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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; पूछिये फुरसतिया से</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>बमों को हमारे शून्य से गुणा कर दो</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:15:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

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		<description><![CDATA[पाकिस्तान न हों तो सैकडों वीररस के कवियों की दुकान बंद हो जाये। टेड़े सवालों के मेड़े जवाबों के साथ फिर हाज़िर हैं आपके फुरसतिया, <strong>अनूप शुक्ला</strong>। पढ़िये और आप भी <strong>पूछिये फुरसतिया से</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3>जीतेंद्र कह रहे हैं कि एड्स से बचने का सबसे आसान उपाय बताइए और एड़्स से बचाव के विज्ञापन का कोई सही आइडिया दीजिए।</h3>
<p>  <img src="http://www.nirantar.org/images/stories/fursatiya.gif" border="0" alt="Poochiye Fursatiya se" title="Poochiye Fursatiya se" hspace="2" vspace="2" width="127" height="125" align="right" />एड्स से बचने के लिये पहले जान लें कि एड्स होता क्या है? यह सभी को पता है कि एड्स से शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अप्राकृतिक खुराफातें एड्स होने का मुख्य कारण हैं। खुराफातें बोले तो अप्राकृतिक यौन संबंध, एड्स रोगी से संक्रमण आदि एड्स से बचने के लिये जरूरी है कि खुराफात रहित जीवन जियें। अपने शरीर को अपना समझें, धर्मशाला समझने से बचें। दूसरा मुफीद उपाय यह है कि आप निरंतर &quot;निरंतर&quot; पत्रिका का पारायण करते रहें। इसमें शारीरिक एड्स से बचाव के उपाय तो बताये ही गये हैं। साथ ही साथ हर अंक की उत्कृष्ट सामग्री आपको मानसिक एड्स (दीवालियापन) से बचने में सहायक होगी। एड्स से बचाव के उपाय के रूप में कुछ नारे हो सकते है-
<ol>
<li>तुम हमें खुराफातें दो, हम तुम्हें एड्स देंगे।</li>
<li>अप्राकृतिक यौन संबंध बनायें, एड्स का उपहार पायें।</li>
<li>जीवन साथी से संबंध, एड्स की दुकान बंद।</li>
</ol>
<h3>पाकिस्तान परमाणु बमों की संख्या बढा रहा है, हिन्दुस्तान क्या करे?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>कल को पाकिस्तान न रहा तो हम किसके भरोसे जियेंगे? मियां अमरीका को भी दिल का दौरा पड़ जायेगा। कहां मिलेगा उनको इतना अच्छा स्टेपनी देश!</div>
</p>
<p>पाकिस्तान की डिलीवरी रात में हुई है। इसीलिये वह निशाचरों की तरह हरकतें पटकता है। पर पाकिस्तान के लोग हमारे देशवासियों की तरह ही सीधे-साधे हैं।  </p>
<p>दरअसल पाकिस्तान का होना हमारे लिये बहुत लाभदायक है। अब तक हम अपने देश में हो रही हर अव्यवस्था के लिये पाकिस्तान को दोष देकर सस्ते में छूट जाते हैं। कहीं दंगा हुआ, पाकिस्तान का हाथ है। नकली नोट मिले, सीमा पार से आये, विस्फोट हुआ- पाकिस्तान ने कराया। गनीमत है कि अपने नलों में पानी न आने की बात में अब तक हम विदेशी हाथ की बात नहीं सोच पाये हैं। गरज यह है कि हमें अपने देश में कोई भी होने वाली किसी भी अव्यवस्था के लिये पाकिस्तान का मुंह ताकना पड़ता है। </p>
<p>   <img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/fursatiya-bomb.jpg" border="0" alt="Bomb guna zero kitna?" title="Bomb guna zero kitna?" hspace="2" vspace="2" width="200" height="194" align="right" /> गोया कि पाकिस्तान न हो हम कहीं मुँह दिखाने लायक न रहें। बडे़-बडे़ घोटाले, भ्रष्टाचार के उफनाते नाले, देश को दो पैसों में बेचने वाले फिर किस भरोसे पनपेंगे? पाकिस्तान न हों तो सैकडों वीररस के कवियों की दुकान बंद हो जाये। फनफनाती जवानी वाले युवा जो पाकिस्तान को फूंक देने की सनसनाती सलाह देते हैं उनके सामने अभिव्यक्ति का संकट पैदा हो जाये। मैं तो यह सोचकर कांप जाता हूँ कि अगर कल को पाकिस्तान न रहा तो हम किसके भरोसे जियेंगे? हमारी तो हमारी, पाकिस्तान को कुछ हो गया तो मियां अमरीका को भी दिल का दौरा पड़ जायेगा। कहां मिलेगा उनको इतना अच्छा स्टेपनी देश!</p>
<p> जहां तक पाकिस्तान के परमाणु बम बनाते जाने की बात है तो भइये उसका जन्म ही घृणा की राजनीति से हुआ है। सो वो तो यह करेगा ही। जवाब में हमें जो करना है वह हमारे देश की सरकार करेगी। लेकिन बिना मांगी हमारी सलाह तो यह है कि शून्य के अविष्कारक देश होने के नाते जितने भी बम पाकिस्तान बनाये सबको शून्य से गुणा कर दो। परिणाम जीरो बटा सन्नाटा हो जायेगा।</p>
<h3>सागर चन्द नाहर का सवाल है कि भारत की आजादी को साठ वर्ष होने को हैं, परन्तु आज भी भारतीय पुरूष स्त्रियों के गुलाम क्यों है?</h3>
<p>  सागरजी अपने सच को सारे भारत के मर्दों पर थोपना ठीक नहीं। आप अपनी कहानी को सारे भारत के मर्दों की कहानी मानकर बड़ी नाइंसाफी कर रहे हैं। एक मर्द के अपनी पत्नी की गुलामी के आंकड़े सारे मर्दों के आंकड़े मानना कुछ ऐसा ही है जैसे किसी बुद्धिमान, खूबसूरत महिला को देखकर यह निष्कर्ष निकालना कि सारी महिलायें बुद्धिमान होती हैं, सारी महिलायें खूबसूरत होती हैं, सारी बुद्धिमान महिलायें खूबसूरत होती हैं या फिर यह कि सारी खूबसूरत महिलायें खूबसूरत होती हैं। सच इन सबसे अलग हो सकता है। इसी तरह औरत-मर्द लोग गुलामी के बजाय बराबरी का रिश्ता भी कायम करने को हुड़क सकते हैं।</p>
<h3>आलोक हैरान हैं कि भारत सरकार ने <a href="http://hi.shunya.in/users/jungly/comment/list?article=960">एक लैप्टॉप प्रति बच्चा </a> वाली योजना नामञ्ज़ूर क्यों कर दी?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>भारत तो है ही एक नाराप्रधान देश। एक नारा दिया, देश का नाड़ा साल-दो साल उसी से कसा रहता है।</div>
</p>
<p>भारत तो है ही एक नाराप्रधान देश। एक नारा दिया, देश का नाड़ा साल-दो साल उसी से कसा रहता है। नेताजी ने कहा, &#39;तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा&#39;। लोगों ने ऐन आजादी के पहले दूसरों का खून बहाकर नेताजी की मांग पूरी कर दी। नेहरू जी बोले, &#39;आराम हराम है&#39;। लोगों ने कहा, &#39;आराम में बड़ी आराम है&#39;। इंदिरा जी बोलीं- &#39;गरीबी हटाओ&#39;। नौकरशाह बोले- &#39;गरीब हटाओ-गरीबी रेखा नीचे लाओ&#39;। नेता बोला -&#39;भ्रष्टाचार मिटाओ&#39;। दूसरा बोला,&#39; हमें भी खाने दो, तुम भी खाओ&#39;। अब तो जनता नारों से इतना ऊब चुकी है कि नेता कहता है, &#39;सरकार हटाओ&#39; तो जनता कहती है- &#39;भेजा मत खाओ, पांच साल बाद आओ&#39;।</p>
<p> तो भइये, प्रति बच्चा एक लैपटाप की योजना भी कुछ ऐसी ही थी। जब पता चला कि हर बच्चे को एक लैपटाप मिलेगा तो लोगों ने कहा हम और बच्चे पैदा करेंगे। इधर बच्चा पैदा करेंगे, उधर लैपटाप मिलेगा। इधर मिलेगा उधर बेंच लेंगे। दस हजार का लैपटाप पांच में तो निकल ही जायेगा। इस तरह योजना की घोषणा होते ही तमाम लोगों ने बच्चे के लिये प्रार्थनापत्र दे दिया। सरकार को कहीं से भनक लग गई। उसे लगा कि इससे एक तो देश पर अरबों खरबों बरबाद होंगे, दूसरे देश की जनसंख्या भ्रष्टाचार की तरह बेतहाशा बढ़ जायेगी। यही सब सोचते हुये उसने योजना वापस ले ली।</p>
<p> कुछ लोग कहते हैं कि योजना के निरस्त होने के पीछे किसी अनुवादक का है। अनुवाद के दौरान उसने भार्गव डिक्शनरी देखकर लैपटाप का अनुवाद किया गोद + लट्टू। बोला सरकार का विचार है कि हर पैदा हुये बच्चे को एक गोद मिलेगी तथा एक लट्टू। अब चूंकि गोद तो सरकार पहले से ही उपलब्ध कराती है तथा लट्टू की तरह तो हर भारतीय बच्चा नाचता है। सो जब दोनों जरूरतें पहले से ही पूरी की जा रही हैं तो फालतू में पैसा खर्च करके क्या फायदा? यही सोचकर सरकार ने घोषणा वापस ले ली। </p>
<h3>रमण पूछते हैं कि बॉलीवुड वाले जो हिन्दी की रोटी खाते हैं, हिन्दी बोलने से क्यों कतराते हैं?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>बेहतर अभिव्यक्ति के प्रयास में हीरोइन अपने पूरे शरीर को ही लैंग्वेज में झोंक देती है।</div>
</p>
<p>इसके पीछे आर्थिक मजबूरी मूल कारण हैं। असल में तीन घंटे के सिनेमा में काम करने के लिये हीरो-हीरोइनों को कुछेक करोड़ रुपये मात्र मिलते हैं। हिंदी फिल्मों में काम करते समय तो डायलाग लिखने वाला डायलाग लिख देता है वो डायलाग इन्हें मुफ्त में मिल जाते हैं सो ये बोल लेते हैं। एक बार जहां सिनेमा पूरा हुआ नहीं कि लेखक लोग हीरो-हीरोइन को घास डालना बंद कर देते हैं। इनके लिये डायलाग लिखना भी बंद कर देते हैं। अब इतने पैसे तो हर कलाकार के पास तो होते नहीं कि पैसे देकर जिंदगी भर के लिये डायलाग लिखा ले। पचास खर्चे होते हैं उनके। माफिया को उगाही देना होता है, पहली बीबी को हर्जाना देना होता है, एक फ्लैट बेच कर दूसरा खरीदना होता है। हालात यह कि तमाम खर्चों के बीच वह इत्ते पैसे नहीं बचा पाता कि किसी कायदे के लेखक से डायलाग लिखा सके। मजबूरी में वह न चाहते हुये भी अपने हालात की तरह टूटी-फूटी हिंदी-अंग्रेजी बोलने पर मजबूर होता है।</p>
<p> अब हिंदी चूंकि वह थोड़ी बहुत समझ लेता है लिहाजा उसे पता लग जाता है कि कितनी वाहियात बोल रहा है। लिहाजा वह घबराकर अंग्रेजी बोलना शुरू कर देता है। अंग्रेजी में यह सुविधा होती है चाहे जैसे बोलो, असर करती है। आत्मविश्वास के साथ कुछ गलत बोलो तो कुछ ज्यादा ही असर करती है। बोलचाल में जो कुछ चूक हो जाती है उसे ये लोग अपने शरीर की भाषा (बाडी लैन्गुयेज) से पूरा करते हैं। बेहतर अभिव्यक्ति के प्रयास में कोई-कोई हीरोइने तो अपने पूरे शरीर को ही लैंग्वेज में झोंक देती हैं। जिह्वा मूक रहती है, जिस्म बोलने लगता है। अब हिंदी लाख वैज्ञानिक भाषा हो लेकिन इतनी सक्षम नहीं कि ज़बान के बदले शरीर से निकलने लगे। तो यह अभिनेता हिंदी बोलने से कतराते नहीं। उनके पास समुचित डायलाग का अभाव होता है जिसके कारण वे चाहते हुये भी हिंदी में नहीं बोल पाते है। </p>
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		<title>नारियल का मिर्ची के साथ गठबंधन</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 20:34:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

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		<description><![CDATA[बंगलौर में नारियल की चटनी में इतनी मिर्ची क्यों डालते हैं? तोगडिया जी हमेशा गुस्से मे क्यों रहते है? आग लगने पर ही पानी भरने की याद क्यों आती है? जब ये सवाल पूछे गये हैं फुरसतिया से तो भई जवाब भी मजेदार ही होंगे, फुरसतिया स्टाईल.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/askfursatiya.gif" alt="पूछिये फुरसतिया से" hspace="1" vspace="1" align="right" />घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?) </p>
<p>भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</p></div>
<p><strong><a href="http://ashishkachittha.blogspot.com/">आशीष</a> का सवाल है कि &#8220;बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया&#8221; कहावत का चलन कब से शुरु हुआ?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/rupees.jpg" alt="" hspace="8" vspace="4" width="180" height="113" align="left" />रुपये-पैसे के बारे में सारे सवाल के जवाब तो भैये कार्ल मार्क्स ही बता पायेंगे तुमको, या फिर पढ़ों &#8220;दास कैपिटल&#8221;। पर जितना अपन को पता है उससे यही बता सकते हैं कि जब से दुनिया को पता चला होगा कि  बाप-भाई के बिना तो काम चल सकता है लेकिन रुपये के बिना नहीं, तभी से यह मुहावरा चलन में आ गया होगा। वैसे भी बिना पैसे का बाप गधा समान माना जाता है जबकि पैसे वाले गधे को भी लोग बाप बनाने के लिये लपकते हैं। पैसा होगा तो कोई गधा भी बाप बनने की सारी प्रकियाओं को बाईपास कर दे,  जबकि पैसा न होने पर बाप बनने की सारी प्रकियाओं को पूरा करने के बाद भी लोग गधे बने रहते हैं। अगर यह सच न होता तो लोग अपने बाप-भाई को छोड़कर पैसा कमाने के लिये अपने घर से दूर गधों की तरह क्यों खटते?</p>
<p><strong><a href="=">आलोक</a> समझ नहीं पा रहे कि बंगलौर में नारियल की चटनी में इतनी मिर्ची क्यों डालते हैं?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">नारियल-मिर्च गठबंधन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुये बनाया गया है।</div>
<p>हुआ कुछ ऐसा भाई कि नारियल ने एक बार सोचा कि हम इतने लोगों की जीविका चलाते हैं देखें लोग हमारे बारे में क्या सोचते हैं। उसने एक मार्केट सर्वे कराया अपनी छवि के बारेमें जानने के लिये। जो रपट आई वो चौंकाने वाली थी। हर बुरे और कठोर आदमी के लोग कहते, &#8220;उसका व्यक्तित्व नारियल की तरह उपर से कठोर लेकिन अंदर से मुलायम है।&#8221; हर लगुये-भगुये को लोग कहते वह नारियल की तरह है। फिर क्या था, गुस्सा आ गया नारियल को। उसने मिर्ची के साथ गठबंधन कर लिया। यह सोचकर कि जहां नारियल पाया जाता है वहां मिर्ची भी बहुतायत में पायी जाती है। सो यह नारियल-मिर्च गठबंधन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुये बनाया गया है। अब बंगलौर चुँकि राजधानी है सो इस गठबंधन का असर सबसे ज्यादा वहीं दिखता है। अब गठबंधन के टिकाउपन का पता तो अपन को क्या उपरवाले को भी नहीं।</p>
<p><strong>झूठ सफेद होता है, लेकिन फिर झूठे का मुँह काला क्यों होता है?</strong></p>
<p>इसके जवाब जानने के लिए इतिहास की झरोखे से बाहर झांकना जरूरी है। पहले लोग जब झूठ बोलते थे तो उसकी सजा तय थी &#8211; कौवे से कटवाना। इधर आपने झूठ बोला उधर कौवा काट गया। इसीलिये यह गाना भी चल निकला &#8211; <em>झूठ बोले कौवा काटे, काले कौवे से डरियो</em>। कौवे बड़ी ईमानदारी से यह काम करते थे। इधर किसी ने झूठ बोला नहीं कि उधर कौवे ने आकर काट लिया। बस यहीं से लफड़ा हो गया। कौवे की कार्य समर्पणता देखकर उसे ढेर सारे काम सौंप दिये गये। किसी अतिथि के आने की सूचना देना हो मुंडेर पर कौवा बोले, किसी अपशकुन की सूचना देनी हो तो कौवे की ड्यूटी, मतलब काम बेहद बढ़ गया। इधर आबादी बढ़ी तो लाज़मी है झूठ भी बढ़ा। उधर कौवे कम हो गये। आदमियों ने भले न अपनाया हो पर कौओं ने परिवार नियोजन पर ध्यान दिया। तो कौओं की संख्या काम के मुकाबले बहुत कम हो गयी। झूठे लोगों को काटने का काम पिछड़ता चला गया।</p>
<p>कुछ तकनीकी समस्यायें भी रहीं। लोग झूठ बोलकर इन्तजार करते कि कौवा आये काट जाये लेकिन कौवे आते नहीं। कहते, &#8220;सौ-पचास झूठ हो जायें तब बताना। एक साथ काट दूंगा आकर।&#8221; आधा झूठ तो युधिष्ठिर जैसे लोग बोल गये लेकिन कौवा आधा काटे कैसे? उधर नेता लोग देश सेवा के नाम पर काटे जाने के खिलाफ अदालती &#8216;स्टे&#8217; ले आये। इन सब समस्याओं के चलते यह तय किया कि झूठ बोलने पर काटने का &#8216;सिस्टम&#8217; पुराना है कुछ नया किया जाये। तो फिर यह तय हुआ कि &#8216;कलर कोडीफिकेशन&#8217; की तर्ज पर जो झूठ बोले उसका मुंह रंग दिया जाये जैसे किसी <a href="http://nuktachini.blogspot.com/2005/06/blog-post_08.html">गुणता निरीक्षण अनुभाग</a> में निरीक्षण करने के बाद वस्तुयें रंग दी जाती हैं। अब जैसा कि आप जानते और मानते है कि झूठ सफेद होता है तो यह तय किया गया कि झूठ बोलने वाले का मुंह काला कर दिया जाये ताकि &#8216;कलर कन्ट्रॉस्ट&#8217; के कारण झूठ दूर से दिख जाये। इसीलिये झूठे का मुँह काला होता है। कैसे सवाल हैं यार संपादक जी, जवाब देने के चक्कर में सौ झूठ हमें भी बोलने पड़ गये।</p>
<p><strong>आलोक फिर पूछते हैं कि विदेश से वापस आ के हिन्दुस्तानियों को अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के अलावा सब लोग बदतमीज़ क्यों लगते हैं?</strong></p>
<p>सवाल कुछ गड़बड़ लग रहा है, <a href="http://www.devanaagarii.net/hi/alok/blog/">आलोक महाशय</a>! होता दरअसल यह है कि जब कोई प्रवासी विदेश से घर आता है तो वह देखता है कि कौन उसके लिये रहने का बढ़िया इन्तजाम करता है, मुफ्त की गाड़ी, मय ड्रायवर (क्योंकि हिन्दुस्तान के रास्ते और गीयर वाली गाड़ी चलाना वह भूल चुका है) जुटा सके, प्रवास के हर खर्चे को छोटा-मोटा समझकर उसे भुगत सके। ऐसे लोगों को ही वह अपना दोस्त तथा रिश्तेदार समझता है। इसके उलट जो बिना किसी सुविधा की औकात के उसके आसपास किसी आशा में मंडराते रहते हैं उन्हें वह बदतमीज समझता है। वैसे इस बारे में मेरा छोटा लड़का कहता है कि जो जैसा होता वह दूसरों के बारे में वैसा ही सोचता है। पर यह सवाल काहे पूछ रहे हो आलोक भाई, आपको तो वापस आये काफी दिन हो गये!</p>
<p><strong>आग लगने पर ही पानी भरने की याद क्यों आती है?</strong></p>
<p>जब हमने यह प्रश्न <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा</a> से पूछा तो प्रतिप्रश्न किया गया, &#8220;आग लगने पर पानी की याद नहीं आयेगी तो क्या आग की याद आयेगी?&#8221;। हमें लगता है कि इसका जवाब भारतीय संस्कृति के गर्भ में छिपा है। भारतीय संस्कृति में संग्रह की प्रवृत्ति वर्जित मानी गई है। भगवान से आदमी केवल इतना मांगता है जितने में वो परिवार सहित खा ले और कोई अतिथि आ जाये तो उसको निपटा ले।</p>
<blockquote><p>साईं इतना दीजिये जामें कुटुम समाय,<br />
मैं भी भूखा न रहूँ साधु न भूखा जाय।</p></blockquote>
<p>अब आग लगने के पहले पानी का इन्तजाम करना मतलब संग्रह की प्रवृत्ति। संस्कृति की अवमानना, संसाधनों का दुरुपयोग। पता चला कि आप पानी का इन्तजाम किये बैठे हो और आग है कि लग के ही नहीं दे रही। सारा इन्तजाम बेकार हो गया न! इसीलिये सुरक्षित तरीका यही यही है कि जब आग लगे तभी पानी का इन्तजाम किया जाये। फिर भी अगर किसी को बुरा लगता है इस दशा पर तो उसके लिये चुल्लू भर पानी काफी है जो कि किसी भी &#8216;बिसलरी&#8217; की बोतल में आ जायेगा। इसके अलावा ठेलुहा समुदाय के लोग इसलिये भी पहले से पानी का कोई इन्तजाम नहीं रखते क्योंकि उनको भरोसा होता है कि जब भी आग लगेगी वो <a href="http://theluwa.blogspot.com/2004/09/blog-post.html">राग मल्हार</a> गाकर पानी बरसवा लेंगे-<em>आग लगी हमरी झोपड़िया में हम गायें मल्हार।</em></p>
<p><strong>फ़ौलादी सिंह पे हिन्दी पिक्चर क्यों नहीं बन रही है?</strong></p>
<p><em>वन्स अपान अ टाइम</em> हम छात्रावस्था में छात्रावास में टेलीविजन देख रहे थे, चित्रहार चल रहा था। कोई हीरोईन टाइप की महिला डान्सरत थी। किसी ने सवाल उछाला, &#8220;ये कौन हीरोईन है?&#8221;  हमारे एक दोस्त ने मासूमियत से जवाब दिया, &#8220;पता नहीं यार, आजकल मैं हीरोईनों के टच में नहीं हूँ।&#8221; तो भैया, हम भी आजकल फौलादी सिंह के टच में नहीं हैं। इसलिये फौलादी सिंह के बारे में जानने के लिये हम अपनी सुपुत्र की शरण में गये। उसने बताया कि फौलादी सिंह के बारे में अभी तक हालीवुड में कोई पिक्चर नहीं बनी। अब जब हालीवुड में नहीं बनी तो बालीवुड में कैसे बनेगी! अगर सही में हिंदी में पिक्चर बनवाना है फौलादी सिंह पर तो पहले अंग्रेजी में कोई ऊलजलूल पिक्चर बनावायी जाये उसपर उसके बाद हिंदी में उसकी नकल की जाये। सीधे-सीधे हिंदी में फौलादी सिंह पर पिक्चर बनाना तो हिंदी फिल्म निर्माण प्रक्रिया का सरासर उल्लंघन होगा।</p>
<p><strong><a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्द्र</a> का सवाल है कि तोगडिया जी हमेशा गुस्से मे क्यों रहते है?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">परशुराम, दुर्वासा, शिव शंकर आदि लोग अपने इंस्टैंट कोप के कारण प्रसिद्ध रहे हैं।</div>
<p>भइया <a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्दर</a>, हमें पता नहीं कि ये तोगड़िया जी कौन हैं, क्या करते हैं पर जब उनके बारे में सवाल पूछा जा रहा है तो लगता है कि कोई बड़े आदमी ही होंगे-हाकिम-हुक्काम टाइप। जहां तक गुस्से की बात है तो भारतीय संस्कृति में गुस्सा बड़ी &#8216;कूल&#8217; चीज माना जाता रहा है। ससुराल में दामाद का गुस्सा, सास का बहू पर गुस्सा, अमीर घर की लड़की का ससुराल वालों पर गुस्सा तो लोग जानते-भोगते ही हैं। इतिहास में भी परशुराम, दुर्वासा, शिव शंकर आदि लोग अपने इंस्टैंट कोप के कारण प्रसिद्ध रहे हैं। पुराने समय में मनमाफिक काम न होने पर गुस्सा करने का रिवाज था। जैसे गोस्वामी तुलसीदास ने बताया भी:</p>
<blockquote><p>विनय न मानत जलधि जड़, गये तीन दिन बीत,<br />
बोले राम सकोप तब, भय बिनु होय न प्रीत।</p></blockquote>
<p>तो रामचन्द्र जी ने तीन दिन तक प्रार्थना का &#8216;रूट फालो&#8217; करने के बाद भी काम न होने पर गुस्से पर &#8216;स्विचओवर&#8217; किया। पर अब जमाना बहुत तेज हो गया है। तीन दिन बहुत होता है, बड़े लोग तड़ से गुस्सा कर देते हैं। पर अगर गुस्से का कारण जानना हो तो जैसा श्रीलाल शुक्ल जी बताते हैं-</p>
<blockquote><p>&#8220;इन हाकिम लोगों को पचास तरह की बीमारियां होती हैं। कब्ज, गैस, डायबिटीज, दुष्चिन्ता, नामर्दी, बवासीर आदि। इनका हाजमा दुरुस्त नहीं रहता। चिड़चिड़े हो जाते हैं और ऊलजलूल हरकतें करते हैं। वास्तव में अपने को कोस रहे होते हैं। तो ऐसे में इनसे डरना नहीं चाहिये और जब ये लोग गुस्सा कर रहे हों तो चुपचाप सोचना चाहिये कि कैसे इन्हें बुत्ता दिया जाये।&#8221;</p></blockquote>
<p>तो मुझे यही लगता है कि आपके तोगड़ियाजी को कुछ यही समस्यायें होंगी जो श्रीलाल शुक्लजी ने बताईं। लोग यह भी कहते हैं कि गुस्सा करने वाले के दिमाग में कोई माईक टाईसनी वायरस घुस जाता है और गुस्सेल प्राणी हरसंभव ऊलजलूल हरकतें करता है।</p>
<p><strong>वाजपेयी जी की जबान बार-बार फिसल क्यों जाती है?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/vajpayee.gif" alt="" hspace="8" vspace="4" width="100" height="106" align="left" />हर आदमी जिंदगी में कभी न कभी फिसलता जरूर है। यह नियम है। वाजपेयी जी विद्वान हैं, संयमी हैं। बचपन, जवानी में कभी नहीं फिसले। पर अब बुजुर्गियत में भी वाजपेयी जी जिंदगी के नियमों का उल्लंघन नहीं करते। लिहाजा फिसलन के सार्वभौमिक सिद्धान्त का पालन करते हैं। वाजपेयी जी के व्यक्तित्व का सबसे आकर्षक पहलू उनकी भाषण कला है जो कि जबान से संचालित होती है। इसीलिये फिसलन के नियम का पालन करने में वह फिसल जाती होगी। इसलिये आप भी कहीं फिसलना चाहते हो अभी फिसल लो। बाद में मजबूरी की फिसलन में वो मजा कहां!</p>
<h2>और अंततः</h2>
<p><strong>हिन्दी चिट्ठाकार फुरसतिया से सवाल पूछने मे झिझकते क्यों है?</strong></p>
<p>यार <a href="http://www.jitu.info/merapanna">जीतेन्दर</a>, तुम कहते हो लोग फुरसतिया से जवाब पूछने में झिझकते क्यों हैं? उधर कुछ <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">भाई लोग</a> तकादा करते हुये पूछते हैं, &#8220;फुरसतिया को जवाब देने की फुरसत क्यों नहीं मिलती?&#8221;। <a href="http://apniduniya.blogspot.com/">कोई कहता</a> है कि बहुत मेहनत लगती होगी जवाब देने में वहीं भाई लोग कहते हैं कि उतना मजा नहीं आया इस बार। जब मैं सोचता हूँ तो हर एक के सवाल सही लगते है। बहरहाल सवाल पूछने में झिझक के कुछ कारण जो मुझे लगते हैं वे हैं</p>
<ul>
<li>लोग यह मानते हैं कि जो सवाल वो सोच रहे हैं वो टेलीपैथी से फुरसतिया तक पहुंच जायेंगे तो बेकार टाइप करने तथा ई-मेल की जहमत क्यों उठाई जाये?</li>
<li>कुछ लोग यह मानते हैं कि जो सवाल उनके मन में उठ रहे हैं उनका जवाब देना फुरसतिया के बस की बात नहीं।</li>
<li>कुछ संकोची यह मानते हैं कि उनके सवाल पढ़कर लोग हंसेंगे।</li>
<li>कुछ लोग कहते हैं कि पहले वाले जवाब तो मिले नहीं, नये सवाल क्यों पूछें जायें?</li>
<li>जो इस किसी में शामिल नहीं हैं उनके दिमाग की उत्सुकता, कौतूहल तथा चुहल वाला हिस्सा सुन्न पड़ गया है। उनको किसी डाक्टर झटका की अविलम्ब जरूरत है।</li>
</ul>
<p class="note">फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &#8220;<a href="http://fursatiya.blogspot.com">फुरसतिया</a>&#8221; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &#8220;पूछिये फुरसतिया से&#8221; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</p>
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		<item>
		<title>परिपक्व हो जायेंगे तब भोली भाली बातें करेंगे</title>
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		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 13:16:05 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

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		<description><![CDATA[आजकल के बच्चों मे बचपना क्यों नज़र नही आता? हिंदुस्तानी फिल्मों में इतने गाने क्यों होते हैं? नेताओं के स्वागत पोस्टर में नाम के आगे "मा." क्यों लिखा रहता है? भूख क्यों लगती है? सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="padding: 0px 5px 5px; margin-top: 0px">घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?) भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</div>
<p><strong>दानव नाचन पूछते हैं आजकल के बच्चों मे बचपना क्यों नज़र नही आता?</strong></p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/kid.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="200" height="149" align="right" />जब हमने अपने बच्चे से पूछा कि तुम्हारा बचपन कहां है तो वह बोला, &#8220;क्या बच्चों जैसी बात करते हैं?&#8221; मैंने कहा, &#8220;मैं सच में पूछ रहा हूं&#8221;। वह बोला,&#8221;हमारा बचपन तो आपने छीन लिया&#8221;। मैं बड़ा नाराज हुआ,&#8221;मज़ाक मत करो! सच बताओ, मुझे लिखना है। तो वह बोला, &#8220;आप पता नहीं किस जमाने की बात करते हो? बहुत दिन हुये नया नियम चालू हुये। अब बचपन आता है पचपन के बाद। हम लोग अब बहुत समझदार हो गये हैं। बचपन का समय बहुत कीमती होता है। बहुत किफायत से खर्च किया जाता है यह। जब हम पक्की तरह समझदार, परिपक्व हो जायेंगे तब जमकर भोली भाली बातें करेंगे। अभी तो आप ही पीछे पड़े रहते हो समझदारी से, सारा दिन पढ़ने लिखने के लिये कहते रहते हो। समय कहां से लायें हम बचपना करने के लिये!&#8221;</p>
<p>दरअसल भैये बच्चों का बचपन वाकई हम बड़ों ने चुरा लिया है। कुम्हार जब अपनी कृति गढ़ता है तो उसे नर्म माटी दरकार होती है, शैशव सी मृदुता ली हुई माटी, जिसे समय की चाक पर फिराते हुये आस्ते आस्ते मनभावन रूप में गढ़ा जा सके, जिसे सारा संसार सराहे और मूल्यवान माने। इसे फिर जीवन की धूप दिखा कर मजबूत बनाया जाता है ताकि बोझ सह सके, संघर्ष कर सके। आजकल के पालक अपनी कृति जल्दी से जल्दी तपाना चाहते हैं, भार सहने की क्षमता से ज्यादा बोझ लाद देते हैं उन पर। बेचारी माटी बचपने की नमी बहुत जल्दी ही खो देती है, असमय और लगातार होती बेहतर बनने की प्रतियोगिता में। अपने अरमान बच्चों से पूरा कराने की होड़ में पालक बचपन के दौर से रूबरू ही नहीं होना चाहते, फिर जब बच्चे सयानेपन की जबां बोलने लगते हैं तो माता पिता पछताते हैं कि जिन कोंपलों को कुचल आगे बढ़े वे खिलते तो कितना अच्छा होता!</p>
<p><strong>जीतेन्द्र कि व्यथा है, जब साथी कहें ब्लॉग लिख, दिल कहे कूद जा मैदान में और दिमाग कहे रूक जा तो क्या करना चाहिये?</strong></p>
<p>अरे क्या कहते हो। ब्लॉगिंग के विचार तो बबुआ ट्यूब से निकले पेस्ट और बिजली के बिल जैसा है, एक बार निकला तो वापसी इंपॉसिबल! वैसे इस बात पर इतानी माथा पच्ची भी क्या करना, खास तौर पर यह जानते हुये कि भले चार लाईना लिखना आपको है, झेलना तो पाठक को है। तो बंधुवर, हम तो यही चाहेंगे कि दिल की बातें नज़रअंदाज न की जायें क्योंकि दिमाग की तो वैसे भी आप खास सुनते न होंगे, जब कोई सुन्दर लड़की नज़रों के रडार के रेंज में हो और होम मिनिस्टरी हो साथ तब भी दिमाग मना करे है, भईये बाज आओ, पर आप सुनो हो क्या? वैसे भी ब्लॉगरों की बीवीयाँ ब्लॉग को सौतन मानती हैं तो (अल्ताफ राजा माफ करेंगे) गुपचुप इश्क लड़ाने का मज़ा लीजिये, बिना सोचे ब्लॉग लेखन का मज़ा लीजिये। वैसे अगर वाकई दिमाग की राह पर भूस्खलन हो गया हो और सृजनात्मकता के शहर में कर्फ्यू लगा हो तो अपनी कॉलेज की पुरानी नोटबुक निकाल कर बेख़ौफ़ दाग दें दर्जनो बार मित्रों को सुनायी और बीसीयों बार पत्रिकाओं द्वारा लौटाई गयीं अपनी तुकारांत स्वरचित कविताएँ। हिन्दी के ब्लॉगमंडल में आजकल इनका फैशन भी सर चढ़कर बोल रहा है। हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा।</p>
<p><strong>शैल का जिज्ञासा है कि हिंदुस्तानी फिल्मों में इतने गाने क्यों होते हैं?</strong></p>
<div>शरीर की जरूरतें तो पूरी हो जाती हैं, मन की भूख कभी नहीं पूरी होती। यहीं से सारा लफड़ा होता है।</div>
<p>हिंदुस्तानी फिल्मों का तो ऐसा है शैल भइया कि फिल्म में कोई कहानी न हो तो एक बार काम चल सकता है। पर बिना गाने के कोई फिल्म एक कदम नहीं चल सकती। कारण बहुत हैं पर सबसे मुख्य है कि हम लोग हर एक हर का ख्याल रखने की पवित्र आदत से नत्थी रहते हैं। सिनेमा चाहे अंतरिक्ष की कहानी लेकर बने उसमें हीरो-हीरोइन रखने ही पड़ेंगे। तो एक युगल गीत तो होगा ही। फिर हीरो-हीरोइन हमेशा तो साथ रह नहीं सकते तो एक विरह गीत तो गाना ही पड़ेगा हीरो को (याद आ रही है टाइप)। फिर हीरोइन कैसे नहीं याद करेगी हीरो को !वह भी गायेगी (मेरे पिया गये रंगून टाइप का) गाना। फिर जो कहीं कोई त्योहार पड़ गया तो उसको भी कृतार्थ करना पड़ेगा। कहीं पारिवारिक सिनेमा हुआ तो पूरा परिवार मिलकर एक खुशी का तथा एक गम का गाना तो गायेगा ही। पार्टी अगर कोई हुई तो कितनी फीकी लगेगी बिना गाने के! अब भगवान को न याद किया तो शायद सिनेमा चौपट हो जाये सो एक भजन भी लाजिमी है।</p>
<p>आजकल तो मल्टीस्टार फिल्मों को जमाना है। हर स्टार एक युगल गीत चाहेगा। फिर बहुत से गाने &#8220;बस यूं ही टाइप&#8221; के होते हैं। कुछ नहीं समझ में आया किसी के तो गाना शुरु हो गया। जब किसी सीन में लड़ाई-झगड़े की तैयारी जब बहुत देर तक दिखाई जाती है पर लड़ाई शुरु नहीं होती तो मुझे लगता है कि कहीं काम (खेत/दफ्तर/सीमा/मैदान) से हारा थका हीरो दोनों पक्षों के बीच में आकर बस गाना गाने ही वाला है जिससे प्रभावित होकर लोग आपस में गले मिलने लगेंगे। इतना सब होने के बावजूद बहुत लोग &#8220;बेगाने&#8221; रह जाते हैं। नहीं मिल पाता उन्हें अलग से कोई गाना-साझे में कोरस गाना पडता है।</p>
<p>तो लब्बोलुआब यह कि हिंदुस्तानी फिल्मों में हर बात को यथासंभव गाने से घेरने की कोशिश कि जाती है-बिना भेदभाव के। इस प्रयास में अगर कुछ ऊंच-नीच हो जाये तो फिल्म का क्या दोष। वैसे भी हिंदुस्तान में शायद अभी भी सिनेमा में घुसने के पैसे पड़ते हैं। सिनेमा हाल से घर वापस आने का अभी भी कोई टिकट नहीं पड़ता। पानी सर से ऊपर गुजरने पर इस मुफ्त सुविधा लाभ हर कोई बिना भेदभाव के उठा सकता है।</p>
<p><strong>किसी ने पूछा है कि नेताओं के स्वागत पोस्टर में नाम के आगे &#8220;मा.&#8221; क्यों लिखा रहता है?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/neta.jpg" border="0" alt="" hspace="5" vspace="2" width="241" height="182" align="left" />जब कभी मा. लिखने की परंपरा शुरु हुयी होगी तो उसका मतलब &#8220;माननीय&#8221; रहा होगा। अर्थात, नेताजी मान-सम्मान के योग्य हैं। अब लोग सम्मान करें या न करें यह उनकी श्रद्धा है। वैसे मा. लिखने के पीछे शायद बचत की भावना रही होगी, कि एक अक्षर लिख के चार का मतलब निकाल लिया। अब जबसे नेताओं के आचरण में समय के अनुसार दूसरे गैर जिम्मेदाराना पहलू जुड़े होंगे तो यह <em>जाकी रही भावना जैसी</em> की सुविधा देते हुये &#8220;श्लेष&#8221; अलंकार में बदल गया। नेताओं के आचरण के हिसाब से मनचाहा अर्थ तलाश कर सकते हैं लोग। मान लीजिये कि नेताजी का नाम &#8220;सेवकराम&#8221; (किसी जीवित या मृत नेता से समानता होना स्वाभाविक है) है । तो मा.सेवकराम के पोस्टर के कुछ मतलब निम्नवत हो सकते हैं-</p>
<ul>
<li>माननीय सेवकराम</li>
<li>माटीपुत्र सेवकराम</li>
<li>माबदौलत सेवकराम</li>
<li>मारिये सेवकराम को</li>
<li>मान गये सेवकराम</li>
<li>मानेंगे नहीं सेवकराम</li>
<li>मारिये (विरोधियों को) &#8211; सेवकराम</li>
<li>मार डालेंगे (ये) सेवकराम (को)</li>
<li>मारते काहे नहीं &#8211; सेवकराम</li>
</ul>
<p>अब सब कुछ हमीं बतायेंगे क्या यार! कुछ आप भी तो जोड़िये अपने उद्‌गार!</p>
<h2>और जाते जाते&#8230;</h2>
<p><strong>देवाशीष का सवालः भूख क्यों लगती है?</strong></p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/girl_apple.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="175" height="163" align="right" />हे मानव! आम धारणा है कि शरीर एक मशीन की तरह काम करता है। इसे चलाने के लिये ऊर्जा चाहिये। भूख इसीलिये लगती है ताकि जहां ऊर्जा खतम हो नयी ऊर्जा भोजन के रूप में दी जाये। भूख का चलन कैसे शुरु हुआ यह जानने के लिये हमने दुनिया के पहले जोड़े, आदम-हव्वा से पूछा। पता चला कि कहानी कुछ दूसरी है।</p>
<p>आदम-हव्वा आपस में मिलते थे यह तो तीसी कक्षा का बालक भी जानता होगा। बहरहाल, सूत्रों की खबर है कि वे लटपटा गये थे। कुछ-कुछ होने लगा था दोनों को। फिर इलू-इलू भी हुआ। वहां के राजा (या ज़मींदार या मंत्री, अरे कूछ भी मान लो भाई! कहानी मे विध्न न डालो!) को बड़ा नागवार गुजरा यह प्रेम संबंध। उसने साजिश करके सेब के पीछे वर्जित फल लिखवा दिया जिसे आदम चूमता रहता था हव्वा के इन्तजार में, उसके गाल समझकर। एक दिन कुछ ज्यादा देर हो गयी। बेकरारी बढ़ गयी आदम की। बोसा लेते लेते, सेब को हकीकत में हव्वा का गाल समझ कर काट लिया फल को। वहां पहले से ही तैनात राजा के लोगों ने उसे &#8220;रंगे होठों&#8221; पकड़ लिया तथा निकाल बाहर किया दोनों को जन्नत से। तब से प्रतिक्रियावश काटने तथा खाने की आदतें विकसित हो गयी तथा भूख का जन्म हुआ।</p>
<p>इतना तो जानते होगे नादान कि, भूख भी दो तरह की होती है। एक शरीर की जरूरत के मुताबिक दूसरी मन की जरूरत के हिसाब से। शरीर की जरूरतें तो पूरी हो जाती हैं, मन की भूख कभी नहीं पूरी होती। यहीं से सारा लफड़ा होता है। एक सच्ची घटना बताता हूं</p>
<blockquote><p>एक आदमी को खूब खाने की आदत थी। सौ, दो सौ रोटी खा जाता एक बार में। एक सर्कस वाले ने उसे अपने यहां रख लिया। टिकट लगाकर उसे दिखाता लोगों को कि देखो ऐसा आदमी जो बिना डकार लिये खाता रहता है। तीन शो करता। सब के सब, हाउसफुल! एक दिन पेटू महाशय ने कहा, &#8220;मेरा हिसाब कर दो। मैं तुम्हारे यहां और काम नहीं कर सकता।&#8221; मालिक अचकचा गया, पूछा, &#8220;क्या बात है? क्या तन्ख्वाह कम है? सुख सुविधा में कमी है? बताओ तो सही!&#8221; वह मासूमियत से बोला, &#8220;तुम्हारी सर्विस कंडीशन हमें फूटी आँखों पसंद नहीं हैं। दिन भर मुझसे काम कराते रहते हो। सबेरे, दोपहर, शाम तुम्हारे शो में ही लगा रहता हूं, मुझे अपना ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर करने का तो टाइम ही नहीं मिलता। भूख के मारे हालत खराब हो जाती है।&#8221;</p></blockquote>
<p class="note">फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &#8220;<a href="http://fursatiya.blogspot.com/">फुरसतिया</a>&#8221; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &#8220;पूछिये फुरसतिया से&#8221; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</p>
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		</item>
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		<title>आस्था की तुष्टि से संतोष मिलता है</title>
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		<pubDate>Mon, 23 May 2005 06:50:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0505fursatiya/</guid>
		<description><![CDATA[रात के बाद सबेरा होता है या सबेरे के पहले रात? आजकल हसीनों में शर्मोहया क्यों नहीं है? पूजा के समय भगवान को प्रसाद व भोग चढ़ाया जाता है, यह जानते हुये भी कि अंतत: खाना इन्सान को ही है। आखिर क्यों? ऐसे ही टेड़े सवालों के मेड़े जवाब दे रहे हैं हाजिर जवाब <strong>फुरसतिया</strong>!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px"><img hspace="1" vspace="1" border="0" align="right" alt="पूछिये फुरसतिया से" src="http://www.nirantar.org/images/stories/askfursatiya.gif" />घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?) भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</div>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">तरुण पूछते हैं कि रात के बाद सबेरा होता है या सबेरे के पहले रात?</h3>
<p>यार, पहला सवाल पूछा वो भी <a href="http://apniduniya.blogspot.com/">निठल्ला</a>! यह तो मुर्गी पहले या अंडे वाली बात हुई। एक घर में एक मेहमान कुछ ज्यादा दिन टिक गया। घर के बच्चे ने कहा, &quot;अंकलजी,आप इतने अच्छे हैं। क्या आप फिर नहीं आयेंगे?&quot; मेहमान बोला, &quot;क्यों नहीं आयेंगे बेटा? जरूर आयेंगे। तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि मैं नहीं आऊंगा।&quot; बच्चा बोला, &quot;आप आयेंगे तो तब जब आप जायेंगे&quot;। तो यही हाल रात-सबेरे का है। एक का आना दूसरे के जाने से जुड़ा है। आप किसको पहले देखना चाहते हैं यह आप पर है। वैसे मैं तो यही मानता हूं कि हर रात के बाद सबेरा आता है। किसी भी सबेरे तक पहुंच कर रात के बारे में सोचना समय बरबाद करना है।</p>
<p>    <img hspace="5" vspace="5" border="0" align="left" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/lady.gif" /><br />
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">जितेन्द्र पूछते हैं आजकल हसीनों में शर्मोहया क्यों नहीं है? वो शरमाना, वो लजाना कहाँ गायब हो गया है?</h3>
<p>
<div id='pullQuoteR'>आज के &#8216;डेटिंग&#8217; के जमाने में तुम शर्म खोज रहे हो। बड़े बेशर्म हो! यह तो कुछ ऐसा ही है कि &#8216;फ्लडलाइट&#8217; के जमाने में लालटेन की या &#8216;लेटेस्ट&#8217; लैपटाप में 5.25&quot; की फ्लापी ड्राइव खोजी जाये।</div>
<p>किन हसीनाओं से मिल रहे हो आजकल मियाँ? क्या वे तुम्हारे कहने पर भी ब्लाग लिखने को तैयार नहीं हैं जो तुमको वे बेशर्म, बेहया लग रही हैं? वैसे हर ज़माने में खूबसूरती और इज़हारे मुहब्बत के प्रतिमान अलग होते है। आज के &#8216;डेटिंग&#8217; के जमाने में तुम शर्म खोज रहे हो। बड़े बेशर्म हो! यह तो कुछ ऐसा ही है कि &#8216;फ्लडलाइट&#8217; के जमाने में लालटेन की या &#8216;लेटेस्ट&#8217; लैपटाप में 5.25&quot; की फ्लापी ड्राइव खोजी जाये या इस &#8216;नेटयुग&#8217; में संदेशों के लिये कबूतरों का इंतजार किया जाये। याद है, पहले कभी किसी की तिरछी नजर जिदगी भर कुछ यूँ धंसी रहती थी-</p>
<blockquote>
<p>तिरछी नजर का तीर है मुश्किल से निकलेगा,<br />
  गर दिल से निकलेगा तो दिल के साथ निकलेगा।</p>
</blockquote>
<p>अब जमाना बदल रहा है। महिलायें अब नैन झुका के नहीं, मिला के बात करने लगी हैं। मामला बराबरी का है। ऐसे में लजाने, शर्माने, हाय दैया कहकर लाल हो जाने वाली हसीनाओं की खोज करना समय चक्र को पीछे करना है। फिर भी अगर हुड़क रहा हो जी किसी नाज-नखरे, शर्मो-हया से लथपथ हसीना से दीदार का, तो हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह चले जाओ किसी सुदूर ग्रामीण अंचल में छुट्टी बिताने। शायद मिल जायें। पर पत्नी से पूछ लेना। कहीं ऐसा न हो कि <a href="http://www.jitu.info/merapanna/?p=304">बाथरूम</a> की जगह पूरा घर साफ करना पड़ जाये, हर रोज़।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">देवाशीष का सवाल है, पूजा के समय भगवान को प्रसाद व भोग चढ़ाया जाता है, यह जानते हुये भी कि अंतत: खाना इन्सान को ही है। आखिर क्यों?</h3>
<p>भइयै, इस बारे में हमने नारदजी से बात की। सवाला कि कितना पहुंचता है प्रसाद भगवान के पास? वे बोले, &quot;जितना चढ़ता है उसका यही कोई 15%&quot;। हमारा कौतूहल बढ़ा, पूछ बैठे, &quot;बाकी कहां जाता है?&quot; वे सकुचाकर बोले, &quot;बिचौलिये खा जाते हैं&quot;। हमें बड़ी चिंता हुई। सोचा कि भगवान भी क्या भारत की आम जनता हो गये हैं, जिनके लिये चले प्रसाद का कुछ अंश ही उन तक पहुंच पाता है, शेष बीच वाले खा जाते हैं। लोगों का यह जानते हुये भी प्रसाद चढ़ाना, कि खाना उन्हीं को है कुछ इसी तरह है ज्यों जनता के कल्याण के नाम पर नेता-अधिकारी ऐसी योजनायें बनाते हैं जिनसे अंतत: स्व&zwj;-कल्याण ही हो।</p>
<p>
<div id='pullQuoteR'>हरिशंकर परसाई जी ने &quot;सुदामा के चावल&quot; में बताया है कि असल में सारा चावल तो द्वारपाल नोच-खसोट कर खा गये थे। कृष्ण के पास सुदामा खाली हाथ पहुंचे थे।</div>
<p>यह लोककथा प्रचलित है कि सुदामा के चावल खाकर कृष्ण ने उनको मालामाल कर दिया। हरिशंकर परसाई जी ने &quot;सुदामा के चावल&quot; में बताया है कि असल में सारा चावल तो द्वारपाल नोच-खसोट कर खा गये थे। कृष्ण के पास सुदामा खाली हाथ पहुंचे थे। पूरा वाकया सुनने पर कृष्ण ने इस सच को छुपाने के लिये सुदामा को मालामाल किया था कि सुदामा उनके दरबार में लूट लिये गये। उन्होंने कहा था, &quot;तुम नवें आदमी हो जो अपने को सुदामा बताकर आया है। मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो? पर यह धन मैं इस अनुरोध के साथ दे रहा हूं कि मेरे दरबार में जो धांधली फैली है वह बाहर मत कहना। यह एक मित्र को मेरा उपहार नहीं है। सच को दबाने का सौदा है यह।&quot; बाद में सौदा पट जाने पर &quot;दो मुट्&zwnj;ठी चावल- दो लोक&quot; वाली कहानी फैला दी गयी।</p>
<p>वैसे माहाराज, अपने से ताकतवर को पूजने का पुराने समय से ही रिवाज रहा है। मानव पहले प्रकृति से रहस्यों से अनजान था तो शुरु में अग्नि, वायु, जल आदि को पूजता रहा। प्रसाद चढ़ाता रहा। ये देवता हमारे बीच के थे। प्रसाद सीधे पहुंच जाता रहा। बाद में मानव की जरूरतें बढ़ीं तो देवता &#8216;इम्पोर्ट&#8217; किये गये। अवतरित हुये पापनाश के लिये &#8211; दुष्टों के संहार के लिये। पूजा-प्रसाद का तरीका वही रहा। सच बात तो यह है कि कहीं कुछ नहीं पहुंचता। यह तो हमारी रूढ़ सोच है कि यहां के चढ़ाया प्रसाद किसी भगवान तक पहुंचता है। यह हमारी आस्था है जिसकी तुष्टि से हमें संतोष मिलता है। अगर भगवान कहीं हैं और प्रसाद के पैमाने से भक्तों को सुख आवंटित करते हैं तो उनमें और घूस लेकर काम करने वाले अफसर में क्या अंतर है? हालांकि घनघोर आस्तिक भी मानते कहते हैं कि मुख्य चीज है भावना। कुछ लोग पूरी दुनिया में भगवान की सत्ता मानते हैं तथा कहते हैं-</p>
<blockquote>
<p>जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,<br />
  या फिर वो जगह बता जहां खुदा न हो।</p>
</blockquote>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">जितेन्द्र का एक और सवाल: लोग कहते हैं कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। आपका जहां कितना मुकम्मल है?</h3>
<p>यार जीतेन्दर, पूरा जहां तो अपन ने देखा नहीं अभी तक, पर यह जानते हैं कि हमें पल्लवित करने के लिये अपनी सुविधाओं को स्थगित करने वाले मां-बाप-भाई मिले, हमको अपना <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/03/blog-post_09.html">मानसपुत्र</a> मानने वाले तथा अपने को दुनिया में किसी से भी हीन न समझने का उत्साह व आत्मविश्वास भरने वाले गुरु मिले, अपने से भी ज्यादा अपना समझने वाले दोस्त मिले, सारे मतभेद और विसंगतियों को अनदेखा करके चाहने वाली पतिगर्विता <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2005/01/blog-post_25.html">पत्नी</a> मिली, बेहद प्यारे-बेऐब बच्चे मिले, लगभग अपनी शर्तों पर काम करने लायक परिस्थितियां मिलीं और अब तुम्हारे जैसे सिरफिरे सवाल पूछने वाले दोस्त मिले। लोग &#8216;बिग बैंग&#8217; थ्योरी के आधार पर कहते हैं कि ब्रम्हांड प्रकाश की गति से फैल रहा है। जब कभी यह प्रसार रुकेगा ऊर्जा के चुकने पर तो ब्रम्हांड सोचेगा, यार काश मैं फुरसतिया के जहां जितना मुकम्मल हो पाता। हमारी बात ही शायद कृष्ण बिहारी &#8216;नूर&#8217; ने अपने शेर में कही है-</p>
<blockquote>
<p>मैं कतरा सही, मेरा अलग वजूद तो है,<br />
  हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।</p>
</blockquote>
<p>&nbsp;</p>
<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px">फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &quot;<a href="http://fursatiya.blogspot.com/">फुरसतिया</a>&quot; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &quot;पूछिये फुरसतिया से&quot; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</div>
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		<title>सुपरमैन और अंडरवियर</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-fursatiya</link>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 06:44:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0405fursatiya/</guid>
		<description><![CDATA[अगर आपकी पूर्व प्रेमिका अपने बच्चों को आपसे उनके मामा तौर पर मिलवाये तो आप क्या करेंगे? अगर सुपरमैन इतना बुद्धिमान है तो फिर अंडरवियर अपनी पैंट के ऊपर क्यों पहनता है? कहते हैं कि पैदल चलने और जॉगिंग करने से वजन कम होता है। तो क्या उल्टे पैर चलने से वजन बढ़ सकता है? ऐसे ही टेड़े सवालों के मेड़े जवाब दे रहे हैं हाजिर जवाब <strong>फुरसतिया</strong>!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px">
<p><img width="135" vspace="8" hspace="8" height="140" border="0" align="left" title="Poochiye Fursatiya se" alt="Poochiye Fursatiya se" src="http://www.nirantar.org/images/stories/askfursatiya.gif" />घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?)</p>
<p> भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</p>
</p></div>
<p>
<h3>अगर आपकी पूर्व प्रेमिका अपने बच्चों को आपसे उनके मामा तौर पर मिलवाये तो आप क्या करेंगे? </h3>
<p></p>
<p>भैये! प्रेमिका के बच्चों के मामा की स्थिति को प्राप्त होने के बाद फुरसतिया के लिये करने को बचेगा भी क्या &#8211; सिवाय चुपचाप मिल लेने के? सो चुपचाप मिल लेंगे। बाकी हमें लगता है कि प्रश्नकर्ता किसी उहापोह में है और कुछ टिप्स चाहता है। तो यह रहे कुछ मंत्रः</p>
<p>अपने जिगरे पर हाथ रखकर सोचो मानव &#8211; असफलता बताती है कि सफलता का प्रयत्न पूरे मन से नहीं किया गया है। तो जहां चूक हो गयी उसके बारे में जमाने को कोसो। अगर मौका बचा है तो फिर से नयी कोशिश में जुट जाओ। साथ ही तुम यह भी सोचकर खुश हो सकते हो कि चलो पूर्व प्रेमिका का ख्याल रखने वाले लोग और भी हैं।</p>
<p>अगर सच में उसे कभी चाहते रहे हो तो उसके जन्मदिन या शादी की सालगिरह पर प्रेम की सारी निशानियां (प्रेमपत्र, अंतरंग फोटो, इत्र सने रूमाल आदि-इत्यादि) अच्छे भूतपूर्व प्रेमियों की तरह वापस कर दो। इसे डायरी में नोट करोः असफल प्रेम के रूप में इंसान को ताजिंदगी एक ऐसे खुशनुमा एहसास का सहारा मिल जाता है जिसकी बदौलत वह अपने को सदा कुछ खास मानने का भ्रम पाल सकता है। इसके लिये तुम पाक़ परवरदिगार को दुआ दो कि कम से कम उसने जिंदगी भर प्रेमिका को याद रखने का मौका तो दिया।</p>
<p>अब अगरचे तुम्हारा प्यार बस छलावा रहा। और यह प्रेमिका कई प्रेमिकाओं में से एक रही हो तो खुश हो जाओ यह सोचकर कि अब दूसरी प्रेमिकाओं को ज्यादा समय दे सकोगे। शहीद होने से बाल-बाल बच निकलने के लिये &quot;ईश्वर को धन्यवाद कैसे दें&quot; नामक फुरसतिया की पुस्तक डाक से मंगवाने कि लिए 1001 रु का ड्राफ्ट भिजवा दो।</p>
<p>और हाँ! अपने &quot;भान्जों&quot; को ब्लॉग बनाना ज़रूर सिखा दो ताकि इंडीब्लागीज़ के वक्त वोट के काम आयें और लगे हाथों प्रेमिका के हालचाल भी मिलता रहे।</p>
<p>
<h3>क्या भारत से कभी भ्रष्टाचार मिट पायेगा? </h3>
<p></p>
<div id='pullQuoteR'> भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात सोचना मानवाधिकार का सरासर उल्लंघन है</div>
<p>बड़ा देशद्रोही टाईप का सवाल है। यह पूछना वैसा ही है कि क्या तुम दूध से पानी और खून से कलेसट्रॉल हटा सकते हो। महानुभाव, हमारे देश का बहुत बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार यज्ञ में अपना योगदान देता है। भ्रष्टाचार समाप्त करने की बात सोचना उनके पेट पर लात मारना है, मानवाधिकार का सरासर उल्लंघन है। ऐसे प्रस्ताव कभी परवान नहीं चढ़ सकते।</p>
<p>         कल्पना करो कि भ्रष्टाचार तत्काल प्रभाव से समाप्त हो जाये तो कुछ दृश्य जो फुरसतिया के ध्यान में आते हैं वे कैसे होंगे </p>
<ul>
<li>साल में पाँच लाख रुपये पाने वाले अधिकारी की लड़की की शादी रूक जायेगी जिसने दहेज में एक करोड़ रुपये देने का वायदा कर रखा है।</li>
<li>नेताओं की देशसेवा की भावना की नदी तुरंत सूख जायेगी।</li>
<li>बुजुर्ग नेताओं तथा युवा नेताओं में लखनवी अंदाज में एक दूसरे नेतृत्व का मौका देने की अंतहीन प्रतियोगिता चलती रहेगी।</li>
<li>सड़कों से बंगले तथा सूखे से हरियाली निकलना बंद हो जायेगा। अधिकारी अपने कार्यकाल में बाढ़ तथा सूखे की कामना के लिये भगवान के यहां अर्जी लगवाना बंद कर देंगे।</li>
</ul>
<p>वैसे किसी भी समाज में भ्रष्टाचार कम किया जा सकता है पर पूरी तौर पर कभी समाप्त नहीं हो सकता। कमी के लिये भ्रष्टाचार के अवसर कम करने होंगे। यह सब समाज के हर वर्ग के सहयोग के बिना असंभव है। जितना समाज जागरूक होगा, भ्रष्टाचार उतना ही कम होगा। किसी नैतिक चमत्कार से यह नहीं हो सकता। व्यवस्था में बुनयादी परिवर्तन के बिना यह बदलाव दिवास्वप्न है।</p>
<p>
<h3>कहते हैं कि पैदल चलने और जॉगिंग करने से वजन कम होता है। तो क्या उल्टे पैर चलने से वजन बढ़ सकता है? </h3>
<p></p>
<p>आर्यपुत्र, दुनिया के किसी भी स्कूल का हाईस्कूल पास या फेल बच्चा जानता है कि वजन का घटना शरीर में जमा ऊर्जा की खपत पर निर्भर करता है। जितनी ज्यादा ऊर्जा खपेगी वजन उतना ही ज्यादा कम होगा।</p>
<p>ऊर्जा एक अदिश राशि (Scalar Quantity) है। दिशा पर इसकी मात्रा निर्भर नहीं करती। आप चाहें आगे चलें, चाहें पीछे, वजन घटेगा ही। उल्टे पैर चलने में चूंकि गति कम होगी लिहाजा वजन भी कम घटेगा। पर बढ़ेगा कतई नहीं। इसके बाद भी अगर कोई उल्टे चलने का मन बनाता हैं तो तय है कि &#8211; </p>
<ul>
<li>वह पैरों से नहीं दिमाग से पैदल है।</li>
<li>उसका दिमाग मोटा है जो कि उसको भूत की तरह पीछे दौड़ा रहा है।</li>
</ul>
<p>फुरसतिया की मानो, उल्टे चलने का ख्याल मन से निकाल दो वरना निश्चित तौर पर गिरोगे और तुम्हारे वजन में प्लास्टर, मरहम पट्टी तथा स्ट्रेचर का वजन और जुड़ जाएगा। बूझे कि नहीं?</p>
<p>
<h3>कहते हैं सुपरमैन सबसे ज्यादा बुद्धिमान होता है.तो फिर वो अंडरवियर अपनी पैंट के ऊपर क्यों पहनता है? </h3>
<p></p>
<p>     <img width="187" vspace="5" hspace="5" height="300" border="0" align="right" alt="Superman" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/superman.jpg" />देखो बरखुरदार, बुद्धिमत्ता में अगर थोड़ी बेवकूफी का &#8216;फ्लेवर&#8217; हो तो बुद्धिमत्ता में चार चांद लग जाते हैं। दुनिया के तमाम बुद्धिमानों के बुद्धिमानी के किस्सों से ज्यादा उनके बेवकूफी के किस्से प्रचलित हैं। न्यूटन के नियमों से अनजान लोग भी जानते हैं कि न्यूटन ने अपनी छोटी-बड़ी बिल्लियों के निकलने के लिये दरवाज़े में अलग-अलग छेद बनवाये &#8211; जबकी बड़े छेद से दोनों बिल्लियां निकल सकती थीं। बल्ब के अविष्कारक के नाम से अनजान लोग भी यह जानते हैं कि बचपन में उसने मुर्गी की तरह अंडे पर बैठ कर सेने का प्रयास किया। हुसैन की पेंटिंग्स से ज्यादा उनका नंगे पांव चलना चर्चा में रहता है।</p>
<p>         बुद्धिमानों की बेवकूफी के किस्से चलन में होने का कारण यह भी है कि लोग वे बेवकूफियां दोहरा कर महान बन जाते हैं। गांधीजी के ब्रम्हचर्य के प्रयोगों को दोहराकर बहुत सारे बुजुर्ग नेता बरास्ते शार्टकट उनके बराबर महान बन जाने की खुशफहमी पालते हैं। बॉलीवुड में शोहरत और पैसे की आकांक्षी कन्याएं इसका उलट रास्ता अपना कर प्रीती जिन्टा बनने के ख्वाब निर्देशक के साथ देखती हैं।</p>
<p>बात को समझाने दो। सुपरमैन एक काल्पनिक चरित्र है। पैंट के ऊपर अंडरवियर भी लेखक की कल्पना है। जिसके कारण निम्न हो सकते हैं- </p>
<ul>
<li>सुपरमैन बहादुरी के कारनामे करता है। ऐसी स्थितियों में अक्सर कपड़े गीले हो सकते हैं। अब चूंकि ऐसी स्थितियों के दिन तय नहीं होते इसलिये उसे हमेशा तैयार रहना पढ़ता है। अंदर के संभावित गीलेपन को बाहर का अंडरवियर छिपाता है।</li>
<li>सुपरमैन बहादुर भी माना जाता है। बहादुरी तथा बेवकूफी में चोली-दामन का साथ है अगर वह कपड़े आम आदमियों की तरह पहनेगा तो लोग उसकी बहादुरी पर शक करेंगे। अंडरवियर ऊपर धारण करने की बेवकूफी करके वह ऐसे किसी भी शक को खत्म कर देता है।</li>
<li>कभी कस्टम चौकी पर तलाशी का नाटक होने पर वह अपना ऊपर का अंडरवियर उतारकर तलाशी करवा सकता है तथा यह रिकार्ड किया जा सकता है: अंडरवियर तक उतरवाकर तलाशी ली गयी, कुछ भी नहीं मिला। इससे तलाशी भी हो जाती है, सबकी इज्जत भी बची रहती है।</li>
</ul>
<p>
<h3>बातचीत शुरु करने के लिये मौसम ही सबसे ज्यादा उपयुक्त क्यों रहता है? </h3>
<p></p>
<p>क्योंकि मिर्ज़ा, मौसम और बीवी दोनों के तेवर का अनुमान लगाना कठिन होता है। तिस पर बातचीत की किसी असफलता का ठीकरा हम मौसम के सर पर फोड़ सकते हैं। मौसम तो मूक होता है। आरोप चुपचाप सह लेता है बेचारा। पर स्व.रमानाथ अवस्थी कहते हैं -<br />
     &nbsp;</p>
<blockquote>
<p>कुछ कर गुजरने के लिये<br />
      मौसम नहीं मन चाहिये।</p>
</blockquote>
<p>तो जनाब, मौसम का कंधा छोड़कर बातचीत शुरु करें। बात निकलेगी तो दूर तलक जायेगी।</p>
<h1>अंततः&#8230;</h1>
<p>
<h3>सब जानते हैं कि शादी जी का जंजाल है, फिर भी सभी करते हैं क्यों?</h3>
<p></p>
<div id='pullQuoteR'>  शादी के बाद प्रेम अधूरा नहीं रहता, खलास हो जाता है।     </div>
<p>देखो भइये! इस दुनिया में कोई संतुष्ट नहीं है &#8211; गरीब अमीर होना चाहते है, अमीर सुंदर होना चाहते हैं, कुंवारे शादी करना चाहते हैं और शादी-शुदा मरना चाहते हैं। शादी को लोग जी का जंजाल मानते हैं फिर भी करते हैं क्योंकि हर आदमी कोई हादसा देखकर सोचता है यह भयंकर ज़रूर है लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं होगा। प्रेम विवाह करने वाले भी इसलिये शादी करते हैं क्योंकि वे मानते हैं कि शादी बिना प्रेम अधूरा होता है। अरे मूढ़! शादी के बाद प्रेम खलास हो जाता है &#8211; अधूरा नहीं रहता।</p>
<p>         कहानी पुरानी है फिर भी सुनाने में हर्ज नहीं है।</p>
<blockquote>
<p>दो आदमी मरने के बाद यमराज के पास पहुंचे। एक ने अपने कर्मों का हिसाब दिया कि कैसे वह पत्नी के कष्ट सहता रहा। नहाने के बाद  <a href="http://web.archive.org/web/20060220094121/http://www.jitu.info/merapanna">  जीतू</a> की ही तरह वह बाथरूम पोछता था। यमराज ने उसकी तपस्या को ध्यान में रखकर बिना कमीशन लिये उसे स्वर्ग में एक बर्थ एलॉट कर दी। दूसरे ने बताया कि उसने दो शादियां की। दोगुनी तपस्या की। उसके कष्ट की कल्पना मात्र से बेहोश होते-होते यमराज ने उसे यह कह कर भगा दिया कि बेवकूफों की यहां कोई जगह नहीं है।</p>
</blockquote>
<p>शादी एक ऐसा जंजाल है जिसमें फंसकर दुनिया की हर समस्या छोटी लगने लगती है। लोग कहते हैं &#8211; कुंवारा वह जो चारों तरफ घूमे और तरह-तरह की समस्यायें पैदा कर ले। शादीशुदा को कहीं जाना नहीं पड़ता। वैसे तुम भी खुश ही दिखते हो इस जंजाल में फंसकर &#8211; क्या कहते हो!</p>
<p class=note>फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &quot;<a href="http://fursatiya.blogspot.com/">फुरसतिया</a>&quot; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &quot;पूछिये फुरसतिया से&quot; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</p>
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		<title>कम्पयूटर स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-fursatiya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0305-fursatiya#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 06:36:04 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[पूछिये फुरसतिया से]]></category>

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		<description><![CDATA[घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछे जायेंगे बेझिझक <strong>फुरसतिया </strong>से!]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px">
<p><img title="Poochiye Fursatiya se" src="http://www.nirantar.org/images/stories/askfursatiya.gif" border="0" alt="Poochiye Fursatiya se" hspace="8" vspace="8" width="135" height="140" align="left" />घर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?)</p>
<p>भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!</p></div>
<p><strong>जितेन्द्र पूछते हैं, जब महिलायें ज्यादा अच्छा खाना बनाती है तो फिर होटलों वगैरह में पुरूषों को खाना बनाने के लिये क्यों रखा जाता है?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">अच्छा खाना बनाने वाली महिलाओं के पति कभी-कभी भावुक होकर क्रान्तिकारी भी बन जाते हैं।</div>
<p>भैया जितेन्द्र यह सच है कि आमतौर पर खाना बनाने का काम महिलायें ही करती हैं पर महिलायें ज्यादा अच्छा खाना बनाती हैं मानना उसी तरह बचकाना है जितना यह मानना कि चूंकि सबसे अधिक आबादी चीन की है इसलिये चीनी लोग सबसे ज्यादा प्यार करते होंगे।</p>
<p>फुरसतिया अपने एक मित्र के यहां एक बार खाने पर गये। नयी-नयी शादी हुयी थी उसकी। खाना लगाया गया। फुरसतियाजी ने खाना देखते ही कहा, &#8220;भाभीजी, खाना बहुत अच्छा बना हैए&#8221; वे खुश होकर बोलीं, &#8220;भाई साहब, बिना खाये कैसे कह रहे हैं कि खाना अच्छा बना है?&#8221; फुरसतिया सपाट भाव से तुरंत बोले, &#8220;हो सकता है कि खाना खाने के बाद खाने की तारीफ न कर पाऊं, इसलिये पहले ही कह दिया।</p>
<p>वैसे होटलों में खाना बनाने के लिये पुरूषो को इसलिये रखा जाता है क्योंकि:</p>
<ul>
<li>महिलायें कूड़े-कचरे,बासी-कूसी सामानों को खाने में प्रयोग करने में हिचकती हैं</li>
<li>अच्छा खाना बनाने वाली महिलाओं के पति कभी-कभी भावुक होकर क्रान्तिकारी भी बन जाते हैं। आखिरकार, गुलामी की मेवा खाने से बेहतर है आजादी की घास खाना। होटल के बेयरे यह सुख प्रदान करने में सहायक होते हैं।</li>
<li>जो महिलायें अच्छा खाना नहीं बना पातीं उनके लिये ये पुरुष सहायक होते हैं। वे कह सकतीं हैं, &#8220;जिस कचरे के लिये इतना पैसा खर्च हुआ उससे बेहतर तो मैं घर में मुफ्त खिलाती हूं।</li>
</ul>
<p><strong>शैल का सवाल है, हिंदी में महिला चिट्ठाकारों की संख्या नगण्य क्यों है? </strong></p>
<p>क्योंकि महिलाओं के पास समय बरबाद करने के बेहतर साधन मौजूद हैं।</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/lady_on_comp.jpg" border="0" alt="" hspace="5" vspace="5" align="right" />असल में महिलाओं की सहज बुद्धि बहुत तेज होती है। कोई भी काम वे ठोंक बजाकर करती हैं। जो महिलायें लिखने में सक्षम हैं वे इस इंतजार में हैं कि हिंदी में लिखने वालों की संख्या कम से कम इतनी हो जाये ताकि यदि वे लिखें, &#8220;आज मौसम बहुत अच्छा है, फीलगुड हो रहा है&#8221;, तो ताबड़तोड़ कम से कम तीस वाह-वाह उनके ब्लॉग पर इतर‍-उतर छितरा जायें। जैसे-जैसे ब्लॉगर बढ़ेंगे महिला ब्लॉगरों के पदार्पण की संभावनायें बढ़ेंगी। वैसे <a href="http://padmaja.blogspot.com/">पद्म्जा</a> तथा प्रारंभ ब्लॉग की महिला ब्लॉगर के नये-पुराने चिट्ठों की अगर धुआंधार तारीफ की जाये तो शायद ये घबरा कर फिर लिखना शुरु कर देंगी। गौरतलब है कि बीच में प्रतिपोस्ट अधिक कमेंट के लालच में <a href="http://jitu.info/">जीतेन्द्र</a> ने इस बात पर विचार किया था कि वे काल्पनिक महिला चिट्ठाकार के नाम से लिखना शुरु कर दें। बाद में पता चला कि वो किसी संभावित महिला चिट्ठाकार की तारीफ में कमेंट लिखने में जुटे हैं ताकि तुरंत तारीफ कर सकें। सूचना है कि अभी तक 100 कमेंट तैयार कर चुके हैं। बहरहाल, इंतजार करें। भगवान के यहां देर है अंधेर नहीं।</p>
<p><strong>जितेन्द्र पुनः पूछते हैं, कम्पयूटर स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग?</strong></p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/gender.gif" border="0" alt=" " hspace="8" vspace="8" width="75" height="68" align="left" />भैया जितेन्द्र, बड़ा अहमक सवाल है। अब पूछा है तो जवाब भी सुनो, कम्प्यूटर चलता है, खराब होता है, बैठ जाता है। ये सारे मर्दाने लक्षण है। इसमें डाटा फीड होते हैं, सेव किये जाते हैं, यह उत्पादन का माध्यम है। ये सारे जनाने गुण हैं। तो फुरसतिया का यह मानना है कि दोनों गुण होने के कारण कम्पयूटर उभयलिंगी है। जवाब का और शुद्धिकरण किया जाय तो इसकी दिन प्रतिदिन बढ़ती महिमा के कारण कहना गलत न होगा कि कम्प्यूटर अर्द्धनारीश्वर है। अगला सवाल!</p>
<p><strong>ईस्वामीजी का सवाल है, अभी मैं किसी ब्लॉगर को पेलवान कह लेता हूं, कोई किसी को भाई, बंधुवर, जी कहता है। जब कोई महिला ब्लॉगर आयेंगी तब उन्हें क्या कहा जायेगा?</strong></p>
<p>स्वामी जी को फुरसतिया का परनाम। मेरा विश्वास करें, समय आने पर संबोधन अपने आप आ जायेगा। समय बिताने के लिए एक कथा सुनाता हूँ।</p>
<p>एक नवविवाहित पहलवान को मित्रों ने सलाह दी, पहली रात दुल्हन से ज़रा नर्मी से पेश आना, मुलायमियत से बोलना। पहलवान ने सलाह पर अमल किया। पलंग के बाइस चक्कर लगाकर फुसफुसाकर बोला, &#8220;क्यों? पंजा लड़ायेगी?&#8221; वैसे घिसा-पिटा ही सही &#8220;जी&#8221; बहुत दिन काम करेगा। आप अभ्यास करते रहें।</p>
<p><strong>ईंद्र अवस्थी की विवेचना है, सुकुल,ये बताओ कि ब्लॉगरों में समूह चिट्ठा काहे प्रचलित हो रहा है?</strong></p>
<p>होश में आओ! जैसे देश में एक पार्टी का शासन गये-जमाने की बात हो गई, वैसे ही अकेले चिट्ठा लिखना सबके बूते की बात नहीं रह गई। संगठन में शक्ति की बात के अलावा इसके और भी लाभ हैं, मसलन ब्लॉग का स्तर गिरने का आरोप दूसरों पर ठेला जा सकता है, न लिखने का अपराध बोध नहीं रहता और यह सांत्वना तो रहती है कि कोई और पढ़े न पढ़े, ब्लॉग को कम से कम लेखक मंडल के लोग तो पढ़ेंगे। इसीलिये लोग संयुक्त ब्लॉग की तरफ लपकते दिख रहे हैं। कुल मिलाकर समूह ब्लॉग दौपद्री की तरह होता है। वैसे अगर तुम भी साझे की खेती करते तो कुछ न कुछ पैदावार इस साल भी हो जाती अब तक <a href="http://theluwa.blogspot.com/">ठेलुहा</a> में।</p>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है।</div>
<p><strong>जाते जाते जितेन्द्र का एक और सवाल, आपके चिट्ठे इतने लम्बे क्यों होते है?</strong></p>
<p>फुरसतिया जब लिखते हैं तो लगभग हमेशा इस भ्रम का शिकार हो जाते हैं कि वे बहुत अच्छा लिखते हैं तथा लोगों को बहुत अच्छा लगता है उनका लेखन। फिर सोचते हैं कि लोगों को अच्छी लगने वाली चीज देने में कंजूसी क्यों की जाए भला। वैसे भी चिट्ठों के साइज का अभी मानकीकरण नहीं हुआ, इसलिये लंबे-छोटे की परिभाषा अस्पष्ट है। वैसे बहुत छोटी पोस्ट देखकर फुरसतिया को मुन्नाभाई एमबीबीएस का डायलाग याद आता है जिसमें हॉस्टल के कमरे को देखकर सर्किट कहता है, &#8220;भाई! ये कमरा तो शुरु होते ही खतम हो गया।&#8221; छोटी पोस्ट लिखने में संकोच का कारण शायद यह भी है कि फुरसतिया अपने ब्लॉग को बांस मानने में हिचकते हैं। बांस की कहानी संक्षेप में कुछ यूँ है:</p>
<blockquote><p>एक ट्रक के पीछे बहुत से कुत्ते हांफते हुये भाग रहे थे। किसी ने एक कुत्ते से पूछा, &#8220;तुम कहां जा रहे हो?&#8221; कुत्ता हांफते हुये बोला, &#8220;मेरे आगे वाले से पूछो। जहां वह जा रहा है, वहीं मैं भी जा रहा हूं&#8221;। आगे वाले ने भी यही जवाब दिया। जब सबसे आगे वाले से पूछा गया तो वह हांफते हुये बोला, &#8220;यह तो नहीं पता हम कहां जा रहे हैं। बस इस ट्रक के पीछे लगे हैं। ट्रक में लदे हैं बांस। यह ट्रक जहां तक जायेगा हम वहां तक जायेंगे। जहां ट्रक रुकेगा, बांस उतारे जायेंगे, फिर गाड़े जायेंगे। जहां बांस गड़ेंगे हम वहीं मूत के भाग आयेंगे।&#8221;</p></blockquote>
<p class=note>फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा &#8220;<a href="http://fursatiya.blogspot.com/">फुरसतिया</a>&#8221; अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में &#8220;पूछिये फुरसतिया से&#8221; लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम</p>
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