top">
<p>&nbsp;</p>
<div class=dropCap>स</div>
<p>र्वोच्च न्यायालय में सेन्टर फॉर पब्लिक इन्टरेस्ट लिटिगेशन ने नवम्बर 2004 में एक जनहित याचिका दाखिल की थी। इस में खाद्य मिलावट निवारण कानून के उल्लंघन के आधार पर कोला कम्पनियों के विरुद्ध कार्यवाई की मांग की गई थी। याचिका में आयुर्विज्ञान की प्रतिष्ठित अन्तर्राष्ट्रीय शोध-पत्रिकाओं के हवाले दिए गए थे। बहस के दौरान कोला कम्पनियों ने न्यायालय में नए &#8220;एकीकृत खाद्य सुरक्षा व मानक अधिनियम, 2005&#8243; की प्रति लहराते हुए दलील दी थी कि अदालत इस कानून के लागू होने का इन्तजार करे। अगस्त 2006 में सुनीता नारायण के सेन्टर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट (सी.एस.ई) की हालिया रपट से मची खलबली के बाद केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने कहा कि इस रपट को वे राज्य सरकारों को भेज रहे हैं तथा वे ही इसकी पुष्टि और तत्पश्चात इस पर कार्यवाई कर सकती हैं। कुछ राज्यों में कार्यवाई हुई भी।</p>
<p>बहरहाल, नया &#8220;एकीकृत खाद्य अधिनियम&#8221; संसद के दोनों सदनों में पारित हो चुका है। यह कानून 1954 के खाद्य मिलावट निवारण कानून और 1955 के फल उत्पाद कानून जैसे कानूनों को समाप्त कर बनाया गया है। यह समयोचित है कि केन्द्र सरकार जनहित में खाद्य-उद्योग को अपने नियंत्रण में ले, नए अधिनियम में यह घोषणा है। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री द्वारा सी.एस.ई की रपट राज्य सरकारों को भेजे जाने जैसे कदम को कम्पनियों द्वारा इस कानून का सहारा लेकर अब चुनौती दी जा सकेगी।</p>
<p>1977 में तत्कालीन जनता पार्टी की सरकार ने कोका कोला कम्पनी (तब पेप्सी का आगमन नहीं हुआ था) के समक्ष दो शर्ते रखी थीं- पहली शर्त थी कम्पनी में विदेशी पूंजी 33 फीसदी से कम रखने की तथा दूसरी अपने उत्पाद का फार्मूला बताने की। कम्पनी ने दोनों शर्तों को कबूलने की बजाय भारत छोड़ना उचित समझा। उदारीकरण के दौरान विदेशी पूंजी की सीमा हट गई। पर सूचना का अधिकार देने वाली सरकार ने उसके बाद बने एकीकृत खाद्य सुरक्षा व मानक कानून में गैरजरूरी गोपनीयता बनाए रखने का प्रावधान कर दिया। कानून की धारा 16(6) के अनसार- खाद्य प्राधिकरण चाही गई गोपनीय सूचनाओं को किसी तीसरे पक्ष के समक्ष प्रकट नहीं करेगी तथा न ही प्रकट होने का कारण बनेगी, बस जन स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए आवश्यक जिन सूचनाओं का सार्वजनिक किया जाना अनिवार्य हो वे अपवाद होंगी। कोला के गुप्त फार्मूले की रक्षा के लिए भारत सरकार ने इस प्रावधान के अंर्तगत व्यवस्था दी है।</p>
<p>तो जहाँ खाद्य उद्योग से जुड़ी विशालकाय बहुराष्ट्रीय कम्पनियों के प्रति उदारता बरती गई है वहीं भड़भूजे, खोमचे वाले, दूध, दही, लस्सी और मिठाई बेचने वालों को लाइसेन्स के दायरे में ले आया गया है। आनुवांशिक इंजीनियरिंग से विकसित खाद्यान्न व खाद्य पदार्थों के भारतीय बाजारों में प्रवेश के चोर दरवाजे खोल दिए जाएंगे। नागरिकों के आहार सम्बन्धी अधिकार जिन कानूनों से सुरक्षा पाते थे उन्हें अप्रभावी बनाकर, जहरीले रसायनों और औद्योगिक प्रसंस्करण को कानूनी दर्जा देने की व्यवस्था इस कानून से हो जाएगी। युरोप और अमरिका में इन खाद्यान्नों पर जनता की पैनी नजर रहती है। अमरिका में बने जीन-रूपांतरित सोयाबीन के तेल पर यूरोप में रोक है। भारत सरकार ने ऐसे सोयाबीन तेल पर आयात शुल्क घटाकर 4 प्रतिशत कर दिया है जबकि मलेशिया, थाइलैण्ड आदि से आयात होने वाले पाम तेल पर 200 प्रतिशत तक का आयात शुल्क होता है।</p>
<p>वॉल मार्ट, मैक्डॉनाल्ड्स आदि के प्रबल समर्थक खाद्य प्रसंस्करण राज्य मंत्री सुबोध कांत सहाय लगातार कहते रहे हैं कि भारतीय किसान इन कम्पनियों के बड़े आपूर्तिकर्ता होंगे। अन्न स्वावलम्बन का इस देश को गर्व था, उसके पटरी से उतरने की प्रक्रिया शुरु हो चुकी है।</p>
<p>खाद्य गुणवत्ता निर्धारित करने की अंतर्राष्ट्रीय संस्था कोडेक्स एलिमेन्टारियस में खाने-पीने के धन्धे से जुड़ी इन बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को अमेरिका अपने देश की नुमाइन्दगी देता है। फलस्वरूप अमेरीकी फार्मा ग्रेड फॉस्फोरिक एसिड जैसे अखाद्य रसायनों के पेय में प्रयोग पर कोडेक्स की मुहर लग जाती है।</p>
<p>कोला कम्पनियों का दावा है कि उनके भारतीय उत्पाद अन्तर्राष्ट्रीय मानकों पर खरे ठहरते हैं। क्या युरोप अथवा अमरिकी बाजारों में अधिकृत रूप से भारत में निर्मित उत्पाद वे बेच सकती हैं? कुछ माह पूर्व वाराणसी स्थित शीतल पेय संयंत्र पर उसके अटलान्टा मुख्यालय से एक अन्तर्राष्ट्रीय अधिकारी का आगमन हुआ था। उनके तथा परिवार हेतु कथित रूप से उसी कम्पनी का अमेरिका में निर्मित बोतलबन्द पानी और पेय के कैन भी लाए गए थे ताकि उन्हें भारत में बोतलबन्द किए गए पानी और कोला न पीना पड़े। मानदण्डों की बाबत इन कम्पनियों का पाखण्डपूर्ण आचरण सर्वविदित है।</p>
<p>केरल के प्लाचीमाड़ा गांव में बॉटलिंग संयत्र द्वारा भूगर्भ जल के दोहन तथा प्रदूषण के विरुद्ध स्थानीय लोगों का आन्दोलन गत तीन चार वर्षों से चल रहा है। संयंत्र राज्य प्रदूषण बोर्ड की पहल पर राज्य सरकार के प्रतिबन्ध के पूर्व ही बन्द कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय की समिति के समक्ष कम्पनी अपने कचरे में सीसे, कैडमियम जैसी खतरनाक धातुओं का मूल स्रोत नहीं बता रही थी।</p>
<p>कीटनाशक अवशेषों के सर्वव्यापी होने पर कोला कम्पनियां जो चिन्ता प्रकट कर रही हैं उससे यह भस्म नहीं होना चाहिए कि वे प्राकृतिक खेती के प्रसार के लिए इस देश में आई हैं। हालांकि आगामी दिनों में जनता की आँखों में धूल झोकने के लिए ऐसी परियोजनाएं कागज पर शुरु करने की तिकड़म तो वे कर ही सकती हैं। इस सन्दर्भ में माँ के दूध से लेकर सब्जी-भाजी में कीटनाशक अवशेषों की मौजूदगी का उल्लेख काफी हो रहा है। अत्याधुनिक खेती में नए बीजों के साथ-साथ निर्दिष्ट मात्रा में खाद, कीटनाशक और भारी सिंचाई का पैकेज तय होता है। ऐसी खेती के फलस्वरूप नीचे जा रहे भूगर्भ जल-स्तर तथा भूमि की कम होती उर्वरा शक्ति तो किसानों को साफ-साफ दिखाई देने लगी है। कीटनाशकों द्वारा कीट-नाश का प्रभाव तो उसे दीखता है, दुष्प्रभाव स्पष्ट नहीं होते। इस प्रश्न पर निर्णय उस खाद्य पदार्थ से मिलने वाले पोषक तत्वों के आधार पर लिया जाना चाहिए। कोला पेय किसी आहार का विकल्प नहीं हैं, पेय जल का भी नहीं। कोला पेय हमें जो रिक्त कैलोरियां चीनी के कारण देता है उसका सेहत पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कोला कम्पनियों पर गठित संयुक्त संसदीय समिति ने इनके द्वारा भूगर्भ जल की लूट पर भी गौर किया था तथा समिति द्वारा जलसंसाधन मंत्रालय से यह अपेक्षा की गई थी कि इस बाबत स्पष्ट नीति बनाई जाए।</p>
<div id="pullQuoteR">उपभोग जीवन के लिए जरूरी है लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति, निहायत गैर-जरूरी और नुकसानदेह वस्तुओं व सेवाओं की भी भूख पैदा कर देती है।</div>
<p>अमेरिकी बाल रोग विशेषज्ञों के संघ ने स्कूलों को कोला मुक्त करने की भारी वकालत की थी। एक प्रस्ताव पारित कर बच्चों के स्वास्थ्य पर विशेष तौर पर मोटापे, हड्डी व दाँत के कमजोर होने पर इस संघ की प्रतिष्ठित शोध-पत्रिका &#8220;पीडियाट्रिक्स&#8221; ने दावा किया था कि यदि शैशव को कोला-मुक्त नहीं किया गया तो बाल-मोटापे की महामारी आ जाएगी जो आगे चलकर मधुमेह की महामारी का रूप धारण कर लेगी। बाल रोग विशेषज्ञों व अभिभावकों के अभिमान के फलस्वरूप अमरीकी विद्यालय परिसर कोला मुक्त हुए हैं। बच्चों में कोला की खपत बढ़ने के चलते दूध की खपत घटने के भी व्यवस्थित अध्ययन हुए हैं। अब विदेशों में बच्चों को ध्यान में रखकर विज्ञापन न बनाने तथा प्री-स्कूलों को कोला-मुक्त रखने की बात कम्पनियों को भी कबूलनी पड़ी है।</p>
<p>प्रसिद्ध समाजवादी चिन्तक सfच्चदानन्द सिन्हा ने स्पष्ट किया है कि उपभोग जीवन के लिए जरूरी है लेकिन उपभोक्तावादी संस्कृति, निहायत गैर-जरूरी और नुकसानदेह वस्तुओं व सेवाओं की भी भूख पैदा कर देती है। पूंजीवाद की कोख से यह अपसंस्कृति पैदा होती है फिर पूंजीवाद को ही शक्ति देने में लग जाती है। कोला में कीटनाशकों के तड़के से मची हलचल से प्रतीत हो रहा है कि हमारे देश में यह अपसंस्कृति जड़ जमा चुकी है। क्या हम उपभोक्तावाद (उपभोग नहीं) को सिर्फ परिष्कृत करके ही सन्तुष्ट हो जाएंगे?</td>
<td align="center" valign="top"></td>
<td align="left" valign="top">
<p>&nbsp;</p>
<div class=dropCap>स</div>
<p>न् 2003 और 2006 में भारत में कोला पेय पदार्थों में कीटनाशकों की उपस्थिति द्वारा कंटैमिनेशन यानि संदूषण पर खासा बवाल मचा है। दोनों ही मामलों में अभियोक्ता एक ही है, सेंटर फॉर साइंस एंड एंवायरमेंट (सी.एस.ई) नामक एक गैर सरकारी संस्थान। गौरतलब है कि सी.एस.ई देश की एकमात्र ऐसी संस्था है जिसने यह मुद्दा उठाया (या जैसा की कईयों का मत है, निर्मित किया)।</p>
<p>इस विषय पर जैसे जैसे बहस बढ़ी है विभिन्न बिंदु उभर कर सामने आये हैं। आखिर कोला पेय में संदूषण क्यों है? क्या भारतीयों को इनसे खतरा है? हम जो भी खाते या पीते हैं उसमें संदूषण होता है तो फिर केवल कोला पर ही ऊंगली क्यों उठाई जाये? पेप्सीको तथा कोक को तो उच्च मापदंडों का पालन करना चाहिये तो क्या वे जानबूझकर भारत जैसे विकासशील देश में निम्नतर स्वास्थ्य मानकों का अनुपालन चलने दे रहे हैं? क्या भारत की सरकार हमारे स्वास्थ्य की सुरक्षा हेतु कड़े नियमन लागू करने में अक्षम है? और इस मामले में गैर सरकारी संस्थायें यानी एन.जी.ओ इतनी दिलचस्पी क्यों ले रहे हैं?</p>
<p>आईये इन मुद्दों की बिंदुवार चर्चा करें।</p>
<div id=pullQuoteR>हम जो भी खाते या पीते हैं उसमें संदूषण होता है तो फिर केवल कोला पर ही ऊंगली क्यों उठाई जाये? पेप्सीको तथा कोक क्या जानबूझकर भारत में निम्नतर स्वास्थ्य मानकों का अनुपालन चलने दे रहे हैं?</div>
<p>पहला और सर्वाधिक महत्वपूर्ण मुद्दा है कोला तथा खानपान और पेय पदार्थों में संदूषण का स्तर। सी.एस.ई की जाँच के नतीजों के अनुसार कोला में यह मान्य स्तर से 24 गुना अधिक है। चलो माना! पर क्या सी.एस.ई को यह ज़िक्र नहीं करना चाहिये कि यह &#8220;मान्य स्तर&#8221; कितना है और किसके लिये लागू होता है? कोला एक कॉम्पलेक्स यानि मिश्रित उत्पाद है जिसमें तीन संश्लिष्ट होते हैं, 90 फीसदी पानी, तकरीबन 8 फीसदी चीनी और शेष कोला कांसेंट्रेट। गौर करने की बात यह है कि पानी के लिये तो जाँच प्रोटोकॉल और मानक मौजूद हैं पर कोला के लिये नहीं। जिन मानकों का सी.एस.ई प्रयोग करती है वे भूगर्भिय जल के लिये लागू होते हैं और यह मानक, जिसमें संदूषण की मान्य मात्रा दशमलव एक पार्ट प्रति बिलियन (पी.पी.बी) है, भारत तथा युरोपिय संघ दोनों ही मानते हैं। अगर हम सी.एस.ई के दावे, यानि कोला पेय में 11.85 पी.पी.बी के संदूषण, को मान भी लें तो यह जानना ज़रूरी होगा कि इंफेट फूड या शिशु आहार, जिसमें ज़ाहिर तौर पर सर्वाधिक सुरक्षा की ज़रूरत होगी, में कीटनाशक रेसीड्यू या अवशेषों का विश्वव्यापी मान्य मानक 10 पी.पी.बी है। चीनी के लिये विश्वव्यापी मानक 400 पी.पी.बी है। इसी से स्पष्ट है कि कोला पूर्णतः सुरक्षित है तथा इनमें कीटनाशक अवशेषों की मात्रा उचित सीमाओं से कहीं कम हैं।</p>
<p>इससे एक बात और ज़ाहिर होती है वह यह कि कोला कंपनियाँ काफी कठोर सफाई प्रक्रिया का पालन करती हैं। पर हम उनकी तारीफ करने के बजाय उनकी निंदा कर रहे हैं!</p>
<p>यह एक और चौंकाने वाले तथ्य की ओर इशारा करता है कि भारतीय फूड चेंस यानी खाद्य श्रंखलाओं में संदूषण का स्तर दुनिया में विद्यमान सबसे कम स्तरों में से एक है। भले ही यह किसी योजना या सोची समझी नीति का परिणाम न हो पर है यह सच। यहाँ तक की भारत में उपलब्ध सेब, चीनी और चाय जैसे खाद्य पदार्थ, जिनमें कीटनाशक संदूषण का स्तर कोला से कई गुना अधिक होता है, युरोप और उत्तरी अमेरिका की तुलना में सुरक्षित हैं। इसकी विश्व खाद्य रपट से पुष्टि हुई है। निश्चित ही यह भारत के लिये अत्यंत गर्व का विषय है।</p>
<p>इस पृष्ठभूमि के साथ मानकों पर हो रही बहस पर नज़र डालनी चाहिये। क्या भारत में सी.एस.ई द्वारा चाहे जा रहे उच्चतर मानकों की वाकई ज़रूरत है? क्या यह सामान्य नागरिक के जीवन में किसी तरह की बेहतरी लायेगा? विश्व स्तर पर यह मानक ALARA या ALOP में से किसी एक पर आधारित होते हैं। ALARA का मतलब है &#8220;एज़ लो एज़ कैन बी रीजनेब्ली अचीव्ड&#8221; यानि की तर्कसंगत रूप से जितना संभव हो उतना न्यूनतम माप। ALOP का अर्थ है &#8220;एक्सैपटेबल लेवल्स आफ प्रॉटेक्शन&#8221; यानि सुरक्षा के स्वीकार्य स्तर। पहला मानक युरोपीय संघ द्वारा परिकल्पित है जबकी दूसरा, जिसका अनुपालन संप्रति भारत में होता है, स्वास्थ्य के लिये जोखिम के मुल्यांकन पर आधारित तकनीक है। सी.एस.ई युरोपीय मानकों के अनुपालन पर जोर देता है।</p>
<p>लेखक सी.एस.ई से इस सवाल का जवाब चाहेगाः भारत तो पहले से ही ALOP आधारित मानक का पालन करता है, जिसका अपनुपालन कर रहे उत्पादों से उपभोक्ताओं को सेहत का कोई जोखिम नहीं होता, फिर युरोपीय मानकों को मानने पर बल क्यों दिया जा रहा है? इससे तो कोई ठोस फायदे भी नहीं हैं।</p>
<p>हाँ इसका यह जवाबी तर्क दिया जा सकता है कि भले ही कोई ठोस फायदा न हो पर अगर इनका कार्यावन्यन सीधा सादा है तो इसको अपनाने में हर्ज़ की क्या है। दरअसल इसमें हमारा काफी नुकसान है। उच्चतर मानकों को अपनाने से ये मानक सारे कृषि आधारित उत्पादों पर भी लागू होंगे और जब भारत से निर्यातित सामग्री भी इसी मानक की कसौटी पर परखी जायेगी तो सारे निर्यात, खास तौर पर युरोपीय संघ को किये जा रहे निर्यात, पर अंकुश लग जायेगा। यह मानक लागू करने से युरोपीय संघ के राष्ट्रों का कुछ खास नहीं बिगड़ने वाला, पर भारत के कृषिक्षेत्र पर इसके परिणाम प्रलयंकारी होंगे।</p>
<p>अंत में लेखक की राय है कि हमें सी.एस.ई की भुमिका की भी पड़ताल करनी चाहिये। सी.एस.ई प्रेस काँफ्रेंस के द्वारा &#8220;जनता का स्वास्थ्य खतरे में है&#8221; और &#8220;सार्वजनिक नीतियाँ उपहास का पात्र बन गई हैं&#8221; जैसे व्यक्तव्य देने से ज़रा भी नहीं हिचकिचाती। तथापि भारत स्थित अनेक अन्य प्रयोगशालाओं, जिनमें खाद्य विज्ञान और टॉक्सिकोलॉजी के श्रेष्ठ वैज्ञानिक कार्यरत हैं, ने सी.एस.ई की जाँच पद्धतियों और प्रणालियों पर आक्षेप किये हैं। भारत की किसी और प्रयोगशाला ने सी.एस.ई के निष्कर्षों और जाँच तकनीक की पुष्टि नहीं की है। यह एक महत्वपूर्ण बात है।</p>
<div id="pullQuoteR">सी.एस.ई के सार्वजनिक बयान सनसीखेज़ और भ्रामक रहे हैं, इनका विज्ञान त्रुटिपूर्ण और धूर्ततापूर्ण और इनकी मंशा संदिग्ध रही है।</div>
<p>दरअसल जब कभी सी.एस.ई को अपनी जाँच प्रणाली या तकनीकी योग्यता को प्रमाणित करने को कहा गया तो वे ऐसा नहीं कर पाये। सी.एस.ई के पास NABL प्रमाणन नहीं है जो को भारत की 15 अन्य प्रयोगशालाओं के पास है। एक टीवी कार्यक्रम में, जिसमें खाद्य विज्ञानी डॉ खंडल और सी.एस.ई प्रमुख सुनीता नारायण आमंत्रित थे, डॉ खंडल ने सी.एस.ई के परीक्षणों में कई विसंगतियों को ज़ाहिर किया और वे कोई भी जवाब देने में असमर्थ रहीं। पंजाब की राज्य सरकार, जिसने कोला पेयपदार्थों की जाँच अपनी प्रयोगशाला में करवाई है, ने सार्वजनिक बयान दिया है, &#8220;सी.एस.ई का संभवतः कोई व्यक्तिगत अजेंडा है&#8221;। अगर वाकई यह सच है तो यह जानकारी निःसंदेह बड़ी रोचक होगी।</p>
<p>सी.एस.ई 25 वर्ष पुराना संस्थान है, 1982 में अनिल अग्रवाल ने इसकी स्थापना की। नई दिल्ली में, जहाँ लेखक रहते हैं, प्रदूषण कम करवाने में संस्थान की भूमिका को काफी प्रशंसा मिली और वे इस तारीफ के हकदार भी हैं। पर लगता है कि इनकी प्राथमिकतायें गड़बड़ा गई हैं। सी.एस.ई के सार्वजनिक बयान सनसीखेज़ और भ्रामक रहे हैं, इनका विज्ञान त्रुटिपूर्ण और धूर्ततापूर्ण और इनकी मंशा संदिग्ध रही है। उम्मीद है कि एक समय उत्कृष्ट रहा यह संस्थान पुनः अपना स्थान प्राप्त करेगा जिससे हम सब लाभान्वित हों।</td>
</tr>
</tbody>
</table>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2108&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-nazariya-cola-debate/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>भारत में एड्सः शतुरमुर्ग सा रवैया</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-bharat-mein-aids</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-cover-bharat-mein-aids#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:42:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[Condom]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806coverbharat-mein-aids/</guid>
		<description><![CDATA[एड्स को हमारे जीवन में आये पच्चीस साल हो गये। भारत अब विश्व की सर्वाधिक एचआईवी संक्रमित जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले। पढ़िये <strong>डॉ सुनील दीपक</strong> की आमुख कथा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 6px; margin-bottom: 6px;" title="AIDS wall painting/Truckers are considered a vul" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aids.jpg" border="0" alt="AIDS wall painting/Truckers are considered a vulnerable group." vspace="6" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स से हमें क्या लेना देना। मुझे कभी एड्स नहीं हो सकता। यह तो पैसे बनाने की अंर्तराष्ट्रीय साजिश है, इस से ज़्यादा भयावह तो हेपिटाईटिस रोग है। हमसे ज़्यादा एड्स पीड़ित तो अफ्रीका में हैं। यही मानते हैं न आप? अब चौंकिए! <a href="http://www.unaids.org">यूएनएड्स</a> की हालिया रपट के मुताबिक विश्व भर में 2005 के अंत तक 386 लाख एचआईवी संक्रमित लोग हैं, सिर्फ एशिया में ही 83 लाख ऐसे लोग हैं और इस की दो तिहाई संख्या भारत में बसती है। जी हाँ, हम दक्षिण अफ्रीका से आगे निकल चुके हैं। भारत अब विश्व की सर्वाधिक एचआईवी संक्रमित जनसंख्या वाला देश बन गया है।</p>
<p>हम चाहें तो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (<a href="http://www.nacoonline.org">नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम</a>) यानि भारानी और स्वास्थ्य मंत्रालय के हमेशा के तर्क &#8211; यानि कि ये आँकड़े गलत हैं, भारत के लिये संख्या 52.1 लाख है 57 लाख नहीं &#8211; से मतैक्य रखें या फिर समझदारी का परिचय देते हुए कम से कम यह स्वीकारें कि समस्या तो है और इस के प्रति शतुरमुर्गनुमा रवैया नहीं अपनाया जा सकता। भारानी ने माना है कि उसके आँकड़ों में 19 से 49 आयुवर्ग के ही लोग शुमार हैं, माता से बच्चों को या वृद्धों में हुए संक्रमण की जानकारी इसमें शामिल नहीं। जुलाई 2003 में भारानी की परियोजना निदेशक डा.मीनाक्षा दत्ता घोष ने कहा था एड्स भारत में केवल कुछ दलों या शहरों में रहने वालों तक सीमित नहीं है, यह अब आम जनता और गाँवों में भी फैल रही है। भारानी और यूएनएड्स दोनों ही यह मानते हैं कि भारत में 80 से 85 प्रतिशत संक्रमण असुरक्षित विषमलैंगिक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Heterosexual">हेट्रोसेक्शुअल</a>) यौन संबंधों से फैल रहा है। इसके बाद दूसरा बड़ा कारण है इंजेक्शन द्वारा नशा करने वालों में संक्रमित सुई का प्रयोग। रक्त बैंको पर चुंकि अब काफी नियंत्रण रखा जाता है इसलिए रक्तदान से संक्रमण का फैलाव बहुत कम हुआ है।</p>
<h2>कौन हैं निशाने पर?</h2>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="How AIDS spreads in India" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-transmission-pie.jpg" border="0" alt="How AIDS spreads in India" hspace="2" vspace="2" width="250" height="149" align="right" />सेक्स वर्कर्स (यौन कर्मियों) को एड्स का बहुत खतरा है। हालाँकि कुछ राज्यों में वेश्यावृति को कानूनी मान्यता मिली है पर उससे जुड़े बहुत से काम जैसे ग्राहक खोजना और वेश्याघर चलाना गैरकानूनी हैं। इस वर्ष मार्च में लेखक ने काठमाण्डू में यौनकर्मियों की एक सभा में भाग लिया। पता चला कि उनमें से बहुत सी स्त्रियाँ शादीशुदा हैं, पति और बच्चों के साथ रहती हैं पर गरीबी और कमाई का अन्य कोई ज़रिया न होना उन्हें इस कार्य की ओर लाता है। एड्स की बात हुई तो उनमें से एक छोटी उम्र की युवती बोली, &#8220;सब लोग हमें ही दोष देते हैं कि हम यह बीमारी फैला रहे हैं। हमें कहा जाता है कि हम बिना कॉन्डोम के ग्राहक को न स्वीकारें। पर ग्राहकों के सामने हमारी क्या चलती है? यह मालूम भी हो कि अगर बीमारी हो गयी तो मुझे कोई सहारा नहीं देगा, घर से बाहर निकाल फेकेंगे, पर क्या करुँ? बच्चे भूखे हों तो एक प्लेट खाने के लिए बिक जाती हूँ, मैं किसी को कैसे मजबूर करुँ कि कॉन्डोम पहनो!&#8221;</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Statewise figures of AIDS" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-state-distribution.jpg" border="0" alt="Statewise figures of AIDS" hspace="2" vspace="2" width="250" height="247" align="left" />अनुमानतः मुम्बई में 15,000 यौनकर्मी हैं और 2003 में उनमें से 70 प्रतिशत के शरीर में एचआईवी वायरस था। सूरत में किये गये एक अन्य शोध ने दिखाया कि वहाँ की यौनकर्मियों में 1992 में 17 प्रतिशत के शरीर में एचआईवी वायरस था जिनकी मात्रा 2001 में बढ़ कर 43 प्रतिशत हो गयी थी।</p>
<p>ट्रक चालक भी एड्स की बीमारी के लिए अधिक खतरे वाला गुट माने जाते हैं। भारत की सड़कों का जाल विश्व में उच्च स्थान पर है और अनुमान लगाया गया कि भारत में 20 से 50 लाख तक लोग हैं जिनमें लम्बे रास्ते पर ट्रक चलाने वाले, उनकी सहायता करने वाले और क्लीनर शामिल हैं। 1999 में हुई एक शोध ने दिखाया था कि ट्रक चलाने वालों में 86 प्रतिशत हर यात्रा में सड़कों के जाल से जुड़े विभिन्न यौनकर्मियों से यौन संबंध बनाते हैं। उनमें एड्स के बारे में जानकारी तो अच्छी पायी गयी थी पर उनमें से केवल 11 प्रतिशत ही कॉन्डोम का प्रयोग करते थे।</p>
<p>चिंताजनक बात यह है कि संक्रमण का परिद्श्य अब बदल रहा है। एड्स का शिकंजा अधिक प्रचलित प्रदेशों (जैसे आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मणिपुर और नागालैंड) और कुछ तबकों (यौनकर्मी, ट्रकचालक और नशा करने वाले) की बजाय आम जनता में बढ़ता जा रहा है। लांसेट के शोध के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में एचआईवी के मामलों में एक तिहाई कमी आई है जबकि उत्तर भारत में वृद्धि हुई है।</p>
<h2>एड्स और मानवाधिकार</h2>
<div id="pullQuoteR">एड्स विधेयक के संसद के मानसून सत्र में पास होने की संभावना थी हमें यह जानकारी मिली है कि मौजूद सत्र में भी यह विधेयक नहीं लाया जा सकेगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विधेयक संसद को अभी तक नहीं भेजा है।</div>
<p>भारत सरकार एड्स के विषय पर एक नया कानून बना रही है जो कि दुनिया का इस तरह का पहला कानून होगा। इस विधेयक के संसद के मानसून सत्र में पास होने की संभावना थी परंतु निरंतर मित्र के हवाले से हमें यह जानकारी मिली है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र में भी यह विधेयक नहीं लाया जा सकेगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विधेयक संसद को अभी तक नहीं भेजा है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के संबंधित अधिकारियों ने इस संबंध बताया कि लॉयर्स कलेक्टिव ने इस विधेयक का जो प्रारूप नाको के पास भेजा था, उस पर मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आई.सी.एम.आर) में विचार-विमर्श हुआ। इसके उपरांत उस ड्राफ्ट को संशोधन संबंधी सुझावों के साथ वापस लायर्स कलेक्टिव के पास वापस भेजा गया है। इसके उपरांत इसे विधायी विभाग के पास भेजा जाएगा।</p>
<p>मतलब यह कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में ही इस विधेयक को लाए जाने की आशा की जा सकती, हालाँकि यह भी आवश्यक नहीं कि उस सत्र में यह पारित हो ही जाएगा। संभव है कि विधेयक पर विचार के लिए इसे संसदीय स्थायी समिति के पास भेज दिया जाए, जहाँ इस पर कई महीने तक विचार-विमर्श होगा। संकेत तो यही हैं कि यह विधेयक अगले वर्ष के अंत से पहले पारित नहीं हो सकेगा।</p>
<p>विधेयक का मुख्य उद्देश्य है एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में हो रहे भेदभाव का विरोध, निजी क्षेत्र के संस्थान भी इसे के दायरे में शामिल होंगे। इस विधेयक को लाने की कार्यवाही शुरु हुये 4 साल हो चुके हैं, वकीलों के स्वयंसेवी संगठन लॉयर्स कलेक्टिव एचआईवी एड्स घटक (LCHAU) ने इसका प्रारुप तैयार किया, गनीमत है कि अंततः इसको संसद में पेश करने की नौबत आ सकी। इस प्रस्तावित बिल के अनुसार भारत सरकार एड्स पर काबू पाने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तर्ज पर एक राष्ट्रीय अभियोग बनायेगी जो राष्ट्रीय एड्स नीति को लागू करेगी।</p>
<p>संक्रमित लोगों की परेशानियों का वाकई कोई अंत नहीं। संक्रमित बच्चों को शालाओं से निकाले जाने से लेकर, नौकरी से बरखास्तगी, इलाज करने से मना करना जैसे मसलों से हमारा समाज अपरिचित नहीं। कार्यक्षेत्र में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव कोई कोरी फिल्मी कल्पना नहीं है (<strong>इसी अंक में पढ़ें &#8211; <a href="http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-per-films/">एड्स और फिल्में: अच्छी शुरुवात</a></strong>) वकीलों के दल की कोओर्डिनेटर शोभना कुमार मानती हैं कि इस बीमारी को कलंक की तरह देखा जाता है इसलिए बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के मानव अधिकारों की भी अवहेलना होती है। भारतीय जन स्वास्थ्य अभियान के डा.रवि नारायण कहते हैं, &#8220;एड्स के बारे में जनता को सही जानकारी न होने से और स्वास्थ्य कर्मचारियों को इस विषय पर ठीक से प्रशिक्षण न मिलने के कारण इस बीमारी के बारे में बहुत सी गलतफहमियाँ हैं जिनसे लोग एड्स रोगियों से गलत व्यवहार करते हैं। इसकी छवि लोगों में डर तथा घृणा बढ़ाती है जिसके डर से लोग जाँच और इलाज करवाने से डरते हैं।&#8221;</p>
<p>पुणे स्थित एडवोकेट असीम सरोदे ने निरंतर को बताया कि किसी कानून का अभाव भी भेदभाव का कारण है। वैसे उच्च तथा उच्चतम न्यायालयों के पुराने निर्णयों के आधार पर किसी भी एड्स संक्रमित व्यक्ति को कार्य से नहीं निकाला जा सकता यदि वह पूर्ण क्षमता से कार्य कर सकने में समर्थ हो। असीम कई पीड़ित लोगों को मुफ्त कानूनी मदद देते रहे हैं। उनका अनुभव यही रहा कि नियोक्ता कभी भी एड्स को वजह बताकर किसी को नौकरी से नहीं निकालते, वजहें कुछ और बताई जाती हैं जैसे कि अक्षमता या सहयोगियों से मनमुटाव। संप्रति बीमा कंपनियाँ भी इस रोग से संबंधित कोई पॉलिसी नहीं दे रहीं हैं पर यह बिल आने के बाद शायद स्थिति सुधरे। असीम का मानना है कि बिल के पास होने में कई बाधायें हैं क्योंकि पास होने के बाद इससे सरकारी कार्य और खजाने दोंनों पर बोझ काफी बढ़ने वाला है।</p>
<p>प्रस्तावित विधेयक संक्रमित लोगों को बराबरी, स्वायत्तता, स्वास्थ्य, जानकारी, प्रिवेसी और सुरक्षित कार्यस्थल के अधिकार दिलायेगा। किसी भी व्यक्ति के साथ नौकरी, स्वास्थ्य, यात्रा और बीमा के मुद्दे पर उसके एचआईवी संक्रमित होने की वजह से भेदभाव नहीं किया जा सकेगा। साथ ही संक्रमित व्यक्ति की जानकारी गोपनीय रखने की गारंटी भी मिलेगी। बिल में &#8220;अपने जीवनसाथी को सूचित रखने&#8221; और &#8220;संक्रमण न फैलाने&#8221; के दायित्व जैसे प्रावधान भी जोड़े गये हैं। हालांकि कई यह मानते हैं कि शिक्षा की बजाय कानून से ऐसे मुद्दे सुलझाना नामुमकिन है। उन्हें अंदेशा है कि जिन संस्थानों पर संक्रमित लोगों को निकाल बाहर न करने का कानूनी जोर डाला जायेगा वे उचित मानसिकता के अभाव में उनके प्रति बैर पाले बैठे रहेंगे।</p>
<h2>यौन संबंध और भारतीय मानसिकता</h2>
<div id="pullQuoteR">दुनिया खजुराहो और वात्स्यायन के कामसूत्र के कारण हमें यौनशास्त्र का विशेषज्ञ मानती है। शायद वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि हमारे समाज में यौन विषय पर बात करना कितना कठिन है!</div>
<p>कोणार्क, खजुराहो और वात्स्यायन के कामसूत्र की प्रसिद्धि के कारण दुनिया हमें यौनशास्त्र का विशेषज्ञ मानती है। शायद वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि हमारे समाज में यौन विषय पर बात करना कितना कठिन है! ज़ाहिर हैं कि यौन विषयों पर बेरोकटोक बातचीत के अभाव में लोगों तक एड्स की सही जानकारी पहुँचाना दुष्कर कार्य है। लेखक ने एक दफा अपने चिकित्सक सहयोगी से एक चुटकुला सुना था, &#8220;एक आदमी क्लिनिक में आया, बोला कि डॉक्टर साहब मेरी पत्नी फ़िर से गर्भवती हो गयी है। आप ने तो कहा था कि अगर कॉन्डोम का उपयोग करुँगा तो और बच्चे नहीं होंगे, फ़िर यह कैसे हो गया? डॉक्टर ने पूछा कि क्या उसने कॉन्डोम का ठीक से प्रयोग किया था। &#8220;हाँ डॉक्टर साहब&#8221;, व्यक्ति बोला, &#8220;जैसा आप ने दिखाया था मैंने ठीक वैसा ही किया। मैं अपनी पत्नी के साथ सोने से पहले एक केला ले कर उस पर कॉन्डोम चढ़ा देता था।&#8221; यह चुटकला हमारे मुल्क की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ किसी बात को सीधे नहीं, घुमा फिरा कर ही कहने को ही सभ्यता समझा जाता है।</p>
<p>मानव शरीर के बारे में लज्जा और यौन विषयों को अश्लील समझना केवल अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों की बात हो, यह नहीं है। शालाओं व कॉलेजों में जब बात पुरुष और नारी के जननाँगों पर पहुँची तो शिक्षक खिसिया कर यही कहते हैं कि इसकी पढ़ाई छात्र स्वयं ही कर लें। शालाओं में यौन शिक्षा प्रारंभ हुई है, पर समाज का रवैया ज्यों का त्यों है। कुछ समय पहले ही अभिनेत्री खुशबू के विवाह पूर्व यौन संबंधों के बयान पर कितना फसाद हुआ था! लगता है कि यौन संबंधों की बात करते ही हमारी संस्कृति के लिये खतरा पैदा हो जाता है। भारतीय जीवन में यौन विषयों का महत्व समझने के लिए रेलगाड़ी से यात्रा करना ही काम आता है। रास्ते भर दीवारों पर रंगे विज्ञापन महज़ दो ही विषयों पर होते हैं, &#8220;खोयी मर्दानगी प्राप्त करें&#8221; और &#8220;शादी के रिश्ते&#8221;। गाड़ी के भीतर शौचालयों की दीवारों पर उकरी ग्राफीटी समाज में व्याप्त अधकचरे यौनज्ञान का ही तो प्रतिबिम्ब हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Age-wise AIDS data for India 2005" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-age-distribution.jpg" border="0" alt="Age-wise AIDS data for India 2005" hspace="2" vspace="2" width="250" height="204" align="right" />भारत में यौन आचरणः सन 2001 में भारत में पहला राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहेवियर सर्वे) हुआ जिसमें विभिन्न प्रदेशों में करीब 85,000 लोगों से उनके यौन आचरण संबंधी प्रश्न पूछे गये। भाग लेने वाले 50 प्रतिशत से अधिक लोग 25 से 39 वर्ष आयु वर्ग के थे, महिलाओं और पुरुषों की सँख्या भी लगभग बराबर थी। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि</p>
<ul>
<li>पाँच राज्यों, बिहार, उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल, में करीब 60 प्रतिशत लोगों ने एड्स का नाम सुना था। देश के बाकी हिस्सों में यह जानकारी 70 से 80 प्रतिशत लोगों को थी। आम तौर पर स्त्रियों और ग्रामीण लोगों में जानकारी कम थी।</li>
<li>उपरोक्त पाँच राज्यों में एड्स यौन सम्पर्क से हो सकती है यह जानकारी केवल 55 प्रतिशत को थी, ग्रामीण इलाकों में जानकारी और भी कम थी जबकि केरल में यह जानकारी करीब 98 प्रतिशत लोगों को थी।</li>
<li>कॉन्डोम से एड्स से बचा जा सकता है यह जानकारी बिहार और पश्चिम बँगाल में करीब 30 प्रतिशत लोगों को थी। बिहार और उड़ीसा में 30 प्रतिशत लोगों को कॉन्डोम क्या होता है यह मालूम ही नहीं था।</li>
<li>उत्तरप्रदेश, असम, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में 90 प्रतिशत लोग मानते थे कि एड्स मच्छर के काटने से फैल सकती है।</li>
<li>पहले यौन संबंध के समय पर औसत उम्र मध्यप्रदेश में सबसे कम थी, यानि 17 वर्ष और गोवा में सबसे अधिक थी, यानि 22 वर्ष।</li>
<li>आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में 10 प्रतिशत से अधिक लोगों ने माना कि उनका पिछले महीनों में अपने पति या पत्नी से अलग, कम से कम एक अन्य व्यक्ति से यौन सम्पर्क हुआ था। अन्य राज्यों में उनकी सँख्या कम थी। ऐसे यौन संबंधों में कॉन्डोम का इस्तेमाल करने वाले उड़ीसा में सबसे कम थे, यानि केवल 16 प्रतिशत, जबकि गोआ में सबसे अधिक थे, 81 प्रतिशत।</li>
</ul>
<h2>एड्स और सामाजिक जागरूकता</h2>
<p>समाज में एड्स से बचने के लिए यौन संबंधों की बात करना आवश्यक है। 2001 में भारत में हुये राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहेवियर सर्वे) के परिणामों से स्पष्ट समझ आता है कि देश में बहुत से भागों में आम जनता को एड्स संबंधी ठीक जानकारी नहीं है। उपरोक्त सर्वेक्षण में यह भी मालूम हुआ था कि अगर टेलीविज़न, रेडियो और समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं से जानकारी दी जाए तो करीब 92 प्रतिशत जनता तक यह जानकारी पहुँच सकती है। पर यह जानकारी देने के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं?</p>
<div id="pullQuoteR">भारत में कॉन्डोम को हमेशा से परिवार नियोजन के साधन के रूप में प्रचलित किया गया है ना कि सुरक्षित यौन संबंधों के लिए।</div>
<p>अगर भारानी के जालस्थल पर देखें तो वहाँ पर विगत वर्षों में एड्स पर बने बहुत से टेलीविज़न विज्ञापन देख सकते हैं। इनमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और तबु जैसे जाने माने फिल्मी कलाकारों के भी विज्ञापन हैं। अधिकतर एड्स से ग्रस्त लोगों के मानव अधिकारों की रक्षा और उनसे भेद भाव न करने के बारे में हैं पर &#8220;असुरक्षित यौन संबंध&#8221; कह कर उससे आगे की कोई बात इन विज्ञापनों में नहीं दिखती। जालस्थल पर डॉक्टर और एड्स ग्रसित लोगों से सवाल पूछने की सुविधा है। निरंतर ने जालस्थल पर दिये फॉर्म से जानकारी माँगी कि क्या किसी एड्स ग्रसित व्यक्ति से विवाह किया जा सकता है। एक हफ्ते के बाद किसी असंबद्ध ईमेल पते से इसी जालस्थल के ही अनेक पृष्ठ अटैचमेंट के रूप में भेज दिये गये, ईमेल कई लोगों को सामूहिक रूप से भेजा गया था पर पत्र में कुछ भी नहीं लिखा था। निरंतर ने इसी पते पर पुनः दरियाफ्त की पर कोई जवाब न आया। ऐसा रवैया मीडिया पर हावी है, स्पष्ट कहने का साहस किसी में नहीं (<strong>इसी अंक में पढ़ें: <a href="http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-aur-media/">सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?</a></strong>)</p>
<p>एड्स नियंत्रण कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय शिक्षा परिषद ने &#8220;विद्यालय में एड्स शिक्षा&#8221; के नाम से शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एक लघु पुस्तिका तैयार की थी। इसमें यौन विषयों पर बात करने की कठिनाई को स्वीकारा गया है। &#8220;जिम्मेदार यौन आचरण एड्स शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है जिसमें शिक्षकों को वह स्रोत बनना चाहिए जो छात्रों को यौन और यौनता (sexuality) जैसे नाजुक विषयों के बारे में जानकारी देनी चाहिये। अधिकतर शिक्षक अपनी घबराहट और लज्जा की वजह से इन विषयों पर बात करने के लिए बात नहीं कर पाते। प्रशिक्षण से घबराहट और लज्जा को जीता जा सकता है&#8230;&#8221;। पर यह पुस्तिका यह नहीं बताती कि इन विषयों पर बात करने की हिम्मत रखने वाले शिक्षकों को जब जनता &#8220;अश्लील और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध&#8221; कह कर मारने दौड़े और &#8220;मसाले&#8221; की तलाश में घूमने वाले पत्रकार उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में चटखारे ले कर खबरें भेजें तो वे क्या करें!</p>
<p>विदेशों में बसे भारतीय समुदायों में इस बारे में कोई दुविधा नहीं कि यौन संबंधों के बिना एड्स से बचने की बात नहीं की जा सकती। ऐसे कुछ जानकारी देने वाले पोस्टरों के उदाहरण देखना चाहें तो केनेडा के दक्षिण एशियन एलाअंस के <a href="http://www.asaap.ca/docs/media_camp.htm">जालपृष्ठ</a> पर देख सकते हैं। कुछ समय पहले लेखक ने एक अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कोर्स का संचालन किया जिसका विषय था समुदाय में यौन संबंधों जैसे नाजुक विषयों पर कैसे बात की जाये। इस पाठ्यक्रम में दुनिया के विभिन्न देशों के लोग आये थे जिसके दौरान ब्राजील से आये डॉ मनज़ानो ने अपने क्लिनिक में प्रयोग करने वाले एड्स पर कुछ पोस्टर दिखाये। एक पोस्टर में कॉन्डोम कैसे इस्तमाल करें, कैसे चढ़ायें, कैसे और कब उतारें, सब कुछ स्पष्ट दिखाया और समझाया गया था। एक अन्य पोस्टर में यौन संबंधों के दौरान एड्स के खतरे की बात थी और उसमें विषमलैंगिक और समलैंगिक यौन संबंधों की बात को स्पष्टता से दिखलाया और समझाया गया था। इंडोनेशिया, मिस्र, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के प्रतिनिधियों ने कहा कि इस तरह के पोस्टर उनके देशों मे लगायें से तो पुलिस पकड़ कर ले जायेगी।</p>
<p>भारत सरकार की एड्स नीति की आलोचना की गयी है कि यह केवल &#8220;अधिक खतरे वाले गुटों&#8221; जैसे यौनकर्मी और ट्रक चलाने वाले, की ओर जानकारी को प्रोत्साहन दे रही है, जबकि अब यह बीमारी शहरों से बाहर, आम जनता में फैल रही है। आम जनता से एड्स की बात करने के लिए यौन विषयों से जुड़ी हमारी सामाजिक वर्जनाओं से टकराने की हिम्मत किसमें होगी ?</p>
<p>भारत में कॉन्डोम को हमेशा से परिवार नियोजन के साधन के रूप में प्रचलित किया गया है ना कि सुरक्षित यौन संबंधों के लिए। यहाँ कन्डोम के प्रचार के विरुद्ध एक कड़ी राजनीतिक और धार्मिक लॉबी है क्योंकि यह धारणा है कि यह स्वच्छन्द सम्भोग को बढ़ावा देता है। पर जहाँ भी सही पहल की गयी नतीजे सही आये हैं। कलकत्ता के सोनागाची क्षेत्र में बीमारी के बारे में जानकारी देना और कॉन्डोम इस्तमाल करने के बारे में बताने का अच्छा असर हुआ है। 1992 में केवल 27 प्रतिशत यौनकर्मी कॉन्डोम का इस्तमाल करती थीं, जबकि 2001 में कॉन्डोम का इस्तमाल बढ़ कर 81 प्रतिशत हो गया।</p>
<h2>भारतीय संस्कृति और समलैंगिक यौन संबंध</h2>
<p>जब कनाडा में रहने वाली भारतीय मूल की फिल्म निर्माता दीपा महता ने अपनी फिल्म &#8220;फायर&#8221; में समलैंगिक स्त्रियों की बात उठाई थी तो इस फिल्म के विरुद्ध कुछ प्रदर्शन हुए थे और कुछ लोगों ने कहा था कि समलैंगिक संबंध भारतीय संस्कृति का हिस्सा ही नहीं हैं। पर यह बात केवल फिल्मों तक ही सीमित हो, दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। यह सच है कि समलैंगिक यौन संबंधों का एड्स के भारत में फैलने में महत्वपूर्ण योग नहीं है फिर भी उनको नकारना मूखर्ता होगी। सन 2001 से लखनऊ की नाज़ फाउँडेशन ऐसे ही कुछ लोगों के अज्ञानात्मक रवैये से वहाँ की पुलिस से जूझ रही है। समलैंगिक यौनकर्मियों के बीच एड्स के विषय में जानकारी देने और सुरक्षित यौन संबंध की बात करने वाली नाज़ फाउँडेशन के कई काम करने वाले जेल जा चुके हैं।</p>
<p>यह समलैंगिक संबंधों के बारे में समाज के एक वर्ग के विचारों की बात उठाती है जिस पर गम्भीरता से विचार होना चाहिये। इसके लिए पुलिसवालों की अज्ञानता के साथ भारत के विक्टोरियन समय के कानूनों की भी गलती है जो कि समलैंगिक संबंधों को &#8220;अप्राकृतिक&#8221; और दंडनीय मानते है। नाज फाऊँडेशन के <a href="http://www.nfi.net">जालस्थल</a> पर एड्स संबंधी बहुत सी प्रशिक्षण सामग्री हिंदी में भी उपलब्ध है।</p>
<p>एड्स जैसे अफ्रीका में फैला है वैसे ही अनेक देशों में शिक्षित वयस्क लोगों की पूरी पीढ़ी ही खत्म हो गयी है, खेतों में काम करने वाले किसान खत्म हो गये हैं, बस बच्चे और बूढ़े रह गये। ईश्वर न करे यदि अगर वैसा हाल भारत में होने लगे तो शायद हमारे समाज में भी यौन विषयों की चर्चा के इर्दगिर्द खड़ी की संकोच की दीवारें तोड़नी पड़ेंगी। पर जब तक भारतीय समाज में इस खतरे की वास्तविक पहचान नहीं जागेगी, शायद इस विषय पर खुल कर बात करना केवल दिवास्वप्न ही रहेगा? डा. नारायण कहते हैं, &#8220;एड्स से लड़ने के लिए महिलाओं और नौजवानों को सबसे आगे बढ़ना चाहिए। स्वास्थ्य कर्मियों, रोगग्रस्त लोगों के संगठन, स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील लोग, आदि सब को मिल कर काम करना पड़ेगा ताकि सभी जरुरतमंद लोगों को बीमारी के इलाज के लिए एआरवी दवाएँ मिल सकें।&#8221;</p>
<h2>शतुरमुर्ग बने रह कर क्या होगा?</h2>
<p>संसार के अलग अलग देशों ने अपने अपने अंदाज़ में इस समस्या से निबटने के तरीके बनाये पर हर किसी के अनुभव से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। संसार भर में  युवाओं के यौन व्यवहार में परिवर्तन लाने से लाभ हुये हैं, जैसे कंबोडिया व थाईलैंड ने देह व्यापार में कमी लाकर, जिंबाब्वे ने पहले सेक्स संबंध बनाने की उम्र में देरी लाकर और युगांडा ने बहुविवाह के खिलाफ रूख बनाकर सफलता अर्जित की है। काँडोम के प्रयोग को बल देने का कदम तो हर मुल्क में लाभ दे चुका है। अनुभवों से सीख लेना अत्यावश्यक है, जैसे युगांडा में यह जाना गया कि जो बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं करते उनके बड़े होकर संक्रमित होने की आशंका तिगुनी हो जाती है, कितना ज़रूरी हो जाता है किसी भी सरकार के लिये अपना शिक्षा बजट बढ़ाना क्योंकि ये एड्स की खिलाफत करने में एक परोक्ष अस्त्र साबित होगा।</p>
<div id="pullQuoteR">एड्स एक असाधारण घटना है, तो ज़ाहिर है कि हमारा इसके प्रति रवैया भी असाधारण होना चाहिये। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले।</div>
<p>एड्स एक असाधारण घटना है, तो ज़ाहिर है कि हमारा इसके प्रति रवैया भी असाधारण होना चाहिये। एड्स को हमारे जीवन में आये पच्चीस साल हो गये। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले। प्रगति हो रही है, पर बहुत कुछ करना शेष है। यूएनएड्स के आंकड़ों के अनुसार युवा वर्ग को एचआईवी से बचे रहने के लिये अपनी जीवनशैली में बदलाव और ज़रूरी जानकारी होने के लिये लिये किये जा रहे प्रयास अभी भी नाकाफी हैं। गुप्त रोगों को छुपाये रखना और उनका इलाज न कराने से एड्स का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एआरवी दवाएँ भी महज़ 20 फीसदी लोगों तक ही पहुँच पा रही हैं। इन दवाओं की कीमत कम करने के लिये सरकारी कोशिशों की नितांत आवश्यकता है।</p>
<p>एड्स का एक बड़ा दुष्प्रभाव है कि समाज को भी संदेह और भय का रोग लग जाता है। यौन विषयों पर बात करना हमारे समाज में वर्जना का विषय रहा है, जासूस विजय जैसे प्रयासों से स्थिति की शक्ल बदल रही है। निःसंदेह शतुरमुर्ग की नाई इस संवेदनशील मसले पर रेत में सर गाड़े रख अनजान बने रहना कोई हल नहीं है। इस भयावह रोग से निबटने का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक बदलाव लाना भी है, एड्स पर प्रस्तावित विधेयक को अगर भारतीय संसद कानून की शक्ल दे सके तो यह भारत ही नहीं विश्व के लिये भी एड्स के खिलाफ छिड़ी जंग में महती सामरिक कदम सिद्ध होगा।</p>
<p class="note"><strong>अतिरिक्त सामग्री व सहयोग</strong>- देबाशीष चक्रवर्ती<br />
<strong>हार्दिक आभारः</strong> मनीषा मिश्र, UNAIDS, सृजन शिल्पी तथा उषा राय, पत्रकार।<br />
तथ्य <a href="http://www.avert.org/indiaaids.htm">भारतीय एचआईवी व एड्स स्टैटिस्टिक्स</a> तथा UNAIDS के 2006 के आँकड़ों पर आधारित।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2107&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0806-cover-bharat-mein-aids/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>एड्स पर फिल्में : अच्छी शुरुवात</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-per-films</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-per-films#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:08:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविजित मुकुल किशोर</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806coveraids-per-films/</guid>
		<description><![CDATA[एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी हिंदी फीचर फिल्मों की गिनती करने के लिये तो हाथों की उँगलियाँ की भी जरुरत नहीं क्योंकि अभी तक केवल दो ही ऐसी फिल्में बनी हैं। पढ़ें <strong>अविजित मुकुल किशोर</strong> की खरी खरी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aidsmovies.jpg" border="0" alt="एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी फिल्म" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">एच</div>
<p>आईवी-एड्स के विषय पर बनी हिंदी फीचर फिल्मों की गिनती करने के लिये तो हाथों की उँगलियाँ की भी जरुरत नहीं क्योंकि अभी तक केवल दो ही ऐसी फिल्में बनी हैं &#8211; ओनीर की &#8220;माई ब्रदर निखिल&#8221; और रेवथी की &#8220;फ़िर मिलेंगे&#8221;। इन फिल्मों के ज़िक्र से इस विषय से सम्बंधित तमाम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू आँखों के तैर जाते हैं। इसके अलावा, फिल्म निर्माताओं की विचारपद्धति को समझना भी आवश्यक है &#8211; कि वे किसे &#8220;दर्शक&#8221; कहते हैं और कैसी फिल्में दिखाने लायक समझते हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">जितने विज्ञापन देखने को आते हैं &#8211; शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में &#8211; यौन सम्बंध को &#8220;अनैतिक सम्बंध&#8221; ही कहा जा रहा है!</div>
<p>हमारी फिल्मों में रोग का अक्सर फिल्म की पृष्ठभूमि में प्रयोग किया जाता है। &#8220;आनंद&#8221; से ले कर &#8220;कल हो न हो&#8221; तक कैंसर के रोगियों के पात्रों वाली कई फिल्में बनी हैं। इसी तरह &#8220;आह&#8221; से ले कर &#8220;आलाप&#8221; तक क्षय रोग पर फिल्में बनी हैं। इन सभी में रोग केवल पात्रों की व्यथा और कहानी में ट्रेजेडी डालने के लिए प्रयोग किया गया है। रोग के विषय, उसके सामाजिक प्रभाव या लोगों को उसके बारे में जागरुक करने के इरादे से कम ही फिल्में बनी हैं।</p>
<p>विदेशी फिल्मों की बात करें तो &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; जैसी कई फिल्मों ने न केवल एड्स का विषय उठाया वरन कई सामाजिक समस्याओं को भी सामने लाये। &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; इस विषय पर बनी पहली फिल्मों में से है और इसमें एक एचआईवी-बाधित पुरुष के साथ, संक्रमित और समलैंगिक होने की वजह से, दफ्तर में हुए भेद भाव को दिखाया गया है। फिर ऐसी कई फिल्में जैसे कि &#8220;एन्ड द बैंड प्लैड आन&#8221; और &#8220;लाँगटाईम कम्पैनियन&#8221; सामाजिक दायित्व के साथ बनाई गयीं और ये व्यवसायिक दृष्टि से भी सफल रहीं। यह कह पाना मुश्किल है कि फिल्मों की वजह से समाज का रुख बदला या फिर समाज स्वयं इन विषयों पर बात करने को तैयार हो चला था जिससे ये फिल्में सफल हो पायीं। शायद दोनों ही बातों में कुछ न कुछ तथ्य है।</p>
<p>एचआईवी-एड्स के बारे में बात करना शुरु करें तो बस ऐसी बातें अपना मुँह उठाये बाहर झाँकने लगती हैं जिन्हें समाज अपनी पूरी ताकत से छुपा के रखना चाहता है। एक समय पर भारत सरकार ने कॉण्डोम के विज्ञापन दूरदर्शन और रेडियो पर बंद करवा दिये थे क्योंकि इनसे यौनता को एक मान्यता मिलती थी और उनका मानना था कि इस से &#8220;अनैतिकता&#8221; फ़ैल सकती है। आज तक इस विषय में जितने विज्ञापन देखने को आते हैं &#8211; शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में &#8211; यौन सम्बंध को &#8220;अनैतिक सम्बंध&#8221; ही कहा जा रहा है! कुछ साल पहले हमारे मंत्रियों ने बिल गेट्स की संस्था द्वारा एचआईवी की रोकथाम हेतु पेश की जा रही भारी भरकम रकम को यह कह कर ठुकरा दिया था कि &#8220;उनके आँकड़े हमारे यहाँ एचआईवी को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं, हमारे यहाँ ऐसी कोई बड़ी समस्या नहीं है।&#8221; भारत में हमने हाल ही में इस सब विषयों पर बात करना शुरु किया है। यौन और सामाजिक नैतिक मूल्य का अधिकतर छत्तीस का आँकड़ा ही रहता है। बॉलीवुड में ये फिल्में बनी और पर्दे पर दिखाई गयीं यह सराहने लायक बात है। &#8220;मेरा भाई निखिल&#8221; समलैंगिकता के विषय में बात करने वाली संभवतः सबसे पहली फिल्म है (दीपा मेहता की &#8220;फायर&#8221; को नहीं गिन रहा क्योंकि वह विदेशी प्रोडक्शन था।) कम बजट की यह फिल्म गोआ के एक युवक के जीवन पर आधारित है। इसमें कोई बड़े स्टार नहीं हैं सिवाय जूही चावला के, जिन्होंने मुख्य पात्र निखिल की बहन की भूमिका बहुत खूबसूरती से निभायी है।</p>
<div id="pullQuoteR">हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है।</div>
<p>&#8220;फ़िर मिलेंगे&#8221; इसकी अपेक्षा एक संपूर्ण मसाला फिल्म है। इसमें सलमान खान, अभिषेक बच्चन और शिल्पा शेट्टी जैसे बड़े सितारे हैं। हालांकि फिल्म में दफ्तर में होने वाले भेदभाव का विषय सीधा &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; से उठाया गया है पर इसका एक दृश्य बहुत पसंद आया जिसमें शिल्पा शेट्टी अभीनित चरित्र के बॉस अपने वकील से कहते हैं कि उन्हें शिल्पा की काबिलियत पर कोई शक नहीं, पर उसके कुचरित्र से शिकायत है। एचआईवी-एड्स की बात भी यहीं आ कर फँस जाती है। समाज में क्या बात करना उचित समझा जाता है क्या नहीं, इसकी ओर ध्यान देने का समय बहुत पहले ही आ गया था।</p>
<p>इन फिल्मों ने यह विषय उठाया और सिनेमाघरों के माध्यम से समाज तक पहुँचाया, यह प्रशँसनीय बात है। एक और महत्वपूर्ण बात है कि हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है। &#8220;समलैंगिक&#8221; शब्द कितना खराब लगता है, पर और क्या कहें, इसके समानार्थी के रूप में इस्तेमाल होते शब्द गाली जैसे लगते हैं। इन फिल्मों में भी एचआईवी और यौन से सम्बंधित शब्दों के लिए अधिकतर अँग्रेजी शब्दों का ही प्रयोग किया गया है।</p>
<hr />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2106&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-per-films/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>एड्स से कैसे बचा जाए</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-se-bachaav</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-se-bachaav#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:05:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[Prevention]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/%e0%a4%8f%e0%a4%a1%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f/</guid>
		<description><![CDATA[एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य स्रोत हैं - यौन संबंध, रक्त द्वारा तथा माँ से शिशु को संक्रमण। यानी एड्स से कोई भी सुरक्षित नहीं। पर क्या एड्स से बचा जा सकता है? जी बिल्कुल! बचाव के तरीके जानने के लिये पढ़ें <strong>रमण कौल</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स से बचाव की बात करने से पहले इस बात पर एक और नज़र डाली जाए कि यह बीमारी फैलती कैसे है। एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य कारण हैं &#8211; यौन द्वारा, रक्त द्वारा, माँ-शिशु संक्रमण द्वारा। अब करते हैं बचाव की बात।</p>
<h1>यौन द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p>आप यौन द्वारा एचआइवी के शिकार न बनें, इस के लिए आप को इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>यदि आप अविवाहित हैं या आप का कोई स्थाई और विश्वसनीय यौन संगी नहीं है तो सेक्स को जितना हो सके, जब तक हो सके, टालना बेहतर है।</li>
<li>सेक्स साथियों में बदलाव न करें तो बेहतर है। एक वफ़ादार साथी से नाता रखें और उस से वफ़ा करें, यानी उसी से सेक्स करें।</li>
<li>यदि आप के पास अपने या अपने साथी के एचआइवी रहित होने का सौ प्रतिशत प्रमाण नहीं है तो सेक्स के समय कंडोम (जैसे निरोध, कोहिनूर, आदि) का प्रयोग करें &#8211; नियमित रूप से और सही विधि से।</li>
</ul>
<p><img title="Use Condom" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-1.jpg" border="0" alt="Use Condom" hspace="3" vspace="3" width="155" height="119" align="right" />बाज़ार में पुरुषों के प्रयोग हेतु कंडोम मिलते हैं, और स्त्रियों के प्रयोग हेतु भी। पुरुषों वाले कंडोम अधिक प्रचलित भी हैं और अधिक उपलब्ध भी &#8212; इस कारण यहाँ हम उन्हीं की बात करेंगे। यदि आप को इस बात की संभावना लगती है कि आप का किसी से यौन संबन्ध होने की संभावना है तो अपने पास कंडोम अवश्य रखें। किसी से सेक्स के लिए राज़ी होने से पहले उसे कंडोम प्रयोग के लिए राज़ी कर लें। कंडोम प्रयोग करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है</p>
<ul>
<li>पैकेट खोलते समय ध्यान से खोलें। आप के नाखून से कंडोम में छेद हो सकता है। छेद वाला कंडोम प्रयोग करना कंडोम प्रयोग न करने के बराबर है।</li>
<li>कंडोम को शिश्न पर चढ़ाने से पूर्व उसे पूरा न खोलें। उस का आगे का सिरा दबाएँ ताकि उस में हवा न फंसी रहे, उस के बाद उसे शिश्न पर चढ़ाते हुए पूरी तरह खोलें। कुछ चित्र <a href="http://www.rubbertree.org/condom.html" target="_new">यहाँ</a> देखें</li>
<li>यौन क्रिया पूरी होने पर शिश्न की अनुत्तेजित स्थिति आने से पहले ही कंडोम को सावधानी से उतारें, और सावधानी से फेंकें, ताकि द्रव्य इधर उधर न गिरे और किसी के संपर्क में न आए। कंडोम को कभी भी पुनः प्रयोग न करें।</li>
</ul>
<h1>रक्त द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Blood transfusion" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-2.jpg" border="0" alt="Blood transfusion" hspace="3" vspace="3" width="108" height="111" align="left" />रक्तदान के समय एड्स का संक्रमण न हो इस के लिए रक्तदाता के खून की जाँच होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि रक्त लेने और देने के लिए जिन सूइयों का प्रयोग हो रहा है, वे नई हों और अप्रयुक्त हों। चूँकि रक्त-आधान अस्पतालों या प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा ही किया जाता है, आज के युग में रक्तदान के द्वारा असावधानी होने पर एचआइवी का संक्रमण होने की संभावना कम है &#8212; ऐसा हो तो घोर अपराध ही कहा जाएगा।</p>
<p><img title="Use of Syringes" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-3.jpg" border="0" alt="Use of Syringes" hspace="3" vspace="3" width="156" height="103" align="right" />रक्त द्वारा संक्रमण होने की अधिक संभावना तब रहती है जब रोगी, या उस के साथी स्वयं गलत तरीके से सूइयों का प्रयोग करते हैं और उन की अदला बदली करते हैं। आम तौर पर ऐसा तब होता है जब इंजेक्शन द्वारा नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले जूठी सूइयों का प्रयोग करते हैं। स्वास्थ्य कर्मचारियों, जो कई रोगियों के बीच काम करते हैं, के लिए भी रक्त द्वारा रोग संक्रमण का खतरा बना रहता है। यदि आप स्वयं को या दूसरों को इंजेक्शन द्वारा दवाइयाँ दे रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें</p>
<ul>
<li>हर बार नई, अप्रयुक्त या संक्रमण रहित सूई का प्रयोग करें।</li>
<li>एक व्यक्ति पर प्रयोग की गई सूई दूसरे व्यक्ति पर प्रयोग न करें।</li>
<li>इंजेक्शन करते समय संपर्क संबन्धी सावधानियाँ बरतें, जैसे फेंके जाने वाले दस्ताने पहनना, इंजेक्शन से पहले और बाद में साबुन और पानी से हाथ धोना, आदि।</li>
</ul>
<h1>माँ-शिशु संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Pregnant Woman" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-4.jpg" border="0" alt="Pregnant Woman" hspace="3" vspace="3" width="34" height="80" align="right" />यदि एक एच॰आइ॰वी॰ युक्त स्त्री गर्भवती हो जाती है तो नवजात शिशु के संक्रमित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है &#8212; यह संक्रमण गर्भ, प्रसव या स्तनपान द्वारा हो सकता है। एचआइवी युक्त स्त्रियाँ एचआइवी युक्त शिशुओं को न जनें, इस के लिए इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>अवांछित गर्भ को टाला जाए, जिस के लिए कंडोम और अन्य गर्भ निरोधक साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।</li>
<li>गर्भ और प्रसव के दौरान माता को एंटीरेट्रोवाइरल दवाइयाँ दी जाएँ, जिस से शिशु के संक्रमित होने का खतरा कम हो जाता है।</li>
<li>यदि अन्य हालात इजाज़त दें ते शिशु का जन्म सी-सेक्शन द्वारा कराया जाए। इस से माता के द्रव्यों से बच्चे का संपर्क कम हो जाता है और संक्रमण का खतरा भी।</li>
<li>यदि अन्य स्वीकार्य विकल्प उपलब्ध हों, तो शिशु को स्तनपान न कराया जाए।</li>
</ul>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; width: 99%;">
<h1>जानकारी ही बचाव है!</h1>
<h3>एड्स है क्या?</h3>
<p>एड्स शब्द बना है एक्वार्यड इम्यूनो डेफिशियेन्सी सिन्ड्रोम से और इसका कारण होता है एक अतिसूक्ष्म कीटाणू ह्यूमन इम्यूनोडेफीशीयेन्सी सिन्ड्रोम यानि एचआईवी। एड्स स्वयं कोई बीमारी नही है पर एड्स से पीड़ित मानव शरीर संक्रामक बीमारियों, जो कि बैक्टीरिया और वायरस आदि से होती हैं, के प्रति अपनी प्राकृतिक प्रतिरोधी शक्ति खो बैठता है क्योंकि एचआईवी रक्त में मौजूद प्रतिरोधी पदार्थ लिफ्मोसाईट्स पर हमला करता है। एड्स पीड़ित के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता के क्रमशः क्षय होने से कोई भी अवसरवादी संक्रमण, यानि आम सर्दी जुकाम से ले कर टी.बी. जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं।</p>
<h3>क्या एड्स का इलाज संभव है ?</h3>
<p>ऐसी दवाईयाँ अब उपलब्ध हैं जिन्हें ए.आर.टी यानि एंटी रेट्रोवाईरल थेरपी दवाईयों के नाम से जाना जाता है। सिपला की ट्रायोम्यून जैसी यह दवाईयाँ महँगी हैं, प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 15000 रुपये होता है, और ये हर जगह आसानी से भी नहीं मिलती। इनके सेवन से बीमारी थम जाती है पर समाप्त नहीं होती। अगर इन दवाओं को लेना रोक दिया जाये तो बीमारी फ़िर से बढ़ जाती है, इसलिए एक बार बीमारी होने के बाद इन्हें जीवन भर लेना पड़ता है। अगर दवा न ली जायें तो बीमारी के लक्षण बढ़ते जाते हैं और एड्स से ग्रस्त व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है।</p>
<div id="pullQuoteR">सिपला जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा।</div>
<p>एक अच्छी खबर यह है कि सिपला और हेटेरो जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये शीघ्र ही पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा (सिपला इसे वाईराडे के नाम से पुकारेगा)। इन्हें यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से भी मंजूरी मिल गई है। इन दवाईयों पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 1 लाख रुपये होगा, संबल यही है कि वैश्विक कीमत से यह 80-85 प्रतिशत सस्ती होंगी।</p>
<h3>एड्स कैसे फैलता है ?</h3>
<p>एचआईवी केवल एक मानव से दूसरे मानव को फैल सकती है। पीड़ित व्यक्ति के शरीर के सभी द्रव्यों जैसे रक्त, स्तनदुग्ध, वीर्य, आदि में फैल जाता है। कोई अन्य व्यक्ति अगर इन द्वव्यों के संपर्क में आता है तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। यह वायरस स्वस्थ त्वचा को पार नहीं कर सकता इसलिए बाहरी शरीर से संपर्क में आने पर इससे कुछ खतरा नहीं होता। इसके फैलने का सबसे आसान तरीका है यौन संपर्क। इसके अतिरिक्त संक्रमित व्यक्ति का रक्त किसी और को देने से, संक्रमित सुई या सिरिंज का इस्तेमाल करने से और संक्रमित माँ के दूध से उसके बच्चों में भी फैल सकता है।</p>
<h3>एड्स के लक्षण क्या हैं ?</h3>
<p>एचआईवी शरीर में प्रवेश के बाद धीरे धीरे फैलना शुरु करता है। जब वायरस की मात्रा शरीर में बहुत बढ़ जाती है, उस समय बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। एड्स के लक्षण प्रकट होने में आठ से दस साल या अधिक भी लग सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को, जिसके शरीर में एड्स का वायरस हों पर एड्स के लक्षण प्रकट न हुए हों, एचआईवी पॉसिटिव यानि एचआईवी वायरस सहिक कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति भी एड्स फैला सकते हैं।</p>
<p>एड्स के लक्षण बहुत विभिन्न तरह के हो सकते हें, क्योंकि शरीर में कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है, इसलिए विभिन्न संक्रामक बीमारियाँ हो सकती हैं, हर संक्रामक बीमारी के अपने लक्षण होते हैं। एड्स के प्रमुख लक्षण हैं वजन में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी और एक माह से ज़्यादा से चल रहा बुखार या डायरिया। अप्रधान संकेतों में एक महीने से ज्यादा लगातार चल रही खाँसी, खुजली वाली त्वचा की बीमारियाँ, बार बार होती दाद, मुँह और गले में छाले आदि शामिल हैं। एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने हेतु मुख्यतः एंज़ाइम लिंक्ड इम्यूनोएब्ज़ॉर्बेंट एसेस यानि एलिसा टेस्ट किया जाता है।</p>
<h3>किसको एड्स का खतरा अधिक है?</h3>
<p>खतरा सभी को है पर किशोरवयः व नौजवान लोगों को खतरा अधिक है क्योंकि आम तौर पर इस उम्र में यौन और नशीले पदार्थों जैसे नये अनुभवों की तलाश अधिक रहती है। युवाओं में एक अन्य वर्ग है जिनको एड्स का खतरा अधिक है, वह है यौन कर्मियों का, यानि वे लोग जो वेश्यावृत्ति से जुड़े हैं। अनुमानतः भारत में करीब 20 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें से 20 प्रतिशत 15 वर्ष से कम आयु के हैं और 50 प्रतिशत 18 वर्ष से भी कम आयु के हैं।</p></div>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2105&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-se-bachaav/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-aur-media</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-aur-media#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:03:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[BBC]]></category>
		<category><![CDATA[doordarshan]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806coveraids-aur-media/</guid>
		<description><![CDATA[हमारे समाज में खुले तौर पर यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम,&#160; हिचक साफ दिखती है। हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। पढ़िये <strong>रवि श्रीवास्तव</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aids-advt.jpg" border="0" alt="Image" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स के बारे में एक तथ्य से शायद हर पढ़ा लिखा परिचित हो, और वह है &#8220;जानकारी ही बचाव है&#8221;। अलबत्ता जानकारी क्या होनी चाहिये यह बिना लागलपेट परोसने में हर माध्यम की घिग्घी बंध जाती है। हमारे समाज में खुले तौर पर और वह भी यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम, यह हिचक साफ दिखती है। भारत के एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक में सरकारी विज्ञापन की बानगी देखें,</p>
<blockquote><p>“कॉन्डोम जरूरी है। कई बार टीवी पे देखा है। अखबारों में पढ़ा है। लेकिन कभी, किसी ने मुझे खुल कर, इसके बारे में कुछ नहीं समझाया। एक दिन जब मैं कॉन्डोम के बारे में छुप कर पढ़ रहा था तो बड़े भैया ने देख लिया। उन्हें सब झट से समझ आ गया। उन्होंने मुझे कॉन्डोम के बारे में अच्छी तरह समझाया। एचआईवी / एड्स और सेक्स के बारे में भी खुल कर बात की। दाद देनी पड़ेगी भैया की। उनकी हिम्मत की। काश सबको ऐसे ओपन-माइंडेड भैया मिलें!”</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">&#8220;मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।&#8221;</div>
<p>हम इस क्रियेटिव माध्यम की कुव्वत या रचनाधर्मिता कि बात अलग रखें तो बात अभी भी चाहरदिवारी के अंदर ही है। पढ़ने वाला अगर जागरूक न हो तो कॉन्डोम क्या है और इसका सही प्रयोग कैसे किया जाता है यह जानकारी इन महंगे विज्ञापन से नहीं मिलती (इसी अंक में पढ़ें &#8211; एड्स से कैसे बचा जाय)। सरकार ने बात करना शुरु किया पर असल जानकारी पाने का जिम्मा &#8220;ओपन-माइंडेड भैया&#8221; पर डाल दिया। तमाम मीडिया एड्स से बचने के ऐसे ही अस्पष्ट संदेशों से अटा पड़ा दीखता है। अलबत्ता यह पता नहीं कि ये विज्ञापन दर्शकों में एड्स के प्रति कोई जागरूकता जगा पाने में सक्षम भी हैं या नहीं।</p>
<p>एड्स जैसी अभूतपूर्व घटना के प्रति प्रतिक्रिया भी अभूतपूर्व होनी चाहिये। लोगों को जानकार बनाने के लिये हर संभव माध्यम और तरीके की भी सहायता लेनी चाहिये। और क्या संदेश कुछ मज़ाकिया ढंग से नहीं दिते जा सकते? थाईलैंड में एड्स एक्टीविस्ट और पूर्व काबिना मंत्री मेचाई वीरवैद्य, जो &#8220;काँडोम किंग&#8221; के नाम से लोकप्रिय हैं, ने हास्य, जिंगल जैसे अपरंपरागत तरीके से जागरूकता फैलाने का काम लिया। पर भारतीय विज्ञापन एजेंसिया भारत के पाठकों को रुख को देखते हुए ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती, हास्य का शुमार तो दूर की बात है। <em>निरंतर</em> ने कई नामी विज्ञापन एजेंसियों से पूछा कि क्या वे हास्य विनोद को शामिल कर कोई कैंम्पेन बना चुके हैं या बनाने वाले हैं, पर केवल मुद्रा ने ही जवाब दिया और वह भी ना में।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; width: 200px; float: right;">
<h3>&#8220;एक बढ़िया कार्यक्रम जो बढ़िया काम कर रहा है&#8221;</h3>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="Om Puri" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/om-puri.jpg" border="0" alt="Om Puri" hspace="3" vspace="3" width="125" height="118" align="left" />लोकप्रिय अभिनेता <strong>ओम पुरी</strong> टी.वी धारावाहिक &#8220;जासूस विजय&#8221; में दर्शकों के साथ पारस्परिक बातचीत के एक अंश की मेज़बानी करते नज़र आते हैं जिसमें दर्शक केस को सुलझाने में जासूस विजय को भी पछाड़ने का प्रयास करते हैं। एक लिहाज़ से वे कार्यक्रम के सूत्रधार भी हैं। ओम का परिचित और सम्माननीय व्यक्तित्व दर्शक और शो के मध्य संवाद स्थापित करने में मदद करता है।</p>
<p>ओम दर्शकों को एड्स और एच.आई.वी के बारे में खुलकर बोलने और अपने सवाल उन तक भेजने को भी उत्साहित करते हैं। &#8220;यह एक बढ़िया कार्यक्रम है जो बढ़िया कार्य कर रहा है।&#8221;, ओम पूरी कहते हैं, &#8220;मैं भारत में जहाँ भी गया, लोग जासूस विजय के बारे में जानते हैं। हाल ही में लद्दाख गया तो वहाँ देखा कि उत्सुक लोग हस्तचालित जनरेटर चलाकर भी यह कार्यक्रम देखते हैं&#8221;।</p></div>
<p>हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। <em>निरंतर </em>एक ऐसे ही प्रयास की अनुशंसा करता है जो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम) यानि भारानी ने दूरदर्शन और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के साथ संयुक्त रूप से निर्मित किया है।</p>
<p>एड्स के विज्ञापनों का श्रोता वर्ग चाहे जो भी हो संदेशों से दुरुहता कम होगी और बात सीधे सादे तरीके से कही जाय जो &#8220;शिक्षा देने&#8221; जैसी न लगे तो गले उतरना आसान होता है। भारानी ने शायद यही सोचकर 15‍‌‍‍‍‍‍ से 40 साल के आयुवर्ग पुरुषों के लिये एक ऐसे ही कार्यक्रम की परिकल्पना की (यह आयुवर्ग यौनिक रूप से ज्यादा सक्रीय होता है और इनको एड्स का खतरा सर्वाधिक है)। इसके फलस्वरूप <a title="BBC World Service Trust" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/trust/">बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट</a> ने  दूरदर्शन पर प्रसारण हेतु दो टी.वी कार्यक्रम &#8220;<a title="Jasoos Vijay website" href="http://www.jasoosvijay.com/" target="_blank"><strong>जासूस विजय</strong></a> &#8221; और &#8220;<a title="Haath se haath mila" href="http://www.haathsehaathmilaa.com/"><strong>हाथ से हाथ मिला</strong></a> &#8221; के रूप में शुरु किया देश का सबसे बड़ा एचआईवी एड्स सजगता कार्यक्रम।</p>
<p>जासूस विजय कार्यक्रम की रुपरेखा रोमांचक है, जिसमें ऐक्शन और ड्रामा के द्वारा एड्स की जानकारी, संक्रमण के मार्ग, गुप्त रोग की पहचान व इलाज और काँडोम के फायदों का संदेश दर्शकों तक पहुँचाया जाता है। और यह वाकई असरकारक रहा है, यह धारावाहिक हर महीने करीब 75 लाख लोगों द्वारा देखा जाता हैं। इतना ही लोकप्रिय है ट्रस्ट का बनाया दूसरा कार्यक्रम &#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; जिसे हर माह 40 लाख दर्शक देखते हैं। &#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; एक साप्ताहिक रियेलिटी शो के प्रारूप में प्रसारित होता है, हर कथा एक युवा सितारे पर केंद्रित होती है जिसने एड्स की जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। कार्यक्रम में बॉलीवुड के सितारों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है।</p>
<p>पर मनोरंजक कारयक्रमों की वजह से कहीं निहित संदेश हंसी में ही इधर उधर तो नहीं हो जाते। बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के युवा कार्यक्रमों की निर्माता प्रियंका दत्त कहती हैं, &#8220;मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।&#8221; जासूस विजय सीरियल के मुख्य पात्र विजय को एच.आई.वी पॉसिटिव चित्रित किया गया है, इससे अनायास ही दर्शकों में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव न करने का संदेश पुख्ता रूप में चला जाता है।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Fardeen Khan with Yuva Start Hasina Kharbih in an episode of Haath Se Haath Mila." src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/haath-se-haath-mila.jpg" border="0" alt="Fardeen Khan with Yuva Start Hasina Kharbih in an episode of Haath Se Haath Mila." hspace="5" vspace="5" width="250" height="172" align="left" />&#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; मे बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदाय के लिये कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, हाल ही के एक एपिसोड में फिल्म स्टार फरदीन खान ने युवा सितारे हसीना खारबीह को शिलाँग मे रॉक कॉनसर्ट के आयोजन का चैलेंज दिया ताकी मेघालय के युवा एड्स के बारे में जानें।</p>
<p>पर क्या वाकई ये कार्यक्रम उपाय कारगर हैं। व्यूअरशिप ठीक है पर क्या इनके असर को मापा तोला भी गया है। 2005 में बी.बी.सी ने एड्स के ज्ञान, रवैये और व्यवहारों पर एक फील्ड स्टडी की। 2001 के राष्ट्रीय बिहेवियरल सेंटीनल सर्वेलेंस सर्वे के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे था। इस सर्वे से पता चला कि, आम तौर पर, टीवी देखने वाले लोगों में, न देखने वालों कि तुलना में एड्स और इससे बचाव के तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी और बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के इन कार्यक्रमों के दर्शकों मे यह जागरूकता कहीं अधिक पायी गई।</p>
<p>बी.बी.सी जासूस विजय की तर्ज पर और कार्यक्रमों पर विचार कर रहा है बस किसी प्रायोजक की तलाश है। संस्थान ने दोनों कार्यक्रमों से संबंधित वेबसाईट्स का निर्माण भी किया है जहाँ पर इन कार्यक्रमों के अलावा एड्स की भी जानकारी उपलब्ध है। एक खास बात है इन जालस्थलों पर उपलब्ध एड्स पर छोटी सी बुकलेट, प्रियंका ने बताया कि यह बुकलेट अब तक 56,000 से ज्यादा लोगों को डाक से भेजी जा चुकी है।</p>
<p class="note">अतिरिक्त सामग्री व सहयोग &#8211; देबाशीष चक्रवर्ती</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2104&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-aur-media/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>पानी का अभाव – धारणाएँ, समस्याएँ और समाधान</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0805-aamukh-katha-01</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0805-aamukh-katha-01#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 01 Aug 2005 17:26:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Cola]]></category>
		<category><![CDATA[Dams]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>
		<category><![CDATA[Urbanization]]></category>
		<category><![CDATA[Water]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=3055</guid>
		<description><![CDATA[जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है, इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी। इस संकट की जड़ क्या है? इस से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि "सबके लिये पानी" का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके? प्रस्तुत है इन सारे विषयों और जल से जुड़े अन्य मुद्दों पर विहंगम दृष्टि डालता चंद्रिका रामानुजम व राजेश राव का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">
<p><img class="alignright" style="margin: 10px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/coverstory.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="right" />जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है,  इसे मानवाधिकार का दर्जा भी दिया जाता है। इसके बावजूद दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास शुद्ध पेयजल उपलब्ध नहीं होता। कहा जाता है कि सन् 2025 तक विश्व की 50 फीसदी आबादी भयंकर जल संकट झेलने को मजबूर होगी। इस संकट की जड़ क्या है? इस से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि &#8220;सबके लिये पानी&#8221; का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके? प्रस्तुत है इन सारे विषयों और जल से जुड़े अन्य मुद्दों पर विहंगम दृष्टि डालता चंद्रिका रामानुजम व राजेश राव का यह आलेख।</p>
<p>लेखक द्वयः एसोशियेशन फॉर इंडियाज़ डेवेलपमेंट (ऍड) की स्थानीय शाखा से संबद्ध स्वयंसेवक हैं। मुख्यतः शिक्षा तथा पानी से जुड़े मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने वाली चंद्रिका पानी से संबंधित मुद्दों पर शोध हेतु ऍड के फोकस समूह का संयोजन करती हैं। राजेश पानी से जुड़े विकास के मुद्दों पर नज़र रखते हैं। चंद्रिका पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं और राजेश इंजीनियर। दोनों ही लेखक आस्टीन, टेक्सास में रहते हैं।</p>
</div>
<div class="dropCap">रा</div>
<p>जस्थान के शुष्क इलाकों में महिलाओं को रोज़ाना घरेलू ज़रूरत का पानी लाने के लिये तकरीबन 4 घंटे चलना पड़ता है।</p>
<ul>
<li>दिसंबर 2003 में कर्नाटक ने तमिलनाडू को ज्यादा पानी देने के उच्चतम न्यायालय के निर्णय पर आपत्ति जतायी।</li>
<li>तमिलनाडू में समय पर पानी नहीं मिल पाने के कारण फसलें काल कवलित होती रहीं।</li>
<li>मधुरंथगम के किसानों का विरोध है कि चैन्नई की ज़रूरतो को पूरा करने के लिये उनके जलाशय से पानी क्यों लिया जा रहा है।</li>
<li>भारत व बांग्लादेश में सेंकड़ो लोग, आर्सेनिक जैसे खतरनाक रसायनों से प्रदूषित पानी पीने को मजबूर हैं, वहीं बोतलबंद पानी का 800 करोड़ रुपयों का बाज़ार फलफूल रहा है।</li>
<li>प्लाचीमाडा, केरल में पंचायत विरोध जताती है कोका कोला के संयंत्र पर, जो उनके प्राकृतिक संसाधनों का नाश कर रहा है, पर न्यायालय आदेश देता है कि कोक अपना उत्पादन शुरु कर सकता है और ग्रामसभा को लाईसेंस देना ही पड़ेगा।</li>
</ul>
<div>
<table border="0" cellspacing="0" cellpadding="0" width="100%">
<tbody>
<tr>
<td width="45%" align="center" valign="top"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/Well.jpg" border="0" alt="" width="236" height="160" /></td>
<td width="10%"></td>
<td width="45%" align="center" valign="top"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/Girl.jpg" border="0" alt="" width="225" height="160" /></td>
</tr>
<tr>
<td align="center" valign="top"><strong>ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को पानी लाने के लिये<br />
4 घंटे पैदल चलना पड़ता है।</strong></td>
<td></td>
<td align="center" valign="top"><strong>पानी लाने की जुगत में लड़कियाँ पाठशाला<br />
जाने की सोचें भी तो कैसे!</strong></td>
</tr>
<tr>
<td colspan="3" align="center" valign="top"><span style="color: #808080;">चित्र आभारः रामकृष्णन, आकाशगंगा परियोजना</span></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<p>यह सारे तथ्य भारत में दिन प्रतिदिन विकराल रूप धरते जलसंकट का रूप दिखाते हैं। जल मनुष्य की बुनियादी ज़रूरत है। युनेस्को जल को मानवाधिकार का दर्जा देती है। पर आज दुनिया भर में लगभग 100 करोड़ लोगों के पास पेयजल उपलब्ध नहीं है। लगभग और 290 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य-रक्षा सुविधायें मुहैय्या नहीं हैं। अनुमान है कि सन् 2015 तक विश्व की आधी आबादी विकट जल संकट झेलने को विवश होगी। इस संकट की जड़ क्या है? क्या घटते जल प्रदाय से जल संकट पैदा हो रहा है? इस संकट से मुकाबला कैसे किया जाये ताकि सहस्त्राब्दी के अंत तक सबके लिये पानी का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके?</p>
<div id="boxL">
<p><img class="aligncenter" style="margin-top: 10px; margin-bottom: 10px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/WaterCycle.jpg" border="0" alt="" width="300" height="205" align="center" />जल चक्र वह प्राकृतिक प्रक्रिया है जिससे शुद्ध जल का सतत पुनर्भरण होती रहती है।</p>
<ul>
<li>महासागर का जल वाश्पिकृत (evaporate) हो वाष्प का रूप धरता है।</li>
<li>वाष्प का द्रविभवन (condensation) होता है और ये बादल का रूप धर लेते हैं।</li>
<li>ठंडी ज़मीनी हवा के संपर्क में आकर जल पातन क्रिया (precipitation) के नतीजतन बारिश या हिम के रूप में गिरती है।</li>
<li>वर्षा जल
<ul>
<li>पौधों और वृक्षों के द्वारा प्रस्वादन से वाष्प में बदलता है।</li>
<li>ज़मीन मे समाता है और भूमिगत जल, नदियों तथा महासागर की ओर बहने लगता है।</li>
<li>पृथ्वी की सतह पर जलधारा के रूप मे बह कर महासागर में मिल जाता है।</li>
</ul>
</li>
</ul>
</div>
<h2>शुद्ध पेयजल पूर्ति व जुड़े खतरे</h2>
<p>पृथ्वी पर मौजूद जलसंपदा का सिर्फ 2.5 प्रतिशत ही शुद्ध जल का स्त्रोत है। इसका भी दो तिहाई हिस्सा ध्रुवीय हिमपिंडो, बर्फ की तहों और गहरे भूमिगत संग्रहों में कैद हैं। तो पूरी जलसंपदा के सिर्फ 0.5 प्रतिशत तक ही मानव की सहज पहुँच है। यह शुद्ध जलापूर्ति विभिन्न रुपों में अभिगम्य है। जल चक्र जल का एक से अन्य रूप में रूपांतरण करता है (<strong>देखें बॉक्सः</strong> जल चक्र), जिससे सतही तथा भूमिगत जल स्त्रोतों की वर्षा तथा पिघलते हिमपिंडो से प्राप्त जल से पुनर्भरण होता है। पर यह जानना ज़रूरी है कि अगर वर्षाजल तथा सतही जल की सही तरीके से हार्वेस्टिंग न हो तो अधिकांश जल भूगर्भीय <em>एक्यूफर्स </em>(पानी का संचय करने वाली पत्थरों और मिट्टी की भूगर्भीय सतह) का पुनर्भरण करने के बजाय समुद्र के हत्थे चढ़ जायेगा।</p>
<p>स्वच्छ जल की आपूर्ति तकरीबन 7400 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रति वर्ष यानि लगभग 4500 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन होती है। इससे आपको ऐसा लगता होगा कि यह तो ज़रूरत से भी ज्यादा है, पर लगातार बढ़ती मांग और घटती सप्लाई से वैश्विक जल प्रबंधन में कई परेशानियाँ हैं।  ताज़े पानी के संसाधन विश्व में असमान रूप से फैले हुए हैं। उदाहरणतः एशिया में, जहाँ संसार की 60 प्रतिशत जनसंख्या रहती है, विश्व के केवल 36 प्रतिशत जल संसाधन हैं। इस असमान विभाजन से जल प्रबन्धन पर दो तरह से असर होता है: पहला, प्रति व्यक्ति जल की मात्रा घट जाती है, जिस का अर्थ है पानी की तंगी और कुछ इलाकों में संकट की स्थिति; और दूसरा, भूमिगत जल के दुरुपयोग से भविष्य में नवीकरण योग्य पानी तक हमारी पहुंच को और हानि पहुंचती है।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/Per-Capita-Consumption.jpg" border="0" alt="" hspace="7" vspace="2" width="300" height="209" align="right" />विश्व भर के जल का 80 प्रतिशत कृषि के लिए प्रयुक्‍त होता है। परन्तु सिंचाई के लिए प्रयोग होने वाले जल का 60 प्रतिशत व्यर्थ जाता है,  रिसती नहरों, वाष्पीकरण और कुप्रबन्धन के कारण। कृषि में प्रयोग हुए खाद और कीटनाशकों के अवशेष भी जल स्रोतों को दूषित करने में अपनी भूमिका अदा करते हैं।</p>
<p>संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रिपोर्ट के अनुसार, औद्योगिक, मानवीय और कृषि-सम्बन्धित जूठन के रूप में 20 लाख टन गन्दगी और विषाक्त जल हमारे पानी में मिल जाता है। इस गन्दगी और विषाक्त पदार्थों से ताज़े जल की उपलब्धि 58 प्रतिशत तक घटने का डर है। इस के अतिरिक्त प्रदूषण से होने वाले नाटकीय जलवायु परिवर्तन से भी जल की उपलब्धि 20 प्रतिशत घटने की आशंका है।</p>
<div id="boxL">
<h2>एक धंसता शहर</h2>
<p>मेक्सिको शहर की स्थापना 15वीं शताब्दी में विजेता स्पेनी सेना ने की। जो जगह पहले नेटिव इंडीयन्स को जीवनोयापन का सहारा देने वाली झीलों की नगरी हुआ करती थी विजेताओं द्वारा शहर का निर्माण करने के लिये बरबाद कर दी गई। विडंबना ही है कि शहर के बढ़ते आकार व ओद्योगिकीकरण से अभी भी भूजल का अत्यधिक प्रयोग हो रहा है। शुद्ध पेयजल की कमी के साथ साथ अपर्याप्त सीवेज और रिसते पाईपों की बदौलत शहर हर 14 दिन में 2 सेंटीमीटर धंसता चला जा रहा है।</p>
</div>
<p>पानी के बढ़ते उपभोग और बढ़ते शहरीकरण के कारण पानी का संकट और भीषण होता जा रहा है। बढ़ते शहरीकरण के परिणामस्वरूप भूमिगत जल का भी संसार के अनेक शहरों में ज़रूरत से ज़्यादा दोहन हो रहा है (<strong>देखें बॉक्सः</strong> एक धंसता शहर)। भूमिगत जल के दुरुपयोग से भूमि भी सिकुड़ रही है और हम जल संग्रहण के सबसे सस्ते पात्र से भी हाथ धोने जा रहे हैं। जलस्रोतों के संरक्षण और शुद्धिकरण में वन महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वे प्रदूषण करने वाले तत्वों को नदियों तक पहुँचने से रोकते हैं, बाढ़ रोकते हैं और भूमिगत जल के पुनर्भरण में वृद्धि करते हैं।</p>
<p>अनुमान है कि न्यूयॉर्क नगर में वितरित जल का 25 प्रतिशत भाग जंगल ही साफ करते हैं। शहरीकरण द्वारा वनों के कटाव और वेटलैंड्स (जलयुक्त भूमिक्षेत्र) के हनन से पानी के भटकने के रास्ते खुले हैं, जिस से कभी बाढ आती हैं तो कभी सूखा पड़ता है।</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/Water_Usage.jpg" border="0" alt="" hspace="6" vspace="2" width="300" height="250" align="right" />किसी भी देश के जल की खपत का स्तर और तरीका वहाँ के आर्थिक विकास के स्तर का एक महत्वपूर्ण सूचक है। विकासशील देशों के लोग, विकसित देशों के लोगों से काफी कम प्रति व्यक्ति जल खर्च करते हैं। इस के अतिरिक्त, विकासशील देशों में जल संसाधनों का अधिकतर भाग कृषि पर खर्च होता है जबकि विकसित देशों में पानी का उपयोग कृषि और उद्योग में लगभग बराबर वितरित रहता है (साथ का ग्राफ देखें)।</p>
<p>आर्थिक विकास से समाज की जीवन शैली में परिवर्तन आता है &#8211; यानी शहरीकरण, पाईपों द्वारा पानी की पहुँच, अनाज/माँस की खपत में वृद्धि, अधिक औद्योगीकरण &#8211; यानि कि हर ऐसी चीज़ जिस से पानी की खपत पर सीधा असर पड़े। अमरीका में औसत प्रति परिवार जल-खपत 1900 में 10 घन मीटर से बढ़ कर 2000 में 200 घन मीटर तक पहुँच गई, क्योंकि अधिकाधिक लोगों के लिए जल का स्रोत कुओं और सार्वजनिक नलों से बदल कर घरों के नल हो गए।</p>
<h2>भारत में पानी से जुड़े मुद्दे</h2>
<p>भारत में जल के दो मुख्य स्रोत हैं &#8211; वर्षा और हिमालय के ग्लेशियरों का हिम-पिघलाव। भारत में वार्षिक वर्षा 1170 मिलीमीटर होती है, जिस से यह संसार के सब से अधिक वर्षा वाले देशों में आता है। परन्तु, यहाँ एक ऋतु से दूसरी ऋतु में, और एक जगह से दूसरी जगह पर, होने वाली वर्षा में बहुत अधिक अन्तर हो जाता है। जहाँ एक सिरे पर उत्तरपूर्व में चेरापूँजी है, जहाँ हर साल 11000 मिलीमीटर बौछार होती है, वहीं दूसरे सिरे पर पश्चिम में जैसलमेर जैसी जगहें हैं जहाँ मुश्किल से 200 मिलीमीटर सालाना बारिश होती है। राजस्थान के लोगों को यह यकीन करना मुश्किल लगता होगा कि गुजरात में इस मानसून की बाढ़ में 2000 करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ या फिर कि हिमाचल की सतलज नदी की बाँध से हज़ारों लोग बेघर हो गये या यह कि हाल की बहुवर्षा से मुंबई का जनजीवन ही अस्तव्यस्त हो गया।</p>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 235px"><img style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/ManOnPipe.jpg" border="0" alt="" width="200" height="160" /><p class="wp-caption-text">शहरी दरिद्र के लिये शुद्ध पेयजल अभी भी स्वप्न मात्र है। चित्रः सोमनाथ मुखर्जी (ऍड, बॉस्टन)</p></div>
<p>हालांकि बर्फ व ग्लेशियर ताजे पानी के इतने अच्छे उत्पादक नहीं हैं, पर वे इसे बांटने के अच्छे साधन हैं व जरुरत के समय पानी देते हैं, जैसे कि गर्मी में। भारत में 80 प्रतिशत नदियों का प्रवाह गर्मियों के जून से लेकर सितम्बर तक के चार महीनों मे होता है जबकि गर्मी व उमस से भरी समुद्री हवा उत्तर पूर्व से अंदर की ओर आती है (दक्षिण पश्चिम मानसून का मौसम)। पानी की कमी भारत में बड़ी तेजी से भयानक रूप लेती जा रही है। विश्व बैंक की एक रपट के अनुसार, जब जनसंख्या 2025 में बढ़कर 140 करोड़ हो जाएगी, पानी की बढ़ी हुई जरुरत को पूरा करने के लिए देश की सभी जल स्त्रोतों का उपयोग करना पड़ेगा।</p>
<p>बढ़ती आबादी का दबाव, आर्थिक विकास और नाकारा सरकारी नीतियों ने जल स्त्रोतों के अत्याधिक प्रयोग तथा प्रदूषण को बढ़ावा दिया है। पुनर्भरण से दुगनी दर पर ज़मीनी पानी बाहर निकाला जा रहा है जिससे कि जलस्तर हर साल 1 से 3 मीटर नीचे गिर जाता है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत की बीस बड़ी नदियों में से पाँच का नदी बेसिन पानी की कमी के मानक 1000 घन मीटर प्रति वर्ष से कम है और अगले तीन दशकों में इस में पाँच और नदी बेसिन भी जूड़ेंगे।</p>
<p>जल प्रदूषण एक गम्भीर समस्या है व जल के उपलब्ध साधनों पर और अधिक दबाव डालती है। जल मंत्रालय के अनुसार, भारत का 70% सतह जल व बढ़ते हूए जमीनी जल के भंडार जैविक, व जहरीले रसायनों से प्रदूषित हैं। वर्ल्ड वॉटर इंस्टिट्यूट के अनुसार गंगा नदी, जो कि अनेकों भारतीयों का मुख्य जल स्त्रोत है, में हर मिनट 11 लाख लीटर गंदा नाले का पानी गिराया जाता है। यूनेस्को द्वारा दी गई विश्व जल विकास रिपोर्ट में भारतीय पानी को दुनिया के सबसे प्रदूषित पानी में तीसरे स्थान पर रखा गया है।</p>
<div id="boxL">
<h2>हरित क्रांति</h2>
<p>हरित क्रांति में तीन मुख्य कारक थे जिन्होंने भारत को अन्न निर्भर देश से दुनिया के सबसे बड़े कृषक देशों में बदल दिया</p>
<ul>
<li>कृषि योग्य भूमि में लगातार विस्तार</li>
<li>चालू कृषि भूमि में दोहरी फसलें &#8211; जिस से कि हर साल एक की जगह दो बार उपज की कटाई होती थी</li>
<li>आनुवंशिक विज्ञान द्वारा बेहतर बीजों का प्रयोग</li>
</ul>
<p>हरित क्रांति से रिकार्ड तोड़ अन्न उत्पादन हुआ व प्रति यूनिट उपज भी बढ़ी। लेकिन इस से पर्यावरण पर बुरा असर भी पड़ा। कृषि-रसायनों पर आधारित खरपतवार नाशकों के प्रयोग ने आसपास के वातावरण व मानव स्वास्थ्य पर भी असर डाला है। सींचित भूमि के बढ़ावे से जमीन की लवणता में भी वृद्धि हुई है।</p>
</div>
<p>जल प्रदूषण के अनेक स्रोत हैं जिनमें सम्मिलित हैं &#8211; घरेलू सीवेज, कृषि एवं औद्योगिक अपशिष्ट। साठ- सत्तर के दशक की &#8220;हरित क्रांति&#8221; ने ढेरों पर्यावरणीय मुद्दों को जन्म दिया (<strong>देखें बॉक्सः</strong> हरित क्रांति)। कृषि कार्यों में बेतहाशा इस्तेमाल किए जा रहे कीटनाशकों तथा कृत्रिम खादों ने जल में घुल मिलकर जलचरों के जीवन तक पहुँच बना ली है तथा जल को उपयोग हेतु अयोग्य बना दिया है।</p>
<p>शहरी क्षेत्रों में जल प्रदूषण का प्रमुख कारण है नालियों का मलमूत्र युक्त गंदा पानी तथा उद्योगों का रसायन युक्त उत्सर्जन जो बह-बह कर नदियों में मिलता रहता है। हर साल करीब 5 करोड़ घन मीटर गैर-उपचारित शहरी नालों का गंदा पानी इन नदियों में बहाया जाता है जिससे भारत की सभी चौदह नदी तंत्र भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं। इसी तरह, औद्योगिक क्षेत्रों द्वारा उत्सर्जित 55 अरब घन मीटर प्रदूषित जल में से 6.85 करोड़ घन मीटर स्थानीय नदियों में, बिना किसी पूर्व उपचार के, सीधे सीधे बहा दिया जाता है।</p>
<p>भारत के 80 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू जल प्रदाय तथा 45 प्रतिशत क्षेत्रों में कृषि कार्य हेतु भूगर्भ जल ही इस्तेमाल में आता है। भूगर्भ जल पर यह भारी-भरकम निर्भरता इसके प्राकृतिक स्रोतों को तेज़ी से ख़त्म कर रही है। राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश तथा दक्षिणी राज्यों में भूगर्भ जल स्तर में तेज़ी से गिरावट दर्ज की जा रही है। भारत अभी अभूतपूर्व आर्थिक उत्थान के दौर से गुजर रहा है जो जल संकट को और भी गहरा करेगा। जैसे जैसे ग्रामीणों का पलायन शहरी क्षेत्रों की ओर बढ़ता जाएगा, घरेलू तथा उद्योगों की बढ़ती जरूरतों की वजह से जल स्रोतों पर और भी अधिक भार पड़ता जाएगा।</p>
<h2>संघर्ष</h2>
<p>जल संकट के कारण साझा जल स्रोतों पर विवाद और संघर्ष पैदा होने की आशंका निर्मूल नहीं है। कर्नाटक तथा तमिलनाडु राज्यों के बीच कावेरी जल विवाद इसका अप्रतिम उदाहरण है। दोनों ही राज्य सिंचाई हेतु कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं। मानसून अगर देरी से आता है या अवर्षा की स्थिति निर्मित होती है तो नदी के जल के उपयोग के लिए हर बार विवाद की स्थिति बन जाती है। यह विवाद स्थानीय कृषकों के विस्थापन से और अधिक तीव्र एवं जटिल हो गया है जो जीवनयापन के लिए कावेरी नदी के जल पर निर्भर हैं।</p>
<p>कृषि उपज के अस्वस्थ तौर तरीक़ों तथा प्रभावी-पारंपरिक वर्षा जल संग्रहण तंत्र के बेजा इस्तेमाल के कारण जल के लिए संघर्ष तीव्रतर होता जा रहा है। क्षुद्र वाणिज्यिक लाभों के लिए तंजावूर डेल्टा स्थित तमिलनाड़ु के बड़े किसान धान की तीन तीन फसलें लेते हैं जिसके पैदावार के लिए जल की अत्यधिक आवश्यकता होती है। कर्नाटक में मंद्या के किसान गन्ने की खेती करते हैं &#8211; जो एक <em>कैश क्रॉप</em> है पर जिसके लिए भी अतिरिक्त जल की आवश्यकता होती है।</p>
<p>हाल ही में पंजाब सरकार अपने उस वादे से मुकर गई जो व्यास नदी के जल को हरियाणा और राजस्थान के बीच साझा करने के लिए सतलज यमुना लिंक बनाया जाने के लिए दिया गया था। हालाकि हरियाणा के तटवर्ती इलाकों में व्यास नदी नहीं बहती है, परंतु यह नदी जल समझौता दरअसल 1976 में हरियाणा के पंजाब अलग होने से पहले का है, लिहाजा हरियाणा का भी इस पर हक है। पर, तब से ही पंजाब अपने गहन कृषि उपयोग के लिए उस जल पर अपना दावा जताता रहा है।</p>
<p>भारत तथा विश्व में अनेक जगहों पर कई नदियाँ दो या अधिक देशों में से होकर बहती हैं। इन नदियों के जल सर्वत्र विवादों से घिरे रहे हैं कि किस देश का कितना हक बनता है। आज की महती आवश्यकता यह है कि कृषि को तर्कसंगत बनाया जाए, जल वितरण न्याय संगत तरीके से किया जाए तथा राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर पर ठोस जल प्रबंधन नीति लागू की जाए।</p>
<h2>बहस निजीकरण की</h2>
<p>जैसे जैसे जल संरक्षण की जरूरतें बढ़ती जाएगी, वैसे वैसे नीति निर्धारकों तथा उद्योगों के बीच निजीकरण पर बहसें नया रूप लेती रहेंगी। आज के विश्व में जहाँ व्यक्ति और समुदाय जल के लिए अपनी गांठ से खर्च कर रहा है, वहीं कृषि तथा उद्योगों को जल के लिए सिंचाई के लिए नहरों और टैक्स छूट इत्यादि के जरिए आर्थिक सहायता मुहैया किए जा रहे हैं। ऊपर से, शहरी क्षेत्रों की सार्वजनिक जल वितरण प्रणालियाँ बढ़ती जरूरतों, भ्रष्टाचार, जल चोरी और ढहते आधारिक संरचना के चलते असफल होती जा रही हैं।</p>
<div id="boxR">
<h2>पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक</h2>
<p>दक्षिण अमेरिका के बोलिविया में जलवितरण का निजीकरण करने का नतीजा निकला पानी की कीमतों में बढ़ोतरी हुई, पानी पहुँच से परे हो गया। कोचाबंबा में जलवितरण के निजीकरण का ठेका बेकटेल नामक कंपनी को मिला। बेकटेल ने तुरंत कीमतें दोगुनी कर दीं और शुल्क आधारित परमिट के द्वारा घरों में वर्षाजल के संचयन पर भी रोक लगा दी। कंपनी के इन मनमाने कदमों को व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ा और अंततः बेकटेल को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। इसके बाद बेकटेल ने बोलिविआई सरकार पर ढाई करोड़ डालर का दावा ठोंक दिया, जो कंपनी का कथित विशुद्ध मुनाफा होता यदि उसे काम करने दिया जाता।</p>
</div>
<p>जलसंसाधनों के निजीकरण की बहस जल को उपभोक्ता सामग्री बनाने के मुद्दे पर केंद्रित है और एक सीधी विचारधारा पर आधारित हैः यदि जल संचयन समय की पुकार है तो जल का मूल्य अदा करने की मजबूरी जलसंचयन को बढावा ही देगी। लेकिन बहस इतनी सीधी भी नही है। पहले तो, जलसंचयन से गरीब व्यक्ति, जो कि आहार श्रँखला के सिरे पर होते हैं, और अधिक जलसंचय करने को मजबूर होगा क्योकि पहले ही उसकी पानी तक पहुँच कम है और वह पानी का अधिक मूल्य वहन भी नही कर सकता। पानी का निजीकरण एकाधिकार को बढावा देगी क्योकि ढाँचागत लागत की वसूली में जल कंपनियों को समय लगेगा और इस दौरान उसके जल वितरण पर निवारक अधिकार रहेंगे। यह एकाधिकार कंपनियों को ग्राहकों से पानी की बढी कीमतें लेने की भी इजाज़त दे देगा (<strong>देखें बॉक्सः</strong> पानी का निजीकरणः बोलिविया का सबक)।</p>
<p>ऐसी हालत में जब कि पानी की कीमत समुदाय द्वारा ही वहन की जानी है, क्या निजी संस्थानों को पानी जैसे बहुमूल्य संसाधन से लाभार्जन की अनुमति देनी चाहिए? तेजी से फैलते वैश्वीकरण में जल का व्यवसायीकरण उसे उन लोगों से छीन लेगा जो कीमत वहन नही कर सकते।</p>
<h2>नदियो का युगमन &#8211; चमत्कार या मृगमरीचिका?</h2>
<p>पिछले कुछ वर्षों में नदियों को जोड़ने की योजना को खासा समर्थन मिला है। भारत में 37 नदियों को तीस कड़ियों, दर्जनों बाँधों और हजारों मील लंबी नहरों द्वारा जोड़ना 10,000 करोड़ रूपये का एक भागीरथ प्रयास होगा। इस योजना के मुख्य उद्देश्य हैं:</p>
<ul>
<li>340 लाख हेक्टेयर भूमि की सिंचाई</li>
<li>ग्रामीण, शहरी और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिये पेयजल।</li>
<li>जलविद्युत जनरेटरों द्वारा 34000 मेगावाट का उत्पादन।</li>
<li>नदीयों के नेटवर्क पर अन्तर्देशीय परिवहन</li>
<li>पर्यावरण सुधार और वनीकरण का विकास</li>
<li>रोजगार सृजन</li>
<li>राष्ट्रीय एकता</li>
</ul>
<p>यद्यपि इनमें कुछ उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं पर जनता एवं गैरसरकारी संगठनों द्वारा कुछ सवालिया निशान भी लगाये गये हैं। भाजपा सर्मथित एन.डी.ए सरकार द्वारा प्रारंभ की गई इस परियोजना का कॉग्रेस सर्मथित यू.पी.ए सरकार के नेतृत्व मे क्या हश्र होता है यह भी अस्पष्ट है। सरकारी दावा है कि नदियों को जोड़ने वाली आठ नहरों के तकनीकी औचित्य अध्ययन पूरे कर लिए गए हैं, फिर भी इन रिपोर्टों को सार्वजनिक नहीं किया गया है। ऐसे दस्तावेज़ों तक पहुँच न हो तो स्वतन्त्र संगठनों द्वारा सरकार के दावों की पुष्टि कठिन हो जाती है। उदाहरणतः यह स्पष्ट नहीं है कि परियोजना से उत्पन्न कितनी ऊर्जा खुद परियोजना को चलाने में खर्च होगी ताकि पानी को अधिक ऊँचाई तक उठाया जाए। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या रिसती नहरों को ठीक करने और सिंचाई की क्षमता को सुधारने जैसे वैकल्पिक समाधानों को भी मद्दे नज़र रखा जा रहा है अथवा नहीं।</p>
<div id="boxL">
<h2>क्या बाँध एक समाधान हैं?</h2>
<p>बीसवीं सदी गवाह रहा ढेरों बड़े बाँधों के निर्माण का। आज विश्व में करीब 48000 बाँध हैं जो बढती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ती कर रहे हैं। संप्रति भारत व चीन विश्व के बड़े बाँध निर्माताओं में शामिल हैं। पर विरले ही ऐसे शोध किये गये जिससे यह पता लगे कि क्या बाँध उन उद्देश्यों की पूर्ती कर भी रहे हैं या नहीं, जिनके लिए उनका निर्माण हुआ।</p>
<p>पिछले दशक में वर्ल्ड कमिशन आन डैम्स (बाँध पर वैश्विक आयोग), जिसमें उद्योगपति, अभियंता, नीति निर्धारक और गैरसरकारी संगठन शामिल होते हैं, द्वारा बाँधो की लागत और उनसे लाभ के मूल्याकँन पर शोध किया गया। उनके शोध से यह साबित हुआ कि भले ही फायदे हुए हों, पर बाँधों के निर्माण कि लागत उनसे होने वालो लाभों से कहीं ज्यादा है। आयोग की सलाह थी कि बाँधों का निर्माण विकल्पहीनता की स्थिति में ही करना चाहिए।</p>
</div>
<p>बहुत से आदिवासी, किसान और मछुआरे नदियों के किनारों पर रहते हैं और अपनी जीविका के लिए नदियों पर निर्भर रहते हैं। अनुमान है कि भारत में 1950 से बने बाँधों के कारण पहले ही 2 करोड़ लोग विस्थापित हो गए हैं। बाँधों की आयु 30 से 50 साल रहती है। आजकल पश्चिम में पर्यावरण को हुई हानि के चलते बाँधों को तोड़ा जा रहा है। बाँधों के निर्माण से जंगल कट गए हैं, हज़ारों ऐसे वनप्राणियों और वृक्षों, जो बाढ़ को रोकने और पानी को ज़मीन में सोखने में मदद करते, का सफाया हो गया है। प्रसिद्ध भाखड़ा नांगल परियोजना के हाल के विश्लेषण से पता चला है कि इस बाँध से मिले पानी से पंजाब की सिंचाई की मांग की केवल 10% पूर्ति हुई है, और भूमिगत जल का घटाव राज्य में खतरनाक गति से जारी है।</p>
<p>प्रस्तावित जुड़ाव राज्यों के बीच बेहतर सहयोग की मांग करता है। परन्तु कई राज्यों ने जुड़ाव योजना को समर्थन देने से मना कर दिया है, क्योंकि उन्हें दूसरे राज्यों के साथ पानी बाँटना पड़ेगा। नदियों की घाटियाँ अन्तर्राष्ट्रीय जल निकाय हैं और उन पर अन्तर्राष्ट्रीय जल सन्धियाँ लागू होती हैं। भारत और उसके पड़ोसियों के बीच पानी के समुचित विभाजन पर कोई सहमति नहीं है।</p>
<p>विश्वव्यापी जल समस्याओं में निपुण सान्द्रा पोस्टेल के अनुसार, जल संरक्षण और वर्तमान संसाधनों का सक्षम प्रयोग आर्थिक और पर्यावरण-संबन्धी दृष्टि से, बाँध बनाने और पानी के वैकल्पिक स्रोत खोजने की अपेक्षा अधिक प्रभावी है। नदियों के पारस्परिक जुड़ाव और अन्य वैकल्पिक समाधानों के लाभ और लागत पर सार्वजनिक चर्चा को बहुत अधिक महत्ता दी जानी चाहिए, इस से पहले कि ज़्यादा देर हो जाए।</p>
<h2>समाधान</h2>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 235px"><img style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/Johar.jpg" border="0" alt="" width="200" height="117" /><p class="wp-caption-text">वर्षाजल संचयन (रेनवॉटर हार्वेस्टिंग) से राजस्थान के अलवर जिले में पिछले तीन साल से सूखे के प्रकोप से निजात पा रखी है।</p></div>
<p>जहाँ चेरापूँजी, जिसे दुनिया के सब से वर्षायुक्त स्थान के रुप में जाना जाता है, जल की कमी से लगातार जूझ रहा है, राजस्थान का अलवर ज़िला, जहाँ वार्षिक वर्षा मात्र 300 मिलीमीटर होती है, असफल मानसून के रहते भी तीन साल से जल की दृष्टि से आत्मनिर्भर रहा है। यह तभी संभव हो पाया जब ऐसे जोहड़ बनाए गए और ठीक किये गए, जिन में मानसून के दौरान बारिश का पानी जमा किया जाता है, ताकि साल भर पानी दस्तियाब रहे। पानी के प्रयोग का नियन्त्रण सामुदायिक निर्णयों द्वारा किया जाता है और ऐसे कार्य वर्जित होते हैं जिन से जल-संवर्धन को हानि पहुँचती है, जैसे पशुओं को अत्यधिक चराना। जल संकट सिर पर होने के कारण ग्रामीण समुदाय ऐसे समाधानों की ओर रुख कर रहे हैं जो पारंपरिक रूप से भारत और अन्य स्थानों में प्रयोग होते रहे हैं। महाराष्ट्र में रालेगाँव सिद्धि से लेकर राजस्थान के अलवर ज़िले में और तमिलनाड़ के कई इलाकों में छोटे बाँध और तालाब ठीक किये जा रहे हैं ताकि स्थानीय जल समस्या को हल किया जाए।</p>
<div id="boxL">
<h2>जल संरक्षण के दस साधारण नियम</h2>
<ul>
<li>हर दिन एक ऐसा काम करने का प्रयास करें जिससे जल बचाया जा सके। फिक्र न करें अगर यह कम है, हर बूँद की कीमत है। आप का कदम बदलाव ला सकता है।</li>
<li>पानी उतना ही प्रयोग करें जितना ज़रूरत हो, जैसे कि दाढ़ी बनाते या ब्रश करते वक्त नल बंद कर दें।</li>
<li>कोशिश करें कि आपके घर के अंदर व बाहर कहीं से पानी का रिसाव नहीं हो रहा हो।</li>
<li>सब्ज़ी, दाल, चावल को धोने में प्रयुक्त पानी फेंके नहीं। इसे फर्श साफ करने या पेड़ों को पानी देने के काम में लाया जा सकता है।</li>
<li>अपनी गाड़ी धोते वक्त पाइप की जगह बाल्टी का प्रयोग करें।</li>
<li>अपने समुदाय में समूह बनाये जो जल संरक्षण और वर्षा जल हार्वेस्टिंग को प्रोत्साहन देता हो। अपने इलाके के लिये साधारण वर्षा जल हार्वेस्टिंग प्रणाली बनायें। छत के जल का संचय कर व छान कर घरेलू प्रयोग के लिये शुद्ध पानी पाया जा सकता है। अधिक जानकारी के लिये <a href="http://www.rainwaterharvesting.org">यह जालस्थल</a> देखें।</li>
<li>अपने शौचालय में <em>लो-फ्लश</em> या <em>ड्यूअल फ्लश</em> जैसे फ्लश उपकरण लगवा कर आप पानी बचा सकते हैं।</li>
<li>नहाते वक्त शॉवर की जगह बाल्टी व मग का इस्तेमाल करें।</li>
<li>अगर वाशिंग मशीन का प्रयोग करना ही है तो मशीन फुल लोड पर चलायें।</li>
<li>दिन के सबसे ठंडे समय यानि प्रातः या सांयकाल अपने बगीचे में पानी डालें।</li>
</ul>
</div>
<p>स्थानीय सरकारों ने, विशेषकर तमिलनाड़ और कर्नाटक में, शहरों की लगभग सभी वाणिज्यिक एवं घरेलू इमारतों में वर्षा का जल एकत्रित करने के लिए सार्वजनिक नीति बनाने पर ज़ोर दिया है, जैसा चेन्नई ने कर दिखाया है। परन्तु बढ़ती आबादी और पानी की खपत के कारण शहरी समुदाय की बढ़ती प्यास बुझाने में ये असफल रहे हैं। अन्य समाधान भी हैं, जिन्हें भारत के सन्दर्भ में कुछ सुधारा जा सकता है। जैसे कि कनाडा, सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया व भारत ने अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए &#8220;ग्रे वॉटर रिसाइक्लिंग&#8221; का प्रयोग करना शुरू किया है।</p>
<p>देश में पानी की सबसे ज्यादा बरबादी कृषि क्षेत्र में होती है। जहाँ विश्व में कृषि दक्षता का प्रतिशत 70 प्रतिशत  है वहीं भारत में यह केवल 35 प्रतिशत है। शेष पानी बह जाने, वाष्प में बदल जाने या वॉटर लॉगिंग के कारण बरबाद हो जाता है। सिंचाई तकनीक में सुधार लाने के लिये काफी आधुनिकीकरण हुआ है। ड्रिप तकनीक उनमें से एक है। सरकार को कम लागत वाली आधुनिक सिंचाई तरकीबों की खोज के लिये धन लगाकर गरीब तथा मार्जीनल किसानों की सहायता करनी चाहिये जो इन मंहगी तरकीबों का खर्च नहीं उठा सकते।</p>
<p>पानी की बढ़ती कमी के कारण जल संरक्षण को आज की जरूरत बना दिया है। घरेलू, कृषि तथा ओद्योगिक स्तर पर जलसंरक्षण को बढ़ावा देना चाहिये। इसका मतलब यही है कि हमें अपनी जीवन शैली तथा <em>क्रॉप पैटर्न</em> (फसल चक्र) का पुनरीक्षण करना होगा ताकि पानी की मांग की को सफलता पूर्वक पूरा किया जा सके।</p>
<p>विभिन्न प्रयोगकर्ताओं में पानी के उपयोग की बढ़ती जरूरतों के मद्देनजर पानी के उपयोग की प्राथमिकताओं का निर्धारण आवश्यक हो गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार घरेलू तथा सफाई संबंधी जरूरतों के लिये प्रति व्यक्ति प्रति दिन पचास लीटर पानी की आवश्यक होती है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या के बावजूद यह आवश्यकता विश्व में उपलब्ध ताजे पानी की मात्रा का केवल 1.5 प्रतिशत है। अत:  न्यूनतम मूलभूत जरूरत को पूरा करने राजनैतिक इच्छाशक्ति आवश्यक है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिये नीति निर्धारकों, सामूहिक तथा कृषि/उद्योग क्षेत्र के प्रयोगकर्ताओं से अलाहदा परिप्रेक्ष्य की जरूरत है। क्या हम इस चुनौती का सामना कर सकते है?</p>
<h2>संदर्भ:</h2>
<ul>
<li>http://news.nationalgeographic.com/news/2003/06/0605_030605_watercrisis.html</li>
<li>http://www.pacinst.org/reports/basic_water_needs/basic_water_needs.pdf</li>
<li>www.worldwater.org</li>
<li>www.cseindia.org</li>
<li>http://www.clw.csiro.au/priorities/urban/awcrrp/stage1files/AWCRRP_1A_Final_23June04.pdf</li>
<li>http://earthtrends.wri.org/features/view_feature.cfm?theme=2&amp;fid=17</li>
<li>http://unesdoc.unesco.org/images/0012/001295/129556e.pdf</li>
<li>http://earthtrends.wri.org/pdf_library/country_profiles/</li>
<li>http://www.devalt.org/water/WaterinIndia/issues.htm</li>
<li>http://www.american.edu/projects/mandala/TED/ice/CAUVERY.HTM</li>
<li>http://edugreen.teri.res.in/explore/water/</li>
<li>http://www.fao.org/ag/agl/aglw/aquastat/countries/india/index.stm</li>
</ul>
<p class="note">एसोशियेशन फॉर इंडियाज़ डेवेलपमेंट (ऍड) जमीनी संगठनों तथा आंदोलनों के साथ मिलकर काम करता व भारत के एक समान, न्यायिक विकास को बढ़ावा देने के लिये प्रतिबद्ध एक स्वयंसेवी, अलाभकारी संगठन है। यह संगठन शिक्षा, जीविका, प्राकृतिक संसाधन, स्वास्थ्य, महिला सशक्तिकरण तथा सामाजिक न्याय जैसे संबंधित मुद्दों को उठाने तथा सहयोग देने के लिये तत्पर है। ज्यादा जानकारी के लिये ऍड का <a href="http://www.aidindia.org">जालस्थल देखें</a>। हिदी रूपांतरणः <a href="about?PHPSESSID=24d056e131063e0832e6bd910fc66a7a">निरंतर टीम</a>, अतिरिक्त सामग्री व ग्राफिक्सः देबाशीष चक्रवर्ती</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=3055&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0805-aamukh-katha-01/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

