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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; कच्चा चिट्ठा</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>हास्य व्यंग्य के किंग: समीर लाल</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 08:07:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[मार्च 2006 में इन्होंने हिन्दी चिट्ठाकारी की शुरुआत की और देखते ही देखते सबके मन को भा गये। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व है। कच्चा चिट्ठा में इस बार बमार्फ़त <strong>अनूप शुक्ला</strong> भेंट कीजिये <a href="http://udantashtari.blogspot.com/">उड़नतश्तरी</a> के लेखक <strong>समीरलाल </strong>से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://udantashtari.blogspot.com/">
<div class=dropCap>उ</div>
<p>ड़नतश्तरी</a> के लेखक समीर लाल की सक्रियता देखकर यह विश्वास करना मुश्किल लगता है कि उन्होंने गये साल ही लिखना शुरू किया। हलके-फुल्के अंदाज़ में गहरी बात कह जाने वाले समीरजी अपनी बात कहने के नये-नये दिलकश अंदाज़ खोजते रहते हैं। चाहे वह गीता का सार हो या कबीर के दोहे, आधुनिक परिस्थितियों से जोड़कर वे बेहतरीन लेख लिखते रहते हैं। कुंडलिया किंग समीर ने चिट्ठाजगत को कुंडलिया से परिचित कराया और फिर धीरे से उसका पेटेंट मुंडलिया के नाम से करा लिया। पंकज के लालाजी का ज्ञान का प्रकाश ही था जिससे चकाचौंध होकर गिरिराज जोशी उनका शिष्यत्व ग्रहण करने के लिये बेताब हुये।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 3px 8px;" title="Sameer Lal" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/sameer-lal.jpg" border="0" alt="Sameer Lal" hspace="8" vspace="3" width="139" height="161" align="left" />मूलत: पूर्वी उत्तरप्रदेश (गोरखपुर) के वासी समीर की पैदाइश रतलाम की और ज्यादातर रिहाइश मध्यप्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी जबलपुर की है। आज के लोकप्रिय चिट्ठाकार समीरलाल में लेखन के कीटाणु बचपन से ही थे। उन दिनों को याद करते हुये समीरजी बताते हैं, &#8220;एक बार बचपन में कहानी लिखना शुरु किया था जब क्लास पाँचवीं में था शायद। जबलपुर से प्रकाशित &#8220;ज्योतिर्मिलन&#8221; मासिक के बाल विषेशांक में कहानियां प्रकाशित हुई और बाल साहित्यकार का पुरस्कार मिला जिसे घोषणा के तीन वर्ष उपरान्त प्रख्यात व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई के हाथों प्राप्त किया।&#8221; स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है।</p>
<div id="pullQuoteR">स्कूल के दिनों में परसाई के हाथों पुरस्कार के रूप में प्राप्त पुस्तक आज भी उनके लिये बहुमूल्य धरोहर है</div>
<p>लेकिन स्कूल के दिनों के बाद शायद जीवन संघर्षों के कारण लिखना स्थगित रहा। इस बारे में समीरजी कहते हैं, &#8220;फिर कभी नहीं लिखा, बस आम युवकों की तरह कॉलेज की कापियों के आखिरी पन्नों पर कुछ शेरो शायरी और कवितायें लिखीं। पिछले एक वर्ष से नियमित लेख कवितायें, व्यंग्य की ओर पुनः रुझान हुआ जो चिट्ठों के माध्यम से गति प्राप्त करता गया और वही ऊड़न तश्तरी, ई-कविता और अनुभूति याहू ग्रुप के माध्यम से सबके सामने है।&#8221; आचार्य रजनीश को सुनने के शौकीन समीर को किताबें पढ़ने, पेंसिल-स्केचिंग करने और शास्त्रीय संगीत सुनने का भी शौक है। अंग्रेजी कवि राबर्ट फ्रॉस्ट इनके पसंदीदा कवि हैं जिनकी कई कविताऒं का आपने भावानुवाद भी किया है।</p>
<p>लेखन के अलावा कालेज के दिनों में अपने तमाम इतर अनुभवों की दास्तान बताते हुये समीर कहते हैं, &#8220;सी.ए. करने के दौरान बम्बई की छात्र राजनिति में सक्रिय रहा, हॉस्टल एसोसियेशन और छात्र संघ के महामंत्री, फिर बाद में, काँग्रेस में सक्रिय भूमिका रही। मध्यप्रदेश युवक कांग्रेस के औद्योगिक प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष, कमलनाथ जी के संयोजन में म.प्र. जनजागरण मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री, जबलपुर चार्टड एकाउन्टेन्ट एसोसियेशन के उपाध्यक्ष, जबलपुर चेम्बर ऑफ कामर्स के ट्रेज़रार और उपाध्यक्ष भी रहा। इस दौरान कई अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय रोजगार मेलों का जबलपुर में आयोजन किया। राजनेताओं से संपर्क रखने का तब बहुत शौक था और साथ ही आचार्य रजनीश, महेश योगी, शंकराचार्य स्वरुपानन्द जी और स्वामी प्रज्ञानन्द जी आदि से व्यक्तिगत परिचय और उनकी विभिन्न संस्थाओं का ऑडिटर और सलाहकारी भी रहा।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, &#8220;अच्छा लिखा है। लिखते रहें।&#8221;</div>
<p>समीरलाल <a href="http://chitthacharcha.blogspot.com">चिट्ठाचर्चा</a> में नियमित लिखते हैं, और जिस दिन ये लिखें उस दिन इस चिट्ठे के हिट्स की संख्या हनुमान की पूँछ बन जाती है। टिप्पणी करने के मामले में समीर बेहद उदार हैं, लोग तो यहाँ तक कहते हैं कि अक्सर नोटिस बोर्ड के नीचे भी जगह खाली होने पर समीरजी लिख देते हैं, &#8220;अच्छा लिखा है। लिखते रहें।&#8221; आजकल कवि सम्मेलनों में भी शिरकत करने वाले समीरलाल जी अपनी जमाऊ कविताऒं से अपना रंग जमाने लगे हैं और श्रोताऒं के बीच वे लोकप्रिय कवि हो गये हैं। पिछ्ले एक वर्ष में ही बफैलो, वाशिंगटन में कवि सम्मेलन और जबलपुर में कुछ काव्य गोष्ठियां और एकल काव्य पाठ का उन्हें मौका मिला।</p>
<p>समीरलालजी बम्बई से सी.ए. कर वापस गृहनगर जबलपुर में प्रैक्टिस करने लगे। 1999 में वे कनाडा आ गये, दोनों बेटों को १२वीं तक भारत में ही पढ़ाया ताकि वो अपनी संस्कृति को समझ सकें और उससे जुड़ सकें, दोनों अब कम्प्यूटर इंजीनियर हैं। खुद कनाडा आकर शेयर बजार के कोर्स कर पहले स्टाक एक्सचेंज पर यहां की एक बड़ी बैंक के लिये ट्रेडर रहे। न जाने कब तकनीक की तरफ रुझान हो गया। सब कुछ इन्टरनेट से ही सीखा, फिर माईक्रोसॉफ्ट एक्सेल एक्सपर्ट, एक्सेस एक्सपर्ट आदि के रास्ते चलते हुये आऊटलुक प्रोग्रामिंग में महारत हासिल की। अब विज़ुअल बेसिक डॉटनेट में सिद्धता के दम पर उसी बैंक में बतौर तकनीकी सलाहकार कार्यरत हैं। इसी बीच अमेरिका से ही अकाउंटिंग से संबंधित सी.एम.ए और प्रोजेक्ट मेनेंजमेंट में पीएमपी पूरण किया। संप्रति बैंक की विभिन्न मेन्यूल कार्यप्रणाली को आटोमेट करने के कार्य में सलाहकार हैं। स्पष्टतः समीर में लगातर नया ज्ञान, नया विज्ञान सीखने की ललक हैं।</p>
<p>मार्च 2006 में समीरलाल ने ब्लॉग लेखन की शुरुआत की और देखते ही देखते लोकप्रिय हो गये हैं। कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं। मजाक करो तो मजाक सहने का माद्दा भी रखो का सिद्धांत मानने वाले समीर हास्य व्यंग्य के महारथी हैं लेकिन किसी का भी दिल दुखाना इनकी फितरत में नहीं है। एकाध बार तो अपनी पोस्ट तक यह सोचकर हटा ली कि किसी का दिल न दुखे। लेखन से मजाकिया और बिंदास से लगने वाले समीर को &#8220;लेखन शैली के विपरीत और व्यवसायिक मजबूरियों के अलावा स्वाभाव से शांत और गंभीर रहना पसंद है।&#8221; अपने स्वभाव के एक और पहलू का खुलासा करते हुये कहते है: &#8220;गुस्सा बहुत मुश्किल से ही आता है।&#8221; हिंदी चिट्ठाकारी को संभावनाशील मानने वाले समीरजी का विचार आगे चलकर भारत में ही बसने का है। फिलहाल भारत में कुछ ट्रस्टों से जुडे़ हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">कविता, कुंडलियाँ, त्रिवेणी और मुंडलिया, सबमें इनकी सहज गति है। सहज, मनलुभावन गद्य इनके लेखन का प्राणतत्व हैं।</div>
<p>ब्लॉग लेखन में पत्नी के सहयोग का जिक्र करते हुये समीरजी खुलासा करते हैं, &#8220;पत्नी का योगदान ही है कि पूर्ण खाली समय ब्लॉग और लेखन को देने का बिल्कुल बुरा नहीं मानना, तभी इतना समय देना संभव हो पाता है। बाज़ार से लेकर घर के सारे खुद ही कर लेती है। गायन में उनकी काफी रुचि है जो रियाज़ के अभाव में लगभग छूटा हुआ है। किताबें पढ़ने का शौक है मगर एम.ए. हिन्दी में होने के बावजूद भी लेखन में रुझान नहीं। उनका मानना है कि अगर दोनों ही यह करने लगे, तो घर चल चुका। बात तो पते की है, इसलिये हम इसे तुरंत मान लेते हैं।&#8221;</p>
<p>चार पांच घंटे से ज्यादा सोने को समय की बरबादी मानने वाले समीर ब्लॉग लेखन के अलावा तरकश की कोर टीम के सदस्य भी हैं। इसके अलावा अनुभूति, अभिव्यक्ति, हिन्दी नेस्ट, साहित्यकुंज, मुक्तक सागर पर रचनायें प्रकाशित हुई हैं। एक्सेल पर अंग्रेजी में ब्लॉग <a href="http://www.sameerlalcanada.blogspot.com/">टेक नोट एक्सचेन्ज</a> और वीबी डॉट नेट पर कई ऑनलाईन पत्रिकाओं में अनेकों लेख भी प्रकाशित। समीर टाईम्स के नाम से सन 2000 में एक वेबसाईट शुरु की जो कि आज भी सुचारु रुप से चल रही है। बस मौज मजे के लिये मगर हिट्स ठीक ठाक मिल जाती हैं।</p>
<p>बहुप्रतिभाशाली समीर को निरंतर लिखते रहने और आगे प्रगति करते रहने के लिये निरंतर टीम की हार्दिक शुभकामनायें।</p>
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		<title>छोटे मियां सुभान अल्लाह -पंकज बेंगानी</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 06:51:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चाचिट्ठा में परिचय पाईये <strong>तरकश </strong>के एक और प्रखर तीर, उदयीमान चिट्ठाकार <strong>पंकज बेंगानी</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img vspace="5" hspace="5" border="0" align="right" alt="पंकज बेंगानी" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/pankaj-baingani.jpg" /><a href="http://www.tarakash.com/mantavya/">पंकज बेंगाणी</a> उर्फ मास्साब के बारे में जब कुछ कहने की बात आती है तो अनायास यही मुंह से यही निकलता है बड़े मियां तो बड़े मियां, छोटे मियां सुभान अल्लाह। </p>
<p>अभी हाल ही में अपने ब्लॉग जगत में प्रवेश की सालगिरह मनाने वाले पंकज बेंगानी का जन्म 25 नवम्बर 1978 को राजस्थान के बिदासर कस्बे में हुआ। 5 साल वहीं रहे और रेत में खेलते हुए दिन गुजारे। फिर पिताजी सब को लेकर सूरत आ गए। सब यानि माँ, संजय और पंकज। एक साल बाद छोटी बहन का जन्म हुआ।</p>
<p>         <!-- Ten Qustions START-->
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 5px; padding: 5px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; font-size: 1em; float: left; width: 175px; text-align: left">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉगलेखन की शुरुआत कैसे हुयी?</strong><br />  ब्लोग लिखना रवि कामदार की प्रेरणा का फल है। मै तो कुछ जानता ही नही था। उसीने समझाया और बताया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />  पहला ब्लॉग जीतूजी का मेरा पन्ना देखा, फिर भैया का जोगलिखी। </p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong><br />  ब्लोग नारद से देखता हुँ, अंग्रेजी के लिए देशी पंडित और इंटेटब्लोग भी देखता हुँ।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं मानीटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />  सीधा मोनिटर पर। कागज की जरूरत क्या है? </p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौनसे हैं?</strong><br />  पसन्दिदा चिट्ठे हैं उडनतस्तरी, मेरा पन्ना, जो कह ना सके, फुरसतिया, योर्स ट्रुली, और न्यूजमेन।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong><br />  नापसन्द चिट्ठे भी हैं पर नाम नही बता सकता।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br />  पहले बुरा लगता था जब टिप्पणी नही मिलती थी। अब बुरा नही लगता, क्योंकि शायद अब मुझे लोग जानने लग गए हैं।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />  मुझे अपनी सबसे अच्छी पोस्ट <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/01/blog-post_28.html">एक चिट्ठी स्पाईडरमेन के नाम</a> और <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/02/blog-post_28.html"> मुर्गीबाई की समाधी</a> लगती है</p>
<p><strong>सबसे खराब?</strong><br />  सबसे खराब पोस्ट <a href="http://www.tarakash.com/mantavya/2006/06/blog-post_29.html"> भगवान भी बिकते हैं</a>&quot; लगती है। </p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong><br /> सारा दिन नेट पर ही होता हुँ, क्लाइंटो से बात, ब्लॉगरों से बात, सेवा का काम, मेवा का काम, ई-पेपर पढना, डिजायनें खंगालना, स्रोत जुगाडना ,लडकीयों के वोलपेपर सेव करना (देखिए मैं इमानदार हुँ) बस चलता ही रहता है।</p>
</p></div>
<p>      <!-- Ten Qustions end-->
<p>पंकज ने अपनी पढाई गुजराती माध्यम में शुरू की। पाँचवी तक गुजराती में पढे़, फिर पिताजी शहर से थोडा दूर एक हिन्दी भाषी क्षेत्र में रहने आ गए तो फिर हिन्दी विद्यालय में दाखिला लिया और दसवीं तक हिन्दी माध्यम में पढा़ई की। दसवीं के बाद असम चले गये, मामाजी के पास। सूदुर पहाडी क्षेत्र सिलचर में। वहाँ अंग्रेज़ी माध्यम की कालेज में दाखिला लिया। कैरियर-वैरियर क्या होता है यह तो पता ही नही था। पारिवारिक रूप से व्यापारिक होनें के नाते इन्हें तो यही सिखाया जाता था कि बस पढाई खत्म करो और धन्धे में लग जाओ।</p>
<p>पर पंकज का मन कभी परिवार के परम्परागत व्यवसाय में नही था, ना तो पिताजी के कपडों के व्यवसाय में ना ही मामाजी के चाय के व्यवसाय में। अपनी रुचि रुझान तथा पढ़ाई और नौकरी के बारे में पंकज बताते हैं</p>
<blockquote><p>बचपन से फिल्मों और मीडिया क्षेत्र के प्रति अकल्पनीय रूझान था। मैं समझता हुँ मेरे अन्दर एक नैसर्गिक सोच थी ही विज्ञापन और मीडिया क्षेत्र की। उस दौर में मैं जिस तरह के समाचार चैनलों की कल्पना किया करता था वो आज वास्तव में है। मै फिल्म देखकर उसके हर पहलू पर किसी विशेषज्ञ की भाँति टिप्पणी कर सकता था। मुझे पता होता था कि कैमरा एंगल क्या होगा, स्क्रिप्ट में कहाँ तकलीफ है या एडिटिंग कैसे <br />
ुई। लोग पूछते थे कहाँ से सीखा? मैं कहता था कहीं से नहीं सब देख देख कर सीखा। फिर पढाई बीच में ही छोडकर अहमदाबाद आ गया। भैया पहले ही आ चुके थे। पढाई छोड देने का दुःख पहले भी नही था, आज भी नही है क्योंकि कॉमर्स की पढाई मुझे बकवास लगती थी, रूचि ही नहीं थी।</p>
<p>अहमदाबाद आकर मैंने अपनी रूचि का काम किया। अरेना मल्टीमीडिया में दाखिला लिया। मैं पहली ब्रांच के पहले विद्यार्थियों में था। अपने 2 साल के कोर्स में मै सिर्फ 6 महीने ही विद्यार्थी की भाँति पढा। फिर मुझे वहीं शिक्षक के रूप में नौकरी मिल गई। नतीजा यह हुआ की आगे की पढाई खुद ही करनी पडी। मैने अरेना में 3 साल नौकरी की। शिक्षक से सेंटर हेड जैसे शीर्ष पद पर पहुँचा। मैं पूरे भारत की अरेना की सभी शाखाओं में सबसे कम उम्र का हेड था। लेकिन थोडे समय के लिए ही, क्योंकि अन्दरुनी राजनीति से तंग आकर मैने नौकरी छोड दी।</p>
<p>वो मेरी जिन्दगी का सबसे कठिन पल था। मुझे 7000 रूपये मिलते थे। हमारा साइबर कैफे बन्द हो चुका था। कमाने का कोई जरिया नही था। छवि तो शुरू ही हुई थी और कोई ग्राहक नही था। मैने सिर्फ एक बार भैया से पूछा, नौकरी छोड दूं? और उन्होंने कहा, छोड दो! </p></blockquote>
<p>अपने भैया संजय बेंगानी, सरदार पटेल और नरेंद्र मोदी को अपना आदर्श मानने वाले पंकज मानते हैं कि भैया के विचारों का उन पर गहरा असर हुआ है। भैया का असर पंकज पर कुछ इस कदर था कि वे</p>
<blockquote><p>असम में उनके हिन्दी के लिए आन्दोलन के साथ बडे हुए और हिन्दी के प्रति प्रेम भी जागा। भैया ने ही किताबें पढने का शौक डाला। भैया की वजह से ही भगवान के प्रति सोच भी बदली। मैं कट्टर प्रभु भक्त था, रात को सोने से पहले हनुमान चालीसा बिना भूले पढता था।</p></blockquote>
<p>लेकिन अपने भैया को अपना आदर्श मानने वाले पंकज कुछ मामलों में उनके अंधभक्त नहीं हैं। जहां भैया ने समाज का सामना करते हुये प्रेमविवाह किया वहीं पंकज ने मां द्वारा पसंद की हुयी पत्नी का वरण किया और जैसा कि वे खुद कहते हैं</p>
<blockquote><p>भैया को पहले प्रेम हुआ था फिर विवाह किया, मेरा पहले विवाह हुआ फिर प्रेम प्रकरण चल रहा है।</p></blockquote>
<p>भैया संजय के जल्द गुस्सा आने-जाने वाले स्वभाव के विपरीत पंकज शांत स्वभाव के हैं और सरफिरे ग्राहकों से निपटने का काम वही करते हैं। भैया जहां एक ही ब्लॉग में सब कुछ लिखते हैं वहीं पंकज के <a href="http://www.tarakash.com/new2/index.php?option=com_newsfeeds&amp;catid=4&amp;Itemid=7">कई ब्लॉग</a> हैं जिसमें वे यदा-कदा लिखते रहते हैं और चित्र विज्ञापन पोस्ट करते रहते हैं।</p>
<p>संजय बेंगानी अपने छोटे भाई के बारे में बताते हैं</p>
<blockquote><p>मुझ से उलट पंकज शांत स्वभाव वाला हैं, वाद्ययंत्र बजा सकता हैं, गला भी ठीक-ठाक है, पर रेखाचित्र नहीं बना पाता।</p></blockquote>
<p>समूह ब्लॉग <a href="http://www.tarakash.com/new2/">तरकश</a> की शुरुआत के बारे में जानकारी देते हुये पंकज बताते हैं</p>
<blockquote><p>तरकश का विचार भैया का था। मेरे मित्र रवि कामदार की प्रेरणा से हमनें ब्लॉग की दुनिया में प्रवेश किया। मैंने अपना अंग्रेजी ब्लॉग और भैया ने हिन्दी ब्लॉग शुरू किया। फिर भैया ने सोचा क्यों न एक यूनीक पहचान बनाई जाए और इस तरह हमने तरकश डॉट कॉम शुरू किया। मैं, भैया और रवि ने तरकश पर अपने अपने ब्लॉग लिखने शुरू किए। फिर हमने इसे नए रूप में लाने के बारे में सोचा। पर प्रोग्रामिंग का अति अल्प ज्ञान राह में रोडा था। पर ई-स्वामी की प्रेरणा से मैंने &quot;जूमला&quot; सिखना शुरू किया। फिर देबूदा, ई-स्वामी, विशाल पाहुजा जैसे दिग्गजों की मदद और एक अदम्य संकल्प के साथ तरकश को बना ही दिया। हिन्दी ब्लॉग जगत के कुछ और नामी गिरामी हस्तियों को भी तरकश के साथ जोडने का बीडा उठाया और समीरलाल, सागर नाहर, निधि और शुएब अब तरकश के लिए भी लिख रहे हैं और कई और जुडने वाले हैं। आगे की कई योजनाएँ हैं। हिन्दी ब्लॉग जगत मे हमारा सक्रिय योगदान जारी रहेगा। इसके अलावा तरकश के जैसा अंग्र<br />
ेजी संस्करण भी तैयार किया जा रहा है। तरकश में भी और कई अन्य विभाग आएंगे। </p></blockquote>
<p>हिंदी, अंग्रेज़ी, गुजराती और मारवाड़ी बोल सकने वाले पंकज को फिल्में व विज्ञापन देखने का, किताबें पढने का और पर्यटन का बहुत शौक है। इनका लक्ष्य छवि को भारत की अग्रणी डिजाइन कम्पनी बनाना और तरकश को एक अग्रणी हिन्दी संजाल बनाना है। हो सका तो फिल्म निर्देशन करना चाहेंगे।</p>
<p>निरंतर की टीम की कामना है कि पंकज अपने भैया को आदर्श मानते हुये, अपनी पत्नी के साथ प्रेम-प्रकरण में नित नये आयाम छूयें और तरकश तथा अपनी मीडिया कम्पनी छवि की शानदार सफलता के साथ फिल्म निर्देशन करें तथा इसके साथ-साथ अपने ब्लॉग में नियमित लेखन करते रहें।</p>
<hr width="100%" />
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		</item>
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		<title>राष्ट्ररंग डूबा ब्लॉगर &#8211; संजय बेंगानी</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Sep 2006 09:14:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चाचिट्ठा में इस बार मुलाकात कीजिये <strong>तरकश</strong> की संस्थापक तिकड़ी में से एक और प्रतिभाशाली चिट्ठाकार <strong>संजय बेंगानी</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/sanjay-baingani.jpg" border="0" alt="संजय बेंगानी" hspace="5" vspace="5" width="112" height="141" align="right" />हिंदी ब्लॉग जगत की अनेकानेक उपलब्धियों में से एक, <a href="http://www.tarakash.com/">तरकश</a> की परिकल्पना करने वाले और अपने सीमित तकनीकी ज्ञान के बावजूद अपनी परिकल्पना को साथियों की मदद से साकार रूप देने वाले, <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/">संजय बेंगानी</a> ने ब्लॉग लेखन इसी वर्ष जनवरी माह में शुरू किया जो कि उनका जन्म-माह भी है।</p>
<p>सात जनवरी, 1973 को राजस्थान के बिदासर कस्बे में जन्में संजय का बचपन राजस्थान में ही गुजरा। प्रारंभिक शिक्षा भी वहीं पुरी की। बाद में 12 वर्ष की आयु में सूरत शहर आना हुआ। यहीं दसवीं तक की पढ़ाई गुजराती माध्यम में सरकारी स्कूल से पूरी की। बाद में असम चले गये जहाँ हिन्दी कॉलेज नहीं होने की वजह से अंग्रेजी में पढ़ाई शुरू की जो इनके रुझान बदलने की वजह से कभी पूरी नहीं हो पाई। तब अधिकतर समय पुस्तकालय में जो गुजरता था।</p>
<p><!-- Ten Qustions START--></p>
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 10px; padding: 10px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; font-size: 1em; float: right; width: 250px; text-align: left;">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉगलेखन की शुरुआत कैसे हुयी?</strong></p>
<p>चिट्ठा लिखने की शुरूआत एक वर्ष पहले हुई जब &#8216;रवि कामदार&#8217; ने मुझे &#8216;एक काम की चीज़&#8217; बताते हुए कुछ हिन्दी चिट्ठो के बारे में बताया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong></p>
<p>पहला ब्लोग कौन सा था यह तो याद नहीं इसलिए कह नहीं सकता, हाँ पहले-पहल जो ब्लॉग पढ़े वे &#8216;मेरा पन्ना&#8217;, नुक्ताचीनी, रविरतलामी का चिट्ठा, फुरसतिया थे। उस समय नई प्रविष्टियों की सूचना चिट्ठा-विश्व से मिलती या फिर विभिन्न गूगल ग्रुप से।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong></p>
<p>नारद पर दिन भर में कई बार चक्कर लगा आता हूँ, अब नारद ही नई प्रविष्टियों की सूचना पाने का माध्यम है।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं मानीटर पर या पहले कागज पर? </strong></p>
<p>सीधे लिखता हूँ, विचारों का प्रवाह बहता हैं, उंगलियाँ उन्हें टंकित करती जाती हैं।</p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौनसे हैं?</strong></p>
<p>वैसे तो मैं सारे चिट्ठे पढ़ता हूँ तथा टिप्पणी भी देने की कोशिश करता हूँ परंतु जिस दिन निम्न चिट्ठो पर कुछ नहीं लिखा जाता कुछ खोया खोया सा लगता हैं- मेरा पन्ना, उड़नतश्तरी, जो कह न सके, चिंतन, दस्तक, नुक्ताचीनी, रविरतलामी का चिट्ठा, फुरसतिया।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong></p>
<p>ऐसा कुछ याद तो नहीं।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong></p>
<p>टिप्पणी न मिलने पर लगता हैं या तो कोई पढ़ने आया ही नहीं या फिर जो लिखा हैं वह टिप्पणी करने लायक था ही नहीं। टिप्पणी न करने से अच्छा हैं आप आलोचना ही कर जाते, पता तो चले क्या गलत लिखा था। आप खाना बनाते समय नमक डालना भूल जाएं तब तारिफ तो कोई करेगा नहीं, पर कोई नमक मांगे ही नहीं तो खराब तो लगेगा ही न।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong></p>
<p>एक भी पोस्ट ऐसी नहीं जिसने पूरी संतुष्टि दी हो. लेकिन &#8216;भारत का बाप कौन&#8217; मेरे विचारो की सही अभिव्यक्ति थी।</p>
<p><strong>सबसे खराब?</strong></p>
<p>कई हैं, जिन पर एक भी टिप्पणी नहीं मिली।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong></p>
<p>अपने क्लाइंट्स से सम्पर्क में रहने के लिए, अपने व्यवसाय के लिए जानकारियाँ खंगालने के लिए, गपशप के लिए, ताजे समाचारों के लिए। दरअसल नेट बिना के जीवन की कल्पना नहीं कर सकता, हरदम आन-लाइन रहता हूँ।</p></div>
<p><!-- Ten Qustions end--></p>
<p>प्रखर राष्ट्र्वादी और <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=45">हठधर्मी</a> संजय अपने शुरुआती दिन याद करते हुये लिखते है</p>
<blockquote><p>अपनी किशोरावस्था में हम कोई बङी क्रांति करने के फिराक में रहते थे। कुर्ता-पायजामा हमारा ड्रेस कोड हुआ करता था और अंग्रेजी बोलने वाले को हम देशद्रोही से कम नहीं समझते थे।</p></blockquote>
<p>क्रांति की फिराक में रहने के परिणाम से ही जो सोच बनी वह यह थी</p>
<blockquote><p>जीवन के २०वें वर्ष में प्रवेश करते-करते लगने लगा था कि दुनिया को हम ही बदल कर रख देगें और इस काल में समानान्तर सिनेमा देखना खास पसंद करते थे।</p></blockquote>
<p>लेकिन इसके साथ ही जीवन से जुड़ी सच्चाइयां भी रहीं होंगी इसीलिये क्रांति के सपनों के साथ-साथ जीविका के बारे में भी सोच बनी और प्रयास भी हुये</p>
<blockquote><p>इसी दौरान व्यवसायिक गति-विधियों में हिस्सा लेने लगा था। यह ट्रेनिंग जैसा होता हैं। मेरा जन्म व्यापारी समाज में हुआ हैं इसलिए कैरियर का प्रश्न कभी सामने नहीं आया। अपना व्यवसाय करना हैं ऐसा शुरू से ही दिमाग में बैठा हुआ था। इसी सिलसिले में गुवाहाटी, सिलचर, जोधपुर, सूरत होता हुआ वर्तमान में अहमदाबाद में हूँ जहाँ हम दोनो भाई अपनी मीडिया कम्पनी चला रहे हैं।</p></blockquote>
<p>संजय अपने क्रांतिकारी विचारों को सामाजिक जीवन में भले अमली जामा न पहना पायें हों लेकिन व्यक्तिगत जीवन में इसकी भरपाई करने से नहीं चूके और 23 वर्ष की आयु में निधि के साथ प्रेम विवाह किया। प्रेम विवाह तो तब संस्कार के विरूद्ध माना जाता था। लेकिन इनकी शादी प्रेम विवाह थी, वो भी अंततः सभी की मर्ज़ी पा कर ही सम्भव हो सकी। यह प्रेम की ही कोमल भावनायें रहीं होंगी जिसने संजय के कवि रूप को भी <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=32">परवान</a> चढ़ाया और उन्होंने लिखा</p>
<blockquote><p>महक उठी फिज़ा कि गुलशन खिल उठे, हर फूल, हर कली में तुम हो तुम ही तुम हो।</p></blockquote>
<p>अपने प्रेम विवाह की परेशानियों की चर्चा करते हुये संजय ने अपने बच्चे को दी जाने वाली छूट की <a href="http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=7">घोषणा</a> अभी से कर दी है</p>
<blockquote><p>मैं अपने बच्चे को &#8216;लिव इन रिलेशनशिप&#8217; तक ही छूट देना चाहूँगा।</p></blockquote>
<p>नौ वर्ष की उम्र का पुत्र उत्कर्ष फिलहाल अपने पिता द्वारा उसको भविष्य में मिलने वाली छूट से बेखबर पढा़ई-लिखाई और कम्प्यूटर गेम में मस्त रहता है और आजकल अपना ब्लॉग भी शुरू कर दिया है, नाम है <a href="http://meriduniya.wordpress.com/">मेरी दुनिया</a>।</p>
<p>अपने चिट्ठा लेखन की शुरुआत की कहानी बताते हुये कहते है</p>
<blockquote><p>चिट्ठा लिखने की शुरूआत एक वर्ष पहले हुई जब &#8216;रवि कामदार&#8217; ने मुझे &#8216;एक काम की चीज़&#8217; बताते हुए कुछ हिन्दी चिट्ठो के बारे में बताया। लिखने-पढ़ने में भारी रूचि थी पर वर्तनियों की इतनी भूलें होती रही हैं की कभी कुछ छपने के लिए नहीं भेजा। पर चिट्ठा तो &#8220;अपना मैदान हैं और अपने घोड़े हैं&#8221;। फिर सभी चिट्ठाकार बन्धु लिखते रहने के लिए उकसाते भी रहे,तो लिखना जारी रहा।</p></blockquote>
<p>संजय की सोच उनके लेखन में साफ झलकती है। उनके सबसे अधिक चिट्ठे राष्ट्ररंग श्रेणी के हैं। साफगोई पसंद संजय का स्वभाव कुछ ऐसा है कि इनको गुस्सा बहुत जल्दी आता हैं, हालांकि उतनी ही जल्दी शांत भी हो जाता हैं। सोच से नास्तिक, विचारधारा से दक्षिणपंथी संजय को कुतर्क बिल्कुल पसंद नहीं है। लिखना-पढ़ना, रेखाचित्र बनाना पसन्द करने वाले संजय को अपने बेसुरे गले और नाच-गा नहीं सकने का मलाल हैं।</p>
<p>हर काम के लिये सरकार का मुंह ताकने को गलत मानने वाले संजय का मत है कि लोकतंत्र श्रेष्ठ शासन व्यवस्था हैं। हमें विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतंत्रता हैं और स्वतंत्रता है कल के सुनहरे सपनों को देखने की। कल के भारत को रचने में हमारी भूमिका भी हैं। जो हमें लोकतंत्र से प्राप्त हुई हैं। इस लिए हमें गर्व हैं अपने लोकतंत्र पर । फिलहाल संजय अपने अनुज पंकज के साथ <a href="http://www.chhavi.com">छवि</a> नामक मीडिया कंपनी चलाते हैं। छवि डिजायन और क्रिएटीव कम्पनी है। इसमें बेंगानी बंधु ब्रांड डिजायन करते हैं यानि कम्पनी का लोगो से लेकर सबकुछ, वेब डिजायन करते हैं,विज्ञापन डिजायन करते हैं, कोर्पोरेट प्रजंटेशन बनाते हैं।</p>
<p>निरंतर की तरफ़ से संजय को उनके निरंतर लेखन के लिये और तरकश तथा मीडिया कंपनी में लगातार उन्नति के लिये शुभकामनायें।</p>
<hr />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2186&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-kachha-chittha-sanjay/feed</wfw:commentRss>
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		</item>
		<item>
		<title>निधि के लेखन का है अंदाज़ खास</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-nidhi</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-nidhi#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 06 Aug 2006 06:09:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806kachha-chitthanidhi/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>कच्चा चिट्ठा</strong> में परिचय कीजिये विचारों की अभिव्यक्ति को सर्वोपरि मानने वाली हरफनमौला चिट्ठाकार और <strong><a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">चिन्तन</a></strong> की रचयिता <strong>निधि  </strong>से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img width="115" vspace="3" hspace="3" height="155" border="0" align="right" title="Nidhi" alt="Nidhi" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/nidhi.jpg" />आम तौर पर महिला चिट्ठाकार अपनी कविताओं के लिये ख्याति पाती हैं लेकिन लकीर से हट कर काम करने के चक्कर में निधि ने शुरुआत से गद्य पर हाथ साफ किया। गद्य तक तो ठीक लेकिन इसके भी दो कदम आगे वे <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">&#8216;चिन्तन&#8217;</a> करने लगीं। लेकिन चिंतन तथा बिंदास बोलता हुआ गद्य लिखने का यह मतलब नहीं कि उन्होंने कवितायें लिखी ही नहीं। लिखीं और खूब लिखी-</p>
<blockquote><p>पन्नों पे रख के दिल को उनको दिखा दिया,<br />
   वो देख के बोले कि गज़ल अच्छी है ।</p></blockquote>
<p>आम तौर पर लोग कवितायें पढ़कर उदास हो जाते हैं लेकिन निधि अधिकतर कविता ही तब लिखती हैं जब वे उदास होती हैं-</p>
<blockquote><p>कभी कभी न जाने क्या होता है मुझको,<br />
   भरी भीड़ में पाती हूँ,<br />
   खुद को एकदम एकाकी।<br />
   दम घुटता सा पाती हूँ,<br />
   तब मैं खुली हवा में भी।<br />
   मिलती है भीगी सी,<br />
   पलकों की कोरें,<br />
   पाती हूँ अनजान कसक अपने दिल में।</p></blockquote>
<p>
<div id='pullQuoteR'>लेखन का माहौल निधि को विरासत में मिला। नानाजी, प्रख्यात साहित्यकार श्री परिपूर्णानन्द वर्मा के पुत्र तथा प्रख्यात राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार डा.सम्पूर्णानन्द के भतीजे हैं।</div>
<p>&nbsp;</p>
<p><a href="http://khulepanne.wordpress.com/">अमित कुलश्रेष्ठ</a> के प्रोत्साहन कम उकसावे पर ज्यादा अपना &#8216;चिन्तन&#8217; शुरू करने वाली निधि का जन्म 15 नवंबर 1979 में कानपुर में हुआ। आरंभिक शिक्षा नाना जी के पास रह कर बकेवर में तथा फिर आगरा में हुई और उसके पश्चात 1999 में दयालबाग विश्वविद्यालय से एम.एस.सी. में दाखिला लिया। वहीं से भौतिकी तथा कम्प्यूटर में परास्नातक। वर्ष 2000 में आकाशवाणी, आगरा में आकस्मिक संचालक के रूप में चयन। पढ़ाई के साथ साथ &#8216;युववाणी&#8217; तथा कुछ अन्य कार्यक्रमों का संचालन। इसके बाद 2001 में एक अमेरिकन कंपनी में मेम्बर टेक्निकल स्टाफ़ के पद पर चयनित हो नोएडा आ गयी। वर्ष 2003 में साथ ही कार्यरत साथी अमित श्रीवास्तव से विवाह। शादी के पश्चात पति व ससुराल वालों के प्रोत्साहन से गायन पर भी ध्यान देना शुरू किया।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; width: 175px; float: right">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉग लिखना कैसे शुरू किया?</strong><br />
 देखादेखी। जब पता लगा हिंदी मे ब्लॉग लिखा जा सकता है तो प्रेरणा मिली। अंग्रेज़ी में डायरी लिख लिख के पक गये थे। सोचा हिंदी का ब्लॉग आज़माया जाये।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />
वैसे तो परेश मिश्रा का <a target="_blank" href="http://paresh.blogspot.com/">ब्लॉग</a> पर हिंदी में अमित का <a target="_blank" href="http://khulepanne.wordpress.com">भानुमती का पिटारा</a> सबसे पहले देखा।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखती हैं?</strong><br />
  नारद जी की दया है। इसके अलावा कुछ अपने और दूसरों के चिट्ठों पर की गयी टिप्पणी और कड़ियों को फॉलो करके भी देखे हैं।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखती हैं कंप्यूटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />
  सीधे की-बोर्ड पर चालू होते हैं। काग़ज़ पे लिखे ज़माना हुआ। कागज़ कलम सिर्फ़ महीने के राशन की लिस्ट बनाने के काम आता है अब <img src='http://www.nirantar.org/wp-includes/images/smilies/icon_sad.gif' alt=':(' class='wp-smiley' /> </p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौन हैं? </strong><br />
  सभी पर कुछ न कुछ अच्छा है।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है?</strong><br />
  चिट्ठा नहीं पर कभी कभी कोई प्रविष्टी खराब लगती है। वह तब जब भाषा असभ्य हो या गलत बातों की पैरवी की गयी हो।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br />
  टिप्पणी न मिलने पर लगता है कि कहाँ कमी है यह बताने वाला कोई भी नहीं। अच्छाई सब लिखते हैं।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />
 वैसे तो सब ऐं वैं ही हैं। पर अतीत से जुड़ी पोस्ट पढ कर यादें ताज़ा हो जाती हैं औ साथ ही वह बहुत सच्चाई से लिखीं इसलिये वह मुझे अच्छे लगतीं हैं।</p>
<p><strong>और सबसे खराब?</strong><br />
  मैं अपनी हर पोस्ट में कमी निकाल सकती हूँ। सुधार की संभावनाएं तो असीमित हैं।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करती हैं?</strong><br />
  किताबें, गाने तथा नये रोचक सॉफ़्टवेयर डाउनलोड करने, तरह तरह की जानकारी ढूढँने के और नयी नयी चीज़ें सीखने के लिये।</p>
</p></div>
<p>अपनी रुचियों के बारे में गिनाते हुये निधि जब शुरु होती हैं तो बात लकीर से हटकर बनी फिल्मों, गायन, लेखन, मिट्टी के पुतले बनाना, अभिनय, रंगोली, पेन्टिंग, नृत्य फ़ोटोग्राफ़ी, खाना बनाना, प्राकृतिक जगहों पर भ्रमण और तकनीकी विषयों के बारे मे जानना-समझते तक जाती है। इनमें काफी कालेज के जमाने के शौक थे जिनके लिये तमाम पुरस्कार भी बटोरे। अभी इस सूची में चिट्ठाकारी, आयुर्वेद आदि-इत्यादि, वगैरह-वगैरह जुड़ते जा रहे हैं। गाने-बजाने का शौक तो बरकरार है। लेकिन पता चला है कि कभी डांस का भी शौक था जो अब अभ्यासाभाव में कभी-कभी <em>मटक लेने</em> तक सिमट गया है।</p>
<p>बचपन में काफी अंतर्मुखी रही निधि कक्षा 10 तक पुस्तकों तक सीमित रहीं। फिर गुरुओं तथा शुभचिंतकों के सराहना और प्रोत्साहन का परिणाम था कि अपनी कलाओं को दूसरों के समक्ष रखने के पहल की। उन्ही दिनों सर्वश्रेष्ठ छात्र और समाज सेवा के लिये मिले पुरुस्कारों ने आत्मविश्वास में और वृद्दि की। इसके बाद कॉलेज के दिनों में कोई क्षेत्र नहीं छोड़ा जहाँ पैर न पसारे हों। पढा़ई के क्षेत्र में निधि कक्षा के सर्वोत्तम विद्यार्थियों में भी रहीं।</p>
<p>जहां तक लेखन का सवाल है तो वो लेखन का माहौल निधि को विरासत में मिला। शुरू के दिनों में ननिहाल में रहीं। पूरा ननिहाल (निधि के नानाजी, प्रख्यात साहित्यकार श्री परिपूर्णानन्द वर्मा के पुत्र तथा प्रख्यात राजनीतिज्ञ एवं साहित्यकार डा.सम्पूर्णानन्द के भतीजे हैं) लेखन से जुड़ा रहा है इसलिये शायद लिखने की क्षमता प्रकृति प्रदत्त है। वर्ष 1991-92 में दो लेख &#8216;उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान&#8217; की पत्रिका &#8216;अतएव&#8217; में भी प्रकाशित हुए ।</p>
<p>जीवन के उतार-चढ़ाव के  बारे में बताते हुये निधि कहती हैं-</p>
<blockquote><p>1999 में मेरे एम.एस.सी. में दाखिला लेने के दो माह बाद ही पिताजी का आकस्मिक देहांत हो गया। इसी सदमें से 28 दिन के बाद नानी जी भी चल बसीं। घर से कोई सहयोग न था। मैं और मेरी छोटी बहन किसी तरह माँ और बुरी तरह से बिखरी ज़िन्दगी को सँभालने की कोशिश कर रहे थे। इस समय मेरा कोई मित्र भी मेरे पास न था। इसलिये भावों के अतिरेक को शब्दों में ढालना शुरू कर दिया। मेरी अधिकतर कवितायें मैने इसी समय लिखीं।</p></blockquote>
<p>लेखन को किसी भी तरह के भाषा-बंधनों में बांधने के बजाय विचारों की अभिव्यक्ति को सर्वोपरि मानने वाली निधि कभी-कभी बेसिर-पैर का हांकने से भी परहेज नहीं करतीं जिसका विचारों से कोई वास्ता नहीं होता:-</p>
<blockquote><p>
   आज कहते हो ज़िन्दगी को कम ये कर देगी,<br />
   शराब चीज़ बुरी है इसे पिया न करूँ,<br />
   खै़रख़्वाह उम्र तो घटती है साँस लेने से,<br />
   कल ना कह देना कि साँसे भी मैं लिया ना करूँ ।</p></blockquote>
<p>निधि का लेखन का अंदाज़ खास है। अपने अनुभवों के बारे में जब बताती हैं तो लगता है कि आखों देखा हाल सुना रही हैं। इनमें शामिल हैं मम्मी की हिदायतें, बड़े <em>वो</em> टाइप पतिदेव, गूगल देवता और आवारा आशिक की उड़ैया से लहालोट नायिका। पतिदेव का वर्णन पढ़ते हुये लगता है कि ये निधि का वो खिलौना है जिसमें वो उसकी अच्छाईयां निहारकर निहाल भी सकें तथा मीनमेख का माइक्रोस्कोप लगाकर यह भी कह सकें बड़े वो टाइप हैं हमारे पतिदेव। यह लेख पढ़ते समय लगता है कि किसी से उलाहना कर रही हों कि हमारे ये हमारे दिल का ख्याल नहीं रखते। तथा फिर हाले-दिल सुनाने को कहने पर कहे कि हाय दिल तो इन्हीं के पास है। संभाल के रखा है।</p>
<p>निधि की नायिकायें भी नायिकाओं टाइप ही हैं। एक हमउम्र दिलफेंक आवारा आशिक को दिल देने की बजाय दो बुजुर्गों (कुमार-मित्तल) की किताब में दिल लगाती हैं। ये नायिकायें खुद तो बिना कुछ किये दिलफेंक मजनुओं से येन-केन-प्रकारेण बचती हैं लेकिन जब खबर सुनती हैं कि किसी कन्या ने किसी मजनूं की उड़ैया कर दी तो दिल बाग-बाग हो जाता है। नायिकाओं को लगता है कि उनका बदला ले लिया गया। निधि जाने पहचाने वाक्य टाइप करने के बजाय अपने खुद के वाक्य गढ़ना भी बखूबी जानती हैं-</p>
<ul>
<li>सामान्यत: कोई भी नारी बिना वजह अपना वक्त और सैंडल ज़ाया नहीं करती।</li>
<li>मौसम की तरह कुछ लोग भी चिपचिपे होते हैं।</li>
</ul>
<p>निधि की अभी तक के अपने अतीत के बारे में ही ज्यादातर लिखा है। इसमें उनके <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/06/15/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ac%e0%a5%80%e0%a4%a4-%e0%a4%97%e0%a4%af%e0%a4%be/">बचपन</a> की <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/05/25/%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%aa%e0%a4%a8-%e0%a4%ad%e0%a4%be%e0%a4%97-%e0%a5%a8-%e0%a4%b8%e0%a4%ac%e0%a4%95-%e0%a4%b8%e0%a4%81%e0%a4%96%e0%a5%8d%e0%a4%af%e0%a4%be-%e0%a5%a9/">यादे</a> हैं, मम्मी के <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/06/15/%e0%a4%ae%e0%a4%ae%e0%a5%8d%e0%a4%ae%e0%a5%80-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%a1%e0%a4%be%e0%a4%af%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97/">डायलाग</a> और  पति से पहली <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/07/testing-2/">मुलाकात</a> से लेकर पांच सौ के छब्बीस पत्ते उड़ा देने के <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/2006/07/14/%e0%a4%85%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%ac-%e0%a4%b2%e0%a5%8b%e0%a4%97-%e0%a4%b9%e0%a4%ae%e0%a5%87%e0%a4%82-%e0%a4%ac%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%88-%e0%a4%a6%e0%a5%8b-%e0%a4%b0%e0%a5%87/">किस्से</a> हैं तथा कुछ सामयिक घटनाओं पर लेख हैं।</p>
<p>अपने व्यक्तित्व तथा स्वभाव के बारे में निधि खुलासा करती हैं:</p>
<blockquote><p>अपना खुद का बेहद उलझा हुआ व्यक्तिव मेरे लिये एक पहेली है। और खुद को समझना मेरे ही लिये चुनौती। शायद जीवन में घटी कुछ दु:खद घटनाओं की परीणीति हो ये। अगर कहूँ कि मैं काफ़ी डग्गेमार प्राणी हूँ तो ग़लत नहीं होगा। जब तक धकियाया न जाय कुछ नहीं करती। परंतु ईश्वर की कृपा से हमारे मित्र तथा पति देव बड़े हिम्मती हैं। सब लोगों को लगता है कि हम बहुत कुछ कर सकते हैं सो सब अपनी मर्ज़ी की दिशाओं में हमें ठेलने में लगे हैं। फिलहाल &#8216;की-बोर्ड&#8217; बजाना सीख रहें है तथा गायन का अभ्यास भी कर रहे हैं। कोशिश कर रहे हैं कि लेखन नियमित करें।*</p></blockquote>
<p>निधि को पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ नौकरी करना फिलहाल रास नहीं आता। अपनी आगे की योजनाओं के बारे में निधि का कहना है:-</p>
<blockquote><p>आगे चल के अनाथ बच्चों और बुज़ुर्गों के लिये कुछ करना चाहती हूँ। कुछ भी कर ग़ुज़रने का हौसला तो है पर वो दिशा ढूँढ रही हूँ जहाँ मेरी आत्मा को तृप्ति मिले। बस यूँ समझ लीजिये कि मैं क्या हूँ और क्यूँ हूँ, एक पत्नी, बेटी, बहू के अतिरिक्त मेरी अपनी पहचान क्या है, अपने आप से मेरी क्या अपेक्षायें है तथा परिवार के अतिरिक्त अपने देश की उन्नति में मैं क्या योगदान दे सकती हूँ, इन्ही प्रश्नों का हल तलाश रही हूँ।#</p></blockquote>
<p>निधि का व्यक्तित्व हरफनमौला सा है। आशा है कि वे अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ नियमित लेखन से भी जुड़ी रहेंगी तथा अपनी अतीत की यादें समेटने के साथ-साथ समकालीन विषयों पर अपने हाथ आजमायेंगी। निरंतर परिवार की तरफ से निधि को उनकी पारिवारिक जिम्मेदारियों व भविष्य की योजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा करने तथा अनवरत लेखन के लिये मंगलकामनायें।</p>
<hr width="100%" />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2184&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>बहुमुखी प्रतिभा वाले हैं झालिया नरेश</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-ashish</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-kachha-chittha-ashish#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:56:51 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806kachha-chitthaashish/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>कच्चा चिट्ठा</strong> में परिचय कीजिये दोस्तों के बीच झालिया नरेश या आमगाँव के ज़मींदार तथा चिट्ठाकारों के बीच चिरकुंवारे के रुप में जाने जाने वाले और लोकप्रिय चिट्ठे <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/"><strong>खाली-पीली</strong></a> के रचयिता <strong>आशीष श्रीवास्तव</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
<div style="float:left;padding:10px;margin:10px;"><img style="border: medium none" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/ashish_shrivastava.jpg" border="0" alt="आशीष श्रीवास्तव" align="left" /></div>
<p>दोस्तों के बीच झालिया नरेश या आमगाँव के ज़मींदार तथा चिट्ठाकारों के बीच चिरकुंवारे के रुप में जाने जाने वाले और लोकप्रिय चिट्ठे <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/"><strong>खाली-पीली</strong></a> के रचयिता <strong>आशीष श्रीवास्तव</strong> का जन्म 19 अक्टूबर, 1976 को छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में अपने ननिहाल में हुआ। बचपन विदर्भ के पिछड़े क्षेत्र <strong>गोंदिया</strong> जिले की <strong>सालेकसा</strong> तहसील के एक गाँव <strong>झालिया</strong> में ऊधम-मस्ती करते हुये बीता।  प्राथमिक शिक्षा झालिया में और माध्यमिक शिक्षा दो किमी दूर <strong>कावराबांध</strong> गाँव में हुयी जहां पिताजी अध्यापक थे। उच्चतर माध्यमिक शिक्षा पास के कस्बे आमगाँव में हुयी। गोंदिया से संगणक प्रौद्योगिकी में अभियांत्रिकी स्नातक आशीष ने कॉलेज के दिनों में एक संगणक प्रशिक्षण केंद्र में अध्यापन कार्य भी किया। </p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; width: 175px; float: right">
<h1>दस सवाल</h1>
<p><strong>ब्लॉग लिखना कैसे शुरू किया?</strong><br />     रविजी का <a href="http://abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2004/blogs.htm">लेख</a> पढा था -अभिव्यक्ति पर। बस उसी के बाद चिठ्ठे पढना शुरू किया। कुछ दिनों बाद लगा कि चलो खुद भी लिखने की कोशिश करते है और शुरू हो गये। लिखने का कीड़ा पहले से था, अब डायरी से हटकर नेट पर आ गया।</p>
<p><strong>पहला ब्लॉग कौन सा देखा?</strong><br />     पहला ब्लॉग ठीक तरह से तो याद नहीं लेकिन शायद <a href="http://myjavaserver.com/~hindi/">चिठ्ठा विश्व</a> से शुरूवात की थी। शुरूवाती ब्लॉग में <a href="http://www.hindini.com/fursatiya">फुरसतिया</a>, <a href="http://www.hindini.com/ravi/">रवि जी</a>, <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">रमण कौल </a>और <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा नरेश</a> तथा <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल जी</a> के चिठ्ठे ही थे। बाद में <a href="http://www.akshargram.com/">अक्षरग्राम</a> और रमण जी की सूची से दायरा बढ़ता गया।</p>
<p><strong>नियमित रूप से ब्लॉग कैसे देखते हैं?</strong><br />     <a href="http://www.akshargram.com/narad">नारद</a> का फ़ीड फायरफ़ोक्स के RSS प्लग-ईन में जोड़ दिया है, जो पूरे दिन मुझे हर नयी प्रविष्टि के बारे में बताता रहता है।</p>
<p><strong>लेखन प्रक्रिया क्या है? सीधे लिखते हैं कंप्यूटर पर या पहले कागज पर?</strong><br />     मैं सीधे कंप्यूटर पर ही लिखता हूं, पेन से लिखना छूट गया है। कागज पर मेरी लिखावट तो <strong>&#39;आप लिखे खुदा बांचे&#39; </strong>की हालत में है।</p>
<p><strong>सबसे पसंदीदा चिट्ठे कौन हैं?</strong><br />     लगभग सभी। लेकिन <a href="http://www.hindini.com/fursatiya/">फुरसतिया</a> , <a href="http://www.kalpana.it/hindi/blog/">सुनील दीपक</a>, <a href="http://www.jitu.info/merapanna/">जीतू</a>, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल</a>, <a href="http://www.kaulonline.com/chittha">रमण</a>प्रमुख है, इस सूची में। अब <a href="http://abhivyakta.wordpress.com/">निधि</a> भी शामिल हैं। <a href="http://theluwa.blogspot.com">ठेलुहा</a> का लिखना बंद करना अच्छा नही लगता है। कविताओं मे <a href="http://pratyaksha.blogspot.com/">प्रत्यक्षा</a> और <a href="http://anoopbhargava.blogspot.com/">अनूप भार्गव</a> पसंद आते हैं।</p>
<p><strong>कोई चिट्ठा खराब भी लगता है ?</strong><br /> नहीं, ऐसा कोई चिट्ठा तो नही है लेकिन कुछ प्रविष्टियां अच्छी नही लगती है। विशेषत: जिसमें बिना सोचे-समझे, बिना ठोस तथ्यों के भावनात्मक रूप से अनाप-शनाप लिख दिया गया हो। उदाहरण के लिये भारत को इजराईल के जैसे व्यवहार करने की सलाह देने वाला चिठ्ठा।</p>
<p><strong>टिप्पणी न मिलने पर कैसा लगता है?</strong><br /> बुरा तो लगता है। लेकिन ये भी सच है कि जिस चिठ्ठे पर मैंने सबसे ज्यादा टिप्पणी की उम्मीद की उसी पर कम मिली और हल्के फुल्के ढंग से लिखे चिठ्ठों पर ढेर सारी।</p>
<p><strong>अपनी सबसे अच्छी पोस्ट कौन सी लगती है?</strong><br />     सभी लेकिन ये दो चिठ्ठे अच्छे लगते है एक हल्के फुल्के मूड का और दूसरा गंभीर मूड का <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=12">एक क्वांरे की व्यथा</a> और <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=8">क्या इन्सान जानवरों से भी गया गुजरा हो गया है?</a>। ये मेरे दिल की एक ऐसी भड़ास है जिससे मैं बचना चाहता हूं लेकिन नहीं बच पाता हूं।</p>
<p><strong>और सबसे खराब?</strong><br />     <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=47">आदर्श प्रेमिका के गुण</a>। इस पर मुझे अच्छी खासी टिप्पणियां भी मिली लेकिन पहली बार मैंने इस प्रेम को माना। ये मेरे जीवन का एक ऐसा हिस्सा है जिससे मैं हमेशा कतराता रहा। इसका दूसरा भाग लिखने के बाद भी मैंने प्रकाशित नही लिया है।</p>
<p><strong>चिट्ठा लेखन के अलावा और नेट का किस तरह उपयोग करते हैं?</strong><br /> नेट तो मेरी रोजी रोटी का सवाल है। मैं एक वेबानुप्रयोग विशेषज्ञ हूं, गूगल देव का भक्त, जावा का मास्टर। जावा ऐसे भी मुक्त श्रोत के लिये जानी जाती है, जिसमें मेरी हर परेशानी का हल नेट पर ही होता है। चिट्ठों के अलावा मैं जावा फोरम में भी सक्रिय सदस्य हूं।</p>
</p></div>
<p>स्नातक होने के बाद शुरू हुयी यायावरी। पहली नौकरी मुंबई में, दूसरी दिल्ली, तीसरी गुडगाँव और चौथी चेन्नई में। इन सभी जगहों पर काम करते हुये दुनिया की भी सैर जारी रही। अमरीका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान और मॉरीशस घूम (काम कर) आये</p>
<blockquote><p>अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं<br />     रुख हवाओं का जिधर का है, उधर के हम हैं।</p></blockquote>
<p>स्वप्नदर्शी आशीष ने बचपन से ही ऊंचे सपने देखने शुरू कर दिये थे:</p>
<blockquote><p>सितारों से आगे जहाँ और भी हैं<br />     अभी इश्क़ में इम्तिहाँ और भी हैं<br />     तू शहीन है परवाज़ है काम तेरा<br />     तेरे सामने आसमाँ और भी हैं।</p></blockquote>
<p>विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले तथा बचपन में आर्य समाज, आर.एस.एस. (आमगाँव संघ का गढ़ है) से जुड़े रहे आशीष अब नास्तिक होते जा रहे हैं। राहुल सांकृत्यायन के जीवन से &#39;काफी प्रभावित&#39; आशीष का प्रिय &#39;नारा&#39; है:</p>
<blockquote><p>सैर कर दुनिया की गाफिल, ज़िंदगानी फिर कहां,<br />ज़िंदगानी गर कुछ रही, तो नौजवानी फिर कहां।</p></blockquote>
<p>आशीष के शौक गिने चुने ही है- पढना, संगीत सुनना और अपनी फटफटिया पर आवारागर्दी करना। कल्लो बेगम (उनका कम्प्यूटर) से प्यार अब ढलान पर है।</p>
<p>आशीष खुद के बारे में बताते हुये कहते हैं:</p>
<blockquote><p>दोस्तों में अच्छा खासा लोकप्रिय हूँ, या यूं कह लीजिये महफिलों की जान हूँ। जहां जाता हूँ वहाँ हंसी के फव्वारे छूटते रहते हैं। बदकिस्मती से लडकियां कुछ ज्यादा ही पसंद करती हैं। मेरे अच्छे दोस्तों में लडकियाँ ही ज्यादा है, फिर भी अब तक कंवारा हूँ।</p>
<p> मैं डार्विन के सिद्धांत &quot;सर्ववाईवल आफ द फिटेस्ट&quot; पर विश्वास करता हूँ। हर एक को जीवन के लिये संघर्ष करना पड़ता है, जो अपने आपको वातावरण के अनुकूल कर लेता है वही इस संघर्ष में विजयी होता है। मैं ज़माने के अनुसार ढलने की बजाये ज़माने को ढालने में विश्वास रखता हूँ। </p>
<p>     लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती<br />     हिम्मत करने वालों की हार नहीं होती।</p>
<p> डर लगता है असफलता से। निजी जीवन में जरूर कुछ असफलतायें झेली है लेकिन व्यवसायिक जीवन में अब तक असफलता नही देखी है। थोडा सा जिद्दी हूँ, थोडा गुस्सैल भी। अभिमान की हद तक स्वाभिमानी हूँ। देश और मातृभाषा के विरोध में कुछ भी सुनना पसंद नही। इस पर हमेशा लड़ते रहता हूँ।</p>
<p>     निज गौरव का नित ज्ञान रहे<br />     हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे।<br />     सब जाय अभी पर मान रहे<br />     मरणोत्तर गुंजित गान रहे।<br />     कुछ हो न तजो निज साधन को<br />     नर हो न निराश करो मन को ।।</p></blockquote>
<p>आध्यात्म से लेकर क्वाँटम भौतिकी तक, गल्प विज्ञान से लेकर प्रेम कहानी तक सब कुछ पढ़ने के शौकीन आशीष को लिखने से ज्यादा पढ़ने का शौक है। कभी कभार <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/a/ashish_shrivastav/index.htm">तुकबन्दी</a> भी कर लेते हैं। अपने  लिखने के अंदाज के बारे में बताते हुये आशीष कहते हैं:</p>
<blockquote><p>लिखने का तो ऐसा है कि बस बिना सोचे जो मन में आया लिख लिया। जब भी कुछ सोच कर, योजना बनाकर किसी विषय पर लिखने की सोची, आज तक उसे लिख नही पाया। लोगों को अपनी बातों में बांधे रखने में मेरा जवाब नहीं है,<br />
 बिना किसी विषय के घंटों बोल सकता हूँ।</p></blockquote>
<p>जो मन में आया सो लिख दिया के साथ यह भी सच है कि आशीष अपनी अभिव्यक्ति की सड़क पर विचारों की फटफटिया दौड़ाते समय वर्तनी के स्पीड ब्रेकर की चिंता छोड़ <strong>&quot;लीखते रहाते हैं। जिवन में चुंकि बहुत कूछ करना है।&quot;</strong></p>
<div id='pullQuoteR'>आमतौर पर नायिकायें नायकों के प्रेम निवेदन ना-नुकुर के बाद स्वीकार करती रहीं हैं लेकिन इनके मामले में कुछ उल्टी हवायें बहीं। </div>
<p>ब्लॉगिंग की शुरुआत में <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=9">अमरिकी</a>  <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=7">प्रपंच</a> के बारे में बताना शुरू  करके आशीष प्रेम-प्रपंच के बारे में प्रवचन करते हुये <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=13">कन्या-पुराण</a> बाँचते रहे। सब लोगों को बताते रहे कि कितने अवसरों पर वो अपना कुंवारेपन का विकेट बचाये रहे। किसी भी कन्या द्वारा इनको अपने दिल का राजा बनाने की साजिश सूंघते ही आशीष ने झट से उसका गाडफादर, बोले तो फ्रेंड फिलासफर एंड गाइड, बनकर साजिश विफल कर दी। आमतौर पर नायिकायें नायकों के प्रेम निवेदन ना-नुकुर के बाद स्वीकार करती रहीं हैं लेकिन इनके मामले में कुछ उल्टी हवायें बहीं सो इन्होंने भी सरफिरेपन का बखूबी परिचय देते हुये लैला के <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=76">गाल लाल</a> कर दिये। इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ा जब ये एक बार खुद <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=47">लटपटाये</a> तो समय और इसके संस्कारों ने इनको सफल नहीं होने दिया। तब से ये कुंवारेपन का झण्डा लहराते हुये घूम रहे हैं- नगरी-नगरी, द्वारे-द्वारे। हास्यव्यंग्य के <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?cat=3">किस्से</a> सुनाते हुये आशीष अपने गुरुजनों के प्रति श्रद्धा सुमन भी <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=87">अर्पित</a> करते रहते हैं। </p>
<p>बताने वाले बताते हैं कि <a href="http://www.ashish.net.in/khalipili/?p=78">&#39;कल्लो बेगम&#39;</a> के पुराने आशिक आशीष का हाथ कम्प्यूटर पर काफी साफ है लेकिन अभी तक इस दिशा में हिंदी ब्लॉगिंग से संबंधित किसी भी उल्लेखनीय तकनीकी योगदान की जिम्मेदारी से आशीष हाथ झाड़ रखे हैं। शायद आगे कुछ जौहर दिखायें।</p>
<p>स्वप्नदर्शी, आत्मविश्वासी, बहुमुखी प्रतिभा वाले, उदारमना आशीष की कितनी ही ख़्वाहिशे हैं, कितने ही  सपने पूरे करने है:</p>
<blockquote><p>हज़ारों ख्वाहिशें ऐसीं, के हर ख्वाहिश पे दम निकले<br />     बहुत निकले मेरे अरमाँ, लेकिन फिर भी कम निकले</p></blockquote>
<p>निरंतर परिवार की तरफ से आशीष की हर ख्वाहिश, हर तमन्ना, हर सपना पूरा होने की हार्दिक मंगलकामनायें। कामना यह भी कि इनका लेखन निरंतर प्रवाहमान रहे तथा वे अंतर्जाल पर हिंदी के विकास में सक्रिय योगदान कर सकें।</p>
<hr />
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		<item>
		<title>जुलाई का कच्चा चिट्ठा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-kaccha-chittha</link>
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		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 20:06:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चा चिट्ठा में आपकी मुलाकत कराते हैं चिट्ठामंडल के सदस्यों से. इस बार मिलिये चिट्ठाकार अतुल अरोरा और कवियित्री दीपा जोशी से.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>अतुल अरोरा</h1>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/profile.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" align="left" />
<div class="dropCap">ज्व</div>
<p>लंत मुद्दों की पीड़ा, गुदगुदाते पलों की ठिठौली और कभी-कभी खामखाँ के चिंतन मनन के संकलन &#8211; <a href="http://rojnamcha.blogspot.com">रोजनामचा</a> तथा एक अप्रवासी भारतीय के अमेरिका प्रवास के रोचक संस्करणों के संकलन &#8211; <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com">लाइफ इन एच ओ वी लेन </a>के लेखक अतुल अरोरा को उनके दोस्त व प्रशंसक सौ फीसदी कथाकार तथा अव्वल दर्जे का गप्पबाज मानते हैं।</p>
<p>७ मई, १९७० को कानपुर में जन्में और पले‍-बढ़े अतुल ने पी.एन कालेज कानपुर से बी.एस.सी. के उपरांत एच.बी.टी.आई. से संगणक प्रयोग में निष्णात (मास्टर आफ कंप्यूटर एप्लीकेशन) की उपाधि प्राप्त की। आरंभिक कुछ साल लखनऊ व कानपुर में काम करने के पश्चात इस शाकाहारी, यूपी वाले खत्री ने रुख किया अमेरिका का। संप्रति वे फिलाडेल्फिया में कार्यरत हैं, अपना समय अपनी जीवनसंगिनी, बच्चों और लेखन, फोटोग्राफी जैसे अपने शौकों में बाँटते हैं। लेखन के अलावा अतुल को शौक है सिनेमा (खास तौर पर पुरानी हिन्दी फिल्मों का) और भ्रमण का।</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/atul.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" align="right" />किस्सागोई में अतुल को महारत हासिल है। आमजीवन की घटनाओं से लिखने का मसाला उठाकर उसमें चिकाईबाजी की छौंक लगाकर लज़ीज लेखन के रूप में पेश करने का हुनर अतुल को बखूबी आता है। हिंदी चिट्ठाजगत के सबसे चर्चित लेख अगर टटोलें जायें तो उसमें अतुल के हाल आफ फेम के सारे लेख तो होंगे ही चाहे वे <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/10/blog-post_14.html">असली प्रवासी</a> होने का , <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/11/blog-post_02.html">लिटमस टेस्ट</a> हों, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/11/blog-post_16.html"> डॉ झटका</a> हों, <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2004/12/blog-post_13.html">कुत्ते की पहचान</a> का संकट हो, <a>भैंस का दर्द हो</a> या <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/2005/05/blog-post_17.html">राजा का बाजा</a>। तकनीकी तौर पर भी अतुल का हाथ तंग नहीं है। नई-नई खुराफातें करते रहते हैं। स्वाभाव से संस्कारी बालक के सारे गुण होने के बावजूद अतुल अपने जिस गुण का झंडा खुद फहराते रहते हैं वह है इनका गुस्सा। वास्तव में अतुल को लेखन और गुस्सा विरासत में मिला है। इनके पिताजी श्री नाथ अरोराजी मशहूर जनवादी लेखक हैं। संयोग कुछ ऐसा भी हुआ है कि अभिव्यक्ति के <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/1purane_ank/2005/02_16_05.html">एक अंक में</a> कथाकार पिता की कहानी (<a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2005/upahar/upahar1.htm">उपहार</a>) तथा चिट्ठाकार पुत्र के संस्मरण <a href="http://www.akshargram.com/2005/02/22/184">साथ-साथ</a> छपे।</p>
<p>अतुल गुस्से को मर्दों का गहना मानते हैं। तथा गाहे-बगाहे यह गहना <a href="http://akshargram.com/2005/01/05/132/#comments">धारण करते</a> रहते हैं। विज्ञान की भाषा में कहा जाये तो अतुल की &#8220;विशिष्ट उष्मा&#8221; बहुत कम है। बहुत जल्द हत्थे से उखड़ते हैं पर उससे जल्द ही ठंडे हो जाते हैं। दोस्तों से लंबे समय तक नाराज न रह पाना इनकी बहुत बड़ी कमजोरी है। हिंदी ब्लॉग जगत की हर उल्लेखनीय गतिविधि से अतुल सक्रिय रूप से जुड़ रहे। इन उपलब्धियों में सारी कहा-सुनी, उठा-पटक  भी शामिल हैं। नवीनतम हरकत रही प्रथम भारतीय चिट्ठाकार सम्मेलन, जिसे बताने की <a href="http://www.akshargram.com/2005/06/11/439/"> हड़बड़ी</a> में अतुल अपनी सारी किस्सा गोई भूल गये। लिखने की बात पर उनकी कलम रुंध गई तथा काम संभाला रमणकौल ने &#8211; <a href="http://www.kaulonline.com/chittha/?p=50"> इधर-उधर कर</a> के ।</p>
<p>स्वभाव से सकारात्मक रुख वाले अतुल मेहनती है तथा अपना लक्ष्य हासिल करने में मेहनत से जी नहीं चुराते वहीं दोस्तों पर भरोसा और प्यार इतना करते हैं कि गाहे-बगाहे अपने जिम्मे के काम दोस्तों  को करने के लिये छोड़ देते हैं। अपने बारे में अफवाहें फैलाने में भी पीछे नहीं रहते अतुल, उनमें से एक यह है कि इनको <a href="http://tatkaal.blogspot.com/2005/02/blog-post_20.html">हिंदी ठीक से नहीं</a> आती। इस अफवाह का दंड भी इनके प्रशंसको ने पहले ही दे दिया था जब इन्हें हिंदी के लिये <a href="http://www.indibloggies.org/results-2004">इंडीब्लॉगीज़ अवार्ड</a> से नवाज़ा था।</p>
<p>आम हिंदुस्तानियों की तरह अतुल अपनी पत्नी को अपने से ज्यादा <a href="http://merapanna.blogspot.com/2004/12/blog-post_110317668205122127.html#comments"> समझदार</a> मानते हैं पर करते अपने मन की हैं (?)। अतुल तहज़ीब-पसंद इतने हैं कि चुहल भी <a href="http://hindini.com/eswami/?p=14#comments">बताकर</a> करते हैं। तमाम आम प्रवासी की तरह देश की तमाम खामियां देखकर दुखी रहते हैं, मन बहुत बेचैन होता है मातृभूमि में आने का पर हालात पर बस नहीं। देश-दुनिया में बसे अतुल के प्रशंसक दोस्त इनको लगातार बेहतर लिखते देखना चाहते हैं। हम भी उनमें से हैं। तमाम शुभकामनाओं के साथ!</p>
<hr />
<h1>दीपा जोशी</h1>
<p>दीपा जोशी ने अपना चिट्ठा-<a href="http://deepshikha70.blogspot.com/">अल्पविराम</a>, पिघलते एहसासों में प्रेम का इतिहास खोजते हुये शुरु किया:</p>
<blockquote><p>इन पिघलते एहसासों ने रचा<br />
तुम्हारे व मेरे प्रेम का इतिहास।</p></blockquote>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/deepa_joshi.gif" border="0" alt="" hspace="4" vspace="2" align="right" />संगीत तथा गुनगुनाना शौक है दीपा जोशी का। अन्य रुचियाँ हैं- संगीत, कला, साहित्य तथा दर्शन। साहित्य में भी कविता में ज्यादा मन रमता है। ७ जुलाई, १९७० को दिल्ली में जन्मी, पली-बढ़ी, पढ़ी-लिखी दीपा जोशी ने &#8216;माँ&#8217; शीर्षक से पहली कविता जब लिखी तब वे मात्र बारह वर्ष की थीं। फिलहाल दिल्ली में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में कार्यरत दीपा, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम-हिन्दी में सृजनात्मक लेखन में अध्ययनरत हैं।</p>
<p>कला व शिक्षा में स्नातक दीपा जोशी की रचनायें गृहशोभा, सरिता, उत्तरांचल पत्रिका व दैनिक जागरण के नजरिया स्तंभ में छपती रहीं हैं। वेब पत्रिकाओं <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/d/deepa_joshi/index.htm">अनुभूति</a>, <a href="http://www.sahityakunj.net/LEKHAK/DeepaJoshi/aai_hholi_aai.htm">साहित्यकुंज,</a><a href="http://www.kaavyaalaya.org/">काव्यालय</a>, <a href="http://www.nirantar.org/0505-vatayan-kavita">निरंतर</a> व पोयट्री डॉट काम पर कवितायें प्रकाशित हो चुकी हैं। दीपा की कविताओं में विविध रंग समाहित हैं, जिनमें हास्य है, उल्लास है तथा प्रेमानुभूति भी। प्रेमानुभूति के लिये दीपा को विलगाव, व्यथा का रास्ता ज्यादा रास आता लगता है, जैसे</p>
<blockquote><p><a href="http://www.nirantar.org/0505-vatayan-kavita">खो गए</a> ओ घन कहाँ तुम<br />
हो कहाँ किस देश में पथरा गई कोमल धरा<br />
चिर विरह की सेज में।</p></blockquote>
<p>या फिर</p>
<blockquote><p>मिलन की चाह में<br />
जुदाई का<br />
अपना है मजा<br />
ये अलग बात है<br />
सब माने इसे सजा।</p></blockquote>
<p>या</p>
<blockquote><p><a href="http://www.anubhuti-hindi.org/nayihawa/d/deepa_joshi/shraddhanjali.htm">वो कल</a> की ही तो बात है<br />
नहीं बिछड़ा था<br />
जब तुम्हारा व मेरा साथ।</p></blockquote>
<p>पर कभी मिलन की आस से मन <a href="http://deepshikha70.blogspot.com/">उल्लास</a> से भी भर जाता है:-</p>
<blockquote><p>आयी होली आयी<br />
बजने लगे<br />
उमंग के साज<br />
इन्द् धनुषीय रंगों से<br />
रंग दो<br />
पिया आज</p></blockquote>
<p>हिंदी पखवाड़े में वाद-विवाद, भाषण तथा काव्यपाठ प्रतियोगिताओं में विभिन्न पुरस्कारों से सम्मानित खुशनुमा क्षणों को दीपा जोशी ने सुरुचिपूर्ण तरीके से <a href="http://www.freewebs.com/deepshikha/poetrycom.htm">सहेजा</a> है। नियमित तथा सार्थक लेखन के लिये दीपा जोशी को शुभकामनायें।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=3019&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>जून 2005 का कच्चा चिट्ठा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0605-kachha-chittha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0605-kachha-chittha#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 14:06:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[जून 2005 के कच्चा चिट्ठा स्तंभ में मिलिये निट्ठला चिंतन के लेखक तरुण जोशी और नौ दौ ग्यारह के लेखक आदि चिट्ठाकार आलोक कुमार से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2>तरुण जोशी</h2>
<p>किसी को भी आश्चर्य होगा यह देखकर कि <a href="http://apniduniya.blogspot.com/2005/05/blog-post.html">निठल्ले भी चिन्तन</a> करते हैं वह भी आक्रोश के साथ। पर जब तरुण जोशी के चिट्ठे का दीदार किया मानना भी पड़ा। फिर हमें लगा कि <a href="http://theluwa.blogspot.com/2004/09/blog-post.html">ठेलुहों</a> की तर्ज पर निठल्लों के लिये भी कहा जा सकता है कि</p>
<blockquote><p>एक ढूँढो हजार मिलते हैं<br />
बच के निकलो टकरा के मिलते हैं।</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/tarun.jpg" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="100" height="130" align="left" />प्रकृति के सुकुमार कवि <a href="http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/snp/index.htm">सुमित्रानन्दन पन्त</a> तथा कथा लेखिका <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/kahaniyan/2004/phg/pitihuigot1.htm">शिवानी</a> के अंचल, उत्तरांचल में पैदा हुये और पले-बड़े-पढ़े तरुण ने लगता है किस्सागोई के गुर मनोहरश्याम जोशी से लिये हैं। इन्होंने एम.सी.ए. करने के दौरान कॉलेज में एडवेंचर क्लब की स्थापना की, कालेज तथा क्लब की पत्रिका की शुरुआत की। शेरो शायरी के शौक के कारण कालेज में &#8216;गालिब&#8217; के रूप में बदनाम हुये (नाम भी तो हुआ)। पढ़ाई के उपरांत पाँच साल दिल्ली में जीविकोपार्जन किया, फिर उड़ चले अमेरिका। तब से न्यूजर्सी में टिके हैं।</p>
<p>पहाड़ तरुण के दिल में पहले प्यार की तरह बसे हुये हैं। इसके अलावा घूमना, ट्रैकिंग, सिनेमा, संगीत तथा क्रिकेट के शौकीन जोशी जी हाल-फिलहाल तक अमेरिका में क्रिकेट खेलते रहे हैं। ब्लागिंग की <a href="http://apniduniya.blogspot.com/2005/05/blog-post.html">अपनी शुरुआत</a> के बारे में तरुण लिखते हैं</p>
<blockquote><p>पिछले साल की शुरूआत मे इस नाचीज को &#8216;ब्‍लॉग&#8217; के &#8216; ब्‍ &#8216; तक का इल्‍म न था। फिर इक दिन कुछ हुआ यों कि सर्फ करते करते रेडिफ डॉट कॉम के &#8216;ब्‍लॉग&#8217; बटन पे क्लिक कर दिया, बस फिर क्‍या था घर जाने से पहले अपने नाम का भी एक ब्‍लॉग था इंटरनेट की इस मायावी दुनिया में&#8230;नाम रखा गया &#8216;माय लोनली प्‍लेनेट&#8217;। साथ ही इस बात का भी एहसास हुआ कि भले ही इस दुनिया मे एक नाम के दो या दो से ज्‍यादा लोग हो जायें लेकिन इंटरनेट की इस मायावी दुनिया मे ये संभव नहीं। बहरहाल, थोड़ी सी कोशिशों के बाद हमें नाम मिल ही गया। 4-5 महीने इसी जगह &#8216;इधर उधर&#8217; की हाँकते रहे, &#8216;मेरा पन्‍ना&#8217; था सो जो जी मे आया &#8216;तत्‍काल&#8217; कह दिया। &#8216;कुछ बतकही&#8217; &#8216;ज्ञान विज्ञान&#8217; की करी तो कभी लिखा &#8216;रोजनामचा&#8217;। &#8216;अपनी बात&#8217; की &#8216;अभिव्‍यक्ति&#8217; कभी &#8216;प्रसंग&#8217; मे की तो कभी &#8216;कविता सागर&#8217; में। कभी की &#8216;नुक्ता चीनी&#8217; और कभी &#8216;ठलुआ&#8217; गिरी। जब कभी &#8216;कही अनकही&#8217; छोड़ देने का मन किया तो बैठे रहे &#8216;फुरसतिया&#8217; में। ऐसा नहीं है कि हमेशा ही कुछ कहते रहे, कभी छुट्टियों में कहीं &#8216;नौ दो ग्‍यारह&#8217; हो गये तो अपने ब्‍लॉग पर भी &#8216;निरवता&#8217; छायी रहती। अगर कुछ नही किया तो वो था &#8216;चिट्ठा चर्चा&#8217; और ना ही कभी कीं &#8216;कुछ बातें मेरे जीवन&#8217; की।</p></blockquote>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/profile.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" align="right" />मज़े की बात कि निठल्ला चिन्तन के जन्म की कहानी बताने के पहले तरण सात पोस्ट लिख चुके थे। मुंगेरीलाल के हसीन सपने भले पूरे हो गये हों, कहानी अभी जारी है। प्रिटी वूमेन को चिट्ठी लिखने वाले जोशी जी का अंदाज़ बाकायदा निठल्ला है तथा वे इसको पुख्ता करने में वायदाखिलाफी से भी गुरेज नहीं करते (अपने अंग्रेजी चिट्ठे पर प्रकाशित कुमायूँनी होली का हिंदी अनुवाद अभी तक नहीं लिखा)। तरुण के आगमन से हिंदी चिट्ठाजगत समृद्ध हुआ है। आशा है तरुण की लेखनी तथा तकनीकी कौशल से चिट्ठाजग और विकास करेगा तथा फिलहाल सारा समय <a href="http://www.civfanatics.com/">सिविलाइजेशन</a> तथा ब्लॉगिंग में लगाने के कारण नाराज रहे परिवारीजन अपनी नाराजगी को गर्व में तब्दील कर लेंगे।</p>
<h2>आलोक कुमार</h2>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/wp-content/uploads/2005/06/alok_kumar.JPG" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="100" height="130" align="left" />हिन्दी का पहला चिट्ठा <a href="http://devanaagarii.net/hi/alok/blog/index.html">नौ दो ग्यारह</a> लिखने वाले आलोक कुमार पढ़ाई से सिविल इञ्जीनियर, पेशे से प्रोग्रामर और शौक से लेखक हैं। जन्म हुआ जोधपुर में, उसके बाद दिल्ली, लिसोथो, गुवाहाटी, दिल्ली, चण्डीगढ़, पुणे, रायपुर, चेन्नई, जामनगर, मुम्बई, बंगलोर और संप्रति मनीला में हैं। ब्लॉग के लिए &#8220;चिट्ठा&#8221; शब्द का ईज़ाद करने वाले आलोक का हिन्दी चिट्ठा वर्ष 2003 में <a href="http://indibloggies.blogspot.com/">ईंडीब्लॉग अवार्ड्स</a> से भी नवाज़ा जा चुका है।</p>
<p>आलोक जाल पर देवनागरी के प्रसार और <a href="http://indic-computing.sourceforge.net/">स्वतन्त्र तन्त्रांश</a> के कई कार्यों से जुड़े रहे हैं पर नहीं चाहते कि उन पर &#8220;हिन्दीवाला&#8221; होने का ठप्पा लगाया जाए। उनका मानना है कि भाषा के साथ, संस्कृति जुड़ी होती है, और सामाजिक सम्बन्ध भी। आलोक मानते हैं कि जाल पर दो चीज़ें करना ज़रुरी है, पहला, जाल पर भारतीय भाषाओं के स्थलों के पढ़ने और बनाने का सरलीकरण, और दूसरा भारतीय भाषाओं में अधिक से अधिक काम की सामग्री को पैदा करना। उनका मत है कि इन दोनो ही कार्यों कि जिम्मेवारी सरकार की नहीं, हमारी है।</p>
<p>आलोक के चिट्ठे की खासियत यही है कि चिट्ठे बहुत ही संक्षिप्त होते हैं, दो टूक बात कह कर पल में नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। आलोक तकनीकी विषयों पर हिन्दी चिट्ठाजगत के प्रकाश स्तंभ हैं, अपने जालस्थल <a href="http://devanaagarii.net/">देवनागरी</a> से वे जाल पर हिन्दी के शौकीनों का पथ प्रर्दशन करते रहते हैं और हिन्दी का प्रचार भी। यह स्थल जाल पर हिन्दी का प्रयोग सिखाने वाले स्त्रोतों में मील का पत्थर है। आलोक देवनागरी नाम से एक याहू ग्रुप के भी कर्ताधर्ता हैं और साथ ही <a href="http://dmoz.org/">डीमॉज़</a> निर्देशिका में हिन्दी का परचम लहराने वाले शख्स भी।</p>
<p>जाल पर भारतीय भाषाओं, खास तौर पर हिन्दी, का नाम रोशन करने और इसका सम्मान बढ़ाने वाले आलोक चिट्ठों की दुनिया से कभी भी नौ दौ ग्यारह न हो यही हमारी कामना है। हमारी शुभकामनायें!</p>
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		<title>मई 2005 का कच्चा चिट्ठा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0505-kachha-chittha</link>
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		<pubDate>Mon, 23 May 2005 06:41:18 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चा चिट्ठा स्तंभ में हर माह परिचय कीजिये नये चिट्ठाकारों से। मई 2005 के कच्चा चिट्ठा में हम आपकी मुलाकात करवा रहे हैं युवा कवि व चिट्ठाकार <strong>प्रेमपीयूष</strong> और हरदिल अज़ीज़ तकनीकी चिट्ठाकार व लेखक <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h2>प्रेमपीयूष</h2>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Prem Piyush" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/prem_piyush.JPG" border="0" alt="Prem Piyush" hspace="5" vspace="5" width="102" height="132" align="right" />ये आये, <a href="http://prempiyushhindi.blogspot.com/"> लिखना शुरु किया</a> और सबको भा गये। प्रख्यात कथाकार फणीश्वरनाथ &#8216;रेणु&#8217; के अंचल पूर्णिया (बिहार) मे जन्मे और नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के साथ जन्मदिन (23 जनवरी) मनाने वाले प्रेमपीयूष होनहार छात्र रहे हैं। नवोदय विद्यालय से मेरिट छात्रवृत्ति पाकर, इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय नई दिल्ली से कम्पयूटर अप्लीकेशनस् में स्नातक (BCA) तथा परास्नातक (MCA) की उपाधि प्राप्त की। परास्नातक के दौरान मनोरोगियों तथा डाक्टरों (मनोचिकित्सकों) के लिये वेबसाइट विकसित की। संप्रति बिहार सरकार के वित्त विभाग के लिये साफ्टवेयर विकसित कर रहे हैं।</p>
<p>प्रेमपीयूष अपने बारे में बताते हुये कहते हैं:-</p>
<blockquote><p>उन्हीं राहों के अनजान पथिक</p>
<p>जो साथ हँसते, गाते और रोते थे,</p>
<p>उनको खोने का दुःख तो होता है</p>
<p>फिर प्रेमवश सपनों मे मिल आता हूँ।</p></blockquote>
<p>गाने तथा लिखने के शौकीन प्रेम प्रोग्रामिंग तथा मल्टीमीडिया सॉफ्टवेयर दोनों में सिद्धहस्त हैं। सहयोगी भावना से लबालब मन वाले प्रेम का मानना है‍</p>
<blockquote><p>जब मै अकेला हो जाता हूँ,</p>
<p>तुम साथी बनकर आते हो।</p>
<p>जब अंधेरा छाने लगता है,</p>
<p>तुम दीपक एक जलाते हो।</p></blockquote>
<p>प्रेम कहते हैं, &#8220;इधर कुछ महीनों पहले ब्लागिंग विधा भी सीख ली है। कभी नए-नए विचार दिमागी तंत्र को हिला देते है तो कभी आन-लाइन पढाई भी हो जाती है।&#8221; अनुगूंज मे &#8220;बचपन के मीत&#8221; विषय पर <a href="http://prempiyushhindi.blogspot.com/2005/03/7.html"> प्रेम का लेख</a> मानो इनके किस्सा गोई विरासत में मिले होने की घोषणा करता है। स्वभाव से सहज तथा विनम्र माने जाने वाले प्रेम बालकविता में भी गति रखते हैं और मौका मिलने पर भांग की गोली खाकर सबको होली के रंग में <a href="http://prempiyushhindi.blogspot.com/2005/03/blog-post_25.html"> सराबोर</a> भी कर देते हैं।</p>
<blockquote><p>मोहन खेले होली रे भैया, राधा खेले होली हो ।<br />
ग्वाला खेले होली रे भैया, ग्वालिन खेले होली हो ।<br />
ब्लागर खेले होली रे भैया, ब्लागिन खेले होली हो ।<br />
हमहें खेले होली रे भैया, तुम्हें खेले होली हो ।</p></blockquote>
<p>भारत दूरस्थ गावों में जाने के लिये लाखों डाक्टर पैदा नहीं किये जा सकते पर कंप्यूटर वहां पहुंच सकते हैं। भारत के गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतरी के लिये नेटवर्किंग सुविधा के उपयोग को अपना सपना मानने वाले प्रेम पीयूष की सफलता के लिये निरंतर की मंगलकामनायें। आशा है हम सभी प्रेम पीयूश के ब्लॉग रस से सदा सराबोर होते रहेंगे।</p>
<h2>रविशंकर श्रीवास्तव</h2>
<p>अगर किसी गजल के शेर चुराकर कहा जाये तो रविरतलामी के लिये कहा जा सकता</p>
<blockquote><p>कितना मुश्किल है इनकी कहानी कहना,<br />
जैसे बहते हुये पानी पर पानी लिखना।</p></blockquote>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Ravishankar Shrivastava" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/ravi_ratlami.jpg" border="0" alt="Ravishankar Shrivastava" hspace="5" vspace="5" width="200" height="200" align="right" />लेख भी सौतन बनाने का काम करते हैं यह पता तब चला जब कि रविरतलामी का <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/vigyan_varta/pradyogiki/2004/blogs.htm"> लेख पढ़कर</a> चिट्ठाकारी में कूदे खिलाड़ी के परिवार के लोगों ने कहना शुरु किया, &#8220;ये ब्लॉग तो हमारे लिये सौत हो गये हैं &#8211; हमारे ये तो सारा समय ब्लॉग से ही उलझे रहते हैं।&#8221; लोगों की आहों ने असर किया तथा बहुत दिनों से सबसे बुजुर्ग ब्लॉगर की कुर्सी पर काबिज रवि को उनसे भी बुजुर्ग ब्लॉगरों ने आकर जवान बना दिया। पर फिलहाल हिंदी चिट्ठाकारी में सबसे ज्यादा शब्द लिखने का खिताब रतलाम, मध्य प्रदेश, निवासी 45 वर्षीय रविशंकर श्रीवास्तव (रवि रतलामी) के पास बरकरार है।</p>
<p>रवि विद्युत अभियांत्रिकी में स्नातक हैं। इन्हें म.प्र.राज्य विद्युत मंडल में 20 से अधिक वर्षों का तकनीकी तथा प्रबंधन का अनुभव है। सन् 2003 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले कर रवि भाई ने अपना पूरा समय हिन्दी लिनक्स के अनुवाद कार्य में लगा दिया।</p>
<p>रवि को हिन्दी साहित्य में छिटपुट लेखन का 20 वर्षों का अनुभव है। साहित्य के अलावा वे फीचर लेखन में सिद्धहस्त हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स फ़ॉर यू समूह, दिल्ली की पत्रिकाओं आई.टी तथा <a href="http://hindini.com/ravi/?p=24#comments"> लिनक्स</a> फ़ॉर यू में पिछले आठ वर्षों से वे तकनीकी लेखन करते आये हैं। आई.टी पत्रिका के तकनीकी लेखक पैनल तथा इंडलिनक्स हिन्दी टीम के सदस्य भी हैं। इसके अतिरिक्त रवि ने हिन्दी दैनिक चेतना में 2 वर्ष तक तकनीकी स्तम्भ में लेखन किया तथा संप्रति अभिव्यक्ति तथा प्रभासाक्षी में तकनीकी विषयों पर नियमित लिखते हैं।</p>
<p>रवि को तकनीकी दस्तावेज़ों के अंग्रेज़ी से हिन्दी में अनुवाद का 4 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उनके किये गए अनुवाद कार्यों में केडीई 3.3 हेड ब्रान्चेस का हिन्दी अनुवाद (90 % से ज़्यादा), गनोम 2.8 का अधिकतर अनुवाद तथा 90% समीक्षा एवं पुनरीक्षण, एक्सएफ़सीई 4.2 का शत प्रतिशत हिन्दी अनुवाद, गेम 0.7 का 95 प्रतिशत हिन्दी अनुवाद तथा डेबियन संस्थापक का शत प्रतिशत हिन्दी अनुवाद सम्मिलित है।</p>
<p>पंगे लेने की पुरानी आदत है इनकी। जिनसे <a href="http://raviratlami.blogspot.com/2005/01/blog-post_110552624324896978.html"> प्रेम</a> किया उनसे विवाह भी <a href="http://www.akshargram.com/2005/01/13/144/#comments"> करना पड़ा</a>। जिजीविषा ऐसी कि मौत के कारिंदे <a href="http://hindini.com/ravi/?p=15#comments"> सलाम</a> करके लौट गये। इनकी चिट्ठाकारी की प्रवीणता और नियमितता इनका परिचय हैं और लगभग हर प्रविष्टि के साथ एक गज़ल उनका ट्रेडमार्क। रवि की चुटीली उक्तियाँ पड़ कर लगता है कि उत्तर भारत के किसी शहर की हवा मन को छूकर निकल गयी, वह हवा जिसमें गज़ल की खुशबू, जमीनी हकीकत, सामजिक पीड़ाओं के बीच भी हँस सकने की हिम्मत और नींद से झझकोर देने वाली अपील शामिल है।</p>
<p>सामयिक मुद्दो के साथ गजलों का मिश्रण एक अनूठा प्रयोग है। गजल भी गंगा जमुनी भाषा में, यानि हिंदी भी और उर्दू भी, &#8220;बोले तो फुलटुस हिन्दुस्तानी&#8221;। रवि आशु कवि है, विषय देते ही पद्य की धारा बहने लगती है। वे बिंदास लिखते हैं, खुद रवि मानते हैं-</p>
<blockquote><p>मेरी ग़ज़लों को लेकर पाठकों की यदा कदा प्रतिक्रियाएँ प्राप्त होती रहती हैं. जो विशुद्ध पाठक होते हैं, वे इन्हें पसंद करते हैं चूंकि ये क्लिष्ठ नहीं होतीं, किसी फ़ॉर्मूले से आबद्ध नहीं होतीं तथा किसी उस्ताद की उस्तादी की कैंची से कंटी छंटी नहीं होतीं। वे सीधी, सपाट पर कुछ हद तक तल्ख़ होती हैं।</p></blockquote>
<p>हिन्दी चिटठा विश्व की बात करें तो रवि काफी और नियमित रूप से लिखते हैं। आजकल रवि के चिट्ठे चित्रमय होने लगे हैं, अक्सर ये अखबार की कतरनों पर त्वरित टिप्पणीयाँ होती हैं। इन टिप्पणियों के साथ की गज़लें कई बार झकझोर देती हैं। लोग तथा खुद रवि यह तय नहीं कर पाये हैं कि ब्लॉग लिखने के लिये गज़ल लिखते हैं या गज़ल लिखने के लिये ब्लॉग। पर यह आम अफवाह है कि इनके पास कोई ऐसी मशीन है जरूर जो लगातार गज़लें पैदा करती रहती है। इनकी गज़लों में ऐसा कुछ नहीं है जिसकी पच्चीकारी पर लोग लौट-लौट कर फिदा हों पर यह साफ है कि रवि की गजलें उन पुलों की तरह हैं जो लोगों के दिलों को सामाजिक संवेदनाओं से जोड़ती हैं। जैसे कि यह-</p>
<blockquote><p>ये उम्र और तारे तोड़ लाने की ख्वाहिशें<br />
व्यवस्था ऐसी और परिवर्तन की ख्वाहिशें।<br />
आदिम सोच की जंजीरों में जकड़े लोग<br />
और जमाने के साथ दौड़ने की ख्वाहिशें।<br />
तंगहाल घरों के लिए कोई विचार है नहीं<br />
कमाल की हैं स्वर्णिम संसार की ख्वाहिशें।<br />
कठिन दौर है ये नून तेल और लकड़ी का<br />
भूलना होगा अपनी मुहब्बतों की ख्वाहिशें।<br />
जला देंगे तुझे भी दंगों में एक दिन रवि<br />
फ़िर पालता क्यूँ है भाई-चारे की ख्वाहिशें।</p></blockquote>
<p>निरंतर पर <a href="http://www.nirantar.org/author/raviratlamigmail-com/">रवि के व्यंग्य, समीक्षायें</a> तो आप पढ़ते ही रहते हैं। रवि की लेखनी यूँ ही चलती रहे यही हमारी आशा है।</p>
<p class="note">आलेख- अनूप शुक्ला, जीतेन्द्र चौधरी, अतुल अरोरा और देबाशीष</p>
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		<title>अप्रैल 2005 का कच्चा चिट्ठा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-kachha-chittha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0405-kachha-chittha#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 08 Apr 2005 00:24:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चा चिट्ठा स्तंभ में हर माह परिचय कीजिये नये चिट्ठाकारों से। इस अंक में आपकी भेंट करवा रहे हैं &#34;मेरा चिट्ठा&#34; के लेखक चिट्ठाकार <strong>आशीष गर्ग</strong> और &#34;नुक्ताचीनी&#34; चिट्ठे के लेखक और निरंतर के प्रकाशक <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px">कच्चा चिट्ठा स्तंभ में हर माह परिचय कीजिये नये चिट्ठाकारों से। इस अंक में आपकी भेंट करवा रहे हैं &#8220;मेरा चिट्ठा&#8221; के लेखक चिट्ठाकार आशीष गर्ग और &#8220;नुक्ताचीनी&#8221; चिट्ठे के लेखक और निरंतर के प्रकाशक देबाशीष चक्रवर्ती से।</div>
<h1>आशीष गर्ग</h1>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/ashish_garg.jpg" border="0" alt="आशीष गर्ग" hspace="5" vspace="5" width="100" height="130" align="right" /><a href="http://ashishkachittha.blogspot.com/">मेरा चिट्ठा</a> के लेखक आशीष गर्ग बहुमुखी प्रतिभा के धनी है। इनका जन्म 13 सितम्बर 1973 को (कायमगंज, जिला फर्रूखाबद, उ.प्र.) मे हुआ था। बचपन वही बीता। फिर 9 साल कायमगंज में रहने के बाद, 3 साल तक पुखंरायां (कानपुर देहात) मे रहे, फिर उसके बाद कानपुर में। प्रारम्भिक पढाई कानपुर मे करने के बाद वे फिर निकल लिये एन.आई.टी नागपुर से धातुकर्म अभियांत्रिकी में स्नातक करने, फिर मूड फ्रेश करने के लिये एक साल तक टाटा स्टील मुंबई मे नौकरी की। अब ज्यादा दिन नौकरी में मन नहीं लगा फिर निकल लिये बंगलोर भारतीय विज्ञान संस्थान से परास्नातक करने। अब तो आप लोग भी समझ गयें होंगे कि पढाई और नौकरी तो सिर्फ बहाना था, इनको तो अलग अलग शहरों मे घूमने का शौंक था। फिर इनका पहली बार भारत के बाहर जाना हुआ, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय (इंग्लैंड) पी.एच.डी के लिये। करीब दो साल वहां नौकरी करने के बाद, कानपुर स्थित भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान में सहायक प्राख्याता के पद पर कार्यरत है, अब आगे का इनको नही पता तो हमे क्या पता होगा क्योंकि ये है एक नम्बर के घुमक्कड़ प्रवृत्ति के। इनका मन लगता है रिसर्च में, खेलकूद में, दुनिया घूमने में और पढ़ने में, खासक्रर हिन्दी की किताबें (मधुमुस्कान और लोटपोट इनकी पसंदीदा किताबें थीं)।</p>
<p>आशीष के पसंदीदा कवि जयशंकर प्रसाद है। आशीष के चिट्ठो मे आप सामाजिक बुराइयों के प्रति आक्रोश को पायेंगे, समाज मै फैली असमानता, अशिक्षा, भ्रष्टाचार,अमीरों की शोषण नीति,अमीरी का दिखावा,एक दूसरे के प्रति असहिष्णुता और असंवेदना को देखकर आशीष काफी दुखी होते है। शायद ब्लाग लिखने की प्रेरणा इनको इन्ही कुरीतियों से मिली। आशीष का ब्लाग समाज मे फैली कुरीतियों पर प्रत्यक्ष कटाक्ष करता है।</p>
<blockquote><p>&#8220;करोड़ों अरबों के आई आई आई टी बनाने से, बेहतर होगा कि हम अच्छे पांलीटेक्निक और आई टी आई बनायें, ऐसे लोग जो कि सचमुच में इंजीनियेरिंग करते हैं&#8221;</p></blockquote>
<p>साथ ही आशीष भारत मे अंग्रेजी के वर्चस्व और हिन्दी की दुर्दशा को लेकर भी काफी व्यथित रहते है, लेकिन इन्हे आशा है दिन बदलेंगे, इनके शब्दों मे</p>
<blockquote><p>&#8220;हिन्दी की देश में दुर्दशा को देख कर मन खिन्न हो जाता है पर उम्मीद बरकरार है कि एक दिन हम अंग्रेज़ीदां लोगों को हिन्दी का सम्मान करते देखेंगे।&#8221;</p></blockquote>
<p>आशीष <em>मेरा चिट्ठा</em> के अतिरिक्त हिन्दी के प्रथम विज्ञान ब्लाग <a href="http://vigyaan.blogspot.com/"> ज्ञान विज्ञान</a> के भी लेखक है, यह ब्लाग वैज्ञानिक उपलब्धियों और जानकारियों का खजाना है। आशीष स्वयं अपने आप मे हिन्दी चिट्ठाकारी के एक अनमोल रत्न है, और हमे आशा है कि ये अनमोल रत्न हिन्दी चिट्ठाकारी को और उँचाइयों तक ले जायेगा। उनके लेखन और हिन्दी चिट्ठाकारी मे योगदान के लिये हमारी हार्दिक शुभकामनायें।</p>
<hr />
<h1>देबाशीष चक्रवर्ती</h1>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/debashish.jpg" border="0" alt="देबाशीष चक्रवर्ती" hspace="5" vspace="5" width="100" height="130" align="right" />जन्म से बनारसी देबाशीष चक्रवर्ती का लालन पालन भोपाल में हुआ, पिता सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी <a href="http://www.bhel.com/">भेल</a> में यहीं कार्यरत रहे और यहीं बस भी गए। माताजी लखनऊ की हैं। मनचाही मंज़िल की तलाश में यायावर मन ने कई राहें पकड़ीं। अखबारों में संपादक के नाम पत्र से शुरुवात हुई, स्कूल व कॉलेज की पत्रिकाओं के संपादक मंडल में रहे और बस मुगालते में आ गए कि लेखक बन सकते हैं सो वैद्युत अभियांत्रिकी में ईंजीनियरिंग के बाद जा पहुँचे <a href="http://www.naidunia.com/"> नईदुनिया</a> में, पर एक माह में ही सत्य से साक्षात्कार हो गया जब तनख्वाह बताई गई महज़ 500 रु माहवार। हालांकि फीचर लेखन जारी रहा नवभारत, नई दुनिया, <a href="http://www.bhaskar.com/"> भास्कर</a>, जागरण, देशबंधु, क्रॉनिकल, फ्री प्रेस सभी के लिये लिखा। कॉलेज में मित्र के साथ भित्ती पत्रिका (वॉल मैगेज़ीन) की नींव डाली। 6 साल वैद्युत उत्पादनों का विपणन किया, सारा मध्यप्रदेश नाप लिया, गुना से बैलाडिला तक। सन 2000 में यह नौकरी छोड़ चल पड़े सूचना प्रोद्योगिकी की राह, <a href="http://www.webdunia.com/"> इंदौर</a>, <a href="http://www.patni.com/"> मुम्बई</a> और संप्रति पुणे। 2002 में <a href="http://radiomirchi.idniatimes.com/"> एफएम रेडियो</a> में यूँ ही भाग्य आजमाया, चुने गए पर फिर पारिश्रमिक पर बात नहीं बनी। आजकल रेडियो सुनते हैं तो लगता है अच्छा ही किया, रचनात्मक लेखन की गुंजाईश ही कहाँ रखी व्यावसायिक वरीयताओं ने।</p>
<p><a href="http://geocities.com/debuchakrabarty"> देबाशीष</a> ने <a href="http://geocities.com/wahjava"> पहले</a> <a href="http://geocities.com/thisisamitabh"> भी</a> <a href="http://geocities.com/cdac_indore"> कई</a> <a href="http://geocities.com/tanmayworld"> जालस्थल</a> बनाए। <a href="http://www.blogger.com/profile/924053"> अक्टुबर 2002</a> से <a href="http://nullpointer.debashish.com"> ब्लॉगिंग</a> कर रहे हैं। हिंदी बेल्ट में रहे तो भाषा के प्रति रूझान स्वाभाविक था। <a href="http://devanaagri.net/"> नौ दो ग्यारह</a> देख कर पहले एक मित्र को <a href="http://padmaja.blogspot.com/"> उकसाया</a> और फिर स्वयं शुरु कर दी <a href="http://nuktachini.debashish.com/"> नुक्ता चीनी</a>। उनकी कृति <a href="http://www.myjavaserver.com/%7Ehindi"> चिट्ठा विश्व</a> से समुदाय संभवतः और करीब आया। फिर <a href="http://akshargram.com/sarvagya/Anugunj"> अनुगूँज</a>, <a href="http://bunokahani.blogspot.com/"> बुनो कहानी</a>, <a href="http://nirantar.org"> निरंतर</a> आदि इत्यादि। देबाशीष <a href="http://dmoz.org/">डीमॉज़</a> पर संपादक हैं और चिट्ठाकारों की <a href="http://tinyurl.com/2ewxq"> निर्देशिका</a> भी संपादित करते हैं और साथ ही <a href="http://j.webring.com/hub?ring=hindibloggers"> वेबरिंग</a> और <a href="http://www.blogdigger.com/groups/groups.jsp?id=130"> समूह फीड</a> भी अद्यतन रखते हैं। भारतीय ब्लागिंग की बात हो और इन्डीब्लॉगीज़ का उल्लेख ना हो ऐसा कैसे हो सकता है। पूरे दो साल तक ब्लॉगमंडल मे <a href="http://indibloggies.blogspot.com/"> इन्डीब्लॉगीज़</a> का हल्ला मचा रहा, देश मे ब्लागिंग के प्रति लोगों को आकर्षित करने मे इन्डीब्लॉगीज़ ने महती भूमिका निभायी। जब खोज की गयी तो पता चला कि इसके सूत्रधार देबाशीषजी है।</p>
<p>मित्र इन्हें देबू, चक्कू दादा आदि नामों से पुकारते हैं। देबु दा मूलतः अंर्तमुखी हैं, नपातुला बोलते हैं पर बेहद चंचल मन के हैं। बड़बोलेपन, दिखावे, धोखेबाज़ी और झूठ से सख्त नफरत है। वैसे तो अन्याय के खिलाफ कई बार आवाज़ उठायी और खामियाज़ा भी भुगता पर साधारण शादीशुदा मर्दों की तरह बीवी के अन्याय के सामने घिघ्घी बंध जाती है। लेखन के मामले में आजकल एक नंबर के आलसी हो गये हैं सो जालस्थलों के साथ ब्लॉग भी अक्सर सज़ा भुगतते रहे हैं। लेखन के अलावा संगीत का बेहद शौक है, कुछ लोगों ने इन की गर्दभ तान पर इनाम भी दे दिये। पहले टी.वी और सिनेमा के भी खासे मुरीद थे अब काफी कम देखते हैं। मिताली और  तन्मय के अलावा इन्हें पसंद है छुट्टी के दिन सुबह देर तक सोना और अपना P-IV कम्पयूटर। जीवन में आकांक्षाएँ अलग अलग रहीं, कभी गायक बनना चाहते थे तो कभी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में जाना, कभी फिल्मकार तो कभी लेखक। अब जब आई.टी में ही आ जमे हैं तो बस यहीं रम जाना चाहते हैं। <a href="http://www.akshargram.com/"> दोस्तों</a> का मानना है: &#8220;ये जहाँ कहीं भी रहे, अंर्तजाल पर हिन्दी की गतिविधियों के सूत्रधार के रूप मे हमेशा मौजूद रहेंगे।&#8221;</p>
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		<title>मार्च 2005 का कच्चा चिट्ठा</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 06:21:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[कच्चा चिट्ठा]]></category>

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		<description><![CDATA[कच्चा चिट्ठा स्तंभ में हर माह परिचय कीजिये नये चिट्ठाकारों से। इस अंक में आपकी भेंट करवा रहे हैं <em>ई-लेखा</em> के लेखक चिट्ठाकार <strong>आशीष तिवारी</strong> और <em>प्रतिभास </em>के लेखक और लिंकमास्टर<strong> अनुनाद सिंह</strong> से।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>आशीष तिवारी</h1>
<p><img title="आशीष तिवारी" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/ashish_tiwari.gif" border="0" alt="Ashish Tiwari" hspace="8" vspace="8" width="100" height="130" align="right" /><a href="http://elekha.blogspot.com/">ई-लेखा</a> के लेखक आशीष फिरोज़ाबाद में जन्में, जयपुर में पले बढ़े, वाराणसी में स्नातक बने, बंगलोर में पेशेवर व स्नात्कोत्तर बने और संप्रति मोहाली में सॉफ्टवेयर में प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वाराणसी से पहले एक साल जोधपुर व बँगलौर से पहले एक साल कटनी भी रह चुके हैं।</p>
<p>आशीष को हिन्दी से विशेष प्रेम है। फिल्में देखना व पुस्तक पढ़ना रूचिकर लगता है। आशीष विवाहित है और <a href="http://devanagari.net/">आलोक</a> व इला को अपना पारिवारिक मित्र मानते हैं। उनका अपना गृह पृष्ठ भी है पर आलसी होने की वजह से उस पर जाले लग रहे हैं। उनकी कोई खास लेखन शैली नहीं है (और यही खास है)। आशीष मानते है कि भाषा भावना से जुडी हुई है और घर पर हिन्दी व दफ्तर में अंग्रेज़ी का उपयोग एक तरह का दुराव पैदा करता है। उनका सपना है कि हिन्दी व्यापार जगत की भाषा बने, हिन्दी का प्रसार अपने आप हो जाएगा। जब चीनी और जापानी इस प्रकार सफल हो सकते हैं तो भला हिन्दी क्यूँ नहीं।</p>
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<h1>अनुनाद सिंह</h1>
<p>उत्तर प्रदेश के कुशीनगर के एक छोटे से गाँव में जन्में, <a href="http://pratibhaas.blogspot.com/">प्रतिभास</a> के लेखक अनुनाद सिंह, गाँव के सुरम्य वातावरण में ही पले-बढे हैं। माता-पिता कृषि वैज्ञानिक थे और अनुनाद सिंह को भी उनके काम में हाथ बटाना पडता था। आरम्भिक शिक्षा गाँव में ही हुई। अभियान्त्रिकी की पढ़ाई के लिए गाँव का साथ छूटा और जमशेदपुर जा पहुँचे। आप वैद्युत अभियान्त्रिकी में स्नातक है। पावर इलेक्त्रानिक्स आपका कर्म क्षेत्र रहा है। उच्च शक्ति व अत्यधिक स्थायित्व वाली विभिन्न प्रकार की पॉवर सप्लाय की परिकल्पना और निर्माण में आप सिद्धहस्त हैं। संप्रति आप इन्दौर में कार्यरत हैं और पावर कन्वर्टरों की डी. एस. पी. द्वारा रीयल टाइम कन्ट्रोल की समस्यायों से दो-चार हो रहे हैं। समाज हित के लिये सोचना और सम्मिलित प्रयास करना-करवाना उनकी विशेष रुचि है |</p>
<p>अनुनाद हिन्दी के भविष्य को भारत के भविष्य से जुडा हुआ मानते हैं। उनका मानना है कि भारत के विकास के साथ-साथ हिन्दी का भी विकास होगा और हिन्दी के भरपूर प्रयोग के बिना भारत के विकास को गति नही मिल सकती। वे कहते हैं कि हिन्दी को उपयोग की जरूरत है, वह अपने आप विकसित हो जाएगी। अगर हम हिन्दी का प्रयोग नहीं करेंगे तो हमेशा ही पंगु बने रहेंगे और हिन्दी को भी पंगु बनाये रखेंगे। अगर हिन्दी का ज्ञान नौकरी प्राप्ति के लिये आवश्यक बना दिया जाय तो हिन्दी रातोंरात रानी बन जायेगी और अंग्रेज़ी उसकी दासी।</p>
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