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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; नज़रिया</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>भारतीय समाज और भ्रष्टाचार</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 19:57:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[corruption]]></category>
		<category><![CDATA[Internet]]></category>

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		<description><![CDATA[क्या भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे? अन्तर्जाल पर किसका वर्चस्व रहेगा गुंडों मवालियों का या उनका जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं? इन दोनों मुद्दों पर पढ़ें निरंतर के जुलाई २००५ अंक की संपादकीय राय.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">क्या</div>
<p>भ्रष्टाचार हम भारतीयों के जीवन का एक अभिन्न अंग बन चुका है? और क्या हम कभी इससे स्वतंत्र हो पाएँगे?</p>
<p><img src="http://nirantar.org/images/stories/editorial.gif" border="0" alt="नज़रिया" hspace="4" vspace="3" align="left" />दो नम्बर के पैसे पर थोड़ा लगाम कसने के उद्देश्य से, वर्ष 2005 के वित्त विधेयक में, हर 10000 रुपए की नक़द निकासी पर दस रुपए का कर जब वित्त मंत्री पी। चिदम्बरम ने लगाना चाहा, तो हर तरफ हल्ला मच गया। सदन में चिल्ल-पों के बीच वित्त मंत्री ने इस कर को यह कह कर उचित ठहराने की भी कोशिश की कि एटीएम की कतार में लगने से बचने के लिए आप उसके दरबान को यूँ ही दस रुपए देते हैं।</p>
<p>वित्त मंत्री की यह बात परोक्ष रूप से इस बात का इशारा करती है कि भ्रष्टाचार और घूसखोरी आम भारतीयों के जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। अब अगर वे चाहें तो भी इससे निजात नहीं पा सकते। भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी  सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।</p>
<div id="pullQuoteR">भारत के भूतपूर्व प्रधान मंत्री स्व.राजीव गांधी सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुके थे कि भ्रष्टाचारियों के कारण देश के विकास के लिए जारी हर एक रूपये में से सिर्फ पंद्रह पैसा ही सही जगह पहुँच पाता है।</div>
<p>गुरचरण दास ने दैनिक भास्कर के अपने कॉलम में अभी-अभी ही अपने एक मित्र का किस्सा बयान किया है। उनका वह अनिवासी भारतीय मित्र अमेरिका के एक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर है, जहाँ कि कई नोबल पुरस्कार प्राप्त फैकल्टीज़ भी हैं। उस मित्र ने भारत और भारतीय विद्यार्थियों की सेवा के लिए उस विश्वविद्यालय की एक शाखा भारत में खोलनी चाही। इसके लिए उन्होंने भारतीय विश्वविद्यालय एसोसिएशन को अर्जी दी। जाहिर है, अर्जी का कोई जवाब उन्हें नहीं मिला। अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद के अधिकारियों के साथ उनकी बैठक का नतीजा रिश्वत की मांग के रूप में सामने आया। यूजीसी और शिक्षा मंत्रालय में उनका आवेदन धूल मिट्टी खाता रहा। हार कर उनके मित्र ने चीन में उस यूनिवर्सिटी का कैंपस खोलने का निश्चय किया है, और कहा है कि भारत से कोई आशा नहीं की जा सकती।</p>
<p>भारत से कोई आशा क्यों नहीं की जा सकती? बिलकुल की जा सकती है। बस, आपको इसके लिए भ्रष्ट होना पड़ेगा। रिश्वतखोरी अपनानी होगी। अगर गुरचरण दास के वह मित्र रिश्वत बांट देते तो उनके यूनिवर्सिटी का कैंपस भारत में फल-फूल रहा होता। भारत में बाढ़ राहत के नाम से जारी करोड़ों रुपयों से अपने लिए बंगले और प्रापर्टी खरीदने वाले आईएएस अफसर एशियन हीरो के पुरस्कार से नवाज़े जाते हैं। ग़रीब गुरबों को सामाजिक सुरक्षा पेंशन के  मात्र 100 रूपये प्रति महीने दी जाने वाली राशि को भी भ्रष्ट भारतीय अधिकारी और कर्मचारी गबन करते हैं। परीक्षा के परचे फिर से जाँचने में धांधली कर रुपए कमाते हैं। अपने कुनबे को मस्टररोल पर रख कर शासन को चूना लगाते हैं। रक्षा सौदों में रशियन भाषा को दोष देते हुए खरीदी आदेशों में एक शून्य बढ़ा कर हजार का माल लाख में खरीद लिया जाता है। मंत्री पुत्र की शादी के लिए अफसरों से अवैध वसूली की जाती है। </p>
<p>कुल मिलाकर यहाँ भारत में हर संभावित स्थल से, हर संभावित भ्रष्ट तरीके से जब रूपया आसानी से कमाया जा सकता है तो फिर, भारत से आशा क्यों नहीं की जा सकती? भारत ने बहुतों की आशाओं को पूरा किया है। और कर रहा है। यही वजह है कि भारत में जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा छूटा नहीं है, जहाँ भ्रष्टाचार ने अपने कदम नहीं रख छोड़े हों। भ्रष्टाचार आपके जीवन का अभिन्न अंग बन चुका है। इसे आप नकार नहीं सकते। स्थिति यह है कि इसके बगैर, संभवत: आपका जीवन असंभव नहीं, तो अति कठिन तो है ही।</p>
<p>पर, क्या हमें यह यथा स्थिति स्वीकारनी चाहिए? कतई नहीं। आज भारतीय समाज के लिए एक और स्वतंत्रता आंदोलन की, एक और सम्पूर्ण क्रांति की ज़रूरत है। भ्रष्टाचार को उखाड़ फेंकने की, स्वस्थ और स्वच्छ समाज को फिर से रचने की, आज घोर ज़रूरत है। सोन चिरैया को वापस उसके घरौंदे में ला बिठाने का समय आ चुका है। इस आंदोलन का बिगुल बजाया जाना चाहिए। आइए उम्मीद करें, और यह प्रार्थना भी, कि भारत में गांधी सा कोई महात्मा शीघ्र अवतरित हो। जो इस नए स्वतंत्रता आंदोलन का सूत्रपात कर भारतीयों की जड़ को जकड़ चुके भ्रष्टाचार से स्वतंत्रता दिलाए।</p>
<p>आमीन</p>
<p class="note">लेखक <a href="http://hindini.com/ravi">रविशंकर श्रीवास्तव</a> निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।</p>
<h2>कितनी स्वतंत्रता हो सामुदायिक अंतर्जाल पर</h2>
<div class="dropCap">अं</div>
<p>ग्रेज़ी की कहावत है, &#8220;टू मैनी कुक्स स्पॉइल द ब्रॉथ&#8221;, यानी एक ही व्यंजन को बनाने के लिए कई लोगों को लगा दिया जाए तो उस का बुरा हाल ही होगा। शायद यही हुआ लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ के विकिटोरिल प्रयोग के साथ, जो बड़ी धूम से शुरू तो हुआ पर कुछ दिनों में ही बन्द हो गया।</p>
<p>&#8220;ब्लॉग&#8221; की तरह &#8220;विकी&#8221; भी इंटरनेट पर अपेक्षाकृत नया शब्द है। हवाइयन भाषा के शब्द विकी-विकी, जिस का अर्थ है जल्दी-जल्दी, से लिया गया यह शब्द &#8220;विकी&#8221; अन्तर्जाल पर एक और क्रान्ति का वाहन बन गया है। विकी साइट ऐसी साइट होती है, जिसे आप न सिर्फ पढ़ सकते हैं, बल्कि बड़ी आसानी से बदल भी सकते हैं। यानी आप किसी विकी साइट पर कोई लेख पढ़ते हैं और उस पर दी गई सूचना आप को अपर्याप्‍त लगती है, या त्रुटिपूर्ण लगती है, तो बजाय लेख के लेखक को लिखने के आप स्वयं लेख को बदल ड़ालते हैं। इस तरह का तन्त्र साझे प्रकल्पों के लिए बहुत बड़ा वरदान है, जिस में कई लोग संसार के विभिन्न कोनों में बैठ कर एक ही लेख को मिल कर पूरा कर सकते हैं। विकी के सफल प्रयत्‍नों में मुख्य है <a href="http://hi.wikipedia.org">विकिपीडिया</a>, जो एक बहुभाषीय ज्ञानकोष है, <a href="http://hi.wiktionary.org">विकशनरी</a> जो एक बहुभाषीय शब्दकोष है, <a href="http://en.wikinews.org/wiki/Main_Page">विकीन्यूज़</a>, जहाँ आप समाचार लिख सकते हैं। <a href="http://wikipedia.sourceforge.net/">मीडियाविकी</a>, जो कई विभिन्न विकी प्रकल्प बनने में सहायक हैं, का नारा है &#8220;..क्योंकि विचारों को चाहिए आज़ादी&#8221;।</p>
<div id="pullQuoteR">हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं</div>
<p>पर जहाँ स्वतन्त्रता है, वहाँ स्वतन्त्रता का दुरुपयोग करने वाले भी हैं। पिछले दिनों अमरीका के एक प्रमुख समाचार पत्र लॉस ऍञ्जिलिस टाइम्ज़ ने एक निराला प्रयोग किया, और उस का नाम रखा विकिटोरियल यानी विकी सम्पादकीय। यह अखबार के सम्पादकीय पृष्ठ के उप-सम्पादक माइकल न्यूमैन के दिमाग़ की उपज थी। उन के अनुसार उद्देश्य था इंटरनेट पर अखबार के पाठकों को मौका देना &#8220;साझे ढ़ंग से सत्य की खोज&#8221; का। इस के अन्तर्गत, पत्र के सम्पादकीय को खुला छोड़ा गया ताकि पाठक उसे बदल सकें। सम्पादकीय की मूल प्रति तो अपने स्थान पर रही, पर उस की एक और प्रति रखी गई लोगों की छेड़छाड़ के लिए। जैसा अपेक्षित था, सम्पादकीय के मूल स्वरूप की पहचान समाप्‍त होने में देर नहीं लगी। लगभग एक हज़ार पाठकों ने सम्पादकीय को बदलने के लिए रजिस्टर किया। कुछ ने विभिन्न शब्दों पर कड़ियाँ जोड़ीं, एक ने तो सम्पादकीय को ही आधा कर दिया। पर ज़ोर का झटका तब लगा जब कुछ पाठकों ने अश्लील चित्र ड़ालने शुरू कर दिए। हार कर अखबार ने विकिटोरियल को &#8220;अस्थाई रूप से&#8221; <a href="http://www2.latimesinteractive.com/wiki/index.php/Wikitorial">बन्द कर दिया</a>, उन लोगों का धन्यवाद देते हुए जिन्हों ने सही मानसिकता के साथ इस प्रयोग में भाग लिया। हम तो यही गुनगुना सकते हैं कि, &#8220;&#8230;यह तो होना ही था&#8221;।</p>
<p>आज़ादी की राहें खोलने वालों और आज़ादी का ग़लत फायदा उठाने वालों का यह चूहे-बिल्ली का खेल तो सदियों से चलता आया है और आगे भी चलता रहेगा। यदि आप घर में खुली हवा आने के लिए खिड़की-दरवाज़े खुले छोड़ना चाहते हैं तो जल्द ही चोर-लुटेरों का ड़र आप को मजबूर करेगा सींखचे लगाने के लिए, या फिर खिड़की-दरवाज़े बन्द करने के लिए। अन्तर्जाल पर वाइरस, वर्म, स्पैम, पॉर्न, स्पाइवेयर यह सब इसी बीमारी के लक्षण हैं। पर हम यही आशा कर सकते हैं कि अन्तर्जाल पर गुंडों मवालियों की संख्या के मुकाबले उन का वर्चस्व रहेगा जो रचनात्मक कार्य करते हैं, नए रास्ते खोलते हैं, नए सॉफ्टवेयर बनाते हैं और चोर उचक्कों की नाक में दम करने के लिए भी नए तन्त्र बनाते हैं। आशा है विकिटोरियल की खिड़की फिर खुलेगी, सींखचे लगने के बाद ही सही।
<p class="note">लेखक <a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a> निरंतर के संपादक मंडल के सदस्य हैं।</p>
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		<title>सामुदायिक प्रयत्नों के पसीने का प्रताप</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0605-nazariya</link>
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		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 14:43:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
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		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

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		<description><![CDATA[निरंतर का यह अंक वर्डप्रेस विशेषांक है। इस विशेषांक के जरिए हमारा प्रयास है कि हम वर्डप्रेस से संबंधित जानकारी रोचक तरीके से प्रस्तुत करे साथ ही आपको इस उत्पाद की सफलता के नेपथ्य में निहित सामुदायिक प्रयत्नों के पसीने की महक आप तक पहूँचा सके।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">अ</div>
<p>भिव्यक्ति, यानि अपने विचारों का संप्रेषण, मानव की पुरातन चाहत है। इसी चाहत से भाषायें पनपीं। इंसान के लिये यह बहुत जरुरी है कि अपनी बात दुनिया के सामने रखे। कहते हैं कि बातों के धनी बहुत आगे जाते हैं चाहे वह कार्य हो या व्यक्तिगत जिंदगी। बात कहने के बहुत से माध्यम हैं &#8211; प्रत्यक्षतः, फोन पर, सिनेमा-चित्रकला-कविता जैसे कला माध्यमों के जरिए, अखबार व रेडियो पर, आदि इत्यादि। आमने सामने या फोन की बात जैसे माध्यमों में बातचीत भले ही थोड़े से लोगों तक ही सीमित रहती हो पर किसी की कही बात पर तुरंत प्रतिक्रिया की जा सकती है। मास कम्यूनिकेशन के माध्यमों की पहुँच तो बहुत लोगों तक होती हैं पर यहाँ किसी की कही बात का जवाब आसानी से तुरंत नहीं दिया जा सकता। अंतर्जाल के आने के बाद समाचारों और विचारों ने दुनिया के एक कोने से दूसरे कोने तक प्रकाश की गति से पहुँचना शुरु कर दिया। लोग अंतर्जाल पर अपने निजी जालपृष्ठ बना कर अपने बारे में बताने लगे पर इन्हें अद्यतन रखना टेड़ी खीर थी। तिस पर, प्रतिक्रिया देने का सिलसिला अभी भी ईमेल, गेस्टबुक या फीडबैक फॉर्म जैसे तरीकों तक ही सीमित था। विचारों का प्रकाशन पहले से आसान तो हुआ था पर अभी भी सीमित ही था क्योंकि प्रयोक्ता को कम्पयूटर का ज्ञान होना आवश्यक था।</p>
<p>जब चिट्ठे या ब्लॉग का परिदृश्य में प्रादुर्भाव हुआ तो लोगों के मस्तिष्क के तार ज्यों अंतर्जाल के ज़रिए एक दूसरे से जुड़ गए। अब कुछ भी लिख कर उसका प्रकाशन करना बायें हाथ (या जिस भी हाथ से टायपिंग की जा सकती हो) का खेल था। अंतर्जाल पर ऐसे प्रकाशन तंत्रों का तांता लग गया जिनकी मदद से आपके लिखते ही सारी दुनिया न केवल लेख को पढ़ सकती थी बल्कि अपनी राय भी छोड़ सकती थी। प्रकाशन के इन साधनों, जिन्हें ब्लॉगिंग टूल या सॉफ्टवेयर कहा जाता है, में मुक्त कोड पर आधारित तंत्रांश वर्डप्रेस ने कुछ ही सालों में अपनी एक खास जगह बना ली है। इतने सारे ब्लॉगिंग माध्यमों और मूवेबल टाईप जैसे बड़े खिलाड़ियों के रहते वर्डप्रेस ने अतिशय सफलता कैसे हासिल की यह जानना ज़रूरी था। जो वर्डप्रेस का इस्तेमाल नहीं करते उनके लिये यह जानकारी कभी एक साथ मुहैया नहीं कराई गयी। निरंतर के इस अंक में हमने यही करने का प्रयत्न किया है।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 3px 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/wp-special.jpg" border="0" alt="Wordpress Special" hspace="8" vspace="3" width="150" height="75" align="left" />निरंतर का यह अंक वर्डप्रेस विशेषांक है। इस विशेषांक के जरिए हमारा प्रयास है कि हम वर्डप्रेस से संबंधित जानकारी रोचक तरीके से प्रस्तुत करे साथ ही आपको इस उत्पाद की सफलता के नेपथ्य में निहित सामुदायिक प्रयत्नों के पसीने की महक आप तक पहूँचा सके। वर्डप्रेस के विशेषांक में -</p>
<ul>
<li>आमुख कथा <a href="http://www.nirantar.org/0605-cover-wp-zero-to-hero/">ज़ीरो बन गया हीरो</a> में <a href="http://www.pnarula.com/">पंकज नरुला</a> नज़र डाल रहे हैं वर्डप्रेस के जन्म से लेकर जवानी तक की यात्रा पर। साथ ही पहचानें इसकी क्षमताओं और इसे बनाने वालों की सोच के बारे में।</li>
<li>यदि आपके पास अपना जालस्थान या वेबस्पेस उपलब्ध है तो आप अपने ब्लॉग को वर्डप्रेस पर स्थापित कर सकते हैं। निधि में आपके समस्त प्रारंभिक प्रश्‍नों का उत्तर देने का प्रयास कर रहा है <a href="http://idharudharki.kalusa.org/">रमण कौल</a> के रोचक लेख <a href="http://www.nirantar.org/0605-nidhi">आईये वर्डप्रेस अपनायें</a> का पहला भाग। वर्डप्रेस को अपने व्यक्तिगत प्रयोग के लिए कैसे लगाएं तथा इसे अपने हिसाब से कैसे ढाले यह इस लेख से जाना जा सकता है।</li>
<li>वर्डप्रेस अपने समुदाय के दम पर ही सफलता की चोटी पर चढ़ा है। अनगिनत लोगों का इसके विकास में प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष योगदान रहा है। क्या माजरा बनता है जब समुदाय के मुताल्लिक अंतर्जाल पर सेंकड़ों बार मिले दो भारतीय एक दूसरे से पहली बार रूबरू होते हैं। आमुख कथा <a href="http://www.nirantar.org/0605-cover-wp-cosmopolitan-community/">वर्डप्रेस महानगरीय संस्कृति के सदृश है</a> में पढ़िये वर्डप्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता मार्क घोष और कार्थिक शर्मा की पाप नगरी लॉस वेगास में हई बातचीत।</li>
<li>वर्डप्रेस की बात हो और इसके २० वर्षीय रचियता मैट मुलनवेग का जिक्र न हो ऐसा तो असम्भव है। संवाद में मैट से निरंतर का विशेष <a href="http://www.nirantar.org/0605-samvaad">साक्षात्कार</a> अवश्य पढ़ें।</li>
<li>किसी भी चिट्ठे को सुंदर बनाते हैं अभिकल्प। इन्हीं अभिकल्पों में से एक प्रसिद्ध अभिकल्प है <a href="http://www.brokencode.com/manji">मांजी</a> जिसको बनाने वाले हैं लेबनान के ख़ालेद अबु अल्फ़ा। आखिर क्या वजह है कि लोग ऐसी परियोजनाओं में समय लगाते हैं। कैसे मीलों दूर बैठे लोग आपसी समन्वय रख पाते हैं। कैसा लगता है इनमें हिस्सेदारी करना। यह सब खालेद के विचारों से जानिए उनके लेख <a href="http://www.nirantar.org/0605-cover-wp-priceless/">वर्डप्रेसः बेमोल, फिर भी अनमोल</a> में।</li>
</ul>
<p>निरंतर का यह पहला विशेषांक है। भविष्य में हम थीम आधारित ऐसे ही और विशेषांक संजोने का प्रयास करते रहेंगे। आपको यह अंक कैसा लगा, अपने सुझाव और टिप्पणियों और पत्र के ज़रिए हमें बताना न भूलें।</p>
<h2>असाधारण है रियली सिंपल सिंडिकेशन यानि आर.एस.एस</h2>
<p>ब्लॉग जब खूब चल पड़े और चारों और इनके चर्चे मशहूर हो गये तो इसी से जुड़ा एक और तंत्र सामने आया। जिस नाम से यह पहले पहल जाना गया वह ही इसका परिचय भी बन गया। यूं तो <a href="http://www.xml.com/pub/a/2002/12/18/dive-into-xml.html">आर.एस.एस</a> एक तरह का <a href="http://www.w3.org/XML/">क्षमल प्रारूप</a> है और इसके बाद आर.डी.एफ, <a href="http://www.atomenabled.org/">एटम</a> यानि अणु जैसे अन्य प्रारूप भी सामने आये हैं पर आर.एस.एस एक तरह से क्षमल फीड का ही पर्याय बन गया है। जिस भी जालस्थल से आर.एस.एस फीड प्रकाशित होती है पाठक <a href="http://www.bloglines.com/">ब्लॉगलाईंस</a> जैसे किसी न्यूज़रीडर के द्वारा बिना उस जालस्थल पर जाये उसकी ताज़ा सार्वजनिक प्रकाशित सामग्री, जब भी वह प्रकाशित हो, तब पढ़ सकते हैं। यह बात दीगर है कि जालस्थल के मालिक ही यह तय करते हैं कि फीड में सामग्री की मात्रा कितनी हो और यह कितने अंतराल में अद्यतन रखी जावेगी।</p>
<div>आर.एस.एस अभी विकास के दौर से गुजर रहा है और लोग इसके उन्नत और अनोखे प्रयोग करने के नित नये तरीकें खोजने में लगे हैं।</div>
<p>आज आलम यह है कि ब्लॉग हो या समाचारों की साईट, जिन जालस्थलों की विषय वस्तु नियमित रूप से बदलती रहती है, आर.एस.एस फीड का उनके जालस्थल से चोली दामन का साथ बन गया है। आर.एस.एस कि पृष्ठभूमि में प्रयुक्त हो रही मूल तकनीक, यानि <a href="http://www.google.com/search?q=push+technology">पुश तकनलाजी</a>, कोई नयी बात नहीं है। ९० के दशक में काफी जोरशोर से काम में लाये गये हैं ये। इस बार जो बात अलग है वो यह है कि आर.एस.एस को व्यापक रूप से मान्यता दी गयी और अपनाया गया। तकनीकी तौर पर आर.एस.एस काफी आकर्षित करता रहा है जालस्थल कंपनियों को। यह अनुमान लगाना कठिन नहीं अगर आप <a href="http://www.nirantar.org/0505-halchal">याद करें</a> कि विगत माह ही आस्क जीव्ह्स ने आनलाईन न्यूज़रीडर जालस्थल ब्लॉगलाईंस को खरीद लिया था। अब हर बीतता दिन आर.एस.एस के साथ साथ अन्य कई और कार्यों को भी राह दिखाता है। आर.एस.एस फीड है, तो टेक्नोराती, फीडस्टर जैसे आर.एस.एस खोज जैसे जालस्थल भी हैं। <a href="http://www.feeddemon.com/">फीडडेमन</a>, बलॉगलाईंस, <a href="http://www.syndic8.com/">सिंडिक ८</a> जैसे आर.एस.एस विषयवस्तु को पढ़ने में मदद करने वाले एग्रीगेटर्स या न्यूज़रीडर हैं तो आर.एस.एस फीड को प्रकाशित करने वाले तंत्र भी हैं। देखा जाये तो आर.एस.एस अभी भी विकास के दौर से गुजर रहा है और लोग इसके उन्नत और अनोखे प्रयोग करने के नित नये तरीकें खोजने में लगे हैं। इनमें विज्ञापन एक विशेष क्षेत्र है।</p>
<p>किसी भी जालस्थल की आर.एस.एस फीड होने का मतलब है कि लोग आपकी साईट बिना वहाँ आये पढ़ सकते हैं, भला कौन जालस्थल संचालक ये चाहेगा। इसे रोकने का एक तरीका तो यह हो सकता है कि आप संपूर्ण सामग्री न देकर फीड में कड़ी के साथ केवल सामग्री का सारांश प्रकाशित करें। इससे पाठक को पूरी सामग्री पढ़ने के लिये आपकी साईट पर आना ही पढ़ेगा। <a href="http://in.rediff.com/news/index.html">समाचार साईटों</a> के लिये ये आला उपाय है जो सिर्फ समाचार शीर्षक ही <a href="http://www.rediff.com/rss/index.html">प्रकाशित करें</a>। हालांकि कालक्रम में यह पाठकों को उबा भी सकता है। दूसरा तरीका यह कि फीड में सामग्री थोड़ी ज्यादा या पूर्णतः रखी जाये पर हर प्रविष्टि के साथ विज्ञापन हों। यह तकनीक अभी इतनी परिष्कृत नहीं हुई है हालांकि गूगल एडसेंस के फीड के मैदान में उतरने के बाद माज़रा ज़रूर बदलेगा (इसी अंक के <a href="http://www.nirantar.org/0605-halchal">हलचल</a> में संबंधित समाचार &#8220;फीड के लिये गूगल एडसेन्स बनी हकीकत&#8221; पढ़ें)। एडसेंस की मूल भावना की तर्ज़ पर ही विज्ञापनों को टेक्स्ट या चित्र के रूप में फीड में प्रकाशित कर दिया जायेगा। तकनीक ये सुनिश्चित करेगी कि विज्ञापन का मसौदा जब पाठक फ़ीड पढ़ रहे हों तभी आनन फानन तैयार हो, बजाय इसके कि जब इसका अभिधारण हो रहा हो। सब्सक्रिप्शन आधारित सामग्री के प्रकाशन के लिये ये नये युग का सूत्रपात करेगा।इसके अलावा भी लोग दिमाग पर ज़ोर लगा रहे हैं। आर.एस.एस फीड किसी भी साइट को बिना वहाँ जाये पढ़ना तो बायें हाथ का खेल बना देता है पर पारस्परिक व्यवहार या बातचीत का तत्व हटा देता है, संवाद दो तरफा नहीं रहता। अक्सर प्रविष्टि के साथ टिप्पणी की कड़ी तो रहती है पर टिप्पणी करनी हो तो अंततः जाना आपको साईट पर पड़ेगा ही। अब लोगों ने फीड में HTML फार्म का समावेश कर संवाद का पुट जोड़ने की कोशिश की है। <a href="http://corp.feedster.com/blog/rafer/archives/2005/05/future_salon_an_1.html">स्कॉट</a> ने अपनी फीड में यह प्रयोग किया ताकि लोग गुमनाम रहकर भी उनकी किसी भी प्रविष्टि को &#8220;<a href="http://nirantar.org/0505-nidhi/">टैग</a>&#8221; कर सकें। याहू में कार्यरत <a href="http://www.russellbeattie.com/notebook/1008483.html">रस्सेल</a> एक कदम और आगे निकले, हाल ही में <a href="http://www.russellbeattie.com/notebook/index.rss">अपनी फीड</a> में उन्होंने टिप्पणी करने का नन्हा सा HTML फार्म ही जोड़ दिया।</p>
<p>तकनलाजी के दीवाने आर.एस.एस के और उन्नत प्रयोगों के बारे में भी कयास लगा रहे हैं। जैसे कि इनका ऐसे ऐजेंट के रूप में प्रयोग जो समय समय पर अंतर्जाल से वांछित ताज़ी सामग्री खंगाल कर ला दे। या फिर ऐसे औज़ार के रूप में जिससे आप अपने कैलेंडर, संपर्क पते जैसी जानकारी साझा कर सकें। कल्पना कीजिये कि विभिन्न कंपनियाँ अपने उत्पादों के बारे में नवीनतम जानकारी, मूल्य सूची ईमेल के बजाय फीड से भेजें तो कितनी आसानी हो जाये। या फिर विश्वविद्यालय अपनी पाठ्य सामग्री इस तरह से भेजें। ये बातें बहुत उम्मीदें जगाती हैं। साथ में अनगिनत परेशानियाँ भी जुड़ी हैं, सिक्योरिटी और व्यक्तिगत पसंद संबंधी। क्या फीड को पासवर्ड द्वारा सुरक्षित कर या ईमेल ग्रुप की तरह किसी विशिष्ट समूह लोगों तक ही इसकी पहुँच सुनिश्चित करना मुमकिन है? आजकल के न्यूज़रीडर तो केवल सामग्री को फीड से अभिधारित कर तय प्रारूप में आप दर्शाते हैं। क्या पाठक यह तय कर सकेगा कि फीड में कौन सी जानकारी कितनी आये, कब और किस रूप में आये? क्या वह सामग्री का विश्लेषण कर पायेगा? ऐसे कई अनुत्तरित सवालों का जवाब लोग खोज रहे हैं। और मुझे लगता है कि जवाब जल्द ही आयेंगे?</p>
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		<title>आखिर ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0505-nazariya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0505-nazariya#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 May 2005 07:09:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अतुल अरोरा</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>

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		<description><![CDATA[जब सेंकड़ों मस्तिष्क साथ काम करें तो जेम्स सुरोविकी के शब्दों में, &#34;भीड़ चतुर हो जाती है&#34;। गोया, इंसान को इंसान से मिलाने का जो काम धर्म को करना था वो टैग कर रहे हैं। निरंतर के संपादकीय में पढ़िये <strong>देबाशीष चक्रवर्ती </strong>और <strong>अतुल अरोरा</strong> का नज़रिया।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h1>संबंधों के साझे सेतु</h1>
<p><img hspace="2" vspace="2" border="0" align="right" alt="नज़रिया" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" />ब्लॉग पार्टिसिपेटरी वेब (अंर्तजाल पर भागीदारी) का सटीक उदाहरण है। अंर्तजाल के हमारे रोज़मर्रा के जीवन में बढ़ते हस्तक्षेप के साथ ही सूचना के आदान प्रदान के तरीके साझे होते जा रहे हैं। जब सेंकड़ों हज़ारों मस्तिष्क एक साथ काम करें, जब नाना प्रकार के विचारों और योगदान का विलय हो जाये तो <a href="http://www.aaronsw.com/weblog/001315">जेम्स सुरोविकी</a> के शब्दों में, &quot;भीड़ चतुर हो जाती है&quot;। सोशियल बुकमार्किंग के इस नये दौर में यह बात चरितार्थ होने लगी है। विचारों की साझेदारी से अनायास ही संबंधों के सेतु बंधने लगे हैं। गोया, इंसान को इंसान से मिलाने का जो काम धर्म को करना था वो टैग कर रहे हैं।</p>
<p>जानकारी की जमावट और लोगों को जोड़ने का यह एक क्रांतिकारी माध्यम है और साथ ही मानवीय भावना का प्रतीक भी जो अराजकता से व्यवस्था की सृष्टि कर रहा है। निरंतर के मई 2005 अंक की आमुख कथा का विषय भला और क्या हो सकता था भला? <a href="http://www.nirantar.org/0505/nidhi">&quot;क्या आप टैगिंग करते हैं?&quot;</a> आपको कीवर्ड के साम्राज्य से न केवल परिचित कराने का प्रयास है वरन उसमें शामिल होने का खुला न्यौता भी।</p>
<p align="center"> <img hspace="5" height="284" width="313" vspace="5" border="0" align="middle" alt="टेकनोराती पर भारत की खोज" title="Searching India on Technorati" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/tag-editorial.JPG" /></p>
<p>टैगिंग बेईंतहां सफल हो कर अंर्तजाल पर नया अध्याय रचेगी या फिर अनगिनत अन्य क्रांतिकारी विचारों की तरह विस्मृति की गर्त में समा जायेगी इस प्रश्न का जवाब तो भविष्य ही दे सकता है। हम तो वर्तमान में ही जीते हैं न!</p>
<p>आपका मित्र,</p>
<p><strong><a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष</a></strong></p>
<p></p>
<hr/></p>
<h1>आखिर ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</h1>
<p>कुछ माह पहले की बात है। आफिस में काम करते हुए यूनिकोड से संबद्ध एक प्रश्न पर अपने अमरीकी सहयोगी से विचार विमर्श कर रहा था। तभी मेरे सहकर्मी ने मुझे हिंदी का कोई अक्षर टाईप करके दिखाया जिससे मेरे ज्ञान चक्षु खुल गये। तकनीक तो गजब की थी। अगर आपने अपने कंप्यूटर में शंकर दयाल शर्मा के जमाने से कोई अपडेट नही किया हो तो बात अलग है अन्यथा आजकल बिना किसी फोन्ट डाउनलोड किये आपके कंप्यूटर पर हिंदी, गुजराती, मराठी ही क्या दुनिया की कोई भी भाषा दिख सकती है। </p>
<p>यह स्वीकारते हुए मुझे कोई संकोच नहीं होता कि पिछले कुछ समय से मसरूफियत ने मुझे रेत में सर गड़ाये शतुरमुर्ग बना छोड़ा था। यूनिकोड, <a href="http://akshargram.com/sarvagya/index.php/XML_Feed">क्षमल फीड</a>, ब्लॉग,<a href="http://codex.wordpress.org/Using_Permalinks">पर्मालिंक</a>, <a href="http://www.bloglines.com/">न्यूज़रीडर</a>, <a href="http://www.cruftbox.com/cruft/docs/trackback.html">ट्रैकबैक</a> जैसे शब्द कब तूफान की तरह आये और अंर्तजाल तकनीकी पर छा गये पता नही चला। पर कुछ ही महीनो में पकड़ फिर से मजबूत हो चली और परिचय हुआ ब्लॉग की विधा से। फिर मिला <a href="http://www.devanaagarii.net/hi/alok/blog/">नौ दो ग्यारह</a> और <a href="http://nuktachini.debashish.com/">नुक्ता चीनी</a> से और मैं भी कूद पड़ा <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com/">लाईफ ईन ए एच ओ वी लेन</a> को लेकर। कुल दस पंद्रह हिंदी ब्लॉग से शुरू हुई यात्रा आज पचास से अधिक ब्लॉग और इस ब्लॉगजीन तक आ पहुँची और सतत जारी भी है। पर अभी भी दूसरे शतुरमुर्गो को देखकर कोफ्त होती है जो पूछते हैं कि ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?</p>
<p>वैसे गलती उनकी भी नहीं है। अंग्रेजी अखबारों की कटिंग चाय पिलाने वाले या &quot;मैने आज फलां किताब पढ़ी&quot; सरीखी हेडलाईन वाले चिट्ठों की भीड़ से अच्छे मोती चुनने की ज़हमत सिर्फ पढ़ने के शौकीन उठाना चाहते हैं। जब भी कोई शतुरमुर्ग तकनीकी के क्षेत्र में हलचल को देखकर कुछेक ब्लॉग देखने की ज़हमत उठाता भी है तो सरसरी तौर पर उसे आये दिन बेहतरीन टेम्पलेट बदलने वाले, परन्तु सामग्री के नाम पर भूसा परोसने वाले चिठ्ठाकारो की भरमार दिखती है। कभी सुना था कि दुनिया अपने गम से इतनी दुःखी है कि वह आपका दुःख सुनकर और दुःखी नही होना चाहती। इसलिए किसी को यह नही जानना कि आज आप ट्रैफिक में क्यों फँसे या फिर आपकी माशूका को कौन सी चाकलेट पसंद है या फिर आप परदेश में कितने नोस्टालजिक हो रहे हैं। ठीक इसी प्रकार किसी अखबार से कोई खबर उठाकर उस पर अपनी टिप्पणी जोड़ देना भी अधिक पाठक आकर्षित नही कर सकता।</p>
<p>अधिकांश यह नही जानते कि ब्लॉग सिर्फ डायरी नही है। बेशुमार तकनीकि, राजनैतिक, आर्थिक लेख इस विधा की ओर मुड़ चुके हैं या मुड़ रहे हैं। ब्लॉग वही सफल है जिनकी सामग्री पठनीय है। आप खोजी निगाह रखते हो तो आपको दूर नही जाना पड़ेगा। कम से कम आधा दर्जन ऐसे ब्लॉग है जो किसी भी अखबार के संपादकीय से ज्यादा मारक क्षमता रखते हैं। तकनीकी के क्षेत्र में भी आपको हर विधा के ब्लॉगर मिल जायेगें जो आये दिन अपने क्षेत्र में होने वाले नये अनुभव आपसे बाँटते हैं। ज्यादा ज़हमत उठाने से बचना हो तो सीधे पिछले दो साल के <a href="http://indibloggies.org/">इंडीब्लॉगीज़ पुरस्कार</a> देख लीजिए। आपको हर क्षेत्र के कुछ चुने हुए ब्लॉग देखने को मिलेंगे। जैसा कहा जाता है कि संतजनों की संगति में भी संत ही होते है अतः इस अवार्ड को पाने वाले या इनके उपविजेताओं के ब्लॉग पर आपको भूसा परोसने वाली कड़ियाँ भी कम ही मिलेंगी। इस अंक में साहित्यिक पत्रिका &quot;अभिव्यक्ति&quot; की <a href="http://www.nirantar.org/0505/vishesh">दास्तान</a> पढ़िये और सोचिए कि क्या आज से आठ साल बाद ऐसा ही कुछ निरंतर के लिए भी लिखा जायेगा?</p>
<p>आपका मित्र,</p>
<p><strong><a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल अरोरा</a></strong></p>
<p></p>
<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser">साथ ही पढ़ें <a href="http://www.nirantar.org/0505-sampadakji">पत्र संपादक के नाम</a>। आप भी हमें patrikaa at gmail dot com पर पत्र भेज कर अपनी राय दर्ज करा सकते हैं।</div>
<p> <br />
<h2>   निरंतर के मूल अंक का मुखपृष्ठ</h2>
<p align="center"><img height="174" width="431" border="0" align="middle" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/may_cover_01.gif" /><img border="0" align="middle" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/may_cover_02.gif" /><img border="0" align="middle" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/may_cover_03.gif" /><img border="0" align="middle" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/may_cover_04.gif" /><img border="0" align="middle" alt=" " src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/may_cover_05.gif" /></p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2214&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<title>धौंस नहीं सहेंगे चिट्ठों के सिपाही</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-nazariya</link>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 07:37:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[Flickr]]></category>
		<category><![CDATA[TOI]]></category>
		<category><![CDATA[Yahoo]]></category>

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		<description><![CDATA[आंदोलन का प्रतीक माने जाने वाले अखबार कार्पोरेट्स के हाथों अपना ज़मीर बेच चुके हैं। ऐसे में ब्लॉग्स का ईमानदार स्वर आशाएं जगाता है। पढ़िये ब्लॉग्स पर मीडिया मुगलों की दादागिरी पर निरंतर का दो टूक <strong>संपादकीय</strong>।<br /><br />साथ ही पढ़ें याहू द्वारा <strong>फ्लिकर </strong>के अधिग्रहण और <strong>याहू 360&#176;</strong> के पर्दापण पर निरंतर द्वारा बदलते परिदृश्य का आंकलन, &#34;<strong>बड़े खिलाड़ी के आने से बड़ा हुआ खेल</strong>&#34;।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center"><img width="490" height="250" border="0" title="Editorial" alt="Editorial" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/story_big_editorial.jpg" /></p>
<p><font size="5">अ</font>गर पूर्णतः व्यक्तिगत किस्म के चिट्ठों को छोड़ दिया जाय तो ब्लॉगिंग की शुरुवात से ही इसका एक आकर्षक पहलू रहा है, इसके विद्रोही स्वर तथा व्यवस्था के ऐसे पक्षों का पर्दाफाश करने की काबलियत जिन का, आम तौर पर, मुख्यधारा के मीडिया की नज़र में कौड़ी का भाव रहता है। <a href="http://www.talkingpointsmemo.com/old/dec0201.html#120602320pm">रंगभेद का सर्मथन</a> करने वाले अमरीकी सिनेटर के सही रंग उजागर करने से लेकर प्रद्युम्न माहेश्वरी के <a href="http://mediaah.blogspot.com/">मीडीयाह</a> तक यह बात साबित हुई है कि मामले का एक अलाहदा पक्ष रख कर ब्लॉग खोजी पत्रकारिता को एक नया आयाम प्रदान कर चुके हैं, वह है निर्भीक, बेबाक और निस्वार्थ पक्ष रखने का सार्मथ्य। और जब सामाजिक आंदोलन का प्रतीक माने जाने वाले अधिकांश अखबार भीमकाय कार्पोरेट्स के हाथों अपना ज़मीर बेच कर &quot;एडवरटोरियल&quot; जैसे अशिष्ट शब्द की रचना कर चुके हैं, ब्लॉग्स का यह ईमानदार स्वर आशाएं जगाता है।<img width="135" vspace="5" hspace="5" height="140" border="0" align="left" alt="नज़रिया" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" /> ब्लॉग अंर्तजाल समाज के अण्णा हजारे और मेधा पाटकर हैं। समाज के अधिकारों की रक्षा के इस नये अस्त्र को तीसरी दुनिया में अंर्तजाल के विहंगम होने तक का भले ही इंतज़ार हो, यह बिलाशक एक इतर सामाजिक ढांचे का रूप अख्तियार कर चुका है जो आने वाले वर्षों मे और मुखर ही होगा।</p>
<p>मेरे इस विश्वास के पीछे कारण हैं। हम सतत देख रहे हैं कि मुख्यधारा के मीडीया के लिए अब ब्लॉग्स को अनदेखा करना असंभव होता जा रहा है। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान हमने इन के बढ़ते कद को देखा है। जब अफगानिस्तान से <a href="http://afghanwarrior.blogspot.com/">पहला ब्लॉग</a> लिखा जाता है तो खुशी होती है कि युद्धोन्माद के अम्ल से मरू बने देश में जनाधिकारों की कोंपलें फूट रही है। ब्लॉग मानवाधिकारों के स्वास्थ्य बताते तापमापक भी बन गए हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि इनके बाहुबल में इज़ाफे से बड़े मीडिया घरानों की चूलें हिल रही हैं। चिट्ठाकारिता के क्षेत्र में जबसे पत्रकारों ने भी कदम रखा है इस से इस माध्यम को न केवल पेशेवर कलेवर मिला है वरन इसके असरदार होने की बात भी पुख्ता हुई है।
<div id='pullQuoteR'>ब्लॉग अंर्तजाल समाज के अण्णा हजारे और मेधा पाटकर हैं।</div>
<p>प्रद्युम्न, जो पेशे से स्वयं पत्रकार हैं, नेपथ्य में चल रही मीडिया घरानों के कार्यकलापों का खुलासा करते रहे हैं। मुझे नहीं मालूम इसमें उनका कोई व्यक्तिगत हित शुमार रहा या नहीं, पर जनतंत्र में हमें किसी भी मामले के हर पक्ष को जानने का अधिकार है। इस बड़े अखबार के मामले में यह पक्ष ज़रा काला था। जिन विज्ञापनों को वे संपादकीय पृष्टों का मुलम्मा चढ़ा कर बेचते आ रहे थे उनकी पोल इस चिट्ठे ने खोल दी। ऐसा नहीं कि ये कोई नयी बात थी, इस अखबार के पाठक सालों से इस धीमे जहर का सेवन करते आये हैं। जब मनोरंजन के पृष्ठ पर उनके ही लाइफस्टाईल चैनल की चर्चा हो, जब उनकी उमर्दराज़ खानपान विशेषज्ञा डीनो मोरिया के रेस्तरां की &quot;खास&quot; तारीफ कर रही हों, जब रविवार दर रविवार केवल दीपक चोपड़ा की पुस्तकों की ही समीक्षा छपे और साथ में समूह के पोर्टल से इन्हें खरीदने की कड़ी भी हो, कम शब्दों में &#8211; जब समूचा अखबार ही समूह के उत्पाद बेचने का विज्ञापन प्रतीत होने लगे तो शक तो होता ही। प्रद्युम्न ने केवल इस शंका की पुष्टि की। हास्यास्पद बात यह है कि विचार ज़ाहिर करने करने के मौलिक अधिकार पर आपत्ति करने वाले कोई और नहीं वरन समाज का चौथा स्तंभ माने जाने वाली संस्था है। </p>
<p>जब इस मीडिया घराने ने माहेश्वरी के हाथ कानूनी धमकियों के माध्यम से मरोड़ने चाहे तो उन्हें अंदेशा नहीं रहा होगा कि अब तक फकत मीडियाह ब्लॉग और कुछ अन्य <a href="http://www.jivha.com/blog/archives/categories/the-slimes-of-india-chronicles/">चिट्ठों</a>  (कड़ी अब निष्क्रिय) की चर्चा तक ही सीमित रहे उनके पापों का घड़ा अब हर पनघट पर फूटेगा। निरंतर की आमुख कथा &quot;<a href="http://www.nirantar.org/0405/cover-story">मीडिया ही घोंट रहा है ब्लॉग का गला</a>&quot; में मार्क ग्लेसर पेश कर रहे हैं इसी संपूर्ण घटनाक्रम का जायज़ा। सीमित साधनों के चलते मीडियाह ब्लॉग भले ही बंद हो गया हो विचारों की आज़ादी की बयार निरंतर बहती ही रहेगी, इसी अटूट विश्वास के साथ हम मार्क के लेख का <a href="http://www.nirantar.org/0405/cover-story">हिंदी रूपांतर</a> प्रस्तुत कर रहे हैं। किसी मीडिया समूह विशेष के खिलाफ निरंतर का कोई अजेंडा नहीं, यदि अजेंडा है तो बस सचाई पर किसी भी तरह की धौंसपट्टी की खिलाफत।</p>
<p></p>
<h2>बड़े खिलाड़ी के आने से बड़ा हुआ खेल</h2>
<p><img width="210" style="padding:10px" height="148" border="0" align="right" alt="जेरेमी का याहू 360 डिग्रीज़ ब्लॉग" title="Jeremy's yahoo 360 degrees blog" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/y360.jpg" />निरंतर के इसी अंक की <a href="http://www.nirantar.org/0405/halchal">हलचल</a> में हमने अंर्तजाल के बड़े खिलाड़ियों में से एक याहू द्वारा चित्रों कि सजाल पर सहेजने की मुफ्त सेवा देने वाले और बेहद अल्पसमय में सबकी पसंदीदा बनी <a href="http://www.flickr.com/">फ्लिकर</a> के अधिग्रहण और साथ ही <a href="http://360.yahoo.com/">याहू 360&deg;</a> द्वारा ब्लॉगिंग के अखाड़े में पर्दापण की खबर दी है। छोटी मछलियों को बड़ी मछलियों द्वारा निगलते जाने का यह कोई पहला वाकया नहीं है, पर वाकई यह है एक मह्त्वपूर्ण ख़बर। सिर्फ इसलिए नहीं कि मैदान में पहले से मौजूद <a href="http://www.blogger.com/">गूगल</a> के साथ उनके दो दो हाथ होने का माजरा दर्शनीय होगा बल्कि इसलिए भी कि स्वस्थ मुकाबला हो तो उपभोक्ता को ज्यादा फायदा होने की संभावना है। याहू एक समझदार कंपनी है जो सदा युवा रहने का प्रयास करती रही है, यह कदम भी उनका एक प्रभावी कदम है अपने संस्थान को बदलाव की सच्चाईयों से अद्यतन रखना। पिछले कई वर्षों से एक उत्कृष्ट मुफ्त होस्टिंग सेवा कायम रखने के बाद क्या यह याहू का मोहभंग है पारिवारिक चित्रों के अल्बम और पकवानों की विधियों वाले जड़ एच.टी.एम.एल पृष्टों से? मुझे अब लगता है कि सचाई शायद इसकी ठीक उलट ही है। याहू का सब्सक्राईबर आधार बड़ा तगड़ा है जो उसकी किसी भी नई परियोजना को हाथों हाथ के सकते हैं, अधिक पाठक मतलब विज्ञापनो से अधिक आय। यह समीकरण भले ही उतना सरल न हो फिर भी याहू के कदम से उसकी अपने विभिन्न उत्पादों, जैसे कि विज्ञापन युक्त मुफ्त होस्टिंग जो अब ब्लॉगिंग की भी सुविधा दे, मैसेंजर, ब्रीफकेस, आवाज़, चित्र व चलचित्र अल्बम आदि, की जमावट एक जगह कर उसमें दम भरने की चेष्टा साफ झलकती है।</p>
<div id='pullQuoteR'>याहू का सब्सक्राईबर आधार बड़ा तगड़ा है जो उसकी किसी भी नई परियोजना को हाथों हाथ के सकते हैं, अधिक पाठक मतलब विज्ञापनो से अधिक आय।</div>
<p>हमारे देश में ही क्या दुनिया भर में ब्लॉगिंग करने वाले विभिन्न वर्ग हैं जो अलग अलग कारणों से कीबोर्ड का प्रयोग करते हैं। पर ज्यादातर इसे बड़े गंभीर भाव से लेते हैं। ब्लॉग के माध्यम से हमारी सबसे बातचीत भी होती रहती है। हालिया कमेन्ट स्पैम डकैतों ने यह भी जता दिया कि इस वार्तालाप में अनजाने लोग जबरिया शामिल भी हो सकते हैं। ऐसे कई कारणों से लोगों का चिट्ठाकारी, या कहें तो आनलाईन व्यवहार के दौरान ही, अपनी पहचान छुपा कर रखना ज़रूरी हो गया। मेरे जैसे लोग जो शुरु से यह चोला न ओढ़ सके वह भी कई दफा इस एनॉनीमिटि को तरसते हैं। अगर आप के पास यह सुविधा हो कि आप अपने चिट्ठे, बोलते चिट्ठों, चित्र या विडियो के बारे में यह तय कर सकें कि फलां सभी देख सुन सकेंगे और फलां केवल मेरे मित्र और परिवार के सदस्य और फलां केवल मेरी गर्लफ्रेंड तो कितना ही अच्छा हो। है न! याहू 360&deg; शायद ऐसे वार्तालाप, जिसे विशेषज्ञ &quot;<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/YASNS">येट अनदर सोशीयल नेटवर्किंग</a>&quot; पुकारते हैं, को आसान बना दे। याहू 360&deg; की झलक देखें तो पहली नज़र में ये सामाजिक तालमेल का स्वाद ही ज्यादा मिलता है, लगता है ज्यों <a href="http://my.yahoo.com/">माई याहू</a> पर <a href="http://www.orkut.com/">आर्कुट</a> और <a href="http://messenger.yahoo.com/">मैसेंजर</a> चस्पा कर दिए गए हों, ब्लॉगिंग का इस समीकरण में छोटा सा अस्तित्व है। मुझे लगता है कि गंभीर ब्लॉगर इस से बिचकेंगे। बहरहाल, आने वाले दिन ही बतायेंगे कि ऊँट किस करवट बैठेगा। फिलहाल तो यह सुविधा गूगल मेल की भांति गिने चुने लोगों को नसीब होगी जो यह कड़ी आगे बढ़ायेंगे। तो कुछ हफ्ते तैयार रहें &quot;मुझे याहू 360&deg; का निमंत्रण मिला&quot; या &quot;मेरी याहू 360&deg; की समीक्षा&quot; नुमा चिट्ठे पढ़ने के लिए। </p>
<p>आपका मित्र </p>
<p><a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष चक्रवर्ती</a></p>
<p class=note>साथ ही पढ़ें <a href="http://www.nirantar.org/0405/sampadakji">पत्र संपादक के नाम</a>। आप भी हमें patrikaa at gmail dot com पर पत्र भेज कर अपनी राय दर्ज करा सकते हैं।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2213&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<title>बलॉगिंग विथ परपस</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-nazariya</link>
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		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 12:12:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Collaboration]]></category>

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		<description><![CDATA[जिह्वा ने जब अपना प्रसिद्ध चिट्ठा बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी। क्या चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस? क्या वे समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते? <strong>नज़रिया स्तंभ</strong> में पढ़िये संपादक की कलम से निरंतर का परिचय और चिट्ठा जगत पर नुक्ता चीनी के साथ पाईए परिचय आमुख कथा का।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारीः सच या मिथक?</h3>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" border="0" alt="नज़रिया" hspace="8" vspace="8" width="135" height="140" align="left" />कुछ समय पहले मैंने ब्लॉग को बहुत गंभीरता से न लेने कि हिमायत करते हुए अपने <a href="http://nullpointer.debashish.com/the-blog-matrix">अंग्रेज़ी चिट्ठे</a> में लिखा था कि ब्लॉग से सामाजिक बदलाव या जनजागरण जैसे असर की अपेक्षा रखना इस माध्यम को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना है। &#8220;मैंने आज नाश्ते मे दलिया खाया&#8221; या फिर &#8220;मैंने आज बॉस की बेटी को किस किया&#8221; नुमा नितांत आत्मकेंद्रित चिट्ठों कि भरमार से मेरी यह राय पुख्ता हुई। मन ही मन यह चाहते हुए कि &#8220;बलॉगिंग विथ परपस&#8221; यानि उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी हकीकत बने मैंने आहिस्ता आहिस्ता यह प्रयास किया कि राजनैतिक समाचारों पर टिप्पणी के अलावा सामाजिक तथ्यों पर भी लिखुं, मूलतः बंगाली होने और अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के बावजूद हिन्दी बेल्ट में अधिकांशतः रहने के कारण सोचता हिन्दी में था, अतः हिन्दी ब्लॉग शुरु किया। पर जैसी चिट्ठाकारी आप और मैं करते आए हैं यह उस रूप से ज्यादा अलग नहीं है जो समीक्षक ब्लॉगिंग को महज़ पत्रकारिता का ही नया आयाम करार दे कर गढ़ चुके थे।</p>
<div id="pullQuoteR">एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया।</div>
<p>एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया। विचारों की हिकारत से कुकुरमुत्तों की नाई <a href="http://blogkela.blogspot.com/">केले</a> उग आए। असर ऐसा था कि मुझे कई दफा ये लगा कि अपना चिट्ठा बंद ही कर दूँ, महीनों लिखने का जी नहीं करता। जिह्वा उपनाम से लिखने वाले बंगलौर निवासी लेखक ने जब अपना बेहद <a href="http://www.jivha.com/">प्रसिद्ध चिट्ठा</a> बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी, &#8220;आखिरकार ये मेरा ही है, जो चाहे सो करूँ&#8221; की भावना के साथ पटाक्षेप हुआ। <a href="http://www.jish.nu/">जिश मुर्खजी</a> ने कलम रखी तो सुझाव दिया,&#8221;ब्राउज़र के बाहर भी एक दुनिया है, उसका ज़ायका लो&#8221; भारतीय समाज पर ब्लॉग के असर के प्रश्न पर अर्थशास्त्री और ब्लॉगर अतानु दे <a href="http://www.nirantar.org/0305-samvaad">कह उठे</a>, &#8220;मज़ाक कर रहे हो क्या! भारत को कौन बदल सकता है?&#8221; ये नाकारात्मक रूख मेरी इस भावना को बलवती करते रहे हैं कि चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस, वे शायद समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते। ब्लॉगिंग आखिरकार कोई सामाजिक आंदोलन तो है नहीं, यह बस &#8220;तू मुझे लिंक कर और मैं तुझे&#8221; की ब्लॉग की मूल भावना पर ही झूल रहा है। अब तक ब्लॉगिंग के गिने चुने रूख ही मुखर हुए हैं,कड़ियों के संकलन,निजी वाकये या 9/11 जैसी आपदाओं पर आपबीतियाँ, समाचारों पर टिप्पणियाँ जैसे चिट्ठे जो शायद किसी और पेशे से जुड़े गैरलेखकों की सृजनात्मकता का पक्ष रखते हैं और दूसरे काफी संजीदा से चिट्ठे जो अक्सर लेखक के अपने ही पेशे से ताल्लुक रखते हों।</p>
<p><a href="http://tsunamihelp.blogspot.com/">त्सुनामी हेल्प ब्लॉग</a> को कारगर होते देख मेरी यह भावना काफी बदली है। इस एक ब्लॉग ने सेवाभावना को सर्वोपरि रख कर अनेकानेक पृथक दलों को एकीकृत किया और शायद यह स्थापित भी किया कि ब्लॉगिंग सिर्फ पत्रकारिता या निजी डायरी लेखन नहीं है। निरंतर के पहले अंक की आमुख कथा में मुम्बई स्थित सलाहकार दीना मेहता ने मेरे आग्रह पर इसी विषय से जुड़ा <a title="भारतीय ब्लॉगिंग: टिप्पिंग प्वाईंट पर" href="http://www.nirantar.org/0305-cover-story/" target="_blank">एक अन्वेषी लेख</a> लिखा है जो चिट्ठाकारी के बदलते परिवेश पर विश्लेषणात्मक दृष्टिपात कर रहा है। यदि लेखिका का पूर्वानुमान सही निकले तो दिन दूर नहीं जब उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी एक सचाई बनेगी और लोग चिट्ठाकारी को पेशे के रूप में अपना सकेंगे।</p>
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<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">साझे प्रयासों की एक और कड़ी</h3>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/old_logo.gif" border="0" alt="Nirantar" hspace="8" vspace="8" width="189" height="60" align="right" />ब्लॉग यानि कि चिट्ठा वर्तमान दौर में अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। दुनिया भर में चिट्ठों की लोकप्रियता बढ़ी है तथा हर घड़ी नए ब्लॉग जन्म ले रहे हैं। हिन्दी में ब्लॉग लेखन का सिलसिला शुरु हुये दो साल हुये हैं। इस साल भारतीय भाषाओं मे ब्लॉग लेखन में भी तेजी आई साथ ही विषयों में विविधता तथा गहराई बढ़ी है। लेखन के अलावा जो एक बात सशक्त रूप से उभरी वह है हिन्दी चिट्ठाकारों का पारस्परिक व्यवहार और चिट्ठाकार समुदाय का जन्म। <a href="http://www.akshargram.com/">अक्षरग्राम</a> और <a href="http://www.myjavaserver.com/~hindi">चिट्ठा विश्व</a> से लेकर <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya">सर्वज्ञ</a>, <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/anugunj">अनुगूँज</a>, <a href="http://bunokahani.blogspot.com">बुनो कहानी</a> जैसे कितने ही साझे प्रयासों के शक्तिशाली उदाहरण सामने हैं। निरंतर इसी की एक कड़ी है।</p>
<p>यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि आने वाले समय में चिट्ठाकारी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी चिट्ठाकारी भी इसका अपवाद नही होगी। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक ब्लॉग पत्रिका की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही थी। पत्रिका का कलेवर ऐसा सोचा जा रहा था जिससे चिट्ठाकार बन्धु अपना रचना कौशल निखार सकें साथ ही गैर ब्लॉग लेखकों के लिए ब्लॉगजगत की छवि प्रस्तुत की जा सके। इसी उद्देश्य को लेकर शुरु की जा रही है यह हिन्दी जगत (और संभवतः विश्व की) की पहली ब्लॉग पत्रिका &#8212; निरंतर। शुरुआती दिनों में जब हिन्दी चिट्ठाकारी का स्वरूप, शैली, शिल्प सब कुछ निर्माण के दौर में है, उम्मीद है कि निरन्तर का प्रकाशन इस काम में मील का पत्थर साबित होगा। यह प्रयास सामूहिक है। सबकी भागीदारी के बिना इस ऐतिहासिक काम को अंजाम देने की सोचना दिवास्वप्न होगा। सभी से आशा एवं अनुरोध है कि अपने सुझाव व सहयोग के माध्यम से निरंतर से जुडे रहें। साथियों के सहयोग के लिये बढे हाथों की गर्मजोशी ही निरंतर की सफलता की कहानी कहेगी।</p>
<p>निरंतर के संपादक मंडल के सभी साथियों <a href="http://pnarula.com">पंकज नरूला</a>, <a href="http://jitu.info">जितेन्द्र चौधरी</a>,  <a href="http://fursatiya.blogspot.com">अनूप शुक्ला</a>, <a href="http://raviratlami.blogspot.com">रविशंकर श्रीवास्तव</a>, <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com">अतुल अरोरा</a> और <a href="http://kaulonline.org">रमण कौल</a> का मैं आभार व्यक्त करता हूँ सहयोग, समर्थन, धैर्य और भागीदारी के लिए।</p>
<p>आपका मित्र<br />
<a href="http://www.debashish.com">देबाशीष चक्रवर्ती</a></p>
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