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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; सारांश</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
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		<title>ट्रैफ़िक जाम और सपने</title>
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		<pubDate>Mon, 01 Aug 2005 14:44:58 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>

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		<description><![CDATA[सारांश में इस बार एक महिला लेखिका के प्रथम उपन्यास के अंश प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष है। सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सुषमा जगमोहन के इस प्रयास "ज़िंदगी ई-मेल" का 28 जुलाई, 2005 को दिल्ली में विमोचन हुआ। सुषमा पेशे से पत्रकार हैं और उनकी रचनायें हंस, मधुमती व सखी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। ]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">सारांश में इस बार एक महिला लेखिका के प्रथम उपन्यास के अंश प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष है। सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित <strong>सुषमा जगमोहन</strong> के इस प्रयास &#8220;ज़िंदगी ई-मेल&#8221; का विगत 28 जुलाई, 2005 को दिल्ली में विमोचन हुआ है। सुषमा पेशे से पत्रकार हैं और उनकी रचनायें हंस, मधुमती व सखी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। यह उपन्यास अधिकाधिक लोग पढ़ें व सराहें यही हमारी मंगलकामना है।</div>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="right" />
<div class="dropCap">दी</div>
<p>प को आफिस जाने में थोड़ी देर हो गई। कनाडा से जो पैंट तनु ने भिजवाई थी, उसने सोचा उसी को पहन ले। पहनी, तो लंबी निकली। उसे चेंज करने में वक्त लगा। ब्रेकफास्ट भी नहीं ले पाया। और सड़क पर ट्रैफिक जाम। हुआ क्या पता ही नहीं? गाड़ियां रेंग रही थीं। अब तो इसी चौराहे पर तीन लालबत्ती निकल जाएंगी, उसने सोचा। पसीने से नहा गया था। क्या यार, सुबह-सुबह यह हाल है, इसीलिए तो बस अपने इंडिया में दम घुटता है। पता नहीं कब तक बनेगा यह फ्लाई ओवर भी? कनाडा में होता है ऐसा क्या? क्या सड़कें हैं वहां की, हॉलीवुड की उस ऐक्ट्रेस निकोल किडमैन के गालों की जैसी! क्या सर्राटे से गाड़ी जाती है।</p>
<p>हां, और क्या? अपने ख्याल पर वह धीरे-धीरे मुस्कुरा उठा। हेमामालिनी के गालों जैसी सड़कें तो। हमारे यहां लालू जी के ख्वाबों में ही रह गईं। वाह! क्या सपने दिखाए थे उन दिनों लालूजी ने भी। कहां हैं वे सड़कें! कनाडा की सड़कें उसके जेहन में आ रही थीं। &#8230;और उन पर दौड़ती खूबसूरत कारें! क्या मजा आएगा उन्हें चलाने में भी। तनु ने लिखा तो था। आज देर हो जाएगी दफ्तर पहुंचने में। बात नहीं हो पाएगी। अगर ये खूबसूरत दौड़ती कारें उड़ना शुरू कर दें तो? फौरन दफ्तर पहुंच कर बात कर सकता है तनु से।</p>
<p>बेवकूफ ही रहे मियां तुम भी! सोचते भी हो तो गज भर की। किलोमीटर की नहीं सोच सकते? कारें बन गई हैं तो उड़ने वाली कार भी आ ही जाएगी एक दिन। ऐसी कार होती तो ये ई मेल लिखने की नौबत ही क्यों आती। और ये दो-दो देशों के बीच तनु और उसका रोना पीटना क्यों मचा होता? श्री दीप कुमार मिश्रा आराम से हर वीकेंड में पहुंच जाते कनाडा। तब श्रीमती तनुश्री मिश्रा इतनी हाय तौबा क्यों मचा रही होतीं! हर हफ्ते दिखाई दे जातीं हौजखास के अपने मकान में। दोनों बच्चे रोहित और शरद भी हर छुटृटी में दिल्ली में घर आ जाते। बाबा भी खुश रहते। व्हॉट अ सोल्युशन। लेकिन यह तरक्की इतनी देर से क्यों हो रही है?</p>
<p>कहां हो रही है देर, देखो, दीप तुम्हारी गाड़ी तो उड़ने भी लगी। उसे लगा, उस ट्रैफिक जाम के बीच उसकी कार धीरे-धीरे उड़ने लगी। कार की शक्ल भी बदली हुई थी। एकदम गोल। पहिए गायब हो गए। नो गियर, नो स्टियरिंग व्हील। सामने कंप्यूटर स्क्रीन और एक छोटा सा स्पीकर और माइक्रोफोन नजर आ रहा था जिससे वह कंप्यूटर को निर्देश दे सकता था। उसने स्पीकर में कहा, &#8216;टोरंटो। &#8216; और बहुत तेजी से, शायद सॉनिक स्पीड से गाड़ी हवा को चीरने लगी। फिर अचानक उसे आवाज सुनाई दी,&#8217; दीप, आपको कितनी देर लगेगी?&#8217;</p>
<p>उसने इधर-उधर चौंक कर देखा तो पाया कि वह जानी पहचानी सी आवाज तनु की थी। वह कंप्यूटर स्क्रीन पर नजर आ रही थी।</p>
<p>उसने कहा,&#8217; जस्ट इन फिफ्टीन मिनट्स, डार्लिंग।&#8217;</p>
<p>पलक झपकते ही मकान छोटे-छोटे खिलौनों में बदलने लगे, फिर गायब हो गए। उसे लगा, बादलों को चीर कर कार उड़ी जा रही है। वह अपनी नई कार को निहार रहा था। वह कंप्यूटर की मदद से कार की खूबियों का निरीक्षण करने लगा। अरे, कमाल की कार है यह तो!</p>
<p>जवाब में कंप्यूटर ने कहा,&#8217; एफरमेटिव, सर।&#8217;</p>
<p>उसे पता चला कि जरूरत पड़ने पर माहौल के हिसाब से कार की शेप और रंग भी बदला जा सकता है। कार में तरह-तरह के इंटीरियर भी हैं। जैसे ठंडी हवाओं के झोंकों से महकता समंदर का किनारा। रेगिस्तान में बसे ओएसिस की शीतलता। जैसे बर्फीली पहाड़ियों का इलाका। या बियाबान जंगल। या फिर दूर-दूर तक वादियों में महकते फूलों का नजारा। और न जाने कितने ऑप्शन थे।</p>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0805/sushma_cover.jpg" border="0" alt="" hspace="3" vspace="3" width="352" height="181" align="right" />उसे भूख का अहसास होने लगा था। तो उसने कंप्यूटर से खाने की जगह के बारे में पूछा। कंप्यूटर ने उसे मेन्यु दिखाया और अलग-अलग तरह के खानों के ऑप्शन दिए। दीप ने जंक फूड का ऑप्शन चूज किया। उस ऑप्शन में गोलगप्पे, छोले भठूरे और कचौड़ी से लेकर पिजा, बर्गर तक सब कुछ उपलब्ध था। उसने बर्गर, फ्राइज और कोक को चूज किया। तो उसमें भी कंप्यूटर ने कई ऑप्शन दे दिए, जिसमें मैक्डीज, विंपीज और निरूला&#8217;ज भी थे। उसने सोचा कि कंप्यूटर कुछ ही देर में गाड़ी का रुख मैक्डीज की तरफ कर लेगा, जिसे उसने चूज किया था लेकिन यह क्या! पलक झपकते ही ट्रे सामने आ गई जिसमें खाना सजा हुआ था। पेमेंट के लिए उसे कंप्यूटर स्क्रीन पर अपना क्रेडिट कार्ड नंबर और डालना था। बस वह खाने की ओर अपने हाथ बढ़ाने ही लगा था कि इसी बीच उसे जोर से पीं पीं, पौं पौं पौं की आवाज सुनाई देने लगी।</p>
<p>क्या यहां आसमान में इतनी उंचाई पर भी ट्रैफिक जाम हो गया? यह शोर इसी तरह होता रहा तो वह अभी इस ऊंचाई से एकदम नीचे गिर जाएगा। फिर उसे लगा कि उसकी गाड़ी जमीन पर आ लगी है। पौं-पौं उसे अभी भी सुनाई दे रही थी।</p>
<p>बर्गर की खुश्बू की जगह कचरे की संड़ाध मारता ट्रक उसके पीछे खड़ा था। और टृक ड्राइवर उसे मोटी-मोटी गालियां बकता हुआ गाड़ी बढ़ाने को कह रहा था। उसने देखा ग्रीनलाइट हो चुकी थी। पीछे वाली गाड़ियों से सामूहिक पीं पीं पीं हो रही थी। उसके साथ की गाड़ियों में बैठे लोग हंस रहे थे तो पीछे बाले खुंदक खा रहे थे। उसने झेंप कर आंखें मूंद लीं। फिर मुस्कुराहट आ गई। कम्बख्त सपने भी नहीं देखने देते।</p>
<p>तो 10 की सुबह ट्रैफिक जाम के नाम। श्रीमती तनुश्री मिश्रा से श्री दीप कुमार मिश्रा की बात सुबह नहीं हो पाई। बीच में वक्त मिला तो कंप्यूटर में ई मेल बाक्स में झांका। बेबी की मेल आई हुई थी। लिखा था, आज का दिन भी अच्छा बीता। लेट हो गई थी। समर टाइम की अभी आदत नहीं पड़ी है। 15 कापी चेक कीं। लेकिन पेस्ट्री चौथाई खाई और अब जी ऐसा हो रहा है जैसे एग खाने से होता है। सोचा आपसे बात कर लूं तो ठीक हो जाएगा। सोउंगी, अभी एक घंटे के लिए। आपकी बेबी।</p>
<p>बात करने का वक्त शाम को ही मिल पाया,</p>
<p>16.00,</p>
<p>गुड मॉर्निंग, तनु, अब कैसी तबियत है? पेस्ट्री में एग होता है इसलिए ऐसा हुआ है। आज आने में देर हो गई। दीप।</p>
<p>एक मेल रोहित का, हाय डैड, आज का दिन अच्छा गया। मुझे मेरा पहला चेक मिला। मगर वो सिर्फ एक दिन का था। 18 डॉलर। मैं आजकल घर में रात का खाना कम खाता हूं। ऐसा तब ही होता है, जब मैं जॉब पर जाता हूं। क्योंकि वहां पर बहुत खाता हूं। लव यु डैड। रोहित।</p>
<p>16.10,</p>
<p>बेटा रोहित, एक दिन की पे कहां की है। 18 डॉलर एक दिन के तो बहुत कम हैं। ये पैसे कितनी देर के काम के हैं। थक भी जाते होंगे। यार, अपना ध्यान रखो। कहीं पढ़ाई सफर न करे। शरद और अपना ध्यान रखना। तुम दोनों की बहुत याद आती है। हर बार, हमेशा, हर जगह। मैंने तकिए के पास तुम दोनों की स्कूल वाली फोटो टांगी है। रोज सोते समय तुम दोनों को देख कर दिल बहला लेता हूं। क्या तुम्हें याद नहीं आती? ममा का ध्यान रखना। और उनकी बात मानना। ये तुम्हारा दोस्त केविन कैसा है, वहीं का है या इंडियन है? बेटा मौका मिले तो खेलने जरूर जाया करो। खास तौर पर लंबे होने वाले गेम। अब तुम्हारी हाइट बढ़ी कि नहीं। बहुत दिन हो गए तुम्हें देखे। कभी-कभी ऐसा लगता है कि शरद तुम से लंबा हो रहा है फोटो देख कर। ओके टेक केयर। तुम दोनों को जल्दी देखने की आस में आंख लगाई। तुम दोनों का पापा।</p>
<p>16.59,</p>
<p>तनु को, काम से, जून में भले ही महीना भर रह जाऊं। लेकिन मैं सोचता हूं, वहां कितने दिन रहूंगा? फिर वापस आना पड़ेगा। क्या ऐसे ही आना-जाना चलता रहेगा? फोन पर क्या कह रही थीं, नौकरी छोड़ दूं। फिर हमेशा के लिए साथ होंगे। क्या बात करती हो? मुझे डर है, काम नहीं मिला या कम पैसे वाला काम मिला तो बचे-खुचे पैसे भी खत्म हो जाएंगे। दीप।</p>
<p>11 अप्रैल, आते ही उसने छोटी सी मेल भेजी, आज सिरदर्द हो रहा है। कल दिन में ऑफिस में तो कढ़ी राइस खा लिया था। और रात को पार्टी में चिकन राइस खाया। शायद इसीलिए सिरदर्द हो रहा है। दीप।</p>
<p>मेल बाक्स उसने दोपहर को ही खोला। तनु की कई मेल पहुंची हुई थीं, एक रोहित की। उसने तनु की मेल पढ़नी शुरू की।</p>
<p>हाय दीप, गुड मॉर्निंग, अब सिरदर्द कैसा है? आज का दिन बहुत धांसू रहा। दिन में करीब 50 कापियां जांचीं। नींद आ रही हैं। मुझे यहां सैटरडे तक जाना है। इस महीने के चौथे वीक तक मेरे एकाउंट में 720 डॉलर आ जाएंगे। कट कटा कर 700 डॉलर। मई में इसी काम का ट्रेवलिंग अलाउंस मिलेगा। तुम पैसे की चिंता मत करो। किराया तो निकाल ही लूंगी। अगले वीक अगर ये जॉब नहीं हुई तो आस पास के स्कूल और बोर्र्ड में जाउंगी। काम मिलना मुश्किल है। शरद रोहित से लंबा नहीं है। दोनों खुश है। रोहित की आज भी 5 से 11 तक डयूटी है। मैंने भी कुछ बनाया है कल और आज शाम के लिए। लव यु एंड मिस यु।</p>
<p>-और हां, एक बात तो तुम्हें बताना भूल ही गई। वो तुम्हारे रघुबीर सिंघानिया ने जो गेस्ट रिकमेंड किया था, वह तो बड़ा ओवर स्मार्ट निकला। अंजु ने बताया।</p>
<p>दूसरा मैसेज रोहित का। हाय डैड, गुड मॉर्निंग, हाऊ आर यु। मैं ठीक हूं अभी मैक्डॉनल्ड से लौटा। आज मेरी ट्रेनिंग का आखिरी दिन था। अगली बार से मुझे सब कुछ अपने आप करना पड़ेगा। आज मैं शरद के लिए चिकन बर्गर लेकर आया। उसे अच्छा लगा। घर में सब लोग ठीक हैं ना?? चाचा, बाबा, लूसी एंड मालती दीदी को प्यार बोलना। आपको पता नहीं है कि मेरे को 15 आवर्स के 100 डॉलर मिलेंगे। इस वीक मैंने अपने 15 घंटे पूरे कर लिए हैं। आगे और लिखता हूं। अब मॉम भी मेरे साथ हैं। लव यु। रोहित।</p>
<p>फिर तनु का मैसेज,</p>
<p>दीप, तुम्हें सिरदर्द रोटी ना खाने की वजह से है। ध्यान रखा करो कि राइस कितना भी खाओ, एक चपाती जरूर ले लो। हम दोनों को ही यह प्रॉब्लम हैं। यहां सुबह के साढ़े तीन हो रहे हैं। तुम हैरान तो जरूर हो रहे होगे कि आजकल मैं ज्यादा मेल क्यों नहीं कर पा रही हूं? बच्चे सो रहे हैं। 50 कापियां चेक करते करते इतनी थक गई थी कि आखें कब बंद हो गईं, पता ही नहीं चला। अब भी सिरदर्द हो तो निमोलिड खालो।</p>
<p>16.30,</p>
<p>उसने लिखा, मैंने घर पर ही गोली खाली थी। मैं समझ सकता हूं। मेरे बगैर तुम्हें ज्यादा काम करना पड़ रहा हैं कोई बात नहीं, जब ठीक लगे, तब मेल कर देना। तुम साढ़े तीन बजे ही कैसे उठ गईं? तबियत तो ठीक है? हां, तुम क्या कह रही थीं रघुबीर के गेस्ट के बारे में? कैसे ओवर स्मार्ट है? तुम तो कह रही थीं कि अंजु को उस दिन बुरा लगा था। तुम उनकी पार्टी में नहीं गई थीं। बात नहीं कर रहे वे लोग। फिर कब बात हुई? समझ नहीं आया कुछ? तुम्हारा दीप।</p>
<p>तनु का एक और मैसेज, इस समय सुबह के चार बजे हैं। पहला खत लिखते-लिखते झपकी आ गई। सॉरी। कोई झगड़ थोड़े ही हुआ था। अंजु भी मेरी ही तरह नौकरी करना चाहती है। इसके लिए उसे अपना रिज्यूमे फिर से बनाना था। वह मेरे साथ कुछ वक्त बिताना चाहती थी। उसने कहा था कि मैं उसके घर पहुंच जाऊं। हम साथ खाना खाएंगे। वह बीमार भी थी। मेरे साथ ही कुक करना चाहती थी। मेहमान से अपसेट थी, डिप्रेस भी। नहीं चाहती थी मेहमान साथ खाए। इसीलिए उसने प्रोग्राम बदला और हमारे घर आ गई। वहां हमने साथ खाना खाया। दीप, जब से घड़ी आगे बढ़ी है, टाइम गड़बड़ा गया है। पता है आठ बजे तक दिन रहता है। अंजु बोल रही थी कि नौ बजे तक साफ उजाला रहता है। क्योंकि पोल के पास है&#8230;</p>
<p>17.00</p>
<p>तनु, तुमने यह नहीं बताया कि वो लोग अपने मेहमान के बारे में क्या कह रहे थे? क्या कभी मेरे बारे में वो लोग पूछते हैं? दीप</p>
<p>जब जाती हूं तो अंजु मनीष दोनों पूछते हैं। बोलते हैं कि समझ नहीं आता कि जब रहना यहीं है तो छोड़ क्यों नहीं आते नौकरी। वो लोग भी तुम्हें उसी तरह मिस करते हैं, जिस तरह हम लोग करते हैं। और तुम्हारे लौटने का इंतजार कर रहे हैं। मेहमान की बहुत बुराई की। मैंने कहा, गलती रघुबीर की है, जो भेजा। वो आदमी डाइवोर्सी है। शायद दूसरी शादी कर चुका है। पर पेपर्स में डिक्लेयर नहीं किया था सेकंड वाइफ को। अब बच्चा वापस भेजेगा दूसरी बीबी के पास। दूसरी शादी डिक्लेयर करेगा। फिर बुलाने में डेढ़ साल लगेगा। वह तो अब सोच रही है कि कोई नया गेस्ट मिले तो इसे भगा दे। मैं तो दीप जी, इसी पचड़े के मारे कोई पेइंग गेस्ट रखती ही नहीं। आपके आने के बाद देखेंगे। मैं कम में गुजारा कर लूंगी। तनु।</p>
<p>17.34,</p>
<p>चलो, अच्छा लगा कि वो लोग मुझे याद करते हैं। तुम जैसा कहो, वैसा ही कर लेता हूं। तुम अच्छी सी नौकरी तलाश लो। मैं अगले ही दिन का टिकट कटवा कर तुम लोगों के पास आ जाउंगा। मेरा कैसे मन लग रहा है, ये मैं ही जानता हूं। एक-एक दिन काटना भारी पड़ रहा है। आज तुम्हें नहीं जाना काम पर। दीप।</p>
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		<title>कोई भला चिट्ठा क्यों लिखना चाहेगा?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-saransh</link>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 13:04:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>बिज़ स्टोन</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>
		<category><![CDATA[Biz Stone]]></category>

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		<description><![CDATA[चिट्ठाकारी आसान है और नियमित चिट्ठा लेखकों को पुस्तक प्रकाशन के अनुबंध या स्वतंत्र लेखन कार्य द्वारा अर्थलाभ मिलना भी कोई असंभव काम नहीं है। सारांश में पढ़ें <strong>बिज़ स्टोन</strong> की पुस्तक &#34;<strong>हू लेट द ब्लॉग्स आउट</strong>&#34; से एक चुने हुये लेख &#34;वाई वुड एनीवन वाँट टू ब्लॉग?&#34; का <strong>रमण कौल</strong> द्वारा किया हिन्दी रूपांतर।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser"><a href="http://www.bizstone.com/">बिज़ स्टोन</a> को कोई महापंडित कहता है तो कोई बेवक़ूफ। बिज़ के अपने शब्दों में, &quot;वे सब सही कहते हैं&quot;। &quot;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&quot; और &quot;ब्लॉगिंग&quot; पुस्तकों के लेखक बिज़, गूगल में <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a> पर काम करते हैं। यहाँ प्रस्तुत है &quot;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&quot; के लेख &quot;व्हाइ वुड ऍनीवन वांट टू ब्लॉग&quot; का हिन्दी रूपान्तर। इस किताब की देबाशीष द्वारा की समीक्षा आप <a href="http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</div>
<blockquote>
<p>&quot;मेरा ब्लॉग न होता तो मैं भी किसी भूले बिसरे बाल-अभिनेता जैसा होता, जिसे हर दसेक साल में &quot;कहाँ गए वह लोग?&quot; जैसे किसी कार्यक्रम में याद किया जाता। मैं परेशां और फटेहाल होता। पर ब्लॉग लिखने से मैंने कथावाचन का नया शौक पा लिया है, और शायद एक दूसरा पेशा भी। मैं खुश हूँ कि मैं अपने परिवार का गुजर बसर कुछ ऐसे काम द्वारा कर पाता हूँ जिससे मुझे प्रेम है।&quot; &#8211;  <a href="http://www.wilwheaton.net/">विल वीटन</a></p>
</blockquote>
<p><font size="5">मे</font>री बहन एक छोटे से घर में अपने दो ग्रेहाउंड कुत्तों, तीन बिल्लियों और अपने पति के साथ रहती है। बढ़िया शाकाहारी बनैना ब्रेड बनाती है वह। जब मैं उसके घर जाता हूँ, कुत्ते कुछ बौखला से जाते हैं। बारी बारी से मुझे घूरते हैं। नज़र रखते हैं कि कहीं मैं अपने छिपे हुए पंख खोल कर किसी बिल्ली को न ले उड़ूँ।</p>
<p><img vspace="2" hspace="2" border="0" align="left" alt="बिज़ स्टोन द्वारा लिखित पुस्तक हू लेट द ब्लॉग्स आउट से अंश" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" />ऐसा ही एक अवसर है जब मैं उन के घर में बनैना ब्रेड का आनन्द ले रहा हूँ और मैण्डी (यानी मेरी बहन) और गैरो (मेरे जीजा) के साथ बतिया रहा हूँ। गैरो को तो मैंने चिट्ठाकारी का रस्ता दिखा दिया है &#8212; वह अब अपने बैंड के लिए ब्लॉग लिखता है। हम बात छेड़ते हैं कि कैसे मैण्डी शायद कभी अपना व्यवसाय शुरू करेगी, हो सकता है जडी बूटियों से संबन्धित ही कुछ करे। उसे औषधीय बूटियों में बड़ी रुचि है, और बहुत जानकारी रखती है उन के बारे में। पर देर नहीं लगती बातचीत का रुख चिट्ठों की तरफ मुड़ने में। यूँ समझो कि मुझे इस की बीमारी है।</p>
<p>&quot;मैण्डी, तुम्हें अपना ब्लॉग शुरू करना चाहिए।&quot;</p>
<p>वह नाक सिकोड़ती है, कहती है कि वह कभी यह नहीं कर सकती। उसे यह विचार ही नहीं सुहाता कि पराये लोग पढ़ें कि वह क्या कर रही है, या उस के बारे में जानें। पराये लोगों की तो बात ही छोड़ो, वह कहती है, उससे भी बुरा तो यह है कि उसके परिचित लोग अंर्तजाल पर जाकर उस के बारे में पढ़ सकेंगे। ब्लॉगिंग जिसके &quot;पल्ले नहीं पड़ती&quot; वह ऐसे ही बात करता है।</p>
<p>मुझे ग़लत न समझें, प्राईवेसी ब्लॉगमंडल में एक वाजिब परेशानी है। पर मेरी बहन चिट्ठों के बारे में यह नहीं समझती कि ब्लॉग वैसा ही बनता है जैसा आप उसे बनाते हैं। कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि मैण्डी अपने चिट्ठे पर कुछ व्यक्तिगत लिखे। यह उसका पेशेवराना उपक्रम भी बन सकता है। पर यह बात उसे जँचती नहीं। उस की नाक की सिकुडन अभी भी गई नहीं है, और अब तो उसने एक आँख भी आधी भींच ली है। कुछ लोगों को ज़रा ज़्यादा ही प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। या शायद यह मेरे कई दिनों से न नहाने का असर हो।</p>
<p>यदि मैण्डी जडी बूटियों (हर्बोलॉजी) पर चिट्ठा शुरू करती है तो उसे हर्ब्लॉग का नाम दे सकती है। बढ़िया। यह कई स्तरों पर काम करता है। चलिए मानते हैं कि मैण्डी अंततः जड़ी बूटियों से जुड़ा एक छोटा मोटा कारोबार करना चाहती है। ब्लॉग से उसे इस उद्यम में मदद मिल सकती है। देखते हैं उसका बूटी ब्लॉगिंग का कारनामा किस तरह से रंग ला सकता है।</p>
<div id='pullQuoteR'> मेरी बहन चिट्ठों के बारे में यह नहीं समझती कि ब्लॉग वैसा ही बनता है जैसा आप उसे बनाते हैं। कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि मैण्डी अपने चिट्ठे पर कुछ व्यक्तिगत लिखे। यह उसका पेशेवराना उपक्रम भी बन सकता है।</div>
<p>वह अपना ब्लॉग सीधी सी सम्पादकीय नीति से शुरू करती हैः रोज़ कुछ घंटे इंटरनेट पर घूम कर जड़ी बूटियों, रेसिपीयों, इलाजों और उत्पादों से सम्बन्धित जालपृष्ठ देखना, उन की कड़ियाँ देना और अपनी राय, विवेचना और विचार रखना। यदि वह अपने ब्लॉग की प्रविष्टियों पर टिप्पणियों की अनुमति देती है तो उसके पाठक प्रतिक्रिया के ज़रिए उसकी सम्पादकीय नीति को स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं।</p>
<p><a target="_blank" title="Who lets the blogs out at Amazon" href="http://www.amazon.com/exec/obidos/redirect?path=ASIN/0312330006&amp;link_code=as2&amp;camp=1789&amp;tag=nirantar-20&amp;creative=9325"><img width="290" vspace="5" hspace="5" height="361" border="0" align="left" title="Who let the Blogs out by Biz Stone" alt="Who let the Blogs out by Biz Stone" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/story_big_bizstone.jpg" /></a>       अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को ब्लॉग के बारे में बता कर वह उस पर आवाजाही की शुरुआत कर सकती है। इससे भी बढिया, यदि उसके दोस्तों के ब्लॉग हैं तो वह उन से कह सकती है कि वे उस के ब्लॉग की कड़ी डालें। छोटे मोटे टेक्स्ट आधारित विज्ञापनों पर भी वह बीसेक डॉलर खर्च कर सकती है, पर ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि यदि वह अपनी सम्पादकीय दृष्टि जड़ी बूटियों पर केन्द्रित रखे, तो मैण्डी का ब्लॉग वैसे ही वेब पर खोज करने वालों को आकर्षित करेगा। यह अच्छा है, क्योंकि उन्हें जड़ी बूटियों की सूचना चाहिए और वही उसके पास है।</p>
<p>      समर्पित पाठक संख्या को बढ़ाने के साथ साथ मेरी बहन धीरे धीरे अपने औषधि-पदार्थों और होम्योपैथी के ज्ञान को सान लगा सकती है। मानिए कि एक साल तक वह यही करती रहती है। यानी कि साल भर का ज्ञान उसके ब्लॉग में समाया होगा, और उससे भी महत्वपूर्ण बात, उसकी पाठक संख्या हर महीने बढ़ती जाएगी। अच्छी खासी आवाजाही और एक विशेष विषय-वस्तु के चलते मैण्डी अपने ब्लॉग पर विषय सम्बन्धित विज्ञापन डाल सकती है, और ठीकठाक पैसा बना सकती है। साथ ही वह जड़ी बूटी की वेब-गुरू बनने के पथ पर भी लगभग अग्रसर है। जब लोग जाल पर किसी समझदार बूटी विशेषज्ञ को खोजने निकलेंगे तो मैण्डी के ब्लॉग पर तो पहुँचेंगे ही (हो सकता है कोई सम्पादक ही लेखक खोज रहा हो?)। अन्ततः मैण्डी को चिट्ठाकारी के कई फायदे पता चलेंगे &#8211; कुछ व्यावसायिक तो कुछ व्यक्तिगत। </p>
<h1>चिट्ठाकारी के फायदे</h1>
<p>इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आपका चिट्ठा आपके किसी शौक, आपके काम, या राजनीति पर केन्द्रित है, या आप दिन भर क्या करते हैं इस पर। चिट्ठाकारी है सूचना का आदान प्रदान और जितना आप शोध करेंगे, विचार विनिमय करेंगे, उतनी ही आप की अपनी रुचि के क्षेत्र में निपुणता बढ़ेगी, चाहे वह क्षेत्र &quot;मेरी रुचियाँ&quot; ही क्यों न हो। हर प्रविष्टि जो आप छापेंगे आपके जीवन कार्य में जुड़ जाएगा और वह कार्य आपके मन की एक खिड़की है। चाहे आप केवल अपनी पसन्दीदा जालपृष्ठों की सूची ही क्यों न छापें, आप की चुनी हुई कड़ियाँ ही आप का व्यक्तित्व प्रदर्शित करती हैं। चिट्ठाकारी खोजने, सोचने और लिखने का रोज़मर्रा का अभ्यास है। इस अभ्यास के कई लाभ हैं।</p>
<h1>चिट्ठाकारी आप को सयाना बनाती है</h1>
<p>इंटरनेट पर सूचना के अथाह भंडार के चलते, चिट्ठाकार को कोई भी कड़ी सुझाते समय समझदारी से चुनाव करना पड़ता है। फिर उस चिट्ठाकार को उस कड़ी के चिट्ठाकारी के योग्य होने के कारणों को प्रभावशाली टिप्पणी द्वारा समझाना पड़ता है। अपने आप में तो यह इतना मुश्किल नहीं है, पर रोज़ ऐसा करने से विश्लेषणात्मक मस्तिष्क की ख़ासी कसरत होती है क्योंकि न सिर्फ हमें रुचिकर लगने वाली चीज़ें चुननी पड़ती हैं बल्कि वे हमें रुचिकर क्यों लगती हैं यह भी बतलाना पड़ता है। फिर हमें ये विचार संक्षिप्त विवरण के साथ पाठक तक पहुँचाने होते हैं।</p>
<p>चिट्ठाकारी एक सूचना-संतृप्त जीवन शैली है, चिन्तन और अभिव्यक्ति से भरपूर। पहले पहल तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि चिट्ठाकार मूड के हिसाब से दिन में दो चार प्रविष्टियाँ लिख मारने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते, पर कुल मिला कर जो प्रभाव होता है वह आदमी को &quot;स्मार्टता&quot; है। हैं, ऐसा कोई शब्द है भी? देखा मैं कैसे इन चीज़ों के बारे में सोचता हूँ? आप शर्तिया कह सकते हैं कि मैं एक चिट्ठाकार हूँ।</p>
<p>चिट्ठाकारी और चिट्ठामंडल कई चीज़ों के मिले जुले असर का ही दूसरा नाम है। लाखों चिट्ठे अंर्तजाल को अक्लमन्द बना रहे हैं, और हज़ारों चिट्ठे आप को। केवल अक्लमन्द ही नहीं, कामयाब भी। एक उदाहरण देता हूँ। </p>
<h1>ब्लॉग से पुस्तक प्रकाशन तक</h1>
<p>मैंने ज़िक्र किया था कि संभव है कि कोई लेखक खोजने वाला सम्पादक मैण्डी के चिट्ठे तक जा पहुँचे। यह संभावना की सीमाओं से बाहर तो नहीं है।</p>
<p>गए दिनों में पुस्तक छपने का सौदा किसी किसी को ही मिलता था। या तो आप साहित्यिक पंडित होते, या लेखकों के उच्च सम्प्रदाय के सदस्य, या फिर अपने क्षेत्र में उन्मादपूर्ण नैपुण्य से भरे। फिर आप को दरकार होती एक एजेंट की, एक प्रचारक की और अपने काम का एक भंडार जिस से आप साबित करते कि आप में वह सब कुछ है जिस से आप चुनिन्दा, कुलीन, गर्वशील, प्रकाशित गुट का हिस्सा बन सकते हैं।   </p>
<p>अब, आप को चाहिए बस एक चिट्ठा और थोड़ा सा दम। चिट्ठाकारी लोगों का टाँका किताबी सौदों से जैसे तैसे भिड़ा ही देती है। यदि आप का सपना रहा है कि बार्न्ज़-ऍण्ड-नोब्ल के शेल्फ पर कहीं आप का नाम हो और आप अपने दोस्तों से यह कहने की तमन्ना रखते हों, &quot;यार आज नहीं आ सकता, मेरा संपादक सर पर सवार है,&quot; तो चिट्ठाकारी आप का पहला कदम है। अभी, इस समय, वेब पर चिट्ठाकारों को किताबें लिखने के ठेके मिल रहे हैं। चिट्ठे से पुस्तक तक के सफल सफर का राज़ क्या है?</p>
<h1>दीवाने हो जाइए</h1>
<p>मुझे अपना पहला पुस्तक लिखने का ठेका ऐसे ही मिला। पाँच साल पहले मैं तब चिट्ठाकारी का दीवाना हो गया जब मैं ने यह जाना कि यह कितना आसान है और मुझे अहसास हुआ कि एक क्रान्ति पनप रही है। मैं चिट्ठाकारी के बारे में इतना बोलता था कि मेरे दोस्त मुझे पागल समझने लगे; मेरे मुँह खोलते ही लोग अक्सर आँखों से इशारे करते थे। पर देखो तो, अब मैं लेखक हूँ। यह दीवानगी जैसा लगाव आप के भी काम आ सकता है। इस दीवानेपन का यूँ तो इलाज है, पर लगाम न लगाई जाए तो आप को खासी दिहाड़ी दिला सकता है।</p>
<div id='pullQuoteR'>  जो लोग बारीकियों में गुम हो जाते हैं, स्वाभाविक चिट्ठाकार होते हैं। इसलिए, यदि आप को किसी चीज़ का फितूर है और उसे लोगों के साथ बाँटने की इच्छा है, तो बड़ा सही समय है चिट्ठा शुरू करने का।</div>
<p>जूली पॉवेल ने भी अपने पागलाना बर्ताव को किताबी ठेके में बदल दिया। क्वीन्ज़ न्यूयार्क में वह बदकिस्मती के दौर से गुज़र रही थी, तो जूली ने कहा, &quot;इसकी माँ की ***&quot; (मुझे लगता है उसने वाकई ऐसा कहा, क्योंकि वह गालियाँ बहुत बकती है) और फैसला किया एक साल में जूलिया चाइल्ड और सिमोन बैक की लिखी पुस्तक &quot;मास्टरिंग द आर्ट ऑफ फ्रेंच कुकिंग&quot; के 1961 के पहले संस्करण में छपे हर व्यञ्जन को पकाने की अपनी दीवानी योजना पर ब्लॉगावेज़ (ब्लॉग दस्तावेज़) बनाने का।   <a href="http://blogs.salon.com/0001399/">जूली/जूलिया परिकल्पना</a> का जन्म हुआ। 365 दिन में पाँच सौ छत्तीस व्यञ्जन। &quot;एक युवती और एक रद्दी सा उपनगरीय रसोईघर। शादी, नौकरी, बिल्लियों का पोषण, सब दाँव पर।&quot; ख़ैर, इस &quot;दिन की सरकारी कामचोर, रात की बाग़ी रसोइयन&quot; ने एक जाने माने प्रकाशन गृह के मन में सहानुभूति जगा दी। जो लोग बारीकियों में गुम हो जाते हैं, स्वाभाविक चिट्ठाकार होते हैं। न सिर्फ इसलिए कि वे हर दिन और कभी तो दिन में कई बार चिट्ठा लिखेंगे, पर इसलिए भी कि वे अपने पुरालेखों, परिचय, अभिकल्पों, खाकों से छेड़छाड़ करना, बदलते रहना, जोड़ना, घटाना पसन्द करते हैं। इसलिए, यदि आप को किसी चीज़ का फितूर है और उसे लोगों के साथ बाँटने की इच्छा है, तो बड़ा सही समय है चिट्ठा शुरू करने का। बाद में जब आप वह किताब लिखने के ठेके पर दस्तखत करेंगे, तब धन्यवाद देंगे मुझे। शायद कुछ इस तरह &#8211; &quot;यह पुस्तक समर्पित है बिज़ को।&quot; </p>
<h1>अपना चिट्ठा आप बनो</h1>
<p><a href="http://www.thebaghdadblog.com/home/">सलाम पैक्स</a> ईराक से चिट्ठा लिखते थे, जब चारों तरफ बम फूट रहे थे। बमबारी, लड़ाई, आतिशबाज़ी हमेशा बढ़िया तरीका तो नहीं है, पर यह सलाम के लिए चल निकला। ज़ाहिर है लोग वहाँ पर वास्तव में क्या हो रहा है यह सुनना चाहते थे, न कि सिर्फ टीवी समाचारों में यह सुनना कि अमरीका कितना महान है। दरअसल सलाम को तो गुड़ की डली ही मिल गई, क्योंकि उसकी किताब उसके चिट्ठे का ही छपा हुआ रूप है। यदि आप ऐसा कारनामा कर दिखाएँ तो सोने पे सुहागा, क्योंकि सारा काम तो किया कराया है। धत् तेरे की! मुझे क्यों नहीं आया यह ख्याल।</p>
<p>मान लीजिए आप किसी युद्धरत, बम बरसाए शहर में फंस गए हैं, तन पर जो कपड़े हैं वही रह गया है आप के पास, और चिट्ठा लिखने की सनक हो रही है, तो घबराइए मत। कुछ ऐसा जुगाड़ कर सकते हैं कि बस एक ईमेल खाते या एक सेलफोन से चिट्ठाकारी की जाए। ऑडियो-ब्लॉगर से आप की आवाज़ फोन से सीधे MP3 फाइल के रूप में प्रकाशित होती है। हाँ अगर आप दुश्मन के फौजियों से छिप कर भाग रहे हों तो ऑडियो-ब्लॉगिंग न करें, क्योंकि वह सुन सकते हैं और आप को गोली मार सकते हैं। चिट्ठाकार ज़िन्दा रहे तो बेहतर चिट्ठा लिख सकता है। </p>
<p>किताबी ठेके के बारे में मत सोचिए, बस चिट्ठा लिखते जाइए। <a href="http://smartypants.diaryland.com/">मिमी स्मार्टीपैंट्स</a> ने वही तो किया, और वह इतनी भी दीवानी नहीं थी कि हार्पर-कॉलिन्ज़ यूके के किताबी ठेके को ठुकरा देती। &quot;मैं इस किताब के चक्कर में दोषभावना से घिरी हूँ, क्योंकि कितने ही योग्य लेखक अपनी पुस्तकें छपवाने कि लिए संघर्ष करते हैं, कष्ट झेलते हैं, और कई लोग गुमनामी में पापड़ बेलते हैं शानदार उपन्यास लिख लिख के। मैं अपने छोटे मोटे जालस्थल पर दोपहर के अन्तराल में बक बक करती हूँ, जो लिखती हूँ वह किताब भी नहीं है, और आस्मान से टपक पड़ता है किताब का ठेका।&quot; </p>
<p>मिमी भी उसी राह पर चली जिस पर सलामः उस की पुस्तक भी उस के चिट्ठे का छपा हुआ रूप है। मित्रों, इस गुड़ की डली को मैं जितना मीठा कहूँ उतना कम हैः आप का सम्पादक सारा काम करे और आप बटोरें चेक। पर ज़्यादा सयानापन नहीं अभी, क्या! अभी अपने चिट्ठा पर काफी ज़ोरदार मेहनत करना है आपको। </p>
<h1>ड्रीम टीम का हिस्सा बनिए</h1>
<p>
<div id='pullQuoteR'>सामूहिक चिट्ठा बहुत अच्छा तरीका है ज्ञान बटोरने का। कुछ चीज़ें आप को पता होती हैं, कुछ आप के दोस्तों को। कई चिट्ठाकार, मतलब काम हल्का।</div>
<p>मैग, मैट और पॉल, तीन सयाने और चिट्ठों के कारीगर बन्दे हैं, जो मिल जुल कर बढ़िया काम करते हैं। एक प्रकाशक जिस ने उन की किताब छापी, पहचान गया कि इस तिगड़ी में दम है, और उन का सामूहिक ज्ञान एक सूचनात्मक ग्रन्थ में बदला जा सकता है। कुछ चीज़ें आप को पता होती हैं, कुछ आप के दोस्तों को। मिल जुल कर जो ज्ञान होता है, वह अकेले के ज्ञान से ज़्यादा होता है। यह तो सीधी सी बात है, है न? सामूहिक चिट्ठा बहुत अच्छा तरीका है इस तरह से ज्ञान को बटोरने का। करना इतना है कि एक बन्दा चिट्ठा शुरू करे, फिर सेटिंग्स वाले नियन्त्रण पटल में जा कर दूसरों को आमन्त्रित करे। कई चिट्ठाकार, मतलब काम हल्का।</p>
<h1>अपनी राह खुद निकालें</h1>
<p><a href="http://wilwheaton.net/">विल वीटन</a> अदाकार से चिट्ठाकार बने हैं। पहले चिट्ठे के द्वारा, और अब अपनी पुस्तकों द्वारा वीटन को वह आत्मीय सम्पत्ति मिल गई है जिस के मारे वह ऑडिशन पर जाया करते थे। वीटन को तीन पुस्तकों का ठेका मिला, और सिनात्रा की तरह ही उस ने यह काम मेरे तरीके से किया। मेरा मतलब, उस के तरीके से। मेरा मतलब.., खैर आप समझ गए। बजाय इन्तज़ार करने के कि प्रकाशक उसके पास आएँ, वीटन ने अपना &quot;तथा-कथित अन्तरिक्ष युग में जीवन पर पाँच लघु, पर सत्य कथाओं&quot; का समूह &quot;डान्सिंग बेयरफुट&quot; स्वयं छापा, और अपने चिट्ठे का प्रयोग किया द्वारा उस की बिक्री बढ़ाने के लिए। अपने घर की बैठक से उस ने पाँच महीनों में तीन हज़ार से अधिक प्रतियाँ ग्राहकों से पैसा ले कर रवाना कीं, और यह कोई मामूली करामत नहीं है। एक अन्दर की बात बताता हूँ &#8211; प्रकाशकों को बिकने वाली पुस्तकें अच्छी लगती हैं। अब वह बड़ा-सा लेखक है &#8211; एजेंट, पब्लिसिस्ट, सब ताम झाम के साथ। शाबाश विल, लगे रहो।</p>
<h1>आप टिकट नहीं खरीदेंगे तो लाटरी कैसे जीतेंगे</h1>
<p>चिट्ठाकारी आसान है, और इसको अपनी ज़िन्दगी में शामिल कर लेना मुश्किल नहीं है। आप न चाहें तो अपनी व्यक्तिगत बातें बताने की आवश्यकता नहीं है। शुरू हो जाइए, कुछ भी गढ़ लीजिए। उसे संवारिए। कुछ बढ़ाइए, कुछ चढ़ाइए। साल भर बाद मैं आप की तेज़ी से बिकती किताब &quot;झूठों भरा साल&quot; खरीद रहा होऊँगा, 12.95 डॉलर में। अच्छी लिखी है।</p>
<p>यदि आप अपने चिट्ठे पर लगे रहेंगे, तो किताबी ठेके या अन्य स्वच्छंद लेखन कार्य के रूप में मिलने वाला आर्थिक लाभ असम्भव नहीं है। यदि आप टिकट नहीं खरीदेंगे तो लाटरी कैसे जीतेंगे। मैण्डी मुझ पर जितनी चाहे नाक सिकोड़े, पर वह तब समझेगी कि मेरी बात सही थी जब वह डाउनटाउन बॉस्टन में बार्न्ज़-ऍण्ड-नोब्ल की दुकान पर अपनी किताबें आटोग्राफ कर रही होगी, क्योंकि लाखों लोग उस के ऐसे उपन्यासों के दीवाने होंगे जो उसने एक शक्की जड़ी बूटी विशेषज्ञ के बारे में लिखी होंगी, जो अपने जड़ी बूटी विज्ञान से प्रेरित जासूसी से अपराधों के भेद खोलता है। फिर मैं उस से कुछ पैसे भी उधार ले पाऊँगा।</p>
<p class=note><em>हू लेट द ब्लॉग्स आउट?</em> से अंश सेंट मार्टिन प्रेस की पूर्वानुमति से प्रकाशित। समस्त प्रकाशनाधिकार लेखक के पास सुरक्षित। प्रस्तुत पुस्तकांश का बिना पुर्वानुमति अंर्तजाल पर अथवा पुस्तक रूप में पुनः प्रकाशन नहीं किया जा सकता। इस मूल अंग्रेज़ी आलेख का हिन्दी रूपांतरण किया  <a href="http://kaulonline.com/"> रमण कौल</a> ने। इस किताब की देबाशीष द्वारा की समीक्षा आप <a href="http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</p>
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		<title>वेबलॉग नीतिशास्त्र</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 06:46:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>
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		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

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		<description><![CDATA[सारांश में पेश करते हैं पुस्तकाँश या पुस्तक समीक्षा। निरंतर के पहले अंक में हमें प्रसन्नता है <strong>रेबेका ब्लड</strong> की पुस्तक &#34;द वेबलॉग हैन्डबुक&#34; के अंश का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करते हुए। रेबेका 1996 से अंर्तजाल पर हैं, उनका ब्लॉग रेबेकाज़ पॉकेट खासा प्रसिद्ध है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चिट्ठे ऑनलाइन जगत के विद्रोही स्वर हैं। सुदूर फैले अपने पाठकों में सूचनाओं को छान-फटक कर करीने से परोसने की नई तरक़ीब, इसकी सबसे बड़ी शक्ति तो है ही, इसने मुख्यधारा के मास मीडिया से इतर अपना एक अलग, खास, महत्वपूर्ण स्थान भी बना लिया है। बगैर किसी का आभार उपकार लिए, चिट्ठे अपने विशेष अंदाज़ में अपनी अलग कसौटियों सहित सूचनाओं और उन पर की गई टिप्पणियों का खासा प्रसार कर रहे हैं।</p>
<p><img title="Saransh" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" border="0" alt="रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग से अंश" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="right" />चिट्ठा नेटवर्क का सामर्थ्यवान प्रभाव ही शायद इस बात की वास्तविक वजह हो सकती है जिसके कारण मुख्यधारा के समाचार संगठनों ने भी इस दृग्विषय की तफ्तीश करना प्रारंभ किया है, तथा संभवत: यही चिट्ठों को पत्रकारिता का रूप मानने वाली चर्चा का सबब भी है। चिट्ठाकार नियंत्रण तथा प्रभाव के संदर्भ में भले ही न सोचते हों, परंतु व्यवसायिक मीडिया जरूर यह सोचता है। मास मीडिया की सबसे बड़ी चाह होती है विस्तृत पाठक-श्रोता-दर्शक। विज्ञापनों से प्राप्त राजस्व, जो व्यावसायिक प्रकाशनों या प्रसारणों के लिए जीवन जल होते हैं, पाठक-श्रोता‍-दर्शक की संख्या पर निर्भर करता है। व्यापार के दृष्टिकोण से विज्ञापकों के लिए दर्शक जुटाना ही विषय-सामग्री का मुख्य कार्य होता है, भले ही माध्यम कागज़ हो या टेलीविज़न।</p>
<p>पत्रकारों &#8212; जो समाचारों की रपट देते हैं &#8212; को भली प्रकार यह पता रहता है कि अपने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने को उत्सुक व्यापार जगत तथा सत्ता के दलालों पर निर्भर उनके तंत्र में दुरुपयोग की संभावनायें निहित हैं। उनके नैतिक आर्दश की रचना पत्रकारिता के दायित्व के दायरा तय करता और एक स्पष्ट आचार संहिता पेश करता है जिससे समाचारों की ईमानदारी बनी रह सके।</p>
<p>चिट्ठों की, जो अव्यावसायिक लोगों द्वारा सृजित किए जाते हैं, ऐसी कोई संहिता नहीं होती और प्राय: चिट्ठाकारों को व्यक्तिगत रूप से अपने अव्यवसायी स्तर का गुमान रहता है। “हमें किसी फालतू सत्य परीक्षक की दरकार नहीं” यह अवधारणा आम रूप से दिखती है, गोया कि अशुद्धता कोई गुण हो।</p>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है।</div>
<p>मुझे एक मौलिक धारणा प्रस्तावित करने की अनुमती दें: चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। भले ही समाचार स्रोत विज्ञापनदाताओं के प्रति कृतज्ञता रखें तथा रिपोर्टर के लिए भी बेहद ज़रूरी होता हो कि अपने स्रोतों से अच्छे संबंध बनाए रखें ताकि काम चलता रहे; परंतु चुँकि वे भी मूलतः व्यवसाय ही हैं &#8212; जहाँ तनख्वाह देनी होती है, विज्ञापकों को प्रसन्न रखना होता है तथा पाठक-श्रोता-दर्शक को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बनाए रखना होता है &#8212; व्यावसायिक समाचार संगठनों का निहित स्वार्थ होता है कि वे कतिपय मानकों को संभालें रखें जिससे पाठक उनके प्रकाशनों के खरीददार बने रहें और विज्ञापन दाता उन्हें विज्ञापनों से नवाज़ते रहें। केवल न्यूनतम खर्च तथा कोई महत्वपूर्ण व्यवसायिक लाभ की उम्मीद न होने के कारण चिट्ठों के पास ऐसी कोई प्रेरणादायक चीज़ें नहीं होतीं।</p>
<p>वही चीज़ें जो व्यावसायिक समाचार निर्गमों की विश्वसनीयता से समझौता प्रतीत हों, वह किसी स्तर की पत्रकारिता के मापदण्डों के लिए प्रेरणादायक होती हैं। और वही चीज़ें जो चिट्ठों को वैकल्पिक समाचार स्रोत के रूप में इतना महत्वपूर्ण बनाती है, यानि पर्यवेक्षकों की कमी तथा तमाम नतीजों से मुक्ति, उनकी ईमानदारी तथा उनके मूल्यों से समझौता भी कर सकती हैं। इस बात के पूरे चिन्ह दृष्टव्य हैं कि जैसे-जैसे इनकी संख्या में वृद्धि होगी और माध्यम के बारे में जागरूकता फैलेगी चिट्ठे और ज़्यादा असर छोड़ेंगे। यह सही नहीं है, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं कि, जाल (नेटवर्क) ग़लत जानकारियों को फैलाता रहेगा या फिर कि आम जानकारी में सत्य हमेशा ही छन कर बाहर आएगा। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं चूँकि लोगों को उन्हें फैलाने में आनंद आता है। वास्तविक दुनिया हो या ऑनलाइन, भूल-सुधार विरले ही ध्यान आर्कषित करते हैं, उनमें वो मज़ा जो नहीं होता।</p>
<p><img title="Weblog Handbook" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/weblog_handbook.jpg" border="0" alt="Weblog Handbook" hspace="8" vspace="8" width="250" height="307" align="left" />चिट्ठों की दुनिया में नीतिशास्त्र की लगभग कोई चर्चा नहीं है: स्वतन्त्र व्यक्ति को यह बताया जाना कि उन्हें क्या करना चाहिए, खासा नागवार गुजरता है। परंतु मैं छ: नियम प्रस्तावित करूँगी जो मेरे विचार में हर प्रकार के ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए नैतिक आचरण स्थापित करता है<sup><strong>1</strong></sup>। मुझे उम्मीद है कि चिट्ठा समुदाय यहाँ बताए गए नियमों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगा; आने वाले समय में, और अनुभवों के साथ हो सकता है समुदाय नए नियमों को शामिल करने या फिर हमारे मानकों की संहिता बनाने की ज़रूरत महसूस करे। कम से कम मैं यह तो आशा रखती हूँ कि ये सिद्धान्त हमारी जिम्मेदारियों तथा हमारे समग्र व्यवहार के समाज पर प्रभाव के बारे में परिचर्चा की प्रेरणा देंगे।</p>
<p>पत्रकारिता आचार संहिता का उद्देश्य होता है कि समाचार रपटों में सत्य और परिशुद्धता कायम रहे। तुलनात्मक रूप से, यहाँ पर दिया गया प्रत्येक सुझाव चिट्ठाकारी के हर पहलू में पारदर्शिता -‍- जो चिट्ठों के विलक्षण गुणों तथा उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है &#8212; लाएगा। यह उम्मीद करना अवास्तविक होगा कि प्रत्येक चिट्ठाकार संसार की अपक्षपाती छवि सामने रखे, परंतु यह अपेक्षा रखना बहुत ही विवेकी है कि वे अपने स्रोत, पूर्वाग्रह तथा व्यवहार के बारे में स्पष्टता बनाए रखें।</p>
<p>मेरे बेहतर प्रयासों के बावजूद उन चिट्ठाकारों जो अपनी इस खोज में लगे हैं कि उन्हें पत्रकार माना जाना चाहिए को इन नियमों के पालन की अधिक आवश्यकता है। हो सकता है कि समाचार संस्थाएँ किसी दिन किसी चिट्ठे (या किसी चिट्ठा-प्रविष्टि) को विश्वस्त स्रोत के रूप में इंगित करें, परंतु यह तभी होगा जब चिट्ठे समग्र रूप से यह प्रर्दशित करने में सक्षम होंगे कि उनकी जानकारियों के संग्रहण और वितरण में ईमानदारी है तथा उनके ऑनलाइन व्यवहार में अनुरूपता है।</p>
<p>कोई भी चिट्ठाकार जो अपने लिए एक व्यवसायिक पत्रकार की सुविधाएँ और सुरक्षाएँ की उम्मीद रखता है उसे इन सिद्धातों से भी आगे जाना होगा। अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं; अंतत: व्यक्तिगत व्यवसायिकता और मानक आचार संहिताओं का सावधानी पूर्वक अनुसरण ही समाज और क़ानून के सामने उसका स्तर बना पाएगा। शेष सभी के लिए, मुझे विश्वास है, कि निम्न मानक यथेष्ट होंगे:</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">1. सिर्फ उसी चीज़ को वास्तविकता के रूप में प्रकाशित करें जिस की सचाई पर आपको विश्वास हो।</h3>
<p>यदि आपका कथन अनुमान है तो ऐसा स्पष्ट करें। यदि आपके पास ऐसे कारण हैं जिससे आपको विश्वास हो कि कुछ ग़लत है तो या इसे पोस्ट ही न करें या अपने कारणों को दर्ज करें। यदि आप कोई दावा कर रहे हैं तो नेक इरादे से करें; इसे तभी सत्य घोषित करें जब आपकी पूर्ण जानकारी में ऐसा हो।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">2. यदि संदर्भित सामग्री ऑनलाइन मौजूद हो तो उसकी कड़ी भी दें।</h3>
<p>संदर्भित वस्तुओं की कड़ी देने से पाठकों को इस बात की सुविधा मिलती है कि वे आपके कथन की परिशुद्धता तथा परिज्ञान को जाँच सकें। सामग्रियों का संदर्भ देना परंतु कुछ चुनी हुई कड़ियाँ ही देना जिससे आप सहमत होते हैं जोड़ तोड़ करने जैसा होगा। ऑनलाइन पाठकों को, जहाँ तक संभव हो, संपूर्ण सत्य पाने का हक है &#8212; अंर्तजाल के ऐसे इस्तेमाल से, पाठकों को सूचनाओं का निष्क्रिय नहीं, वरन् सूचना का सक्रिय ग्राहक बनने की शक्ति प्रदान करता है। यही नहीं, स्रोत सामग्रियों की कड़ियाँ देना ही वह ज़रिया है जिससे हम जानकारियों तथा ज्ञान का एक विशाल, नई और एकीकृत नेटवर्क बना रहे हैं।</p>
<p>किन्हीं विरले अवसरों पर जब लेखक संदर्भ देना तो चाहता है, परंतु नैतिकता के नाते ट्रैफिक को उन जालस्थलों पर जाने नहीं देना चाहता (उदाहरण के लिए, कोई द्वेष भरा जालस्थल) तो उसे उस जालस्थल का नाम या पता (यू.आर.एल) टंकित करना चाहिए (परंतु लिंक नहीं) तथा अपने इस निर्णय के कारणों का भी खुलासा करना चाहिए। इससे प्रेरित पाठकों को वह आवश्यक जानकारी मिल जाएगी जो जालस्थल को खोजने के लिए उन्हें ज़रूरत है ताकि वे स्वयं अपना निर्णय ले सकें। ऐसी व्यूह रचना लेखक को अपनी पारदर्शिता (और इस प्रकार उसकी ईमानदारी) बनाए रखने की अनुमती तो देता ही है, साथ ही ऐसे प्रयोजनों को समर्थन को अस्वीकृत भी करता है जिसे वह घृणित मानें।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">3. गलत जानकारियों को सार्वजनिक रूप से सुधारें।</h3>
<p>यदि आप को पता चलता है कि आपने किसी ऐसी सामग्री की कड़ी दी है जो कि सही नहीं है तो इसे नोट करें तथा ज़्यादा सही रपट की कड़ी दें। यदि आपका स्वयं का कोई कथन गलत सिद्ध हो जाता है तो अपने गलत कथन तथा सत्य की टीप लिखें। आदर्श परिस्थिति में ऐसे सुधार आपके ताज़ातरीन चिट्ठों में, मूल प्रविष्टि में जोड़े गए टीप के रूप में प्रकाशित होने चाहिएँ। (यह याद रखें कि चिट्ठा प्रविष्टियों को जब एक बार पोस्ट कर दिया जाता हैं, खोज इंजिन उन्हें याद रख लेते हैं तथा चिट्ठे में मौजूद असत्यता को फैलाते रहते हैं भले ही आप कुछ दिनों बाद जानकारी सुधार देते हैं।) यदि आप अपनी पिछली प्रविष्टियों में कोई सुधार नहीं करना चाहते हैं तो कम से कम बाद की प्रविष्टियों में टीप अवश्य डालें।</p>
<p>चिट्ठों में सुधार का एक बहुत ही सुस्पष्ट तरीका बोइंग बोइंग चिट्ठे के अंशदाताओं में से एक, कोरी डॉक्टोरोव अपनाते हैं। वे अपनी लिखी हुई गलतियों को मिटाने के बजाए, वहीं पर काट देते हैं तथा सही जानकारी वहीं पर आगे जोड़ देते हैं। पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि बिल कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है। (एच.टी.एम.एल में इसे ऐसे करें: पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि &lt;strike&gt;बिल&lt;/strike&gt; कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है।)</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">4. प्रत्येक प्रविष्टि को यह मान कर लिखें कि उसे बदला नहीं जा सकेगा; किसी भी प्रविष्टि में भले ही आप कुछ अतिरिक्त जोड़ लें परंतु उसे नए रूप में लिखें या मिटाएँ नहीं।</h3>
<p>चिट्ठों को सोच-समझ कर पोस्ट करें। यदि आप प्रत्येक प्रविष्टि पर दृढ़ता पूर्वक अपना प्रयास व्यय करेंगे, तो आप अपनी व्यक्तिगत तथा पेशेवर ईमानदारी को बनाए रख सकेंगे।</p>
<div id="pullQuoteR">प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है।</div>
<p>प्रविष्टियों में परिवर्तन करना या उन्हें मिटाना जाल की ईमानदारी को नष्ट करता है। अंर्तजाल को इस तरह रुपाकार दिया गया है कि सभी जुड़े रहें; वस्तुत: चिट्ठों की स्थाई कड़ी अन्यों को जुड़ने का आमंत्रण है। कोई भी जो उस दस्तावेज़ पर टिप्पणी करता है या उद्धत करता है, वह उस दस्तावेज़ के अपरिवर्तित स्वरूप पर निर्भर करता है। प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर कहीं भी किसी भी जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है। यदि परिशिष्ट जोड़ना प्रायोगिक नहीं है, जैसे कि कोई निबंध जिसमें ढेरों गलतियाँ हों, तो परिवर्तनों की तारीख तथा परिवर्तन की प्रकृति के संक्षिप्त विवरणों सहित टीप देना चाहिए।</p>
<p>यदि आप समझते हैं कि यह कुछ ज़्यादा ही कर्तव्यनिष्ठता है, तो ज़रा उस लेखक की स्थिति पर विचार करें जो एक ऑनलाइन दस्तावेज़ को किसी निश्चित घोषणा के लिए इंगित करता है। यदि यह दस्तावेज़ परिवर्तित हो जाता है या मिटा दिया जाता है &#8212; और खासकर यदि परिवर्तनों की टीका नहीं दी जाती है &#8212; तो उस लेखक के विचार बेवकुफ़ाना बन जाएंगे। किताबें बदलती नहीं हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख अपरिवर्तनीय होते हैं। कागज पर नए संस्करणों को ऐसे ही बतलाया जाता है।</p>
<p>साझा ज्ञान का जो जाल हम बना रहे हैं वह कभी भी किसी नवीनता से ज्यादा नहीं माने जाएंगे जब तक कि हम अपने प्रकाशनों का स्थायी लेख-प्रमाण तैयार कर इनकी ईमानदारी की सुरक्षा नहीं करते। जाल को लाभ तभी होता है जब ऐसी प्रविष्टियाँ को भी, जो बदलते माहौल में अप्रासंगिक हो जातीं हैं, ऐतिहासिक लेख-प्रमाण मान कर जस का तस छोड़ दिया गया हो। उदाहरणार्थ: एक चिट्ठाकार एक ऑनलाइन आलेख की अशुद्धियों के बारे में शिकायत करता है; लेखक उन अशुद्धियों को सुधार लेता है (तथा उनकी टीप भी दर्ज करता है!); अतः चिट्ठाकार की प्रविष्टि तो अर्थहीन हो गई है &#8212; या कि नहीं? प्रविष्टि को मिटा देने से कुछ ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि वह घटना बस हुई ही नहीं &#8212; जबकि वह घटी है। लेख-प्रमाण ज्यादा शुद्ध होगा और इतिहास की उपयोगिता बेहतर अगर चिट्ठाकार अपनी मूल प्रविष्टि के नीचे यह टीप जोड़ें कि लेखक ने सुधार कर दिए हैं और, चिट्ठाकार के ज्ञान के अनुसार, अब आलेख सही है।</p>
<p>इतिहास को फिर से लिखा जा सकता है, परंतु इसे लौटाया नहीं जा सकता। अंर्तजाल पर शब्दों को बदलना या मिटाना तो संभव है, परंतु संभावना सदैव अच्छी नीति हो यह ज़रूरी नहीं। प्रकाशन से पहले सोच-विचार करें तथा जो भी आप लिखते हैं उस पर कायम रहें। यदि आप बाद में यह निर्णय लेते हैं कि आप किसी विषय पर गलत थे, तो उसकी टीप दर्ज करें और आगे बढ़ें।</p>
<p>मैं यह सुनिश्चित करती हूँ कि मैं ऐसे किसी भी विचार को पोस्ट न करूं जिस पर कायम रहने की चाह न हो, भले ही बाद में उन विचारों से असहमत हो जाऊँ। किसी विषय के बारे में चाहे मैं कितनी भी कूपित या उत्तेजित रहूँ, मैं विचारशील और सधा काम करती हूँ। यदि एकाध दिनों में मेरे विचारों में परिवर्तन होते हैं तो मै बस उन्हें दर्ज कर लेती हूँ। यदि किसी बात पर क्षमा माँगने की आवश्यकता हो, तो वैसा करती हूँ।</p>
<p>यदि आपको बाद में पता चले कि आपने कोई गलत जानकारी पोस्ट कर दी है, तो आप अपने चिट्ठे पर सार्वजनिक रूप से इस बारे में लिखें। गलत लिखी गई प्रविष्टि को मिटा देने से आपके पाठकों द्वारा पहले ही पढ़कर ग्रहण की गई मिथ्या जानकारी को सुधारने का कोई जरिया नहीं होगा। एक अतिरिक्त चरण में मूल प्रविष्टि में सुधार करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि भविष्य में गूगल सही जानकारी प्रसारित करेगा।</p>
<p>इस नियम का एकमात्र अपवाद तब है जब आप असावधानीवश अन्य किसी की व्यक्तिगत जानकारी जाहिर कर देते हैं। यदि आपको पता चलता है कि आपने कोई गोपनीयता भंग की है या किसी परिचित का ज़िक्र कर के उसे परेशान किया है, तो यह उचित ही है कि ऐसी अपमानजनक प्रविष्टियों को पूरी तरह मिटा दिया जाए, पर आप यह लिखें कि आपने ऐसा किया है।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">5. अपने कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स को प्रकट करें।</h3>
<p>अधिकांश चिट्ठाकार अपने कार्य तथा व्यावसायिक इंटरेस्ट्स के प्रति पारदर्शी होते हैं। यह कम्प्यूटर प्रोग्रामर की निपुणता है कि किसी पत्रिका में नवीनतम आपरेटिंग सिस्टम के गुणों के बारे में प्रकाशित आलेख पर उसके द्वारा दिए गए विश्लेषणों को विशिष्ट महत्ता प्राप्त होती है। चूंकि चिट्ठों के पाठक आस्था के बल पर बनते हैं, यह प्रत्येक चिट्ठाकार का कर्तव्य है कि जब भी उचित हो वह आर्थिक (या अन्य विशेष विरोधों को) इंटरेस्ट्स को जाहिर करे। एक उद्यमी को किसी प्रस्तावित संसदीय बिल या व्यापारिक विलयन के प्रभाव के विषय में खास अन्तर्दृष्टि हो सकती है; यदि उसे किसी घटना के फलस्वरूप किसी प्रकार का सीधा लाभ पहुँचने वाला हो, तो उसे अपनी टिप्पणी में ऐसा लिखना चाहिए। किसी सेवा या उत्पाद से प्रभावित चिट्ठाकार को अपने चिट्ठे में उस सेवा की हर अनुसंशा के साथ यह बात बतानी चाहिए कि उस कंपनी के शेयर उसके पास हैं। यदि किसी चिट्ठाकार को समीक्षा/परीक्षण के लिए कोई सीडी प्राप्त होती है तो उसे यह बताना चाहिए; उसके पाठक स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि चिट्ठाकार की अनुकूल समीक्षा उसकी रुचि पर आधारित है या फिर मुफ़्त सीडी प्राप्त करते रहने की इच्छा पर।</p>
<p>अपनी महत्वपूर्ण कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स का तुरंत ज़िक्र करें और फिर जो बताना है वह लिखें; इससे आपके पाठकों के पास आपकी टीका का आकलन करने हेतु सभी आवश्यक जानकारी उपलब्ध होगी।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">6. संदेहास्पद, पूर्वाग्रही स्रोतों की टीप दें।</h3>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि किसी भी पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है।</div>
<p>जब कोई गंभीर आलेख किसी अत्यंत पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत से आता है तो चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि वह उस साइट के स्वरूप की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है। सूचनाओं की तलाश में चिट्ठाकारों को कभी-कभी बहुत ही रोचक, भली प्रकार से लिखे आलेख ऐसे जालस्थलों पर मिल जाते हैं जो बहुत ही पूर्वाग्रही संगठनों द्वारा या कट्टर व्यक्तियों द्वारा चलाए जाते हैं। पाठकों को यह जानने का अधिकार है कि एक आलेख जो प्रथम तिमाही में किए गए गर्भपात के चिकित्सकीय दुष्परिणामों को बताता है वह किसी जीवन का पक्षधर (प्रो-लाइफ), चुनाव का पक्षधर (प्रो-चॉइस) या हर तरह के चिकित्सकीय मध्यस्थताओं का विरोध करने वाले जालस्थल से आया है। इसराईली फिलस्तीनी संघर्ष पर विचारपूर्वक किया गया योग पढ़ने के लायक होगा भले ही वह फिलस्तीनी मुक्ति संघटन के किसी सदस्य द्वारा या किसी यहूदी आन्दोलनकारी द्वारा लिखा गया हो &#8212; परंतु पाठक को अधिकार है कि उसे स्रोत के बारे में पता चले।</p>
<p>यह मान लेना न्यायोचित है कि चतुर भ्रमणशील पाठक के पास इन स्रोतों के स्वभाव के आकलन के पर्याप्त ज्ञान और प्रेरक कारण हैं; परंतु सभी पाठक ऐसा कर पाने में सक्षम हों ऐसा मानना विवेकपूर्ण नहीं होगा। पाठक, कुछ हद तक, अंर्तजाल पर भ्रमण करने के लिए मार्गदर्शन हेतु चिट्ठों पर निर्भर होते हैं। थोड़े मनचले या अति गंभीर एजेंडे वाले स्रोतों से आलेख प्रस्तुत कर देने में बुराई नहीं है; परंतु ऐसे स्रोतों के स्वभाव के बारे में नहीं बताना अनैतिक होगा चूँकि पाठकों के पास ऐसी जानकारी नहीं होती जिससे कि वे आलेख की योग्यता का मूल्यांकन कर सकें।</p>
<p>यदि आप शंकाग्रस्त हैं कि आपके पाठक इसके सन्दर्भ के आधार पर आलेख को पूरी तरह नकार देंगे तो फिर सोचिए कि आप इसकी कड़ी दे ही क्यों रहे हैं। यदि आलेख की योग्यता के विषय में आपको दृढ़ विश्वास है, तो कारण बताएँ और यह बात आलेख को स्वयं साबित करने दें, लेकिन इसके स्रोत के बारे में स्पस्ट रूप से बताएँ। यदि उन्हें एक बार भी यह पता चल जाए कि आपने आलेख का स्रोत छिपाया है &#8212; या स्पष्ट नहीं किया &#8212; जिसके सभी तथ्यों के प्रकाश में संभवतः वे अलाहदा मूल्यांकन करते, आपके पाठक हमेशा के लिए आप पर से भरोसा खो देंगे।</p>
<p><em><a name="1"></a>1: बिन्दु 1 तथा बिन्दु 5 के लिए मैं डेव विनर की आभारी हूँ स्क्रिप्टिंग न्यूज पर <a href="http://scriptingnews.userland.com/backissues/2002/02/04#integrity">वेबलॉगिंग के संदर्भ में ईमानदारी</a> पर उनकी चर्चा के लिए। हालांकि हमारे विचारों में बहुत ज्यादा भिन्नताएँ हैं, इस विषय में उनकी धारणाएँ मेरे स्वयं के विचारों के लिए पंख प्रदान करती हैं।</em></p>
<p class="note">रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक <a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/ASIN/073820756X/ref=nosim/rebeccaspocke-20">द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग</a> से, स्वत्वाधिकार 2002, सर्वाधिकार सुरक्षित; हिन्दी रुपांतरण रेबेका ब्लड की पुर्वानुमति से प्रकाशित। <strong>अनुवादः <a href="http://raviratlami.blogspot.com/">रविशंकर श्रीवास्तव</a> एवं <a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष चक्रवर्ती</a>। प्रस्तुत पुस्तकांश का बिना पुर्वानुमति अंर्तजाल अथवा पुस्तक रूप में पुनः प्रकाशन नहीं किया जा सकता।</strong> रेबेका की पुस्तक की प्रति जीतने के लिए इसी अंक में <a href="http://www.nirantar.org/0305/samasya-purti">समस्या पूर्ति</a> स्तंभ की प्रतियोगिता में भाग लें।</p>
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