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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; निधि</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
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		<title>140 अक्षरों की दुनिया: माइक्रोब्लॉगिंग</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-tech-deergha-microblogging</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-tech-deergha-microblogging#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 15 Jul 2008 07:54:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>
		<category><![CDATA[Microblogging]]></category>
		<category><![CDATA[SMS]]></category>
		<category><![CDATA[Twitter]]></category>

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		<description><![CDATA[ब्लॉगिंग के बाद इंटरनेट पर एक और विधा ने जोर पकड़ा है। जी हाँ ट्विटर, पाउंस और प्लर्क के दीवाने अपने बलॉग छोड़ दीवाने हो चले हैं माईक्रोब्लॉगिंग के। <strong>पैट्रिक्स </strong>और <strong>देबाशीष </strong>कर रहे हैं इस लोकप्रिय तकनीक की संक्षिप्त पड़ताल जिसमें लोग फकत 140 अक्षरों में कभी अपने मोबाईल, कभी डेस्कटॉप तो कभी जालस्थल द्वारा अपना हालेदिल लिखे चले जाते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-twitter.jpg" border="0" alt="Microblogging" hspace="3" vspace="3" width="490" height="302" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">आ</div>
<p>प अभी क्या कर रहे हैं? ये बड़ा ही सीधा सवाल है जिसका जवाब देना भी बेहद आसान होता है। अंतरजाल पर दुनिया के हजारों लोग इसी सवाल का जवाब देते अघाते नही और <strong>ट्विटर </strong>की दुनिया में उनके इस सवाल का इंतज़ार कभी दस तो कभी हजारों <strong>फॉलोवर्स </strong>को रहता है। इससे पहले कि आप ट्विटर को कोई धार्मिक संप्रदाय समझ बैठें जिसके अनुयायी भेद भरे संदेश साझा करते हैं, हम आपको इसका राज़ बता ही देते हैं।</p>
<div id="boxR">
<h3>क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?</h3>
<p><img title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/dchucks-on-twitter.jpg" border="0" alt="Microblogging" hspace="2" vspace="2" width="198" height="154" align="middle" /></p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग (Microblogging) पारंपरिक ब्लॉगिंग का एक अलाहदा रूप है जिसमें संक्षिप्त टेक्स्ट संदेश भेजे जा सकते हैं। संदेश की सीमा अक्सर 140 अक्षरों की होती है जिसे आप अपने मोबाईल फ़ोन, इंस्टैंट मैसेंजर, ईमेल या जालघर द्वारा भेज सकते हैं। 2006 में प्रारंभ, ट्विटर सर्वाधिक प्रसिद्ध माइक्रोब्लॉगिंग सेवा है, अगला नंबर गूगल द्वारा अधिग्रहित <strong>जायकू </strong>का है।</p>
<p>ज्यों ज्यों माइक्रोब्लॉगिंग की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा हो रहा है इसके अति साधारण रूप में नये नग जोड़े जाने की कवायद चल रही है। डिग के संस्थापक केविन रोज़ द्वारा स्थापित <strong>पाउंस </strong>में फाइल शेयरिंग व कार्यक्रम न्यौते भेजने कि सुविधा जोड़ी गई तो हाल ही में शुरु किये गई प्लर्क के जालघर में अंतरापृष्ठ को एक टाईम लाईन का स्वरूप दे कर विडियो व अन्य मीडिया जोड़ने की सुविधा दी गई है।</p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग का जादू इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि फ़ेसबुक से लेकर लिंक्ड-इन तक को, स्टेटस अपडेट के बहाने ही सही, माइक्रोब्लॉगिंग की सुविधा मुहैया करानी पड़ी है। तो यह बिलावजह नहीं है कि माइक्रोब्लॉगिंग नामचीन शख्सियतों को भी लुभा रही है तभी तो ब्लॉगअड्डा ने अमिताभ बच्चन के बलॉग के बाद खास उनके लिये माइक्रोब्लॉगिंग की <a href="http://www.masala.com/4133-micro-blogging-just-for-the-big-b" target="_blank">सुविधा भी शुरु</a> की है। <a href="http://twitter.com/bbc" target="_blank">बीबीसी</a> व <a href="http://twitter.com/ajenglish" target="_blank">अलज़जीरा</a> जैसे नामचीन समाचार संस्थानों स लेकर अमरीका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार <a href="http://twitter.com/barackobama" target="_blank">बराक ओबामा</a> तक ट्विटर पर हैं।</div>
<p>ट्विटर एक अलग किस्म की <strong>इंस्टैंट मैसेजिंग</strong> सेवा है, कई इसे <strong>माइक्रोब्लॉगिंग </strong>(देखें बॉक्सः क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?) कहकर पुकारते हैं। फर्क़ यह है कि आप ट्विटर पर केवल 140 या उससे कम अक्षरों में ही संदेश भेज सकते हैं जो आपके फॉलोवर्स (ट्विटर की ज़बान में आपके संदेश पाने की हामी भरने वाले को फॉलोवर कहा जाता है) को तुरंत मिल जाता है। इसी तरह आप भी अपनी पसंद के लोगों को फॉलो कर सकते हैं। और इस तरह बन जाता है एक बढ़िया सामाजिक तंत्र या सोशियल नेटवर्क जिसकी बात आजकल हर वेंचर कैपिटलिस्ट किया करता है। मज़े की बात यह है कि ट्विटर सेवा मोबाईल पर भी चलती है यानी आप अपने सेल फोन द्वारा भी संदेश भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर के अलावा अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवायें भी आहिस्ता आहिस्ता अपनी पैठ बना रही हैं। विपणन व सोशियल मीडिया में रुचि रखने वाले <strong>गौरव मिश्रा</strong>, जो <a href="http://www.gauravonomics.com/" target="_blank">गौरवानॉमिक्स</a> नामक चिट्ठा लिखते हैं, ट्विटर के अलावा जायकू, पाउंस, प्लर्क, क्युपि, चित्र व एसएमएस गपशप जैसी सेवायें आजमा चुके हैं। ट्विटर के प्रयोक्ता इसे विविध माध्यमों से भी इस्तेमाल करते हैं, कई लोग अपने मोबाईल द्वारा भारत के शॉर्टकोड 5566511 पर संदेश भेजते हैं तो कई टीव्हिर्ल (Twhirl)  या ट्विटरफॉक्स (TwitterFox) जैसे डेस्कटॉप क्लायंट या ब्राउज़र एक्सटेंशन का प्रयोग करते हैं।<img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Gaurav Mishra" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/gaurav-mishra-quote.jpg" border="0" alt="Gaurav Mishra" hspace="5" vspace="5" width="225" height="123" align="left" /></p>
<p>140 अक्षरों की सीमा ट्विटर पर अनचाही बातों और बड़बोलेपन पर बाँध तो लगाती ही है, साथ ही न्यूनतम शब्दों में वही बात कहने का हुनर भी सिखा देती है जो आप अपने ब्लॉग पर 1000 शब्द खर्च करे बिना कह नहीं पाते। और यकीन मानिये 140 अक्षर कम नहीं होते क्योंकि ट्विटर पर अक्सर लोग बेतकल्लुफ और निजी बातें लिखते हैं। कई बार ये बातें रिमाईंडर, निजी नोट, त्वरित विचार या आवश्यक खबर होती है। किसी व्यक्ति को फॉलो करते करते आपको उसकी शख्सियत का इल्म होने लगता है, मसलन उसे कैसी फिल्में पसंद है, वो क्या पढ़ता है, कहाँ खाना खाता है, उसके आफिस में क्या चल रहा है, वगैरह। पर ट्विटर पर लोग इतनी निजी बातें क्यों करने लगते हैं जो वो साधारणतः अपने ब्लॉग पर नहीं करते। <a href="http://www.b5media.com/" target="_blank">बी 5 मीडिया</a> व <a href="http://www.inquisitr.com/" target="_blank">इंक्यूज़िटर</a> के संस्थापक <strong><a href="http://www.duncanriley.com/" target="_blank">डंकन रियली</a></strong> &#8220;नेटवर्क व त्वरित वार्तालाप&#8221; को इसकी वजह मानते हैं, &#8220;ट्वीट काफी सीमित पाठकवर्ग पर केंद्रित होते हैं और इनका छोटा आकार इनका प्रारूप निजी बना देता है&#8221;, वे कहते हैं। गौरव कहते हैं, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग ने ब्लॉगिंग के साथ वही किया जो एक समय ब्लॉगिंग ने पारंपरिक प्रकाशन के साथ किया था। माइक्रोब्लॉगिंग के एसएमएस और चैट से साम्य ने इसे अनौपचारिक कलेवर दे दिया है&#8221;</p>
<p>ट्विटर पर अधिकांश लोग पहले चिट्ठाकारी से जुड़े फिर इस माध्यम से। प्रकाशन की सरलता ने लाखों लोगों को अपने ब्लॉग पर जो चाहे वो लिखना सिखाया। पर लंबे गद्य लेखन से कई ब्लॉगर उकता जाते हैं। ब्लॉग का प्रारूप अमूमन ऐसा होता है कि कम शब्दों में लिखना श्रेष्ठ नही होता। वर्डप्रेस की असाईड्स और टंबल ब्लॉग जैसे माध्यमों ने यहाँ निजात ज़रूर दी, जहाँ एक लाईना पोस्ट लिखना संभव था, टेबल ब्लॉग पर तो आप केवल एक विडियो या चित्र भी पोस्ट कर सकते थे, बिना एक भी शब्द लिखे। पर तात्कालिकता ने ट्विटर को मकबूलियत दिला दी। कहना न होगा कि कई दफा किसी बात को तुरंत कहना ज़्यादा जरुरी होता है और ट्विटर ने इसी जरुरत को पूरा किया।</p>
<div id="boxL">
<h3>नया रूप, नई बातें</h3>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग के पदार्पण और ट्विटर की मकबूलियत से कुछ नये शब्दों का सृजन भी हुआ है, नोश फ़रमायें</p>
<ul>
<li><strong>ट्वीटः </strong>माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि</li>
<li><strong>ट्विटररः </strong>ट्विटर प्रयोक्ता</li>
<li><strong>ट्विटोस्फ़ीयरः </strong>ट्विटर संसार</li>
<li><strong>मिसट्वीटः</strong> ऐसी माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि जिस पर आपको खेद हो। ट्विटर पोस्ट हटाने की सुविधा तो देता है पर संपादित करने या वापस लेने की नहीं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी शब्दों के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Twitter%20Glossary" target="_blank">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</p>
<h3>ट्विटर मैशअप</h3>
<p>जाल पर ट्विटर जैसी तो सेंकड़ों सेवायें हैं पर इसके जैसा नाम किसी का नही है। ट्विटर से जुड़े निम्नलिखित मैशअप खासे लोकप्रिय हैं</p>
<ul>
<li><a href="http://twittermap.com/twittervision" target="_blank"><strong>ट्विटरविज़नः</strong></a> यह विश्व के नक्शे के द्वारा ट्विटर पर विभिन्न जगहों से भेजे जा रहे संदेशों के बारे में बताता है।</li>
<li><a href="http://www.twitterholic.com/" target="_blank"><strong>ट्विटरहॉलिकः</strong></a> 100 सवार्धिक फॉलोवर्स वाले प्रयोक्ताओं की पायदान।</li>
<li><a href="http://summize.com/" target="_blank"><strong>सम्माईज़ः </strong></a> ट्विटर का खोज इंजन, जुलाई 2008 में इस सेवा को ट्विटर ने खरीद लिया है।</li>
<li><a href="http://iconfactory.com/software/twitterrific" target="_blank"><strong>ट्विटेरिफिक</strong></a> , <strong>ट्विटरफॉक्स </strong>जैसे अनेक तंत्रांश व ब्राउज़र एक्सटेंशन आपको ट्विटर पर संदेश अपने कंप्यूटर से भेजने की सुविधा देते हैं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी मैशअप के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Mashups" target="_blank">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</div>
<p>ट्विटर के आने के बाद से कई अनियमित चिट्ठाकार तो खुश हुये ही, अनेक नियमित लेखकों ने भी अपने ब्लॉग लेखन में कमी की बात स्वीकारी है। अपने ब्लॉग पर लंबी उबाउ पोस्ट लिखने से ट्विटर पर नन्हा सा अपडेट देना कई लोगों को भाने लगा है। शायद इसकी वजह है ट्विटर पर अपना संदेश छोड़ना बेहद आसान है और इसमें समय बेहद कम लगता। इन संदेशों को प्राप्त करने वाले तुरंत लेखक को उसके प्रयोक्ता नाम के सामने खास @ चिन्ह लगाकर अपना जवाब भी दे सकते हैं। डंकन इस बात से सहमत हैं कि अनके निजी ब्लॉग पर लेखन कम हुआ है पर अपने मुख्य ब्लॉग पर उन्हें ट्विटर की बदौलत ज्यादा लिखने का मौका मिला है। ट्विटर को मुख्यतः ब्रेकिंग न्यूज़ या रोचक बातें तुरंत बताने के लिये प्रयोग करते हैं और यही खबरें बाद में उनके ब्लॉग पर विस्तार से लिखने का मसाला बन जाती हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Duncan Riley" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/duncan-riley-quote.jpg" border="0" alt="Duncan Riley" hspace="5" vspace="5" width="225" height="124" align="right" />हालांकि ट्विटर पर सब अच्छा ही है ऐसी बात तो नहीं है। खास तौर पर हालिया महीनों में जब ये सेवा अनिश्चित रूप से कई बार बंद पड़ गई और जब कभी पुनः शुरु की जाती तो अनेक फीचर्स बंद कर दिये जाते। यह अंदेशा गलत न होगा कि ट्विटर की खटारा हालत का फ़ायदा हाल ही में प्रारंभ एक अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवा <strong>प्लर्क </strong>को मिला है। डंकन यह बात मानते हैं कि लोगों ने अन्य सेवाओं का रुख किया है। &#8220;पर तकनीकी दिमाग वाले लोगों को प्लर्क उतना पसंद नहीं आ रहा। फ्रेंडफीड की बढ़त जारी है और हर रोज़ इससे नये लोग जुड़ते जा रहे हैं&#8221;, डंकन कहते हैं।</p>
<p>बात सिर्फ माइक्रोब्लॉगिंग की ही की जाय तो ढेर सारे लोगों को फॉलो करने वाले प्रयोक्ताओं को संदेशों की बाढ़ से निबटना सीखना होता है। कुछ प्रयोक्ता ऐसे भी होते हैं जो पचासों बार अपने बारे में संदेश भेजते हैं और सारी बातें व्यक्तिगत ही हों तो असंबद्ध व्यक्ति के लिये यह सरदर्दी का सबब भी बन सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर पर अपने बारे में बताने की उत्कंठा भी कई बार हदें पार कर जाती हैं। देखा जाय तो तो ब्लॉगिंग करने वालों का इस इच्छा से पहले भी नाता पड़ चुका होता है। समय पर ट्वीट न करने पर फॉलोवर्स की संख्या कम होने का अंदेशा रहता है, संदेश भेजते समय भी सोचना होता है कि क्या यह संदेश साझा करने लायक है या नहीं। जैसे जैसे आपके फॉलोवर्स की संख्या बढ़ती जाती है यह मानसिक दबाव भी बढ़ता चला जाता है।</p>
<p>तो ट्विटर पारंपरिक चिट्ठाकारी से कितना अलग है? गौरव मानते हैं कि माइक्रोब्लॉगिंग काफी अलग विधा है, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग और ब्लॉगिंग दोनों साथ जी सकते हैं। मैंने वर्डप्रेस के माइक्रोब्लॉगिंग आधारित प्रोलोग थीम के इस्तेमाल के बाद यह पाया कि ट्विटर महज़ एक अलहदा इंटरफेस वाली सेवा नहीं है।&#8221;। वाकई यह तुलना गैरवाजिब है। पारंपरिक ब्लॉगिंग का अपनी आकर्षण और पाठक वर्ग है, आखिरकार दुनिया में ऐसी सेंकड़ों बातें हैं जो 140 अक्षरों में समेटी नहीं जा सकती। किसी भी सर्जनात्मक विधा की ही तरह पारंपरिक निबंधात्मक ब्लॉगिंग का अंत होना असंभव ही है। मसलन, किसी ट्विटरर को उसके माइक्रोब्लॉग के आधार पर पुस्तक लिखने का प्रस्ताव मिले इस बात के आसार कम ही हैं।</p>
<p>ट्विटर की बेतकल्लुफ बातचीत के माध्यम के रूप में एक अलहदा जगह बन ही गई है, बातें जो हम दफ्तर में कॉफी मशीन के पास या नुकक्ड़ पर यार दोस्तों के साथ करते हैं। ट्विटर की सादगी उसकी पहचान है और इसने आनलाईन संपर्क के एक नये और खास माध्यम के रूप में अपनी जगह बना ली है।</p>
<div id="section-teaser">
<h2>और भी सेवायें हैं ट्विटर के सिवा</h2>
<p>जी हाँ, ट्विटर पर पूर्णतः निर्भर होना कितनी खराब बात है यह इसके प्रयोक्ताओं ने हाल ही में सीख लिया जब अत्यधिक प्रयोक्ताओं की संख्या से निबटने में ट्विटर का रूबी आधारित तंत्राँश नाकामयाब रहा। नतीजन ट्विटर सेवा अक्सर बंद रहती या इसके अनेक फ़ीचर बंद पड़े रहते। ट्विटर के अनेक विकल्प हैं जिनमें से कुछ की जानकारी निम्नलिखित हैः</p>
<table border="0" cellspacing="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#f2ecec">
<tbody>
<tr>
<td align="center">
<table border="0" width="99%" bgcolor="#ffffff">
<tbody>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank">पाउंस</a> इस माइक्रोब्लॉगिंग माध्यम में अतिरिक्त सुविधायें भी हैं। मैसेजिंग यानि संदेश भेजने पाने के अलावा प्रयोक्ता अपने परिचितों के साथ इसके द्वारा कड़ियाँ, फाईलें और इवेंट्स साझा कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank"><img title="Pownce" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/pownce_logo.jpg" border="0" alt="Pownce" hspace="2" vspace="2" width="150" height="46" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank">टंबलर</a> यह बेहद सरल और कुशल माइक्रोब्लॉगिंग  प्लैटफॉर्म है। इसके द्वारा भी ढेरों किस्म की चीज़ें, जैसे चित्र, उद्धरण, कड़ियाँ, गपशप और विडियो आदि प्रकाशित की जा सकती हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank"><img title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/tumblr-logo.gif" border="0" alt="Tumblr" hspace="2" vspace="2" width="127" height="36" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank">जाईकू</a> इसे ट्विटर का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी माना जाता है। सुविधाओं के मामले में दोनों में काफी समानता है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank"><img title="Jaiku" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/jaiku.gif" border="0" alt="Jaiku" hspace="2" vspace="2" width="79" height="62" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank">प्लर्क</a> इसमें भी ट्बलर जैसे अनेकों चीजें साझा करने की सुविधा है पर इसकी खास बात है इसका टाईमलाईन प्रारूप जो इसे बिल्कुल अनोखा बनाता है। प्लर्क में ट्विटर के फॉलोवर की जगह कर्मा प्वाइंट्स के ज़रिये लोकप्रियता मापी जाती है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank"><img title="Plurk" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/plurk.png" border="0" alt="Plurk" hspace="2" vspace="2" width="130" height="58" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%; text-align: left;" align="justify"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank">एसएमएस गपशप</a> यह वेबारू द्वारा निर्मित माइक्रोब्लॉगिंग प्लैटफार्म है जहाँ आप किसी समूह के सदस्य बनकर या अपना समूह बनाकर एसएमएस भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank"><img title="SMS Gupshup" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/smsgupshup.gif" border="0" alt="SMS Gupshup" hspace="2" vspace="2" width="140" height="38" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank">वकाओ</a> एसएमएस गपशप जैसे ही सुविधा के साथ ही टैगिंग व श्वेत श्याम चित्र भेजने की सुविधा भी। वकाओ से ट्विटर पर भी संदेश भेजे जा सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank"><img title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/vakow.gif" border="0" alt="Vakow" hspace="2" vspace="2" width="111" height="37" /></a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<p class=note><b>छपते छपते</b>: इस लेख को अंतिम रूप देते समय (बमार्फत <a title="Twitter Summize Deal confirmed" href="http://gigaom.com/2008/07/15/twitter-summize-deal-confirmed/" target="_blank">ओम मलिक</a>) खबर पक्की हुई है कि ट्विटर ने अपनी ही पर आधारित खोज ईंजन <a href="http://www.summize.com">सम्माईज़</a> को खरीद लिया है। सौदे की कीमत 80 लाख डॉलर से अधिक आँकी जा रही है।<br />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2176&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>IDN करेंगे हिन्दी का नाम रोशन</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-nidhi</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-nidhi#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 15 Jul 2008 07:50:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[DNS]]></category>
		<category><![CDATA[IDN]]></category>
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		<category><![CDATA[Punycode]]></category>
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		<description><![CDATA[जब जालपृष्ठ हिन्दी में है तो भला डोमेन नाम हिन्दी में क्यों नहीं? <strong>अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नाम (IDN)</strong> द्वारा ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी इंटरनेट प्रयोक्ताओं को इसका हल तो मिला ही है, भविष्य में संपूर्ण डोमेन नाम अपनी भाषा में लिख सकने के मार्ग भी प्रशस्त हो रहे हैं। पढ़िये आइडीएन के बारे में विस्तृत जानकारी देता <strong>वरुण अग्रवाल</strong> का लिखा, रमण कौल द्वारा अनूदित लेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img hspace="5" height="140" width="135" vspace="5" border="0" align="right" alt="Nidhi" title="Nidhi" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" /></p>
<p>
<div class=dropCap>इं</div>
<p>टरनेट हमारे जीवन का महत्वपूर्ण अंग बन चुका है। हमें जब भी कोई जानकारी खोजनी हो, चाहे वो स्थानीय पीवीआर में कौन सी फिल्म चल रही है यह मालूम करना हो, या हाल की सर्वाधिक लोकप्रिय पुस्तक के बारे में पता करना हो, हम बस उसे &quot;गूगल&quot; कर लेते हैं। यह हमारे जीवन का इतना महत्वपूर्ण अंग बन चुका है कि यदि इंटरनेट सेवा एक दिन के लिए भी ठप्प पड़ जाए तो हममें से अधिकांश अवसादग्रस्त हो जायें। पर यहाँ &quot;हम&quot; का तात्पर्य &#8211; &quot;हम&quot; भारतीयों से या &quot;हम&quot; अंग्रेज़ी पढ़े भारतीयों से है! जब देश में इंटरनेट के महत्व और विकास की बात होती है तो यही प्रश्न उठता है। हालाँकि विश्व के अंग्रेज़ी भाषियों में से एक बहुत बड़ी संख्या भारत में निवास करती है, फिर भी भारत की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो उन का प्रतिशत बहुत कम है।</p>
<p>इस समस्या को सुलझाने के लिए लोगों ने क्षेत्रीय भाषाओं में जालस्थल बनाने शुरू किए ताकि इंटरनेट अधिकाधिक भारतीयों तक पहुँचे। परंतु इस में एक अड़ंगा यह है कि जालस्थल तो क्षेत्रीय भाषाओं में है, पर प्रयोक्ता को जालस्थल का पता फिर भी अंग्रेज़ी के अक्षरों में ही याद रखना और टाइप करना पड़ता है, जो कोई खास आरामदेह बात तो है नहीं। इस समस्या का हल हो सकता है अन्तरराष्ट्रीयकृत डोमेन नाम यानि आइडीएन (IDN) द्वारा।</p>
<h1>आइडीएन, एक संक्षिप्त पृष्ठभूमि</h1>
<p>फिलहाल, इंटरनेट की कुछ तकनीकी कमियों के कारण, डोमेन के नाम केवल अंग्रेज़ी के सादे अक्षरों (प्लेन टेक्स्ट यानि ASCII या एस्की) में ही पंजीकृत किए जा सकते हैं (उदाहरणतः nirantar.org)। अन्तरराष्ट्रीय अक्षरों (उदाहरणतः उदाहरण.in जिसमें इस तरह के अक्षर हैं) को इंटरनेट की डोमेन नाम प्रणाली यानि डीएनएस (DNS) नहीं पहचान पाती, और इस कारण ये एक पंजीकृत नाम के रूप में डोमेन नाम रजिस्ट्री में नहीं रह सकते।</p>
<p>2003 में विकसित एक अन्तरराष्ट्रीय मानक &quot;प्यूनीकोड&quot; (Punycode) की मदद से ग़ैर-एस्की अक्षरों को ऐसे अक्षरों में परिवर्तित किया जा सकता है, जिन्हें डीएनएस समझ सके। इसके द्वारा ऐसी प्रक्रिया हासिल होती है जिससे ग़ैर-एस्की अक्षरों को डोमेन रजिस्ट्री और डीएनएस तो एस्की प्रारूप में ही देखता है, पर साधारण वेब प्रयोक्ता उसे मूल भाषा में देख पाता है। &quot;प्यूनीकोड&quot; ग़ैर-एस्की अक्षरों वाले शब्द को एक एस्की अक्षरमाला में अनूदित करता है, जिसे डोमेन नाम रजिस्ट्री में पंजीकृत किया जा सकता है और डीएनएस द्वारा समझा जा सकता है। अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नामों को एस्की में परिवर्तित करने के लिए सर्वप्रथम इन अन्तरराष्ट्रीय अक्षरों को, अन्तरराष्ट्रीय रूप से अनुमोदित भाषा प्राधिकरण द्वारा विकसित, एक सारणी की मदद से एस्की अक्षरों से संबद्ध करना पड़ता है।</p>
<p>उदाहरण.in का ही उदाहरण लें तो द्वितीय स्तर डोमेन (.in से पहले का शब्द) को प्यूनीकोड परिवर्तक द्वारा एस्की अक्षरमाला में परिवर्तित किया जाता है। फिर इस नाम के उपसर्ग के रूप में (&ldquo;xn-&ldquo;) अक्षर जोड़ दिए जाते हैं, ताकि डीएनएस इसे आइडीएन के रूप में पहचान सके। तो इस तरह, अन्तरराष्ट्रीय डोमेन नाम उदाहरण.in का एस्की नाम xn-p1b6ci4b4b3a.in बनता है।</p>
<p style="align:center;text-align:center;"><img hspace="3" height="226" width="490" vspace="3" border="0" align="middle" title="Unicode to Punycode conversion" alt="Unicode to Punycode conversion" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/idn-to-punycode.jpg" /></p>
<p>          <!-- Boxitem 1 starts-->
<div id="boxR" style="background:#F7F7F7;">
<h2>सुनहरा भविष्य भी</h2>
<p>जब जालपृष्ठ हिन्दी में है तो भला डोमेन नाम हिन्दी में क्यों नहीं? यह प्रश्न तो हम हिन्दी प्रेमियों के मन में सदा रहा ही है। देश में 4 करोड़ 10 लाख जाल प्रयोक्ता हैं और यह हमारी कुल आबादी का महज़ 4 प्रतिशत ही है। ज़ाहिर है कि प्रयोक्ताओं की यह संख्या तेज़ी से बढ़ रही है, पिछले साल ही यह बढ़त दर 25 फीसदी थी। स्पष्टतः अंग्रेजी का प्रभुत्व अब खत्म हो रहा है। <a target="_blank" href="http://www.eurekalert.org/features/kids/2004-02/aaft-wlw020805.php">विशेषज्ञों का अनुमान</a> है कि 2050 तक अंग्रेज़ी का कद चीनी, हिन्दी व उर्दु के सामने बेहद छोटा रह जायेगा (ग्राफ देखें)।</p>
<p><img hspace="2" height="151" width="230" vspace="2" border="0" align="middle" alt="Rise of Hindi &amp; Urdu" title="Rise of Hindi &amp; Urdu" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/language-rise-graph.jpg" /> 
       </p>
<p>तो हिन्दी अब आहिस्ता आहिस्ता जाल पर कदम बढ़ा रही है। हमारे देश की कोडयुक्त ccTLD यानि .in ने पहले ढाढस बंधाई और फिर आइडीएन से डोमेन नाम अपनी भाषा में लिखने के मार्ग प्रशस्त हुये। अक्तुबर 2007 से समूचे डोमेन नाम जिसमें <a target="_blank" href="http://en.wikipedia.org/wiki/TLD">TLD</a>(जालपते में डॉट के बाद आने वाले शब्द जैसे कॉम, आर्ग, बिज़, इंफ़ो) भी शामिल है का हिन्दी व तमिल समेत 11 लिपियों में परीक्षण भी प्रारंभ हुये। हिन्दी के लिये यह पता <a target="_blank" href="http://उदाहरण.परीक्षा">http://उदाहरण.परीक्षा</a> है। अन्य परीक्षण जालपते नीचे दिये चित्र में दिये हैं।</p>
<p><img hspace="2" height="236" width="225" vspace="2" border="0" align="middle" alt="Example.test URLs" title="Example.test URLs" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/example-test-urls.jpg" /> 
          </p>
<p>जुलाई 2008 में संपन्न ICANN की बैठक में यह निर्णय भी आ गया है कि 2009 से नये जेनेरिक टॉप लेवल डोमेन यानि gTLD  भी उपलब्ध होंगे और ये पूरी तरह गैर रोमन अक्षरों में लिखे जा सकेंगे। तो वो समय जल्द ही आने वाला है जब जालपते <a target="_blank" href="http://निरंतर.पत्रिका">http://निरंतर.पत्रिका</a> या <a target="_blank" href="http://नुक्ताचीनी.चिट्ठा">http://नुक्ताचीनी.चिट्ठा</a> जैसे पते दिखें।</p>
<p>आइडीएन जालपते फिलहाल तो .कॉम TLD के लिये ही उपलब्ध हैं और उसमें भी TLD रोमन लिपी में ही स्वीकार्य होता है। ध्यान दें कि अन्तर्राष्ट्रीय डोमेन नाम बुक कराते समय आपको भाषा भी चुननी पड़ती है जिसे डोमेन मिलने के बाद बदला नहीं जा सकता, दो लिपियों को मिलाकर भी नाम बनाना स्वीकृत नहीं है। फिलहाल सभी ब्राउज़र भी आइडीएन जालपते समझने में असमर्थ हैं। अगर आप  इंटरनेट एक्सप्लोरर 7 या फायरफॉक्स 3 इस्तेमाल करते हैं तो <a target="_blank" href="http://www.देबाशीष.com">http://www.देबाशीष.com</a> अथवा <a target="_blank" href="http://www.निरंतर.com">http://www.निरंतर.com</a> पर जाने पर आप सही जालपते तक पहुंच जायेंगे। पर इंटरनेट एक्सप्लोरर 5 या 6 या फायरफॉक्स 2 के प्रयोक्ता ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि इनमें गैररोमन लिपी से प्यूनीकोड बनाने की क्षमता नहीं होती।</p>
<p>पर पुराने ब्राउज़र का प्रयोग आइडीएन जालपते के प्रयोग करने की राह में बाधक भला कैसे बनें। आप चाहें तो हिन्दी डोमेन नाम का प्यूनीकोड खुद ही निकाल लें, यह काम उन्नत ब्राउज़र खुद ही करते हैं पर आप <a target="_blank" href="http://mct.verisign-grs.com/index.shtml">प्यूनीकोड कंवर्टर</a> जैसे जाल तंत्रांश से यह काम कर सकते हैं। अगर आप और भी उत्सुक हैं तो इस काम के लिये बने विशेष प्लगिन का इस्तेमाल कर सकते हैं, मसलन वेरिसाईन द्वारा बनाया <a target="_blank" href="http://www.idnnow.com/index.jsp">आईनैव</a> नामक मुफ्त प्लगिन जिससे आप अपने ईमेल में भी आइडीएन जालपतों का प्रयोग कर सकेंगे। आइडीएन का समर्थन करने वाले विभिन्न ब्राउज़रों व तंत्रांशों की एक विस्तृत सूची <a target="_blank" href="http://www.verisign.com/information-services/naming-services/internationalized-domain-names/page_002201.html">यहाँ दी गई है</a>।</p>
</p></div>
<p> <!-- Boxitem 1 ends--></p>
<p><a href="http://www.afilias.info/biographies/ram-mohan" target="_blank">राम मोहन</a>, जो एफिलियास के मुख्य तकनीक अधिकारी और उपाध्यक्ष हैं, बताते हैं, &quot;यह परिवर्तन प्रक्रिया डोमेन पंजीकर्ताओं अथवा डोमेन विक्रेताओं द्वारा, जो प्यूनीकोड या &quot;:xn-&quot; प्रारूप में नाम तैयार करने हेतु इंटरनेट इंजीनियरी टास्क फोर्स (IETF) के नेम-प्रेप (Nameprep) और स्ट्रिंग-प्रेप (Stringprep) मानकों का प्रयोग करते हैं, पूरी की जाती है। ग़ैर-एस्की नामों को पंजीकृत करने के पूर्व उसे प्यूनीकोड में परिवर्तित करना आवश्यक है क्योंकि डोमेन रजिस्ट्री केवल एस्की अक्षरों को ही संजो पाती है और इस बात को सुनिश्चित करती है कि हर नाम अनूठा हो। इसके अतिरिक्त रजिस्ट्री अपने उत्तरदायित्व में हर डोमेन के लिए एक ज़ोन फाइल बना कर प्रकाशित करती है और ज़ोन फाइल ही वह डाइरेक्ट्री प्राधिकरण है जो अन्त में हर नाम को इंटरनेट पर खोज पाने में मदद करती है। रजिस्ट्री दरअसल हर नाम को प्यूनीकोड प्रारूप में आरक्षित करती है, न कि मूल प्रारूप में, और सामंजस्य प्रक्रिया के तहत आइडीएन समर्थित अनुप्रयोग प्रयोक्ता और रजिस्ट्री के बीच उपयुक्त अनुवाद के दायित्व का निर्वाह करते हैं।&quot;</p>
<h1>आइडीएन के विकास में बाधाएँ</h1>
<p>आइडीएन की संभावनाएँ तो प्रबल हैं, पर अगले कदम पर आने वाली पेचीदगियाँ NIXI&nbsp; और इस विकास प्रक्रिया से संबन्धित अन्य संस्थाओं के लिए खासी चुनौती पेश करती हैं। भारत में 24 भाषाएँ हैं और 12 लिपियाँ (शायद किसी भी अन्य देश से अधिक), जिस का अर्थ है विभिन्न भाषाओं में मिलते जुलते अक्षरों और लिपियों का प्रयोग।</p>
<p>डाइरेक्टी के अध्यक्ष और कार्यकारी अधिकारी <a href="http://bhavin.directi.com/about-me/" target="_blank">भाविन तुराखिया</a> कहते हैं, &quot;यह बुनियादी समस्या है और इससे अन्य समस्याएं भी जन्मी जो आइडीएन को अपनाने की राह में रोड़ा बने हुये हैं। ये समस्याएं केवल तकनीकी ही नहीं है, बल्कि इनमें नीति निर्धारण के मुद्दे भी शामिल हैं। पर फिर भी, आइडीएन अंगीकरण की ओर भारत की पहल और इस दिशा में अब तक किये कार्य द्वारा यह अंदाज़ा तो लग जाता है कि भारत इसमें कितना बड़ा सुअवसर देख रहा है। हालाँकि भारत की जनसंख्या 100 करोड़ से कुछ अधिक ही है, फिर भी केवल 12.5 करोड़ ही अंग्रेज़ी बोलते हैं। 30 करोड़ प्रयोक्ताओं वाली हिन्दी सब से अधिक प्रयुक्त भाषा है, और उर्दू बोलने वाले 13 करोड़ हैं, यह संख्या दुगनी हो जाती है अगर पड़ौसी देशों को भी गिना जाए। इसलिये यदि आइडीएन को प्रभावशाली ढंग से अपनाया जाता है, तो कुल इंटरनेट प्रयोक्ता आधार दुगनी या तिगुनी संख्या भी छू सकता है। पर इस क्षेत्र में अभी बहुत काम बाकी है।&quot;</p>
<p>यूँ तो यह समस्या हर देश के लिए है, पर भारत के लिए यह समस्या कुछ ज़्यादा ही टेढ़ी है। चीन के साथ स्थिति की तुलना की जाए तो भारत के लिए कितना काम है, उस का पता चलता है। चीन में 160 करोड़ चीनी भाषी हैं, जो केवल दो ही लिपियाँ प्रयोग करते हैं, और उन में भी जापानी और कोरियाई भाषाओं से मिलते जुलते अक्षर भी हैं।</p>
<p>तुराखिया समझाते हैं, &quot;इन देशों में विकास प्रयत्नों के परिणाम काफी तेज़ी से आए हैं क्योंकि उनकी पेचीदगियों हमारे जितनी अधिक नहीं है। इस का अर्थ यह भी हुआ कि उन भाषाओं में आनलाइन मसौदा कहीं ज़्यादा है। तिस पर इन देशों में इंटरनेट की पहुँच कहीं ज़्यादा है, हालाँकि आइडीएन भारत में इसी पहुँच को बढ़ाने की दिशा में एक कदम है। हमारी वर्तमान पहुँच केवल 5.3% है, जबकि चीन की 15.9% है और जापान की 68.7%।&quot;</p>
<p>इंटरनेट एक्सप्लोरर 7.0 और फायरफाक्स 1.5 से आगे ब्राउज़र तो पहले ही आइडीएन का समर्थन करते हैं। समस्या यहाँ पहचान और समझ की नहीं है। भारत में पहले ही ऐसे जालपृष्ठ हैं जो हिन्दी, तमिल और अन्य भाषाओं में मसौदा उपलब्ध कराते हैं। इस के अतिरिक्त कई ईमेल भेजे जाते हैं, जिन में ग़ैर-एस्की अक्षर होते हैं।</p>
<p>मुख्य चुनौती यह है कि डोमेन नाम ही एस्की के परे नहीं जा पाए हैं, जिस के फलस्वरूप प्रयोक्ताओं को जालस्थल के मसौदे और पते के बीच भाषा बदलनी पड़ती है। &quot;अब, जब कि इस परिवर्तन को क्रियान्वित करने की तकनीक उपलब्ध है, हम नीति संबन्धी मुद्दों पर काम कर रहे हैं। जब दोनों पूरे हो जाएँगे, तब प्रयोक्ताओं को पूरी तरह (या लगभग पूरी तरह) अपनी भाषा में संवाद करने का एक पूर्ण और सरल रास्ता मिल जाएगा।&quot;, राम मोहन बताते है।</p>
<h1>आगे की राह</h1>
<p>मोबाइल उद्योग के साथ तुलना की जाए तो, उस की प्रयोक्ता संख्या इंटरनेट के मुकाबले तीन गुणा हैं। इस संख्या में तब्दीली लाने के लिए यह ज़रूरी है कि कुछ मुद्दों को सुलझाया जाए &#8211; जिनमें से एक इंटरनेट की उपलब्धि और कीमत से जुड़ा है। चूँकि दूरसंचार की मूल व्यवस्था इंटरनेट सेवा के मूल्य पर सीधा असर डालती है, यह ज़रूरी है कि सरकार पूरे देश में इसके विकास की राह आसान बनाए। आइडीएन पर केन्द्रित प्रयासों से काफी अपेक्षायें हैं और यह सही दिशा में उठाया गया कदम है।</p>
<p>आइडीएन इंटरनेट में लोकतंत्रीकरण लाने हेतु एक आवश्यक कारक है। तुराखिया कहते हैं &quot;ट्रेडमार्क धारकों के लिए प्राथमिक पंजीकरण 2008 की प्रथम तिमाही में उपलब्ध होने की आशा है। पहले ही ICANN द्वारा 13 भाषाओं में परीक्षण नाम लागू किये गए हैं, जिनमें देवनागरी और तमिल लिपियाँ शामिल हैं। जहाँ तक आम तौर पर अपनाए जाने का प्रश्न है, उस में अभी देर लग सकती है, क्योंकि देश का अधिकतर भाग अभी इंटरनेट के इस्तेमाल से अछूता है, और जहाँ प्रयोग हो भी रहा है, वहाँ इस बात की मुश्किल से समझ है कि दूसरी भाषा में इसे कैसे प्रयोग किया जाए।&quot;</p>
<p>मोहन कहते हैं, &quot;हमारा विचार है कि इंटरनेट का विकास सीधा उस के प्रयोग से जुड़ा है। दूरसंचार तेज़ी से इसलिए बढ़ रहा है क्योंकि आम आदमी को इसका रोज़मर्रा का इस्तेमाल दिखता है। मैं मानता हूँ कि NeGP (राष्ट्रीय अनु-प्रशासन योजना) जैसी परियोजनाएँ और सभी सरकारी सेवाओं को इंटरनेट पर उपलब्ध कराने के राज्य आधारित प्रयास आम आदमी को लाभ पहुँचाएँगे। इंटरनेट की पहुँच इसलिए भी कम है कि अधिकतर लोग इसे पी.सी. या लैपटॉप द्वारा प्रयोग की जाने वाली सेवा के रूप में देखते हैं।&quot; इस स्थिति में नाटकीय परिवर्तन आने वाला है। अगली लहर आएगी भारत में मोबाइल फोनों पर इंटरनेट सेवा की और इससे मोबाइल फोन की बिक्री और इसके इस्तेमाल में अतिशय वृद्धि होगी।</p>
<p>भारत पहला ऐसा राष्ट्र बनने का सामर्थ्य रखता है, जो पी.सी. और लैपटॉपों पर आधारित &quot;इंटरनेट 1.0 से&quot;, मोबाइल फोनों पर आधारित &quot;इंटरनेट 2.0&quot; की ओर छलाँग लगाएगा।</p>
<p>चूँकि अधिकतर भारतीय अपनी भाषा को प्राथमिकता देते हैं, आइडीएन का लागूकरण सकारात्मक कदम ही होगा, और यह तथ्य दूसरे कारकों के साथ मिल कर इंटरनेट को अपनाने में तेज़ी लाने में मदद करेगा। आशा है कि आइडीएन की आमद के साथ हमें इंटरनेट को केवल देश के अंग्रेज़ी भाषी लोगों से जोड़ कर देखना नहीं पड़ेगा।</p>
<p class=note>वरुण के एक्सप्रेस कंप्यूटर में प्रकाशित मूल लेख का अनुवाद किया <strong>रमण कौल</strong> ने। ग्राफिक्स व अतिरिक्त सामग्री: <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong>। आधार चित्र इंटरनेट से साभार।</p>
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		<item>
		<title>ओपन आईडीः ताले अनेक, चाबी सिर्फ एक</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 07:53:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जितने जालस्थल उतने लॉगिन, अपने यूज़रनेम और पासवर्ड की जोड़ी याद रखना सरदर्दी है। शुक्र है कि सिंगल साईन आन की तर्ज़ पर अंतर्जाल पर भी एक प्रणाली आकार ले रही है, जिसका नाम है ओपन आईडी। निधि में पढ़ें आईडेन्टिटी 2.0 और ओपन आईडी की जानकारी देता <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/story-big-openid.jpg" border="0" alt="openid" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class=dropCap>वे</div>
<p>ब 2.0 अंतर्जाल का उभरता हुआ संभावी स्वरूप है, ऐसा रूप जहाँ प्रयोक्ता की तूती बोलती है। क्योंकि यह है ही ऐसे जालस्थलों का तानाबाना जहाँ काफी तादात में मसौदा यूसर जेनरेटेड यानि प्रयोक्ताओं के द्वारा ही उत्पादित है। जाहिर है जहाँ प्रयोक्ताओं पर निर्भरता है वहाँ उनकी लॉगिन की जानकारी, उनकी पसंद, यानि उनकी तमाम जानकारियाँ सहेज कर रखनी पड़ती हैं। हर प्रयोक्ता की अपनी पहचान है और अपनी जानकारियाँ। जालस्थल और प्रयोक्ता दोनों के लिये ही जटिलतायें बढ़ती जाती हैं। न जाने कितने ही जालस्थल हैं और हर एक आपका लॉगिन चाहता है। और आपकी सरदर्दी है हर जालस्थल का यूसरनेम और पासवर्ड की जोड़ी को याद रखना। डिलिशियस, वर्डप्रेस, डिग्ग, ब्लॉगर, जितनी आपकी पसंद के जालस्थल उतने ही लॉगइन, उतनी ही चकल्लस।</p>
<p>सन 2005 में संभवतः इसी सरदर्दी से मुक्ति का उपाय सोचते हुये <a title="Live Journal" href="http://www.livejournal.com/" target="_blank">लाईवजर्नल</a> के संस्थापक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Brad_Fitzpatrick" target="_blank">ब्रेड फिट्जपैट्रिक</a> ने सृजन किया &#8220;<strong><a href="http://openid.net/" target="_blank">ओपन आईडी</a></strong> &#8221; का। ओपन आईडी प्रणाली के सहलेखक है वेरीसाईन के डेविड रिचर्डसन, <a href="http://janrain.com/" target="_blank">जैनरेन</a> के जोश होयट और <a href="http://www.sxip.com/" target="_blank">स्किप</a> के डिक हार्डी। ओपन आईडी एक <strong>डिस्ट्रिब्युटेड आइडेन्टिटी मेनेजमेंट सिसटम</strong> यानी विकेंद्रित पहचान प्रबंधन प्रणाली है। इसे <strong>डीसेन्ट्रलाईस्ड <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Single_sign-on" target="_blank">सिंगल साइन आन</a> प्लेटफार्म</strong> भी कहा जा सकता है।</p>
<h1>ओपन आईडी से आसान होंगी राहें</h1>
<p>सिंगल साईन आन प्रणाली का फायदा यह है कि एक जगह लॉगिन करने के बाद प्रयोक्ता को अनुमति और अधिकार के मुताबिक विभिन्न अनुप्रयोगों के प्रयोग की सुविधा दी जा सकती है, वह भी बिना लॉगिन जानकारी दुबारा मांगे। उदाहरणार्थ गूगल में लॉगिन के पश्चात आप गूगल के तमाम अनुप्रयोगों जैसे जीमेल, कैंलेंडर, स्प्रेडशीट, रीडर, ब्लॉगर, आरकुट इत्यादि को दुबारा लॉगिन किये बगैर प्रयोग कर सकते हैं। इसी तरह याहू पर लॉगिन करने के बाद आप डिलिशीयस, याहू मेल या जियोसीटिज़ के जाल अनुप्रयोग दुबारा लॉगिन किये बिना इस्तेमाल करते हैं। इसका कारण सिर्फ यही है कि प्रयोक्ताओं की जानकारी हर अनुप्रयोग के लिये अलग अलग जमा करने की बजाय एक ही स्थान पर संजो कर रखी जा सकती है और प्रयोक्ता को भी बार बार रजिस्टर या लॉगिन करने का दबाव नहीं रहता। अंतर्जाल पर तो प्रयोक्ता समय की कमी और स्पैमिंग जैसे खतरों के कारण रजिस्टर करने से यथासंभव बचने का प्रयास करते हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">ओपन आईडी का मंतव्य है कि आपको हर दूसरी साईट पर लॉगिन करने के लिये वहाँ रजिस्टर करना या अपना खाता बनाने की दरकार न हो।</div>
<p>याहू, गूगल जैसे बड़े जालस्थल यह सुविधा अपने समूह की साईटों तक ही सीमित रखते हैं। ओपन आईडी इसी किस्म की प्रणाली है जिससे अंतर्जाल पर विभिन्न जालस्थलों का उपयोग इसी तरह किया जा सकेगा। ओपन आईडी प्रणाली में व्यक्ति की पहचान यूज़रनेम/पासवर्ड यानी प्रयोक्तानाम/कूटशब्द के बजाय किसी यू.आर.एल (जैसे की आपके ब्लॉग का पता) या एक्स.आर.आई से होता है। बस चाहिये कोई ओपन आईडी प्रोटोकॉल समझने वाला <strong>आइडेन्टिटी प्रोवाइडर</strong> या प्रदाता। ओपन आईडी का मंतव्य है कि आपको हर दूसरी साईट पर लॉगिन करने के लिये वहाँ रजिस्टर करना या अपना खाता बनाने की दरकार न हो। यदि वह जालस्थल ओपन आईडी समर्थित है। ओपन आईडी की ज़बान में ऐसे जालस्थल को रिलायिंग पार्टी कहते हैं। तो आप अपनी ओपन आईडी पहचान के द्वारा वहाँ बिना पंजीकृत हुये लॉगिन कर सकते हैं।</p>
<p>ओपन आईडी (या फिर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Windows_CardSpace" target="_blank">विनडोस कार्डस्पेस</a> ) के मूल में जो अवधारणा है उसे <strong><a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Identity_2.0" target="_blank">आईडेन्टिटी 2.0</a></strong> या डिजिटल आईडेन्टिटी कहा जाता है। ओपन आईडी का दूसरा अवतार जिस चढ़ते सूरज की रौशनी में पनप रहा है आईडेन्टिटी 2.0 उसी बढ़त का हिस्सा है। इसका उद्देश्य यही है कि अंतर्जाल पर अपनी पहचान सिद्ध करने का तरीक़ा असल ज़िन्दगी से मिलता जुलता हो, यानि कि जिस तरह से आप अपनी ड्राइविंग लाईसेंस या वोटर आईडी कार्ड का इस्तमाल करते हैं, ठीक वैसे ही जाल पर भी अपना परिचय सिद्ध कर सकें।</p>
<h1>कैसे काम करता है ओपन आईडी?</h1>
<p>तो आखिर ये ओपन आईडी है क्या। अब तक आपको अंदाजा तो हो ही गया होगा कि ये हर साईट पर अलग अलग प्रयोक्तानाम और पासवर्ड के प्रयोग से जुदा प्रणाली है। आईडेन्टिटी 2.0 का मूलमंत्र ही है, &#8220;एक प्रयोक्ता, एक पहचान&#8221;। ओपन आईडी के मामले में यह पहचान होती है एक यू.आर.एल या जालस्थल का पता (ओपन आईडी संस्करण 2 में एक्स.आर.आई भी)। आपको अपना कूटशब्द, ईमेल पता या कोई दूसरी जानकारी देने की दरकार नहीं। जालस्थल आपके बारे में और जानकारी की माँग रख सकते हैं पर आप वही जानकारी दें जिसे स्वयं आप जाहिर करना चाहतें हैं।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/OpenId-reg-1.jpg" border="0" alt="Image" hspace="8" vspace="5" width="300" height="157" align="left" />ओपन आईडी ला प्रयोग करने वाले जालस्थल पूर्णतः ओपन आईडी पर आधारित लॉगिन प्रणाली लागू करते हैं या फिर परंपरागत लॉगिन विधि और ओपन आईडी से लॉगिन दोनों की सुविधा देते हैं। ओपन आईडी पर आधारित लॉगिन विधि के फार्म में आप देखेंगे कि केवल एक ही फील्ड या खाने की ज़रूरत होगी जिसमें आप अपनी सार्वजनिक डिजीटल पहचान यानि आपकी ओपन आईडी भरेंगे, जालस्थल ऐसे फार्म की आसान पहचान के लिये ओपन आईडी का प्रचलित चिन्ह दर्शा सकते हैं (संलग्न चित्र देखें)।</p>
<div id="pullQuoteR">आईडेन्टिटी 2.0 का मूलमंत्र ही है, &#8220;एक प्रयोक्ता, एक पहचान&#8221;।</div>
<p>अपनी ओपन आईडी भर कर फार्म सब्मिट करने पर रिलायिंग पार्टी यानि यह जालस्थल (आसानी के लिये हम इसे कखग कहकर पुकारते हैं) जिस पर आप लॉगिन करना चाह रहे हैं आपकी पहचान के वैधिकरण हेतु आपको आइडेन्टिटी प्रोवाइडर के जालस्थल पर भेज देती है। यदि आप इस जालस्थल पर लॉग्ड इन नहीं है तो आपको लॉगिन करने के लिये कहा जायेगा। लॉगिन के पश्चात आप से पूछा जायेगा कि क्या आप &#8220;कखग&#8221; पर इस सार्वजनिक डिजीटल पहचान का प्रयोग करना पसंद करेंगे। इस समय आप यह तय कर सकेंगे कि &#8220;यह विश्ववास&#8221; कितने दिन रहे, यानि आप यह तय कर सकेंगे कि बिना दुबारा यह प्रक्रिया दोहराये कितने दिनों तक आप &#8220;कखग&#8221; पर सीधे जा सकेंगे और कौन सी जानकारी &#8220;कखग&#8221; को दी जा सकती है (मसलन कोई सोशीयल बुकमार्किंग साईट आपसे ईमेल आईडी के अलावा कोई आपका नाम भी जानना चाह सकती है)। आइडेन्टिटी प्रोवाइडर आपका यह &#8220;ट्रस्ट प्रोफाईल&#8221; सुरक्षित रखेंगे और ज़रुरत पड़ने पर इस्तेमाल करेंगे। वेरीसाईन जैसे आइडेन्टिटी प्रोवाइडर यह सुविधा देते हैं कि ज़रुरत के अनुसार आप अलग अलग जालस्थलों के लिये अलग ट्रस्ट प्रोफाईल बना कर रख सकें और विभिन्न अपनी ओपन समर्थित जालस्थलों पर अपनी आवाजाही का रिकार्ड भी देख सकें।</p>
<p>एक बार वैधिकरण हो गया तो आइडेन्टिटी प्रोवाइडर आपको वापस &#8220;कखग&#8221; पर भेज देता है जहाँ आप किसी साधारण पंजीकृत प्रयोक्ता की भांति लॉगिन हो गये होंगे। यदि वैधीकरण असफल रहा तो &#8220;कखग&#8221; जालस्थल आप को यह सूचना दे देगा।</p>
<p>यह पूरी प्रक्रिया अगले चित्र में विस्तार से समझायी गयी है।</p>
<div style="text-align: center"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 2px; margin-bottom: 2px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/story-small-openid.jpg" border="0" alt="How Open ID works" hspace="5" vspace="2" width="497" height="353" /></div>
<h1>ओपन आईडी का उपयोग</h1>
<table border="0" cellspacing="0" cellpadding="0" width="100%">
<tbody>
<tr>
<td rowspan="2" align="left" valign="top">ओपन आईडी का प्रयोग करना शुरु करने के लिये आपको सबसे पहले तो अपना खाता खोलना होगा। आप <a href="http://openid.net/wiki/index.php/OpenIDServers" target="_blank">यहाँ वर्णित</a> किसी भी ऐसे आइडेन्टिटी प्रोवाइडर के यहाँ पंजीकृत हो सकते हैं। यह किसी आम जालस्थल पर पंजीकरण जैसा ही है जहाँ आपका एक प्रयोक्ता नाम, जो साधारणतः आपका ओपन आईडी ही होगा, और पासवर्ड होता है।</p>
<p>वेरीसाईन लैब जैसे कुछ स्थल आपको अपनी पहचान के लिये अपना चित्र भी अपलोड करने को कहते हैं, जिसका लाभ यह है कि अन्य जालस्थलों से जब आपको आइडेन्टिटी प्रोवाइडर के जालस्थल पर वैधिकरण हेतु भेजा जाये तो आप यह पहचान कर सकें कि वेरीसाईन ही है न कि उस का रुप धर कर आपको बेवकूफ बनाने वाला कोई फिशिंग जालस्थल।</p>
<p>एक बार आपका ओपन आईडी मिल जाये तो बस आप ऐसे किसी भी जालस्थल पर लॉगिन कर सकेंगे जहाँ ओपन आईडी को समर्थन दिया जाता हो। अधिकांशतः ऐसे जालस्थल की पहचान ओपन आईडी के चिन्ह से लगाया जा सकता है।</td>
<td style="width: 310px;" align="right" valign="top"><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 2px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/OpenId-reg-2.jpg" border="0" alt="Image" hspace="2" vspace="2" width="300" height="121" align="middle" /></p>
<p><strong>आइडेन्टिटी प्रोवाइडर ही एक मात्र जालस्थल है जहाँ आपको परंपरागत रूप से लॉगिन करना है, शेष अन्य ओपन आईडी समर्थित जालस्थलों पर आप इसी डिजीटल पहचान से सीधे लॉगिन कर सकते हैं।</strong></td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 310px;" align="right" valign="top"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/OpenId-reg-3.jpg" border="0" alt="Image" hspace="2" vspace="2" width="300" height="124" align="middle" /></p>
<p><strong>हर बार पंजीकरण का कोई झंझट नहीं!</strong></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<h1>अपने जालपते को अपनी ओपन आईडी कैसे बनायें</h1>
<p>यदि आपका अपना जालस्थल है जिसके पृष्ठ आप बदल सकते हैं तो आप इस जालस्थल के पते तो अपनी ओपन आईडी के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। कैसे कर सकते हैं यह जानने के पहले आपके मन में शर्तिया यह सवाल ज़रूर उठा होगा कि इससे क्या लाभ होगा। ओपन आईडी का पता तो पंजीकृत होने पर आइडेन्टिटी प्रोवाइडर हमें देता ही है। पर यकीन मानिये अपने जालपते को अपनी ओपन आईडी बनाने में फायदा है। पहला लाभ तो यह कि अगर किसी कारणवश यह आइडेन्टिटी प्रोवाइडर अपनी सेवायें बंद कर देता है, या आप स्वयं ही ऐसे किसी सेवा प्रदाता से अलग होना चाहते हैं तो यह बड़ा आसान होगा, बस आपको अपने जालस्थल में एक जगह परिवर्तन करना होगा, आपकी ओपन आईडी वही की वही रहेगी। दूसरा यह कि आप विभिन्न आइडेन्टिटी प्रोवाइडर जालस्थलों के द्वारा दी गई आइडेन्टिटी का इस्तेमाल कर सकते हैं अपने खुद के पते के साथ, हर किसी की ओपन आईडी याद रखने की दरकार नहीं।</p>
<p>यह करना बड़ा ही आसान है। उदाहरण के लिये आपका ओपन आईडी खाता http://yourname.myopenid.com/ है पर आप अपना जालस्थल पता http://yourname.com/ का प्रयोग करना चाहते हैं। बस अपने जालस्थल, जिसका पता आप अपनी ओपन आईडी के रूप में प्रयोग करना चाहते हैं, के मुखपृष्ठ (मसलन index.html) में &lt;HEAD&gt;&lt;/HEAD&gt; के मध्य निम्नलिखित चस्पा कर दें।</p>
<blockquote style="font-family: courier;"><p>&lt;link rel=&quot;openid.server&quot; xhref=&quot;http://youropenidserver.com/serverurl&quot;/&gt;</p>
<p>&lt;link rel=&quot;openid.delegate&quot; xhref=&quot;http://yoururl.youropenidserver.com&quot;/&gt;</p>
<p>&lt;meta http-equiv=&quot;X-XRDS-Location&quot; content=&quot;http://yoururl.youropenidserver.com/xrds&quot;/&gt;</p></blockquote>
<p>ओपन आईडी सर्वर आपके आइडेन्टिटी प्रोवाइडर का ही पता है। जो लिंक टैग हैं वे ओपन आईडी 1.x के लिये काम आते है जबकि मेटा टैग उभरते हुये ओपन आईडी 2.0 के लिये। ये दोनों रहें तो आपका काम आसान हो जायेगा।</p>
<h1>उज्जवल भविष्य की अपेक्षा</h1>
<p>ओपन आईडी का आहिस्ता आहिस्ता नामचीन जालस्थलों पर प्रचलन बढ़ता जा रहा है, <a href="http://www.technorati.com" target="_blank">टेक्नोराती</a>, <a href="http://www.wikipedia.com" target="_blank">विकीपीडिया</a>, <a href="http://www.sixapart.com/" target="_blank">सिक्सअपार्ट</a> (जिन्होंने लाईवजर्नल का अधिग्रहण भी किया), <a href="http://www.verisign.com/" target="_blank">वेरिसाईन</a> जैसे अनेकों भारीभरकम कंपनियों का वरदहस्त इस पर है। व्यवसायिक पहलू ही शायद ओपन आईडी की बढ़त का प्रमुख कारक है। आर. एस.एस की तरह लोगों को ओपन आईडी की हथेली में बिज़नेस के अवसर की रेखायें स्पष्ट दिख रही हैं। फिलहाल ओपन आईडी गिनती के जालस्थलों पर ही इस्तमाल हो रहा है। <a href="http://zooomr.com/" target="_blank">जूमर</a> एकमात्र ऐसी साईट है पूर्णतः ओपन आईडी का प्रयोग होता है, <a href="http://localhost/joomla/http:/www.Gro.ps">Gro.ps</a> और <a href="http://www.wikitravel.com" target="_blank">विकीट्रैवल</a> जैसे कुछ रूढ़ीवादी जालस्थल ओपन आईडी और पारंपरिक लॉगिन विधी दोनों का ही विकल्प प्रदान करते हैं। ओपन आईडी के 2.0 वर्ज़न के आने के बाद उम्मीद है कि कई जालस्थल इस प्रणाली को अपनाने हेतु प्रेरित होंगे।</p>
<div id="pullQuoteR">ओपन आईडी का आहिस्ता आहिस्ता नामचीन जालस्थलों पर प्रचलन बढ़ता जा रहा है।</div>
<p>आईडेन्टिटी की राह बहुत आसान हो ऐसा नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट कार्डस्पेस और ओपन आईडी का पहुँचमार्ग अलग अलग है, तो निश्चित रूप से एकसमान मानक आधारित मॉडल की सख़्त जरुरत होगी। आईडेन्टिटी 2.0 के तिलिस्म के प्रभावी होने के लिये प्रयोक्ताओं के मन में अपनी डिजीटल व्यक्तित्व बनाने की इच्छा होना तो ज़रुरी है ही पर उससे अधिक जरूरी है कि सेवा प्रदाता इसे अपनायें क्योंकि उन्हें अपने जालस्थल में बदलाव करने होंगे। कुछ लोगों ने तो <a href="http://iwantmyopenid.org/bounty" target="_blank">50,000 डॉलर बाउन्टी</a> कार्यक्रम भी शुरु किया है जिसके अतर्गत ओपन आईडी की सुविधा देने वाले पहले दस मुक्त स्रोत अभिकल्पों को 5000 डॉलर का इनाम मिलेगा।</p>
<p><!-- BOX STORY RIGHT --></p>
<div style="margin: 10px; padding: 10px; background: #e5e5e5 none repeat scroll 0% 0%; width: 99%;">
<h1>खुल जा सिम सिम</h1>
<h3>ओपन आईडी का प्रयोग शुरु करने के तुरतफुरत जुगाड़</h3>
<p>अरे यह क्या? यह लेख आपने अभी पूरा पढ़ा नहीं और आप को ओपन आईडी का इस्तेमाल करने की तीव्र इच्छा होने लगी? यह तो बड़ी अच्छी बात है। आईये हम आपको ओपन आईडी के राजमार्ग की और जाती पगडंडी की राह बता देते हैं।</p>
<p><img style="padding:10px;margin:10px" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/OpenID-wordpress.jpg" border="0" alt=" " width="225" height="143" align="right" /><strong>ओपन आईडी द्वारा लॉगिन</strong>: यदि आप वर्डप्रेस का इस्तेमाल करते हैं तो आप अपने पाठकों को टिप्पणी करने के लिये ओपन आईडी द्वारा लॉगिन की सुविधा दे सकते हैं। इसके लिये आप <a href="http://verselogic.net/projects/wordpress/wordpress-openid-plugin/" target="_blank">वर्डप्रेस ओपन आईडी प्लगईन</a> का प्रयोग करें। यह वर्डप्रेस के नये 2.x संस्करण के साथ काम करता है। इसी काम के लिये एक और प्लगइन <a href="http://the-notebook.org/12/01/2006/openid-comments-for-wordpress/" target="_blank">यहाँ</a> उपलब्ध है।</p>
<p><strong>अपना ओपन आईडी आईडेंटीफायर:</strong> आप अपने ब्लॉग के पते को अपना ओपन आईडी आईडेंटीफायर बना सकते हैं। उदाहरण के लिये लेखक अपने ब्लॉग http://nuktachini.debashish.com का पता अपनी ओपन आईडी पहचान के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं। यह काम एक अन्य प्ल्गइन <a href="http://eran.sandler.co.il/openid-delegate-wordpress-plugin/" target="_blank">ओपन आईडी डेलिगेट</a> से संभव है। यह प्लगइन सेट किये जाने के पश्चात आपके ब्लॉग के एचटीएमएल में उचित लिन्क व मेटाटैग सम्मिलित कर देता है जिसमे आपके वास्तविक ओपन आईडी सर्वर की जानकारी होती है <em>(मुख्य लेख में भी देखें: &#8220;अपने जालपते को अपनी ओपन आईडी कैसे बनायें&#8221;)</em>।</p>
<p><img style="padding:10px;margin:10px" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/OpenID-technorati.jpg" border="0" alt=" " width="240" height="116" align="left" /><strong>टेक्नोराती में क्लेम:</strong> आप टेक्नोराती में अपना ब्लॉग क्लेम करने के लिये अपनी ओपन आईडी का प्रयोग कर सकते हैं।</p>
<p><strong>ओपन आईडी जालस्थलों का प्रयोग:</strong> आप ओपन आईडी का समर्थन करने वाले जालस्थलों पर ओपन आईडी द्वारा लॉगिन कर उनका प्रयोग कर सकते हैं। ऐसे जालस्थलों की सूची बढ़ रही है और <a href="https://www.myopenid.com/directory" target="_blank">विशेष निर्देशिकाओं</a> में उपलब्ध है। ज़ाहिर है कि आप लॉगिन फार्म पर ओपन आईडी का चिन्ह और विवरण देख कर भी यह पता लगा सकते हैं।</div>
<p><!-- BOX STORY RIGHT END --></p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2170&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1206-nidhi-openid/feed</wfw:commentRss>
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		</item>
		<item>
		<title>सूचना संचयन की इन्द्रधनुषी तकनीक</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-nidhi-rainbow</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-nidhi-rainbow#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 07:13:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>ई-स्वामी</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006nidhirainbow/</guid>
		<description><![CDATA[केरल के एक एमसीए के छात्र <strong>सैनुल</strong> ने <strong>रेनबो</strong> नामक ऐसी तकनीक का ईजाद किया है जिसमें डेटा न केवल कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर स्टोर यानि संग्रहित किया जा सकता बल्कि यह संग्रहण रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में किया जाता है। इस अधिक क्षमता, कम कीमत वाले पर्यावरणानुकूल और आसान माध्यम की रोचक जानकारी दे रहे हैं <strong>ईस्वामी</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" title="Rainbow Technique" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/story-big-rainbow.jpg" border="0" alt="Rainbow Technique" vspace="5" width="500" height="250" align="top" /></p>
<div class="dropCap">दु</div>
<p>निया के सर्वकालिक प्रभावशाली व्यक्तियों की कतार में ईसा मसीह, बुद्ध और न्यूटन जैसे नामों के बाद प्रिंटिग प्रेस के जनक जोहैन्न गुटनबर्ग का नाम <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/The_100">आठवें स्थान</a> पर है। महान गौरव दिलवाने वाली इस चौदहवीं सदी की खोज की सफ़लता का आधार था कागज़ &#8211; एक महीन, सस्ता, सुलभ माध्यम &#8211; जिसे अंकित और जिल्दबंद कर के बनतीं थीं किताबें और उनकी प्रतिलिपियां। मुद्रण मशीन ने दुनिया को बदल कर रख दिया।</p>
<p>समय ने करवट बदली और बीसवीं सदी में भविष्योन्मुखी विचारक <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Paperless_office">पेपरलेस ऑफ़िस</a> या कागजमुक्त दफ़्तरों की कल्पना करने लगे। दस्तावेज़ों को सहेजने के लिए कागज़ का स्थान वैद्युत-चुंबकीय या अर्धचालक (सेमिकंडक्टर) आधारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम लेने लगे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में अब फ़िर संभव है की कागज़ या उस जैसा कोई सस्ता माध्यम ही इलेक्ट्रानिक सूचना क्रांति में भी एक नए युग का सूत्रपात कर दे।</p>
<div id="pullQuoteR">रेनबो तकनीक की ख़ासियत यह है कि डेटा न केवल कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर संग्रहित किया जा सकता बल्कि यह संग्रहण रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में किया जाता है।</div>
<p>अगर एक भारतीय छात्र का शोध सफल सिद्ध हुआ तो संभव है कि कंप्यूटर जगत में और क्रांतिकारी परिवर्तन आयें। किसी फ़्लॉपी डिस्क, सीडी या डी.वी.डी के स्थान पर सामान्य कागज़ जैसे माध्यम पर सूचना के भंडारण की यह नई तकनीक खोजी है सैनुल अबिदीन ने। सैनुल केरल के मालापुरम संभाग में कुट्टिपुरम के एम.ई.एस अभियांत्रिकी महाविद्यालय में एम.सी.ए अंतिम वर्ष के छात्र हैं। इनकी इस तकनीक को &#8220;रेनबो टेक्नोलॉजी&#8221; नाम दिया गया है। यह कार्य करने में उन्हें 6-7 माह लगे और अभी भी कार्य प्रगति पर है।</p>
<p>रेनबो तकनीक के बारे में विशेष बात यह ही नहीं है कि डेटा यानि सूचना कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर जमा की जा सकती है &#8211; वरन यह भी की यह जमा की जाती है रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में। ये तकनीक शून्य और एक के माध्यम से सूचना को रखने की द्बिचर अंकीय (बायनरी डिजिटल) तकनीक से आधारभूत रूप से निश्चित ही भिन्न है। पर ऐसा अनोखा विचार उन्हें सूझा कैसे, सैनुल कहते हैं, &#8220;मानव की आंख में 16 बिलियन कोशिकाएं [रॉड और कोन - छडी और शंकू के आकार की] प्रकाश और रंगों के माध्यम से वस्तुओं को पहचानती हैं। तो मैंने सोचा कि हम इसका बिल्कुल उलट कर के सूचना को रंगों के माध्यम से क्यों ना प्रदर्शित करें।&#8221;</p>
<div id="boxL">
<h2><strong>होनहार बिरवान</strong></h2>
<p><strong>सैनुल अबिदीन</strong> केरल के मालापुरम संभाग में कुट्टिपुरम के <strong>एम.ई.एस अभियांत्रिकी महाविद्यालय</strong> में एम.सी.ए अंतिम वर्ष के छात्र हैं। संप्रति वे स्वैच्छिक प्रोग्रामर के रूप में कार्यरत हैं। सैनुल मूलतः केरल में कोट्टकल के करीब करिंगप्पर, मलप्पुरम के निवासी हैं। इनके पिता का नाम है श्री नन्नट बाप्पू (हुसैन) और मां का नाम श्रीमती कुंजीमोल है। सैनुल की बहन का नाम सुमैबा है और भाई का नाम सहीर अब्बास है। सेमिनार और कक्षाएं, मित्रों से गपबाजी और पठन-पाठन इनके शौक हैं।</p>
<p>निरंतर सैनुल के अद्भुत खोज के लिये उनकी प्रशंसा करता है और पाठकों से अनुरोध करता है कि वे इस होनहार बिरवान का हौसला ज़रूर बढ़ायें। सैनुल से संपर्क करने का ईमेल पता है mysainu at yahoo dot com, उनके महाविद्यालय का ईमेल पता है mca at mesengg dot com ।</p>
</div>
<p>इस नई तकनीक का हर पहलू बहुत दिलचस्प है। इसकी कई विशेषताओं में से एक है की विशाल सूचना भंडारण के तेज उपकरण बिल्कुल सस्ते बनाए जा सकते हैं। अर्थात हमारे कंप्यूटरों मे लगी हार्ड-डिस्क से कई गुना बडी क्षमता और तेजी के उपरकण बनाना संभव है &#8211; बनाए जा रहे हैं। इन उपकणों पर किसी भी प्रकार की सूचना &#8211; दृश्य, श्रव्य, दस्तावेज़ या आंकडों की फ़ाईलों को इस तकनीक से सहेजा जा सकता है। इस राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत तकनीक पर पेटेंट लिया जा रहा है।</p>
<p>रेनोबो टेक्नॉलोजी से बनी डिस्क को आर.वी.डी RVD यानि रेनबो वर्सेटाईल डिस्क कहा जाता है। सामान्यत: एक आर.वी.डी पर 90 जीबी से 450 जीबी तक सूचना संग्रहित की जा सकती है &#8211; जबकी एक सामान्य डी.वी.डी की क्षमता मात्र 4.7 जीबी होती है। एक आर.वी.डी को बनाने में 50 पैसे से 1 रुपये की लागत आती है। जबकी एक सीडी को बनाने में लगने वाला पेट्रोलियम सह-उत्पाद पोली कार्बोनेट 400 से 450 रुपये प्रति किलो का पडता है। एक सीडी बनाने मे 16 ग्राम पॉली कार्बोनेट लगता है &#8211; अत: कम कीमत में गुणवत्ता प्रदान करना संभव नही होता। जबकी 131 गुना अधिक भंडारण क्षमता देने वाली आर.वी.डी सामान्य कागज़ से बनाई जा सकती है।</p>
<p>रेनबो टेक्नॉलोजी में सबसे पहले किसी भी फ़ार्मेट (संरूपण) के डाटा को एक साझा फ़ार्मेट में बदला जाता है। इस साझा फ़ार्मेट को &#8220;रेनबो फ़ार्मेट&#8221; कहा जाता है। इस फ़ार्मेट को ऐसे बनाया गया है की इसे बिंब यानि इमेज के रूप में छापा जा सकता है। इस के लिए अलग अलग ज्यामितीय आकारों, रंगों और अन्य आकारों का संयोजन किया जाता है। हर आकार और रंग का संयोजन एक संपूर्ण नमूना होता है &#8211; सूचना की एक पूरी बानगी होती है। इस हेतु इमेज प्रोसेसिंग और पैटर्न मैचिंग जैसी आधूनिक तकनीकी का पूरा प्रयोग होता है। जो सूचना इस प्रकार परिवर्तित कर ली जाती है उसे कागज़ पर उतार दिया जाता है। इस प्रकार सूचना का संग्रहण संभव हो पाता है। सूचना को पढने के लिए इस से उलट किया जाता है।</p>
<div id="pullQuoteR">रेनोबो टेक्नॉलोजी से बनी डिस्क आर.वी.डी पर 90 से 450 जीबी तक सूचना संग्रहित की जा सकती है, जबकि सामान्य डी.वी.डी की क्षमता मात्र 4.7 जीबी होती है।</div>
<p>सामान्यजन के लिये &#8220;कागज़&#8221; शब्द ही लेखन के साधन की छवि बनाता है सूचना संग्रहण के माध्यम की नहीं, पर सेनुल ने यह करिश्मा कर दिखाया है, यहाँ तक कि उनका मानना है कि &#8220;रेनबो तकनीक कागज के अलावा हर उस माध्यम का प्रयोग कर सकती है जिस पर रंग उकेरे जा सकें&#8221;। यानि कि कागज़ ही नहीं कपड़ा जैसे अन्य माध्यमों का भी उपयोग शायद संभव हो। सैनुल स्पष्ट कहते हैं, &#8220;ध्यान रहे की यह कागज़ आधारित तकनीक नही है। मैं सूचना के प्रदर्शन की तरकीब की बात कर रहा हूं। हम सूचना संग्रहण के लिए पेपर या किसी और माध्यम का प्रयोग कर सकते हैं। पुर्नप्रयोग मे लाई जा सकने वाली सामग्री के लिए हमें परिष्कृत तरीके लगाने होंगे।&#8221;</p>
<p>इसमें संदेह नहीं कि यह कार्य जटिल है। इस तकनीक का एक दिलचस्प पहलू है ज्यामितीय आकारों और रंगों के प्रयोग से सूचना का प्रदर्शन जो हमें इजिप्ट के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Egyptian_hieroglyph">हेरोग्लिफ़्स</a> और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Logogram">लोगोग्राम्स</a> की याद दिलवाता है। पर रेनबो फ़ार्मेट के दूसरे फ़ार्मेट्स की तुलना में क्या नफा नुकसान हैं? सैनुल बताते हैं, &#8220;इस तकनीक का लाभ है अधिक भंडारण क्षमता और नुकसान है जटिल इमेज प्रोसेसिंग और पैटर्न मैचिंग जुगतों की जरूरत।&#8221;</p>
<p>हर रेनबो फ़ार्मेट के कुछ हिस्से होते हैं &#8211; मसलन हेडर, बॉडी, फ़ुटर, पैरिटी, रेनबो बाऊंड्री मैपर आदि। हेडर में चित्र का आकार रखा जाता है। चित्र खींचने में प्रयोग की गई जुगत, त्रुटी परिक्षण तंत्र आदि भी स्थापित किए जाते हैं। हालांकी परिवेश में प्रकाश की मात्रा में भिन्नता के चलते रंगों की आभा देने में समस्या आती है किन्तु उसे काफ़ी हद तक मैपिंग फ़ंक्शन्स यानि प्रतिचित्रण जुगतों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। सैनुल स्वीकारते हैं कि &#8220;रंगों का उडना और उनका सटीक ना होना&#8221; बड़ी चुनौती बन कर उभरी पर कुछ संचितकरण तरकीब से वे इस पर काबू पा सके।</p>
<p>रेनबो टेक्नॉलोजी के माध्यम से मुख्यत: चार प्रकार के उपकरण बनाए जा सकते हैं। वे हैं आर.वी.डी, निर्वर्त्य या डिस्पोज़ेबल उपकरण, डाटाबैंक और रेनबो कार्ड। ये सभी तेज गति के अधिक क्षमता के उपकरण हैं। डिस्पोजेबल उपकरण भविष्य में किसी पत्रिका या पुस्तक के साथ भेजी जाने वाली सी.डी या डी.वी.डी का स्थान भी ले सकते हैं।</p>
<p>रेनबो कार्ड अलग अलग आकार और क्षमता के बनाए जा सकते हैं और ये डी.वी.डी का स्थान ले सकते हैं। एक वर्ग इंच के रेनबो कार्ड में 5 जीबी से अधिक डाटा संग्रहित किया जा सकता है। एक ब्रिटिश कंपनी नें रेनबो कार्ड के उत्पादन में रुचि दिखाई है।</p>
<p>डाटाबैंक की क्षमता कल्पनातीत जान पडती है। 125.603 <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Petabyte">पेटाबाईट</a> क्षमता के डाटाबैंक बनाना संभव है। इस प्रकार यह स्पष्ट है की रेनबो तकनीक छोटी बडी हर प्रकार की जरूरतों के लिए प्रयोग में लाई जा सकती है।</p>
<p>रेनबो टेक्नॉलोजी एकाधिक रूप से नई ज़मीन पर बनी है। सैनुल मानते हैं कि &#8220;अधिक क्षमता, कम कीमत, पर्यावरणानुकूलता और आसानी &#8221; इस खोज को दिलचस्प बनाती है।</p>
<div id="pullQuoteR">&#8220;हर शिक्षण संस्था में एक शोध विभाग होना चाहिए जो एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में कार्य करे और जिसके अपने उत्पाद हों&#8221;</div>
<p>एक छात्र के द्वारा रेनबो जैसी जटिल और अनोखी तकनीक के इजाद से भारतीय तकनीकी महाविद्यालयों की काबलियत के प्रति समाज की उम्मीद भी सुदृढ़ होती है और हमें हमारे युवाओं के सुनहरे भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करती है। हमने सैनुल से पूछा कि उनके विचार में हमारी शैक्षणिक संस्थाओं में शोध और विकास को बढावा देने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सैनुल का कहना है, &#8220;मुझे हमेशा माता-पिता और गुरुओं का प्रोत्साहन मिला। हर शिक्षण संस्था में एक शोध विभाग होना चाहिए जो एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में कार्य करे और जिसके अपने उत्पाद हों। छात्रों को अपने मनपसंद प्रोजेक्ट्स पर काम करने की स्वतंत्रता हो और आर्थिक तथा तकनीकी सुविधाएं मिलें ताकि विचार उत्पाद में बदल सके। इस प्रकार होने वाली आय का लाभ संस्था को भी मिलना चाहिये।&#8221;</p>
<p>सैनुल और नई परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं &#8211; जिनके नाम हैं एक्स्प्रेस्सा, ई-फ़ोन व रोबो-बेबी। एक्स्प्रेस्सा क्षेत्रीय भाषाओं के लिए बनाया जा रहा एक साफ़्टवेयर है। लिखित सामग्री को इस के माध्यम से श्रव्य बनाया जा सकता है और पार्श्व संगीत भी जोडा जा सकता है। इस तरह से मोबाईल फ़ोन के माध्यम से इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री को सुना जा सकता है। तो क्या भविष्य में वे केवल शोधकार्य करते रहने चाहते हैं या अपनी कंपनी भी शुरु करना चाहेंगे? &#8220;दोनों!&#8221;, सैनुल चहककर कहते हैं, &#8220;मैं मित्रों के साथ मिल कर केर्लोनटेक नामक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना कर रहा हूं।&#8221; और अपने साथी युवाओं क्या संदेश देना चाहेंगे वे, &#8220;अध्ययनरत रहें। अपने परिवेश का विश्लेषण करें और उस पर प्रश्न भी। अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं ढूंढें और उन्हें पहले से गढे हुए उत्तरों से तौलें। कई नए रहस्य उजागर होंगे। और हाँ, जीवन में मानवीयता को स्थान दें।&#8221;</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2169&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>हिन्दी समांतर कोश: एक विराट प्रयास</title>
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		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 07:01:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Thesaurus]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006nidhisamantar-kosh/</guid>
		<description><![CDATA[शब्दकोश से आप किसी भी शब्द का अर्थ जान सकते हैं। लेकिन यदि आप किसी सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश अपने हाथ खड़े कर देगा। ऐसे में आपको थिसारस की शरण में जाना होगा। <strong>अनूप शुक्ला</strong> बता रहे हैं अरविंद व कुसुम कुमार द्वारा २० साल के अथक परिश्रम से तैयार <strong>हिन्दी समांतर कोश</strong> के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img title="Samantar Kosh" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/samantar-kosh.jpg" border="0" alt="Samantar Kosh" hspace="5" vspace="5" width="231" height="301" align="right" /></p>
<div class="dropCap">आ</div>
<p>प किसी भी भाषा प्रयोग करते हों, शब्दकोश से अवश्य परिचित होंगे। शब्दकोश की सहायता से आप किसी भी शब्द का अर्थ जान सकते हैं।</p>
<p>आप कुछ पढ़ रहे हैं और कोई नया शब्द आपने पढ़ा जिसका अर्थ आपको नहीं पता तो आप अपने पास उपलब्ध शब्दकोश में उसका अर्थ देखकर लिखे हुये को समझ सकते हैं। लेकिन यदि आप कुछ लिख रहे हैं और अपने विचार को अभिव्यक्त करने के लिये किसी सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश आपकी सहायता नहीं कर पायेगा। शब्दकोश आपको किसी शब्द का अर्थ बता देगा लेकिन बात कहने के लिये अगर आप सटीक शब्द की तलाश में हैं तो शब्दकोश अपने हाथ खड़े कर देगा।</p>
<p>ऐसे में आपको थिसारस की शरण में जाना होगा। हिंदी में थिसारस का पर्याय है &#8211; समांतर कोश। जानेमाने शब्दविद् अरविंद कुमार नें वर्षों की मेहनत कर इसी नाम से हिंदी के पहले थिसारस का प्रकाशन किया है। लेकिन &#8220;समांतर कोश&#8221; के बारे में बताने के पहले आपको थिसारस के बारे में और जानकारी दे दें।</p>
<h2><strong>थिसारस क्या है</strong></h2>
<p>थिसारस यूनानी शब्द थैजो़रस का हिंदीकरण है। इस का अर्थ ही है कोश। शब्दश: थिसारस भी एक तरह का शब्दकोश होता है क्योंकि इसमें शब्दों का संकलन होता है। वास्तव में थिसारस या समांतर कोश और शब्दकोश एक दूसरे के बिल्कुल विपरीत होते हैं। किसी शब्द का अर्थ जानने के लिये हम शब्दकोश का सहारा लेते हैं। लेकिन जब बात कहने के लिये हमें किसी शब्द की तलाश होती है, तो लाख शब्दों के समाए होने के बावजूद शब्दकोश हमें वह शब्द नहीं दे सकता, जब कि थिसारस यह काम बड़ी आसानी से कर सकता है।</p>
<h2><strong>कैसे काम करता है थिसारस</strong></h2>
<div id="pullQuoteR">समांतर कोश में किसी भी शब्द के अनेक विकल्प होते हैं। इस का अर्थ यह है कि आप किसी भी ज्ञात शब्द के सहारे किसी अज्ञात या विस्मृत शब्द तक तत्काल पहुंच सकते हैं।</div>
<p>समांतर कोश में किसी भी शब्द के अनेक विकल्प होते हैं। इस सीमित अर्थ में वह पर्याय कोश होता है। लेकिन इससे बहुत आगे जाकर वह हमें उस के विपरीत अर्थों वाले शब्दों तक, और हम चाहें तो उस से संबंधित अन्य समांतर शब्द समूहों तक ले जा सकता है। जैसे कि <em>विवाह</em> के साथ<em> विवाह विच्छेद</em> भी, और विवाह की<em> सगाई</em>,<em> घुड़चड़ी</em> आदि रस्मों तक भी। और क्योंकि विवाह एक संस्कार होता है, इसलिये <em>मुंडन</em>,<em> उपनयन</em> आदि सोलह संस्कारों तक भी। साथ ही विवाह गृहस्थ आश्रम का प्रवेश बिंदु है अतः <em>गृहस्थ आश्रम</em> के साथ साथ <em>संन्यास</em>,<em> वानप्रस्थ</em> और <em>ब्रह्मचर्य</em> आश्रमों तक भी। दो चार पन्ने ऊपर नीचे पलट कर आप <em>विवाह निष्ठा</em>, <em>अनिष्ठा</em>,<em> परनारी</em>,<em> परपुरुष</em> आदि शब्द समूहों की जानकारी हासिल कर सकते हैं, और <em>वेश्या</em>, <em>वेश्यालय</em>, <em>कुटनी</em> आदि की भी।</p>
<p>इस का सीधा अर्थ यह है कि आप किसी भी ज्ञात शब्द के सहारे किसी अज्ञात या विस्मृत शब्द तक तत्काल पहुंच सकते हैं।</p>
<div id="boxR">
<h2><strong>कैसे बना समांतर कोश</strong></h2>
<p>हिंदी के लिये उपयुक्त संदर्भ क्रम बनाने के लिये कोई समीचीन आधार नहीं था जिस पर समांतर कोश का ढांचा खड़ा किया जा सके। हिंदी के पहले थिसारस के लिये नयी जमीन तैयार करना आवश्यक था। पहले समांतर कोश का ढांचा रौजेट के अंग्रेज़ी थिसारस के आधार पर खड़ा करने की कोशिश की गयी। लेकिन अंग्रेज़ी के मुका़बले हिंदी थिसारस की आवश्यकतायें बिल्कुल अलग निकलीं। अंग्रेज़ी और हिंदी के भावों की बहुत सी परस्परतायें बिल्कुल अलग हैं। वहां एक शब्द से जो संदर्भ जुड़ते हैं वे हिंदी में नहीं बनते। इसलिये अंग्रेज़ी थिसारस का ढांचा हिंदी थिसारस के लिये अनुपयुक्त पाया गया। साथ ही अंग्रेज़ी में आम तौर पर एक वस्तु का एक ही नाम होता है। <em>आम</em> है तो उस के लिये बस एक <em>मैंगो</em> शब्द है और उस का एक तकनीकी नाम है लैटिन में <em>मांगीफेरा इंदीका</em>। लेकिन हिंदी में आप<em>आम</em> को कितने ही नामों से पुकार सकते हैं। यह हमारी भाषाऒं की विशेषता है जो हमें अपनी बात कहने के लिये बड़े रोचक ढंग देती है। लेकिन इसका एक परिणाम यह हुआ कि समांतर कोश का आकार अंग्रेज़ी के बड़े अंतरराष्ट्रीय संस्करण वाले थिसारसों से कई गुना बड़ा हो गया।</p>
<p>और फिर जब समांतर कोश के लिये अपने प्राचीन <strong>अमरकोश</strong> को आदर्श बनाने की बात सोची गयी तो थोड़े ही दिनों में मुंह मोड़ लेना पड़ा। वह अपनी किस्म का बेजोड़ ग्रंथ है, लेकिन वर्ण व्यवस्था के उत्कर्ष काल में बना था। उस में मानव क्रियाकलाप को वर्णों के आधार पर रखा गया है। बौद्धिक गतिविधि ब्राह्मण वर्ण के अंतर्गत, युद्ध और शस्त्रास्त्र क्षत्रिय वर्ण के साथ&#8230;। आज के भारत में इस प्रकार का वर्गीकरण एकदम अस्वीकार्य होगा।</p>
<p>इस तरह हिंदी का पहला थिसारस तैयार करने वालों के पास तरह तरह से हेरफेर कर नये ढांचों पर काम कर के देखने के अलावा कोई चारा न था। कम से कम पांच बार काम का ढांचा बदला गया। कामचलाऊ ढांचा बनते बनते करीब चौदह साल निकल गये। ये साल बेकार गये, ऐसा नहीं हुआ। इस दौरान शब्दों का अंकन कार्ड पर होता रहा। इसलिये सही ढांचे के अभाव में भी थिसारस के लिये शब्द संकलन तो चलता ही रहा। और यह 2,60,000 अभिव्यक्तियों से बडा हो गया था। इन कार्डों पर अंकित शब्द समूहों की पूरी खोज खबर रख पाना थिसारस के निर्माण में लगे लोगों की स्मरणशक्ति  और सामर्थ्य से बाहर हो गया। अत: उनको इसका कम्प्यूटरीकरण करना पड़ा। इससे न सिर्फ यह असंभव सा लगने वाला काम पूरा हो पाना संभव हो सका बल्कि समांतर कोश को बनाने में लगे लोगों का कम्प्यूटर की अद्भुत क्षमता से परिचय आरंभ हुआ और वे असंभव से सपने साकार होने लायक हो गये।</p></div>
<h2><strong>समांतर कोश का पहला संस्करण</strong></h2>
<p>कम्प्यूटरी करण के दौरान 2,60,000 शब्दों से बढ़ते-बढ़ते 5,40,000 से अधिक अभिव्यक्तियों का संकलन हो गया। उसमें हर कोटि के बहुविस्तार में जाने का प्रयास किया गया। मान लीजिये, <em>आकाश पिंड</em>। तो हर प्रकार के <em>आकाश पिंड</em> के लिये शब्द जमा हो गये। उसके बाद <em>तारा</em> कोटि के अंतर्गत पहले <em>तारामंडलों</em> के नाम, जहां तक संभव हो सका, हिंदी, अंग्रेज़ी और उनके तकनीकी लैटिन नाम भी। फिर हर तारा मंडल के अंतर्गत आने वाले तारों के नाम, हर <em>मंडल</em> के <em>योग तारे</em> का नाम, और यदि उपलब्ध हो तो उनके पर्यायवाची भी। या राशिचक्र में पहले राशिचक्र के अनेक पर्यायवाची और फिर राशियों के विविध समूहों के नाम, बाद में हर राशि के अंतर्गत उसके अपने पर्यायवाची, हिंदी, उर्दू, अरबी, लैटिन आदि नाम।</p>
<p><em>देवी देवताऒं</em> या <em>ईश्वर</em> के नामों को लें। हमारी भाषायें इनके पर्यायवाचियों से लदी-पड़ी हैं। स्वयं <em> ईश्वर</em> के<br />
हजारॊं नाम हैं। फिर ईश्वर संबंधी मान्यताऒं की कोटियां: जैसे<em> ब्रह्म,</em><em> साकार</em>, <em>निराकार</em>,<em> भगवान</em>,<em> पुरुष</em>,<em> हिरण्यगर्भ</em>, <em>अल्लाह</em>। इनके बाद<em> त्रिमूर्ति।</em> ब्रह्मा, विष्णु, महेश। अब महेश को लें। शिव के नामों की संख्या 2,317 है। और विष्णु के चौबीस अवतार, दशावतार राम, कष्ण&#8230;।</p>
<p>दैनिक जीवन में भाषा के आम उपभोक्ता को इतने विस्तार में जाने की आवश्यकता शायद ही कभी पड़ती हो। अत: समांतर कोश के पहले संक्षिप्त संस्करण में 1,60,850 अभिव्यक्तियों का संकलन तैयार किया गया है। इसमें अंग्रेज़ी आदि भाषाऒं के केवल वही शब्द रखे गये  हैं, जो बोलचाल का हिस्सा बन गये हैं या जिन से किसी नये हिंदी शब्द का संदर्भ स्पष्ट होता है।<br />
<23><strong>समांतर कोश का उपयोग कैसे किया जाय</strong></h2>
<p>समांतर कोश दो भागों में है। एक भाग है <strong>अनुक्रम खंड </strong>और दूसरा है <strong> संदर्भ खंड</strong>। अनुक्रम खंड में अकारादि क्रम में उन सभी शब्दों की सूची दी है जो कि समांतर कोश में शामिल हैं। आप अनुक्रम खंड में अपने भाव या विचार के निकटतम कोई भी शब्द खोजिये। इसके सामने इनका पता संख्याऒं में लिखा है। अब आप संदर्भ खंड खोजिये। यहां हर शीर्षक और उपशीर्षक की एक संख्या है। आप संदर्भ खंड में अनुक्रम खंड में लिखे पते को खोजिये और आप अपने मनचाहे शब्द तक पहुंच जायेंगे।</p>
<p>इस सब के लिये समांतर कोश यह मानकर चलता है कि आप को जिस भाव के लिये शब्द की तलाश है, उस से संबंधित या विपरीत कोई एक शब्द आपको जरूर याद होगा। मान लीजिये आप को निकाह शब्द की तलाश है, और आपको विवाह शब्द याद है। <strong>अनुक्रम खंड</strong> में खोज शब्द विवाह के नीचे कई गंतव्य हैं। उनमें से एक है <strong>विवाह 799.1</strong>। निकाह के लिये स्वभावत: आप संदर्भ खंड में इसी पते पर जायेंगे।</p>
<blockquote><p><strong>विवाह</strong><br />
गृहस्थाश्रम प्रवेश 235.8<br />
मैट्रिमनी- 798.33<br />
वर्जित दृश्य सूची-463.33<br />
विवाह- 799.1 &lt;=<br />
विवाह उत्सव- 799.2<br />
सोलह संस्कार सूची-798.3<br />
<strong>विवाह अनिष्ठा</strong><br />
विवाह अनिष्ठा- 806.1&lt;=</p>
<p><strong>विवाह अभिशून्यन</strong><br />
विवाह लोप- 804.11</p></blockquote>
<p>संदर्भ खंड में आप देखेंगे कि<strong> 799 </strong>शीर्षक ही <strong>विवाह</strong> का है। इसमें उपशीर्षक 1 में विवाह के 39 पर्याय हैं, जिन में से एक है निकाह।</p>
<blockquote><p>1. सं<strong> विवाह</strong>, अक़द, अटूट संबंध, अहद, ऊढ़ि, गँठजोड़, गठजोड़, गठबंधन, गाँठ, निकाह, परिणय, पाणिग्रह, पाणिग्रहण, पाणिबंध, फेरे, बरकाज, बियाह, ब्याह, ब्रह्मचर्यांत, मैरिज(अं), रिश्ता, लगन, लग्न, विवाह बंधन, विवाह संबंध, विवाह संस्कार, वैध यौन संबंध, शादी, संबंध, सप्तपदी, सहचर्या, सहबंधन, सात फेरे, सात वचन, साथ, साहचर्य, हाथ पकड़ाई.</p></blockquote>
<div id="boxL" style="background:#ffffff">
<h2><strong>लेखक परिचय</strong></h2>
<p><img title="Arvind-Kusum" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/arvind-kusum-kumars.jpg" border="0" alt="Arvind-Kusum" hspace="5" vspace="5" width="239" height="205" align="center" /></p>
<p><strong>अरविंद कुमार</strong> का जन्म उत्तर प्रदेश के नगर मेरठ में 17 जनवरी, 1930 को हुआ। 1943 में उनका परिवार दिल्ली आ गया। वे अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. हैं और माधुरी और सर्वोत्तम के प्रथम संपादक। पत्रकारिता में उन का प्रवेश सरिता (हिंदी) से हुआ। कई वर्ष कैरेवान ( अंग्रेज़ी) के सहायक संपादक रहे। कला, नाटक, और फिल्म समीक्षाऒं के अतिरिक्त उन की अनेक फुटकर कवितायें, लेख, कहानियां प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाऒं में प्रकाशित हुई हैं। शेक्सपीयर के जूलियस सीजर के काव्यानुवाद का मंचन राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के लिये इब्राहिम अल्काजी के निर्देशन में हुआ। अरविंद कुमार ने सिंधु घाटी सभ्यता की पृष्ठभूमि में इसी नाटक का काव्य रूपान्तर भी किया है, जिस का नाम है &#8211; विक्रम सैंधव।</p>
<p><strong>श्रीमती कुसुम कुमार</strong> का जन्म 8 दिसम्बर 1933 को मेरठ में हुआ। वे बी.ए., एल.टी. हैं। दिल्ली के सरकारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हिंदी और अंग्रेज़ी पढा़ती रही हैं। दोनों का विवाह 1959 में दिल्ली में हुआ।</div>
<h2><strong>हिंदी समांतर कोश से आगे की संभावनायें</strong></h2>
<p>हिंदी में समांतर कोश के निर्माण के दौरान कम्प्यूटर की क्षमताऒं से परिचित होने के कारण यह विलक्षण सपना देखा गया कि भारत की सभी भाषाऒं के शब्दों की 18 लड़ियों की एक भव्य मणिमाला तैयार की जाये। भारतमाता के गले की शोभा बनने वाली इस मणिमाला के सहारे हिंदी के समांतर कोश या किन्हीं भी दो या अधिक भाषाऒं के संयुक्त समांतर कोश बनाये जाने की योजना है। यह काम बहुत कठिन है लेकिन आज की कंप्यूट्रर की दुनिया में यह पूरी तरह संभव है। समांतर कोश बनाने वाले अरविंद कुमार और कुसुम कुमार का कहना है-</p>
<blockquote><p>हमारे पास उसकी योजना भी है, कार्यनीति भी। चाहिये बस एक विराट प्रयास, एक विराट सहयोग, और शुभकामनायें आप की ओर से और हर भाषा के उत्साही कर्मियों की ओर से।</p></blockquote>
<h2><strong>कैसे रचा गया समांतर कोश</strong></h2>
<p>हिंदी के प्रथम समांतर कोश के रचयिता अरविंद कुमार मुंबई में 1963 से फिल्म पत्रिका माधुरी के संपादक थे। धीरे-धीरे वे फिल्म पत्रकारिता से ऊब चुके थे और कुछ सार्थक करने को छ्टपटा रहे थे। अन्य भाषा कर्मियों की तरह उन के मन में भी अभिलाषा थी कि हिंदी में भी थिसारस हो।</p>
<p>26 दिसंबर, 1973 को सोते सोते उन्हें अपने जीवन का लक्ष्य सूझा -समांतर कोश की रचना। आरंभिक तैयारी के बाद 19 अप्रैल, 1976 को नासिक में गोदवरी नदी में स्नान करके उन्होंने अपनी कुसुम कुमार के साथ समांतर कोश पर काम करना शुरू किया। मुंबई में केवल सुबह शाम के श्रम से इसे पूरा न होते देख कर वे माधुरी को त्याग कर मई 1978 में सपरिवार दिल्ली पहुंचे और दोनों अपना पूरा समय इसी को देने लगे। दिल्ली की 1978 की बाढ़ से ग्रस्त होने पर वे सपरिवार गा़जियाबाद स्थानांतरित हो गये। जब आर्थिक स्थिति को फिर से मजबूत करने की आवश्यकता आ पड़ी तो अरविंद कुमार ने 1980 में रीडर्स डाइजेस्ट के हिंदी संस्करण सर्वोत्तम का प्रथम संपादक होना स्वीकार कर लिया और पांच साल तक उसके साथ रहे।</p>
<p>समांतर कोश के कंप्यूटरीकरण की प्रक्रिया गाजियाबाद में 20 मार्च 1993 से आरंभ हुई और पहले संस्करण की पूर्ति बंगलौर में 11 सितंबर 1993 को हुई। लेखकद्वय के पास न तो कम्प्यूटर खरीदने के पैसे थे, न उस पर काम के लिये पेशेवर प्रोग्रामरों से प्रोग्राम लिखवा पाने के। इनके बेटे सुमीत ने पेशे से शल्यचिकित्स्क होते हुये भी अपने माता-पिता के उद्देश्य के प्रति निष्ठा से प्रभावित होकर इस कार्य में सहयोग के लिये कम्प्यूट्रर प्रोग्रामिंग सीखी, कंप्यूट्रर खरीदवाया, काम की कार्यविधि ( प्रोग्राम) लिखी, उसे चलाने के लिये आर्थिक संसाधन जुटाये और अंत में डाटा को पाठ में परिवर्तित करने की पेचीदा प्रक्रिया का विशिष्ट समाधान भी निकाला। बिना कंप्यूटरीकरण के समांतर कोश का बनना शायद संभव नहीं हो पाता।</p>
<p>20 वर्षों के अनथक प्रयासों और समर्पण से अंतत: समांतर कोश का निर्माण संभव हुआ और स्वतंत्रता दिवस की स्वर्णजयंती के अवसर पर प्रकाशित हुआ। इस महती कार्य को निरंतर का नमन!</p>
<div id="section-teaser">
<table border="0" width="90%" align="center">
<tbody>
<tr>
<td align="left"><strong>समांतर कोश कहां से प्राप्त करें:</strong></td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td><strong>संसोधन और सुझाव:</strong></td>
</tr>
<tr>
<td>1100 शीर्षक, 23,759 उपशीर्षक, 1,60,850 अभिव्यक्तियों वाले दो खंडों में 1768 पृष्ठसंख्या के पक्की जिल्द वाले समांतर कोश की कुल कीमत 600 रुपये है।</p>
<p>इसके प्रकाशक का पता है:<br />
निदेशक, नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया<br />
ए-5, ग्रीन पार्क,<br />
नयी दिल्ली- 110016.</td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td>आप यहां से पुस्तक मंगाने के लिये पत्राचार कर सकते हैं और समांतर कोश में किसी भी संसोधन, सुझाव के लिये निम्न पते पर लिख सकते हैं:</p>
<p>द्वारा श्रीमती मीता लाल,<br />
405, नीलगिरि अपार्टमेंट्स,<br />
अलकनंदा,<br />
नई दिल्ली &#8211; 110019.</td>
</tr>
<tr>
<td colspan="3" align="center"><strong><a href="http://www.rajkamalprakashan.com/index.php?p=sr&#038;Field=author&#038;String=Arvind%20Kumar%20Kusum%20Kumar" target="_blank">आनलाईन आर्डर करने की सीधी कड़ी</a></strong></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2168&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-nidhi-samantar-kosh/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>6</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वेबारू : इंटरनेट खोज का नया आयाम</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-nidhi-webaroo</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-nidhi-webaroo#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:48:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[offline]]></category>
		<category><![CDATA[webaroo]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806nidhiwebaroo/</guid>
		<description><![CDATA[इंटरनेट पर 20 अरब जालपृष्ठ हैं, यानि लगभग 10 लाख जी.बी. की जानकारी। इसे खंगालने के लिये अगर कोई ऐसा माध्यम मिल जाये जिससे आप आफलाईन रहकर ही अपने मोबाईल या पीसी से खोज कर सकें तो कैसा रहे? पढ़िये <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> का रोचक व जानकारीपूर्ण आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-webaroo.jpg" border="0" alt="Webaroo" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">ए</div>
<p>क अनुमान के अनुसार इंटरनेट पर 20 अरब जालपृष्ठ हैं जिनका कुल सम्मिलित आकार लगभग 10 लाख जी.बी. है। इसे खंगालना आसान नहीं और सर्च इंजन, निर्देशिकायें और न जाने किन किन और माध्यमों से हम इसकी थाह पाने में जुटे रहते हैं। जाहिर है कि यह खोज आनलाईन रहकर ही करना संभव है।</p>
<div id="pullQuoteR">वेबारू एक विंडोज़ एप्लीकेशन है जो आपको किसी भी वेब ब्राउजर पर ऑफलाइन खोज तथा ब्राउज़ करने की सुविधा देता है।</div>
<p>ताज़ातरीन इंटरनेट स्टार्टअप <a href="http://www.webaroo.com">वेबारू</a> ने एक ऐसा अनोखा मुफ्त उत्पाद प्रस्तुत किया है जो विशिष्ट अल्गोरिद्म यानि समीकरण का प्रयोग कर इस 10 लाख गीगाबाइट डाटा को महज़ 40 गीगाबाइट में कंप्रेस यानि संपीडित कर विषयवार टुकड़ों में विविध <a href="http://www.webaroo.com/rooWebPacks.html">वेब पैकों</a> की रचना करता है जिन्हें पर्सनल कम्प्यूटरों के हार्डडिस्क, पीडीए और स्मार्टफ़ोनों में संचित करना संभव होगा। इन वेब पैकों में संपीडित जानकारी में से इंटरनेट की तमाम सामग्री तीव्र गति से, ऑफलाइन रहते हुए ढूंढी जा सकती है। समय-समय पर इस डाटा को अपडेट यानि अद्यतित भी किया जा सकता है। वेबारू की इन वेब पैकों को विविध मीडिया, जैसे कि सीडी रॉम, मेमोरी स्टिक, बाहरी हार्डडिस्क इत्यादि के जरिए भी वितरित किए जाने की योजनाएँ हैं।</p>
<div id="boxR">
<h3>अनंत सीमाओं के भारतीय नेटप्रेन्योर राकेश माथुर</h3>
<p>वेबारू की स्थापना की है सफल एंटरप्रेन्योर तथा प्रोग्रामर राकेश माथुर ने, जिनके पहले के तीन स्टार्टअप भी काफी सफल रहे थे। कई वर्ष पूर्व &#8220;जंगली कॉर्प&#8221; (जिसे बाद में अमेज़ॉन ने खरीदा) की सफलता के दौरान कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सी.ई.ओ.) राकेश ने एक मार्केटिंग स्टंट में स्त्रियों वाली पोशाक पहन कर बहुत ध्यान आकर्षित किया। इसे &#8220;<a href="http://www.bizjournals.com/sanjose/stories/1999/04/12/tidbits.html">सफलता हेतु क्रॉस-ड्रेसिंग</a>&#8221; का नाम दिया गया, और 1998 के बेहतरीन जनसंपर्क अभियान के रूप में पहचाना गया।</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/rakesh-crossdressing.gif" border="0" alt="राकेश माथुर: क्रॉसड्रेसिंग फ़ॉर सक्सेस" hspace="2" vspace="2" align="right" />निरंतर ने राकेश से पूछा कि &#8220;क्रॉसड्रेसिंग फ़ॉर सक्सेस&#8221; अभियान का विचार उन्हें कैसे आया तो राकेश का कहना था, &#8220;अगर नतीजों के साथ जीने को तैयार हों तो एन्टरप्रेन्योर्स को सफलता प्राप्ति के लिये हर संभव काम करने को तैयार रहना होगा ही। इस स्टंट के जरिए जंगली को काफी शोहरत मिली और देखिये मुझे 8 सालों बाद भी क्रासड्रेसिंग के बारे में पूछा जा रहा है! मैंने उस परिधान को जंगली कम्पेरिज़न शॉपिंग इंजिन का इस्तेमाल कर तकरीबन $150 डालर में खरीदा था और उससे पब्लिक रिलेशन का अब तक का सर्वश्रेष्ठ परिणाम मिला।&#8221; वाकई एक ड्रेस से कार्पोरेट सफलता का यह एक विशिष्ट उदाहरण होगा!</p>
<p>और एक भारतीय नेटप्रेन्योर होना क्या मायने रखता है राकेश के लिये? उनका जवाब था, &#8220;इंटरनेट एंटरप्रेन्योर्स अब हर क्षेत्र में दिखाई देते हैं, और यह वैश्विक परिदृश्य से अपेक्षित भी है। मैं भारत में वेबारू का विकास करते हुये रोमांचित हूँ। यदि एस्तोनिया एक स्काईप बना सकता है तो&#8230;भारत की सीमाएँ वास्तव में अनंत हैं।&#8221; हम भी सहमत हैं राकेश!</p>
</div>
<p>वेबारू दरअसल एक तरह का विंडोज़ एप्लीकेशन यानि अनुप्रयोग है जो आपको किसी भी वेब ब्राउजर पर ऑफलाइन खोज तथा ब्राउज़ करने की सुविधा देता है। परंतु यह सुविधा आपको या तो विशेष तौर पर तैयार किए गए वेब पैक के जरिए (जिसे कम्प्यूटर हार्डडिस्क पर पहले से भंडारित किया जाता है) या निर्दिष्ट जाल स्थलों के वेबारू द्वारा पहले से डाउनलोड किए हुए व आपके कम्प्यूटर के हार्डडिस्क पर भंडारित किए गए पृष्ठों में ही मिलती है।</p>
<p>वेबारू अनुप्रयोग का बीटा संस्करण तकरीबन 5 मे.बा. का <a href="http://www.webaroo.com/rooDownload.html">डाउनलोड</a> है। इसके विविध विषयों पर केंद्रित सैकड़ों मेगाबाइट के वेब पैकों को पृथक रूप से डाउनलोड करना होगा, जैसे कि स्वास्थ्य संबंधी वेब पैक 186 मे.बा. का है, विकिपीडिया का समग्र डाटा 8 जी.बी. वेब पैक में समाया हुआ है और मुम्बई का वेब पैक 26 मे.बा. का है। यह एक मुफ्त उत्पाद है, तो कमाई का ज़रिया बनेंगे सन्दर्भ आधारित यानि कंटेस्टचुअल विज्ञापन होंगे जो ढूंढे गए तथा ब्राउज़ किए गए पृष्ठों में अंतर्निहित होंगे। वेबारू को बनाने वाली अभियांत्रिकी टोली में अधिकांशतः भारतीय हैं।</p>
<p>लेखक ने पाया कि मुम्बई वेब पैक प्रयोग करने पर मुम्बई शहर से संबंधित तमाम चित्रमय जानकारियाँ ऑफलाइन ही उपलब्ध हो जाती हैं। हाँ, बहुत सी अतिरिक्त जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पातीं पर उनके लिए वेबारू आपको ऑनलाइन ढूंढने का विकल्प प्रदान करता है। <a href="http://abhivyakti-hindi.org/">अभिव्यक्ति</a> तथा <a href="http://www.hindini.com/ravi/">छींटें और बौछारें</a> की सामग्रियों को वेबारू के जरिए ऑफलाइन डाउनलोड कर सामग्रियों की खोज करने की कोशिश की गई तो यह औजार जाल कड़ियों के सिर्फ एक कड़ी भीतर तक जाकर ही सामग्रियों को डाउनलोड कर सका। लिहाजा दोनों ही जाल स्थलों में प्रारंभ के 70-80 पृष्ठ ही डाउनलोड हो पाए। इस लिहाज से यह निर्दिष्ट जाल स्थलों की सामग्रियों को ऑफलाइन ढूंढने में प्रायः असमर्थ ही रहा। वेबारू अगर किसी जालस्थल का संपूर्ण वेब पैक तैयार करे तो संभवतः उसमें ऐसी समस्या न आए। इसी तरह, उपयोक्ता द्वारा स्वयं का या सामाजिक वेब पैक तैयार करने का विकल्प भी नहीं है। वेबारू ने <em>निरंतर</em> को बताया कि ऐसी मांग पहले भी आई है और वे इस पर विचार कर रहे हैं। सामग्री से जुड़े कॉपीराईट के मसले भी जुड़े हैं और यह स्पष्ट नहीं कि वेबारू ऐसी सामग्री कैसे पेश कर पायेगा।</p>
<p>ऑफ़लाइन ब्राउजर की कल्पना ब्राउज़रों के इतिहास के साथ से ही चली आ रही है। वेबारू इसे नए ढंग से परोसने की कोशिश कर रहा है। वेबारू के दल से बातचीत के बार निरंतर ने यह पाया कि उनका मुख्य ध्यान मोबाईल उपभोक्ताओं पर है और भारत जैसे देशों में, जहाँ अच्छी कनेक्टीविटी के अभाव के कारण उत्पाद चल तो सकता है पर बैंडविड्ट्थ भी बड़ी समस्या है, वे शायद छोटे वेब पैकों पर ध्यान केंद्रित करेंगे।</p>
<p>जो भी हो, यदि वेबारू के जरिए आपके पास सिर्फ एक डीवीडी में विकिपीडिया की संपूर्ण सामग्री उपलब्ध हो जाए, या फिर एक सीडी में संपूर्ण अभिव्यक्ति की सामग्री उपलब्ध हो जाए, तो आपको बिना ऑनलाइन हुए इंटरनेट की सामग्री का इस्तेमाल लायक भंडार प्राप्त तो हो ही जाता है। सौदा बुरा नहीं है!</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4;">
<h2>सर्च अनप्लग्ड</h2>
<p>वेबारू का नारा है &#8220;सर्च अनप्लग्ड&#8221;, यानी खोज बेलगाम। वेबारू से जुड़े कुछ प्रश्नों के उत्तर पाने के लिये निरंतर ने वेबारू की टीम से संपर्क किया। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के कुछ महत्वपूर्ण अंश।</p>
<p><strong>आजकल हम इंटरनेट की बढ़ती पहुँच की बात करते हैं। फिर आप की कंपनी ने ऐसे उत्पाद के बारे में कैसे सोचा जो एक तरफ तो इंटरनेट के घटिया कनेक्शनों से त्रस्त लोगों के लिए बना है, और दूसरी तरफ वेब पैकेट डाउनलोड करने के लिए बढिया बैंडविड्ट्थ की भी उम्मीद रखता है?</strong></p>
<p>इन दोनों निष्कर्षों में कोई विरोधाभास नहीं है कि इंटरनेट का बेतार संपर्क (वायरलैस कनेक्टीविटी), आम तौर पर बेकार होता है, और तारयुक्त संपर्क (वायर्ड कनेक्टीविटी), आम तौर पर बढ़िया। विस्तार से कहें तो, बेतार नेटवर्क न तो सर्व-व्याप्त हैं (कवरेज बहुत सीमित है), न तेज ( <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/3G">3G</a> भी वेब-खोज के लिए धीमा है) और न ही सस्ता (उदाहरणतः <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/EVDO">EVDO</a> महीने के अस्सी डॉलर लेता है), और फिलहाल इस में सुधार होने की भी उम्मीद नहीं है। वेबारू का लक्ष्य है मोबाइल यन्त्रों तक वैसा ही बढ़िया वेब अनुभव पहुँचाने की, जिस के हम तारयुक्त यन्त्रों पर आदी हो चुके हैं। इसी तरह के यन्त्रों में आइ-पॉड भी है, जो इंटरनेट से सामग्री कैश यानि इकट्ठा कर बाद में उसे प्रयोग करता है &#8212; साफ तौर पर लोग इस तरह की प्रणाली को पसंद करते हैं।</p>
<p><strong>प्रतीत होता है कि आप के उत्पाद का मूलमन्त्र है कंप्रेशन यानि संपीडन। पर गूगल जैसे खोज-इंजन के भीमकाय डाटा को देखा जाए तो यह कितना असरदार होगा?</strong></p>
<p>हमारे उत्पाद का मूलमन्त्र है डाटा का सही चुनाव, न कि कंप्रेशन। हम पूरे विश्वजाल में क्रॉल कर गिने चुने पृष्ठों को चुनते हैं और उन्हें स्थानीय रूप से डाउनलोड करते हैं। औसतन हर 25,000 रेंगे गए पृष्ठों में से एक ही चुना जाता है। वेबारू की तकनीक का निरालापन इस में है कि हमारा चयन अल्गॉरिद्म बेहतरीन सामग्री-घनत्व के लिये बना है, यानी ज्यादा से ज्यादा विषयों तक पहुँचना और न्यूनतम फाइल आकार में सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली सामग्री एकत्रित करना।</p>
<p><strong>आप के उत्पाद द्वारा डाउनलोड की गई सामग्री ऑफलाइन पठन के लिए जिन वेब पैकों में रखी जाएगी, उस के लिए 40 गीगाबाइट की अतिरिक्त जगह दरकार होगी। आप प्रयोक्ता से 1 गिगाबाइट रैम और ब्रॉडबैंड संपर्क की भी उम्मीद कर रहे हैं। यह भारत जैसी बाजा़र में यह कुछ ज़्यादती की बात नहीं हुई? और धनी देशों में किसी को वेबारू की ज़रूरत ही क्या है?</strong></p>
<p>हमारे छोटे वेब पैक 10 मैगाबाइट से शुरू होते हैं, और बड़े से बड़े 40 गीगाबाइट तक हो जाते हैं। हमारे उत्पाद विश्व के विभिन्न भागों में प्रयोग होंगे और विभिन्न प्रकार के यन्त्रों पर। भारत जैसे बाज़ार में प्रयोक्ता हमारे छोटे वेब पैकों का लाभ उठा पाएँगे। धनी देशों में भी लोग वेबारू प्रयोग करते हैं क्योंकि, जैसा कि हमने पहले कहा, बढ़िया बेतार संपर्क की वहाँ भी कमी है।</p>
<p><strong>वेबारू उन पृष्ठों को कैसे देखता है जो डाइनमिक सामग्री होती हैं या स्क्रिप्टों के पीछे छिपे होते हैं? आजकल के जालपृष्ठों में यह सामान्य सी बात है।</strong></p>
<p>वेबारू स्थिर (स्टैटिक) एचटीएमएल पृष्ठों के बढ़िया काम करता है, जाल पर ज्यादातर पृष्ठ ऐसे ही हैं। हम यह भी जानते हैं कि कुछ पृष्ठों के लिए इंटरनेट संपर्क ज़रूरी है, और उन्हें ऑफलाइन नहीं पढ़ा जा सकता। यही बात कई खोज-इजनों पर भी लागू होती है, जो अभी भी कूटशब्दों द्वारा सुरक्षित या अन्य डाइनैमिक सामग्री को नहीं खोज पाते। संक्षेप में, उत्पाद का महत्व इस बात से है कि यह किए गए वादे पूरे करता है या नहीं, और प्रयोक्ताओं के लिए उपयोगी है या नहीं। हमारा विश्वास है कि जितनी सामग्री वेबारू लोगों तक पहुँचाएगा, उस कारण यह बहुत उपयोगी सिद्ध होगा।</p>
<p><strong>मुम्बई के लिए विशेष तौर पर तैयार वेबारू पैक पर ढूंढने के दौरान बहुत बार वेबारू द्वारा सामग्रियों को देखने हेतु ऑन-लाइन देखने की सलाहें दी गई। क्या यह उपयोक्ताओं में खीज पैदा नहीं करेगा जो वेबारू के जरिए इंटरनेट की सामग्री को पूर्णतः ऑफ-लाइन देखने की आशा करते हैं? वेबारू में कितनी ‘गहराई’ या ‘स्तर’ तक डाउनलोड सामग्रियाँ उपलब्ध रहेंगीं?</strong></p>
<p>मोबाइल पर वेब के प्रयोग की बात करें तो ऑफलाइन स्थिति में खोज या ब्राउज़ बिल्कुल ही न कर सकने की स्थिति की तुलना में तो यह काफी बेहतर अनुभव होगा। वेबारू पर उपलब्ध कड़ियों को नीले रंग से दर्शाया जाता है ताकि उपयोक्ता यह जान सके कि जानकारी ऑफलाइन उपलब्ध होगी या नहीं। वेबारू डाउनलोड कितने लेवल या &#8220;गहराई&#8221; तक करे यह सामग्री पैक पर निर्भर करेगी &#8211; जैसे कि विकि जैसे विशिष्ट पैक में आनलाईन होने की ज़रूरत नहीं होगी।</p>
</div>
<p class="note">अतिरिक्त सामग्री व सहयोग &#8211; देबाशीष चक्रवर्ती व रमण कौल</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2167&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
		<item>
		<title>विकिपीडिया: हिन्दी की समृद्धि की राह</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:47:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>
		<category><![CDATA[Wikipedia]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806nidhiwikipedia/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>विकिपीडिया</strong> इंटरनेट आधारित मुक्त विश्वकोश परियोजना है। यह स्वयंसेवकों के सहकार से निर्मित विकि है। हिन्दी विकिपीडिया की शुरुआत जुलाई 2003 में हुई पर इसमें स्वयंसेवकों का अभाव है। पढ़िये विकिपिडिया पर <strong>मितुल</strong> का जानकारी परक आलेख और जानिये कि कैसे आप भी इस वृहद आंदोलन का हिस्सा बन सकते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><center>विकीपीडिया पर प्रकाशित इस लेख की अगली कड़ी के रूप में सामयिकी<br />
पर प्रकाशित यह लेख भी पढ़ें: <a href="http://www.samayiki.com/2009/01/10-things-wikipedia-is-not/">दस चीजें जो विकीपीडिया नहीं है</center></a></div>
<p><img title="Wikipedia Logo" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/wikipedia-logo.jpg" border="0" alt="Wikipedia Logo" hspace="4" vspace="4" width="200" height="200" align="right" />
<div class="dropCap">वि</div>
<p>किपीडिया इंटरनेट पर आधारित एक मुक्त विश्वकोश परियोजना है। यह विकि के रुप में है, यानी एक ऐसा जाल पृष्ठ जो सभी को इसका संपादन करने की छूट देता है। विकिपीडिया शब्द विकि और इनसाइक्लोपीडिया शब्दों को मिला के बना है। देखा जाये तो विकिपीडिया स्वयंसेवकों के सहकार से निर्मित है, जिसकी भी वेब तक पहुंच है वह विकिपीडिया पर लिख सकता है और लेखों का संपादन कर सकता है। विकिपीडिया के मुख्य सर्वर टैम्पा, फ्लोरीडा में है, अतिरिक्त सर्वर एम्सटर्डम और सियोल में हैं।
<p class="note" style="width:200px;float:left;text-align:left;margin-right:10px"><strong>काम की टिप</strong>: विकिपीडिया का सर्च आप फायरफॉक्स में भी जोड़ सकतें हैं। बस <a href="http://mycroft.mozdev.org/wikipedia-search-plugins.html">इस पृष्ठ</a> पर जायें और हिन्दी विकिपीडिया के सर्च इंजिन के लिए Wikipedia (hi) क्लिक करें।</p>
<p>निपुण लोगों द्वारा बनाए गए विश्वकोश न्यूपीडिया के पूरक के रूप में 29 जनवरी, 2001 में इसकी शुरुआत हुई। अब यह विकिमीडिया फाउन्डेशन द्वारा संचालित है जो एक गैर-लाभकारी संस्था है। 2006 के मध्य में इसमें 46 लाख से भी ज्यादा लेख थे, सिर्फ अंग्रेज़ी भाषा में ही 12 लाख से भी ज्यादा लेख थे। यह 200 से भी ज्यादा भाषाओं में है, जिसमें से 15 भाषाओं में 50 हज़ार से भी ज्यादा लेख हैं। जर्मन भाषा के विकिपीडिया को डीवीडी में भी वितरित किया गया है। </p>
<p>विकिपीडिया के संस्थापक <a title="Jimmy Wales" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jimmy_Wales" target="_blank">जिमी वेल्स</a> के शब्दों में यह &#8220;विश्व के प्रत्येक व्यक्ति के लिये, उनके अपनी भाषा में एक बहुभाषीय, मुक्त, सबसे अधिक मुमकिन गुणवत्ता वाला विश्वकोश बनाने और वितरित करने का एक प्रयत्न है।&#8221;</p>
<p>हालांकि विकिपीडिया की विश्वस्तता और सत्यता पर काफी विवाद भी होता रहा है. वेबसाईट पर आसानी तथा बर्बरता (vandalism) के साथ संपादन करने की क्षमता, असमान गुणवत्ता और कई भाषाओं में तथ्य के परोक्ष लोकप्रियता की प्राथमिकता इत्यादि की काफी आलोचनाएँ हुई हैं। फिर भी इसके मुक्त वितरण, निरंतर और काफी संख्या में बदलाव, विभिन्न क्षेत्रों और भाषाओं के समावेश ने इसे इंटरनेट पर विश्व के सबसे अधिक लोकप्रिय निर्देशिका संसाधनों में से एक बना दिया है।</p>
<div id="boxR" style="background: #ffffff;">
<h2>कोई राजनैतिक अभिलाषा नहीं: जिमी वेल्स</h2>
<div id="section-teaser">विकीपीडिया न केवल सामग्री की संख्या के मामले में सबसे अग्रणी है (कहते हैं कि इसमें एंसाईक्लोपीडिया ब्रिटैनिका के मुकाबले चार गुना ज़्यादा मसौदा है) वरन् लिनक्स जैसे मुक्तस्रोत उत्पादों के प्रयोग में सबसे आगे है। विकीपीडिया के संस्थापक <a title="Jimmy Wales" href="http://en.wikipedia.org/wiki/Jimmy_Wales" target="_blank">जिमी वेल्स</a> हाल ही में भारत प्रवास पर आये और निरंतर के सवालों के उन्होंने संक्षिप्त पर करारे जवाब दिये। विकीपीडिया जल्द ही एक नये अवतार की तैयारी में भी है जिसके अंतर्गत अधिक स्थाई लेख होंगे जिनका प्रिंट या डीव्हीडी जैसे माध्यमों पर स्थानांतरित किया जा सके। प्रस्तुत है जिम्बो, जैसा कि उन्हें विकीपीडियन पुकारते हैं, से निरंतर के ईमेल साक्षात्कार के अंशः</div>
<p style="align:center;text-align:center"><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/jummy_wales.jpg" border="0" alt="जिमी वेल्स" align="center" /></p>
<p><strong>इस तरह की निंदा को आप किस तरह से देखते हैं? क्या मुट्ठी भर संपादकों की मदद से आप सभी सामग्री पर नज़र रख पायेंगे?</strong><br />
आपको ऐसा क्यों लगता है कि केवल हमारे पास ही मुट्ठी भर संपादक हैं। किसी भी प्रकाशन संस्थान के पास ज़्यादा नहीं होते।</p>
<p><strong>अन्य भाषाओं, जैसे हिन्दी, में विकीपीडिया के भविष्य के बारे में आप क्या सोचते हैं?</strong><br />
तेज़ बढ़त! पूरे विश्व में हम सभी भाषाओं में मजबूत विकास देख रहे हैं।</p>
<p><strong>अंग्रेज़ी से इतर भाषाओं में विकीपीडिया की संपादकीय नीति का अनुसरण कैसे सुनिश्चित किया जाता है? क्या इनमें वैडलिस्म की घटनायें ज्यादा होती हैं?</strong><br />
बेशक, पर वैंडलिस्म कुल मिलाकर एक छोटी सी समस्या है और खास महत्वपूर्ण नहीं।</p>
<p><strong>कैंपेन विकिया क्या है? क्या इसे आपकी राजनैतिक अभिलाषा की ओर बढ़ाया कदम माना जा सकता है?</strong><br />
मेरी कोई राजनैतिक अभिलाषा नहीं है।</p>
<p><strong>पाँच वर्षों बाद विकीपीडिया किस रूप में होगा?</strong><br />
बेहतर सवाल होता कि विकीपीडिया के पाँच वर्षों बाद दुनिया किस रूप में होगी।</p>
<p><em>[जिमी वेल्स का चित्र, सौजन्यः किरुबा शंकर]</em></p>
</div>
<p>विकिपीडिया के लिए धन की व्यवस्था विकिमीडीया फाउन्डेशन के ज़रिये होती है। वर्ष 2005 की चौथी तिमाही में इसकी जरुरत 3,21,000 अमरीकन डॉलर थी, जिसमें 60% हार्डवेयर के लिए आवश्यक था।</p>
<p>विकिपीडिया को मई 2004 में दो प्रमुख सम्मान मिले: पहला प्रिक्स आर्स इलेक्ट्रोनिका द्वारा गोल्डन नीसा फार डिजीटल कम्युनीटीज़; दुसरा कमुनिटी क्षेत्र में जजों द्वारा वेबी सम्मान। साथ ही विकिपीडिया को कई स्रोत्रों से प्रशंसा भी मिली है, जिनमें प्रमुख हैं: बीबीसी न्युज़, वाशिंगटन पोस्ट, द इकोनॉमिस्ट, न्यूज़ वीक, टाइम मैगज़ीन और रीइडर-डाइजेस्ट। टाइम मैगज़ीन ने विकिपीडिया के संस्थापक जिमी वेल्स को वर्ष 2006 के विश्व के 100 सवसे प्रभावशाली व्यक्तियो में से एक भी बताया।</p>
<h2>विभिन्न भाषाओं में संस्करण</h2>
<p>जुलाई 2006 तक विकिपीडिया के 151 भाषाओं में सक्रिय संस्करण है, कुल 229 भाषाओं में संस्करण है जो भिन्न अवस्थाओं में हैं। भिन्न भाषाओं के संस्करण स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं। इन संस्करणों के अंशों का एक-दूसरे से कोई संबंध नहीं है, न ही इनके लेखों का कोई संबंध है, और न ही किसी भी लेख के एक भाषा से दूसरी भाषा में अनुवाद की आवश्यकता। </p>
<p>विकिपीडिया में स्वचालित अनुवाद का स्पष्ट निषेध है, हालांकि निपुण लोगों द्वारा अनुवाद का स्वागत भी होता है। भिन्न भाषाओं के संस्करणों को समान नीति जैसे कि &#8220;निष्पक्ष दृष्टिकोण&#8221; के जरिए बांधा गया है। लेखों और चित्रों को भिन्न संस्करणों के बीच इंटरविकि (interwiki) के जरिए जोडा जा सकता है, लेखों के अनुवाद के लिये अनुरोध भी किया जा सकता है। हालांकि अनुवादित लेख काफी कम संख्या में हैं। अलेक्क्षा (Alexa) के अनुसार अंग्रेजी विकिपीडिया कुल ट्रैफिक का केवल 60% ही प्राप्त करता है। जबकि अन्य 40% भिन्न भाषाओं में है। मुख्य भाषाओं में अंग्रेजी, जर्मन, फ्रांसीसी, पोलिश, जापानी, डच, स्वीडिश, इतालवी, पुर्तगाली और स्पैनिश शामिल हैं।</p>
<h2>हिन्दी विकिपीडिया</h2>
<p>हिन्दी में विकिपीडिया की शुरुआत जुलाई 2003 में हुई थी। आज हिन्दी विकिपीडिया मे करीब 1500 मुख्य लेख है। इसमे भुगोल, इतिहास, व्यक्तिगत जीवन, विज्ञान, राजनिति, फिल्में, खेल और साहित्य के लेख प्रमुख हैं। हिन्दी विकिपीडिया में स्वयंसेवकों का घोर अभाव है। कई लेख अभी पूरे नहीं हैं। हिन्दी साहित्य, भारत और सम्बन्धित विषयों की जानकारी हिन्दी से ज्यादा तो अँग्रेज़ी और जर्मन विकिपीडिया पर ही है।</p>
<p>विकिपीडिया के काफी फायदे है, इन फायदों को हिन्दी बोलने और समझने वाले लोगों तक पहुचानें के लिए हमें हिन्दी विकिपीडिया का विकास करना चाहिए। विकि स्वरूप के कारण लेखों की कड़ियों को शब्दों के साथ जोड़ना आसान है, इससे न केवल लेख के बारे मे जानकारी मिलती है, बल्कि उससे जुड़ी अन्य रोचक जानकारियाँ भी प्राप्त होती हैं, उदाहरण के लियेः अगर आप मुंबई विस्फोटों से जुड़ा लेख पढ रहे हैं तो उसमे आपको मुंबई के लोकल ट्रेनों के लेख की कड़ी भी मिल जाएगी। </p>
<p>इंटर्विकि से भिन्न भाषाओ के लेख जुडे होते है। हिन्दी मे महात्मा गांधी के लेख के साथ लगभग 31 और भाषाओ मे उस लेख की कडी है, किसी और भाषा जैसे की गुजराती मे लिखा गया लेख तुरंत ही पढ सकते है। विकिपिडीया मे काफी तेज़ी से समसामयिक विषयों के बारे में लेखो का विकास हो सकता है जैसे कि मुंबई विस्फोटों के खबर का ज़ाहिर होने के चंद मिनटों में ही उसके बारे में अंग्रेजी विकिपीडिया में प्रासंगिक कड़ियों के साथ लेख मौजूद था। ऐसे ही परिणाम आपसी सहयोग से हम हिन्दी में क्यों नहीं प्राप्त कर सकते?</p>
<p>गूगल और अन्य सर्च इंजनों की खोज करने पर विकिपीडिया के लेख परिणामों में प्रमुखता से उभरते हैं। ज़ाहिर है कि हिन्दी विकिपीडिया के विकास से इंटरनेट पर हिन्दी का इस्तेमाल करने वाले लोगों की संख्या में भी वृद्धी होगी। लोगों को हिन्दी का प्रयोग करने हेतु एक और मंच मिलेगा। विकिपीडिया एक ऐसा मंच है जो शिकायत का मौका नहीं देता है, बल्कि आपको अपनी ही शिकायत दूर करने का मौका देता है। अगर आपको लगता है कि कोई जानकारी अधूरी है या गलत है, तो आप उसमें घटजोड़ या सुधार कर सकते हैं। हिन्दी में लगभग हर विषय पर जानकारी की मांग है, जो हम सबको पूरी करनी चाहिए। देखा जाय तो विकिपीडिया चिट्ठाकारिता का भी पुरक है, निजभाषा के प्रति लगाव का जो मुज़ाहिरा हम चिट्ठाकारी से करते हैं वो साथ साथ विकिपीडिया द्वारा भी सर्वथा संभव है।</p>
<p class="note">यह आलेख अंग्रेज़ी के <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Wikipedia">इस मूल लेख</a> का अनुवाद है। सहयोगः रवि श्रीवास्तव</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2166&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>आइए वर्डप्रेस अपनाएँ – भाग 2</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2005 15:42:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

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		<description><![CDATA[रमण कौल के लेख के दूसरे भाग में जानें ब्लागर से वर्डप्रेस में ब्लाग आयातित करना, थीम परिवर्तन और प्लगइन संस्थापन]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">वर्डप्रेस पर <a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a> के लेख का यह दूसरा भाग है। लेख के इस भाग में हम आप को बताएँगे कि आप ब्लॉगर से बनाई प्रविष्टियाँ वर्डप्रेस में कैसे आयातित कर सकते हैं। इस के इलावा बात करेंगे थीम परिवर्तन की, प्लग-इन इन्सटॉल करने की और कार्यान्वित करने की। आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्‍त कर सकते हैं इस लेख के अन्त में टिप्पणी के रूप में या patrikaa एट gmail डॉट कॉम पर सम्पादक को लिखे पत्र के रूप में।</div>
<p><img class="alignleft" style="margin: 1px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="निधि" hspace="1" vspace="1" width="135" height="140" align="right" /><span style="font-size: large;">पि</span>छले अंक में <a href="http://nirantar.org/0605-nidhi">आपने पढ़ा</a> कि वर्डप्रेस को क्यों चुनें, और कैसे स्थापित करें। संभावना है कि आप ने अपना नया चिट्ठा वर्डप्रेस पर स्थापित करने के बारे में विचार किया होगा। यदि आप पहले से किसी चिट्ठे का प्रबन्धन कर रहे हैं (ब्लॉगस्पॉट या किसी अन्य तन्त्र पर) और यदि वर्डप्रेस के कई गुणों के चलते आपने उसे प्रयोग करने का निश्चय कर लिया है तो एक समस्या यह रहेगी कि पुरानी प्रविष्टियों का क्या किया जाए। एक विकल्प तो यह है कि आप पुरानी प्रविष्टियाँ पुराने स्थान पर ही रहने दें और वर्डप्रेस नई प्रविष्टियों के साथ आरंभ करें। या फिर यदि आप चाहते हैं कि पुरानी प्रविष्टियों को वर्डप्रेस पर लाया जाए तो आगे पढ़ें।</p>
<h2>प्रविष्टियों का ब्लॉगर से वर्डप्रेस पर स्थानान्तरण</h2>
<p>वर्डप्रेस के नए संस्करण के साथ एक PHP स्क्रिप्ट है जो ब्लॉगर से प्रविष्टियों को वर्डप्रेस में आयातित करने के लिए बनाई गई है। जब आप ने वर्डप्रेस को अपने सर्वर पर स्थापित किया तो उस के साथ यह फाइल भी स्थापित हो गई है।  इस फाइल का नाम है import-blogger.php और यह आपके सर्वर के /wp-admin/ फोल्डर में रखी हुई है। यानी, यदि आप का चिट्ठा www.xyz.com/blog पर है तो यह स्क्रिप्ट चलाने के लिए आप को अपने ब्राउज़र में http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php पर जाना पड़ेगा। पर अभी नहीं। पहले आप को कुछ काम अपने ब्लॉगर पर करना है। घर बदलने से पहले सामान पैक करेंगे या नहीं? नहीं करेंगे तो सामान टूटी फूटी हालत में पहुँचेगा।</p>
<h2>ब्लागर पर प्रविष्टियों की &#8220;पैकिंग&#8221; और नई जगह भेजना</h2>
<p>हमें करना यह है कि अपने प्रविषटियों से सम्बन्धित सारी सूचनाएँ, यानी तारीख, मसौदा, आदि एक ऐसी सारणी के आकार में बनानी है जिसे वर्डप्रेस समझ सके। हम ब्लॉगर को यह निर्देश देंगे कि यह सारणी हमारे सर्वर पर छाप दे। इस के लिए निम्नलिखित निर्देशों का पालन करें</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/bl1.jpg" alt="" hspace="1" vspace="1" width="428" height="496" align="right" /></p>
<ul>
<li>अपने ब्लॉगर के खाते में लॉग-इन कीजिए।</li>
<li>अब अपने चिट्ठे का नियन्त्रण पटल खोल कर Settings, Publishing पर क्लिक करें। फिर Switch to FTP को चुनें।</li>
<li>अगले पन्ने पर आप को उस बेब सर्वर का पता देना पड़ेगा जिस पर आप ने अपना वर्डप्रेस चिट्ठा स्थापित किया है। उदाहरणतः xyz.com/blog/ । सारी सूचनाएँ भरने के बाद Save Settings पर क्लिक करना न भूलें। नीचे दिए सारे बदलाव पूरे करने से पहले Republish पर क्लिक न करें।</li>
<li>अब Formatting पर क्लिक करें। Date language यदि आप ने हिन्दी रखी हुई है तो उसे English US में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में अन्तिम विकल्प)। इस के अतिरिक्त Timestamp format को mm/dd/yyyy hh:mm:ss AM/PM प्रारूप में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में पहला विकल्प)। फिर Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>Archiving पर जा कर Archive Frequence को Monthly कर दें (यदि पहले से नहीं है)। Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Templates पर जाएँ। यहाँ आप भारी बदलाव करने जा रहे हैं इसलिए पहले अपने टेंपलेट के मसौदे को किसी टेक्सट फाइल में कॉपी कर के किसी सुरक्षित जगह पर संचित करें। अब ब्लॉगर पर अपने टेंपलेट का सारा मसौदा हटा कर केवल नीचे दी हुई पंक्ति उस में डाल दें,&lt;$BlogItemDateTime$&gt;|||&lt;$BlogItemAuthorNickname$&gt;|||&lt;$BlogItemBody$&gt;|||&lt;$BlogItemNumber$&gt;|||&lt;$BlogItemSubject$&gt;और Save Template Changes पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Republish पर क्लिक करें। यह काम सफलतापूर्वक होने का अर्थ है कि आप का लगभग सारा काम हो गया है, यानी सामान पैक हो कर नई जगह पहुँच गया है। अब खोलने और सजाने भर की देर है।</li>
<li>अपने सर्वर पर FTP के द्वारा जा कर सुनिश्चित करें कि आप की फाइलें पहुँच गई हैं। उन के नाम कुछ इस तरह होंगे &#8211; 2005_01_01_wordpress.php। यदि आप को ऐसी कोई फाइल नहीं दिखती तो आप को यह सारा काम दोबारा करना पड़ेगा।</li>
</ul>
<h2>वर्डप्रेस पर प्रविष्टियों का आयात</h2>
<p>बाकी का काम आसान है। अपने ब्राउज़र में नीचे दी गई पंक्‍ति टाइप कर के चला दें</p>
<pre>http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php</pre>
<p>आप की प्रविष्टियाँ आप के वर्डप्रेस चिट्ठे में आयातित हो जाएँगी।</p>
<p>यह कार्य सफलता के साथ हो जाने पर आप चाहें तो ब्लॉगर पर जाकर आप वहाँ किए गए बदलाव पलट सकते हैं ताकि आप का ब्लॉगर चिट्ठा भी ज़िन्दा रहे।</p>
<p>एक बात और, ऊपर बताई गई import-blogger.php फाइल वर्डप्रेस की अधिकृत स्क्रिप्ट फाइल है और यह फाइल यह लेख लिखे जाने के समय तक प्रविष्टियाँ तो ब्लॉगर से वर्डप्रेस में आयातित करती है, पर टिप्पणियाँ नहीं। यदि आप के चिट्ठे पर बहुत अधिक टिप्पणियाँ हैं और आप उन्हें बिना अधिक मेहनत किए आयातित करना चाहते हैं तो <a href="http://www.skeltoac.com/2005/03/12/from-blogger-to-wordpress-2/">ऍण्डी स्केल्टन</a> की तरकीब का इस्तेमाल करें। उम्मीद है वर्डप्रेस के अगले संस्करण में यह कार्यशीलता भी जुड़ जाएगी।</p>
<h2>वर्डप्रेस में अभिकल्प परिवर्तन यानी नई थीम लगाना</h2>
<p>अब सामान नए घर में आ गया तो शायद आप कुछ साज-सजावट की सोच रहे होंगे। वर्डप्रेस में विभिन्न डिज़ाइनों या थीमों को कार्यान्वित करना काफी आसान है। थोड़ी सी मेहनत है तो वह है थीम ढ़ूढने और डाउनलोड-अपलोड करने में। सब से पहले देखें कि पहले से उपस्थित थीम को कैसे कार्यान्वित किया जाए।</p>
<p>अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित अभिकल्पों की सूची मिल जाएगी। सक्रिय अभिकल्प के सामने लिखा होगा &#8220;सक्रिय अभिकल्प&#8221; और शेष अभिकल्पों के सामने लिखा होगा &#8220;चुनें&#8221;। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। पृष्ठ के ऊपर जालस्थल देखें पर क्लिक करें और देखें कि यह अभिकल्प आप के चिट्ठे पर कैसा लगता है। चाहें तो वापस जा कर कोई और अभिकल्प चुन सकते हैं।</p>
<p>वर्डप्रेस के इंस्टालेशन के साथ केवल दो या तीन अभिकल्प आते हैं, इसलिए यदि आप को कोई और अभिकल्प प्रयोग करना है तो वह आप को अलग से इन्सटाल करना पड़ेगा। वर्डप्रेस का आधिकारिक थीम पृष्ठ <a href="http://wordpress.org/extend/themes/">यहाँ</a> है। जो थीम आप को अच्छी लगे, उस के &#8220;डाउनलोड&#8221; पर क्लिक कीजिए। ज़िप फाइल को खोल कर जो फोल्डर बनेगा, उसे ज्यों का त्यों अपने सर्वर के wp-content/themes/ फोल्डर में अपलोड कर दीजिए। अब आप वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँगे, और &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करेंगे तो आप को उपस्थित अभिकल्पों की सूची में नया अभिकल्प भी नज़र आएगा। इसे &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक कर के आप सक्रिय कर सकते हैं।</p>
<p>यदि वर्डप्रेस के आधिकारिक थीम पृष्ठ पर दिए गए अभिकल्प आप को काफी नहीं लगते, तो <a href="http://codex.wordpress.org/Using_Themes/Theme_List">यहाँ</a>, <a href="http://www.alexking.org/index.php?content=software/wordpress/themes.php">यहाँ</a>, <a href="http://themes.wordpress.net/theme-viewer.php">यहाँ</a> और <a href="http://www.bloggingpro.com/wordpress-theme-gallery/">यहाँ</a> देखिए, या फिर <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+themes">गूगल भैया</a> से पूछिए।</p>
<h2>वर्डप्रेस में प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन</h2>
<p>वर्डप्रेस में अतिरिक्त कार्यशीलता प्लग-इन के माध्यम से जोड़ी जाती है। एक प्लग-इन जो बहुत लाभदायक है वह है &#8220;स्पैम-कर्मा&#8221;। यदि आप के चिट्ठे के ऊपर टिप्पणियों द्वारा लोग अपना जुए का या सेक्स का कारोबार बढाना चाहते हैं तो आप को कोई तो हथियार चाहिए उन्हें रोकने के लिए। प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन थीम के स्थापन और कार्यान्वयन जैसा ही है। अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्लग-इन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित प्लग-इन्ज़ की सूची मिल जाएगी। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;सक्रिय करें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। नए प्लग इन खोजने और डाउनलोड करने के लिए <a href="http://wordpress.org/extend/plugins/">यहाँ</a>, <a href="http://codex.wordpress.org/Plugins">यहाँ</a>, <a href="http://www.bloggingpro.com/archives/category/wordpress-plugins/">यहाँ</a> जाएँ या <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+plugin">गूगल</a> से पूछें।</p>
<p class="note">यह लेख 2005 में लिखा गया था और नवीनतम वर्डप्रेस हेतु लागू नहीं होता. अब वर्डप्रेस में आयात प्रक्रिया काफी कम कष्टकर और सरल कर दी गई है. &#8211; संपादक</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2910&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>दिल्ली अभी दूर, पर चलते रहना है ज़रूर</title>
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		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-03#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2005 14:32:13 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विनय जैन</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>

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		<description><![CDATA[संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा जारी हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरणों और फ़ॉण्ट संग्रह की मुफ़्त सीडी से हिन्दी के प्रयोक्‍ताओं की आशाओं को पूरी होगी या नहीं यह जानने के लिए <strong>विनय जैन</strong> ने इन उपकरणों का परीक्षण किया।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img class="alignleft" style="margin: 1px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="निधि" hspace="1" vspace="1" width="135" height="140" align="right" />गत सप्‍ताह भारत सरकार के <a href="http://www.ildc.gov.in/">संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय</a> ने हिन्दी सॉफ़्टवेयर <a href="http://www.bbc.co.uk/hindi/science/story/2005/06/050620_hindi_software.shtml">उपकरणों और फ़ॉण्टों का एक संग्रह</a> मुफ़्त वितरण के लिए प्रस्तुत किया। इंटरनेट पर हिन्दी के दीवानों के लिए यह समाचार चिर-प्रतीक्षित था। सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम हिन्दी के प्रयोक्‍ताओं की आशाओं को पूरा करेगा या उन पर पानी फेरेगा, यह जानने के लिए <strong>विनय जैन</strong> ने इन उपकरणों का परीक्षण किया। पढें, निरन्तर के लिए लिखी उनकी यह विवेचना।</p>
<p>आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्‍त कर सकते हैं, इस लेख के अन्त में टिप्पणी के रूप में, या patrikaa एट gmail डॉट कॉम पर सम्पादक को लिखे पत्र के रूप में।</p></div>
<div class="dropCap">भा</div>
<p>रत सरकार के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अभी हाल ही में हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरणों और फ़ॉण्टों का एक संग्रह मुफ़्त वितरण के लिए प्रस्तुत किया है। यह संग्रह डाउनलोड के लिए <a href="http://www.ildc.gov.in/hindi/hdownloadhindi.htm">टी.डी.आइ.एल की वेबसाइट</a> पर भी उपलब्ध है। सरकार की तरफ़ से ऐसा कुछ आये तो उसकी एक विशेष अहमियत होती है।<img class="alignright size-full wp-image-2889" style="margin: 8px; border: 0pt none;" title="cd_cover" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/cd_cover.jpg" alt="" width="200" height="200" />जिस अभूतपूर्व पैमाने पर यह वितरण किया जा रहा है उससे आशा और बलवती हुई। फिर, देर से आये तो दुरुस्त क्यों नहीं आयेंगे। कुछ ऐसी ही अपेक्षाओं के साथ मैंने यह संग्रह टी.डी.आइ.एल की वेबसाइट से डाउनलोड किया। डाउनलोड में कुछ समस्याएँ रहीं, जैसे एक-दो बार डाउनलोड का रुक जाना, पर टी.डी.आइ.एल के सर्वर पर भारी लोड होने के संदेह का लाभ दें तो इतना मुश्किल भी नहीं रहा। यहाँ ये बता देना उचित होगा कि मैं इंटरनेट से ब्रॉडबैंड के जरिये जुड़ा हूँ।</p>
<p>पहली झलक में मुझे यह संग्रह और इसके घटक कैसे लगे, यह लिख रहा हूँ। बहुत संभव है कि दूसरों के अनुभव मुझसे अलग रहे हों।</p>
<h2>फ़ॉण्ट ढेर सारे, पर थके हारे</h2>
<p>पूरे पैकेज का सबसे आकर्षक भाग है ढेर सारे फ़ॉण्ट &#8211; यूनिकोड और कीमैप-आधारित टी.टी.एफ़, दोनों तरह के। इसका प्रचार भी बाकी घटकों से अधिक किया जा रहा है। पर अफ़सोस कि एक भी फ़ॉण्ट मुझे ऐसा नहीं लगा जिसमें हिंदी के मानक फ़ॉण्टों में से एक बनने की क्षमता हो। ज़्यादातर फ़ॉण्टों की गुणवत्ता मध्यम या निचले दर्जे की है।
<div id="pullQuoteL">पूरे पैकेज का सबसे आकर्षक भाग है ढेर सारे यूनिकोड और कीमैप-आधारित टी.टी.एफ़ फ़ॉण्ट। पर ज़्यादातर फ़ॉण्टों की गुणवत्ता मध्यम या निचले दर्जे की है।</div>
<p>इसके अलावा अधिकतर टाइपफ़ेस सरल पाठ (text) के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इस वितरण से एक आम वेब-विकासक को कुछ खास फ़ायदा नहीं होने वाला। चित्रों या रेखांकनों के लिए भले ही इनका प्रयोग कर लिया जाए, वेब पन्नों पर उपयोग के रास्ते अभी भी बंद हैं। वे तभी खुल सकते हैं जब कुछ मानक फ़ॉण्ट (जैसे अंग्रेज़ी में एरियल/हेल्वेतिका, वरडाना, या टाइम्स हैं) हर प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध हों।</p>
<p>टी.टी.एफ़ युग से लेकर यूनिकोड तक इतने सालों में भी हिंदी कम्प्यूटिंग के पास एक भी मानक या सर्वमान्य टाइपफ़ेस नहीं है। यूनिकोड के बाद स्थिति बदलनी चाहिए थी। पर पूरा प्रयास अलग दिशा में जा रहा है। एक आधिकारिक संस्था के लिए प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि वह कुछ मानक टाइपफ़ेस तय करे और फिर और फिर उन मानकों को सर्वमान्य बनाने के लिए काम करे। फिर उनकी सर्वव्यापकता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है। मेरे विचार में, टाइपफ़ेसों के फैलाव का सबसे अच्छा तरीका है उन्हें ऑपरेटिंग प्रणालियों के साथ उपलब्ध करवाना।</p>
<p>बेहतर होता यदि फ़ॉण्ट विकासकों ने एक या दो टाइपफ़ेसों पर पूरा ध्यान दिया होता और साधारण स्टाइल वाले पर श्रेष्ठ गुणवत्ता के फ़ॉण्ट बनाये होते। और फिर, इस वितरण के साथ-साथ, सरकार ने ऑपरेटिंग प्रणाली बनाने वाली कम्पनियों से बात करके उन फ़ॉण्टों को सीधे ओएस के जरिये उपलब्ध कराया होता। यह काम अब भी हो सकता है।</p>
<p>बहरहाल आइये, संग्रह के कुछ अन्य मुख्य सॉफ़्टवेयरों की बात करें।</p>
<h2>चित्रांकन &#8211; इन्तज़ार और अभी</h2>
<p><div class="wp-caption alignleft" style="width: 360px"><img style="border: 0pt none; padding: 10px;" title="चित्रांकन" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/chitrankan.jpg" border="0" alt="" width="350" height="263" align="left" /><p class="wp-caption-text">चित्रांकन</p></div>चित्रांकन &#8211; हिंदी कम्प्यूटिंग जगत में अगर किसी चीज़ की बेसब्री से प्रतीक्षा थी तो वह था एक ओ.सी.आर (ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन) सॉफ़्ट्वेयर, यानि ऐसा औजार जो स्कैन किए नागरी अक्षरों को चित्र-रूप से पाठ-रूप में बदल सके। यह अकेला सॉफ़्ट्वेयर हिंदी कम्प्यूटिंग में क्रांति लाने की क्षमता रखता है। पर अभी तक मैं इसे संस्थापित (इंस्टॉल) नहीं कर पाया हूँ। पहले तो संस्थापन फ़ाइल चल ही नहीं रही थी। सी-डैक को लिखा। इस बात का श्रेय उन्हें दूँगा कि सहायता समय पर (एक कार्य-दिवस में) मिल गई। पर अब संस्थापन स्थिति-प्रदर्शक 100% पर जाकर रुक जाता है। घंटों कुछ नहीं होता। आखिर रद्द करना पड़ता है।</p>
<p>(बाकी मित्रों की मदद के लिए बता दूँ कि अगर आप संस्थापना के समय यह संदेश देखें कि &#8216;chitrankan.ini is not present&#8217; तो chitrankan.ini को अपने ड्राइव के रूट फ़ोल्डर (C:\, D:\ आदि) में डाल दें। और फिर से संस्थापक फ़ाइल चलाएँ।)</p>
<h2>फ़ायरफ़ॉक्स हिंदी</h2>
<p>फ़ायरफ़ॉक्स (ब्राउज़र) &#8211; अभी तक कोई तकलीफ़ नहीं। पर हिंदीकरण में सुधार की आवश्यकता मुँह बाए है। अटपटापन फिर भी स्वीकार किया जा सकता है, पर &#8216;शैली&#8217; को &#8216;शैलि&#8217; लिखने जैसी वर्तनी-अशुद्धियाँ बहुत अखरती हैं।</p>
<h2>ईमेल प्रबंधक &#8211; चला नहीं</h2>
<p>कोलम्बा (ईमेल प्रबंधक) – अच्छी तरह से संस्थापित तो हो गया, पर चला नहीं। कार्यक्रम चलाने पर एक कमांड विन्डो खुलती है और कुछ नहीं होता। थक कर अ-संस्थापित कर चुका हूँ।</p>
<h2>ऑफ़िस का एक अच्छा विकल्प</h2>
<div class="wp-caption alignright" style="width: 410px"><img style="padding: 10px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/openoffice.jpg" border="0" alt="ओपन ऑफ़िस" width="400" height="290" align="right" /><p class="wp-caption-text">ओपन ऑफ़िस</p></div>
<p>ओपन ऑफ़िस &#8211; मँहगे मॉइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस का एक अच्छा विकल्प। अच्छी तरह से काम कर रहा है। हिंदी अनुवाद  अस्पष्टताओं, गलतियों, और वर्तनी अशुद्धियों से भरा है।  एक हिंदी शब्द-संसाधक में हिंदी वर्तनी-जाँच का न होना विडम्बना है या हास्यास्पद, नहीं कह सकता।</p>
<h2>तुरत-संदेश वाहक &#8211; पंख कटा कबूतर</h2>
<p>गैम (तुरत-संदेश वाहक) &#8211; यह एक ओपन सोर्स इंस्टैंट मैसेंजर क्लायंट है, जो  खासा लोकप्रिय भी है। इस अकेले सॉफ़्ट्वेयर के जरिये आप अपनी याहू, एमएसएन, आइसीक्यू, एओएल व अन्य कई तुरत-संदेश सेवाओं का प्रयोग कर सकते हैं। संस्थापित हुआ लेकिन चलाने पर त्रुटि संदेश देकर बंद हो जाता है।</p>
<h2>पी2पी संचालक</h2>
<p>लाइमवायर (पी2पी संचालक) &#8211; पी2पी यानि &#8216;पियर से पियर&#8217;। &#8216;पियर&#8217; नेटवर्क से जुड़े एक आम कम्प्यूटर को कहते हैं और पी2पी तकनीक हर पियर को आपस में सीधे जोड़ने का काम करती है। पी2पी सेवाओं का मुख्य उद्देश्य और उपयोग फ़ाइलों की अदला-बदली करना होता है। सीधे जुड़ाव और कुछ अन्य कॉम्प्लेक्स तकनीकों के प्रयोग की वजह से यह अदला-बदली बाकी तरीकों के मुकाबले तेज और आसान हो जाती है। चूँकि मैं इस सॉफ़्टवेयर में विशेष रुचि नहीं रखता, मैंने इसे संस्थापित नहीं किया।</p>
<p>ओपन ऑफ़िस, फ़ायरफ़ॉक्स, कोलम्बा, गैम, और लाइमवायर एक संगठित पैकेज के तौर पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। पूरे संग्रह का सबसे बड़ा हिस्सा (करीब 240 एमबी) इसी पैकेज से बनता है।</p>
<h2>तकनीकी शब्दकोश शब्दिका &#8211; यूनिकोड नहीं समझता</h2>
<p><div id="attachment_2899" class="wp-caption alignleft" style="width: 360px"><img class="size-full wp-image-2899" style="padding: 10px;" title="शब्दिका" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/shabdika.jpg" alt="" width="350" height="252" /><p class="wp-caption-text">शब्दिका</p></div>शब्दिका (सी-डैक निर्मित) &#8211; यह प्रशासनिक, बैंकिंग, और तकनीकी शब्दावली का एक कोश है। इसकी कमजोरियों की सूची बहुत लंबी है। हिंदी शब्दों के लिए यह यूनिकोड की बजाय शुषा का प्रयोग करता है। किसी शब्दकोश में खोज सुविधा का न होना उसे वैसे ही अनुपयोगी बना देता है। कोई सहायता उपलब्ध नहीं है। इसके डाटा प्रारूप का मुक्त होना भी आवश्यक है ताकि कोई बाहरी शब्दावली इसमें आसानी से जोड़ी जा सके।</p>
<p>इन कुछ मूलभूत सुविधाओं और एक अच्छे इंटरफ़ेस के साथ यही कोश बहुत काम का बन सकता है। पर अभी तो यह अल्फ़ा स्तर का प्रयास लगता है।</p>
<h2>परिवर्तन 2.0 &#8211; काम का है</h2>
<p>परिवर्तन 2.0 (प्रिया इन्फ़ॉर्मैटिक्स द्वारा निर्मित) – यह सुविधा उपकरण बहुत काम का है पर मुश्किल इंटरफ़ेस की उसी समस्या से ग्रस्त है जिससे इस संग्रह के लगभग बाकी सभी सॉफ़्टवेयर, हालाँकि इसकी &#8220;रंगीनी&#8221; अनूठी है। यह सुविधा हिन्दी के विभिन्न कीमैपों के बीच परस्पर परिवर्तन संभव करती है। उदाहरण के लिए, राजस्थान पत्रिका या भास्कर की वेबसाइटों के स्वामित्व अधीन फ़ॉण्टों में लिखे पाठ को यूनिकोड में बदला जा सकता है। लगभग सभी हिंदी कीमैप समर्थित हैं।</p>
<h2>पाठ-से-वाक सुविधा</h2>
<p><div id="attachment_2902" class="wp-caption alignright" style="width: 360px"><img class="size-full wp-image-2902" style="paddning: 10px; border: 0px none;" title="परिवर्तन" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/parivartan.jpg" alt="" width="350" height="274" /><p class="wp-caption-text">परिवर्तन</p></div>वाचक (प्रोलॉजिक्स द्वारा निर्मित) – यह इस संग्रह में शामिल दो &#8216;पाठ-से-वाक&#8217; (text-to-speech) रूपांतरण सॉफ़्टवेयरों में से एक है। बिना पूछे या बताये, यह आपके MS-Office कार्यक्रमों और इंटरनेट एक्सप्लोरर में खुद को जोड़ लेता है। ब्राउज़र प्लगिन तो काम भी नहीं करता।</p>
<p>एक और पाठ-से-वाक सुविधा (आइआइआइटी, हैदराबाद द्वारा निर्मित) – यह सुविधा कुछ-कुछ विंडोज़ 2000/XP के साथ उपलब्ध &#8216;Narrator&#8217; जैसी है। अभी यह सॉफ़्टवेयर सिर्फ यूनिकोड पाठ (text) फ़ाइलों के साथ काम करता है, ब्राउज़र पाठ को नहीं पढ़ सकता। किसी महिला की आवाज में किए गए उच्चारण साफ और स्पष्ट हैं। मुझे लगता है कि अगर इस पर काम जारी रहा (सुधार और समर्थन दोनों दिशाओं में) तो दृष्टिहीनों, कमजोर नज़र वालों, और अनपढ़ व्यक्तियों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। यह इस संग्रह के बेहतर घटकों में से है।</p>
<h2>वर्तनी-जाँचक &#8211; यूनिकोड नहीं समझता</h2>
<p>जीस्ट स्पेलचेकर यानि वर्तनी-जाँचक &#8211; इसे संस्थापित करने पर यह अपने आप को MS-Office कार्यक्रमों में उपकरण-पट्टी के तौर पर जोड़ लेता है। पर इसकी सबसे बड़ी, बल्कि इसे बेकार बना देने वाली हद तक बड़ी, कमजोरी है कि यह यूनिकोड पाठ पर काम नहीं करता।</p>
<h2>दिल्ली दूर है</h2>
<p>ये थे कुछ मुख्य सॉटवेयर और सुविधा-उपकरण जो कि इस संग्रह में शामिल हैं। इनके अलावा भी कुछ और सॉफ़्टवेयर हैं जिन्हें या तो मैं संस्थापित नहीं कर पाया या वे मुझे काम के नहीं लगे। इस पैकेज के मेरे अब तक के अनुभव का सार यह है कि अभी बहुत काम होना बाकी है। प्रयोक्ता-परीक्षण की कमी साफ नज़र आती है। नीयत और प्रयास बेशक सराहनीय हो सकते हैं, पर इसकी सफलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम नहीं लिए गए हैं। यह प्रस्तुति हड़बड़ी में की गई लगती है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने कुछ महीनों पहले ही विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं से वितरित की जाने वाली सीडी हेतु सामग्री चाही थी।  लगता है कई संस्थाओं ने दबाव में आकर अधकचरे उत्पाद ही दे दिये हैं। कोई हैरत नहीं होनी चाहिये अगर इस मंत्रालय के मुखिया जी की मातृभाषा तमिल, जिसे युद्धस्तर पर हिन्दी के प्रयास के साथ ही शुमार किया गया, की सीडी की भी यही हालत हो।</p>
<div id="pullQuoteR">यूनिकोड समर्थन के प्रयास आधे-अधूरे और बेमन से किए गए लगते हैं। इसी तरह usability की दिशा में काम शून्य के आस-पास है।</div>
<p>नीति स्तर पर भी कई समस्याएँ हैं। मसलन, यूनिकोड समर्थन के प्रयास आधे-अधूरे और बेमन से किए गए लगते हैं। जब तक पूरी मशीनरी इस बात को पक्का मान कर नहीं चलती कि भविष्य की योजनाएँ यूनिकोड आधारित ही होनी चाहिए, कोई भी प्रयास न केवल हमें वहीं खड़ा रखेगा जहाँ हम हैं, बल्कि पीछे भी ले जा सकता है। इसी तरह प्रयोगिता (usability) की दिशा में काम शून्य के आस-पास है। अधिकतर शामिल सॉफ़्टवेयरों के इंटरफ़ेस एक आम आदमी को छोड़िये, कम्प्यूटर के अनुभवी प्रयोक्ताओं को भी सिरदर्द दे सकते हैं। एक और कमजोरी खुद हिंदीकरण में है। अनुवाद का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। और वर्तनी की गलतियाँ जो बिल्कुल अस्वीकार्य होनी चाहिए, हर जगह पसरी पड़ी हैं। प्रस्तुति से पहले गहरा प्रयोक्ता-परीक्षण और अनुभवी हिंदी विशेषज्ञों द्वारा जाँच इन कमजोरियों को दूर कर सकती है।</p>
<p>इस प्रस्तुति के बाद का काम भी महत्वपूर्ण है। एक आइ.टी प्रोफ़ेशनल होने के बावजूद मुझे इस संग्रह को काम में लेने में मुश्किलें आई हैं। मैं सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूँ कि एक आम गैर-आइ.टी तकनीकी क्षेत्र का व्यक्ति जो बस कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करना चाहता है, इन सॉफ़्टवेयरों के साथ कैसे जूझ रहा होगा। बहुत संभव है कि वह इन्हें प्रयोग करने का विचार ही रद्द कर दे। इस संभावना को कम करने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी संस्थाओं द्वारा उसे इसके संस्थापन और प्रयोग में आवश्यक सहयोग और सहायता मिले। यह सहायता फ़ोन, ईमेल, डाक, वेबसाइट (सामान्य प्रश्नोत्तर) या व्यक्तिगत तौर पर उपलब्ध कराई जा सकती है।</p>
<p>साथ ही इस तरह का वितरण नियमित हो। कुछ समय बाद एक सुधरा और बड़ा पैकेज फिर वितरित किया जाना चाहिए। कम से कम वेबसाइट पर तो सुधारों और नये सॉफ़्टवेयरों का वितरण हमेशा चलते रहना चाहिए।</p>
<p>दिल्ली अभी दूर भले हो, चलते रहना जरूरी है।</p>
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		</item>
		<item>
		<title>आईये फॉयरफाक्स अपनाएं 3 – शक्तिसर्च</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-nidhi</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nidhi#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2005 11:30:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Firefox]]></category>
		<category><![CDATA[Search]]></category>
		<category><![CDATA[subLead]]></category>

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		<description><![CDATA[फॉयरफॉक्स की विशेषताओं को अपने सरल अंदाज में बताता <B>पंकज नरुला</b> की फॉयरफॉक्स श्रृंख्ला का यह तीसरा व अंतिम लेख है। इस अंक में आप पढ़ेगें कि कैसे गूगल सरीखे ज्यादा जाने जाए वाले सजालो के लिए शक्तिसर्च कैसे बनाएं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="निधि" hspace="1" vspace="1" align="right" />फॉयरफॉक्स की विशेषताओं को अपने सरल अंदाज में बताता <a href="http://hindi.pnarula.com/haanbhai">पंकज नरुला</a> की फॉयरफॉक्स श्रृंख्ला का यह तीसरा व अंतिम लेख है। <a href="http://www.nirantar.org/0305-nidhi">पहले भाग</a> में आप ने पढ़ा टैब के द्वारा बहुत से पन्ने व <a href="http://www.nirantar.org/0405-nidhi">दूसरे भाग</a> मे कड़ियाँ गरमा गरम के बारे में पढ़ा। इस अंक में आप पढ़ेगें कि कैसे गूगल सरीखे ज्यादा जाने जाए वाले सजालो के लिए शक्तिसर्च कैसे बनाएं।</p>
<p>इस लेख पर आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्‍त कर सकते हैं, इस लेख के अन्त में टिप्पणी के रूप में, या patrikaa एट gmail डॉट कॉम पर सम्पादक को लिखे पत्र के रूप में।</p>
</div>
<div class="dropCap">क</div>
<p>ई बार ऐसा होता है कि आप किसी एक खास सजाल पर बार बार जाते हैं। प्रायः यह सजाल किसी जानकारी ढूंढने से संबधित होते हैं। जैसे कि <a href="http://www.google.com/">गूगल</a>। हर व्यक्ति दिन में काफी बार इस पर जाता है। ब्राउजर के पते वाले खाने में बार बार इसका पता लिख कर जाना काफी दुःखदायक है। इसका आसान इलाज इसका बुकमार्क बना कर, बुकमार्क के द्मारा इस पर जाया जा सकता है। दूसरा तरीका है कई बार संबधित जालस्थल अपनी टूलबार भी उपलब्ध कराते हैं। यह भी काफी कारगर तरीका है पर आप एक ब्राउज़र पर गिनीचुनी टूलबार ही लगा सकते हैं और फिर चाहे एक ही टूलबार लगाई हो ब्राउज़र की देखने लायक जगह तो कम हो ही जाती है। साथ ही टूलबार बनाना कुछ तकनीकी काम है और मेरे आप के जैसे लोगों के लिए मुश्किल है। इसे तो सजाल वाली कम्पनियाँ ही बना कर निकाल सकती हैं। जैसे <a href="http://toolbar.google.com/">गूगल टूलबार</a>, <a href="http://toolbar.yahoo.com/">याहू टूलबार</a>।</p>
<div id="pullQuoteR">ब्राउजर के एड्रेस बार में बार बार इसका पता लिख कर जाना काफी कष्टकर होता है।</div>
<p>तो कुछ ऐसा होना चाहिए जो कि कभी कभी कम्पयूटर प्रयोग करने वाला भी बना सके और यह कुछ ऐसा होना चाहिए कि किसी भी प्रकार के जाल के लिए बनाया जा सके। जैसे कि मुझे अंतर्जाल पर हिन्दी लिखते हुए अब कुछ समय हो चला है। अंग्रेजी माध्यम में काफी समय पढ़ने व यहाँ अमरीका में रहते हुए काफी बार दिमाग में अंग्रेजी शब्द पहले आता है व फिर उसकी हिन्दी सोचनी पड़ती है। ऐसे में अंग्रेजी से हिन्दी शब्दकोश काफी काम आता है। अब यदि यह शब्दकोश अंतर्जाल पर हो तो सोने पर सुहागा। कुछ ऐसा ही शब्दकोश है <a href="http://www.shabdkosh.com">शब्दकोश.कॉम</a>। यह सजाल काफी छोटा है व इसकी टूलबार शायद ही आए। तो इस के लिए कुछ उपाय करते हैं फॉयरफॉक्स के द्वारा। यदि आप इस सजाल पर आकर किसी अंग्रेजी शब्द जैसे कि icon का अर्थ देखें व फिर ब्राउज़र के पते वाले खाने में पता देखें तो ऐसे नजर आऐगा</p>
<pre>http://www.shabdkosh.com/s?e=icon&amp;f=0&amp;t=0&amp;l=hi</pre>
<p>आप देख सकते हैं कि icon इस पते में है। इसी प्रकार यदि आप किसी और शब्द जैसे कि abate का अर्थ देखे को पता कुछ इस प्रकार होगा</p>
<pre>http://www.shabdkosh.com/s?e=abate&amp;f=0&amp;t=0&amp;l=hi</pre>
<p>इन पतों को देखते हुए आप सोच सकते हैं कि यदि किसी प्रकार से पते में <strong>e</strong>, के बाद अंग्रेजी का शब्द डाल दिया जाए तो काम बन सकता है। फॉयरफॉक्स इस मामले में मदद कर सकता है। जब आप किसी अंग्रेजी शब्द का अर्थ देख रहें हो तो उसका बुकमार्क बना लीजिए (बड़े आकार में देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें)। बुकमार्क का नाम Shabdkosh डालिए व Done दबाएं। टैग डालना वैकल्पिक है, चाहें तो डाल सकते हैं।</p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0301.jpg" target="_blank"><img class="aligncenter" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0301.jpg" alt="Create BookMark on Firefox" width="600" height="230" /></a></p>
<p>अब बुकमार्क मीनू में जाकर Oraganize Bookmarks विकल्प पर क्लिक करें।</p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0302.jpg" alt="Organize Bookmarks on Firefox" width="521" height="175" /></p>
<p>बुकमार्क्स मेनु पर क्लिक करें, दायें तरफ शब्दकोश का आपका बनाया बुकमार्क दिखने लगेगा। उस बुकमार्क पर क्लिक करने पर नीचे दिये पैनल में इसकी विस्तारित जानकारी दिखने लगती है, यदि जानकारी पूरी न दिखे तो &#8220;मोर&#8221; बटन पर क्लिक करें (बड़े आकार में देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें)।</p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0303.jpg" target="_blank"><img class="aligncenter" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0303.jpg" alt="Organize Bookmark Page on Firefox" width="600" height="457" /></a></p>
<p>अब Location वाले खाने में abate की जगह<strong> %s</strong> लिखें तथा Keyword वाले खाने में <strong>trans </strong>लिखें। बस अब Ok दबाएं व समझिए गंगा नहा लिए।</p>
<p>अब फॉयरफॉक्स के पते वाले खाने में जाकर जिस भी शब्द का अर्थ का देखना हो उसे trans <em>search-word </em>लिख दें। उदाहरण हेतु, यदि irony शब्द का अर्थ देखना हो तो लिखे <strong>trans <em>irony</em></strong></p>
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0304.jpg" alt="Power search on Firefox" width="495" height="181" /></p>
<p>आप पायेंगे की Enter दबाते ही, Address bar पर पता खुद ब खुद बदलकर शब्दकोश पर खोज के पतें में बदल जाता है और खोज शब्द आपका दिया शब्द ही होता है (बड़े आकार में देखने के लिये चित्र पर क्लिक करें)। अब आपको बार बार जालस्थल का पता टाईप कर, टेक्स्ट बाक्स में शब्द डालने की जरुरत नहीं। सिर्फ दो शब्द टाईप करें और खोज संपन्न।</p>
<p style="text-align: center;"><a href="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0305.jpg" target="_blank"><img class="aligncenter" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/firefox0305.jpg" alt="Power search results on Firefox" width="600" height="333" /></a></p>
<p>है न मज़ेदार?</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2860&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0705-nidhi/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
	</channel>
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