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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; संपादक जी</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>याहू 360: एक अच्छा प्रयास</title>
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		<pubDate>Mon, 23 May 2005 07:08:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[संपादक जी]]></category>
		<category><![CDATA[Orkut]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>
		<category><![CDATA[Yahoo]]></category>

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		<description><![CDATA[संपादकजी स्तंभ में पढ़िये निरंतर के संपादक को लिखे पाठकों के पत्र।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><strong>संपादक जी, </strong><br />
   <img hspace="5" height="33" width="195" vspace="5" border="0" align="right" alt="Yahoo 360" title="Yahoo 360" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/yahoo360.gif" /><font size="5">अ</font>प्रेल २००५ के निरंतर का <a href="http://akshargram.com/nirantar/0405/nazariya?PHPSESSID=0489730762dac632ee714741ea23ef3c">संपादकीय</a> पढ़ा। अभी कुछ दिन पहले <a href="http://360.yahoo.com/">याहू 360</a> को प्रयोग करने का भी मौका मिला। यह सेवा फिलहाल आम लोगों को उपलब्ध नही है, अभी निमन्त्रण के द्वारा कुछ चुनीन्दा लोगो को ही उपलब्ध कराई गयी है। वैसे तो याहू वैब पर प्रत्येक क्षेत्र मे मौजूद है परन्तु ब्लागिंग की दुनिया मे याहू का यह पहला कदम है। लेकिन इसे केवल ब्लागिंग सेवा कहना उचित नही होगा यह ना केवल ब्लागिंग बल्कि सोशल नैटवर्किंग की सर्विस है, ठीक वैसे जैसे <a href="http://www.orkut.com/">आर्कुट</a> है। अब जब <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगस्पाट</a> और आर्कुट विरोधी खेमे <a href="http://www.google.com/">गूगल</a> में है तो याहू कैसे पीछे रहता। जैसा कि आपने भी लिखा है, देखा जाय तो याहू 360 ब्लॉगस्पाट और आर्कुट का मिला जुला रूप ही है, जिसमे याहू ने अपने हिसाब से अपने बाकी के ताम झाम लगाये है। </p>
<p>प्रथमावलोकन में तो कहा जा सकता है कि यह एक अच्छा प्रयास है, क्योंकि सभी चीजों को समायोजन बहुत ही आसान तरीके से किया गया है। इसमे ब्लॉग, याहू मैसेन्जर, याहू फोटो, याहू ग्रुप और याहू म्यूजिक का समायोजन किया गया है। ये पूरी तरह से यूनीकोड को सपोर्ट करता है, मैने अपना ब्लॉग हिन्दी मे बना कर भी चैक किया है, काफी अच्छा दिखता है। इस उत्पाद की खासियत है कि ये प्रयोग मे बिल्कुल आसान है, यूनीकोड एनकोडिंग सपोर्ट करता है, और याहू फोटो से इन्टीग्रेटेड है। लेकिन दूसरी तरफ कुछ खामियां और सुझाव भी है। </p>
<div id='pullQuoteR'>इस उत्पाद की खासियत है कि ये प्रयोग मे बिल्कुल आसान है, यूनीकोड एनकोडिंग सपोर्ट करता है, और याहू फोटो से इन्टीग्रेटेड है।</div>
<ul>
<li>यूनिकोड मे लिखा पैराग्राफ, यदि आपने प्रिव्यू में देखा और वापस एडीटिंग पर आये तो यूनीकोड की जगह उल्टे सीधे अक्षर दिखने लगते है। ये शायद कोई बग है, जो जल्द ही ठीक हो जायेगा। </li>
<li>याहू फोटो से इन्टीग्रेशन तो ठीक है, परन्तु फ्लिकर से इन्टीग्रेशन करना ज्यादा अच्छा रहता। </li>
<li>अभी ब्लॉग के अन्तर्गत एक ही इमेज डालने का प्रावधान है, इसमे और सुधार की गुन्जाइश है। </li>
<li>संपादन के लिये साधारण कन्ट्रोल दिये गये है, पर अभी और सुधार की गुन्जाइश है। </li>
<li>याहू ग्रुप का समायोजन, इसमे अभी बहुत अच्छे ढंग से नही किया जा सका है, इसमें भी अभी काफी गुन्जाइश बाकी है।</li>
<li>अभी फीड (RSS FEED) पर काम चल रहा है, जल्द ही इसे भी प्रयोक्ताओ को उपलब्ध कराया जायेगा। </li>
<li>इसमे फोटो गैलरी, आडियो ब्लाग और वीडियो ब्लाग का समायोजन किया जाये तो बेहतर होगा। </li>
</ul>
<p>अन्त में मै यह कह सकता हूँ कि प्रथमावलोकन मे याहू 360 ने मुझे काफी प्रभावित किया है और बीटा वर्जन होने की वजह से इस प्रोडक्ट पर अभी काफी सुधार की गुन्जाइश है। आप भी इसका अवलोकन अवश्य करें। </p>
<p>भवदीय,</p>
<p><strong>जितेन्द्र चौधरी</strong></p>
<h1>सफलता के नये आयाम स्&zwj;थापित करेगी निरंतर</h1>
<p><strong>संपादक जी,</strong> </p>
<p>सर्वप्रथम, रेबेका ब्&zwj;लड की पुस्&zwj;तक &#8216;द वेबलाक हैन्&zwj;डबुक&#8217; भेजने के लिये आभार स्&zwj;वीकार करें। कतिपय कारणों से तत्&zwj;काल सूचना दे पाने में असफल रहा। आशा है आप इसके लिए क्षमा करेंगे।</p>
<p>&#8216;अंर्तजाल&#8217; जैसी आधुनिक संचार सुविधाओं के माध्&zwj;यम से हिन्&zwj;दी भाषा को विश्&zwj;व पटल पर लाने का &#8216;निरन्&zwj;तर&#8217; का अभियान अत्&zwj;यन्&zwj;त सराहनीय है। इसके अतिरिक्&zwj;त, यह पत्रिका विदेशों में बसे भारतीय मूल के लोगों को आपस में जुड़े रहने का एक अमूल्&zwj;य अवसर भी प्रदान कर रही है। </p>
<p>&#8216;निरन्&zwj;तर&#8217; की अभिकल्&zwj;पना को साकार रुप देने के साहसिक प्रयास में जुटे संपादक मंडल के सभी सदस्&zwj;यों को मैं व्&zwj;यक्तिगत रुप से साधुवाद देना चाहता हूँ। मुझे आशा ही नहीं, विश्&zwj;वास है कि &#8216;निरन्&zwj;तर&#8217; द्वारा की गई आप की यह शुरूआत आगे चल कर हिन्&zwj;दी पत्रकारिता की एक नयी सभ्&zwj;यता को जन्&zwj;म देगी और सफलता के नये आयामों को स्&zwj;थापित करने में भी सक्षम हो सकेगी। </p>
<p>पुनश्&zwj;च,</p>
<p>शुभकामनाओं सहित,</p>
<p><strong>राजेश कुमार सिंह</strong><br />
       (सुमात्रा)
  </p>
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		<title>पत्र : वहशीपन से देश महान नहीं बनता</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 12:06:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[संपादक जी]]></category>
		<category><![CDATA[Hindu]]></category>
		<category><![CDATA[Modi]]></category>

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		<description><![CDATA[गुजरात सरकार ने हिंदुओं को एकबार शर्मसार किया है और शरारती तत्वों को सजा न देकर अगर वह दुबारा ऐसा करेगी तो दुनियाभर में अपने समर्थक खो देगी। हमारे महान देश का नेतृत्व इतना रीढविहीन एवं अदूरदर्शी कैसे हो सकता है जो गुंडो को राजनैतिक परिदृश्य पर छाने की खुली छूट देता है। निरंतर संपादक मंडल को लिखे अपने खत में चिंता जता रहे है आर्केडिया विश्वविद्यालय, अमरिका में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक<strong> डॉ प्रद्युम्न सिंह चौहान</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img vspace="5" hspace="5" border="0" align="right" title="Letters to the Editor" alt="Letters to the Editor" src="http://www.nirantar.org/images/stories/letters.gif" />संपादक महोदय,</p>
<p>गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के वीजा हेतु आवेदन किया था, जहाँ उन्हें किसी संस्था के उद्घाटन हेतु कैलीफॉर्निया जाना था। पर कुछ बुद्धिजीवियों जिनमें अधिकतर भारतीय थे ने विदेश मंत्रालय से उनको वीजा देने पर अपना विरोध दर्ज कराया। मंत्रालय संभवतः इस यात्रा के विरोध दर्शाते ईमेल संदेशों जो कि कैलीफॉर्निया विश्वविद्यालय भी भेजे गये थे से दबाव में आ गया। अंततः वीजा का आवेदन रद्द हो गया।</p>
<p>वैसे तो वीजा देना न देना राष्ट्र विशेष का विशेषाधिकार है परंतु हमें एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को वीजा रद्द होने से निराशा हुई। हम विदेश मंत्रालय को इस अदूरदर्शी कदम पर लिखना चाहते थे क्योंकि हजारो लाखों गुजराती अमेरिका की आर्थिक एवं बौद्धिक संपदा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पर इससे पहले कि हम कुछ लिखें, बीबीसी पर बजरंग दल के सदस्यों द्वारा अहमदाबाद स्थित पेप्सी कोला के गोदाम में आग लगाने एवं तोड़फोड़ की <a href="http://www.washingtonpost.com/wp-dyn/articles/A50269-2005Mar19.html">     खबर</a> आयी। ऐसी हरकत से सिर्फ भारत के दुश्मन ही खुश हो सकते हैं। यह कदम राजनैतिक बचकानापन दर्शाता है। यह हिंसा गुजरात में चरमपंथियों के लगाममुक्त होने की आशंकाओं को ही बल देती है। ऐसा उद्दंड व्यवहार हिंदुओं एवं साथ साथ भारत को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है।</p>
<p>
<div id='pullQuoteR'>बजरंग दल द्वारा अहमदाबाद स्थित पेप्सी कोला के गोदाम में आग लगाने एवं तोड़फोड़ की हरकत से सिर्फ भारत के दुश्मन ही खुश हो सकते हैं। यह हिंसा गुजरात में चरमपंथियों के लगाममुक्त होने की आशंकाओं को ही बल देती है। ऐसा उद्दंड व्यवहार हिंदुओं के साथ साथ भारत को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है।</div>
<p>हमारे महान देश का नेतृत्व इतना रीढविहीन एवं अदूरदर्शी कैसे हो सकता है जो गुंडो को राजनैतिक परिदृश्य पर छाने की खुली छूट देता है। एक राष्ट्र जो महान बनने की और एक राजनैतिक दल जो दूसरों का विश्वास जीतने की आकांक्षा रखता है उसे नये सिरे से अनुशासन, शालीनता और सभ्यता का पाठ सीखना होगा। इस तोड़फोड़ और आगजनी से हम वहशियों के स्तर तक गिर जायेंगे और फिर हमें दुनिया से सम्मान मिलने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। गुजरात सरकार ने हिंदुओं को एकबार शर्मसार किया है और इन शरारती तत्वों को सजा न देकर वह दुबारा ऐसा करेगी और दुनियाभर में अपने समर्थक खो देगी। मुझे पूरे विश्व में अपने हिंदु होने पर गर्व है परंतु ऐसे आदिमकालीन सोच वालों के साथ खुद को संबद्ध देखकर शर्मसार हूँ।</p>
<p>मुझे पश्चिम में रहते चालीस वर्ष हो गये पर सर्वाधिक अपमान पिछले चार वर्षों में गुजरात के दंगो से महसूस हुआ। जो हिंदु क्षणिक हिंसा और भीड़तंत्र में विश्वास करते हैं भारत और हिंदुओं के सबसे बड़े शत्रु हैं। जिनको देश का नेतृत्व करने की चाह है, बेहतर है कि वे अपने वहशीपन पर अँकुश लगाना सीख लें अन्यथा वे और अधिक चुनाव हारेंगे और देश और अधिक अपना सम्मान खोयेगा। सस्ती लोकप्रियता से लोग महान और देश मजबूत नही बनता। हमें विश्व नागरिकों की तरह शीघ्र ही व्यस्क हो जाना चाहिए।</p>
<p>भवदीय</p>
<p><strong>डॉ प्रद्युम्न सिंह चौहान</strong></p>
<p><em>(आर्केडिया विश्वविद्यालय, अमरिका में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक)</em></p>
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