<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; संवाद</title>
	<atom:link href="http://www.nirantar.org/category/samvaad/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.nirantar.org</link>
	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>मनोचिकित्सा से फ़िल्म निर्देशन तक</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:37:47 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Direction]]></category>
		<category><![CDATA[Documentary]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0708samvaad/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>डॉ परवेज़ इमाम </strong>ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी कर मनोचिकित्सक का पेशा अपनाया पर अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों की दुनिया। टीवी कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट से शुरुवात कर उन्होंने अब तक अनेकों पुरस्कृत वृत्तचित्रों का निर्माण किया है। संवाद में पढ़ें परवेज़ के जीवन और अनुभव पर<strong> डॉ सुनील दीपक </strong>से हुई उनकी बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center">
<p><img hspace="3" vspace="2" border="0" alt="Parvez Imam" title="Parvez Imam" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-parvez.jpg" /></p>
</p></div>
<div style="padding: 0px 5px 5px; margin-top: 0px" id="section-teaser">
<p>डॉ. परवेज़ इमाम ने चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई पूरी करके मनोरोग चिकित्सक बनने का निश्चय किया था पर मानसिक रोगों के अस्पताल की बजाय उनकी कर्मभूमि बनी वृतचित्र यानि डाक्यूमेंट्री फ़िल्मों की दुनिया। 1993 से अब तक वे अनेक विधाओं में प्रयोग कर चुके हैं। 30 सेकंड की विज्ञापन फिल्म से लेकर म्यूज़िक वीडियो तक। दूरदर्शन पर प्रसारित विज्ञान कार्यक्रम टर्निंग प्वाईंट के लिये वे काम कर चुके हैं, बाद में रिलायंस समूह के लिये बंगलौर में टेलीमेडिसिन और मेडिकल शिक्षा पर भी काम किया। वे पेशेवर संगीतकार भी हैं, अनेक फिल्मों और टीवी कार्यक्रमों के लिये संगीत रचना कर चुके हैं। अनेक पत्रिकाओं के लिये लिखते भी हैं। उनकी वेबसाईट http://www.f20communications.com पर और अधिक जानकारी प्राप्त की जा सकती है।</p>
<p>     प्रस्तुत है फ़िल्म निर्माता के रूप में उनकी यात्रा और उनके जीवन के बारे में <a target="_blank" href="http://www.kalpana.it"><strong>डॉ सुनील दीपक</strong></a>  से हुई बातचीत के कुछ अंश। यह बातचीत 2007 के पूर्वार्ध की है।</p>
</p></div>
<p><strong> सुनीलः डॉ. परवेज आज आप जाने माने डॉक्युमेंट्री फ़िल्म बनाने के रूप में जाने जाते हैं। सबसे पहले अपने बचपन और परिवार के बारे में कुछ बतायें।</strong></p>
<p><img hspace="5" height="233" width="237" vspace="5" border="0" align="left" alt="Dr Parvez Imam" title="Dr Parvez Imam" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/parvez_imam.jpg" /><strong>परवेज़ः</strong> मैं अलीगढ़ में बड़ा हुआ जो कि दिल्ली से करीब 120 किमी दूर है, अलीगढ़ विश्वविद्यालय के लिये पहचाना जाने वाला शहर है। सामान्य मध्यम वर्ग का परिवार था। बचपन में पढ़ाई में मैं अच्छा नहीं था। कक्षा में मेरा अधिकतर समय कक्षा के बाहर खड़े रहने में निकलता था क्योंकि सजा बहुत मिलती थी, और कक्षा के भीतर मैं अन्य विद्यार्थियों के पीछे छुपने की कोशिश करता रहता ताकि शिक्षकों के सामने न पड़ जाउं, खासकर गणित तथा इतिहास के शिक्षकों के सामने।</p>
<p>मेरे पिता अलीगढ़ विश्वविद्यलय में अंग्रेज़ी के प्रोफेसर थे, अब रिटायर हो चुके हैं, और माँ तो हमेशा से गृहणी ही रही हैं। दोनों से ही मुझे, चाहे मैं कुछ भी करूँ, सदा स्वीकृति ही मिली। उन्होंने कभी मुझ पर जोर नहीं डाला कि मैं अधिक पढ़ूँ, वगैरह। छठी से नौंवीं कक्षा तक हर वर्ष गणित में मुझे स्पलीमैंट्री इम्तहान देना पड़ता था, तब भी उन्होंने कभी मुझ पर जोर नहीं डाला कि मैं अपना जीवन बदलूँ, मुझे उनसे सहारा ही मिला। इसका अर्थ यह होता कि माँ मेरी बहनों और छोटे भाई के साथ गर्मियों की छुट्टियों में कहीं जाती, और मैं पिता के साथ घर में रहता, पिता जी मुझे गणित पढ़ाते ताकि मैं सप्लीमैंट्री इम्तहान पास कर सकूँ। पर उन्होंने कभी मुझसे यह नहीं कहा कि खेलों में हिस्सा न लो, वगैरह।</p>
<p>मेरे पिता, अन्य बहुत सी बातों में असमान्य व्यक्ति रहे हैं। जैसे कि हमें घर में कभी धर्म की बातें नहीं बताई गईं। एक बार की बात याद है कि विद्यालय में सर्वेक्षण हो रहा था, शायद जनगणना की बात थी, और एक शिक्षक ने छात्रों को अपने धर्मों के हिसाब से हाथ उठाने के लिये कहा। मैं तब छह या सात साल का था। मैंने किसी भी धर्म के लिए हाथ ऊपर नहीं उठाया क्योंकि मुझे मालूम ही नहीं था कि मेरा धर्म क्या था। जब कुल छात्रों के और विभिन्न धर्मों के नम्बर आपस में नहीं मिले, तो उन्होंने दोबारा से वही सवाल किया। तीन बार गिनती की और तब मुझे उस शिक्षक ने पकड़ लिया, और गणना करने वालों को बोले कि मैं ही वह बेवकूफ हूँ जिसकी वजह से गलती हो रही थी और मुझसे चिल्ला कर बोले कि &quot;&#8230;आप मुसलमान हो, आप को मालूम नहीं?&quot; उस दिन शाम को घर वापस जा कर मैंनें और मुझसे एक साल छोटी बहन ने, पिता जी से पूछा कि यह मुसलमान वाली क्या बात है? वह बोले कि मेरे शिक्षक ने ठीक नहीं कहा था और सच में हमारा कोई धर्म नहीं है, बोले, जब आप लोग व्यस्क होगे तो आपको जो धर्म अच्छा लगे वही ले लेना। अलीगढ़ जैसे छोटे से शहर में यह बहुत बड़ी बात थी और मेरे कई मित्र मुझे छेड़ते थे कि मैं &quot;नास्तिक&quot; या &quot;कम्यूनिस्ट&quot; हूँ, पर मुझे इस बात पर गर्व होता था कि मैं अपना धर्म खुद चुन सकता हूँ।</p>
<p><strong> सुनीलः अगर आप पढ़ाई में कमज़ोर थे और पढ़ने लिखने में मन नहीं लगता था तो आपने मेडिकल कॉलेज में दाखिला लेने की कैसे सोची और दाखिला मिला कैसे?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> हाईस्कूल में मेरी सेकंड डिविजन आई थी, पर साथ में मेरे पास खेलों के बहुत सारे सर्टीफिकेट थे। मेरी एक बड़ी कज़न थी, उन दिनों में उसका मुझ पर उसका बहुत प्रभाव था। वह जीवविज्ञान पढ़ाती थीं, और शाम को घर के काम करते करते वह मुझे पढ़ाती थीं। जैसे कि रसोई में चपाती बनाते बनाते, वह मुझसे जेनेटिक्स या एवोल्यूशन की बातें करती, और मैं रसोई के दरवाजे पर खड़ा हो कर ध्यान से सुनता। मेरी रुचि को देख कर वह अक्सर कहती, &quot;आपको जीवविज्ञान अच्छा लगता है, आप परिवार के पहले डाक्टर बन सकते हो।&quot;</p>
<p>
<div id='pullQuoteR'>पिताजी बोले, जब आप व्यस्क होंगे तो जो धर्म अच्छा लगे वही ले लेना। मेरे कई मित्र मुझे छेड़ते थे कि मैं &quot;नास्तिक&quot; या &quot;कम्यूनिस्ट&quot; हूँ, पर मुझे इस बात पर गर्व होता था कि मैं अपना धर्म खुद चुन सकता हूँ।</div>
<p>जब हाई स्कूल के परिणाम निकले उन्हीं दिनों में मेरी उस बहन का दुघर्टना में देहांत हो गया। उसको सिर में चोट लगी थी और वह कोमा में चली गईं थीं। उसी रात उन्हें मृत घोषित कर दिया गया। मुझे लगा कि डाक्टरों ने उनका ठीक से उपचार नहीं किया और शायद अगर उसे जल्दी ठीक उपचार मिल जाता तो वह बच जातीं। उनकी मौत का मुझ पर बहुत असर पड़ा।  कुछ महीने बाद जब मैं ग्याहरवीं कक्षा में दाखिला लेने गया तो मैंने जीवविज्ञान का विषय चुना। पिता जी को बहुत अच्ररज हुआ। पूछने लगे कि क्या मैंने सोच समझ कर यह निर्णय लिया था? हाँ, मैंने कहा। हालाँकि नम्बर कम थे पर साथ में खेल के सार्टिफिकेट होने की वजह से खिलाड़ी कोटे में मुझे दाखिला मिल गया।</p>
<p>उस वर्ष मैंने सब खेलकूद बंद कर दिया। साहित्यिक कार्यक्रम, बहस आदि में हिस्सा लेने लगा और ग्यारहवीं और बारहवीं के इम्तहानों में फर्स्ट डिविजन लाया। फ़िर मैंने मेडिकल कॉलिज में दाखिला लेने की तैयारी शुरु कर दी। बिल्कुल किताबी कीड़ा बन गया। माँ और पिता चिंतित हो गये। कई बार रात को पिता जी मेरे कमरे में आते और कहते कि अब पढ़ना बस करो, सो जाओ, पर उनके जाने के बाद में फ़िर से बत्ती जला लेता और पढ़ता रहता। मेडिकल कालिज में मुझे जब दाखिला मिला तो सभी लोग चकित रह गये।</p>
<p><strong> सुनीलः अच्छा, यह बतायें कि आपने मनोरोग चिकित्सक बनने की क्यों सोची और फ़िर अचानक चिकित्सक से फ़िल्म निर्देशक कैसे बन गये?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> पहले सोचता था कि मैं बच्चों का डाक्टर बनूँगा, पर जब मेडिकल कालेज के आखिरी साल में मेरी पोस्टिंग मनोरोग विभाग में हुई तो चिकित्सा क्षेत्र का नया रूप देखा। अन्य सभी विभागों में तो क्लिनिकल या सर्जिकल इलाज की बात होती थी। ये सब शारीरिक स्तर तक ही सीमित थे, जबकि मनोरोग चिकित्सा विचारों की दुनिया की बात करती थी, कि कैसे विचारों का असर भी बीमारी बनाने और उसका इलाज करने पर होता है, यह बात मुझे मुझे अच्छी लगा।</p>
<p>मानसिक रोग में विशेषज्ञता हासिल करने के बाद पहले मैंने राँची के मनोरोग अस्पताल में काम करना शुरु किया। वहाँ मनोरोग पीड़ित लोगों का हाल देखा देखा तो विश्वास नहीं हुआ। यह भारत की सबसे प्रमुख मनोरोग संस्था मानी जाती थी और वहाँ रोगियों का जीवन इस तरह का था जिसमें कैदखाने की मानसिकता अपनी कठोर निर्ममता के साथ दिखती थी। मुझे धीरे धीरे समझ आने लगा कि मानसिक रोगों के लिए क्लिनिक की चाहरदिवारी में बंद करके केवल दवा देने के अलावा भी और कुछ किया जा सकता है। मुझे लगा कि मानसिक रोगों के बारे में बात करने की, दुनिया को इसके बारे में बताने की बहुत आवश्यकता है&#8230;कि इसमें समय लगेगा पर इससे मरीज़ों को, परिवार वालों को और अन्य उपचार कर्मियों को सहायता मिलेगी। </p>
<p>पर मुझे नहीं मालूम था कि यह कैसे किया जाये और मैं स्वयं क्या कर सकता हूँ? मैंने कुछ मरीज़ों की बीमारी के बारे में उनकी &quot;जीवनकथा&quot; लिखना शुरु कर दिया। यह कहानियाँ लिखना उस वातावरण में होने वाले मेरे अपने मानसिक तनाव को भी कम करता था। एक बार एक जीवनकथा को लिख कर मैंने उसे अंग्रेजी पत्रिका इलस्ट्रेटेड वीक्ली आफ इँडिया को भेजा तो उस पत्रिका के सम्पादक ने मुझे उत्तर में कहा कि वह उस तरह की अन्य कहानियाँ भी छापना चाहेंगे। उन्हीं दिनों में मैंने राँची मानसिक रोग अस्पताल को छोड़ने का निश्चय किया क्योंकि मुझे वहाँ रहना बहुत कठिन लग रहा था। लगता था कि वृहद समाज से बिल्कुल कट गया हूँ। </p>
<p>मैंने दिल्ली जाने का फैसला किया। मेरी छोटी बहन सेहबा तब दिल्ली में मास कम्यूनिकेशन का कोई कोर्स कर रही थी और मैं उसके ही मित्रों के साथ घूमने लगा। एक दिन किसी ने कहा कि लोग दूरदर्शन के लिए विज्ञान के विषय पर होने वाले टर्निंग प्वाईंट नामक कार्यक्रम के लिए वैज्ञानिक विषयों पर पटकथा लेखक की तलाश कर रहे हैं तो मैं उस कार्यक्रम के निर्देशक से मिलने गया। उसने मुझसे पूछा कि क्या मैं कार्यक्रम की पटकथा लिख सकता हूँ तो मैंनें हाँ कर दी। फ़िर और लोगों से बात कर, समझ कर, कि पटकथा कैसे लिखी जाती है मैंने &quot;आनुवंशिकता और आनुवंशिकी&quot; (Heredity and Genetics) विषय पर पटकथा लिख कर उन्हें दी।</p>
<p>उस निर्देशक को वह पटकथा बहुत पसंद आई। उसके आधार पर किसी ने एक फ़िल्म बनाई, पर मुझे वह फ़िल्म अच्छी नहीं लगी और मैंने ज़ोर डाला कि उसका दुबारा संपादन किया जाये। बाद में उस निर्देशक की बदली हो गयी और उन्होंने मुझे बुला कर कहा कि मैं उनके लिए विज्ञान संबधी अन्य पटकथाएँ लिखूँ। तब मुझे लगने लगा कि मैं फ़िल्म बनाने के क्षेत्र में जा सकता हूँ और साथ साथ अपना मनोचिकित्सक का काम भी कर सकता हूँ। इससे मुझे अपने अन्य शौक जैसे फोटोग्राफी, संगीत आदि भी पूरे करने का मौका मिलेगा।</p>
<p>तकरीबन एक साल बाद मैंने एक अन्य पटकथा लिखी पर मैंने उनसे कहा कि मैं स्वयं ही इस फ़िल्म का निर्देशन करना चाहता हूँ। वे कुछ हिचकिचाए पर मैंने उन्हें अपने नाटक, संगीत, फोटोग्राफी आदि शौक के बारे में बताया तो वह फ़िर मान गये। वह मेरी पहली फ़िल्म थी, चार मिनट की थी और विषय था &quot;फोबिया&quot; यानि डर।</p>
<p>निर्देशक श्री के पी मधु ने मुझे उस फ़िल्म का संपादन भी करने दिया। फ़िल्म संपादन कैसे करते हैं, यह उन्होंने मुझे सिखाया। बाद में हम दोनों मित्र बन गये और उन्होंने बताया कि वह स्वयं भी विज्ञान के स्नातक थे और जब फ़िल्म जगत में आये तो उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ी थी।</p>
<p>यह निर्णय कि मैं मनोरोग चिकित्सा का क्षेत्र छोड़ दूँ और अपना सारा समय फ़िल्म बनाने को दूँ,  काफी समय बाद आया। एक बार अपने अंकल से बात कर रहा था तो वह बोले कि मैं अगर अपना समय अपने फिल्म बनाने के शौक को दे दूँ और मनोरोग चिकित्सा को शौक बना लूं तो शायद अधिक खुश रह सकता हूँ। उनकी इस बात पर मैंने बहुत सोचा और तब यह निर्णय लिया। 31 जनवरी 1995 को मैंने अस्पताल का काम छोड़ दिया।</p>
<p><strong> सुनीलः यानि कि अब आप मनोरोग चिकित्सा का काम नहीं करते। अच्छा अब कुछ फ़िल्म जगत में अपनी सफलता के बारे में बतायें।</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> मुझे सफलता मिली जब मैंने एक स्वतंत्र फ़िल्म बनाई &quot;बिटवीन द लाइंस&quot;। यह फ़िल्म भारत आने वाले बांग्लादेश के शरणार्थियों के बारे में थी। इस फ़िल्म को नयी दिल्ली वीडियो फ़िल्म फेस्टीवल में &quot;सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म&quot; का पुरस्कार भी मिला। फ़िल्म स्विटज़रलैंड में मिटिल फेस्टिवल में भी भेजी गयी जहाँ यह पुरस्कार नामांकन तक पहुँची। इस फ़िल्म को अन्य कई फेस्टिवल में भी दिखाया गया।</p>
<p>तब मुझमें आत्मविश्वास आ गया कि हाँ में अपनी फ़िल्मों से अपनी बात कह सकता हूँ। अब मैं सचमुच अपने विचारों पर फ़िल्म बना सकता हूँ। तब से बहुत सी फ़िल्में बनाई हैं, कुछ वर्ष पहले मैंने मानसिक रोगों पर भी फ़िल्में बनाई हैं। बहुत से फेस्टिवल में मेरी फ़िल्में गयीं हैं, कुछ पुरस्कार भी मिले हैं।</p>
<p>
<div id='pullQuoteR'>अच्छे फिल्मकार और कथाकार दोनों में दर्शक के मन की बढ़िया समझ होना ज़रूरी है। अपने दर्शकों की सही पहचान पर ही फ़िल्म का बजट, समय और निर्माण योजना निर्भर रहती है।</div>
<p><strong> सुनीलः क्या मनोरोग चिकित्सा का अनुभव फिल्म निर्माण में काम आता है?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> अच्छे फिल्मकार और कथाकार दोनों में दर्शक के मन की बढ़िया समझ होना ज़रूरी है। मेरा मानना है कि मनोविज्ञान की समझ और अनुभव ने मुझे यह जानने में मदद की है कि मैं अपनी फिल्म में कौन सी बात किस प्रकार कहूं ताकि दर्शक मेरी भावनायें पूर्णतः समझ सकें। अपने दर्शकों की सही पहचान पर ही फ़िल्म का बजट, समय और निर्माण योजना निर्भर रहती है। जहाँ तक फिल्म के विषय का सवाल है मैं हमेशा हर चीज़ को मानवीय दृष्टकोण से देखता हूँ, विषयों में लोग और उनके नज़रिये की तलाश रहती है। क्योंकि मेरा यकीन है कि पृथ्वी पर रहने वाली हर चीज़ जीवन से जुड़ी है।</p>
<p><strong>सुनीलः वृत्तचित्र निर्माण में नई तकनीक से क्या निर्माण के काम कुछ आसान हुये हैं?</strong></p>
<p><strong>परवेज़ः</strong> अच्छी फिल्म बनाने के लिये कोई शार्टकट नहीं हैं। मौलिक विचार होना ज़रूरी है। मुझे पता होना चाहिये कि क्या कहना है, क्यों और किसे कहना है। इसी हिस्से पर अब भी  सबसे ज़्यादा समय लगता है। मेरे काम में कमोबेश सस्ती और आसान तकनाजी का असर ज्यादा होता है क्योंकि मैं इनमें प्रयोग कर सकता हूं। इनसे मुझे अपने किरदारों से समझ बढ़ाने और नज़दीक जाने में भी आसानी होती है क्योंकि ये बड़े पैरों वाले ट्राईपॉड पर सवार भारी भरकम काले कैमरों जैसे डरावने नहीं होते। चुंकि मैंने फिल्म निर्माण में कोई औपचारिक शिक्षा ग्रहण नहीं की है अतः प्रयोग करता रहता हूँ।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2124&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0708-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>HIW: खुद कंप्यूटर सीखते हैं बच्चे</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-samvaad-hiw</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-samvaad-hiw#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 15:27:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[HIW]]></category>
		<category><![CDATA[Minimum Evasive Education]]></category>
		<category><![CDATA[NIIT]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507samvaadhiw/</guid>
		<description><![CDATA[&#34;<strong>होल इन द वॉल</strong>&#34; द्वारा एनआईआईटी के <strong>सुगाता मित्रा</strong> ने सिद्ध किया कि बच्चे बिना औपचारिक प्रशिक्षण के स्वयं कंप्यूटर सीख सकते हैं। कम कीमत में करोड़ों भारतियों तक सूचना प्रोद्योगिकी पहुंचाना अब कोई दिवास्वप्न नहीं। निरंतर ने डॉ मित्रा से जानकारी ली इस अनूठे प्रयोग के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" align="right" /><a href="http://www.hole-in-the-wall.com/" target="_blank">&#8220;होल इन द वॉल&#8221;</a> द्वारा डॉ सुगाता मित्रा ने यह सिद्ध किया कि बच्चे बिना शिक्षकों व औपचारिक प्रशिक्षण के स्वयं कंप्यूटर सीख सकते हैं। इससे ये भी स्पष्ट होता है कि बेहद कम कीमत में करोड़ों भारतियों तक सूचना प्रोद्योगिकी की मशाल पहुंचाना कोई दिवास्वप्न नहीं है।</p>
<p>डॉ सुगाता ने ये प्रयोग 1999 में <a href="http://www.hole-in-the-wall.com/Beginnings.html">शुरु किया</a> कालकाजी दिल्ली के झोंपड़ पट्टी इलाके में। इसकी सफलता से प्रभावित होकर अगले कियोस्क शिवपुरी, मध्यप्रदेश तथा मदनतुसी, उत्तरप्रदेश में स्थापत किये गये। वे इसे <a href="http://www.hole-in-the-wall.com/MIE.html" target="_blank"><em>मिनिमम इवेसिव एजूकेशन</em></a> पुकारते हैं जिसका पर्याय है शिक्षका के बिना या कम से कम रोकटोक के साथ तैयार ज्ञानार्जन का माहौल जिसमें बच्चे अपनी नैसर्गिक जिज्ञासा का पूर्ण उपयोग कर अधिकाधिक सीख सकें। ग्रामीण भारत में अब इसके 23 से ज़्यादा कियॉस्क हैं। 2004 में ये प्रयोग कंबोडिया में भी दोहराया गया।</p>
<p>सुगाता भौतिकी में पीएचडी हैं। कॉग्निटिव साईंस तथा शिक्षा तकनलाजी में 25 से अधिक ईजाद का श्रेय उन्हें जाता है। 2005 में वे देवांग मेहता पुरस्कार से नवाज़े गये हैं। डॉ मित्रा कंप्यूटर शिक्षा से जुड़ी संस्था एनआईआईटी में प्रमुख वैज्ञानिक हैं। निरंतर ने डॉ सुगाता मित्रा से और जानकारी ली इस अनूठे प्रयोग के बारे में। प्रस्तुत है इसी वार्तालाप के महत्वपूर्ण अंश।</p>
</div>
<p><strong><br />
</strong></p>
<div class="dropCap"><strong>हो</strong></div>
<p><strong>ल इन द वॉल (HIW) प्रयोग में प्रयुक्त कंप्यूटरों का हार्डवेयर कंफीगरेशन क्या होता है? आप खुले वातावरण की उष्मा, धूल ब आद्रता तथा ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या से कैसे निबटते हैं? क्या किसी विशेष सॉफ्टवेयर का भी प्रयोग होता है?</strong></p>
<p>पर्सनल कंप्यूटर, जो दुनिया भर में घरों और दफ्तरों में प्रयोग होते हैं, चाहरदिवारी के अंदर के कंडीशंड व नियंत्रित वातावरण में काम करने के लिये ही डिजाइन किये गये हैं। ऐसे कंप्यूटरों को ग्रामीण भारत या कंबोडिया जैसे इलाकों में, जहाँ वातानूकूलन व बढ़िया विद्युत सप्लाई का अभाव है, बाहरी वातावरण में नहीं रखा जा सकता।</p>
<p><img style="padding: 10px; margin: 10px;" title="A HIW Kiosk" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/hiw_kiosk.jpg" border="0" alt="A HIW Kiosk" width="250" height="188" align="left" />इस प्रयोग के दौरान हमनें एक ऐसे अहाते (एंक्लोज़र) का डिजा़इन बनाया जिससे साधारण पर्सनल कंप्यूटर भी बाहरी वातावरण में कार्य कर पाते हैं। इस अहाते में एक छोटा झोंपड़ीनुमा ईंटों का ढाँचा होता है जिसकी एक ओर, दीवार में बनी आयताकार काँच से ढंकीं खिड़कियों से, कंप्यूटर के स्क्रीन दिखाई देते हैं। बाहरी मौसम में घरों और दफ़्तरों में प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक माउस कुछ ही दिन टिक पाते हैं। हमने टोबू नामक एक नये सॉलिड स्टेट माउस की रचना की जिसमें कोई घूमने वाला पुर्ज़ा नहीं होता। इस माउस में एक प्लास्टिक प्लेट पर धातु के छः छोटे गोले बने होते हैं। इन्हें &#8220;टच बटन&#8221; कहा जाता है और इनसे काम लेने के लिये बस इन्हें अंगुली से छूना भर होता है। इन गोलों में से चार कर्सर को दायें बायें तथा ऊपर नीचे की दिशाओं में घुमाते हैं और दो लेफ्ट वा राइट &#8220;क्लिक&#8221; के काम आते हैं। उपरोक्त चार टच बटनों के संयोजन से से कर्सर को तिरछा भी घुमाया जा सकता है।</p>
<p>दीवार में बने आयताकार छेद से मॉनीटर के नीचे कीबोर्ड तथा टोबू माउस दोनों बाहर निकले रहते हैं। इन पर रखा पर्सपेक्स (एक प्रकार का पारदर्शी थर्मोप्लासटिक एक्रीलिक रेसिन) से बना एक ढक्कन धूल से इनकी रक्षा करता है। इस छज्जेनुमा ढक्कन के नीचे हाथ डालकर प्रयोगकर्ता माउस व कीबोर्ड का प्रयोग करता है। छोटे हाथों के प्रवेश के लिये इसकी चौड़ाई पर्याप्त होती है। हर खिड़की पर एक धातु का ढक्कन रहता है जिसे कार्यसमय में खोल दिया जाता है और खुली अवस्था में यह सुरज की किरणों से कंप्यूटर को छाया भी प्रदान करता है। इस ढक्कन की ऊंचाई जानबूझकर कम रखी गई है ताकि बड़े इसका आसानी से प्रयोग न कर सकें। हर खिड़की के सामने बैठने के लिये एक बेलनाकार रॉड बनी रहती है, यह भी दीवार से कुछ ही दूरी पर होती जिससे लंबे कद के लोग आसानी से न बैठ सकें। ऐसे डिजाईन द्वारा हम ये चाहते हैं कि केवल 13 साल से कम उम्र के बच्चे ही इन कंप्यूटरों का प्रयोग कर सकें।</p>
<p>हर प्लेग्राउंड कंप्यूटर में वेब कैमरा व माइक्रोफोन होता है। चार घंटों का बैटरी बैकअप भी मुहैया कराया जाता है। अहाते में लगे सेंसरों और संबंधित सॉफ्टवेयर से हम तापमान, आद्रता, बिजली की अवस्था, कंप्यूटर पर चलाये अनुप्रयोग और खोली गई वेबसाईट्स, कंप्यूटर का इस्तेमाल करते बच्चों के चित्र व आवाज़ जैसी जानकारियों पर दूर से नज़र रखते हैं। इसके अलावा हमारा साफ्टवेयर ये ध्यान रखता है कि किसी ज़रूरी अनुप्रयोग को हटाया न जाय, डेस्कटॉप आइकंस को न बदला जाय तथा सिस्टम प्रयोग न किये जा रहे अनुप्रयोगों को स्वतः बंद करे और कंप्यूटर के हैंग हो जाने पर खुद ब खुद रिस्टार्ट भी हो जाये।</p>
<p>सूर्य की रौशनी से कंप्यूटर स्क्रीन चमकें नहीं इसलिये इस पूरी व्यवस्था को आमतौर पर इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि स्क्रीन का रुख उत्तर पूर्व दिशा की ओर हो।</p>
<p><strong>HIW अवधारणा में शिक्षक हैं ही नहीं। क्या ये प्राथमिक शिक्षा तक ही सीमति रहेगी या फिर इसे उच्च शिक्षा क्षेत्र में भी अपनाया जा सकता है? </strong></p>
<p>ये व्यवस्था प्राइमरी तथा प्री प्राइमरी स्तर के लिये ही उपयुक्त है। पर सहयोगी (कोलैबोरेटिव) तथा स्वतःनियामित (सेल्फ रेगुलेटेड) शिक्षण की ये संकल्पना किसी भी आयु समूह पर आजमायी जा सकती है।</p>
<p><img style="padding: 10px; margin: 10px;" title="Dr Sugata Mitra" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/sugata_mitra.jpg" border="0" alt="Dr Sugata Mitra" width="241" height="214" align="right" /><strong>क्या इस तरह की शिक्षा असल जिंदगी में नौकरी दिला पायेगी?</strong></p>
<p>कंप्यूटर में प्रवीणता किसी भी नौकरी के लिये आवश्यक है।</p>
<p><strong>इस प्रोजेक्ट को वर्ल्ड बैंक तथा भारत सरकार से ग्रॉँट मिली है। पर इस विचार का क्रियान्वयन कैसे होगा? सरकार को किस किस्म के बजट की दरकार होगी। क्या आपको ये लगता है कि पारंपरिक शिक्षा पर खर्च के साथ साथ सरकार ऐसी योजनाओं पर भी खर्चना चाहेगी?</strong></p>
<p>मेरा विचार है कि दोनों तरीकों का सहअस्तित्व होना ज़रूरी है। सर्व शिक्षा अभियान के पास अभिनव कार्यों के लिये फंड हैं और वे भारत के दूरदराज़ इलाकों में होल इन द वॉल कंप्यूटर लगाने पर खर्च कर रही है।</p>
<p><strong>हमारे देश में HIW जैसे अभिनव प्रयोग निजि क्षेत्र से ही आते हैं। क्या वजह हैं कि ऐसी सरकारी संस्थायें, जिन पर इसी अपेक्षा से साथ करदाताओं के पैसे लुटाये जाते हैं, इस प्रकार का कोई अभिनव विचार नहीं रच पातीं?</strong></p>
<p>मैं नहीं समझता कि ये पूर्णतः सही है। अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे ऐसे अनेक महत्वपूर्ण विचार हैं जिनका सरकार ने विकास किया है। लेकिन, सरकार में गति और नये विचारों को बाजा़र तक ले जाने की क्षमता की कमी है।</p>
<p><strong>क्या इंटरनेट शिक्षकों की जगह ले सकेगा? इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी जैसे खतरों से बच्चों को कैसे बचाया जा सकेगा?</strong></p>
<p>सार्वजनिक होल इन द वॉल कंप्यूटरों में ऐसे ज़्यादातर खतरे मौजूद नहीं हैं। कंप्यूटर की स्क्रीन पर आते जाते वयस्कों की नज़र पड़ती रहती है और चुंकि प्रयोग समूहों में ही होता है अतः दुरुपयोग, चोरी या वैंडेलिस्म से रक्षा करने के लिये सामाजिक नियंत्रण मौजूद होता है। प्रयोग के चार वर्षों के दौरान ग्रामीण भारत तथा कंबोडिया में स्थापित ऐसे १०० कंप्यूटरों में केवल चार कंप्यूटर वैंडेलिस्म की वजह से क्षतिग्रस्त हुये और कुल उपलब्ध समय का 0.3% समय ही पोर्नोग्राफी तक पहुँचने में जाया हुआ।</p>
<div id="pullQuoteR">हमारे गाँवों को क्या मिलना चाहिये क्या नहीं वाली शहरी सोच ही गलत है। उन्हें भी केबल टीवी, इंटरनेट और रेवलॉन चाहिये।</div>
<p><strong>HIW प्रयोग के निष्कर्षों में से एक था कि बच्चे विभिन्न तत्वों के लिये रूपकों (मेटाफर) का प्रयोग करने लगे जैसे कि आवरग्लास को डमरु पुकारना। एनआईआईटी ऐसी शिक्षण पद्धति से जुड़ी है जहाँ लोगों को पारिभाषिक शब्दावली (टर्मिनोलॉजी) सिखाने की फीस ली जाती है। क्या टर्मिनोलॉजी सीखना हमारे शिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है?</strong></p>
<p>हो सकता है। यहाँ वे कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख रहे हैं। ये ज्ञान क्रियात्मक (फंक्शनल) है। ये कार चलाना सीखने जैसा है, इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि आप ये जानें कि कार्बोरेटर क्या होता है या कि गीयर किस तरह काम करते हैं।</p>
<p><center><iframe title="YouTube video player" class="youtube-player" type="text/html" width="560" height="345" src="http://www.youtube.com/embed/RzPCYCIM8DU" frameborder="0"></iframe></center></p>
<p><strong>HIW प्रयोग ने शायद यही साबित किया है कि एक अपारंपरिक, अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था जो खेल खेल में पढ़ा दे, बेहतर काम करती है। पर आपक क्यों सोचते हैं कि केवल कंप्यूटर द्वारा ही यह उद्देश्य हासिल होगा। क्या ये फक़्त सफ़ेदपोश नौकरियों के लिये कंप्यूटर की जानकारी रखने वाले लोगों को तैयार करने जैसा नहीं है?</strong></p>
<p>हो सकता दूसरे मार्ग भी हों। मैं सिर्फ यही दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ कि कंप्यूटर का प्रयोग करना सीखना सभी बच्चे खुद ब खुद (सेल्फ इंस्ट्रक्शन) कर सकते हैं। मैं सोचता हूं कि हर नागरिक को कंप्यूटर लिटरेट होना चाहिये चाहे उनका पेशा कुछ भी हो। जिस तरह अंकगणित का हर किसी को ज्ञान होना चाहिये, केवल सफ़ेदपोशों को नहीं।</p>
<p><strong>HIW के मूल में संभवतः एडूटेन्मेंट है और आजकल बच्चों के टीवी कार्यक्रम भी अपने आप को इसी प्रारूप में पेश करते हैं। केबल युग के बच्चों के टीवी कार्यक्रमों को आप कितने नंबर देंगे?</strong></p>
<p>अच्छे टीवी कार्यक्रम भी हैं और बुरे भी। एडूटेन्मेंट जितना अधिक हो उतना अच्छा। उदाहरण के तौर पर नैटजीयो, डिस्कवरी आदि बेहद अच्छे हैं।</p>
<p><strong>एक बात बड़ी अजीब लगती है। ग्रामीण भारत में अब भी मूलभूत सुविधायें मयस्सर नहीं हैं। आम तौर पर शिक्षा और स्वस्थ्य सुविधाओं का अकाल है। पर यहाँ हम डिजिटल डिवाईड को पाटने की बात कर रहे हैं। क्या ये वाकई एक शहरी सपना नहीं है? क्या वास्तवकि भारत से इसका कोई सरोकार है?</strong></p>
<p>गाँव वालों से पूछिये। मैं सोचता हूँ कि हमारे गाँवों को क्या मिलना चाहिये क्या नहीं वाली शहरी सोच ही गलत है। उन्हें भी केबल टीवी, इंटरनेट और रेवलॉन चाहिये <img src='http://www.nirantar.org/wp-includes/images/smilies/icon_smile.gif' alt=':)' class='wp-smiley' />  पर हम शहरी लोग ये सोचते हैं कि ये सब बस हमें ही मिलना चाहिये उन्हें नहीं।</p>
<p><strong>क्या HIW अन्य देशों में भी अपनाया गया है? परिणाम कैसे रहे?</strong></p>
<p>जी हाँ, कंबोडिया तथा दक्षिण अफ्रीका में, परिणाम भारत जैसे ही मिले।</p>
<p><strong>HIW प्रयोग में टार्गेट समूह के लिये आयु तथा शिक्षा की न्यूनतम योग्यतायें क्या रहती हैं? </strong></p>
<p>आयु वर्गः 6 से 15 वर्ष। शैक्षणिक योग्यता आवश्यक नहीं है, अनपढ़ भी कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख सकते हैं।</p>
<p><strong>अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं में आजकल काफी सामग्री उपलब्ध है। आप इस दौर को किस तरह देखते हैं? भविष्य कैसा दिखता है आपको?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">इंटरनेट का एक छठवां हिस्सा भारतीय भाषाओं में ही होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि मानव जनसंख्या का एक छठवां हिस्सा भारतीयों से बना है।</div>
<p>भारतीय सामग्री तो भारतियों द्वारा ही बनाई जायेगी। जितनी (इंटरनेट की) पहुँच बढ़ेगी उतनी सामग्री में भी बढ़ोतरी होगी। अंततः इंटरनेट का एक छठवां हिस्सा भारतीय भाषाओं में ही होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि मानव जनसंख्या का एक छठवां हिस्सा भारतीयों से बना है।</p>
<p><strong>आपका कॉम्पलेक्स सिस्टम्स के बारे में एक लेख पढ़ा। क्या आप &#8216;सोशियल बुकमार्किंग साईट्स&#8221; तथा &#8220;ब्लॉग अन्काँर्फ्रेस&#8221; को इस प्रतिमान का हिस्सा मानेंगे? </strong></p>
<p>हाँ, ये सभी सेल्फ आर्गनाईज़िंग कॉम्पलेक्स सिस्टम्स हैं। मैंने इस विषय पर दो पेपर लिखे हैं।</p>
<p><strong>भारत सरकार द्वारा <a href="http://www.laptop.org/" target="_blank">वन लैपटॉप पर चाईल्ड (OLPC)</a> ग्रांट को <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/msid-1698603,curpg-1.cms" target="_blank">ठुकरा देने</a> पर आपकी क्या राय है?</strong></p>
<p>मुझे उनके तर्क मालूम नहीं हैं। पर मुझे लगता है कि किसी भी चीज़ को उसका असर मापे बिना अपनाना या दुत्कारना नहीं चाहिये।</p>
<p><strong>आजकल आप क्या कर रहे हैं?</strong></p>
<p>फिलहाल शिक्षा टेक्नलॉजी और सेल्फ आर्गनाईज़िंग सिस्टम्स आदि पर काम कर रहा हूँ।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2121&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-samvaad-hiw/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>लड़कर वही निर्मल ज़माना लाना होगा</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 07:54:50 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Bahuguna]]></category>
		<category><![CDATA[Chipko]]></category>
		<category><![CDATA[Dams]]></category>
		<category><![CDATA[Prohibition]]></category>
		<category><![CDATA[Tihri]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1206samvaadbahuguna/</guid>
		<description><![CDATA[पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता <strong>सुंदरलाल बहुगुणा</strong> पिछले दिनों जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर व्याख्यान देने रतलाम आये। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण न अन्य विषयों पर <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने उनसे बातचीत की। संवाद में प्रस्तुत है उसी वार्तालाप के अंश।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>
<div id="section-teaser"><img title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.jpg" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" width="135" height="113" align="right" />पर्यावरणविद् व चिपको आंदोलन के प्रणेता <strong>सुंदरलाल बहुगुणा</strong> पिछले दिनों रतलाम प्रवास पर थे। जनशिक्षण मंच में पर्यावरण विषय पर उनका व्याख्यान था। इस दौरान उन्होंने पर्यावरण डाइजेस्ट नामक पत्रिका के इंटरनेट संस्करण का लोकार्पण भी किया तथा जालघर की अपने तरह की अकेली व पहली चिट्ठा-पत्रिका निरंतर का अवलोकन भी किया। इस अवसर पर निरंतर के लिए पर्यावरण विषयों पर सुंदरलाल बहुगुणा से खास बातचीत की निरंतर के वरिष्ठ संपादक <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> ने। संवाद में प्रस्तुत है उसी बातचीत के कुछ अंश:</div>
</p>
<div class="wp-caption aligncenter" style="width: 510px"><img style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" title="चित्र में रविशंकर बहुगुणा को निरंतर का अंक दिखाते हुये। एकदम दायें बैठे हैं पर्यावरण पत्रिका के संस्थापक खुशाल सिंह।" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1206/story-big-bahuguna.jpg" border="0" alt="सुंदरलाल बहुगुणा" vspace="5" width="500" height="269" align="middle" /><p class="wp-caption-text">चित्र में रविशंकर बहुगुणा को निरंतर का अंक दिखाते हुये। एकदम दायें बैठे हैं पर्यावरण पत्रिका के संस्थापक खुशाल सिंह।</p></div>
<p><strong>आप चिपको आंदोलन के प्रणेता रहे हैं। कश्मीर से कोहिमा तक वन को बचाने के लिए आपने गंभीर आंदोलन चलाए हैं। अपनी इस यात्रा के बारे में कुछ प्रकाश डालेंगे?</strong></p>
<p>मनुष्य प्रकृति को अपनी निजी संपत्ति मानने की भूल कर बैठा है तथा इसके अंधाधुंध दोहन की वजह से संसार में अनेक विसंगतियाँ और समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। प्रकृति के असंतुलन से मौसम का चक्र ही बदल गया है नतीजतन दुनिया के अनेक हिस्सों में प्राकृतिक प्रकोप बढ़ चला है। प्रकृति को बचाने के लिए प्रकृति को प्रकृति के पास वापस रहने देने के लिए ही चिपको आंदोलन की सर्जना की गई थी। संतोष की बात यह है कि देश में ही नहीं तमाम विश्व में इस मामले में जागृति आई है। वृक्षों को काटने के बजाए वृक्षों की खेती करना जरूरी है यह बात बड़े पैमाने पर महसूस की जा रही है और इस क्षेत्र में प्रयास भी किए जा रहे हैं।</p>
<p><strong> टिहरी बाँध के निर्माण को रोकने के लिए आपका दो दशकों का लंबा, गहन आंदोलन भी फलीभूत नहीं हो पाया। आपका यह आंदोलन असफल क्यों हो गया?</strong></p>
<p>ऐसा मानना तो अनुचित होगा। जन जागृति तो आई है कि बड़े बाँध नहीं बनेंगे। बड़े बाँध स्थाई समस्याओं के अस्थाई हल हैं। नदी का पानी हमेशा प्रवाहमान रहता है। बाँध कुछ समय बाद गाद से भर जाते हैं और मर जाते हैं। दूसरी बात यह है कि बाँध जिंदा जल को मुर्दा कर देते हैं। पानी के स्वभाव पर अध्ययन से यह बात स्पष्ट हुई है कि रुके हुए जल में मछलियों व अन्य जीव जंतुओं, जिनका जीवन प्रवाहमान पानी के अंदर होता है उनके स्वभाव में विपरीत व उलटे परिवर्तन हुए हैं। बड़े बाँध एक दिन अंततः सर्वनाश का ही कारण बनेंगे।</p>
<p><strong> परंतु इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि बड़े बांधों के निर्माण के पीछे नदियों के जल की विस्तृत क्षेत्र में वितरण की भावना होती है तथा पर्यावरण अनुकूल जल विद्युत निर्माण का उद्देश्य होता है?</strong></p>
<p>यह भी एक दुष्प्रचार है। भारत जैसे जनसंख्या बहुल देश में जहाँ प्राकृतिक संसाधन जैसे कि वर्षा का जल व सौर ऊर्जा बहुलता से मिलते हैं इनका इस्तेमाल चहुँ ओर जल तथा विद्युत उत्पादन-वितरण के लिए बखूबी किया जा सकता है। भारत में प्रायः हर क्षेत्र में वर्षा इतनी होती है कि हर गांव में हर कस्बे &#8211; मुहल्ले में तालाब बना कर वर्षा का जल रोका जा सकता है और इससे पानी की समस्या से छुटकारा पाया जा सकता है। इसी तरह सौर ऊर्जा का इस्तेमाल बिजली उत्पादन में किया जा सकता है।</p>
<p>एक मजेदार वाकया आपको सुनाता हूँ। एक बार मैं नार्वे गया। वहाँ जब मैं पहुँचा तो देखा कि सभी घरों में ताले लगे हैं, और शहर में कोई नहीं है। मुझे लगा कि क्या मैं गलत समय पर आ गया या हूँ। परंतु मुझे बताया गया कि यहाँ धूप बहुत कम खिलती है लिहाजा लोग बाग़ समुद्र किनारे धूप स्नान के लिए गए हुए हैं। भारत में बारिश के चार महीनों को छोड़ दें तो यहाँ धूप का अकाल कभी नहीं रहता। यह प्राकृतिक, अक्षय ऊर्जा है। पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा है। इसका इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता। आप देखेंगे कि जब अंधाधुंध दोहन के कारण पृथ्वी के संसाधन समाप्त हो जाएंगे तो अंततः यही अक्षय ऊर्जा ही काम आएगी। मनुष्य को अभी से चेत जाना चाहिए।</p>
<div id="pullQuoteR">ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। ग्राम स्वराज के इस उद्देश्य को अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा</div>
<p><strong> आप विनोबा जी के ग्राम स्वराज आंदोलन से भी जुड़े रहे हैं। आज की पीढ़ी यह सब भूल चुकी है। वर्तमान पीढ़ी के लिए ऐसे आंदोलनों की सार्थकता आप महसूस करते हैं?</strong></p>
<p>विनोबा जी के ग्राम स्वराज योजना में भी शाश्वत सत्य का अनुष्ठान किया गया है। ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत की अवधारणा जो चली आ रही है उसे बदलना होगा और देश के प्रत्येक नागरिक को स्व-समर्थित बनाना होगा। यही ग्राम स्वराज का उद्देश्य था और इसे अपनाए बिना भारत का उद्धार नहीं होगा।</p>
<p>आज हम भारत की मिट्टी के उपजाऊपन को निर्यात कर रहे हैं। खेतों की मिट्टी अंधाधुंध रासायनिक खादों के उपयोग के कारण नशेबाज हो गई है। खेत मरूस्थल बनते जा रहे हैं। खेतों में इंडस्ट्री की तरह उत्पादन लिया जा रहा है। अंततः धरती बांझ हो जाएगी। हमें इससे बचना है तो वृक्षों की खेती शुरू करनी होगी। धरती की गोद में वृक्ष सदाबहार रहेंगे तो उनसे प्राप्त वनोपजों से पर्यावरण स्वच्छ तो रहेगा ही, सर्वत्र प्रचुरता में पानी, भोजन व वस्त्र भी सुलभ हो सकेंगे।</p>
<p><strong> आपने बहुत भ्रमण किया है और अपने विचारों को तमाम क्षेत्रों में रखा है। लोगों में आपके विचारों के प्रति किस तरह की भावना जाग्रत हुई है, क्या आपके इन विचारों को मान्यता मिली है?</strong></p>
<p>चिपको आंदोलन उत्तर भारत में हिमालय से शुरू हुआ और दक्षिण में कर्नाटक तक पहुँच गया। वहाँ इसका नाम पिक्क हो गया है। तो इन विचारों को मान्यता तो चहुँ ओर मिली ही है।</p>
<p><strong> बहुत समय से देश की कुछ बड़ी नदियों को आपस में जोड़ने के बारे में बातें की जा रही हैं &#8211; गंगा-कावेरी जैसी योजना के बारे में आपके क्या विचार हैं?</strong></p>
<p>यह भी प्रकृति के साथ खिलवाड़ है। देश की नदियों को जोड़ना मूर्खतापूर्ण कदम होगा। लाभ के बजाए हानि ही ज्यादा होगी। नदियों का जलस्तर घटेगा व नदी अपनी स्वयं की शुद्ध करने की शक्ति खो देगी। एक नदी प्रदूषित होने पर वह सारी नदियों को प्रदूषित करेगी। इसे रोकने के लिए, लोकशक्ति जागृत करने के लिए हिमालय से कन्याकुमारी तक पदयात्राएँ करने की आवश्यकता है।</p>
<div id="pullQuoteR">हमारी न्यायपालिका काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। न्यायपालिका ने सरकार को कई संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर किया है।</div>
<p><strong> बड़े बाँध और पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर राज्य व केंद्र की सरकारों की भूमिका पर अकसर सवाल उठाए जाते रहे हैं। आप इन्हें कहाँ तक उचित समझते हैं?</strong></p>
<p>यह तो सर्वविदित है कि राज्य अपने अल्पकालिक लाभ के लिए कार्य करते हैं। परंतु खुशी की बात यह है कि हमारी न्यायपालिका बहुत मजबूत है, काफी गंभीर है और सत्य की अवधारणा पर कार्य करती है। बहुत से मामलों में न्यायपालिका ने सरकार को इन संवेदनशील मुद्दों पर अपना रूख बदलने को मजबूर भी किया है।</p>
<p><strong> आपके पश्चात इस आंदोलन की गति क्या होगी?</strong></p>
<p>यह कतई जरूरी नहीं है कि आंदोलन, चलाने वाले के जीवनकाल में सफल हो जाए। मनुष्य तो नाशवान है। परंतु सत्य हमेशा शाश्वत रहता है। इटरनल ट्रुथ, शाश्वत सत्य तो अमर रहेगा।</p>
<p><strong> उत्तरांचल में आपने व आपकी पत्नी ने नशाबंदी के लिए भी बहुत कार्य किए। आज जब आधुनिक समाज में मद्यपान को सामाजिक उन्नति का प्रतीक समझा जाने लगा है तब नशाबंदी की अवधारणा कहाँ तक उचित प्रतीत होती है?</strong></p>
<p>यह सामाजिक उन्नति तो नहीं, सामाजिक अवनति है। कोई भी नशा उन्नति की ओर नहीं ले जा सकता यह तो तय है। हमारे प्रयासों से हिमाचल के तमाम जिलों में जागरूकता फैली है। चिपको आंदोलन के कारण वनों की कटाई पूर्णतः बन्द है। पाँच जिलों में संपूर्ण मद्यनिषेध अपनाया गया है। ये बातें कम महत्वपूर्ण नहीं हैं।</p>
<p>मैं फिर कहूंगा कि सत्य हमेशा जिन्दा रहता है। मैं इसे अपना सौभाग्य मानता हूँ कि आज मैं जिंदा हूँ। वन माफिया और शराब माफिया ने मेरे जीवन को समाप्त करने के बहुत से कुचक्र चले। एक बार मुझे गंगा में डुबो दिया गया था। इस तरह की समस्याएँ हर आंदोलनकारी के जीवन में तो आती ही हैं। परंतु हार अंततः असत्य की ही होती है।</p>
<p><strong> निरंतर के पाठकों को कोई संदेश देना चाहेंगे?</strong></p>
<p>हमारे समय स्वच्छ जल, पवित्र धरती और निर्मल आकाश (वायु) था। उपभोक्तावादी संस्कृति ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा है और सर्वनाश फैलाया है। आज सभी प्रदूषण के शिकार हैं। समस्या गंभीर होती जा रही है। हमें लड़कर नया जमाना लाना होगा, जो वही, पुराना &#8211; स्वच्छ, पवित्र और निर्मल था। युद्ध तो छेड़ना ही होगा। और यही उपयुक्त समय है।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2120&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1206-samvaad-bahuguna/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>खुद को पत्नी माना ही नहीं कभी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 04 Nov 2006 06:58:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अमरीक सिंह दीप</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006samvaadmaitrayee/</guid>
		<description><![CDATA[कथाकार व उपन्यासकार <strong>मैत्रेयी पुष्पा</strong> समकालीन महिला हिंदी लेखन की सुपरस्टार हैं। पिछले दिनों हंस के एक अंक में संपादक राजेंद्र यादव ने मैत्रेयी की तुलना मरी हुयी गाय से की, इस पर साहित्य जगत में काफी हलचल हुयी। यह और अन्य अनेक बिंदुओं को लेकर वरिष्ठ कथाकार <strong>अमरीक सिंह दीप</strong> ने मैत्रेयी पुष्पा से विस्तार से बातचीत की।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="border: 1px solid #adadad; margin: 5px; padding: 5px; background-color: #ffffff; font-size: 1em; color: black;">
<p><img title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.jpg" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" width="135" height="113" align="right" />समर्थ कथा लेखिका व उपन्यासकार, <strong>मैत्रेयी पुष्पा</strong> को समकालीन महिला हिंदी लेखन की सुपरस्टार कहें तो अतिश्योक्ति न होगी। 30 नवंबर, 1944 को अलीगढ़ जिले के सिकुर्रा गांव में जन्मी मैत्रेयी के जीवन का आरंभिक भाग बुंदेलखण्ड में बीता। आरंभिक शिक्षा झांसी जिले के खिल्ली गांव में तथा एम.ए.(हिंदी साहित्य) बुंदेलखंड कालेज, झाँसी से किया। मैत्रेयी पुष्पा की प्रमुख साहित्यिक कृतियों में शामिल हैं स्मृति दंश, चाक, अल्माकबूतरी जैसे उपन्यास, कथा संग्रह चिन्हार और ललमनियाँ, कविता संग्रह- लकीरें। मैत्रेयी ने  लोकगायक ईसुरी की जीवनी पर उपन्यास लिखा है कहैं ईसुरी फाग। उनकी लिकी कहानी &#8220;ढैसला&#8221; पर टेलीफिल्म का भी निर्माण हुआ है।</p>
<p>श्रीमती पुष्पा को हिंदी अकादमी द्वारा साहित्य कृति सम्मान दिया गया है। उन्हें कहानी &#8216;फ़ैसला&#8217; पर कथा पुरस्कार मिला तथा &#8216;बेतवा बहती रही&#8217; उपन्यास पर उ.प्र. हिंदी संस्थान द्वारा प्रेमचंद सम्मान व &#8216;इदन्नमम&#8217; उपन्यास पर शाश्वती संस्था बंगलौर द्वारा नंजनागुडु तिरुमालंबा पुरस्कार। वे म.प्र. साहित्य परिषद द्वारा वीरसिंह देव सम्मान से भी नवाज़ी जा चुकी हैं।</p>
<p>मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यासों में बुंदेलखंड अंचल की जीवंत झांकी मिलती है। उनके कथा साहित्य में बदलते हुये समय के साथ बदलती हुयी स्त्री के आख्यान हैं। नारी जो घर से निकलकर अपने सपने देखती है, अपनी नियति खुद बनाने के लिये उपक्रम करती है, स्वाबलंबी बनने के लिये जद्दोजहद करती है।</p>
<p>पिछले दिनों अपनी कथाजगत में सक्रिय योगदान के साथ-साथ ही अपने सनसनीखेज बयानों के लिये जाने वाले हंस के संपादक राजेंद्र यादव ने हंस के जुलाई, 2006 के अंक में मैत्रेयी पुष्पा की तुलना मरी हुयी गाय से करने की बात पर साहित्य जगत में काफी हलचल हुयी। हंस में आजकल प्रकाशित हो रहे प्रभा खेतान के एक विवाहित डाक्टर से संबंधों को लिखे जा रहे आत्मकथात्मक संस्मरण काफी चर्चा में हैं।</p>
<p>इन्हीं सब बिंदुओं को लेकर वरिष्ठ कथाकार <strong>अमरीक सिंह दीप</strong> ने मैत्रेयी पुष्पा से विस्तार से बातचीत की। निरंतर के पाठकों के लिये खासतौर पर पेश है इस बातचीत के मुख्य अंश।</p>
</div>
<p><img title="मैत्रेयी पुष्पा, अमरीक सिंह" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/maitraiyee-amreek.jpg" border="0" alt="मैत्रेयी पुष्पा, अमरीक सिंह" hspace="5" vspace="5" width="261" height="274" align="right" /><strong>जुलाई, 2006 के &#8216;हंस&#8217; पत्रिका के सम्पादकीय <a href="http://hansmonthly.com/details.asp?id=3293&amp;title=viuh+fu%3Bfr+igpkuks%5D+eS%3Dks%3Bh%2D%2D%2D%B9&amp;sec=esjh%26rsjh+mldh+ckr&amp;wr=jktsU%E6+%3Bkno&amp;isd=54">नियति पहचानो</a> मैत्रेयी में राजेंद्र यादव ने आपको &#8216;मरी हुई गाय&#8217; का लकब देने के बाद आपकी तारीफ़ के पुल बांधे हैं। क्या आप उससे सहमत हैं?</strong></p>
<p>अब देखिए कि मरी गाय भी कहा और तारीफ़ के पुल भी उन्होंने बांधे हैं। तारीफ़ सच है या यह दूसरी बात सच है यह तो आप लोग समझें कि ये क्या है। बहरहाल जो मैंने लिखा है या जिन विषयों को लेकर मैंने लिखा है उन्हीं विषयों के मद्देनज़र रखा है और सिर्फ यह कहा है। तारीफ़ लग रही है आप लोगों को लेकिन उन्होंने सिर्फ यह कहा है कि यह (मेरा लेखन) अलग है। अलग था,  आया नहीं था अभी तक। जो चीज नयी आयी होती है वह नयी लगती ही है। और लगता है नया शोध है, नयी खोज है और नये तरह का साहित्य आ रहा है। जब और लोग पढ़ते हैं तो उन्हें तारीफ़ लगती है। वरना तो तारीफ़ इसमें कुछ भी नहीं है। एक तरह की नयी बात आती है तो यही उन्होंने कहा है। और तो कुछ नहीं। मुझे तो ऐसा ही लगा बाकी&#8230;।</p>
<p><strong>तो आप सहमत नहीं हैं इस बात से?</strong><br />
किस तरह मेरी तारीफ़ की है? अरे नहीं। जो मैंने किया है, लिखा है वही लिखा है उन्होंने। एक बात मुझे अच्छी लगी जो उन्होंने कही, &#8221; तुम स्त्री को गांव लाई। गांव की<br />
स्त्री और स्त्री के गांव में फर्क है।&#8221; उनका यह कहना मुझे ठीक लगा कि ये एक नई बात हुई। क्या वाकई ही मैंने ऐसा किया है! यूं तो लोग तरह-तरह के कमेंण्ट देते हैं, अपनी समझदारी से देते हैं, सहमति-असहमति प्रकट करते हैं। उससे मुझे खास वो नहीं है। जैसे उन्होंने सिर्फ कहा (लिखा) था -&#8221;तुम नाराज हो?&#8221; मैंने कहा था -  मनोहर श्याम जोशी के लिये आपने इस तरह क्यों लिखा?</p>
<div id="pullQuoteR"><strong>(गांव में) अभी भी नहीं बदला है- पिता के दबाव, पति के दबाव, भाइयों, रिश्तेदारों के दबाव- वे तो बराबर बने हैं अभी भी।</strong></div>
<p><strong>मैंत्रेयीजी, आपने अपने उपन्यासों में वही स्त्री दिखाई है, वही गांव है जो 35-40 साल पहले का गांव था। क्या अब आपके अगले उपन्यास में गांव की वह स्त्री आ रही है जिसमें बहुत से बदलाव हो चुके हैं?</strong><br />
आपने जो कहा है वह कहां? 30-40 साल पहले तो स्त्री बाहर ही नहीं निकलती थी। सारंग जो साहस दिखाती है, मंदा जैसी लड़की कोई नहीं हो सकती जो कुंवारी रह जाये और गांव, समाज के लिये पूरा जीवन बलिदान कर दे। जिसमें इतना विक्षोभ भी है और साहस भी। तो यह तो 35-40 साल पहले की स्त्री तो बिल्कुल नहीं है।</p>
<p><strong>नहीं, मेरा कहना यह था कि अब जो गांव की बहुत सी महिलायें सुरक्षित सीट या महिला सीट होने के चलते आगे तो आ गईं हैं, भले ही वे पिछड़ी हुईं थी लेकिन दो चार महीने में वे भी &#8216;सिस्टम&#8217; में रवां हो जाती हैं और वे भी आधुनिकता का वही रूप पकड़ लेती हैं। आप अपने उपन्यास में इस स्त्री को लेकर लिखने के बारे में कुछ सोचती हैं?</strong><br />
देखिये, मेरी एक कहानी है- &#8216;फैसला&#8221; और चार-छह उपन्यास भी यही कहते हैं कि वो घर से निकलकर पंचायत तक आ गई। पर्चा भरने खुद गई। वह समझ रही है कि जब तक इस पंचायत में हस्तक्षेप नहीं होगा तब तक प्रधान और ये सब मिलकर उसे ऐसे ही धचके देते रहेंगे जो उसे तबाह करते रहेंगे। कहानी &#8216;फैसला&#8217; में यही है कि जो पतियों के दबाव हैं वे बरकरार रहेंगे गांव में। अभी भी नहीं बदला है- पिता के दबाव, पति के दबाव, भाइयों के दबाव, रिश्तेदारों के दबाव- तो वे तो बराबर बने हैं वहां पर अभी भी। फैसला की बासुमती कहती है-&#8221; जो आप कह रहे हैं वह नहीं। जो मैं सोच रही हूं वो&#8230;। जो मैं सोच रही हूं जो मेरा फैसला है वो।&#8221; उसमें भी वो पति के खिलाफ वोट देती है।</p>
<p><strong>आप पहली महिला लेखिका हैं जिसने गांव की स्त्री की व्यथा को पूरी गहराई से जाना, समझा और व्यक्त किया है। आपके उपन्यासों &#8216;इदन्नमम्&#8217;, &#8216;चाक&#8217;, &#8216;अल्मा कबूतरी&#8217; में गांव की स्त्रियां जितनी प्रगतिशीला चित्रित हुयी हैं क्या आज गांव समाज की स्त्रियां वास्तव में इतनी बदल चुकी हैं?</strong><br />
देखिये, प्रेमचन्द ने कहा है कि साहित्य समाज के आगे चलने वाली मशाल है। तो कहीं तो हैं ऐसी स्त्रियां। इसमें कहीं मुझे &#8216;विशफुल थिंकिंग&#8217; नहीं दिखानी पड़ी कि ऐसा होना चाहिये ऐसा होगा&#8230;।</p>
<p><strong>कितने प्रतिशत होंगी ऐसी स्त्रियां?</strong><br />
ऐसी स्त्रियां निखालिश हों यह नहीं। इनमें कुछ न कुछ यथार्थ मिला हुआ है और कुछ कल्पना। अनुपात, जरूर उसका फर्क हो सकता है। कहीं कल्पना ज्यादा, कहीं यथार्थ ज्यादा। और वो जो स्त्री है जो एक हिम्मत है, हौसला है, जो खुद को व्यक्त करने की क्षमता आ रही है स्त्रियों में। इतना मैं दिखा भी रही हूं लेकिन कहीं-कहीं जहां मुझे कमजोर लगता है, वहां मैं अपनी विशफुल थिंकिंग से, आकांक्षा से अपने सपने को सच करती हूं।</p>
<p><img title="मैत्रेयी पुष्पा, गिरिराज किशोर, प्रियंवद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/maitraiyee-giriraj-priyamva.jpg" border="0" alt="मैत्रेयी पुष्पा, गिरिराज किशोर, प्रियंवद" hspace="8" vspace="8" width="291" height="220" align="right" /><strong>आपकी आत्मकथा, &#8216;कस्तूरी कुंडल बसै&#8217; में वैसी बेबाकी नहीं है जैसी अभी प्रभा खेतान की आत्मकथा, <a href="http://hansmonthly.com/details.asp?id=3180&amp;title=vU%3Bk+ls+vuU%3Bk&amp;sec=vkRedFkk&amp;wr=%E7Hkk+%5Bksrku&amp;isd=47" target="_blank"> से अनन्या</a> तक में हैं।</strong><br />
मुझे नहीं मालूम। मैंने पढा़ भी नहीं अभी। थोड़ा पढा़ है, जितना हंस में छ्पा है। देखिये मेरा और उनका ( प्रभा खेतान का) परिवेश बिल्कुल अलग है। जिन परिस्थितियों ने मुझे बनाया जाहिर है उन्ही परिस्थितियों ने उन्हें नहीं बनाया। उनका बचपन देखिये और मेरा बचपन देखिये। बहुत अन्तर दिखाई देगा आपको। मैं एक गांव की लड़की, जहां सड़क भी नहीं, कोई सुविधा नहीं, कोई स्कूल नहीं।&#8230; और वो एक मारवाड़ी परिवार और वह भी अच्छे-खासे धनाढ्य। उसमें पली-बढ़ीं वे, तो उसमें फर्क तो होगा ही।</p>
<p>और आप जिसे बेबाकी मानते हैं उसका मुझे नहीं मालूम। जो मैंने पढ़ा है वो उनका इसलिये है कि डाकटर से जो संबंध हैं, उसमें बेबाकपना दिखाती हैं, वो उस समय का है जब वे काफ़ी &#8216;मैच्योर&#8217; हो चुकीं थीं। मेरा उस जमाने का है जब मैं बहुत कच्ची अवस्था में, &#8216;स्कूल गोइंग&#8217; लड़की थी। उनके अन्दर बहुत समझदारी भी है। मेरे अन्दर समझदारी भी नहीं है। तो उसे आप बेबाकी में रखिये। मेरे को चाहे आप नादानी में रखिये-यह आपके ऊपर है।</p>
<p><strong>हिंदी साहित्य के समकालीन स्त्री लेखन से क्या आप संतुष्ट हैं?</strong><br />
अभी संतुष्ट होने की बात ही नहीं है। अभी वो चीजें आरी नहीं हैं जिन्हें आना है। एक और बात है कि अभी स्त्रियां दो &#8216;ग्रुप्स&#8217; में बंटीं हैं। एक तो वे जो स्त्री विमर्श को खारिज कर रही हैं। दूसरी स्त्री विमर्श को महत्व दे रहीं हैं। अभी तो यह भी मुद्दा चल रहा है क्योंकि स्त्री विमर्श यहां बहुत पुराना नहीं है। स्त्री के ऊपर स्त्री ने लिखा है लेकिन स्त्री विमर्श क्या है इस पर बात नहीं हुई। अभी तो पूरा स्त्री विमर्श् क्या होता है इसी की परिभाषा नहीं पता स्त्रियों को और् राजेंद्र् यादव ने जो हंस के सम्पादकीय में लिखा है उसमें बहुत कुछ समझाया है। हालांकि वे पुरुष हैं लेकिन मेरे ख्याल में स्त्री लेखन से ही लेकर उन्होंने निचोड़ निकाला है।</p>
<p><strong>एक सम्पन्न परिवार की महिला होते हुये भी कैसे आप बुंदेलखंड के गांव की निम्नवर्गीय स्त्री की समस्यायों व पीड़ाओं को इतनी गहराई से समझ और व्यक्त कर लेती हैं?</strong><br />
असल में दीपजी, लोगों को ऐसा भ्रम है कि मैं एक सम्पन्न परिवार की महिला हूं। जब मैं महिला हुई और उतरती अवस्था की महिला हुई तब सम्पन्नता दिखने लगी क्योंकि लड़कियां बड़ी हो गयीं, परिवार भी समर्थ हो गया। उससे पहले तो मैं बहुत विपन्न और बहुत निम्न मध्यवर्ग की लड़की थी जिसके पास वो सहारा भी नहीं था जो गांव की लड़कियों के पास होता है। आपने &#8216;कस्तूरी कुंडल बसै&#8217; में पढ़ा होगा कि मैं ऐसी लड़की थी जिसके पास खाने के लिये रोटी भी नहीं थी, रहने के लिये घर नहीं था, पढ़ने के लिये साधन नहीं थे&#8230;।</p>
<div id="pullQuoteR"><strong>आदमी सुख भूला जाता है, दुख नहीं भूलता। जो मंजिल पा लेते है वो भी अपने संघर्ष याद रखते हैं।</strong><strong>वे सारी इतनी पुरानी बातें आपकी स्मृति में कैसे संचित रहे गईं?</strong></div>
<div>देखिये आदमी सुख भूला जाता है, दुख नहीं भूलता। आदमी जो मंजिल पा लेते है तो भी अपने संघर्ष याद रखता है।</div>
<p>इसको मैं पलट दूं कि आदमी सारी उम्र भूला जाता है लेकिन बचपन नहीं भूलता। तो बचपन ऐसी निश्छल चीज है जो अभी तक याद है। बचपन विपन्नता में गुजरा, संकटों में गुजरा। वही सब मेरे साथ था जिसे मैं साहित्य में ले आई। वही सब आज भी मुझे उनसे जोड़े हुये है। मुझे किसी भी क्षेत्र में, देश के किसी भी इलाके में भेज दीजिये मैं बहुत खुश रहूंगी और वहां जैसे मैंने बचपन काटा वैसे ही लोगों से जुड़कर फिर कुछ लिखना चाहूंगी।</p>
<p><strong>इस वक्त आप क्या लिखा रहीं हैं?</strong><br />
हर लेखक से यह सवाल पूछा जाता है कि वह क्या लिख रहा है! यह तो पक्का है कि लेखक लिखे बिना नहीं रह सकता। उसके हिसाब से कोई छोटा-बड़ा लेखन नहीं होता है। लेखक जो भी लिखता है पूरी ताकत से लिखता हैं, उनकी किताब भी आ गई है- &#8216;सुनो मालिक सुनो&#8217;।</p>
<p><strong>एक जो असंतुष्टि होती है लेखक में कि अभी हमने जो लिखना था वह लिखा नहीं पाया&#8230;?</strong><br />
हां&#8230;। अब तो मैं इसलिये लिख रही हूं कि आत्मकथा का दूसरा भाग लिख सकूं।</p>
<p><strong>&#8216;कस्तूरी कुंडल बसै&#8217; का दूसरा भाग?</strong><br />
हां, मेरे लिये वह बहुत जरूरी है। कभी न कभी लिखूंगी। जो पाठक वर्ग इतना फैल गया है वह कहता है कि &#8216;कस्तूरी कुण्डल बसै&#8217; के बाद यह बताइये कि आप लेखिका कैसे बनीं? जो लड़की इस तरह की थी वह लेखिका कैसे बन गई? इतने बीहड़ से आकर। और जान लीजिये इसमें मेरी शादी का, मेरे पति का कोई सहयोग नहीं। यह तो मेरे अंदर ही कुछ होगा उसी से लिखा यह सब। लेखिका कैसे बन गई यह सब बताना है मुझे।</p>
<p><strong>लिखने की यह प्रेरणा, यह उत्कट जज्बा कहां से आया आप में?</strong><br />
लोग एकदम से कह देते हैं कि मेरी प्रेरणा यह है, वह है। यह गलत है। वो पूरा सोच नहीं पाते। एकदम से कह देते हैं, उतावली में। प्रेरणा एक नहीं होती। प्रेरणा एक भी नहीं होती, एक स्थितियां भी नहीं होतीं। प्रेरणा तो थोड़ी-थोड़ी जाने कहां-कहां से मिलती है और वह एक जज्बा बन जाती है।</p>
<p><strong>आपने अपनी लेखन शुरू किया है सरिता वगैरह से और उसके बाद से एकदम इतना परिपक्व लेखन! यह कैसे हुआ?</strong><br />
असल में पहले तो मुझे यह भी नहीं पता था कि जो मैं लिखूंगी वह छप भी जायेगा, जैसा कि हर लेखक को लगता है। मैं बार-बार कहती हूं कि मेरी बड़ी बेटी है, उसने कहा कुछ लिखो। तुम हमारे लिये लिखतीं थीं तो कुछ इनाम-विनाम मिल जाते थे। अपने नाम से लिखो। तो मैंने उससे यह कहा था कि बेटा मेरा नाम क्या है? मैं तो नाम भी भूल गई। मैं तो मिसेज शर्मा हूं। डाक्टर आर.सी.शर्मा की वाइफ। इसके सिवा मुझे कुछ याद नहीं। तो उस वक्त मैं इस अवस्था में थी। बच्चियों के कहने से मैंने कहानी लिखी। मुझे नहीं पता था कि वह छपेगी भी या नहीं। वह छपी भी नहीं। पढती भी थी लेकिन पढने की एक और विडम्बना मेरे साथ थी कि जब मैं किसी की कहानी पढ़ती थी, मान लो मैं धर्मयुग या साप्ताहिक हिंदुस्तान में किसी की कहानी पढ़ रही हूं, उसके समानान्तर मेरे मन में कोई कहानी चलने लगती थी। मैं इससे इतनी परेशान हो जाती थी कि पढ़ना छोड़ देती थी और अपनी मन की कहानी कहने लगती थी। इस तरह दूसरे की कहानी को भी एक प्रेरणा कह सकते हैं। मैं उस समय इस अवस्था में थी कि यह जानते हुये भी कि यह कहानी छपेगी नहीं मैंने कहानी लिखी। कहानी छपी नहीं लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी। जैसा कि नये लेखक करते हैं कि एक बार कहानी नहीं छपी तो निराश हो जाते हैं कि हम फिर कभी नहीं लिखेंगे। मैंने सोच लिया था कि बच्चों ने कहा है तो अब मैं यह नहीं करूंगी कि नहीं छपी तो नहीं लिखूंगी।</p>
<p>फिर मैंने लिखी कहानी। वह नहीं छपी तो फिर लिखी। फिर-फिर लिखी। एक कहानी &#8216;साप्ताहिक हिंदुस्तान&#8217; में छप गई। जब एक बार छप गई तो लिखना शुरू हो गया। यह भी बहुत जरूरी है किसी लेखक के लिये उसका एकबार छप जाना।</p>
<div id="pullQuoteR"><strong>शादी के शुरू-शुरू में मैंने पति को लिखा था, &#8220;मैंने तो साथी-सखा ढूंढा था तुम तो मालिक हो गये।&#8221; ये कीटाणु तब से रेंग रहे थे मेरे मन में!</strong></div>
<p><strong>अब आप कैसा महसूस करती हैं? एक नामी डाक्टर की पत्नी और एक प्रतिष्ठित लेखिका हैं, इन दोनों के साथ आप कैसा महसूस करती हैं? </strong><br />
देखिये डाक्टर की पत्नी तो मैंने कभी महसूस ही नहीं किया। ठीक है कि मैं शादी करके आई थी। अभी मैंने अपनी पुरानी चिट्ठियां निकालकर पढ़ीं तो मेरी एक चिट्ठी, बहुत पुरानी चिट्ठी, जब मैं बीस वर्ष की थी और मेरी शादी के शुरू-शुरू के दिन रहे होंगे, उसमें मैंने एक वाक्य अपने पति को लिखा था-&#8221;मैंने तो साथी-सखा ढूंढा था तुम तो मालिक हो गये।&#8221; तो मुझे एकदम से लगा कि ये कीटाणु कब से रेंग रहे थे मेरे मन में, कब से कुलबुला रहे थे जो मैंने ऐसा लिखा!</p>
<p>तो सच तो यह है कि पत्नी कभी माना ही नहीं मैंने खुद को। यह मेरे पति का दुर्भाग्य समझ लीजिये कि मैने पत्नी की तरह कभी उनकी सेवा नहीं की जैसी दूसरी औरतें करती हैं कि कहीं जा रहे हैं तो अटैची लगा दी, नहाने जा रहे हैं तो कपड़े रख देतीं हैं, उनके कपड़े प्रेस करतीं हैं -यह कभी नहीं किया। और पति ने कभी इस बात की शिकायत नहीं की। उन्होंने हमेशा अपना काम कर लिया। मैंने कभी नहीं पूछा कि तुम कब आओगे तो लोगों को इससे बहुत शिकायत होती है कि वो जाते हैं तो तुम तो पूछ लेतीं कि कब वापस आओगे? पर उनके जाने पर मैं खुद को स्वतंत्र महसूस करती। मैं सोचती कि अब मैं अपने मन का कुछ करूंगी। कुछ अपने मन का करूंगी, कुछ गज़ल सुनूंगी।</p>
<p><strong>जैसे पेपरवेट उठ गया। अब मैं उडूंगी?</strong><br />
हां, इस तरह उडूंगी चाहे घर में ही उडूं। हालांकि पति सोचते थे कि ये क्यों नहीं मानती। वो मुझे उदाहरण भी देते दूसरी स्त्रियों के। मैं कहती थी कि पता नहीं, मैंने तुमसे शादी इसलिये नहीं की। हालांकि मेरा प्रेम विवाह नहीं हुआ था, अरेंज्ड मैरिज थी लेकिन अरेंज्ड मैरिज भी मेरी मर्जी से हुई थी। मैं कहती कि मैं तुमको पति मानकर नहीं आई थी मैंने तो सोचा था कोई साथी मिलेगा। तो यह समझे लीजिये कि मैंने पारंपरिक रूप में पत्नी कभी नहीं माना अपने-आपको। हां, लेखिका भी नहीं माना अपने आपको। कोई कहता है लेखिका तो मैं सकुचा जाती हूं,संकोच होता है कि मैं कहां लेखिका। जो था मेरे पास&#8230;तो ठीक है लिखती हूं। जो रचनाओं में, बहस में, विवादों में आया है वह मेरे लेखन का, साहित्यिक भाषा में क्या कहते हैं, अवदान रहेगा।</p>
<div style="border: 0px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: none repeat scroll 0% 50% #f4f4f4; width: 500px; float: left;">सभी चित्र व साक्षात्कार शब्दांकनः <strong>अनूप शुक्ला</strong></div>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2119&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-maitrayee/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>3</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>मुझे है आस कल की&#8230;</title>
		<link>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-agnishekhar</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-agnishekhar#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 05 Oct 2006 06:26:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Kashmir]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/1006samvaadagnishekhar/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>डॉक्टर कुलदीप सुंबली &#34;अग्निशेखर&#34;</strong> के व्यक्तित्व के कई पहलू हैं -- कवि, लेखक, विचारक और विस्थापित कश्मीरियों के नेता। पनुन कश्मीर, जिसके वे अगुआ रहे हैं, को वे सेक्युलरिज़्म की नर्सरी मानते हैं। निरंतर संपादक <strong>रमण कौल</strong> ने जम्मू में अग्निशेखर से साहित्य, पनुन कश्मीर जैसे अनेक विषयों पर चर्चा की। <strong>संवाद </strong>स्तंभ में पढ़िये अग्निशेखर का साक्षात्कार।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="border: 1px solid #adadad; margin: 5px; padding: 5px; background-color: #ffffff; font-size: 1em; color: black">
<p><img width="135" vspace="3" hspace="3" height="113" border="0" align="right" alt="संवाद" title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.jpg" /><strong>डॉक्टर कुलदीप सुंबली (अग्निशेखर) </strong>संभवतः न कश्मीर की राजनीति में परिचय के मोहताज हैं, न हिन्दी साहित्य में। हाँ, उन से बात करते समय यह समझ में नहीं आता कि उन के व्यक्तित्व के इन दोनों पहलुओं के बीच की रेखा कहाँ है।</p>
<p>अस्सी के दशक के पूर्वार्ध में जब अग्निशेखर कश्मीर विश्वविद्यालय में हिन्दी में पी.एच.डी. कर रहे थे, तो उन्होंने शायद सोचा ही न होगा कि नियति उन को नेतृत्व की इस दिशा में धकेल देगी। फिर अस्सी का दशक समाप्त होते होते, कश्मीर घाटी में इनक़लाब सा आ गया &#8212; तथाकथित आज़ादी का इनक़लाब। वर्षों से कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित अलगाववाद का जो लावा उबल रहा था, वह ज्वालामुखी बन कर फूट पड़ा। कुछ दिनों के लिए, कुछ शहरों में, लग रहा था कि अलगाववादी अपने मक़सद में कामयाब हो गए हैं। मस्जिदों के लाउड-स्पीकरों से, उर्दू अखबारों में छपी सूचनाओं से एक ही आवाज़ आ रही थी &#8211; रलिव या गलिव, (हमारे साथ) मिलो या मरो। ऐसे में कश्मीरी हिन्दू और अन्य भारतवादी आतंक के घेरे में आ गए। कुछ लोगों को निशाना बनाया गया, जिन में गणमान्य लोग भी थे और साधारण लोग भी। कई गाँव के गाँव ऐसे में एथ्निक क्लीन्सिंग की भूमिका बनाए गए, ताकि बाकी भारतवादियों को सबक मिले। लाखों लोगों का एक पूरा समुदाय, जो पीढ़ियों से कश्मीर के अतिरिक्त किसी घर को नहीं जानता था, समूल उखाड़ फेंका गया। </p>
<p>कश्मीरियों के लिए यह अनुभव संभवतः विभाजन के समय पाकिस्तान से आए शरणार्थियों या तालिबान द्वारा अफ़गानिस्तान से भगाए गए हिन्दुओं से कम नहीं था, पर यह इस दृष्टि से भिन्न था कि जहाँ पाकिस्तान और अफ़ग़ानिस्तान से भागे हिन्दुओं को शरणार्थी मान कर मुआवज़ा दिया गया, कश्मीरियों को कभी शरणार्थी नहीं माना गया क्योंकि कश्मीर तो अभी भी भारत का &quot;अटूट अंग&quot; था। कश्मीरियों की वर्तमान पीढ़ी के लिए विस्थापन जीवन भर की वेदना बन गया। इन्हीं लाखों विस्थापितों में अग्निशेखर के परिवार ने भी जम्मू में आकर डेरा डाला। परन्तु व्यक्तिगत कठिनाइयों के बावजूद, पारिवारिक त्रासदियों के बावजूद, बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने के उन्होंने अपने अधिकार के लिए लड़ने का निश्चय किया। तभी अपने कुछ युवा मित्रों के साथ वे राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में पनुन कश्मीर (अपना कश्मीर) के कन्वीनर के रूप में अवतरित हुए। पनुन कश्मीर का नारा था, &quot;असि छु तरुन कश्मीर&quot; यानी, हमें (वापस अपने) कश्मीर जाना है। पिछले डेढ़ दशक में उन का संघर्ष कई मरहलों से गुज़रा, और मंज़िल अभी भी दूर है।</p>
<p>अग्निशेखर का इस बीच साहित्य का भी मनन होता रहा। तीन कविता संग्रह छपे &#8211; &quot;किसी भी समय&quot;, &quot;मुझ से छीन ली गई मेरी नदी&quot;, &quot;काल वृक्ष की छाया में&quot;। एक कहानी पर <a href="http://www.tribuneindia.com/2004/20040507/cth2.htm#6">फिल्म भी बनी</a>, उस फिल्म में कैमियो रोल भी किया। हाल में उन्हें <strike>छत्तीसगढ़ सरकार के प्रतिष्ठित</strike> सूत्र सम्मान से पुरस्कृत किया गया। वे वेब पत्रिका <a target="_new" href="http://www.kritya.in/">कृत्या</a> के <a target="_new" href="http://www.kritya.in/0205/hn/who_we_are.html">सम्पादक मंडल</a> में भी शामिल हैं। हाल में निरंतर संपादक दल के सदस्य <strong>रमण कौल</strong> को जम्मू में अग्निशेखर से मिलने का मौका मिला। प्रस्तुत हैं निरन्तर के लिए उन के साथ किए गए एक विशेष साक्षात्कार के कुछ अंश।</p>
</p></div>
<p>
    <strong>आप के सार्वजनिक जीवन के कई पहलू दिखाई देते हैं &#8212; कवि, लेखक, विचारक और विस्थापित कश्मीरियों के नेता। क्या इन सब पहलुओं में आप को किसी विरोधाभास का सामना करना पड़ता है?</strong>   </p>
<p>      <img vspace="5" hspace="8" border="0" align="left" title="Agnishekhar" alt="Agnishekhar" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/agnishekhar.jpg" />कविता रच रहा हूँ, तो जी रहा हूँ। इस में किसी प्रकार का विरोधाभास नहीं है। मेरी कविता का केन्द्रीय संवेदन निर्वासन, विस्थापन, निष्कासन है, और यही मेरे जीवन की संवेदना हो गई है। इसी से मुक्ति की कामना, प्रतिरोध का संघर्ष हम छेड़े हुए हैं, जिस में मैं अग्रणी रूप से सक्रिय हूँ और चाहता हूँ कि जिन के साथ हम घाटी में जी रहे थे वे सभी सांस्कृतिक जीवन मूल्य पुनः बहाल हों, सद्भाव हो और धर्म जाति या मौलिक विचारधारा के आधार पर किसी के साथ भेदभाव न हो। मुख्यतः पनुन कश्मीर सूक्ष्म स्तर पर यही एक स्वप्न लेकर चलता है। हालाँकि इसकी स्थूल व्याख्याएँ अलग अलग तरह से की जाती हैं। पनुन कश्मीर मेरे लिए सेक्युलरिज़्म की नर्सरी है, जिस में हम इन्हीं जीवन मूल्यों की पनीरी बचाए हुए हैं। आज कश्मीर घाटी में अलगाव और धर्म के आधार पर एक विखंडन की प्रतिक्रिया अपने हिंस्र और बर्बर रूप में चल रही है। मेरे लिए दो ही रास्ते हैं। या तो पराजय स्वीकार कर अपना जीवन यापन करना, या पलट कर इस सब से लड़ना। शब्द और कर्म दोनों से। कबीर, मेरे आदर्श कवि के हवाले से</p>
<blockquote><p>सुखिया सब संसार है खावै और सोवै <br />
     दुखिया दास कबीर है जागै और रोवै</p></blockquote>
<p> मेरे जागने और मेरे दुख में जहाँ निविड़ एकान्त, उदास कर देने वाली चुप्पी है वहीं भविष्य में आस्था रखने वाले ऐसे तमाम विस्थापित संस्कृति कर्मी, बुद्धिजीवी, संघर्ष-चेतना से संपन्न राजनीतिक कार्यकर्त्ता व शरणार्थी शिविरों में घुट घुट कर सांस ले रही आम जनता की भागीदारी रही है, जो आज के छद्म और क्षुद्र स्वार्थों के युग में अकेला पड़ते हुए भी संबल देती है। कवि केदारनाथ अग्रवाल की कविता पंक्ति हैं</p>
<blockquote><p>मुझे प्राप्त है जनता का बल <br />
     वो बल मेरी कविता का बल <br />
     मैं उस बल से शक्ति प्रबल से  <br />
     एक नहीं सौ साल जियूँगा।</p></blockquote>
<p> इसीलिए मैंने उन तमाम अपने प्रिय प्रगतिशील कवियों, रचनाकारों बुद्धिजीवियों की परवाह नहीं की जो मेरे विस्थापन और (इस) जीनोसाइड पर चुप रहे। यह टीस मुझे अन्दर ही अन्दर सालती रही है। अभिव्यक्ति के सारे खतरे लगातार उठाते हुए चरम यातना के क्षणों में भी मेरी आस्था, मेरा सौन्दर्य मरा नहीं। प्रतिक्रिया वादी बना नहीं अपितु एक अद्भुत दीप्ति से चमक उठा है, जो कि एक संघर्ण रत रचनाकार से अपेक्षित होता है। मैं पाबलो नेरूदा, बरतोत ब्रेख़्त से ले कर क़ाज़ी नज़रुल इसलाम से निराला तक कवियों से प्रेरित व्यक्ति हूँ। </p>
<p>      <strong>पनुन कश्मीर की उत्पत्ति कैसे हुई? इसे कई लोग उतना ही सांप्रदायिक मानते हैं जितना कश्मीर का मुस्लिम अलगाववाद। आप का इस के विषय में क्या कहना है?</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>अलग होमलैंड की मांग साम्प्रदायिक नहीं धर्म-निरपेक्ष है। साम्प्रदायिक तो समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक हैं।</div>
<p> मैं पनुन कश्मीर का स्वप्न दर्शी हूँ। मैंने अपने चन्द मित्रों के साथ इस को सोचा, बुना और खड़ा किया। इस में कश्मीरी विस्थापितों के उन तमाम अधिकारों की आग्रहपूर्वक बात की जो उन से छिन चुके थे, भूमि की बात की, अनुभवों की बात की। भविष्य की अपने लिए शासन की बात की, भारतीय संविधान की निर्बाध बहाली की बात की, इसीलिए होमलैंड के साथ केन्द्र शासित क्षेत्र की बात की, जहाँ वे सब लोग निश्शंक और निर्भय हो कर सम्मान के साथ रह सकें जिन का विश्वास भारतीय लोकतन्त्र और धर्म-निरपेक्षता, सह-अस्तित्व और सहिष्णुता में हो। चूँकि कश्मीर में धर्म-निरपेक्षता की धज्जियाँ उड़ाई गई हैं, सह-अस्तित्व को नकारा गया है, अतः वहाँ के मूल नागरिक होने के नाते हमारा अधिकार बनता है कि हम वहाँ जा कर अपने रंग-ढंग से रह सकें। इसीलिए हम ने अलग होमलैंड की मांग की। यह मांग साम्प्रदायिक नहीं है, बल्कि धर्म-निरपेक्ष है। जबकि समूचा आतंकवाद, अलगाववाद और उसके समर्थक साम्प्रदायिक हैं। इसीलिए मैंने कहा पनुन कश्मीर धर्म-निरपेक्षता की नर्सरी है। </p>
<div style="border: 1px solid #cfcfcf; margin: 5px; padding: 5px; background: #f9f9f9 none repeat scroll 0% 50%; -moz-background-clip: initial; -moz-background-origin: initial; -moz-background-inline-policy: initial; font-size: 1em; float: right; width: 205px; text-align: left">
<h1>कांगड़ी</h1>
<h3>डॉ अग्निशेखर की एक कविता</h3>
<p><img width="201" vspace="5" hspace="2" height="240" border="0" alt="Kangri" title="kangri" src="http://www.nirantar.org/images/stories/1006/Kangri.gif" /></p>
<p>जाड़ा आते ही वह उपेक्षिता पत्नी सी<br />
   याद आती है<br />
   अरसे के बाद हम घर के कबाड़ से<br />
   उसे मुस्कान के साथ निकाल लाते हैं<br />
   कांगड़ी उस समय <br />
   अपना शाप मोचन हुआ समझती है<br />
   उस की तीलियों से बुनी<br />
   देह की झुर्रियों में<br />
   समय की पड़ी धूल<br />
   हम फूँक कर उड़ाते हैं<br />
   ढीली तीलियों में कुछ नई तीलियाँ भी डलवाते हैं।</p>
<p>वह समझती है<br />
   कि दिन फिरने लगे हैं<br />
   हम देर तक रहने वाले कोयले पर <br />
   उस में आंच डालते हैं<br />
   धीरे धीरे उत्तेजित हो कर <br />
   फूटने लगता है उस की देह से संगीत<br />
   जिसे अपनी ठंड की तहों में<br />
   उतारने के लिए हम<br />
   उसे एक आत्मीयता के साथ <br />
   अपने चोगे के अन्दर वहशी जंगल में लिए फिरते हैं।</p>
<p>और जब रात को बुझ जाती है कांगड़ी<br />
   हम अनासक्त से हो कर <br />
   उसे सवेरे तक <br />
   अपने बिस्तर से बाहर कर देते हैं<br />
   कांगड़ी अवाक् देखती है हमें रात भर <br />
   आदमी हर बार <br />
   ज़रूरत के मौसम में उसे फुसलाता है<br />
   परन्तु नहीं सोचता कभी वह<br />
   उलट कर उस के बिस्तर में<br />
   भस्म कर जाएगी सदा की बेहूदगियाँ।</p>
</p></div>
<p>       <strong>पनुन कश्मीर के मार्गदर्शन मांगपत्र में मांग की गई है कि वितस्ता (झेलम) के पूर्व एवं उत्तर का भाग एक केन्द्र शासित प्रदेश रूप में बनाया जाए और वहाँ कश्मीरी हिन्दुओं को बसाया जाए। क्या आप को यह सुझाव व्यावहारिक लगता है?</strong>   </p>
<p> पिछले लगभग दो दशकों से विश्व का भू-राजनैतिक घटनाक्रम जिस तेज़ी के साथ स्थापित मानचित्र बदलता हुआ चला है उसे देखते हुए क्या मैं आप से पूछूँ कि क्या सोवियत रूस का टूटना संभव था? टूट कर नए देशों का बनना, बर्लिन की दीवार का गिरना? इसी तरह आज़ाद कश्मीर में पाकिस्तान का बनना, अलग इस्लामी गणतन्त्र का बनना? कश्मीर को वहाँ के मूल निवासी हिन्दुओं से विहीन करना संभव है, तो विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए चंडीगढ़ सरीखा एक विशाल गृहराज्य बनना संभव क्यों नहीं? यह दरअसल एक राष्ट्रीय मुद्दा है, संकीर्ण और कश्मीरी पंडितों तक सीमित नहीं। </p>
<p> कश्मीर के मुद्दे का अन्तिम निदान कब और कैसे होगा, आज की तारीख में उस के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। जब भी ऐसा होगा, उस समय हमारे भू-राजनैतिक अधिकारों की अनदेखी घातक सिद्ध होगी। कश्मीर में कश्मीरी हिन्दुओं का वापसी कश्मीरियत की वापसी है, उसकी परंपरा की वापसी है, उसकी विरासत की वापसी है, और इसे वृहत् भारतीय सांस्कृतिक परिपेक्ष्य में देखें तो यह हमारे जीवन मूल्यों की वापसी है। </p>
<p>      <strong>आप के लेखन और कविता में किसी और चीज़ से अधिक अपने सामुदायिक निष्कासन की छाप क्यों दिखती है?</strong>   </p>
<p> दुर्भाग्य से निर्वासन हमारी नियति बन गई है। यह निर्वासन देश विभाजन के बाद की सब से बड़ी मानवीय त्रासदी है। इसने एक जीवन्त और उज्जवल संस्कृति को धूल फांकने पर विवश किया है और उसके रेशे रेशे को बिखेर दिया है। और नई चुनौतियों, नए अनुभवों और नए वस्तुसत्य को सामने ला खड़ा किया है। यह वस्तुसत्य हमें यहूदियों के ऐतिहासिक वस्तुसत्य से जोड़ता है। आप हमारे निर्वासन में लिखे गए साहित्य में कई चौंका देने वाली समानताएँ देखेंगे। (आप इसे) यहूदी साहित्य में विस्थापन के साथ, फिलिस्तीनी साहित्य में दुर्द्धर्श आकांक्षा के साथ, अश्वेत साहित्य में आए नस्ल भेद के साथ, अरबी साहित्य विशेषकर सीरिया में 1967 की अरब पराजय के बाद की मानसिकता के साथ, मिला कर देख सकते हैं। </p>
<p> आप यहूदा आमिखाई, महमूद दरवेश, इब्बार रब्बानी, बेंजामिन मोलोइस जैसै अनेक प्रतिनिधि कवियों को पढ़िए, यह वस्तु सत्य भारतीय साहित्य में एक नया अध्याय है। इसे आप लाख चाहें झुठला नहीं सकते। कब तक झुठलाएँगे? </p>
<p>      <strong>कश्मीर के अल्पसंख्यक समुदाय में हमेशा से ही कारगर नेतृत्व का संकट रहा है। ऐसे में पनुन कश्मीर ने इस समुदाय के इतिहास में एक नया युग आरंभ किया था। फिर एक बड़े जन समर्थित आन्दोलन का स्थान एक विभाजित संगठन ने ले लिया। ऐसा क्यों हुआ?</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं भी सक्रिय हो जाते हैं।</div>
<p>हर क्रान्ति एक प्रतिक्रान्ति की भूमि तैयार करती रहती है। इस में व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ, स्वार्थ और अहं के अतिरिक्त कुछ बाहरी हाथ भी सक्रिय हो जाते हैं। वे तमाम शक्तियाँ भी सक्रिय हो जाती हैं जो आप को अपना शत्रु मानने लगती हैं। पनुन कश्मीर जब पहली बार टूटा (1993 में) तो उस में संघ के कार्यकर्त्ताओं की भूमिका थी। उन की समझ से पनुन कश्मीर और जे.के.एल.एफ. में कोई अन्तर नहीं था। इसलिए अग्निशेखर के नेतृत्व से आशंकित हो कर कुछ लोगों ने जो प.क. में सक्रिय थे, यह कर दिखाया। दूसरी बार 1996 में कुछ और साथियों ने कुंठाओं, पूर्वाग्रहों तथा महत्वाकांक्षाओं के चलते हम से विदा ली और अपनी अलग दुकान खोल ली। सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना संपन्न अग्निशेखर के नेतृत्व में खालिस राजनीतिक एजेंडा चलाना उन्हें कारगर नहीं लगा। मुंशी प्रेमचन्द के शब्दों में कहूँ तो साहित्य राजनीति की मशाल होती है। मुझे इस का उलट मंज़ूर नहीं था। जिस तरह का आन्दोलन हम चला रहे हैं, उस की अनिवार्यता है कि वह आम जनता से जुड़े और उस की दैनन्दिन समस्याओं से जुड़े, सांस्कृतिक आकांक्षाओं से जुड़े और उन से अपने राजनैतिक मुद्दे के लिए बल संचय करे। </p>
<p> मैं पारदर्शिता, आधारितभूत संरचना और जवाबदेह संगठनात्मक ढ़ांचे में विश्वास रखता हूँ, इसलिए भी टूटा। जहाँ तक एकीकरण की बात है, मैं ने भी अपनी ओर से तथा अपने साथियों की ओर से (अपने धड़े को) एक साल तक भंग किया, और बिना शर्त किसी भी भावी प्रारूप और नेतृत्व के लिए स्वयं को समर्पित रखा। अभी तक एकीकरण नहीं हो पाया है, परन्तु प्रसिद्ध कवि दीना नाथ नादिम के शब्दों में</p>
<blockquote><p>मुझे है आस कल की<br />
     कल प्रज्वलित होगी दुनिया।</p></blockquote>
<p>       <strong>आप की लिखी कहानी &quot;मेरी ज़मीन&quot; पर एक फिल्म <a target="_new" href="http://timesofindia.indiatimes.com/articleshow/419243.cms">शीन</a> का निर्माण हुआ, जो ज़्यादा नहीं चली। इस फिल्म ने आप की कहानी और आप के समुदाय की कहानी के साथ कितना न्याय किया?</strong>   </p>
<p> शीन मेरी कहानी पर बनी, पर बॉलीवुड की अब तक की सब से खराब फिल्मों में से एक है। एक साहित्यकार के नाते अपनी कहानी पर फिल्म बनने की प्रक्रिया में मेरे जो अनुभव हैं, वे प्रेमचन्द, अमृतलाल नागर, फणीश्वरनाथ रेणु, आदि से भिन्न नहीं हैं। वास्तव में साहित्य और फ़िल्म का आत्मीय संबन्ध और संवाद आज तक बना ही नहीं। साहित्य जहाँ एक स्वायत्त एकक है जहाँ साहित्यकार और उस का सृजन होता है, वहीं फिल्म एक ऐसा समुद्र है जहाँ तरह तरह की कला विधाएँ आ कर जा मिलती हैं। एक कुशल अनुभवी और दृष्टिसंपन्न निर्देशक ही सफल रूप से इन सब का समावेश कर सकता है। फिल्म माध्यम ही निर्देशक का है। हालाँकि मैं महेश भट्ट, अनुपम खेर, नसीरुद्दीन शाह की अपनी कहानी को ले कर उन की राय से बहुत उत्साहित था। महेश भट्ट का तो कहना था कि अगर <a target="_new" href="http://www.hindu.com/mp/2004/04/06/stories/2004040600640100.htm">अशोक पंडित</a> मेरी कहानी को सही ढ़ंग से फिल्मा सके तो यह <a target="_new" href="http://www.festival-cannes.org/">कान</a> तक में जा सकती है। खैर छोड़िए&#8230;   </p>
<p>      <strong>कश्मीर के विषय में हुई बैठकों आदि में आप का वास्ता इस मसले से जुड़े नेताओं से पड़ा है, और आप बता रहे थे कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति के साथ भी आप का सीधा सामना हुआ है। उस के विषय में बताएँ।</strong>   </p>
<div id='pullQuoteR'>मुशर्रफ बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं।</div>
<p>जहाँ तक मुशर्रफ साहब की बात है, वे बहुत ही होशियार और चालाक राजनेता और सैन्य तानाशाह हैं, जो हर लिहाज़ से भारतीय नेतृत्व पर भारी पड़ते हैं। वे शान्ति बातचीत की बात भी करते हैं, अपनी धरती को आतंकवादियों द्वारा इस्तमाल नहीं करने देने की बात भी करते हैं, और इस के विपरीत आतंकवादियों के प्रशिक्षण शिविर, मूलभूत संरचना बनाए रखने में भी अपनी भूमिका निभाते हैं। कश्मीर के मामले में खुल्लमखुल्ला दख़लअन्दाज़ी करते हैं और वज़ीरिस्तान में अपने लोगों पर बम वर्षा पर भारत के टिप्पणी करने पर इस्लामाबाद से डाँट लगाते हैं, &quot;India should mind its own business&quot;. उन्होंने विश्व बिरादरी में वर्दी में होने को बावजूद अपनी एक प्रगतिशील और लचक वाली छवि गढ़ ली है, और self rule, demilitarization और joint control जैसे नए शगूफे छोड़ कर पुरानी ही शराब को नई बोतलों में पेश किया है। मेरी आगरा सम्मेलन के दौरान प्रधान मन्त्री के महाभोज में उन के साथ मुठभेड़ हुई है। मैं ने उन्हें कश्मीर की विनाश लीला, कश्मीरी पंडितों के निष्कासन और जीनोसाइड के लिए सीधे ज़िम्मेदार ठहराया था और आस पास खड़े सभी दिग्गज नेता (वाजपेयी जी, आडवाणी, मुलायम सिंह जी, आदि) दंग रह गए थे। तब परवेज़ मुशर्रफ ने स्थिति को संभालते हुए कहा था, &quot;कुछ तो करना होगा&#8230;, कुछ तो करना पड़ेगा भई&#8230;&quot;।</p>
<hr width="100%" size="2" />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2118&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/1006-samvaad-agnishekhar/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वोट की राजनीति ने बनाये नपुंसक नेता</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0806-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:54:49 +0000</pubDate>
		<dc:creator>विजय मनोहर तिवारी</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Dams]]></category>
		<category><![CDATA[Harsood]]></category>
		<category><![CDATA[Narmada]]></category>
		<category><![CDATA[Rehab]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0806samvaad/</guid>
		<description><![CDATA[बड़े बांध विकास के मापदंड माने जाते हैं। बांधों से बिजली जैसे फायदे प्रगति के सापेक्ष एक और कटुसत्य है डूब क्षेत्र से जन सामान्य का विस्थापन। पत्रकार <b>विजय मनोहर तिवारी</b> ने इन्दिरा सागर बांध परियोजना के डूब क्षेत्र में आये कस्बे <b>&#39;हरसूद&#39;</b> में विस्थापन का अनुभव टीवी द्वारा लोगों तक पहुँचाया, तत्पश्चात अपने अनुभवों को लेखनीबद्ध किया पुस्तक &#39;<b>हरसूद 30 जून&#39;</b> में। पढ़िये विजय से <b>अनूप शुक्ला</b> की बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-harsood.jpg" border="0" alt="नर्मदा सागर बांध परियोजना" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px">
<p><img title="संवाद" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" align="right" />स्वतंत्रता के बाद से बड़े बांध,कारखाने देश के विकास के मापदंड माने गये। नेहरू जी तो बांधों को आधुनिक भारत के मंदिर कहा करते थे। सिंचाई, बिजली, बांध नियंत्रण आदि बांध से होने वाले फायदे हैं तो बांध के डूब क्षेत्र से जन सामान्य का विस्थापन एक भयावह त्रासदी। बांधों से होने वाले लाभों की चकाचौंध में उससे उपजने वाली त्रासदियां नेपथ्य में चली जाती हैं।</p>
<p>कुछ ऐसा ही भारत की बहुउद्देशीय नर्मदा सागर बांध परियोजना में होता। लेकिन जागरूक पत्रकार विजय मनोहर तिवारी ने इस परियोजना के डूब क्षेत्र में आने वाले कस्बे &#8216;हरसूद&#8217; के लोगों के विस्थापन के साक्षत अनुभव पहले टेलीविजन से लोगों तक पहुँचाये तथा बाद में अपने अनुभवों को लेखनी बद्ध किया पुस्तक-&#8217;हरसूद 30 जून&#8217; में। मध्य प्रदेश के पूर्वी निमाड़ में खंडवा जिले में पुनासा के पास नर्मदा नदी पर बनने वाले बांध का की नींव 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रखी थी। उनकी हत्या के उपरांत नर्मदा सागर बांध का नाम उन्हीं की स्मृति में इन्दिरा सागर बांध कर दिया गया।</p>
<p>इन्दिरा सागर बांध कंक्रीट का एक जीता जागता कमाल है। इस पूरी परियोजना में जितनी कंक्रीट का इस्तेमाल हुआ उतने में दिल्ली से लंदन तक सड़क बन सकती है या फिर 2 फुट व्यास का पाइप पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा सकता है। बांध के डूब क्षेत्र में कुल 255 गांव थे। इन्हीं में से खंडवा के पास मध्यप्रदेश का 700 सौ वर्ष पुराना कस्बा &#8216;हरसूद&#8217; भी था। &#8216;हरसूद&#8217; को सन् 2004 के मानसून में डूब जाना था इसलिये वहां के लोगों को 30 जून को निर्ममता पूर्वक, बिना समुचित पुर्नवास की व्यवस्था किये, उजाड़ दिया गया।</p>
<p>जिस समय हरसूद उजड़ रहा था उस समय &#8216;सहारा न्यूज चैनेल&#8217; से इस घटना का कवरेज करने के लिये टीवी पत्रकार विजय मनोहर तिवारी वहां मौजूद थे। विजय मनोहर ने विस्थापन की विसंगतियों को लोगों को दिखाया तथा वे अपने कवरेज के द्वारा हरसूद की आवाज बन गये। बाद में अपनी किताब &#8216;हरसूद 30 जून&#8217; में विजय मनोहर तिवारी ने अपने हरसूद के दिनों के संस्मरण लिखे हैं। निरंतर के पाठकों के लिये यहां प्रस्तुत है विजय मनोहर तिवारी से <strong><a href="http://hindini.com/fursatiya"><strong>अनूप शुक्ला</strong></a></strong> की बातचीत के प्रमूख अंश।</div>
<p><strong> हरसूद पर किताब लिखने का विचार कब बना? आपकी किताब के बारे में लोगों  की प्रतिक्रिया कैसी रही?</strong></p>
<p>जून..जूलाई २००४ में कवरेज के दौरान जो हालात देखे उसके बाद इस हादसे पर कुछ लिखना ही था! लंबे टीवी कवरेज के वक्त ही यह तय कर लिया था कि इस विषय पर किताब लिखना है। तीन महीने में यह किताब लिखी। टीवी कवरेज कितनों को याद रहता, लेकिन यह किताब हरसूद को हमेशा जिंदा रखेगी। लोगों की जबर्दस्त प्रतिक्रिया मिली। पत्रकारिता और साहित्य से जुड़ी नामचीन हस्तियों ने इस किताब को सराहा। देश भर के मीडिया में चर्चा हुई। एन एस डी ने भी इस पर नाटक तैयार किया, इसकी उम्मीद नहीं थी।</p>
<p><strong>पहले भी बाँध बने हैं। वे आधुनिक भारत के मंदिर माने गये। भाखड़ा नांगल, रिहन्द आदि। इन बाँधों के साथ भी विस्थापन की समस्यायें रहीं होंगी लेकिन उनके बारे में बहुत कुछ सुनने में नहीं आता। जब भी बात चलती है तो इन बांधों से मिली सुविधाओं का ही ज़िक्र होता है। क्या यह उस समय मीडिया की उदासीनता के कारण यह हुआ या उस समय विस्थापन इस तरह से हुआ कि कोई समस्या नहीं आई?</strong></p>
<p>उस समय टीवी चैनल नही थे। अखबारों की प्रसार संख्या भी आज जैसी नहीं रही होगी। हरसूद मामले को इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने देशभर में चर्चा का विषय बनाया। अगर टीवी नहीं होता तो हरसूद की खबरें स्थानीय अखबारों के खंडवा संस्करणों में सिमटकर रह गई होतीं। एक शहर के खत्म होने और डूबने के दृश्य चैनलों को भी पहली बार यहीं मिले थे। यह बिकने वाला माल था। मेरे ख्याल से विस्थापन तो कहीं भी आदर्श ढंग से नही हुआ। आप भी जाकर देख सकते हैं कि विकास की यह अवधारणा लाखों परिवारों के लिये अभिशाप की तरह साबित हुई है।</p>
<p><strong>पुस्तक पढ़ने के बाद लगता है कि हरसूद के लोगों में अपने अधिकारों के प्रति राजनैतिक चेतना में कुछ कमी थी जो अपने हक के लिये लड़ना नहीं जानते थे। क्या आपको लगता है कि अगर लोगों में राजनैतिक चेतना होती तो ऐसी हड़बड़ी में विस्थापन न होता?</strong></p>
<p>राजनीतिक चेतना दलिय राजनीति में बिखरी थी। जो आंदोलन के अगुआ थे, वे राजनीतिक दलों से भी जुड़े थे। वे सभी स्वार्थी और धोखेबाज निकले। गैर राजनीतिक चेतना की जरूरत है। राजनीति से परे मानवीय चेतना होना जरूरी है। न हरसूद में यह था, न देश में ऐसा है। हरसूद जैसे मामलों में राजनीति से परे जाकर फैसला होना चाहिए। राजनीति समस्याएं बढ़ा रही है।</p>
<p><strong>हरसूद के लोग रोटी-रोजगार की चिंता में लगे सीधे-साधे, साधारण लोग थे। कुछ-कुछ अपने में मगन। क्या उन लोगों को अपने उजड़ने का अहसास नहीं था? अगर था तो उसका विरोध समय रहते क्यों नहीं हुआ?</strong></p>
<p>लोगों को उजड़ने का अहसास अक्टूबर 1984 में तब ही हो गया था, जब इंदिरा गांधी ने बाँध की पहली ईंट रखी थी। विस्थापन और पुनर्वास को लेकर समय समय पर विरोध होता रहा और बांध भी बनता रहा। विरोध के बहाने विपक्षी दल राजनीति करते रहे। हरसूद के लोग इस आशा में रहे कि बच जाएंगे, लेकिन जब बाँध २४५ मीटर तक बन चुका तो उनके बचने के सभी रास्ते बंद हो गए।</p>
<p><strong>आपके अनुभव पढ़कर लगता है कि हरसूद वासी किसी मसीहा के इंतजार में थे, जो आता और उनके लिये लड़ता। क्या आपको यह भी यह लगता है कि सिर्फ हरसूद की नहीं, यह सामान्य भारतीय जनमानस की ही मन:स्थिति है?</strong></p>
<p>यह हमारा दुर्भाग्य है और हरसूद ही नही देश कि दुर्दशा का कारण भी यही है। एक हजार साल गुलाम यह देश रहा और किसी अवतार या चमत्कार कि आशा में करोड़ों लोग आराम फरमाते रहे। अगर आप सोचते हैं कि 1947 में आप आजाद हो गए तो आप धोखे में हैं। हम एक अलग गुलामी में पड़ गए। अब अंग्रेजों कि जगह हमारे नेता हैं, जो बांटो और राज करो कि उसी नीति पर चलकर देश को आग में झोंक रहें हैं। पाकिस्तान और बांग्लादेश बनने के बाद बचे खुचे भारत का भविष्य अंधकार में है। आजाद देश का यह एपिसोड ऐसा ही चलता रहा तो सौ डेड़ सौ सालों में देश की पुरातन सभ्यता और संस्कृति का नामोनिशान नहीं रहने वाला। यह संस्कृति तेजी से अपने अंत की और अग्रसर है। आइए, हम सब किसी मसीहा के लिये प्रार्थना करें!!!</p>
<p><img title="The begining of submergence" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/harsood-kalimachak-rising.jpg" border="0" alt="The begining of submergence" hspace="4" vspace="4" align="right" /><strong>&#8220;जब हरसूद डूब रहा था तब वहाँ के विधायक मंत्री बनने की जुगाड़ में लगे थे।&#8221; क्या यह हमारे देश के राजनैतिक चरित्र का प्रतिबिम्ब है? जब यही विधायक मंत्री बनकर आये तो हरसूद वासियों की प्रतिक्रिया कैसी थी?</strong></p>
<p>हरसूद का विधायक जब मंत्री बनकर आया तो अपने हाथों से अपने घर तोड़ने में लगे हजारों लोगों के दिल से आह निकली़, भरी आँखों से उन्होंने अपने एमएलए को लाल बत्ती में सवार होकर निकलते देखा। अवसरवादिता का यह नमूना नया नहीं है। ऐसे ही निर्लज्ज नेताओं ने अपने रुतबे की खातिर विदेशी आक्रमणकर्ताओं की मदद की और अंग्रेजों के तलवे चाटते रहे। हमारे नेताओं का ऐसा चरित्र ही रहा है। वे बहुराष्ट्रीय और बड़ी कंपनियों के हितों की खातिर आज भी बिक ही रहे हैं। अपनी कुर्सी के लिये वे सब कुछ दांव पर लागा सकते हैं, देश को भी। हरसूद का विधायक खुद को अलग साबित कर सकता था, लेकिन मंत्री पद की खातिर यह अवसर खो बैठा।</p>
<div id="pullQuoteR">नेता तो हर पाँच साल में चुनाव में पब्लिक के बीच जाता है, भले ही जीते या हारे। नौकरशाहों की स्थिति अलग है। उन्हें ज़मीन पर भला कौन ला सकता है!</div>
<p><strong>आपके कवरेज तथा प्रयासों से जनता की तकलीफ की ओर समाज का ध्यान गया। कुछ सुविधायें हासिल हुईं लोगों को। मंत्री वगैरह वहाँ आये। जो कुछ सुविधायें वहाँ लोगों को मिलीं क्या उनके कारण जनता के मन का आक्रोश भी क्रमशः कम होता गया?</strong></p>
<p>मीडिया के कारण हरसूदवालों को कुछ तात्कालिक राहत ही मिली। थोड़ा मुआवजा बढ गया, मंत्री अफसर दौडे भागे लेकिन समस्या इतनी विकट थी कि यह सब नाकाफी था। गुस्सा तो लोगों का आज तक कम नहीं हुआ है। वे पीढियों पिछड़ गए हैं। उन्हें फिर से अपने पैर जमानें के लिए जीरो से जद्दोजहद करनी पड़ रही है। उनके कारोबार खत्म हो गए हैं। वे कई शहरों में बिखर चुके हैं। जहां भी हैं, परेशान हैं। वे कैसे खुश हो सकते हैं?</p>
<p><strong>हमें लगता है कि आपकी प्रेस रपटों में यह भावना निहित थी कि विस्थापन कायदे से होना चाहिये, संवेदनहीन उजाड़ नहीं हो। अनेक संस्थाएँ और व्यक्ति बाँधों का विरोध करते हैं, मुक्त बाज़ार व्यवस्था के समर्थक मानते हैं बिना ऐसी प्रगति के देश विश्वबाजार में जगह नहीं बना पायेगा। नई आर्थिक व्यवस्था और प्रगति जैसे इन मुद्दों पर आप क्या सोचते हैं?</strong></p>
<p>विस्थापन और पुनर्वास के लिये सरकार की आदर्श नीतियां है। सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश हैं। पर सब कुछ कागजों पर हैं। कम से कम हमने इंदिरा सागर बाँध परियोजना में डूबे हरसूद समेत 250 गांवों में इनका कहीं पालन होते नही देखा। हमारे कवरेज का मकसद ही यह था कि विस्थापन और पुनर्वास कायदे से हो जाए। मुझे लगता है कि सरकार को ऐसी बड़ी विकास परियोजना पर पुनर्विचार करना ही चाहिए, जो हजारों परिवारों को उजाड़ डालती है। व्यापक विचार होना चाहिए और पवन व सौर्य ऊर्जा का दोहन होना चाहिए। वैकल्पिक तरीकों पर डटकर काम होना चाहिए। लेकिन हम 58 सालों से कर क्या रहें हैं? सबसे बडा सवाल तो यह कि क्या आबादी को कंट्रोल नही किया जाना चाहिए। रोजगार, बिजली, पानी, अनाज और मकानों जैसी बुनियादी जरूरतों कि अपनी सीमाएं हैं, लेकिन सरकार को कठिन फैसले लेने होंगे। इसके लिए नपुंसक नेतृत्व की जरूरत नही है। वोट की राजनीति ने नपुंसक नेता तैयार किए हैं। उनसे कोई उम्मीद करना बेमानी है।</p>
<p><strong>आप माखनलान चतुर्वेदी संस्थान के स्नातक हैं। क्या पत्रकारिता की पढ़ाई के दौरान कोई इस तरह की केस स्टडी कराई गई जिनमें आपदाग्रस्त क्षेत्र से विस्थापन जैसे मुद्दों की कवरेज करने का सबक मिला हो?</strong></p>
<p>पत्रकारिता कि पढ़ाई के दौरान ऐसी कोई केस स्टडी नही की, लेकिन इतना सबक जरूर बार बार मिला कि पत्रकारिता की सार्थकता आम आदमी की तकलीफों और मुश्किलों को उजागर करने में ही है। भारत जैसे विकराल आबादी वाले देश में हर तरफ से परेशान और शोषित लोगों को मिडिया से ही उम्मीदें हैं। असंख्य लोग नेताओं और नौकरशाहों के प्रति विश्वास खो चुके हैं। ऐसे में मिडिया को भी संवेदनशील होने की जरूरत है। वैसे मिडिया अपना रोल निभा रहा है।</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/harsood-rehab-centre.jpg" border="0" alt="Image" hspace="6" align="left" /><strong> आपके प्रसारण से मीडिया में काफी हलचल मची तथा हरसूद का मामला भी गरमा गया। कहीं इसी लिये तो नेताओं ने नहीं सोचा कि लाओ अब हरसूद को भी निपटा ही देते हैं। वरना शायद अपने देश की नौकरशाही के अंदाज में सब कुछ खरामा-खरामा चलता रहता। एन.एच.पी.सी. के चेयरमैन ने भी कहा कि &#8220;आपने तो हमारा काम आसान कर दिया।&#8221; क्या आप महसूस करते हैं कि आपने उनके काम में शायद अप्रत्यक्ष रूप से सहयोग ही किया?</strong></p>
<p>हरसूद के कवरेज ने बेशक सरकार कि मुश्किलें बढ़ा दी थीं, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती ने भरसक कोशिश की कि मानसून सिर पर होने के बावजूद लोगों की दिक्कतें कम हों और विस्थापन ठीक से हो जाए। यह सरकार कुछ ही महीने पहले बनी थी और तब तक बाँध पूरा बन चुका था। पिछले 10 सालों तक कांग्रेस सरकार में थी। इतनी बडी परियोजना के समांतर विस्थापन और पुनर्वास के प्रयास पिछले सालों से चलते रहने चाहिए थे, लेकिन सब कुछ अचानक हुआ और अफरातफरी में ही लोगों को बारिश के दिनों में ही विस्थापित होना पड़ा। अफसरों का रवैया बिल्कुल संवेदनशील नहीं था। सामूहिक लापरवाही और बेईमानी के दुष्परिणाम आज हजारों लोग भोग रहे हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">युवा आरक्षण जैसे मसले पर संगठित नहीं हैं और कब्र में पैर लटकाये नेता उनकी तकदीर अंधेरे की स्याही से लिख रहे हैं।</div>
<p><strong>आप युवा हैं, मेधावी हैं। जनता के अधिकारों के लिये आपके मन में तड़प भी है। क्या कभी यह नहीं लगा कि कैमरा, माइक छोड़ हरसूद की जनता का नेतृत्व करके उनके विस्थापन को राजनीति के मार्ग से ही रोकते या मानवीय तरीके से विस्थापन के लिये आंदोलनरत हो जाते?</strong></p>
<p>ऐसा कई बार लगा कि मैदान में आकर हरसूद और 250 गांवों की बरबादी की आवाज बुलंद की जाए, लेकिन मैं मिडिया में रहकर अपना काम ठीक से कर पाया, इस बात का सुकून है। हमने हरसूद को गुमनामी की मौत नहीं मरने दिया। दुनिया भर को खबर मिली की एक हजार मेगावाट बिजली कितने घरों में अंधेरा लेकर आई और हमारी तथाकथित जनहितकारी व्यवस्था का व्यवहार कितना सभ्य रहा?</p>
<p><strong> हरसूद में नौजवान भी रहे होंगे। आज ज़रा-ज़रा सी बात पर युवा हंगामा खड़ा कर देते हैं। किसी अभिनेता को मुंबई का आयकर विभाग नोटिस देता है तो नौजवान उस विभाग का आफिस ही फूंक देते हैं। क्या हरसूद के नौजवानों में ऐसी कोई तड़प दिखी आपको या वे उदासीन ही बने रहे?</strong></p>
<p>हरसूद गाँव नहीं छोटा शहर था। वे खुदकुशी तो कर सकते थे, लेकिन आंदोलन खड़ा करने की उन में ताकत नहीं बची थी। उन्हें हर तरफ और हर तरह से घेरकर मजबूर कर दिया गया था। यह नौबत नहीं आती, अगर वे समय रहते जागरूक होते, गैर राजनीतिक स्तर पर संगठित होते और कुछ साल पहले पहले से यह पहल होती तो शायद कुछ बेहतर होता। लेकिन देश का बड़ा दुर्भाग्य यह है कि करोड़ों युवा भी किसी न किसी राजनीतिक दल के चक्रव्यूह में फंसे हैं। उनकी स्वतंत्र आवाज नहीं है, इसलिये आरक्षण जैसे घातक मसले पर भी देशभर में वे कहीं भी संगठित नज़र नहीं आते और कब्र में पैर लटकाये नेता करोड़ों काबिल युवाओं की तकदीर अंधेरे की स्याही से लिख रहे हैं।</p>
<p><strong> ऐसा लगता है कि नौकरशाही की अकूत ताकत के पीछे लोगों के विरोध घुटने देक देते हैं। क्या यह सच है?</strong></p>
<p>नौकरशाहों के दिमाग में अंग्रेज़ों की अकड़ भरी हुई है। आम आदमी के दुख दर्द से उन्हें कोई सरोकार नहीं है। वे सुविधाओं के गुलाम हैं और अपने पद और कमाई की खातिर नेताओं के साथ गठजोड़ बनाये रखते हैं। एक परीक्षा पास कर के वे तीस पैंतीस सालों के लिये देश की छाती पर सवार हो जाते हैं, कोई उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। नेता तो हर पाँच साल में चुनाव में पब्लिक के बीच जाता है, भले ही जीते-हारे। नौकरशाहों की स्थिति अलग है। उन्हें ज़मीन पर कौन ला सकता है!</p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/harsood-arundhati.jpg" border="0" alt="Image" hspace="6" align="right" /><strong>आपकी किताब में अनेक खूबसूरत फोटो सम्मिलित हैं। बालों में फूल लगाये-मुस्काती सी अरुंधती राय, कागजों को देखने में तल्लीन मेधा पाटकर, पान मसाले के दुकान में कैमरे के सामने खड़े मुस्कराते बच्चे। क्या आपको कभी यह अपराधबोध भी हुआ कि किसी के उजड़ने में हम खूबसूरती तलाश रहे हैं?</strong></p>
<p>बात तस्वीरों में खुबसूरती की! ऐसा नहीं है। हरसूद की त्रासदी अनुभव की बात थी। यह जरूरी था की तस्वीरों से उस भीषण एहसास की झलक मिले। जहाँ तक अरुंधती राय और मेधा पाटकर की मौजूदगी का सवाल है तो यह बहुत जरूरी था कि लोगों को पता चले कि जब चुने हुये नेता और अफसर धोखेबाज साबित हुये तब इस बस्ती में कौन हाल पूछने आया। जहाँ तक मैं समझता हूँ न तो अरुंधती और न ही मेधा को ही हरसूद से चुनाव लड़ना था, जो वहाँ गईं। उनका कोई हित नहीं था। अरुंधती ने हरसूद से लौट कर आउटलुक में लंबा आलेख लिखा, यह योगदान भुलाया नहीं जाना चाहिये।</p>
<div id="pullQuoteR">वोट की राजनीति ने नपुंसक नेता तैयार किए हैं। उनसे कोई उम्मीद करना बेमानी है।</div>
<p><strong> हरसूद के बारे में तमाम जगह किताबों के अंश दिये हैं। आपकी पुस्तक भी स्कूलों को अलविदा कहते हुये ५ हजार बेकसूर, मासूम बच्चों को समर्पित है। तो क्या आपको लगता है कि विस्थापन का सबसे ज्यादा असर बच्चों पर पड़ा?</strong></p>
<p>विस्थापन का बुरा असर केवल बच्चों पर ही पड़ता है यह कहना ठीक नहीं है। लेकिन बच्चों की पढ़ाई पर ज़रूर असर हुआ। हरसूद में करीब पाँच हज़ार विद्यार्थी थे लेकिन सरकार ने कहीं भी इतने बच्चों की पढ़ाई के इंतज़ाम नहीं किये थे। परिवारों के आर्थिक हालात बिगड़े, रोजगार छिन गये ऐसे में बच्चों का भविष्य कैसे सुरक्षित रह सकता है। वे विकास की ऐसी विनाशकारी परियोजनाओं के सबसे मासूम शिकार होते हैं।</p>
<p><strong>हरसूद का आप बहुत विस्तार से कवरेज कर रहे थे। स्थानीय अखबारों में तथा टीवी पर भी तब हरसूद के किस्से दिखाये जा रहे होंगे। लेकिन लगता है बाकी टीवी चैनलों तथा अखबारों ने इन खबरों को हाशिये पर ही रखा, नहीं तो शायद देश भर में इस मुद्दे की गूँज होती। क्या मीडिया की मुद्दों पर एक राय नहीं हो पाती खासतौर उस समय जब एक शहर डूब रहा हो?</strong></p>
<p>ऐसा नहीं है, स्थानीय अखबार खासकर दैनिक भास्कर हर दिन डेढ़ पेज की सामग्री छाप रहे थे। नईदुनिया जैसे अखबारों में भी हरसूद का दर्द छप रहा था। दिक्कत यह थी कि यह सब स्थानीय संस्करणों तक ही सीमित था और राजधानी भोपाल तक में कोई उल्लेखनीय कवरेज नहीं था। दूसरी तरफ टीवी वाले नेशनल न्यूज़ चैनल की ओर से थे। हमारे लिये हरसूद हेडलाईन की खबर थी और पूरे दो महीने तक हमने हर कोण से हरसूद की त्रासदी को कवर किया। इतने लंबा कवरेज किसी का भी नहीं हो पाया। हमने पूरी स्वतंत्रता से काम किया और आखों में आंसू, लेकिन दिल में सुकून लेकर बरबाद हरसूद से वापस आये।</p>
<p><strong>अपने अनुभवों को किताब के रूप में लिखकर कैसा लगा? हरसूद के बारे में रिपोर्टिंग करने के बाद आपके सोच में क्या कुछ बदलाव आये?</strong></p>
<p>अनुभव किताब के रूप में आये तो अच्छा लगा। हम हरसूद के साथ हर स्तर पर हुई नाईंसाफी में भागीदार नहीं बने और अपना काम पारदर्शिता के साथ पूरा किया। हमने अपने तेरह साल के पत्रकारीय जीवन में पहली बार इतनी भीषण मानवीय त्रासदी को इतने नज़दीक से देखा था। हरसूद जैसे खून में समा गया है। वह हमारी समकालीन व्यवस्था की निष्ठुरता का शिकार हुआ और हम चश्मदीद गवाह हैं। पूरी व्यवस्था हमारी नज़र में दूषित है और मजबूरी है कि इसी के बीच ज़िंदगी तमाम करनी है।</p>
<p><strong>नर्मदा घाटी परियोजना के भविष्य के बारे में आपके क्या विचार हैं?</strong></p>
<p>कहा नहीं जा सकता कि नर्मदा घाटी के बाँध कितने टिकाउ साबित होंगे और बिजली की कमी को कितना दूर करेंगे। लेकिन हमें छोटे बाँधों के विकल्पों पर विचार करना चाहिये। हमें भारत के भूगोल को मिले मौसम के वरदानों का भी दोहन करना चाहिये।</p>
<p><strong>जून को हरसूद को डूबे दो साल हो गये।  हरसूद के हालात अब कैसे हैं? वहाँ से विस्थापित लोगों से फिर कभी रूबरू होने का मौका मिला?</strong></p>
<p>तीस जून को हरसूद की दूसरी बरसी थी। वहाँ के लोगों के साथ जीवंत संपर्क है। हम लगातार वहाँ जाते रहे हैं। विस्थापित परिवारों के साथ आत्मीय रिश्ते बनें हैं। हम पुनीत और प्रियंका के विवाह में शामिल हुये जो बस्ती के उजड़ने के बाद हुआ। वहाँ कुछ भी होता है तो लोग मुझे फोन करते हैं, हर घटना की जानकारी मुझ तक पहुँचाना वे अपना फर्ज समझते हैं, यह रिश्ता अजीब है। वे भले बुरे का फर्क समझते हैं। हम उनके बुरे दौर के साथी बने पर उनका बुरा दौर अभी तक खत्म नहीं हुआ है। हम दिल से उनके प्रति शुभकामना करते हैं।</p>
<p><strong>आजकल क्या कर रहे हैं? क्या लिख-पढ़ रहे हैं?</strong></p>
<p>आजकल भोपाल में हूँ। सहारा समय न्यूज़ चैनल से विदा लेने के बाद फिर से प्रिंट मीडिया में हूँ और दैनिक भास्कर में विशेष संवाददाता के तौर पर काम कर रहा हूँ। लेखन में हरसूद की किताब के बाद मीडिया और मीडिया में काम करने वालों की जिंदगी पर एक उपन्यास पूरा किया। इसके बाद अब एक साध्वी के चरित्र पर उपन्यास लिख रहा हूँ, जो सन्यास से सार्वजनिक जीवन में आती है और राजनीति के उतार चढ़ावों और षड़यंत्रों का शिकार होती है। आधा काम पूरा हो गया है, साल के आखिर तक पूरा करने का विचार है। यह किताब किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित नहीं है, किंतु समकालीन राजनीति के कुछ चेहरों को आप इसके पन्नों पर पहचान पायेंगे।</p>
<hr />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2117&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0806-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>13</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>विकास तय करने का भी अधिकार मिले: मेधा पाटकर</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0805-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0805-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Sun, 31 Jul 2005 22:51:26 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Dams]]></category>
		<category><![CDATA[Environment]]></category>
		<category><![CDATA[Narmada]]></category>
		<category><![CDATA[Rehab]]></category>
		<category><![CDATA[Urbanization]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=3120</guid>
		<description><![CDATA[नर्मदा घाटी के लोगों की अगुवाई करने वाली मेधा पाटकर ने एक वृहद, अहिंसक सामाजिक आंदोलन का रूप देकर समाज के समक्ष सरदार सरोवर बाँध के डूब क्षेत्र के विस्थापितों की पीड़ा को उजागर किया। मेधा तेज़तर्रार, साहसी और सहनशील आंदोलनकारी रही हैं। प्रस्तुत है मेधा से देबाशीष चक्रवर्ती की टेलिफोन पर हुई बातचीत के अंश।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser"><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" border="0" alt="संवाद" hspace="3" vspace="3" width="135" height="132" align="right" />आपने और हमने अपनी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा है, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, &#8220;बाँध आधुनिक भारत के मंदिर हैं&#8221;। बाँधों से समृद्धि की बात होती है तो कुछ लोग इससे असहमति जताते हैं। नर्मदा घाटी के लोगों की अगुवाई करने वाली मेधा पाटकर ने एक वृहद, अहिंसक सामाजिक आंदोलन का रूप देकर समाज के समक्ष सरदार सरोवर बाँध के डूब क्षेत्र के विस्थापितों की पीड़ा को उजागर किया। मेधा तेज़तर्रार, साहसी और सहनशील आंदोलनकारी रही हैं। उपवास, पुलिसिया डंडों और गिरफ्तारियों से उन्हें अक्सर रूबरू होना पड़ता है। मेधा के नर्मदा बचाओ आंदोलन से सरकार और विदेशी निवेशकों पर दबाव भी पड़ा, 1993 में विश्व बैंक ने मानावाधिकारों पर चिंता जताते हुए पूँजीनिवेश वापस ले लिया। उच्चतम न्यायालय की भी आँखें खुली, पहले रोक लगाई और फिर 2000 में हरी झंडी भी देखा दी।</p>
<p>मुंबई में पली बढ़ीं 51 वर्षीय मेधा के पिता वसंत खानोलकर स्वतंत्रता सेनानी और ट्रेड यूनियन के सक्रीय सदस्य रहे। अतः आंदोलन की शक्ति मेधा संभवतः परिवार से ही सीख गयी थीं। रुईया कॉलेज से बी.ए के पश्चात आपने टाटा इंस्टीट्युट ओफ सोशियल साईंसेस से &#8220;सामाजिक कार्य&#8221; विषय में एम.ए किया। गुजरात में जनजातियों का अध्ययन करते हुए उन्होनें नर्मदा के विषय पर समाज का ध्यान आकर्षित करना शुरु किया। मेधा और उनके साथियों को 1991 में प्रतिष्ठित राईट लाईवलीहुड पुरस्कार से नवाज़ा गया, जिसकी तुलना नोबल पुरस्कार से की जाती है। वे मुक्त वैश्विक संस्था &#8220;वर्ल्ड कमीशन ओन डैम्स&#8221; में शामिल रह चुकी हैं। 1992 में उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार भी मिला।</p>
<p>मेधा के पाँव में तो पहिये लगे हैं सो निरंतर को उनका फोन नंबर प्राप्त करने के लिये काफी पापड़ बेलने पड़े। प्रस्तुत है मेधा से निरंतर के प्रबंध संपादक देबाशीष चक्रवर्ती की टेलिफोन पर हुई बातचीत के अंश।</p></div>
<p><strong>हम बचपन से सुनते पढ़ते आये हैं कि बाँध से समृद्धि आती है, जलविद्युत शक्ति से खुशहाली आयेगी, संचित जल से कृषि को लाभ होगा, बाढ़ टलेंगे। आप का आंदोलन बाँधों की खिलाफत करता रहा है। बाँधों से क्या नुकसान हैं और इनके विकल्प क्या हैं।</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/medha.jpg" border="0" alt="मेधा पाटकर" hspace="7" vspace="3" width="292" height="266" align="left" />बाँधों, खासतौर पर बड़े बाँधों, की वजह से क्षेत्र की रिहायशी और कृषि भूमि, जंगल और दूसरी जलधारायें डूब में आ जाती हैं। दूसरा कि इसमें जो ज़मीन जाती है और बाकी प्राकृतिक संपदायें नष्ट होती हैं वो कितने ही लोगों और समुदायों के जीवनोयापन का ज़रिया होते है। हैबीटैट (पशु व पौधों के प्राकृतिक-वास) का अद्वितीय नुकसान होता है। और इस समुदाय, उनकी संस्कृति, संस्थाओं, संबंधों और मुख्यतः जीविका के नुकसान की भरपाई करना किसी राज्य के बस की बात नहीं। </p>
<p>नुकसान भोगने वाले हर समुदाय का पुनर्वास यह तो [सरकारी] योजनाओं में भी नहीं आता और जहाँ आता भी है वहाँ इतनी ज़मीन नहीं होती कि हर एक समुदाय को दी जा सके, यह सब दिक्कतें तो हैं ही। वनों का जो नुकसान है वह केवल वन्य जीवन का ही नहीं होता,  अंततः यह लैंड इरोज़न (भूक्षरण) का कारण बनता है। बॉन्डेज होने के कारण एक प्रकार से नदी का अन्त होने लगता है, उसके आगे चलते चलते कैचमेंट (जलग्रहण क्षेत्र) नष्ट होती जाती है, पानी का बहाव भी  चिरस्थायी नहीं रहता है। जो पहले आठ महीने रहता था वो अब तीन महिने ही फ्लैशबैक बनके बह जाता है और चौथे महीने में नदी सूख जाती है। नदी फैलती जाती है और उसके कारण जो बाढ़ आते हैं उनका असर भी बढ़ता जाता है।</p>
<p>जहाँ तक विकल्पों की बात है, तो आपशन्स तो कई हैं। एक तो उस बिंदू से शुरु करें जहाँ से बारिश की पहली बूँद गिरती है और वहाँ से आप बाँधते बाँधते आईये, तो ये निश्चित है कि आपके बड़ी नदी में जाने तक आप इतना सारा पानी रोक पायेंगे कि किसी स्ट्रक्चरल ईंटरवेन्शन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी नदी में, समुद्र तक जब नहीं जा पायेगा नदी का पानी, तो फिर अंदर आयेगा।</p>
<p><strong>कुछ लोग कहते हैं कि बांध होते तो गुजरात की हाल की बाढ़ टल सकती थी?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">सरकार ने घोषणा की कि डाउनस्ट्रीम में लोग अपनी सुरक्षा आप देखें क्योंकि बहाव का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। इसका मतलब यही है कि नदी का अपना खुद का वश छूट गया है।</div>
<p>सरासर गलत, ऐसी बातों के पीछे अज्ञानता और साजिश दोनों हैं। एक तो बाढ़ नर्मदा में नहीं आई, बाढ़ अन्य नदियों की कैचमेंट में आई, जैसे कि विश्वामित्र, और ये कैचमेंट सुरक्षित करने का कोई तरीका नहीं है और सरकार ने भी कभी उस के उपर ध्यान ही नहीं दिया। इसलिये पानी बह गया। कुछ पानी समुन्दर में सीधे गया, कुछ पानी उपनदियों से बड़ी नदियों में आया, इस में से एक नर्मदा है। लेकिन नर्मदा पर आया हुआ पानी पहले ही रोक दिया जो नर्मदा में आकर फिर वापस गुजरात में ले जाता है, नर्मदा तो गुजरात की सीमा पर है न, ये द्रावेड़ी प्राणायाम करने की ज़रूरत ही नहीं होती। दूसरा यह कि नुकसान केवल अपस्ट्रीम (उजान) में नहीं है डाउनस्ट्रीम में भी है। आप जिससे पानी रोकते हैं तो नीचे का हिस्सा सूख जाता है, कुएँ भी सूख जाते हैं, मछुआरों का मतस्यपालन करना आजकल मुश्किल है, नाव चलाने वालों का धंधा बैठ गया है। इन सब के साथ साथ नदी का अपना जो अनुशासन होता है वो भी खत्म होता है। </p>
<p>अभी तो सरकार ने भी घोषणा की है कि नर्मदा सागर परियोजना के कारण&#8230;विज्ञापनों में भी दिखाया&#8230;कि डाउनस्ट्रीम में लोग अपनी अपनी सुरक्षा [स्वयं] देखें क्योंकि बहाव का कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता। इसका मतलब यही है कि नदी का अपना खुद का वश छूट गया है। दूसरा मैं कहती हुँ कि नुकसान जो हैं केवल नदी के थाले (बेसिन) में भी नहीं होते हैं, कैचमेंट में भी नहीं कमांड (कमान क्षेत्र) में भी होते हैं। अभी जो बाढ़ आई उसका एक कारण है पानी की अपर्याप्त निकासी, जिसमें एक बड़ा हाथ नहरों के नेटवर्क का जिनसे बड़े पैमाने पर प्राकृतिक निकासी खत्म हो रही है।</p>
<p><strong>पर क्या बाँधों से उस क्षेत्र के लोगों का फायदा नहीं होता?</strong></p>
<p>बिल्कुल ही नहीं! क्योंकि महाराष्ट्र को तो अभी 110[मीटर] पर, इन्होंने तो मध्यप्रदेश में भी, महाराष्ट्र में भी ये कहा था कि चमक उठेगा महाराष्ट्र 110 बनने के बाद। बहुत सारी बिजली मिलेगी। मेरे पास <a href="http://www.msebindia.com/">एम.एस.ई.बी</a> के मिनिट्स हैं जिसमें सरदार सरोवर का नाम तक नहीं है। पीक महीने जो थे मॉनसून के, उसमें भी, 110 मीटर बनने के बाद भी, महाराष्ट्र को तो बिजली मिली ही नहीं है और जब भी मिलेगी तब कोई <a href="http://nandurbar.nic.in/">नंदुरबार जिले</a> को देने के लिये नहीं मिलेगी, वो तो जायेगी सीधी ग्रिड में। ग्रिड का जो डिस्ट्रीब्यूशन है वो आपको मालूम ही है कि कैसा है, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉसेस महाराष्ट्र में 45 प्रतिशत हैं, मध्यप्रदेश में 40 प्रतिशत, पर मूलतः जो दिल्ली का बंटवारा ही अन्यायी है, वहाँ ये सेंट्रलाईज़्ड पॉवर जेनेरेशन है सेंट्रलाईज़्ड प्रोजेक्ट्स से, बिल्कुल ही अनुचित डिस्ट्रीब्यूशन होता है, पानी का भी वही है। </p>
<p>तकनीकी रूप से असंभव नहीं है पर राजनैतिक और आर्थिक कारण भी हैं। इतने बड़ा सेंट्रलाईज़्ड स्ट्रक्चर जहाँ पानी पहले उद्योगों को फिर बड़े किसानों को मिलना है। और जब कैश क्रॉपिंग और वॉटर इंटेसिंव क्रॉपिंग की बात आ जाती है तो जो छोटे, ड्राईलैंड किसान हैं,मार्झिनल किसान हैं उनको कम से कम फायदा मिलता है। हमारे कुछ साथियों ने मिलकर स्टडी किया है कि मुख्य नहर से यदि उनकी नहर में पानी गया है भले ही वह बसाहट से ज्यादा दूर न हो पर एक तो पानी का टैरिफ उतना बढ़ जाता है उपर से नहर के पानी को कंट्रोल करने वाला अलग ही हो जाता है। ये सब चीज़ें अवश्यमभावी हैं, देखने से लगता है कि अरे ये तो खत्म करना संभव है, अपनी समझ से दूर करना संभव है पर यह भाखरा नांगल में भी नहीं हुई और सरदार सरोवर में नहीं हुई, कहीं पर भी नहीं हुईं। कहीं की भी सिँचाई बंद करना पड़ती है सरकार को बीच बीच में, इतना सारा वॉटर लॉगिंग और सेलिनाईज़ेशन है।</p>
<p><strong>आप और अन्य कई एक्टिविस्ट मुक्त बाजार व्यवस्था और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी विरोध करते हैं। क्या आप लोग मॉडर्नाज़ेशन और टेक्नॉलॉजी के खिलाफ हैं?</strong></p>
<p>कौन कहता है? मॉडर्नाज़ेशन और टेक्नॉलॉजी की परिभाषा क्या है। मॉडर्नाज़ेशन क्या है, एक ऐसा बदलाव जो होना ही है। हम लोग बदलाव के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उसकी दिशा क्या होनी चाहिये? जो कल का था वो ट्रेडिशनल और जो आज का है वो माडर्न, इतनी संकीर्ण परिभाषा नहीं होनी चाहिये। मॉडर्नाज़ेशन का मतलब विकास है वगैरह वगैरह कई आदमी कह के गये हैं पर जब विकास का ढांचा बराबरी और न्याय जैसे सिद्धान्तों के आधार पर बने, तब ही आप इसे सही विकास कहेंगे। हम नहीं चाहते कि साधनों के वितरण में असमानता हो। ये जो मल्टीनेशनल और जो प्राईवेटाइज़ेशन है, ये लोगों के ही साधनों को प्रयोग करने का तरीका हैं। केवल सार्वजनिक ही नहीं, निजी संपत्ति भी कब्ज़े में ले ली, या ऐसे ही खरीद कर भी ले ली लेकिन ये सोचे बिना कि उस का असर क्या होता है। </p>
<p>इसलिये हम अनशन करते हैं। ऐसा भी नहीं कहते कि कोई कंपनी नहीं आये, लेकिन जो कंपनी केवल प्रॉफिट या उससे जुड़ा स्वार्थ है उतना ही देखती है वो लोगों को लूटती है, इसमें राज्य शासन भी लोगों की बजाय कंपनियों की सुरक्षा करने की अशिष्ट भूमिका निभा रहा है। ये बड़ी दुखद बात है, इस चीज से लड़ना है तो मिलजुलकर एक साथ लड़ना पड़ेगा।</p>
<p><strong>आप लोगों ने सामुदायिक अधिकार की बात की है। पंचायती राज से तृणमूल स्तर तक लोगों को अधिकार मिलने की बात चलती है। फिर यह भी होता हे कि कोर्ट कोक को केरल में उत्पादन शुरु करने की <a href="http://www.indiaresource.org/news/2005/1060.html">इज़ाजत दे देती है</a>, ग्रामसभा की आपत्तियों को दरकिनार कर देती है।</strong></p>
<p>न्यायालय व्यक्ति और कार्पोरेट्स में भेद नहीं करतीं। हम इसका विरोध कर रहे हैं, हमारा सत्याग्रह चालू हो गया है क्योंकि हमारा मानना है कि यह न ही समझदारी है और न उचित, नागरिक नागरिक है कंपनी कंपनी है। और ग्रामसभा और जनजातीय सेल्फ रूल तक बात जाने के बाद फिर यह कहना की ग्रामसभा अपने निर्णय पर पुनर्विवार करे तो फिर मतलब ही क्या हुआ निर्णय का!</p>
<p><strong>आपने एक बार ये भी कहा है कि न्यायालयों में ईंवेस्टीगेटिव अप्रोच (अनुसंधान करने का रवैया) की कमी है। पर कई बार तो पब्लिक ईंटरेस्ट पेटिशन्स पर न्यायपालिका के निर्णयों से आम आदमी को बड़ी खुशी होती है, लगता है कि जो काम हमारे चुने राजनेताओं को करना था वह कम से कम कोर्ट ने तो किया।</strong></p>
<p>जूडिशियरी को संविधान का पालन तो करना ही चाहिये। न्यायपालिका  के हाथ में वैसे बहुत है पर अगर वे कानून और संविधान का मूल भावना की परवाह कर केवल अक्षरशः पालन ही करें तो क्या लाभ।</p>
<p><strong>आंदोलनों के रूख से अक्सर ऐसा लगता है जैसे कि ग्रामीण जनता के हर दुख व पानी की समस्या के लिये शहरी ही जिम्मेदार हैं। आम शहरी क्या कर सकता है?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">गरीब चाहे शहरी हो या ग्रामीण दोनों की स्थिति एक जैसी है। शहर के भीतर भी ग्रामीण, जो सिर्फ काम के वक्त लाये जाते हैं, गौण जीवन जीने को विवश हैं।</div>
<p>हम जो अर्बनाईज़ेशन आधारित विकास कर रहे हैं जो एक प्रकार से भारत सरकार ने आज़ादी के बाद मंजूर किया है उसके साथ यही हो रहा है कि ईंटरलैंड के ग्रामीण संसाधनों को शहरों में लाया जा रहा हैं और शहरों में भी जो जीवन जी रहे हैं उसमें केवल 20 से 50% आबादी ही साधनों का वैसा उपयोग कर पा रही हैं जैसा वे चाहते हैं। शहर के भीतर भी ग्रामीण, जो सिर्फ काम के वक्त लाये जाते हैं, गौण जीवन जीने को विवश हैं। </p>
<p>गरीब चाहे शहरी हो या ग्रामीण दोनों की स्थिति एक जैसी है। असंगठित क्षेत्र और अवैद्य निवासियों जैसे लोगों के अधिकारों की तो बात ही नहीं होती। जहां तक पानी की बात है, क्रांपिंग पैटर्न क्या होगा, कृषि टेक्नोलॉजी क्या होगी यह तय करता है कि पानी की क्या स्थिति होगी। हर महानगर में 40% पानी व्यर्थ हो जाता है। वॉटर ईंटेंसिव क्रॉपिंग और पानी का आडंबर पूर्ण प्रयोग रोकना होगा। सिर्फ &#8220;जानकारी का अधिकार&#8221; काफी नहीं हैं, अधिकार यह भी मिलना चाहिये कि आप यह तय करें कि विकास कैसा हो।</p>
<p><strong>आप सक्रिय राजनीति में क्यों नहीं शामिल होतीं? हर कोई आप जैसा प्रतिनिधि पाना चाहेगा।</strong></p>
<p>राजनीति में हम भी शामिल है पर आंदोलन की राजनीति अलग तरह की है। जो राष्ट्रीय राजनीति है उसके अपने नियम है, अपना खेल है, उस पर आज पैसा और माफिया हावी है। उसके अंदर जाने के पहले दस बार सोचना चाहिये। उसके अंदर जाकर भी एकदम जादू हो जायेगा, हम ऐसा भी नहीं मानते। हम देखते हैं कि अक्सर विभिन्न पार्टियाँ जो कानून या नीतियों में बदलाव लाती है तो ये गरीबों के ठीक नुकसान के लिये होती हैं, ऐसे में संगठित शक्ति और आंदोलन ही सरकार पर दबाव बनाते है। पार्टी के भीतर के लोग रोज़गार, कृषि क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के लोगों के खिलाफ नीतियों के खिलाफ कम ही आवाज उठाते हैं, यह काम आंदोलन और संगठित शक्ति ही करती हैं।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=3120&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0805-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>2</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वर्डप्रेस की सफलता का श्रेय प्रयोक्ताओं को</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0605-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0605-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 07:50:34 +0000</pubDate>
		<dc:creator>पंकज नरूला</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=2597</guid>
		<description><![CDATA[ह्यूस्टन, अमरीका में जन्में मैट मुलनवेग केवल 20 वर्ष के हैं और अंतर्जाल तकनलाजी के दीवाने हैं। मुक्त लाईसेंस वाले ब्लॉगिंग सॉफ्टवेयर तथा अर्थगत व्यक्तिगत प्रकाशन आधार वर्डप्रेस के वे प्रमुख विकासकर्ता हैं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="padding: 0px 5px 5px; margin-top: 0px">
<div class="dropCap">अ</div>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" alt="Samvaad"  />पने उम्र से काफी परिपक्व हैं मैट मुलनवेग। ह्यूस्टन, अमरीका में जन्में मैट केवल 20 वर्ष के हैं और अंतर्जाल तकनलाजी के दीवाने हैं। मुक्त लाईसेंस वाले ब्लॉगिंग सॉफ्टवेयर तथा अर्थगत व्यक्तिगत प्रकाशन आधार <a href="http://wordpress.org/">वर्डप्रेस</a> के वे प्रमुख विकासकर्ता हैं। वर्डप्रेस विगत दिनों में काफी लोकप्रिय हुआ है। जब <a href="http://www.typepad.com/">टाईप पैड</a> और <a href="http://www.movabletype.org/">मूवेबल टाईप</a> के निर्माता <a href="http://www.sixapart.com/">सिक्स अपार्ट</a> ने अपने लाइसेंस शर्तों और कीमतों में भारी बदलाव किया तो कई ख़फा ग्राहकों ने मुफ्त सॉफ्टवेयर वर्डप्रेस की ओर रुख किया। मैट के ओपन सोर्स के प्रति भावावेश को देखते हुए यह आगे भी जारी रहने की संभावना है।</p>
<p>मैट का <a href="http://photomatt.net/photos/">छायाकारी</a> व <a href="http://photomatt.net/">लेखन</a> की ओर भी रुझान है। जैज़ के मुरीद मैट सक्सोफोन और पियानो भी बखूबी बजा लेते हैं। वर्डप्रेस के अलावा मैट ने पिंग-ओ-मैटिक की भी स्थापना की है। उनके जालस्थल पर रोज़ाना लगभग 10,000 लोग आते हैं, कहा जाता है कि <a href="http://technorati.com/">टेक्नोराती</a> के अनुसार वे ब्लॉगमंडल में नम्बर तीन हैं। मैट सैन फ्रांसिस्को स्थित मिडिया कंपनी सीनेट के लिये काम करते हैं। वर्डप्रेस के प्रति उनके समर्पण को इसी बात से समझा जा सकता है कि उनके नियोक्ता की ओर से उन्हें अपने काम का 15 प्रतिशत समय वर्डप्रेस के लिये देने की इजाज़त है। निरंतर के वर्डप्रेस विशेषांक के लिये <a href="http://pnarula.com/">पंकज नरूला</a> ने मैट से बातचीत की।</div>
<p><strong>वर्डप्रेस बनाने की प्रेरणा आपको कैसे मिली?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="Wodrpess Special" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/wp-special.jpg" alt="" width="150" height="75" />मैनें ब्लॉगिंग की शुरुवात तब की जब मैं ग्रीष्मकाल के दौरान कुछ समय वाशिंगटन डीसी में था और कुछ समय पहले ही डिजिटल कैमेरा लिया था। मैं अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों को अपने द्वारा खींचे फोटो दिखाना चाहता था तो वेबसाईट इसके लिये सबसे उम्दा साधन लगा। अंततः मै छायाकारी के साथ साथ लिखने भी लगा, तब मैं मिशेल की <a href="http://www.cafelog.com/">बी2/कैफेलॉग</a> का प्रयोग कर रहा था। फिर बी२ परियोजना ठंडे बस्ते में चली गयी और वर्डप्रेस ने टूटे तार जोड़ने शुरु कर दिये।</p>
<p><strong>किसी भी अच्छी ब्लॉगिंग प्रणाली के क्या गुण होने चाहिये? क्या ब्लॉगिंग निकाय को विषय-वस्तु प्रबंधन प्रणाली (सी.एम.एस) माना जा सकता है?</strong></p>
<div id="pullQuoteL">मेरा मानना है कि अच्छा सॉफ्टवेयर अदृश्य होना चाहिये, आपको यह पता भी न चले कि सॉफ्टवेयर वहाँ है।</div>
<p>मेरे विचार से जो पहली चीज किसी भी ब्लॉगिंग प्रणाली को करनी चाहिये वो यह है कि लेखक और पाठक के मध्य कम से कम अवरोध पैदा हों। मेरा मानना है कि सामान्यतः अच्छा सॉफ्टवेयर अदृश्य होना चाहिये, आपको यह पता भी न चले कि सॉफ्टवेयर वहाँ है। जहाँ तक रास्ते से हट कर सिर्फ काम किये जाने की बात है, वर्डप्रेस को मैं सफल मानूँगा। ब्लॉगिंग साधारण विषय-वस्तु प्रबंधन का ही एक विशिष्ट रूप है अतः ब्लॉगिंग निकाय निःसंदेह विषय-वस्तु प्रबंधन प्रणाली है।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/matt.jpg" border="0" alt="मैट मुलनवेग" hspace="2" vspace="2" width="175" height="230" align="right" /><strong>यह बलॉगज़ीन <a href="http://www.civicspace.org/">सिविकस्पेस</a> पर स्थापित है। क्या इस प्रकार की पत्रिका को वर्डप्रेस पर स्थापित किया जा सकता था? क्या वर्डप्रेस में पत्रिकाओं के लिये प्लगईन बनाने की गुंजाईश है?</strong></p>
<p>सिविकस्पेस कुछ विशेष कार्यों के लिये शानदार आधार है, यह इस बात पर निर्भर है कि आप क्या करना चाहते हैं। मैं सिविकस्पेस के निर्माताओं से परिचित हूँ और वे एक मोहक सामुदायिक आधार तैयार करने के लिये काफी मेहनत कर रहे हैं। निरंतर के जालस्थल को देखने के बाद ऐसा लगता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है जो कि वर्डप्रेस पर नहीं किया जा सकता था। पर किसी विशिष्ट कार्य के लिये क्या प्रयोग किया जाय इसका चयन करना पेचिदा काम है, आपको अपनी मौजूदा ज़रूरतों के साथ साथ यह भी ध्यान रखना होता है कि भविष्य में आप कैसा विस्तार चाहते हैं। मेरे ख़्याल से निरंतर के ब्लॉग जैसे हिस्सों के लिये वर्डप्रेस ज्यादा उपयुक्त होता पर चुनाव (पोल) तथा फोरम के किये आपको किसी तृतीय पक्ष के उत्पाद का निरंतर में एकीकरण करना होता।</p>
<p><strong>क्या आप वर्डप्रेस की परवरिश और दिशा निर्धारण आने वाने समय में भी करते रहेंगे या फिर आप को लगता है कि बस अब दुसरों को संभालने दो मुझे और भी ज़रूरी काम हैं? और किन सृजनात्मक विचारों पर काम हो रहा है?</strong></p>
<p>वर्डप्रेस मूलतः इसके प्रयोगकर्ताओं के ही बूते पर चल रहा है और इसकी सफलता का श्रेय इसकी अविश्वसनीय प्रयोक्ता समुदाय को जाना चाहिये। मैं तो खाते, नहाते, गाड़ी चलाते, हर वक्त वर्डप्रेस के बारे में नये विचारों के बार में सोचता रहता हूँ। तो मेरे पास काफी आईडिया हैं, कुछ अच्छे, कुछ खराब, पर मुझै लगता है कि वर्डप्रेस में अभी विकास की काफी संभावनाएं मौजूद हैं और मुझे नहीं लगता कि आने वाले कुछ सालों तक विकास की गति धीमी होगी।</p>
<p><strong>क्या आप सहमत हैं कि वर्डप्रेस की बढ़ती लोकप्रियता के पीछे मूवेबल टाईप के परिवर्तित लाइसेंस शर्तों और कीमतों का हाथ है?</strong></p>
<p>वर्डप्रेस को उस समय मूवेबल टाईप से पलायन करने वाले लोगों के रूप में हज़ारों नये प्रयोक्ता ज़रूर मिले। पर यह सिर्फ एक कारक था। उसके बाद से हम लगातार बढ़ते दैनिक डाउनलोड की संख्या देख रहे हैं और मैं सोचता हुँ कि अब वर्डप्रेस मूवेबल टाईप के प्रयोक्ताओं की तागात से कहीं ज्यादा विकसित हो चुका है।</p>
<p><strong>अप्रिय प्रश्न है, पर वर्डप्रेस पर हाल ही में लगे सर्च इंजनों के साथ हेरफेर के <a href="http://www.nirantar.org/0505-halchal">आरोपों</a> के सिलसिले में क्या आपको लगता है कि ये नैतिक है। क्या ओपन सोर्स परियोजनाओं की यह जवाबदेही बनती है कि वे पैसे कैसे बना रहे हैं इसका खुलासा करें?</strong><br />
जैसा की पहले भी कई बार कह चुका हुँ, वो मेरी एक बड़ी गलती थी। यह तो मुझे नही पता की सारे ओपन सोर्स परियोजनाओं के लिये यह ज़रूरी है पर मेरी व्यक्तिगत भावना है कि ओपन सोर्स परियोजनाओं से मैं जो भी लमाता हूँ उतना मुझे समुदाय को वापस ज़रूर लौटाना चाहिये।</p>
<p><strong>2004 ब्लॉग का साल था। आज और आज से कुछ सालों बाद, तकनीकी तथा सामाजिक व राजनैतिक असरात के मद्देनज़र, आपकी नज़र में एक अच्छे ब्लॉग की क्या खासियतें होंगी?</strong></p>
<div id="pullQuoteL">मेरी धारणा है कि 2005 में ब्लॉग में मल्टीमीडिया के प्रयोग पर ज्यादा ज़ोर दिया जायेगा, दरअसल वर्डप्रेस के अगले संस्करण में मीडिया संबंधित काफी प्रभावशाली चीज़ों को लाने की योजना है।</div>
<p>मेरा विचार है कि ब्लॉगिंग से कुछ चीज़ें फिलहाल नदारद हैं। पहला तो यही कि पढ़ने और लिखने के दरम्यान स्थित फ़ासला काफी विशाल हो गया है, कुछ रोचक पढ़ने के बाद अपने पाठकों के साथ उसे बाँटना अब भी काफी मुश्किल है। मेरी धारणा है कि 2005 में ब्लॉग में मल्टीमीडिया के प्रयोग पर ज्यादा ज़ोर दिया जायेगा, दरअसल वर्डप्रेस के अगले संस्करण में मीडिया संबंधित काफी प्रभावशाली चीज़ों को लाने की योजना है। अंततः, मुझे लगता है कि आगंतुकों के आंकड़े और गूगल एडसेंस या अन्य कोई विज्ञापन अपने ब्लॉग पर डालने जैसे कई कार्य, जो लोग अपने ब्लॉग पर करना चाहते हैं, काफी क्लिष्ट हैं और आपको काम अंजाम देने के लिये कई अलाहदा जगहों पर जाना पड़ता है।</p>
<p><strong>ब्लॉग खासी चर्चा में हैं और इस पर नियमों की बाढ़ लगाने की बातें चल रही हैं। क्या आप इस बात से सहमत हैं? या फिर स्वनियमपालन काफी है?</strong></p>
<p>ब्लॉग को नियमों के शिकंजे में कसना बेवकूफी है, यह ऐसा ही है कि बातचीत या ईमेल पर रोक टोक लगायी जाए। आशा करता हुँ कि ऐसे नियमन यथार्थ में कभी लागू नहीं होगें।</p>
<p><strong>लोकप्रिय चिट्ठाकारों का अचानक ब्लॉगिंग बंद कर देना आम बात हो चली है। क्या आप कभी ब्लॉगर्स ब्लॉक (जब चिट्ठाकार को कुछ भी लिखने का विचार न सूझे) के शिकार हुये हैं?</strong></p>
<p>लोकप्रिय ब्लॉग का होना कई दफा दबाव पैदा कर सकता है और ब्लॉग को लगातार चलाये रखने में निहित तनाव से कई लोग निचुड़ जाते हैं। पर जितने लोगों को भी मैंने ब्लॉगिंग छोड़ते देखा है अक्सर कुछ ही महीनों में वापस आ जाते हैं। मैंने कुछ लोगों को स्थाई रूप से ब्लॉगिंग छोड़ते तभी देखा है जब उनके जीवन में कोई बड़ा परिवर्तन आता है, जैसे कि विवाह या बच्चों का जन्म,जब उनके पास ब्लॉगिंग के लिये वाकई समय ही नहीं होता।</p>
<p>मैं ब्लॉगर्स ब्लॉक के दौर से गुज़र चुका हूँ, पर यह कोई बड़ी बात नहीँ थी। अगर मेरे पास कुछ कहने को नहीं होता तो मैं पोस्ट नहीं करता था। पर सामान्यतः जब मैं ब्लॉगिंग नहीं करता तो वजह यह नहीं होती कि मेरे पास कुछ कहने को नहीं है बल्कि यह कि जब विचार आते हैं तो मैं कंप्यूटर के पास नहीं होता या फिर किसी और कार्य में ऐसे मुबतला हो जाता हूँ कि ब्लॉगिंग करना याद ही नहीं रहता। अगरचे बिना सूचना के एक दिन से ज़्यादा ब्लॉगिंग न करूं तो मुझे ईमेल आना शुरु हो जाते हैं यह पता करने के लिये कि मैं ठीक तो हूँ।</p>
<p><strong>अगर वर्डप्रेस पर नहीं तो सूचना प्रोद्योगिकी में और किस पर काम कर रहे होते आप?</strong></p>
<p>अगर मैं वर्डप्रेस पर काम नहीं करता तो शायद राजनीति शास्त्र पर ध्यान दे रहा होता जो कॉलेज में मेरा मुख्य विषय था या फिर जैज़ संगीत जो हाई स्कूल और कॉलेज के दिनों से मेरा प्यार रहा है। शायद ह्यूस्टन में अब भी खूब पढ़ता और सेक्सोफोन बजाता रहता। सूचना प्रोद्योगिकी के क्षेत्र में होता ही नहीं!</p>
<p><strong>चिटठाकारों को आपका संदेश?</strong></p>
<p>मैं कहूँगा कि परवाह न करो कि दूसरे क्या सोचते हैं, बस ऐसा लिखते जाओ जो तुम खुद पढ़ना पसंद करते। अगर खुद के प्रति सच्चे रहोगे तो पाठक स्वयमेव जुड़ते जायेंगे।</p>
<p class="note">हिंदी रूपांतरः देबाशीष चक्रवर्ती</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2597&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0605-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आई.आई.टी से देश का कोई फायदा नहीं</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0505-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0505-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 May 2005 07:06:37 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Gandhi]]></category>
		<category><![CDATA[Girmitiya]]></category>
		<category><![CDATA[IIT]]></category>
		<category><![CDATA[Kanpur]]></category>
		<category><![CDATA[Musolini]]></category>
		<category><![CDATA[South Africa]]></category>
		<category><![CDATA[WTC]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0505samvaad/</guid>
		<description><![CDATA[दुनिया के जिस किसी भी मंच पर महात्मा गांधी की बात होती तो उनकी जीवनी &#34;पहला गिरमिटिया&#34; की बात जरूर होती है। पढ़िये &#34;पहला गिरमिटिया&#34; के रचयिता, साहित्यकार, <strong>गिरिराज किशोर</strong> से <strong>अनूप शुक्ला</strong> की बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser"><img hspace="2" vspace="2" border="0" align="right" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" />
<div class="dropCap">दु</div>
<p>निया के जिस किसी भी मंच पर महात्मा गांधी की बात होती तो <a href="http://www.abhivyakti-hindi.org/aaj_sirhane/2005/pahla_girmitiya.htm">&#8216;पहला गिरमिटिया&#8217;</a> की बात जरूर होती है। गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका के प्रवास के समय के आधार पर लिखी गयी यह जीवनी दुनिया के लिये वह खिड़की है जिससे गांधी के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में जाना जा सकता है। &#8216;पहला गिरमिटिया&#8217; के लेखक गिरिराज किशोर के लिये गांधी के बारे में लिखना आत्मसाक्षात्कार का एक जरिया रहा।</p>
<p>सन 1937 में मुजफ्फरनगर में जन्में गिरिराज ने सामाजिक कल्याण में स्नातकोत्तर किया है। वे आई.आई.टी. कानपुर में रजिस्ट्रार तथा रचनात्मक लेखन एवं प्रकाशन केन्द्र के अध्यक्ष के पद पर रहे हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में लोग, चिड़ियाघर, जुगलबंदी, तीसरी सत्ता जैसे उपन्यास के अलावा दस कहानी संग्रह, सात नाटक, एक एकांकी संग्रह, चार निबंध संग्रह सम्मिलित हैं। 1992 के प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार ले अलावा उन्हें उत्तर प्रदेश के भारतेन्दु पुरस्कार, मध्यप्रदेश साहित्य परिषद के वीरसिंह देव पुरस्कार तथा हिंदी संस्थान के साहित्य भूषण से सम्मानित किया गया है। संप्रति वे स्वतंत्र लेखन तथा कानपुर से प्रकाशित हिंदी त्रैमासिक पत्रिका &#8216;अकार&#8217; के संपादन में संलग्न हैं।</p>
<p>देश के इस प्रख्यात साहित्यकार को &#8216;कनपुरिये&#8217; अपना खास गौरव मानते हैं। अपनी विनम्रता, सौजन्यता के लिये जाने जाने वाले गिरिराज जी मानते हैं कि &quot;सख्त से सख्त बात शिष्टाचार के आज घेरे में रहकर भी कही जा सकती है। हम लेखक हैं। शब्द ही हमारा जीवन है और हमारी शक्ति भी । उसको बढ़ा सकें तो बढ़ायें,कम न करें। भाषा बड़ी से बड़ी गलाजत ढंक लेती है।&quot; नामसाम्य के कारण अक्सर लोग गिरिराजजी को उनसे धुर उलट सोच वाले आचार्य गिरिराजकिशोर के नाम से संबोधित कर बैठते हैं।</p>
<p>गिरिराज जी से &#8216;निरंतर&#8217; के लिये बातचीत की अनूप शुक्ला ने। उनसे हुयी बातचीत के प्रमुख अंश यहां प्रस्तुत हैं।</p></div>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>आपकी रचनायात्रा में आई.आई.टी कानपुर का खासा योगदान रहा। इस दौरान काफी कष्ट भी उठाने पड़े। क्या परिस्थितियां रहीं?</strong></p>
<p>   <img hspace="5" vspace="5" border="0" align="left" alt="गिरिराज किशोर" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/giriraj.jpg" />देखिये जब मैं आई.आई.टी.गया था तो दो बातें थीं। एक तो मैं हिंदी का आदमी था दूसरे गैर तकनीकी। तो वहां के लोगों ने शुरु में मुझे बिल्कुल सहन नहीं किया। बल्कि विरोध किया और उसके कारण मुझे मुझे तमाम कष्ट उठाने पड़े। एक और बात थी कि मेरा लगाव वहां के छात्रों तथा दूसरी-तीसरी श्रेणी के कर्मचारियों से ज्यादा था जिसे वहां के &#8216;टॉप लीडर्स&#8217; या फैकल्टी नापसंद करती थी। मेरे सामने एक बड़ा सवाल था कि ये प्रोफेसर जो विदेशों में रहते हुये अपना सारा काम खुद करते हैं वे यहां चपरासियों को लेकर लड़ाई करते थे। इसी सब को लेकर वहां फैकल्टी से कभी-कभी कहा-सुनी, तनाव हो जाता था। सस्पेन्ड भी हुआ मैं। मुकदमा लड़ना पड़ा। अंततः उच्च न्यायालय में केस जीता और बहाल हुआ। निदेशक तथा चेयरमैन को इस्तीफा देना पड़ा। पर तमाम कष्ट के बावजूद मैंने प्रयास किया कि इंस्टीट्यूट को नुकसान न होने पाये।</p>
<p><strong>वहां हिंदी क्या स्थिति थी उन दिनों? आपके आने पर हालात कुछ बदले?</strong></p>
<p>मेरे आने से पहले वहां हिंदी में कोई बात नहीं करता था। सब जगह अंग्रेजी में बोर्ड लगे थे। मैंने द्विभाषी कराये। लोगों में भी बदलाव आये। वे हिंदी में बात करने लगे। जब मैं बहाल होकर आया तो मैंने उनसे कहा, &quot;देखिये आपको भी मुझसे असुविधा है, मुझे भी आपसे। मैं बस एक रचनात्मक लेखन केन्द्र खोलना चाहता हूं।&quot; इसे उन्होंने सहर्ष मान लिया। </p>
<p><strong>आपके किसी उपन्यास में फैकल्टी द्वारा सताये जाने पर किसी छात्र की आत्महत्या का जिक्र है!</strong></p>
<p>हां, सरकार का एक आदेश आया की एस.सी, एस.टी. छात्रों की भर्ती कोटे से की जाये। तो उनका &#8216;कट प्वाइंट&#8217; बहुत &#8216;लो&#8217; कर दिया गया। इसका वहां के अन्य छात्रों व फैकल्टी के लोगों ने बहुत विरोध किया। जिसके कारण इन छात्रों को बहुत कुछ सहना पड़ा। उनकी पढ़ाई में समस्या आयी। उनको हेय दृष्टि से देखा गया। लोग उनका सहयोग नहीं करना चाहते थे। पढ़ाना नहीं चाहते थे उनको। अपमानित कर कक्षा में ताने मारते थे कि आप लोग कहां से आ गये। इससे तंग आकर एक छात्र ने आत्महत्या कर ली। मैंने &#8216;परिशिष्ट&#8217; उपन्यास में इसका जिक्र किया है। </p>
<p><strong>कई लोगों मानते हैं कि करोड़ों अरबों के आई.आई.टी बनाने से बेहतर होता कि हम अच्छे पॉलीटेक्निक और आई.टी.आई बनायें, ऐसे लोग जो कि सचमुच में इंजीनियेरिंग करते हैं। आप वहां लंबे अर्से रहे हैं। आपकी क्या सोच है इस बारे में?</strong></p>
<p>मैं आपसे सहमत हूं। यह सही है कि आई.आई.टी.से देश को कोई फायदा नहीं है। असल में ये टेक्निकल लेबर के रिक्रूटिंग इंस्टीट्यूट बन गये हैं विकसित देशों के लिये। हम अपने कुशल तकनीकी लेबर उनको सप्लाई करते हैं। ज्यादातर लोग विदेश चले जाते हैं जहां इनको हाथों-हाथ लिया जाता है। जो रह जाते हैं यहां वे बहुराष्टीय कम्पनियों में चले जाते हैं। देश को इनसे बहुत कम फायदा है। </p>
<p><strong>कहा जाता है कि यहां भर्ती ज्यादातर छात्रों का तन तो यहां रहता है पर मन अमेरिका में?</strong></p>
<p>यहां ज्यादातर छात्र मध्यवर्ग से आते हैं। वहां की सुख-सुविधायें आकर्षित करती हैं। यहां भी जो &#8216;फैकल्टी&#8217; होती है वह ऐसा वातावरण तैयार करती है। पाठ्यक्रम और केस स्टडी वहां के हिसाब से तय होते हैं। अमेरिका से आंकड़े लेकर उसे यहां फीड करके योजनायें बनाई जाती है। जिससे स्वाभाविक रूप से वहां जाने की ललक होती है। एक लड़का था जो विदेश नहीं जाना चाहता था बाद में वहां जाकर इतना रम गया कि वापस आने का नाम नहीं लिया। वह अपने सीनियर्स के लिये रोबोट की तरह हो गया। मैंने अपने उपन्यास &quot;अन्तर्ध्वंस&quot; में इसका जिक्र किया है। इससे भी लोग यहां लोग मुझसे नाराज हुये। </p>
<p><strong>देखा गया है कि परदेश जाने के बाद लोगों के मन में देश के लिये प्यार बढ़ जाता है। काफी आर्थिक सहायता करने लगते है वे देश की। </strong></p>
<p>जब विदेश जाते हैं लोग तो देश की यादें आना,लगाव होना स्वाभाविक होता है। अतीत दूर तक पीछा करता है। एक लड़का विदेश में परिचित प्रोफेसर से मिलने जाता है तो वह पूछता है कि तुम अरहर की दाल लाये हो? उसके पास सहगल,रफी के पुराने गानों के कैसेट हैं। वह कहता है कि जब मैं यहां की जिंदगी से ऊबता हूं तो इन रिकार्ड को सुनने लगता हूं। जो आर्थिक सहायता वाली बात है वो कुछ हद तक सच है। होता यह है कि देश के लिये जो वो पैसा भेजते हैं उनका अधिकतर भाग &#8216;फंडामेंटलिस्ट&#8217; के पास पहुंच जाता है। वे तो समझते कि वे देश की मदद कर रहे हैं लेकिन चक्र कुछ ऐसा बनता है कि उनका पैसा देश की मदद में न लगकर देश को बांटने में लग जाता है।</p>
<p><strong>पहला गिरमिटिया लिखने के पहले और गांधी के बारे में आठ साल शोध करके इसे लिखने के बाद आपने अपने में कितना अन्तर महसूस किया?</strong></p>
<div id='pullQuoteR'>  गांधीजी ने अपने तिरस्कार से ऊर्जा ग्रहण की जिसके कारण वह अपने को इतना काबिल बना पाये।</div>
<p>देखिये मैं आपको एक बात सच बताऊं कि अगर मैं आई.आई.टी.न गया होता तो शायद पहला गिरमिटिया न लिख पाता। वहां मैंने जिस अपमान व कठिनाइयों का सामना किया तो कहीं न कहीं मुझे गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में जो अनुभव किये होंगे। हालांकि न मेरी गांधी से कोई बराबरी है न मैं वैसी स्थिति में हूं पर उनके बारे में सोचने की मेरी मानसिकता अवश्य बनी। मुझे लगा कि हमें इस बात को समझना चाहिये कि ऐसी कौन सी शक्ति थी जिसने इस आदमी को महात्मा गांधी बनाया। एक आम, डरपोक किस्म का आदमी जो बहुत अच्छा बोलने वाला भी नहीं था। वकालत में भी असफल। इतना फैशनेबल आदमी। वह इतना त्यागी और देश के लिये काम करने वाला बना। मुझे हमेशा लगता रहा कि जरूर उसने अपने तिरस्कार से ऊर्जा ग्रहण की जिसके कारण वह अपने को इतना काबिल बना पाया। इससे मुझे भी अपने को प्रेरित करने की जरूरत महसूस हुई। </p>
<p><strong>दक्षिण अफ्रीका में लोग गांधी को किस रूप में देखते हैं?</strong></p>
<p>मैंने पहले भारत के गांधी के बारे में लिखना शुरु किया था। जब मैं दक्षिण अफ्रीका गया तो वहां हासिम सादात नाम के एक सज्जन ने मुझसे कहा, &quot;देखिये गांधी हमारे यहां तो जैसे खान से निकले अनगढ़ हीरे की तरह आया था जिसे हमने तराशकर आपको दिया। आपको तो हमारा शुक्रिया अदा करना चाहिये। अगर आपको लिखना है तो इस गांधी पर लिखिये।&quot; उनकी बात ने मुझे अपील किया तथा मैंने उस पर लिखा। </p>
<p><strong>जब यह प्रकाशित हुआ था तो कुछ लोगों मसलन राजेन्द्र यादव ने इसका भारी-भरकम होना ही एक विशेषता बतायी थी। </strong></p>
<p>इसका एक कारण है कि हिंदुस्तान में एक वर्ग है जो गांधी को पसन्द नहीं करता। उनको लगता है कि गांधी के वर्चस्व से लेफ्टिस्ट मूवमेंट पर असर पड़ेगा। हालांकि वामपंथियों ने भी इसे बहुत सराहा। नामवर सिंह ने सराहना की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े विष्णुकान्त शास्त्रीजी ने बहुत तारीफ की। हर एक की सोच अलग होती है। हर एक को अपनी धारणा बनाने का अधिकार है। </p>
<p><strong>लोग कहते हैं गांधीजी अपने लोगों के लिये डिक्टेटर की तरह थे। अपनी बात मनवा के रहते थे। आपने क्या पाया ?</strong></p>
<p>वो तो देखिये जब आदमी कुछ सिद्धान्त बना लेता है तो उनका पालन करना चाहता है। जैसे किसी ने त्याग को आदर्श बनाया तो उपभोग की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाना चाहता है। गांधीजी तानाशाह नहीं थे। हां उनके तरीके अलग थे। एक घटना बताता हूं। गांधी एक बार इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मिलने गये। साथ में उनके सचिव महादेवदेसाई तथा मीराबेन और मुसोलिनी का एक जनरल था जिससे मुसोलिनी नाराज था। गांधीजी उसी जनरल के घर रुके थे। मुसोलिनी ने गांधी का स्वागत किया और एक कमरे में गये सब लोग जहां केवल दो कुर्सियां थीं। मुसोलिनी ने गांधी को बैठने को कहा। गांधी ने तीनों को बैठने को कहा। तो ये कैसे बैठें? मुसोलिनी ने फिर गांधी को बैठने को कहा। गांधी ने फिर तीनों से बैठने को कहा। तीन बार ऐसा हुआ। आखिरकार तीन कुर्सियां और मंगानी पड़ीं। तब सब लोग बैठे। तो यह गांधी का विरोध का तरीका था। कुछ लोग इसे डिक्टेटरशिप कह सकते हैं। </p>
<p>इसी तरह दूसरे विश्वयुद्ध में उन्होनें हिटलर को लिखा था, &quot;यू आर रेस्पान्सिबल फार द वार एन्ड यू हैव टु वाइन्ड इट अप&quot;। मैंने इस पर हिटलर का जवाब भी देखा। उसने लिखा था, &quot;नो दीज़ प्यूपल आर ब्लेमिंग मी अननेसेसरली, एक्चुअली दे आर रेस्पान्सिबल फार द वार, एन्ड यू मस्ट टाक टू देम।&quot;</p>
<p><strong>मीरा बेन के बारे में सुधीर कक्कड़ ने लिखा है कि वे गांधीजी को चाहती थीं। गांधीजी के मन में भी उनके लिये कोमल भाव थे। सचाई क्या थी?</strong>   </p>
<p>इस तरह से अनर्गल बातें लिखने का कोई आधार नहीं है। मीरा बेन लंदन से गांधी के लिये तो ही आयीं थीं। गांधी को समर्पित होकर। वे उनके प्रति आसक्त भी थीं। ब्रिटेन की संस्कृति के हिसाब से इसमें कुछ अटपटा नहीं था। पर गांधी ने कई बार उनको अपने से दूर रखा। समझाते रहे। पत्र लिखते रहे कि मेरे पास आने के बजाय तुम काम करो। सेवा करो। इससे तुम्हें शान्ति मिलेगी। </p>
<p><strong>आपकी कौन सी कृति ऐसी है जिसे आप जैसा चाहते थे वैसा लिख पाये?</strong></p>
<p>ऐसा कभी नहीं हुआ। रचनात्मकता में ऐसा होता है कि आदमी जो करना चाहता वह नहीं कर पाता। और चीजें जुड़ती जाती हैं। मानव मस्तिष्क कुछ इस तरह है कि जब आप कुछ करना शुरु करते हैं तो काम शुरु करने पर नई-नई संभावनायें नजर आने लगती हैं। वह उस रास्ते चल देता है। पुरानी चीजें छूट जाती हैं। नयी दिशायें खुलती हैं। जब मैंने गांधी पर लिखना शुरु किया तो भारत के गांधी मेरे सामने थे। जब दक्षिण अफ्रीका गया तो पाया कि असली गांधी तो यहां हैं &#8211; मैं उस तरफ चल पड़ा। यह रचनात्मकता की एक सीमा भी है और उसका विस्तार भी। </p>
<p><strong>कानपुर के वर्तमान साहित्यिक परिवेश के बारे में क्या विचार हैं आप के?</strong></p>
<p>पहले यहां साहित्यिक नर्सरी थी। रमानाथ अवस्थी, नीरज, उपेन्द्र जैसे गीतकार यहां हुये । प्रतापनारायण मिश्र , विशंभरनाथ शर्मा &#8216;कौशिक&#8217; सरीखे गद्य लेखक थे। प्रेमचंद थे। अब छुटपुट लोग हैं। वे भी कितना कर पाते हैं। उनकी भी सीमायें हैं।</p>
<p><strong>कानपुर कभी भारत का मैनचेस्टर कहलाता था। आज मिलें बंद हो गयीं। कानपुर किसी उजड़े दयार सा लगता है। क्या ट्रेड यूनियनों के   <a href="http://fursatiya.blogspot.com/2004/11/blog-post.html">   ईंट से ईंट</a> बजा देने के जज्बे की भी इस हालत तक पहुंचने के लिये जिम्मेदारी है?</strong></p>
<div id='pullQuoteR'> आप अधिकार मांगिये पर उत्पादन, जो मांगों का मूल आधार है, उसे ठप्प कर देंगे तो बचेगा क्या?</div>
<p>मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि विदेशों में जो मार्क्सवादी गतिविधियां हुयीं उसमें उन्होंने उत्पादन नहीं प्रभावित होने दिया। विरोध किया पर उत्पादन चलता रहा। हमारे यहां उत्पादन सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। आप अधिकार मांगिये, सब बातें करिये पर उत्पादन, जो मांगों का मूल आधार है, उसे ठप्प कर देंगे, फैक्ट्री बंद कर देंगे तो बचेगा क्या? लड़ेंगे किसके लिये? </p>
<p>सन् 67 में जब मैं यहां आया था तो ये सब फैक्ट्रियां चलतीं थीं। शाम को यहां सड़क पर घण्टे भर लोगों के सर ही सर नजर आते थे। दुकानें थीं। बहुत से लोग बैठते थे। सामान बेचते थे। लोग उधार ले जाते । तन्ख्वाह मिलने पर पैसा चुका देते। लेकिन मिलों के बंद होने से सब बेरोजगार हो गये। पहले जब कोई मरता था तो उसके बच्चे को रोजगार मिल जाता था। अब खुद की नौकरी गयी,बच्चे का भी आधार गया। जो दुकानदार अपनी बिक्री के लिये इन पर निर्भर थे वे भी उजड़ गये। इस बदहाली के मूल में कहीं न कहीं आधार की अनदेखी करना कारण रहा। </p>
<p><strong>आज दुनिया में अमेरिकी वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। अपनी पिछली चीन यात्रा में आपने वहां क्या बदलाव देखे?</strong></p>
<p>मैं पिछले साल अक्टूबर में चीन गया था। वहां देखा कि चीन एकदम अमेरिका हो गया है। चीनी महिलायें अपनी पारम्परिक पोशाक छोड़कर अमेरिकन शार्टस, स्कर्ट में दिखीं। मेरे ख्याल में महिलायें ज्यादा आजाद हुयीं हैं वहां आदमियों के मुकाबले। </p>
<p><strong>जब आपने वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला होते देखा टीवी पर, तो आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?</strong></p>
<p>हालांकि मैं हिंसा का हिमायती नहीं हूं पर मैंने इस बारे में &#8216;अकार&#8217; के संपादकीय में लिखा था, &quot;ऐसा लगा जैसे किसी साम्राज्ञी को भरी सभा में निर्वस्त्र कर दिया गया हो। सारे देशों के महानायक उसे शर्मसार होने से बचाने के लिये समर्थनों की वस्त्रांजलियां लेकर दौड़ पड़े हों।&quot; उसके बाद हमें यह भी दिखा कि कितने डरपोंक हैं अमेरिकन। मरने से कितना डरते हैं वे। मुझे लगता है कि अगर एकाध बम वहां गिर जाते तो आधे लोग तो डर से मर जाते वे। पाउडर के डर से हफ्तों कारोबार ठप्प रहा वहां। </p>
<p><strong>हंस में जो &quot;मेरे विश्वासघात&quot; के नाम से लोगों में अपने यौन विचलनों को खुल के लिखने की शुरुआत हुयी इसको आप किस तरह देखते हैं?</strong></p>
<p>यह तो उकसावे का लेखन है। पानी पर चढ़ाकर लिखवाना। राजेन्द्र यादव ने देह वर्जनाओं से मुक्ति के नाम पर लिखने को उकसाया। बाद में रामशरण जोशी ने कहा भी कि इसे मत छापो पर राजेन्द्र यादव ने छाप दिया। इसी के कारण उसकी नौकरी भी चली गयी। दरअसल एक संपादक का यह भी दायित्व होता है कि वह देखे कि जो वह छापने जा रहा है उससे लेखक का कोई नुकसान तो नहीं हो रहा। राजेन्द्र यादव ने यह नहीं देखा। भुगतना पड़ा लेखक को। </p>
<p><strong>आज देश की हालत को आप किस रूप में पाते हैं?भविष्य कैसा सोचते हैं आप इसका?</strong></p>
<p>आज देश की राजनैतिक हालत बहुत खराब है। नेताओं में कोई ऐसा नहीं है जो आदर्श प्रस्तुत कर सके। अटल जैसे नेता तक रोज अपने बयान बदलते हैं। ऐसे में निकट भविष्य में किसी बड़े बदलाव के आसार तो मैं नहीं देखता। आगे यह हो सकता है कि युवा पीढ़ी अपने आदर्श खुद तय करे। ग्लोबलाइजेशन का यह फायदा हो सकता है कि लोगों में आगे बढ़ने की प्रवृत्ति बढ़े तथा वह आर्थिक समानता के लिये प्रयास करे और विकास की गति तय हो। </p>
<p><strong>आपकी पसंदीदा पुस्तकें कौन सी हैं?</strong></p>
<p>मुझे नरेश मेहता की &quot;यह पथ बंधु था&quot;, यशपाल का &quot;झूठा सच&quot;, अज्ञेय की &quot;शेखर एक जीवनी&quot; काफी पसंद हैं। अभी मैं पाकिस्तान गया था तो वहां &quot;झूठा सच&quot; बहुत याद आया। </p>
<p><strong>पसंदीदा व्यंग्य लेखक कौन हैं आपके?</strong></p>
<p>शरद जोशी मुझे बहुत अच्छे लगते रहे। आजकल ज्ञान चतुर्वेदी बढ़िया लिख रहे हैं। </p>
<p><strong>निरंतर के पाठकों के लिये कोई संदेश देना चाहेंगे?</strong></p>
<p>मुझे तो आप लोगों का यह प्रयास बहुत अच्छा लगा। जिस तरह अलग-अलग देशों रहने वाले आप भारतीय लोग हिंदी के प्रसार के लिये प्रयत्नशील हैं वह सराहनीय है। मेरे ख्याल में इसकी इस समय जबरदस्त जरूरत है। इससे विज्ञान की भाषा बनने में भी बहुत मदद मिलेगी। आगे चलकर यह बहुत काम आयेगा। जिस तरह आज अखबार रीजनल, लोकल होते जा रहे हैं, उनका दायरा सिमटता जा रहा है। ऐसे समय में नेट के माध्यम से दुनिया तक पहुंचने के प्रयास बहुत जरूरी हैं। आप सभी को मैं इस सार्थक काम में लगने के लिये बधाई देता हूं तथा सफलता की मंगलकामना करता हूं।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2125&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0505-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>ब्लॉग नहीं, यूज़नेट से बढ़ेगी हिन्दी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-samvaad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0405-samvaad#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 12:59:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[संवाद]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi]]></category>
		<category><![CDATA[Phonetic]]></category>
		<category><![CDATA[Takhti]]></category>
		<category><![CDATA[Unicode]]></category>
		<category><![CDATA[Usenet]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0405samvaad/</guid>
		<description><![CDATA[यूनिकोड हिन्दी का प्रयोग करने वाले कम ही होंगे जिन्होंने मुफ्त यूनिकोड एडिटर <strong>तख्ती </strong>के बारे में न सुना हो। पर इसकी रचना करने वाले <strong>हेमंत शर्मा</strong> को शायद ही ज्यादा लोग जानते हों। हनुमान जी के भक्त हेमंत उन्हीं का नाम आगे रखते रहे हैं। <strong>संवाद </strong>के अंतर्गत पढ़िये हेमंत से निरंतर की विस्तृत बातचीत।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px;">
<p><img title="Samvaad" src="http://www.nirantar.org/images/stories/samvaad.gif" border="0" alt="संवाद" hspace="5" vspace="5" width="135" height="140" align="left" />यूनिकोड हिन्दी का प्रयोग करने वाले विरले ही होंगे जिन्होंने वर्डपैड जैसे दिखने वाले मुफ्त यूनिकोड एडिटर  <a href="http://takhti.web.officelive.com/default.aspx">तख्ती</a> का प्रयोग न किया हो या इसका नाम न सुना हो। संभवतः यह जाल पर सर्वाधिक प्रचलित हिन्दी यूनिकोड पाठ संपादक (एडिटर) है। पर इस सरल एडीटर को बनाने वाले हेमंत शर्मा को शायद ही ज्यादा लोग जानते हों। हनुमान जी के परम भक्त हेमंत उन्हीं का नाम आगे रखते हैं।</p>
<p>हेमंत की जन्म स्थली है देहरादून। 1990 में आईआईटी दिल्ली से कंप्यूटर साईंस व ईंजीनियरिंग में बी.टेक करने के पश्चात 1998 तक भारत, नार्वे तथा अर्जेंटीना में फील्ड ईंजीनियर के रूप में कार्यरत रहे। 2001 से थॉमसन फाईनेंशियल, न्यूयॉर्क में सॉफ्वेयर ईंजीनियर के रूप में कार्यरत हैं। ज्यादातर डॉट नेट व C++ पर कार्य करते हैं। हेमंत हिन्दी, अंग्रेज़ी के साथ साथ स्पैनिश भी बोल लेते हैं। दौड़ना, पढ़ना, कारपेंट्री, ध्यान और आर्थिक व राजनैतिक विषयों पर बहस करना इनको पसंद हैं। प्रस्तुत है हेमंत की निरंतर से बातचीत के अंशः</p>
</div>
<p><strong>आप बजरंग बली के बड़े भक्त प्रतीत होते हैं। तख्ती के जालस्थल का (पुराना)</strong> <strong>पता http://geocities.com/hanu_man_ji भी उनके नाम पर है और जालस्थल पर भी उनका ज़िक्र है। इस बात पर कुछ प्रकाश डालना चाहेंगे?</strong></p>
<p>भक्त तो हम हैं लेकिन बहुत छोटे। दरअसल जालस्थल शुरु करते समय कुछ समझ नहीं आ रहा था कि क्या नाम रखुँ। नाम कुछ हंसमुख सा होना चाहिए था। तख्ती के पीछे विचार भी ऐसा ही था, हल्का फुल्का &#8211; जिससे कुछ फायदा हो जनता को और गाड़ी आगे बढ़े हिन्दी की। वैसे मेरी ध्यान योग में रुचि है और बुद्ध धर्म की &#8220;ज़ेन&#8221; शाखा में खास दिलचस्पी भी है।</p>
<p><strong>तख्ती बनाने का विचार आपको कैसे आया?</strong></p>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Hemant Sharma" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/hemant.jpg" border="0" alt="Hemant Sharma" hspace="5" vspace="5" width="100" height="130" align="right" />हिन्दी में लिखने के प्रोग्राम तो बहुत पहले से मिलते हैं। लेकिन एक प्रोग्राम का फॉरमैट (प्रारूप) दूसरे में काम नहीं करता था। ये सबसे बड़ा कारण था कि हिन्दी में कंप्यूटर पर काम नहीं होता था। आप किसी को डॉक्यूमेंट या ईमेल भेजेंगे तो वह उसे पढ़ नहीं सकता जब तक उसके पास वही प्रोग्राम न हो। तिस पर ये प्रोग्राम ज्यादातर मुफ्त नहीं होते हैं। जिस तरह से ASCII से अंग्रेजी के गाड़ी आगे बढ़ी थी, मुझे लगा कि <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/ISCII" target="_blank">ISCII</a> से हो सकता है कि काम बन जाए। लेकिन ISCII के प्रोग्राम (CDAC से) भी मुफ्त नहीं हैं।</p>
<p>ISCII के पीछे सरकार ने काफी राजनैतिक गलतियाँ भी की हैं। अगर आप अपनी भाषा को बचाना चाहते हैं तो आप को अपने देश में बिकने वाले कंप्युटर/आपरेटिंग सिस्टम के टेन्डर क्लॉज़ में यह साफ लिख देना चाहिए कि आप की भाषा का सपोर्ट हो। धीरे धीरे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Critical_mass_(sociodynamics)" target="_blank"><em>क्रिटिकल मॉस</em></a> बन जाएगा विषय-वस्तु का। फिर पता चला कि आने वाले समय में युनिकोड की चलेगी। मैंने काफी ढूंढा कि कोई युनीकोड देवनागरी के टेस्ट पृष्ठ मिलें और एडिटर्स मिल जाएं। उस समय विन्डोज़ 2000 में हिन्दी सर्पोट आ गया था। मैने कुछ लिखने की कोशिश करी उसके कुंजीपटल में मगर वह तो बहुत मुश्किल लगा मुझे। इसलिए मैंने एक एडिटर लिखने कि सोची जिससे टायपिंग कि परेशानियाँ दूर हों। इससे तख्ती का पहला टेस्ट वर्ज़न निकला। उससे मैंने यूज़नेट पर परीक्षण किया (UTF-8 प्रारूप में)।</p>
<p><strong>तख्ती की exe का आकार इतना छोटा कैसे रख पाये आप? क्या डाउनलोड आसान बनाना इसके पीछे उद्देश्य रहा?</strong></p>
<p>तख्ती C++ में लिखी थी, शायद इसलिए आकार छोटा हो। मुझे विन्डोज़ प्रोग्रामिंग के बारे में कुछ पता नहीं था तो मैंने सोचा कि इस तरह से कुछ विन्डोज़ के बारे में सीख लिया जाए। तख्ती का पुराना वर्ज़न <a href="http://msdn.microsoft.com/" target="_blank">एम.एस.डी.एन</a> के एक उदाहरण को लेकर विन 32 में लिखा था लेकिन उसमें बहुत बग्स मिले। इसलिए उसके बाद <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Microsoft_Foundation_Class_Library" target="_blank">MFC</a> का सैम्पल ले कर तख्ती का गत वर्ज़न लिखा। तख्ती को Win ME पर चलाने में बहुत मुश्किल हुई क्योंकि उस समय भारत में ज्यादातर लोग <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Windows_Me" target="_blank">Win ME</a> का इस्तेमाल करते थे इसलिए काफी काम कर के मैंने उसे Win ME वगैरह पर चला दिया, लेकिन फिर भी कई शिकायतें हैं।</p>
<p>तख्ती का असली काम <a href="http://www.microsoft.com/typography/developers/uniscribe/default.htm" target="_blank">यूनिस्क्राईब डी.एल.एल</a> करता है। बाकी काम MFC की डी.एल.एल करती हैं शायद इसलिए छोटा साईज़ संभव हो पाया। जिस समय तख्ती लिखी गई थी उस समय अन्तर्जाल पर बड़े डाउनलोड वाकई बड़ी परेशानी पैदा करते थे।</p>
<p><strong>IME, जो कि <a href="http://tdil.mit.gov.in/keyoverlay.htm" target="_blank">INSCRIPT कुंजीपटल</a> का प्रयोग करता है, की तुलना में कई लोगों को, खास तौर पर गैर तकनीकी लोगों को, तख्ती अधिक सुविधाजनक लगती है। आपका क्या मानना है?</strong></p>
<div id="pullQuoteR">तख्ती का उद्देश्य टायपिंग आसान करना था। मैंने ऐसा कुंजीपटल बनाने की कोशिश की जो कि क्वेर्टी जानने वालों के लिए आसान हो।</div>
<p>तख्ती का पहला उद्देश्य मेरी अपनी टायपिंग आसान करना था। इसका कुंजीपटल बनाने में काफी समय लगा। मुझे <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/QWERTY" target="_blank">क्वेर्टी</a> पर टायपिंग आती है। कभी हिन्दी में ईमेल या वेब पेज लिखता हूँ उसके लिए नया कुंजीपटल सीखना मेरे लिए बहुत अधिक मुश्किल है। इसलिए मैंने ऐसा कुंजीपटल बनाने की कोशिश की जो कि क्वेर्टी जानने वालों के लिए आसान हो।</p>
<p><strong>क्या आप स्वयं तख्ती का प्रयोग करते हैं?</strong></p>
<p>जी हाँ। जब भी मैं हिन्दी में लिखता हुँ, तख्ती का ही प्रयोग करता हूँ। छोटे मोटे काम के लिए तख्ती लिखी थी, उसके लिए ठीक है। तख्ती को आप हिन्दी नोटपैड मान सकते हैं।</p>
<p><strong>तख्ती पर आगामी दिनों में और क्या फीचर्स जुड़ने वाले हैं?</strong></p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Takhti" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/takhti.gif" border="0" alt="Takhti" hspace="5" vspace="5" width="150" height="95" align="left" />तख्ती पर अब कोई काम नही होगा। तख्ती लिखने पर मैंने सोचा था कि यूज़नेट पर हिन्दी में लिखना आसान होगा और लोग धीरे धीरे हिन्दी का प्रयोग करेंगे यूज़नेट पर। ऐसा हुआ नहीं। सम्पर्क के लिए हिन्दी का प्रयोग असफल ही रहा है। मेरे विचार में भारत की सरकार ने हिन्दी को बढ़ावा तो दिया, लेकिन मामला नारेबाजी तक ही सीमित रह गया। असली इस्तेमाल कंप्यूटर पर था और अस्सी और नब्बे के दशक में उनका ध्यान भारतीय भाषाओं को कम्प्यूटर पर लाने पर था ही नहीं। अब भी नहीं है। वैसे भी तख्ती एक &#8220;टेक्नोलॉजी डेमोन्सट्रेटर&#8221; थी। मैं दिखाना चाहता था कि युनिकोड का इस्तेमाल करके आप मानक टेक्सट फाईल और संदेश बना सकते हैं जो कोई भी अपने कंप्यूटर पर आराम से पढ़ सकता है, बस यूनिकोड सपोर्ट होना चाहिए। इस उद्देश्य में मैं सफल रहा हूँ। समय के साथ और बेहतर प्रोग्राम आएँगे, और आने ही चाहिएँ।</p>
<p><strong>क्या कभी तख्ती पर कोई शुल्क लगाने का विचार आया?</strong></p>
<p>जी नहीं, तख्ती मुफ्त रहेगी।</p>
<p><strong>क्या तख्ती अन्य भारतीय भाषाओं के साथ इस्तेमाल कि जा सकती है?</strong></p>
<p>हाँ जब तख्ती लिखी थी तब यह सोचा था कि दूसरी भाषाओं के लिए इसमें बदलाव किया जा सकेगा। लेकिन मेरे पास कोई दूसरा फॉन्ट उपलब्ध था नहीं इसलिए टेस्टिंग नहीं हो पाई। एक भाई ने कोशिश की थी लेकिन उनका मत था कि तख्ती में कोई बग है जिसके कारण वह केवल अपनी डिफॉल्ट मैप फाईल (hindi.map) ही पढ़ती है। तो मैंने सुझाव दिया कि आप इस फाइल को ही क्यों न बदल लेते। दुर्भाग्यवश उसके बाद उनसे कोई जवाब नहीं मिला।</p>
<p><strong>क्या आप को अन्य कोई युनिकोड संपादन तंत्र पसंद या नापसंद हैं? </strong></p>
<p>मैंने केवल माईक्रोसॉफ्ट के हिन्दी इन्पुट कुंजीपटल का प्रयोग किया है। मैंने पाया कि उसका प्रयोग करना लगभग असंभव है और उसका कुंजीपटल खाका भी सरलता से उपलब्ध नहीं जिससे सीखना और भी कठिन हो जाता है।</p>
<p><strong>अंर्तजाल पर हिन्दी के प्रयोग की अवस्था आपको कैसी लगती है? हिन्दी ब्लॉगिंग पर आपके क्या विचार हैं?</strong></p>
<p>हिन्दी के प्रयोग में सुधार हो रहा है, लेकिन शायद काफी देर हो गयी है। युवा वर्ग का अंग्रेज़ी की ओर ही झुकाव है और इसमें उनका कोई दोष भी नहीं, भारत में ढंग की नौकरी पाने में हिन्दी कोई मदद नहीं करती। युवाओं के लिए अंग्रेज़ी जानना अनिवार्य हो गया है। दुर्भाग्य की बात यह है कि उन्हें यह लगता है कि नौकरी पाने और अंग्रेज़ी सीखने के लिए हिन्दी को भूलना या उसकी अवहेलना करना जरूरी है। यह होना नहीं चाहिए और यह उन्हें यह समझना होगा। सरसरी तौर पर, भारत में साहित्य, और खास तौर पर हिन्दी साहित्य, की दुर्गति हो रही है। अगर हिन्दी प्रयोक्ताओं की संख्या खासी हो तो यह समस्या काफी हद तक सुधर सकती है। हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रचलन बढ़ रहा है और यह बढ़िया संकेत है। पर जब तक हिन्दी लेखकों और पाठकों की संख्या <em>क्रिटिकल मास</em> नहीं छूती स्थिति खतरनाक ही बनी रहेगी।</p>
<p>मेरा सपना था कि यूज़नेट पर हिन्दी में बातचीत बढ़े पर भारत में यूज़नेट उतना प्रचलित नहीं है सो मुझे आशानुरुप परिणाम नहीं मिले। यहाँ पर याहू ग्रुप्स ज्यादा नामचीन है जो न तो मानक नयाचार है और न ही युनीकोड को मान्यता देता है। ऐसी कई मुश्किलें हैं। मुझे लगता है कि अंततः शालाओं को यह जोर देना शुरु करना होगा कि छात्र कंप्यूटर पर भी हिन्दी टंकण करना सीखें। इससे नयी पीढ़ी कंप्यूटर पर हिन्दी के प्रयोग करने की अभ्यस्त होगी। अब जब माईक्रोसॉफ्ट युनिकोड हिन्दी इस्तेमाल के तरीके मुहैया करा चुका है ऐसा नहीं करने का कोई बहाना नहीं होना चाहिए।</p>
<div id="pullQuoteR">पाठकों की रूचि बढ़ाने के लिए ब्लॉगिंग शायद सबसे सही तरीका नहीं है। ब्लॉगिंग किसी व्यक्ति विशेष का एक तरफा संवाद है, दो तरफा संवाद सबसे बेहतर होता है और यूज़नेट इसके लिए सर्वोत्तम है।</div>
<p>पर पाठकों की रूचि बढ़ाने के लिए ब्लॉगिंग शायद सबसे सही तरीका नहीं है। ब्लॉगिंग किसी व्यक्ति विशेष का एक तरफा संवाद है, दो तरफा संवाद सबसे बेहतर होता है और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Usenet" target="_blank">यूज़नेट</a> इसके लिए सर्वोत्तम है। चूँकि भारत में यह प्रचलन में नहीं है, हिन्दी युनिकोड पर चलने वाले फोरम की दरकार है। इसके अलावा जागरण जैसे कई हिन्दी आनलाइन अखबार निजी स्वामित्व वाले फॉन्ट का प्रयोग करते आ रहे हैं जिससे मामला और पेचीदा हो जाता है। <a href="http://www.bbchindi.com" target="_blank">बी.बी.सी हिन्दी</a> जैसे युनिकोड इस्तेमाल करने वाले जालस्थल न केवल अच्छे हैं बल्कि ज्यादा मशहूर भी हैं।</p>
<p><strong>क्या कभी अपना ब्लॉग शुरु करने का भी इरादा है?</strong></p>
<p>हाँ किसी दिन अपना ब्लॉग शुरू कर सकता हूँ। पर मेरे पास पर्याप्त समय नहीं रहता। मैं तख्ती को एक सफल प्रदर्शन मानता हूँ जिसने यह स्थापित किया कि आगे का रास्ता युनिकोड ही है। मैं अपना समय कंप्युटर पर हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देने में करना चाहुँगा। पहले मैं सरकार और सी.बी.एस.ई जैसी संस्थाओं को विपत्र लिखा करता था, मुझे कुछ जवाब भी मिले जैसे उत्तर प्रदेश सरकार से। यह काफी अच्छा था। पर काफी काम शेष है, खासकर शालाओं में जहाँ हिन्दी के प्रयोग को बढ़ावा देना सबसे ज़रूरी है।</p>
<p><strong>निरंतर के पाठकों के लिए कोई संदेश?</strong></p>
<p>यही कि हिन्दी का प्रसार करें। विभिन्न फोरम पर लोगों को हिन्दी के प्रयोग ले लिए प्रोत्साहित करें। हमारा प्रयास होना चाहिए कि संख्या क्रिटिकल मॉस तक पहूँचे, फिर यह निकाय अपना रख रखाव खुद कर लेगा।</p>
<p class="note">इस साक्षात्कार के प्रकाशन के कुछ समय उपरांत ही अप्रेल 2005 में हेमंत ने भी अपना हिन्दी ब्लॉग शुरु कर दिया, जिसका नाम है <a title="Yog Blog" href="http://jaihanumanji.blogspot.com" target="_blank">योग ब्लॉग</a>।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2123&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0405-samvaad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>5</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

