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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; वातायन</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>व्यतीत</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-kahani</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-kahani#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:35:19 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ वीणा  सिन्हा</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Calcutta]]></category>

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		<description><![CDATA[संस्कृतियों, लिबासों और भाषाओं के कॉकटेल कलकत्ता में नीता के सामने श्यामल है, उसका वर्तमान। श्यामल पहली बार आया है यहाँ, पर नीता का व्यतीत अतीत उसे साल रहा है। वह कलकत्ता को भूल जाना चाहती है। वातायन में पढ़िये 1963 में मनोरमा पत्रिका में प्रकाशित <strong>वीणा सिन्हा</strong> की स्त्री के अंतर्दंद्व पर लिखी कहानी जो आज भी सामयिक लगती है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><center><img hspace="3" height="296" width="490" vspace="4" border="0" align="top" title="Kolkata" alt="Kolkata" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/kolkata.jpg" /></center></p>
<div class=dropCap>नी</div>
<p>ता, जो व्यतीत है, दोहराई जा रही है रात और दिन में। श्यामल उसके लिये एक सीमा है जिसके बाद सब गैर और अनैतिक है। दक्षिणेश्वर, बेलूर, काली माँ का मंदिर, विक्टोरिया मेमोरियल, ज़ू और म्यूज़ियम में इतिहास जीवित है। श्यामल इतिहास के पृष्ठों से गुज़र रहा है। नीता इन जगहों की धूल में अपना इतिहास खोज रही है जो श्यामल से पहले बीत गया है, जहाँ नीता अव्यतीत है। </p>
<p> अतीत के पत्थर पर खुदी दो मूर्तियाँ &#8211; पुरुष और नारी &#8211; जो मिलते मिलते जड़ हो गये सदा सदा के लिये। बारिश से नहाई सड़क पर तेज़ी से फ़िसलती हुई अनगिनत गाड़ियाँ, व्यस्त चेहरों का प्रवाह, झिझका हुआ अँधेरा, बेशुमार जलते हुये लट्टुओं की हँसी, सब हल्की फ़ुहारों से गीले। और नीता, सड़क के धुँधले आईने में इनकी भागती हुई प्रतिछाया देखती है। यह सड़क जो समय के जंगल से गुजरती आ रही है, अतीत के पहाड़ को काटती हुई वर्तमान के समतल मैदान में। &nbsp;</p>
<p> वक्त नक्शा बदल देता है, फ़ंडामेन्टल्स हर हालत में जीवित रहते हैं, जो शाश्वत हैं &#8211; स्थान और काल सभ्यता और संस्कृति से बिलकुल अछूते &#8211; एक कुँवारी लड़की की तरह। कुछ ख्यालों, व्यक्तियों और घटनाओं में वक्त कैद हो जाता है। नीता आज अपने मन के द्वार पर किन्ही बिसरे हुये ख्यालों की दस्तक सुन रही है जो एक व्यक्ति और अनेक घटनाओं को जगा गई है। अनेक घटनाएँ और अनेक ख्याल जिसमें एक व्यक्ति जीवित है, ऊँची इमारतों को चूमने वाली किरणों की तरह और उस पर नृत्य करती हुई हवा की तरह। </p>
<div id='pullQuoteR'>शहर जी रहा है, गीत से स्पंदित है, पल भर का विश्राम नहीं। किसी शहर को देखने और समझने के लिये पैदल चलना आवश्यक है कि आँखें थक जायें। टैक्सी से भागते हुये शहर को न हम आँखों से पकड़ सकते हैं न मन से।</div>
<p>शहर जी रहा है, गीत से स्पंदित है, पल भर का विश्राम नहीं। श्यामल गति को पकड़ रहा है। नीता पीछे छूट जाती है। वह मुड़ मुड़ कर गुज़रे वक्त के पास रह जाती है। लाल पीले, हरे नीले रिबनों की तितलियाँ, जीन्स, स्कर्ट, शलवार, दुपट्टों और साड़ियों की इन्द्रधनुषी रंगिनियों की परेड, सागर और घटाओं को मिलाने वाला संगीत, झरती हुई बूँदों की सिम्फ़नी और आत्म विस्मृति का अनंत सागर जो उन दोनों पर लहरा रहा है। चीनी, ईरानी, इंग्लिश और भारतीय होटलों और रेस्त्रांओं में विभिन्न संस्कृतियों, लिबासों और भाषाओं का कॉकटेल, यह कलकत्ता है, एक कॉस्मोपोलिटन शहर, जहाँ संस्कृतियाँ एक दूसरे को छूती हैं, टकराती हैं और एक दूसरे पर असर डालती हैं। </p>
<p> अब वे दोनों चौरंगी के सायादार फ़ुटपाथ पर चल रहे हैं। नीता बेहद थक गई है। श्यामल ताज़ा और चुस्त हैं। उसका कहना है, &quot;किसी शहर को देखने और समझने के लिये पैदल चलना आवश्यक है कि आँखें थक जायें। टैक्सी से भागते हुये शहर को न हम आँखों से पकड़ सकते हैं न मन से।&quot;</p>
<p> नीता की नज़र श्यामल पर है। श्यामल के घुँघराले बालों में बारिश की बून्दें मरकरी की उजली रौशनी में मोतियों सी चमक रही है। सस्ते बैगों, कंघियों, फ़ाउन्टेन पेनों और व्यवहार में आने वाली ऐसी अन्य छोटी चीज़ों के ढेर फ़ुटपाथ के दोनों बगल लगे हैं। बड़े बड़े फ़ूलों के स्कर्ट में एक जान्डिस सी पीली लड़की श्यामल को घेर रही है। उसके हाथ में फ़ाउन्टेनपेनों से भरा एक थैला है। इस हुजूम में कौन किसके साथ चल रहा है, समझना मुश्किल है। या तो सब साथ हैं या सब अकेले। श्यामल को उसने अकेला समझा है। वह श्यामल के हाथ में एक पेन थमा देती है। वह बहुत धीरे धीरे कुछ अँग्रेज़ी और बांगला में कुछ कह रही है जो शायद पेनों की बात नहीं है। नीता कुछ आगे श्यामल के लिये ठहरी है। वह उस लड़की को समझने की कोशिश कर रही है। लिबास और भाषा से नहीं जाना जा सकता कि वह किस देश की है, चेहरा भी शुद्ध मंगोल नहीं है। देश चाहे कोई भी हो पर भूख है जो काल और देश को नहीं बाँधती। श्यामल मुस्कुराता हुआ नीता के पास लौट आता है। </p>
<p> &quot;नीता, पेन बेचने वाली लड़्की को देख रही हो न? पोशाक और बोलचाल से कितनी सभ्य लग रही है। मैंने बड़ी मुश्किल से पिंड छुड़ाया है। वह एक गलत तरह की लड़की है&quot;। </p>
<p> &quot;आपने पेन खरीदा?&quot;</p>
<p> &quot;वह पेन कहाँ बेच रही थी। उसका व्यापार पेनों का नहीं शरीर का है। वह चंद सिक्कों पर बिक सकती है किसी भी अदना चीज़ की तरह। वह मेरे या किसी के भी अकेलेपन को दूर कर सकती है, एक रात के लिये ही सही।&quot;</p>
<p> ग्रैन्ड होटल आ गया था। वे दोनो&zwj; वहाँ ठहरे हैं। बड़ा सा डाईनिंग हॉल, सुर्ख गुलगुला गलीचा, पीतल के चंद गमलों में कैद बहार, हर मेज़ पर सर उठाये सफ़ेद नैपकिनों के बगूले। प्लेटों और चम्मचों, काँटों और छुरियों की ऑरकेस्ट्रा के बीच डूबे हुये नीता और श्यामल और युनिफ़ॉर्म में मुस्तैद बओरे जो हर क्षण हुक्म की तामीली को प्रस्तुत हैं। </p>
<p> नीता का ध्यान खाने में कम है। उसकी निगाह हर मेज़ को छू रही है। एक मेज़ अभी खाली है। वह उस लड़की का इंतज़ार कर रही है जिसको वह लगातार तीन दिनों से देख रही है, जिसके गालों पर सुर्ख गुलाब की आभा रहती है और जिसकी ऐंठी हुई पिपनियों पर हँसी डोलती रहती है, जिसकी हर अदा अनमनी नज़रों को भी ठहरा लेती है और जिसके साथ कीमती सूट और बो में एक स्मार्ट लड़का रहता है। शायद उनका एन्गेज़मेंट हो गया है, शायद कोर्टशिप का स्टेज हो। खाने में तल्लीन श्यामल नीता को भला लगता है बिलकुल शिशु की तरह सरल और निश्छल। वह उसे माँ की ममता से देखती है। </p>
<p> खाना समाप्त कर वे दोनों उठ रहे हैं। वह लड़की आ रही है, रुक रुक कर चलती हवा की तरह। लड़का आज उसके साथ नहीं है। आज उसकी अदा में बिजली की चपलता नहीं है। चेहरे पर डूबती हुई शाम की खामोशी है और उजड़े हुये बाग की वीरानी। ठहरी हुई हवा की तरह वह कुर्सी पर स्थिर हो जाती है। नीता और श्यामल अपने कमरे में वापस आ जाते हैं। उस लड़की की उदासी नीता को छू गई है। उसे अजय की याद आती है और उस बंगालन लड़की की, जो अब आम रास्ते की तरह है जिस पर जो चाहे गुज़र जाये बेझिझक। ग्रैन्ड होटल, ये कमरा, नीता पर श्यामल नहीं अजय, दो साल पहले का कलकत्ता। अतीत दुहराया जा रहा है वर्तमान में। अजय के साथ वह दक्षिणेश्वर गई थी। अजय ने कहा था, &quot;नीता, कलकत्ता मैं कई बार आया हूँ, दक्षिणेश्वर देखने की साध लेकर लौट जाता रहा हूँ। दक्षिणेश्वर देखने की चाह जैसे युग युग से मेरे अन्तर्मन में उमड़ती रही है, आज शायद तुम्हारे पुण्य से यह इच्छा पूरी हो सकी है।&quot;</p>
<p> नीता पुलकित थी। आज मन मोरनी की तरह नृत्यमगन था। अजय परमहंस के कमरे के सामने भाव मग्न आत्मविभोर खड़े थे। नीता देख रही थी, पल भर के सन्यास से प्रभावित अजय को। </p>
<p> नीता को महसूस हुआ, प्रेम, सपने और अभिलाषायें विराग से धुलती जा रही हैं, और अजय पत्थर की मूर्ति की तरह जड़ थे। सिर्फ़ आँखों में गति थी, आँखें जो भक्ति सागर में तैर रही थीं। नीता को एहसास हुआ, अजय दूर बहुत दूर चले गये हैं और वह बिलकुल असहाय और अकेली रह गई है। </p>
<p> नीता ने दो एक बार उन्हें पुकारा पर वे ख्यालों की घाटी में इस तरह खो गये थे जैसे बाह्य दुनिया से संबंध के हर तार फ़्यूज़ हो गये हों। एक मुग्ध भाव उनकी आँखों में तैर रहा रहा था। नीता ने फ़िर उन्हें लगभग झँझोड दिया तो उन्हे चेतना हुई। चौंक कर बोले, &quot;नीता मेरा तो जी चाहता है कि यहीं इस पवित्र धरती पर, जिंदगी के शेष दिन गुज़ार दूँ। कितनी मोहक और रमणीक जगह है, गंगा के पावन तीर पर दक्षिणेश्वर, एक पूर्ण विकसित कमल की तरह और उस तीर पर चन्दन की मीठी खुशबू की तरह बिखरा हुआ बेलूर मठ!&quot;</p>
<div id='pullQuoteR'>अजय सोचता रहा, क्या था परमहंस में? जिन्होंने अनगिनत पुरुष नारियों के सर झुका दिये अपने कदमों में। और नीता सोच रही थी, परमहंस की पत्नी शारदा देवी की बात जो अपने पति के सन्यास को खुशी खुशी झेल गई।</div>
<p>नीता को कुछ अच्छा नहीं लग रहा था। वह बेमन ही बारह शिवों के बीच एक ग्रह की तरह परिक्रमा करती रही और हर शिव में उसे एक ही चेहरा नज़र आ रहा था, अजय का। वे दोनों कुछ देर गंगा तीर पर बैठे रहे। फ़ूल, सिंदूर, बेल पत्र, धूप और चंदन के गंध से आच्छादित वातावरण और श्रद्धा से नतमस्तक अनगिनत पुरुष नारियाँ। अजय सोचता रहा, क्या था परमहंस में? जिन्होंने अनगिनत पुरुष नारियों के सर झुका दिये अपने कदमों में। और नीता सोच रही थी, परमहंस की पत्नी शारदा देवी की बात जो अपने पति के सन्यास को खुशी खुशी झेल गई। नीता अजय के साथ बेलूर और दक्षिणेश्वर में बिखरे छोटे बड़े मंदिरों में घूमती रही। </p>
<p> उस शाम जब नीता और अजय होटल वापस आये तो नीता बहुत थक गई थी अपने मन से। उसे बराबर यही लगता रहा कि अजय अपने आप में खूब उत्फुल्ल है और नीता से उनका कोई लगाव नहीं है। नीता की उदासी अजय की प्रसन्नता के वाटरप्रूफ पर फिसल फिसल जा रही थी। वे कमल के पत्ते की तरह अप्रभावित थे। कपड़ा बदलने से बिस्तर पर आने तक की क्रियाओं में वे बराबर रामकृष्ण के एक प्रिय भजन को गुनगुनाते रहे ..&quot;मन चल निज निकेतन&quot;। नीता कटी हुई शाख की तरह बिस्तरे पर गिर गई। अजय ने नीता को बड़े प्यार से अपनी बाँहों में बाँध लिया। </p>
<p> &quot;आज मैं बहुत खुश हूँ। जानती हो नीता, दक्षिणेश्वर में मैंने अपने लिये क्या माँगा है, क्या कामना की है?&quot;</p>
<p> &quot;सन्यास की कामना की होगी&quot;</p>
<p> &quot;धत! तुम बिलकुल नहीं समझ सकीं। मैंने तुम्हे माँगा है। तुम कहती हो न नीता, कि छिपकर कलकत्ता आना, फिर पति पत्नी की हैसियत से होटल में ठहरना। तरह तरह के बहाने और झूठी बातें अंतरमन को मान्य नहीं होतीं। पर एक बड़े सत्य की रक्षा के लिये अनगिनत झूठ क्षम्य हैं। मैंने तो यही जाना है। क्या यह सच नहीं कि हम दोनों एक दूसरे को संसार की किसी भी चीज़ से बढ़ कर प्यार करते हैं? नीता, तुमने भी कोई वर शिव से माँगा? मैं तो ऐसा भाव विह्वल हो गया था कि एक क्षण के लिये सबकुछ भूल गया। सच कहता हूँ, तुम्हें भी भूल गया था।&quot;</p>
<p> &quot;जानती हूँ। आपका वह एक क्षण मेरे लिये अनगिनत सदियाँ थीं जिनमें मैं असहाय, अकेली भटक रही थी। आप ही मेरे शिव हैं। मेरा अंतर्मन क्या आपसे छिपा है।&quot;</p>
<p> अजय नीता की प्यार भरी बातों को सुनते रहे अमर संगीत की तरह और देखते रहे मुग्ध होकर ताजमहल की तरह। </p>
<p> &quot;लेकिन नीता, मैंने जान लिया है कि मेरे मन के किसी कोने में सन्यास छिपा बैठा है जो एक दिन मेरे भोगी और लोभी मन को जीत सकेगा। एक ऊँचाई पर भोग और योग के बीच की विभाजक रेखा मिट जाती है और दोनों एकाकार हो जाते हैं सम्पूर्ण में। कोणार्क के मंदिर पर पुरुष नारी के सम्भोग के अनगिनत आसन धर्म की नज़र में अश्लील नहीं हैं। धर्म की ऊँचाई पर नैतिक अनैतिक के भेद का अंत हो जाता है। अंतर सिर्फ देखने का है। </p>
<p> &quot;तुम पर मुझे अगाध विश्वास है नीता। एक राज़ जो मेरे सीने में नज़रबंद है उसे तुम तक पहुँचा देना चाहता हूँ। मुझे भरोसा है कि तुम मुझे हर रूप, हर स्थिति में इसी तरह प्यार करती रहोगी।&quot; </p>
<p> और अजय अपने अतीत के बखिया को उधेड़ने लगे&#8230;..</p>
<p> &quot;तब मैं कोई अठारह उन्नीस साल का रहा होउँगा। पढ़ाई के सिलसिले में मैं एक बंगाली परिवार में पेईंग गेस्ट होकर रहने लगा। सारा परिवार मुझ पर खास तौर से मेहरबान था। मकान मालकिन की कई लड़कियाँ थीं। सभी ने लवमैरिज किया था। एक मँझली लड़की को छोड़कर जो पता नहीं अब तक क्यों अविवाहित थी। शायद उसे कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिला था। वह एक अत्यंत भावुक किस्म की, चुप सी लड़की थी जिसका दिल शीशे की तरह नाज़ुक और कमज़ोर था। उसकी बड़ी बड़ी आँखों में एक अजीब सी उदासी थिरकती थी। उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में दो आँखें ही महत्त्वपूर्ण थीं, जिन्होंने मुझे सबसे अधिक आकर्षित किया। धीरे धीरे वह मुझसे खुलती गई और मैंने उसके तन मन के सारे बँधन खोल दिये। तुम्हें अपनी समस्त चेतना से छू कर कहता हूँ कि नीता, न तब मुझे उससे प्यार था न अब। महज एक उत्सुकता थी आविष्कार की। पता नहीं उसने किस भरोसे पर अपना सब कुछ लुट जाने दिया था। शायद वह उस बँधन का इंतज़ार कर रही थी जिसमें मैं बँध पाता।&quot;</p>
<p> &quot;और एक दिन उसने बतलाया कि वह माँ बनने वाली है। मैं घबरा गया। दरअसल अंजाम मैंने सोचा ही न था। उसे मैंने किसी डॉक्टर से सलाह लेने की बात समझाई पर वह उसके लिये एकदम राजी न थी। पूरी रात को वह आँसुओं से भिगोती रही। वह जो चाहती थी उसके लिये मेरे मन में हिम्मत न थी। बात उसके परिवार पर खुल गई। उसके पिता डरा धमका कर मुझे शादी के लिये बाध्य करना चाहते थे। पर उस आत्माभिमानी ने सबको चुप करा दिया। मैंने उन लोगों का घर छोड़ दिया। कुछ दिनों के बाद मुझे मालूम हुआ कि उसके पिता ने उसको भी घर से निकाल दिया है। अब वह कलकत्ते के टेलीफोन एक्सचेंज़ में काम करती है और अपना तथा अपने बच्चे की परवरिश करती है। मुझे उससे सहानुभूति थी। मैं अपनी भूल महसूस करता था। इसलिये कई बार मैंने रुपये पैसों से मदद करनी चाही थी पर हर बार उसने मनीऑर्डर लौटा दिया। कुछ दिन पहले सुना अब उसने इज़्ज़त की नौकरी छोड़ दी है और किसी न किसी मालदार व्यक्ति के साथ घूमा करती है। अब मेरे मन में उसके लिये घृणा के सिवा कुछ नहीं है, सिर्फ उस लड़के की बात सोचता हूँ। उसके प्रति एक अजब खिंचाव का एहसास मुझे होता है। वह जो किसी को अपना पिता नहीं पुकार सकता, करीब दस साल का होगा। उसे देखने की इच्छा कभी कभी प्रबल हो उठती है पर मैं उस इच्छा को कुचल देता हूँ।&quot;</p>
<div id='pullQuoteR'>नीता सँभल न गई होती तो उसके इर्दगिर्द पड़ी बाँहों के नाग उसे डँस लेते। रामकृष्ण से प्रभावित होने की बात, सुहाने सपने और अनगिनत वायदे सब हवा महल की तरह विलीन हो गये। अजय के चेहरे पर एक नकाब था जो उतर गया। वह मामूली कमज़ोर पुरुष ही थे जो वासना की ज्वाला में अपने सिद्धांत, अपने आदर्श होम कर देता है।</div>
<p>नीता अजय की बाँहों के घेरे से मुक्त हो गई। उसे ऐसा लगा था कि उस घेरे में उसका दम घुट जायेगा। वह ठीक समय पर सँभल नहीं गई होती तो उसके इर्दगिर्द पड़ी बाँहों के नाग उसे डँस लेते और वह उस ज़हर में तड़पती रहती सारा जीवन। सन्यास की बात, रामकृष्ण से प्रभावित होने की बात, सुहाने सपने और अनगिनत वायदे सब हवा महल की तरह विलीन हो गये। उसे लगा कि अजय के चेहरे पर एक नकाब था जो उतर गया। अजय जो नीता को असाधारण लगते थे और जिनको वह प्रेम से ज़्यादा श्रद्धा और इज़्ज़त करती थी ..अब नीता की नज़र में किसी भी मामूली कमज़ोर पुरुष की तरह थे जो वासना की ज्वाला में अपने सिद्धांत, अपने आदर्श होम कर देता है। </p>
<p> सारी रात नीता तनी रही, अजय उसे झुकाते रहे ..पर नीता थी कि टूट सकती थी, झुक नहीं सकती थी। </p>
<p> &quot;नीता क्या तुम मुझे मेरे दोषों के साथ स्वीकार नहीं कर सकतीं? प्रेम जीवन में एक बार किया जाता है और वह मैंने तुमसे किया है, विश्वास करो। वह लड़की तुम्हें मिले तो पूछना कि क्या मैंने उसे कभी प्रेम का आश्वासन दिया था? धोखा मैंने उसे दिया नहीं और न मैंने उससे कोई वायदा ही किया।&quot;</p>
<p> नीता खामोश थी। उसे लग रहा था वो नीता नहीं है, बंगालन लड़की है और ये सारी बातें अजय उससे ही कह रहा हो। उसे अजय से कुछ कहना नहीं था। </p>
<p> &quot;नीता क्या मेरे सन्यास का वक्त आ गया है?&quot;</p>
<p> नीता ने सोचा ये सारी बातें न जाने कितनी बार, कितनों के सामने की गई होंगी और आगे कही जायेंगी। दूसरी सुबह वह कलकत्ता से अकेली ही लौट आई थी। </p>
<p> दो साल बाद फिर कलकत्ता आई है श्यामल के साथ। श्यामल पहली बार आया है और नीता जो एक बार कलकत्ता देख चुकी है उस कलकत्ता को भूल जाना चाहती है। </p>
<p> खिड़की के शीशे पर बून्दों का नृत्य खत्म हो चुका है। घटायें जो आखिरी बून्द तक बरस चुकी हैं&#8230;अब खामोश हैं। श्यामल के हाथ में सिगरेट है। नीता जानती है आखिरी कश के बाद श्यामल कुछ कहेगा। और श्यामल ख्यालों के घाटी में भटकती नीता को छेड़ता नहीं। वह धैर्य से इंतज़ार करता है। </p>
<p> &quot;नीता तुम कभी कभी मूडी क्यों हो जाती हो? क्या तुम्हें कलकत्ता आकर्षक नहीं लगा?&quot;</p>
<p> &quot;हाँ श्यामल&quot;, और नीता श्यामल की बाँहों के घेरे में समा गई। इन बाँहों के घेरे में उसे कितनी शांति मिलती है। अब उसे कुछ सोचना नहीं है। व्यतीत को वह स्पर्श नहीं करेगी। आज उसके सामने श्यामल है जो उसका वर्तमान है &#8230;श्यामल जो उसके लिये एक सीमा है जिसके आगे सब गैर और अनैतिक। </p>
<p> &quot;नीता, कल हम कलकत्ता छोड़ देंगे। मैं जानता हूँ कलकत्ता तुम्हें अच्छा नहीं लगा। हम कहीं और चलेंगे।&quot; और प्यार से वह नीता को थपथपाता रहा।</p>
<p> आँधी की तरह एक ख्याल नीता के मन में आता है और उड़ जाता है कि अजय की मंजिल कहीं वही तो न थी। शायद अजय अब तक भटक रहा हो ..भटकता रहेगा ज़िन्दगी भर?</p>
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		</item>
		<item>
		<title>अमृता इमरोज़: रूहानी रिश्तों की बयानी</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-vatayan-samiksha-amrita-imroz#comments</comments>
		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:33:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Amrita Pritam]]></category>
		<category><![CDATA[Imroz]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>उमा त्रिलोक</strong> ने अपनी किताब में इमरोज़ और अमृता की रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को तो खूबसूरती से अभिव्यक्त किया ही है, साथ ही अमृता प्रीतम के जीवन के आखिरी लम्हों को भी अपनी कलम से बख़ूबी बटोरा है। पढ़िये पुस्तक अमृता इमरोज़ की <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> व <strong>रंजना भाटिया</strong> द्वारा समीक्षायें।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="boxR" style="width:225px">
<h2>एक आज़ाद रुह जिस्मानी पिंजरे से निकल, फ़िर आज़ाद हो गई</h2>
<div class="dropCap">उ</div>
<p>मा त्रिलोक की किताब को पढ़ना मुझे सिर्फ़ इसलिए अच्छा नही लगा की यह मेरी सबसे मनपसंद और रुह में बसने वाली कवियित्री अमृता के बारे में लिखी हुई है, यह पुस्तक मेरे लिये इसलिए भी ख़ास है क्योंकि इसको इमरोज़ ने ख़ुद अपने हाथों से हस्ताक्षर करके मुझे दी।  उमा त्रिलोक ने इस किताब में उन पलों को तो जीवंत किया ही है जो इमरोज़ और अमृता की जिंदगी से जुड़े हुए बहुत ख़ास लम्हें हैं, साथ ही उन्होने इस में उन पलों को भी समेट लिया है जो अमृता जी की जीवन के आखिरी लम्हे थे।  उन्होंने उस रूहानी मोहब्बत के जज़्बे को अपनी कलम से बख़ूबी बटोर लिया है।</p>
<div id="pullQuoteR" style="margin-bottom:15px;margin-top:5px;">उमा त्रिलोक के लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं व नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती।</div>
<p>मैंने इस किताब को पढ़ते हुए इसके हर लफ्ज़ को रुह से महसूस किया। उनके लिखे लफ्ज़ अमृता और इमरोज़ की जिंदगी के उस रूहानी प्यार को दिल के करीब ला देते हैं।  उनके लेखन में इमरोज़ की पेंटिंग और अमृता की कविताओं और नॉवल के किरदारों में एक ख़ास रिश्ता जुडा हुआ सा दिखायी देता है&#8230;एक ऐसा प्यार का रिश्ता जिसे समाज की मंजूरी की ज़रुरत नही पड़ती है।</p>
<p>उमा की अमृता से हर भेंट रिश्तों की दुनिया का एक नया सफर होता। इस किताब में अमृता का अपने बच्चों के साथ व इमरोज़ का उनके बच्चों से रिश्ता भी बखूबी बयां किया गया है। उमा उनसे आखरी दिनों में तब मिलीं जब वह अपनी सेहत की वजह से परेशान थीं। ऐसे में उमा, जो एक रेकी हीलर भी हैं, को अमृता  के साथ रहने का मौका मिला। उन्होंने अपने अंतिम दिनों की इमरोज़ के लिए लिखी कविता &#8220;मैं तेनु फेर मिलांगी&#8221; का अंग्रेज़ी अनुवाद करने की बात कही।  उन आखिरी लम्हों में इमरोज़ के भावों को उन्होंने बहुत खूबसूरती से अभिव्यक्त किया है।  उमा ने सही लिखा है कि प्यार में मन कवि हो जाता है। वह कविता को लिखता ही नहीं, कविता को जीता है। शायद तभी उमा के संवेदना जताने पर इमरोज़ कहते हैं कि एक आज़ाद रुह जिस्म के पिंजरे से निकल कर फ़िर से आज़ाद हो गई।</p>
<p>अमृता इमरोज़ के प्यार को रुह से महसूस करने वालों को यह किताब शुरू से अंत तक अपने लफ्जों से बांधे रखती है। और जैसे जैसे हम इस के वर्क पलटते जाते हैं उतने ही उनके लिखे और साथ व्यतीत किए लम्हों को ख़ुद के साथ चलता पाते हैं।</p>
<p class="note"><strong>समीक्षक &#8211; रंजना भाटिया</strong></p>
</div>
<div id="boxL" style="background: #ffffff;">
<p align="center"><img title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-Imroz-Book-Details.jpg" border="0" alt="Amrita Imroz" hspace="2" vspace="2" align="middle" /></p>
</div>
<div class="dropCap">ज</div>
<p>ब-जब भी दो विलक्षण प्रेमियों की बातें लिखी जाती हैं, तो आख्यान में एक अलग तरह का आवेग पाठक के मन में आ ही जाता है। उमा त्रिलोक की संस्मरणात्मक किताब अमृता इमरोज़ भी कुछ ऐसी ही है। इस किताब को पढ़ते हुए पाठक प्रेम और प्यार के दिव्य प्रकाश को अनुभव सा करने लगता है।</p>
<p><img title="Book Review" src="http://www.nirantar.org/images/stories/vaatayan_samiksha.gif" border="0" alt="Book Review" width="135" height="140" align="right" style="margin:20px" />उमा ने अमृता से अपने सान्निध्य के बारे में इस पुस्तक में अति विस्तार से लिखा है &#8211; कैसे उनके मन में अमृता से मिलने की इच्छा हुई, कैसे वे उनसे पहली दफ़ा मिलीं, और फिर कैसे उनसे नियमित, निरंतर मिलते रहने का सिलसिला शुरू हुआ। पुस्तक में उन्होंने अमृता &#8211; इमरोज़ के प्यार, उनके सरल, सुलझे व्यक्तित्व का तरतीबवार वर्णन किया है। एक अंश -</p>
<blockquote><p>एक बार मैंने इमरोज़ जी से पूछा, “आप जानते थे कि अमृता जी साहिर को प्यार करती थीं और फिर साजिद पर भी स्नेह रखती थीं। आपको कैसा लगता था?”</p>
<p>मेरे इस सवाल पर इमरोज़ जोर से हँसे और बोले, “मैं तुम्हें एक बात बताता हूँ। एक बार अमृता ने मुझसे कहा कि अगर वह साहिर को पा लेतीं तो मैं उसे नहीं मिलता। तुम्हें मालूम है, मैंने क्या कहा? मैंने कहा, ‘तुम मुझे तो जरूर ही मिलतीं, चाहे मुझे तुम्हें साहिर के घर से निकालकर ही क्यों न लाना पड़ता।’ जब हम किसी को प्यार करते हैं तो रास्ते की मुश्किलों को नहीं गिनते।” थोड़ी देर बाद कुछ सोचते हुए उन्होंने अपने अनोखे अंदाज में हौले से कहा, “तुम्हें पता है, जब मैं मुम्बई जा रहा था तब मुझे ही अमृता ने अपनी किताब साहिर को देने के लिए दी थी और मैं खुशी खुशी ले गया था”</p>
<p>फिर कुछ ठहरकर, कुछ सोचते हुए इमरोज़ ने कहा, “मुझे मालूम था अमृता साहिर को कितना चाहती थी, लेकिन मुझे यह भी बख़ूबी मालूम था कि मैं अमृता को कितना चाहता था।” <em>(पृष्ठ &#8211; 43)</em></p></blockquote>
<p>अमृता-इमरोज के बीच उनके डिवाइन लव यानी ईश्वरीय प्रेम के वर्णन को बहुत ही सहज ढंग से बयान करने में उमा सफल रही हैं। उन्होंने काफी सारा वक्त अमृता इमरोज़ के साथ बिताया है और उन पलों को बड़ी खूबसूरती से, बड़ी बारीकी से वर्णन किया है।</p>
<p><img title="Amrita Imroz" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/Amrita-and-Imroz.jpg" border="0" alt="Amrita Imroz" style="align:left;margin:15px;"  align="left"/>कहीं कहीं उमा एकल-बयानी करती भी दिखाई देती हैं। मैं अमृता जी से ऐसे मिली, मैं अमृता जी को इस तरह ले कर गई, एक दिन जब मैं अमृता के यहाँ थी&#8230;इत्यादि। अमृता इमरोज के बारे में इतना ज्यादा लिखा और छापा जा चुका है कि उनके जीवन का कोई पहलू पाठकों से अनछुआ सा नहीं रह गया है। वैसे भी अमृता-इमरोज ने बिंदास, पारदर्शी जीवन जिया है। लेखिका यहाँ पर सिर्फ अपने एकपक्षीय अनुभवों को बयान करती दीखती हैं। हाँ, उन्होंने अमृता-इमरोज के साथ अपने संस्मरण, उनसे बातचीत, उनके विचारों को भी पर्याप्त स्थान दिया है।</p>
<p>पुस्तक की भाषा सरल, पठनीय है। परंतु भाषा प्रवाह व कथ्य पाठकों को बाँध रखने में सक्षम प्रतीत नहीं होता। छोटे छोटे ढेरों अध्याय से पठन में निरंतरता नहीं बन पाती। संस्मरण लिखते समय अमृता का विशाल व्यक्तित्व लेखिका पर हावी रहा है और वे अपनी भाषा में से अमृता के प्रति आदरसूचक प्रतीकों को जरा ज्यादा ही प्रयोग करती दिखाई देती हैं जो त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है। अमृता के प्रति आदरभाव को नकारा नहीं जा सकता, मगर जब बात संस्मरण लिखने की आती हो तो ‘थर्ड पर्सन’ रूप में लिखा गया पाठ निःसंदेह ज्यादा सहज रहता है।</p>
<p>कुल मिलाकर किताब अमृता के प्रशंसकों के लिए संग्रहणीय है। 120 रुपए मूल्य की 130 पृष्ठों की किताब की साज सज्जा, प्रस्तुतिकरण आकर्षक है।</p>
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		<title>मैं बोरिशाइल्ला :  भीड़ से अलग</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:30:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Bangladesh]]></category>

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		<description><![CDATA[बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित &#34;मैं बोरिशाइल्ला&#34; <strong>महुआ माजी</strong> का पहला उपन्यास है जो चर्चित भी हुआ और सम्मानित भी। <strong>रवि </strong>कहते हैं&#160; कि थोड़ा बोझिल होने के बावजूद यह अलग सा उपन्यास अपने प्रामाणिक विवरण के कारण बांग्ला जनजीवन को जानने समझने वाले और इतिहास में रुचि रखने वाले लोगों को दिलचस्प लगेगा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">म</div>
<p>हुआ माजी का उपन्यास &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221; बांग्लादेश की मुक्ति-गाथा पर केंद्रित है। महुआ माजी ने इस उपन्यास को कई वर्षों के शोध उपरांत लिखा है और प्रामाणिक इतिहास लिखा है। यह उपन्यास बहुत ही कम समय में खासा चर्चित हुआ है और इस कृति को सम्मानित भी किया गया है। इस उपन्यास के अजीब से नाम के बारे में स्पष्टीकरण देती हुई महुआ, उपन्यास के अपने प्राक्कथन में कहती हैं -</p>
<div id="boxR" style="width:150px">
<h2>समर्थ उपस्थिति</h2>
<p><strong>महुआ माजी</strong> द्वारा बांग्‍लादेश के मुक्ति संग्राम की पृष्‍ठभूमि पर 2006 में लिखा &#8220;मैं बोरिशाइल्ला&#8221;, उनका पहला ही उपन्‍यास है पर इससे उन्होंने साहित्य संसार में समर्थ रूप से अपनी उपस्थिति दर्ज की। महुआ समाजशास्‍त्र में पीएचडी हैं। उनकी लिखी अनेक कहानियां विभिन्‍न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। &#8220;मैं बोरिशाइल्‍ला&#8221; को पाठकों और समीक्षकों की काफी प्रशंसा मिलने के बाद इसके अंग्रेजी और बांग्ला में अनिवादित किये जाने की खबरें हैं। महुआ को 2007 में इस उपन्यास के लिये अंतर्राष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान से भी सम्मानित किया गया।</div>
<blockquote><p>“&#8230;जिस तरह बिहार के लोगों को बिहारी तथा भारत के लोगों को भारतीय कहा जाता है, उसी प्रकार बोरिशाल के लोगों को यहाँ की आंचलिक भाषा में बोरिशाइल्ला कहा जाता है। उपन्यास का मुख्य पात्र केष्टो, बोरिशाल का है। इसीलिए वह कह सकता है &#8211; मैं बोरिशाइल्ला।”</p></blockquote>
<p><img class="alignleft" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mahua Maji" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mahua_maji.jpg" border="0" alt="Mahua Maji" hspace="5" vspace="5" width="151" height="168" align="middle" />जैसा कि उपन्यास के द्वितीय शीर्षक पृष्ठ पर अंकित है &#8211; यह उपन्यास बांग्लादेश के अभ्युदय की महागाथा है। 1948 से लेकर 1971 तक के ऐतिहासिक तथ्यों, पाकिस्तानी हुकूमत द्वारा बांग्लादेशी जनता पर किए अत्याचारों की घटनाओं तथा मुक्तिवाहिनी के संघर्ष गाथाओं को महुआ माजी ने इस उपन्यास के कथा सूत्र में पिरोया है। एक बानगी देखें -</p>
<blockquote><p>&#8220;&#8230;इसी तरह एक बार मैं सब्जियाँ खरीदने बाजार गया। एक सब्जीवाला शिमला मिर्च, जिसे वहां के लोग बोम्बाइया लौंका कहा करते थे, बेच रहा था। मुझे देखकर सब्जीवाले ने जोर से आवाज दी, &#8220;बोम्बाइया लौंका ले जाइए बाबू।&#8221; बाज़ार में घूमते एक सैनिक के कानों तक जैसे ही बोम्बाइया यानी बम्बइया शब्द पहुँचा, उसने सब्जी वाले की पीठ पर एक भरपूर बेंत मारी और चिल्लाते हुए कहा, &#8220;इंडिया से मिर्च मंगाता है? यहां पाकिस्तान में पैदा नहीं कर सकता?&#8221;</p></blockquote>
<blockquote><p>&#8230; अयूबशाही शासनकाल में भारत की मुहर लगी हुई कोई भी चीज रखना जुर्म माना जाता था। सैनिक घर-घर की तलाशी लेते थे। एक दिन जब हमारे घर में सेना के जवान भारतीय सामानों की जांच करने घुस आए तब मेरी मां को उनके अत्याचार के डर से भारत से मंगाई गई अपनी सिन्दूर की डिबिया को, यह जानते हुए भी कि सुहागन के लिए सिन्दूर पानी में फेंकना अपशगुन होता है, मजबूरन उठाकर खिड़की से बाहर फेंकना पड़ा था&#8230;इस बीच अयूब खान ने यह फरमान जारी कर दिया था कि पाकिस्तान के हर घर में उनकी तस्वीर टाँगना अनिवार्य है। जांच के दौरान जिनके घर में उनकी तस्वीर टंगी हुई नहीं मिलती थी, कड़ी सज़ा दी जाती&#8230;” (पृ 141-142)</p></blockquote>
<p><img class="alignright" style="margin: 20px; border: 0pt none;" title="Mei Borishailla" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/mei-borishailla.jpg" border="0" alt="Mei Borishailla" hspace="5" vspace="5" width="237" height="358" align="left" />जैसा कि ऊपर दिए उद्धरण में स्पष्ट है, उपन्यास की भाषा अत्यंत साधारण है, और समूचे उपन्यास में कहीं भी कोई भाषाई शिल्प नमूदार नहीं होता। कथन में प्रवाह नहीं है, और उपन्यास घटना-प्रधान होते हुए भी आमतौर पर बोझिल-सा बना रहता है। इसके कई खण्ड घोर अपठनीय ही बने रहते हैं।</p>
<p>कुल मिलाकर उपन्यास पाठक को लगातार बांधे रखने में अक्षम ही रहता है। जाहिर है उपन्यास के ताने-बाने को और कसावदार बुना जा सकता था। दरअसल लेखिका ने मुक्ति संग्राम के दिनों में पाकिस्तानी सैनिकों तथा उर्दूभाषी नागरिकों द्वारा बांग्लाभाषियों पर किए गए अत्याचारों तथा मुक्तिवाहिनी के कार्यों के बहुत प्रामाणिक विवरण देने के लोभ में उपन्यास को बिखरा सा दिया है। घटना प्रधान कथानक में सस्पेंस का सर्वथा अभाव भी आगे पढ़ने में जिज्ञासा बनाए रखने में मदद नहीं करता।</p>
<p>जो भी हो, 400 पृष्ठों की यह किताब बांग्ला जन जीवन को निकट से जानने समझने वाले, बांग्लादेश के इतिहास में रुचि रखने वाले उत्सुक लोगों के लिए निःसंदेह दिलचस्प रहेगी। और, आम हिन्दी उपन्यासों की तर्ज पर यह मात्र विचारों व कल्पना की निपट-बयानी नहीं है। क्योंकि यह पारिवारिक, ग्रामीण जन-जीवन या दलित-विमर्श जैसी कहानी नहीं है संभवतः इसीलिए यह भीड़ से अलग भी है। पाठक अगर हिन्दी उपन्यासों में अगर कुछ नया सा पढ़ना चाहते हैं तो मैं बोरिशाइल्ला अवश्य पढ़ें।</p>
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		<item>
		<title>सफल-असफल बनने की सत्य तथाकथा</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:24:16 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>रवि रतलामी </strong>सफ़ल बनना चाहते थे, महान बनना चाहते थे। और खोजते खोजते उनका हाथ वो नुस्ख़ा लग ही गया जिससे वे महान ही नहीं, महानतम बन गये। तो देर किस बात की? आप भी बन जाइये उन के अनुयायी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="text-align: center"><img title="Vynagya" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-vyangya.jpg" border="0" alt="Vynagya" hspace="3" vspace="3" width="490" height="275" /></div>
<div class="dropCap">जी</div>
<p>वन के चार दशक गुजार लेने के बाद पीछे मुड़कर जब मैंने देखा तो पाया कि मैं सफल तो कतई नहीं कहलाऊंगा। जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के कोई खास झंडे गाड़े हों, जब मुझे दिखाई नहीं दिया तो मैं उदास हो गया। इसी उदासी में मैं टहलने निकल गया। सोचा था इस उदासी को गायों-गोल्लरों, ट्रैफ़िक और धूल भरी सड़कों में उड़ाकर आ जाऊंगा। वैसे भी, ऑटो-टैम्पो और सड़क के दोनों ओर रेहड़ी-खोमचे-ठेलों की भीड़ के बीच यदि आप सकुशल एक दो किलोमीटर की यात्रा बिना ठुके-ठोंके सप्रयत्न कर आएं, तो आपकी उदासी यकीनन कई दिनों के लिए छूमंतर हो जाएगी।</p>
<p>सड़क में एक सांड के सींग से बचने की कोशिश में मैं सीधे एक फेरी वाले के ठेले के ऊपर जा गिरा। वो कुछ सज्जन किस्म का आदमी था जिसने मुझे पलट कर गालियाँ नहीं दीं और मुझे तत्परता से उठाया। मेरी भी सज्जनता कुछ जागी और मैं ठेले पर विक्रय के लिए रखी सामग्रियों को उचटती निगाह से देखने लगा। वो किताब की दुकान थी। तमाम तरह की किताबें विक्रय के लिए उपलब्ध थीं। उन सबमें सबसे ऊपर एक किताब का चमकीला शीर्षक चमक रहा था &#8211; &#8220;उठो महान बनो&#8221;।</p>
<div id="pullQuoteR">जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है।</div>
<p>आह! यही तो मैं खोज रहा था। मैं सफल बनना चाह रहा था, महान बनना चाह रहा था। जरूर इस किताब में महान बनने के सस्ते सुंदर सरल तरीके होंगे। मेरी आंतरिक खुशी जाग उठी। मुझे लगा कि मेरे पास महान बनने का हथियार आ गया है। कांपते हाथों से मैंने उस किताब को उठाया। डरते डरते उसकी कीमत देखी &#8211; कहीं यह हजारों में न हो &#8211; महान बनाने वाली महान किताब कहीं कीमत में भी महान न हो। कीमत से तसल्ली हुई। वो जेब पर बहुत भारी नहीं हो रही थी। मैंने तत्काल उसे खरीद लिया और सीधे घर की ओर वापस लपका।</p>
<p>अब मेरे महान बनने में चंद लमहों की ही देरी थी। किताब का आद्योपांत पाठन करना था। चंद बातों को जीवन में उतारना था और बस हो गया। लौटते समय मेरे कदम जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। कल्पना में मैंने देखा कि मैं महान से महानतम बन गया हूं और तमाम दुनिया के लोग मेरे अनुयायी बन गए हैं और मेरे जयकारे लगा रहे हैं। घर आकर मैंने बीवी की ओर हिकारत भरी नजरों से देखा कि वो हमेशा मुझे मेरी औकात से कम आंका करती है, मेरी असफलताओं पर टोकती रहती है, मेरे निठल्लेपन के ताने कसती रहती है, अब देखना &#8211; तेरा वही निठल्ला पति देखते देखते ही कैसे महान बनता है।</p>
<p>नहा-धोकर, किताब में धूप-बत्ती देकर उसका पारायण प्रारंभ किया। आंखें मुंद रही थीं, सिर भारी हो रहा था, मुँह से उबासी दूर हो नहीं रही थी, मगर मैं किताब पढ़ता रहा। इतनी गंभीरता से तो मैंने अपने बोर्ड के इम्तिहान की पढ़ाई भी नहीं की थी। मगर यहाँ मामला महान बनने का जो था। सो गुंजाइश ही नहीं थी। अठारह घंटे छत्तीस मिनट में किताब एक ही बैठक में आद्योपांत पढ़ गया। इस बीच कोई छब्बीस कप कॉफ़ी के उदरस्थ कर लिए और बीबी के छः ताने और स्मित हास्य के कोई आठ वार भी झेल लिए। किताब को मैंने पूरा पढ़ लिया था। उठो महान बनो। अब मैं उठ सकता था। मैं उठा और सीधे बिस्तरे पर जा गिरा। उसके बाद दो दिनों तक सोता रहा।</p>
<p>उठो महान बनो नाम की किताब पढ़ने के महीनों बीत जाने के बाद भी मुझे मेरी स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं आया। मैंने तो उसमें बताए तौर तरीकों को अपने ऊपर ओढ़ने आजमाने की ईमानदार कोशिश की थी। मगर महानता शायद मुझसे कोसों दूर थी। या इस शब्द से मेरा छत्तीस का आंकड़ा था। मैं फिर से गहन उदासी के दौर में फंस गया था।</p>
<p>मैं एक बार फिर उदासी दूर करने घूमने निकला तो अपने आपको उसी किताब दुकान पर पाया। इस दफ़ा सबसे ऊपर एक किताब चमकती दिखाई दे रही थी &#8211; &#8220;बेस्ट सेलर &#8211; कैसे पाएं सफलता।&#8221; वल्लाह! क्या किताब है। एकदम सही। सही समय पर सही किताब मिली मुझे। मैं अब तक हर क्षेत्र का असफल आदमी सफलता ही तो चाहता था। मुझे लगा कि दुनिया का हर सफल आदमी इस किताब में से होकर निकला है। और अब मेरी बारी है। मैंने अपनी जेब कुछ ढीली की और इस किताब को ले आया।</p>
<div id="pullQuoteR">मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज-ब-रोज, उसी रफ़्तार से, कम होती रहीं।</div>
<p>इस दफ़ा मैंने इस किताब के हर हिस्से को गौर से पढ़ा। ये नहीं कि अखंड-रामायण पाठ की तरह एक बैठक में पढ़ मारा। मैंने नोट्स बनाए, सूत्रों को, वाक्यांशों को रटा। मुझे लगा कि मेरी सफलता में अब बस आठ-दस दिनों की देरी है। मगर सूरज रोज सुबह उगता रहा और चन्द्रमा की कलियाँ रोज ब रोज कम होती रहीं &#8211; उसी रफ़्तार से। उनमें भी कोई परिवर्तन नहीं हुआ और मेरी सफलता में भी बाल बराबर फर्क नजर नहीं आया। मैं फिर निराश हो गया।</p>
<p>निराशाओं के ऐसे दौर आते रहे और मैं अपनी निराशा दूर करने सड़क नापता रहा, सांड के सींग खाता रहा, और किताब दुकान पर गिरता रहा। वहां से अपने आपको बदलने के लिए, सफल होने के लिए, धनी बनने के लिए, स्मार्ट बनने के लिए, सुखी बनने के लिए, व्यवहार कुशल बनने के लिए तमाम किताबें लाता रहा, और पढ़ता रहा। मगर परिस्थितियों को नहीं बदलना था सो नहीं बदलीं। मेरे घर के दरवाजे की दिशा दक्षिण की ओर थी और वो भी वैसी ही बनी रही।</p>
<p>घोर निराशा में मैंने इन सारी किताबों को एकत्र किया और उस दुकान में वापस फेंकने के लिए ले गया। मैंने किताबों का गट्ठर उसके ठेले पर दे मारा। मारे क्रोध के मेरा माथा भन्ना रहा था मैं उसे क्रोध में कुछ बोलता &#8211; कि वो कैसी अनुपयोगी, बेकार, रद्दी अप्रभावी किताबें बेचता है &#8211; सामने एक नई नवेली चमचमाती किताब पर मेरी नजर पड़ी। किताब का नाम था &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जिओ&#8221;। आह! तो ये है अल्टीमेट, अंतिम किताब। मेरा गुस्सा काफूर हो गया। मैंने तत्काल उसे खरीदा और प्रसन्न मन घर वापस आया।</p>
<p>मेरी निराशा दूर हो चुकी है। हमेशा के लिए। ऐसा नहीं है कि मैंने किताब का पाठ कर लिया है और उसे पूरा पढ़ लिया है और उसके उपदेशों को जीवन में उतार लिया है। दरअसल, जब भी मैं उसे पढ़ने के लिए उठाता हूं, और उसका शीर्षक पढ़ता हूँ, मेरी सारी दुश्चिंताएं हवा में विलीन हो जाती हैं। मैं सारी चिंता वहीं छोड़ देता हूं &#8211; उस किताब को पढ़ने की चिंता को भी और मैं सुख से जीने लग जाता हूं। किताब को मैंने अपने इबादतगाह में सबसे ऊपर रख दिया है और इसका शीर्षक ही मुझे रोज-ब-रोज, हर वक्त प्रेरित करता रहता है। यह वो किताब है &#8211; ओह माफ कीजिए, यह किताब का वो शीर्षक है, जिसने मेरे जीवन में सर्वाधिक प्रभाव डाला है। जय हो।</p>
<p>मैं सफल हो गया हूँ। मैं महान हो गया हूँ। मैं धनवान, अरबपति हो गया हूँ &#8211; क्योंकि अब मैं इन बातों के लिए कतई कोई चिंता नहीं करता।</p>
<p>आप बताएं, क्या आप चिंता करते हैं? यदि हाँ, तो मेरी सलाह मानें &#8211; &#8220;चिंता छोड़ो सुख से जियो&#8221; नाम की यह किताब खरीद लाएं। पढ़ने व आत्मसात करने के लिए नहीं, उसकी पूजा करने के लिए &#8211; जैसे कि मैं करता हूं।</p>
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		<title>कितना बोलती हो सुनन्दा!</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jul 2008 13:21:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator>गौरव सोलंकी</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>

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		<description><![CDATA[वातायन के काव्य प्रभाग में पढ़िये युवा कवि <strong>गौरव सोलंकी</strong> की कविता।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>कितना बोलती हो सुनन्दा!<br />
फुदक रही हो सुबह से,<br />
<img hspace="5" vspace="5" border="0" align="right" alt="तुम्हारे पैरों में बँधी हैं गली के लड़कों की सीटियाँ" title="तुम्हारे पैरों में बँधी हैं गली के लड़कों की सीटियाँ" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/sunanda.jpg" /><br />
चाची के घर तक जाती हो तो<br />
लड़ने लगती हैं सीटियाँ,<br />
सब गुत्थमगुत्था,<br />
तुम अनजान,<br />
मुस्कुराकर माँगती हो उड़द की दाल।</p>
<p>कितना बोलती हो सुनन्दा<br />
जैसे नया नया पढ़ना सीखने के दिनों में<br />
बोल बोलकर अख़बार पढ़ती हो,<br />
दिन में तीन वक़्त आता हो अख़बार।<br />
गली में से गुजरते हुए<br />
सब पूछते हैं तुमसे ही पता<br />
शिक्को हलवाई का,<br />
तुम बताती रहती हो<br />
बिजलीघर से बाएँ,<br />
फिर हनुमान मन्दिर,<br />
फिर नाई की दुकान,<br />
सामने शिक्को हलवाई।</p>
<p>खरबूजे के मौसम में<br />
बीकानेरी रसगुल्लों की तरह<br />
हुलसी फिरती हो,<br />
तुम्हारे लहंगे ने बुहार दिया है<br />
सुबह से पूरा घर।<br />
चौके में से चम्मच<br />
चोंच में दबाकर उड़ गया है कौआ,<br />
तुम दीवार पर कुहनी टिकाकर<br />
हँस-हँसकर बता रही हो<br />
कि कौन आने वाला है!</p>
<p>कहाँ से लाती हो<br />
इतनी किलकारियाँ भरते शब्द<br />
कि सब खरीदकर ले आए हैं डिक्शनरी,<br />
बोलती हो तो<br />
तुम्हारे होठों में पड़ते हैं<br />
डिंपलिया गड्ढे,<br />
कितना बोलती हो सुनन्दा<br />
कि मोहल्ले में अफीम बिकनी<br />
बन्द सी हो गई है।</p>
<p><strong>2</strong></p>
<p>चाँद बहुत दूर है,<br />
बसों की भी हड़ताल है,<br />
कोई कब तक पीता रहे<br />
रूखी आशाएँ?<br />
साल भर ही तो बीता है<br />
जब तीज पर<br />
कलाई तक मेंहदी लगे हाथों से<br />
तुम पोंछ दिया करती थी<br />
गाँव भर के माथे की सलवटें।<br />
कहाँ गया वो जादूगर किराएदार<br />
बिना नोटिस के<br />
तुम्हारी आँखें खाली करके,<br />
भड़ भड़ बजते रहते हैं<br />
खाली चौबारे के किवाड़।<br />
बेसुध सी डगमगाती हुई चलती हो<br />
और उस पर भी ठहर जाती हो<br />
फ़िल्मों के पोस्टर देखकर<br />
उदास पानी की तरह।</p>
<p>भला कहाँ करता होगा कोई इतना प्यार<br />
कि बिछुड़ने की सालगिरह पर<br />
सूजी का हलवा बनाते हुए<br />
गर्मजोशी से गुनगुनाता रहे<br />
&#8216;मैं तैनू फेर मिलांगी&#8217;,<br />
ऊपर वाले शेल्फ में<br />
काँच की डिब्बी में रखा रहे<br />
शांत सा पोटेशियम सायनाइड,<br />
जिस पर चिप्पी लगाकर लिखा हो<br />
मीठा सोडा।<br />
श्श्श्श्श&#8230;.</p>
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		<title>नेताजी का ऐतिहासिक भाषण</title>
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		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:52:57 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Bahadurshah Zafar]]></category>
		<category><![CDATA[Bose]]></category>
		<category><![CDATA[Netaji]]></category>

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		<description><![CDATA[1857 में हुई आज़ादी की पहली लड़ाई की 150वीं वर्षगाँठ इस वर्ष देश भर में मनाई जा रही है। इस मौके पर <strong>नेताजी सुभाष चंद्र बोस</strong> द्वारा दिए गए एक दुर्लभ भाषण को हम पहली बार हिन्दी में पेश कर रहे हैं। यह भाषण नेताजी ने सम्राट-कवि बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर हुए आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद और जलसे में 11 जुलाई, 1944 को दिया था। हिन्दी अनुवाद व प्रस्तुतिः <strong>अफ़लातून</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/story-big-subhash.jpg" border="0" alt="" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div style="border: 1px solid #adadad; margin: 5px; padding: 5px; background-color: #ffffff; font-size: 1em; color: black">
<p>1857 में हुई आज़ादी की पहली लड़ाई की 150वीं वर्षगाँठ इस वर्ष (2007) देश भर में मनाई जा रही है। इस मौके पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नेताजी द्वारा प्रथम संग्राम के देशभक्त नायक की स्मृति में दिए गए इस दुर्लभ भाषण को नेताजी के दिल के करीब की ज़ुबाँ में पेश करते हुए हमें खुशी हो रही है। &#8220;राष्ट्रभाषा के नाते काँग्रेस ने हिन्दी (या हिन्दुस्तानी) को अपनाया, इससे अंग्रेजी का महत्व समाप्त हुआ&#8221; &#8211; इस उपलब्धि का श्रेय नेताजी महात्मा गाँधी को देते हैं। यह भाषण नेताजी ने सम्राट-कवि बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर हुए आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद और जलसे में 11 जुलाई, 1944 को दिया था। नेताजी की &#8216;ब्लड बाथ&#8217; नामक पुस्तिका में यह संकलित है। यह पुस्तिका पहले-पहल &#8216;आज़ाद हिन्द सरकार&#8217; के &#8216;प्रेस, प्रकाशन तथा प्रचार विभाग&#8217; द्वारा बर्मा से प्रकाशित हुई थी तथा नेताजी जन्मशती के मौके पर, 1996 में, जयश्री प्रकाशन ( 20 ए प्रिंस गुलाम मोहम्मद रोड, कोलकाता &#8211; 700026) द्वारा पुनर्प्रकाशित की गई है। हिन्दी अनुवाद व प्रस्तुति: अफ़लातून।</p></div>
<div class=dropCap>पि</div>
<p>छले साल सितम्बर महीने में हमने भारत की आज़ादी की पहली जंग और इंकलाब के रहनुमा सम्राट बहादुरशाह की मज़ार पर आनुष्ठनिक कवायद का आयोजन किया था। पिछले साल हुआ जलसा भारत की आज़ादी के लिए हो रहे संघर्ष के लिहाज से ऐतिहासिक था चूँकि आज़ाद हिन्द फौज की टुकड़ियाँ मौजूद थीं और जलसे में उन्होंने शिरकत भी की थी। मैं उस जलसे को ऐतिहासिक क़रार दे रहा हूँ चूँकि वह पहला मौका था जब हिन्द की नई इन्कलाबी फौज द्वारा भारत की पहली इंकलाबी फौज के सेनापति को श्रद्धांजलि दी गई। पिछले साल की कवायद में हम में से जो लोग भी शरीक थे उन लोगों ने सम्राट बहादुरशाह के काम को आगे बढ़ाने और भारत को ब्रिटिश गुलामी के जुए से निजात दिलाने की क़सम ली थी। मुझे इस बात की खुशी और फक्र है कि उस कसम को आंशिक तौर पर पूरा करने में हमें कामयाबी मिली है। पिछले साल के जलसे में मौजूद ज्यादातर सैनिक इस वक्त अग्रिम मोर्चा संभाले हुए हैं। भारत की सरहद को पार कर आज़ाद हिन्द फौज आज मातृभूमि की मिट्टी पर लड़ रही है।</p>
<p>इस साल के आयोजन के साथ यह असाधारण, शायद दैविय संयोग था कि सम्राट बहादुरशाह की पुण्य तिथि और &#8216;नेताजी सप्ताह&#8217; एक साथ पड़े हैं। &#8216;नेताजी सप्ताह&#8217; के दौरान समूचे पूर्वी एशिया में रहने वाले भारतीय भारतीयों ने मुकम्मिल आज़ादी हासिल करने तक अपनी लड़ाई जारी रखने का विधिवत संकल्प लिया है। यह दैविय संकेत है कि आज़ादी के जंग के पहले सेनापति की समाधि का स्थल भारत की आज़ादी की आखिरी जंग का मुख्य केन्द्र है। इसी पवित्र अड्डे से हमारी अपनी मातृभूमि की ओर अग्रसर है। आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद में इसी स्थान पर पुन: जुट कर हम अपने संकल्प की आंशिक पूर्ति की खुशी महसूस करने के साथ-साथ भारत की भूमि को अनचाहे अंग्रेजों से निजात दिलाने तक अनवरत संघर्ष के लिए कमर-कस कर तैयार हो रहे हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">अंग्रेज इतिहासकारों ने 1857 की लड़ाई के बारे में यह दुष्प्रचार कर रखा है कि वह अंग्रेज फौज में सेवारत भारतीय सैनिकों का विद्रोह-मात्र था। हकीकत है कि वह एक कौमी इन्कलाब था जिसमें भारतीय सैनिकों के साथ-साथ नागरिकों ने भी शिरकत की थी।</div>
<p>यहाँ 1857 के घटनाक्रम पर एक नज़र डालना वाजिब होगा। अंग्रेज इतिहासकारों ने 1857 की लड़ाई के बारे में यह दुष्प्रचार कर रखा है कि वह अंग्रेज फौज में सेवारत भारतीय सैनिकों का विद्रोह-मात्र था। हकीकत है कि वह एक कौमी इन्कलाब था जिसमें भारतीय सैनिकों के साथ-साथ नागरिकों ने भी शिरकत की थी। इस राष्ट्रव्यापी जंग में कई राजा शरीक हुए जबकि यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि कई राजा खुद को दरकिनार किए रहे। इस जंग के शुरुआती दौर में कई फतह हुईं, अन्तिम दौर में ही बड़ी ताकत के बल पर हमें पराजित किया गया। किसी क्रान्ति की तवारीख़ में ऐसा होना बिलकुल असामान्य नहीं है। दुनिया के इतिहास में यह मुश्किल से मिलेगा जब क्रान्ति पहले संघर्ष में ही कामयाब हो गयी हो। &#8220;आज़ादी की लड़ाई एक बार आरम्भ होती है तो पुश्त-दर-पुश्त चलती है&#8221;। बवक्तन यदि इंकलाब नाकामयाब भी होता है या दबा दिया जाता है तब भी उसके कुछ सबक हासिल होते हैं। आगे आने वाली पीढ़ियाँ इन सबक को लेकर अपनी लड़ाई ज्यादा असरकारक तरीके से, ज्यादा तैयारी के साथ फिर से खड़ी करती हैं। हम ने 1857 की नाकामयाबी से सबक लिया है और इस तजुर्बे का इस्तेमाल भारत की आज़ादी की इस आखिरी जंग में किया है।</p>
<p>यह सोचना भूल होगी कि 1857 में एक दिन अचानक लोगों ने अंग्रेजों के खिलाफ़ हथियार उठा लिए। कोई भी क्रान्ति जल्दबाजी में या अललटप्पू तरीके से नहीं लायी जाती है। 1857 के हमारे रहनुमाओं ने अपने तईं पूरी तैयारी की थी, लेकिन अफ़सोस कि वह पर्याप्त नहीं थी। उस पवित्र युद्ध के एक प्रमुख नेता नाना साहब ने मदद और सहयोग हासिल करने के मक़सद से युरोप तक की यात्रा की थी। दुर्भाग्यवश उन्हें इस कोशिश में कामयाबी हासिल नहीं हुई और नतीजतन 1857 में जब क्रान्ति शुरु हुई, तब अंग्रेजों का बाकी दुनिया से कोई झगड़ा नहीं था और वे अपनी पूरी ताकत और संसाधन हिन्द के लोगों को कुचलने में लगा सके। मुल्क की भीतर जनता और भारतीय सैनिकों के बीच काबिले गौर होशियारी के साथ गुप्त सन्देश प्रचारित कर दिये गये थे। इस वजह से संकेत होते ही देश के कई हिस्सों में एक साथ लड़ाई शुरु हो सकी। फ़तह पर फ़तह हासिल होती गयी। उत्तर भारत के महत्वपूर्ण शहर अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त हो गये तथा उनमें इन्कलाबी फौज ने जीत का परचम लहराया। अभियान के पहले चरण में हर जगह इन्कलाब को कामयाबी मिली। दूसरे चरण में जब दुश्मन का जवाबी हमला शुरु हुआ तब हमारे सैनिक टिक न सके। तब ही यह पता चला कि क्रान्तिकारियों ने एक राष्ट्रव्यापी रणनीति नहीं बनाई थी तथा उस रणनीति के संचालन और समन्वय के लिए एक गतिमान नेता का अभाव था। देश के कई भागों के राजा निष्क्रीय और उदासीन रहे। बहादुरशाह ने इस बाबत जयपुर, जोधपुर, बिकानेर, अलवर आदि के राजाओं को लिखा :</p>
<blockquote><p>&#8220;मेरी प्रबल आरज़ू है कि अंग्रेज किसी भी कीमत पर, किन्हीं भी उपायों से हिन्दुस्तान से खदेड़ दिए जायें। मेरी उत्कट कामना है कि समूचा हिन्दुस्तान आज़ाद हो। इस उद्देश्य से छेड़ा गए इन्कलाबी युद्ध के माथे पर विजय का सेहरा तब तक बँध नहीं सकता जब तक ऐसा कोई व्यक्ति सामने नहीं आता जो पूरी तहरीक की जिम्मेदारी अपने कन्धों पर ले सके, राष्ट्र की विभिन्न शक्तियों को संगठित कर सके तथा पूरी जनता को इस जागृति के दौरान राह दिखाये। अंग्रेजों को हटाने के बाद भारत पर राज करने की मेरी कोई तमन्ना नहीं है। आप सभी अपनी म्यानों से तलवार खींच कर दुश्मन को भगाने के लिए तैयार हो जायें तब मैं तमाम शाही-हकूक भारतीय राजाओं के संघ के हक़ में छोड़ने के लिए तैयार हूँ।&#8221;</p></blockquote>
<p>यह ख़त बहादुरशाह ने अपने हाथ से लिखा था। देशभक्ति और त्याग की भावना से सराबोर इस पत्र को पढ़कर हर आज़ादी-पसन्द हिन्दुस्तानी का सिर प्रशंसा और अदब से झुक जाएगा।</p>
<p>बहादुरशाह बूढ़े और कमजोर हो चुके थे और इसलिए उन्हें लगा कि खुद इस जंग का संचालन करना उनके बूते के बाहर होगा। उन्होंने छ: सदस्यीय समिति गठित की जिसमें तीन सेनापति और तीन नागरिक-प्रतिनिधि थे। इस समिति को पूरे अभियान को संचालित करने की जिम्मेदारी दी गई। उनके द्वारा किए गए तमाम प्रयास निष्फल रहे क्योंकि भारत की पूर्ण आजादी के लिए परिस्थितियाँ परिपक्व नहीं हुई थीं।</p>
<p>एक और तथ्य इस बुजुर्ग नेता के इन्कलाबी जज़्बे और जोश का द्योतक है। उत्तर प्रदेश के बरेली शहर की दीवारों पर अंकित बहादुरशाह का यह फ़रमान गौरतलब है :</p>
<blockquote><p>&#8221; हमारी इस फौज में छोटे-बड़े का भेद भूलकर बराबरी के आधार को नियम माना जाएगा चूँकि इस पाक जंग में तलवार चलाने वाला हर शक्स समान रूप से प्रतापी है। इसमें शामिल सभी लोग भाई-भाई हैं, उनमें अलग-अलग वर्ग नहीं होंगे। इसलिए मैं अपने सभी हिन्दुस्तानी भाइयों से आह्वान कर रहा हूँ जागो तथा दैवी आदेश और सर्वोच्च दायित्व का निर्वाह करने के लिए रण भूमि में कूद पड़ो। &#8220;</p></blockquote>
<p>मैंने इन तथ्यों का हवाला इसलिए दिया है ताकि आप यह जान सकें कि मौजूदा आज़ाद हिन्द फौज की बुनियाद 1857 में पड़ चुकी थी। आज़ादी की इस आखिरी जंग में हमें 1857 की जंग और उसकी खामियों से सबक लेना होगा।</p>
<p>इस बार दैव-योग हमारे पक्ष में है। शत्रु कई मोर्चों पर जीवन-मृत्यु के संघर्ष में उलझा हुआ है। देश की जनता पूरी तरह जागृत है। आज़ाद हिन्द फौज एक अपराजेय शक्ति है और उसके सभी सदस्य अपने राष्ट्र की मुक्ति के साझा प्रयत्न के लिए एकताबद्ध हैं। पूर्ण विजय हासिल करने तक चलने वाले इस अभियान के लिए हम एक दूरगामी साझा रणनीति से लैस हैं। हमारा आधार-अड्डा अच्छी तरह संगठित है और सबसे महत्वपूर्ण है कि अपना जौहर दिखाने की प्रेरणा के लिए हमारे पास बहादुरशाह की यादें और मिसाल है। अंतिम विजय हमारी होगी इसमें क्या कोई शक रह जाता है?</p>
<div id="pullQuoteR">यदि आप चाहते हैं कि आपके देशवासी अतिमानवीय साहस और शौर्य की ऊँचाइयों को छू सकें तब आपको उन्हें देश के प्रति प्रेम के साथ &#8211; साथ शत्रु से घृणा करना भी सिखाना होगा।</div>
<p>जब मैं 1857 के घटनाक्रम का अध्ययन करता हूँ और क्रान्ति के विफल हो जाने के बाद अंग्रेजों द्वारा ढाये गए जुल्म और सितम को याद करता हूँ तब मेरा खून खौल उठता है। अगर हम मर्द हैं, तब 1857 और उसके बाद के वीरों पर अंग्रेजों द्वारा ढाये गए जुल्म और बर्बरता का पूरा बदला ले कर रहेंगे। अंग्रेजों ने निर्दोष व आज़ादी पसन्द हिन्दुस्तानियों का खून न सिर्फ युद्ध के दौरान बहाया बल्कि उसके बाद भी अमानवीय अत्याचार किए। उन्हें इन अपराधों की कीमत चुकानी होगी। हम भारतीय, शत्रु से पर्याप्त घृणा नहीं करते। यदि आप चाहते हैं कि आपके देशवासी अतिमानवीय साहस और शौर्य की ऊँचाइयों को छू सकें तब आपको उन्हें देश के प्रति प्रेम के साथ &#8211; साथ शत्रु से घृणा करना भी सिखाना होगा।</p>
<p>इसलिए मैं खून माँगता हूँ। शत्रु का खून ही उसके अपराधों का बदला चुका सकता है। किन्तु हम खून तब ही ले सकते हैं जब खून देने के लिए तैयार हों। इस युद्ध में बहने वाला हमारे वीरों का खून ही हमारे किए पापों को धो डालेगा। हमारा आगामी कार्यक्रम खून देने का है। हमारी आजादी की कीमत हमारे वीरों के खून की कीमत है। हमारे वीरों के खून, उनकी बहादुरी और पराक्रम ही भारत की जनता द्वारा ब्रिटिश आतताइयों और जुल्मियों से बदला लेने की माँग पूरा करना सुनिश्चित करेंगे।</p>
<p>वृद्ध बहादुरशाह ने पराजय के बाद इसी पैगम्बरी अन्तर्दृष्टि के साथ कहा था :</p>
<blockquote><p>&#8221; गाजियों में भी रहेगी, जब तलक ईमान की,<br />
तख़्ते लन्दन तक चलेगी, तेग हिन्दुस्तान की। &#8220;</p></blockquote>
<p>जय हिन्द</p>
<p class=note>हिन्दी अनुवाद व प्रस्तुति: <a href="http://samatavadi.wordpress.com">अफ़लातून</a></p>
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		<title>गालिब छुटी शराब : भाग 1</title>
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		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:50:30 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविन्द्र कालिया</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Ghalib]]></category>

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		<description><![CDATA['नया ज्ञानोदय' के संपादक <strong>रविन्द्र कालिया</strong> का नाम परिचय का मोहताज नहीं है। हमें हर्ष है कि अपने संस्मरण &#34;<strong>गालिब छुटी शराब</strong>&#34; को निरंतर में धारावाहिक रूप से प्रकाशित करने की अनुमति दी है। पढ़िये इसका प्रथम भाग। आभारः प्रत्यक्षा व प्रबुद्ध।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/story-big-galib-chhoti-sharab.jpg" border="0" alt=" " width="500" height="300" align="middle" /></p>
<p>गालिब छुटी शराब, पर अब भी कभी कभी</p>
<p>पीता हूँ रोज़े-अब्रो-शबे-माहताब में</p>
<p>१५ अप्रैल १९९७, बैसाखी का पर्व। पिछले चालीस बरसों से बैसाखी मनाता आ रहा था। वैसे तो हर शब बैसाखी की शब होती थी, मगर तेरह अप्रैल को कुछ ज्यादा ही हो जाती थी। दोपहर को बीयर अथवा जिन और शाम को मित्रों के बीच का दौर। मस्ती में कभी कभार भाँगड़ा भी हो जाता और अन्त में किसी पँजाबी ढाबे में भोजन, ड्राईवरों के बीच। जेब ने इजाज़त दी तो किसी पाँच सितारा होटल में सरसों का साग और मकई की रोटी। इस रोज़ दोस्तों के यहाँ भी दावतें कम न हुई होंगी और ममता ने भी व्यंजन पुस्तिका पढ़कर छोले भटूरे कम न बनाये होंगे।</p>
<div id="pullQuoteR">शराबी दो तरह के होते हैं : एक खाते पीते और दूसरे पीते पीते। मैं खाता पीता नहीं पीता पीता शख्स था।</div>
<p>मगर आज की शाम, १९९७ की बैसाखी की शाम कुछ अलग थी। सूरज ढलते ही सागरो मीना मेरे सामने हाज़िर थे। आज दोस्तों का हुजूम भी नहीं था &#8211; सब निमंत्रण टाल गया और खुद भी किसी को आमंत्रित नहीं किया। पिछले साल इलाहाबाद से दस पंद्रह किलोमीटर दूर इलाहाबाद रीवा मार्ग पर बाबा के ढाबे में महफ़िल सजी थी और रात दो बजे घर लौटे थे। आज महौल मे अजीब तरह की दहशत और मनहूसियत थी। जाम बनाने के बजाय मैं मुँह में थर्मामीटर लगाता हूँ। धड़कते दिल से तापमान देखता हूँ वही ९९.३। यह भी भला कोई बुखार हुआ। एक शर्मनाक बुखार। न कम होता है न बढ़ता है। बदन में अजीब तरह की टूटन है। यह शरीर का स्थाई भाव हो गया है, चौबीसों घँटॆ यही आलम रहता है। भूख कब की मर चुकी है, मगर पीने को जी मचलता है। पीने से तनहाई दूर होती है, मनहूसियत से पिंड छूटता है, रगों में जैसे नया खून दौड़ने लगता है। शरीर की टूटन गायब हो जाती है और नस नस में स्फ़ूर्ति आ जाती है। एक लम्बे अरसे से मैंने ज़िंदगी का हर दिन शाम के इंतज़ार में गुज़ारा है, भोजन के इंतज़ार में नहीं। अपनी सुविधा के लिये मैंने एक मुहावरा भी गढ़ लिया था &#8211; शराबी दो तरह के होते हैं : एक खाते पीते और दूसरे पीते पीते। मैं खाता पीता नहीं पीता पीता शख्स था। मगर ज़िंदगी की हकीकत को जुमलों की गोद में नहीं सुलाया जा सकता। वास्तविकता जुमलों से कहीं अधिक वज़नदार होती है। मेरे जुमले भारी होते जा रहे थे और वज़न हल्का। छह फ़ीट का शरीर छप्पन किलो में सिमट कर रह गया था। इसकी जानकारी भी आज सुबह ही मिली थी। दिन में डाक्टर ने पूछा था &#8211; पहले कितना वज़न था ? मैं दिमाग पर ज़ोर डालकर सोचता हूँ, कुछ याद नहीं आता। यकायक मुझे एहसास होता है, मैंने दसियों बरस से अपना वज़न नहीं लिया, कभी ज़रूरत ही महसूस न हुई थी। डॉक्टर की जिज्ञासा से यह बात मेरी समझ में आ रही थी कि छह फ़ुटे शरीर के लिये छप्पन किलो काफ़ी शर्मनाक वज़न है। जब कभी कोई दोस्त मेरे दुबले होते जा रहे बदन की ओर इशारा करता तो मैं टके सा जवाब जड़ देता &#8211; बुढ़ापा आ रहा है।</p>
<p>मैं एक लम्बे अर्से से बीमार नहीं पड़ा था। यह कहना भी गलत न होगा कि मैं बीमार पड़ना भूल चुका था। याद नहीं पड़ रहा था कि कभी सरदर्द की दवा भी ली हो। मेरे तमाम रोगों का निदान दारू थी दवा नहीं। कभी खाट नहीं पकड़ी नहीं थी, वक्त ज़रूरत दोस्तों की तीमारदारी अवश्य की थी। मगर इधर जाने कैसे दिन आ गये थे, जो मुझे देखते मेरे स्वास्थ्य पर टिप्पणी अवश्य कर देता। दोस्त अहबाब यह भी बता रहे थे कि मेरे हाथ काँपने लगे हैं। होम्योपैथी की किताब पढ़कर मैं जैलसीमीयम खाने लगा। अपने डॉक्टर मित्रों के ह्स्तक्षेप से मैं आजिज आ रहा था। डॉक्टर नरेन्द्र खोपरजी और डॉक्टर अभिलाषा चतुर्वेदी जब भी मिलते क्लिनिक पर आने को कहते। मैं हँसकर उनकी बात टाल जाता। वे लोग मेरा अल्ट्रा साउंड करना चाहते थे और इस बात से बहुत चिंतित हो जाते कि मैं भोजन में रुचि नहीं लेता। मैं महीनों डॉक्टर मित्रों के मशवरों को नज़र अंदाज़ करता रहा। उन लोगों ने नया नया डॉप्लर अल्ट्रासाउंड खरीदा था, मेरी भ्रष्ट बुद्धि में ये विचार आता कि ये लोग अपने पचीस तीस लाख के &#8220;डॉप्लर&#8221; का रौब गालिब करना चाहते हैं। बाहर के तमाम डॉक्टर मेरे हमप्याला और हमनिवाला थे। मगर कितने बुरे दिन आ गये थे कि जो भी डॉक्टर मिलता अपने क्लीनिक में आमंत्रित करता। जो पैथोलोजिस्ट था वह लैब में बुला रहा था और जो नर्सिंग होम का मालिक था, वह चेकप के लिये बुला रहा था। डॉक्टरों से मेरा तकरार बरसों तक चलता रहा। लुकाछिपी के इस खेल में मैंने महारथ हासिल कर ली थी। डॉक्टर मित्र आते तो मैं उन्हें अपनी माँ के मुआइने में लगा देता। माँ का रक्तचाप लिया जाता तो वह निहाल हो जातीं कि बेटा उनका कितना ख्याल कर रहा है। बगैर मेरी माँ की खैरियत जाने कोई डॉक्टर मित्र मेरे कमरे की सीढियाँ नहीं चढ़ सकता था। क्या मज़ाल कि मेरा कोई भी मित्र उनका हालचाल लिये बगैर सीढियाँ चढ़ जाय ; वह जिलाधिकारी हो या पुलिस अधीक्षक अथवा आयुक्त। माँ दिनभर हिन्दी में गीता और रामायण पढ़तीं मगर हिन्दी बोल न पाती। वह टूटी फ़ूटी पंजाबी मिश्रित हिन्दी में ही संवाद स्थापित कर लेतीं। धीरे धीरे मेरे हमप्याला हमनिवाला दोस्तों का दायरा इतना वसीह हो गया था कि उसमें वकील भी थे और जज भी। प्रशासनिक अधिकारी थे तो उद्धमी भी, प्रोफ़ेसर थे तो छात्र भी। ये सब दिन ढले के बाद के दोस्त थे। कहा जा सकता है कि पीने पिलाने वाले दोस्तों का एक अच्छा खासा कुनबा बन गया था। शाम को किसी न किसी मित्र का ड्राईवर वाहन लेकर हाज़िर रहता अथवा हमारे ही घर के बाहर वाहनों का ताँता लग जाता। सब दोस्तों से घरेलू रिश्ते कायम हो चुके थे। सुभाष कुमार इलाहाबाद के आयुक्त थे जो इस कुनबे को गिरोह के नाम से पुकारते थे। आज भी फ़ोन करेंगे तो पूछेंगे गिरोह का क्या हालचाल है।</p>
<p>आज बैसाखी का दिन था और बैसाखी की महफ़िल उसूलन हमारे यहाँ ही जमनी चाहिये थी। मगर सुबह सुबह ममता, मन्नू और विपिन त्यागी (जगत भानजा ) घेरघार कर मुझे डॉ.निगम के यहाँ ले जाने में सफ़ल हो गये थे। दिन भर टेस्ट होते रहे थे। खून की जाँच हुई, अल्ट्रासाउंड हुआ, एक्सरे हुआ, गर्ज़ यह कि जितने भी टेस्ट संभव हो सकते थे, सब करा लिये गये। रिपोर्ट वही थी, जिसका खतरा था, यानि लिवर (यकृत) बढ़ गया था। दिमागी तौर पर मैं इस खबर के लिये तैयार था, कोई खास सदमा नहीं लगा।</p>
<p>&#8220;आप कब से पी रहे हैं ?&#8221; डॉक्टर ने तमाम कागज़ात देखने के बाद पूछा।</p>
<p>&#8220;यही कोई चालीस बरस से ?&#8221; मैंने डॉक्टर को बताया, &#8220;पिछले बीस बरस से तो लगभग नियमित रूप से।&#8221;</p>
<p>&#8220;रो़ज़ कितने पेग लेते हैं ?&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">शराब के मामले में मैं किसी का मोहताज नहीं रहना चाहता था, न कभी रहा। इसके लिये मैं कितना भी श्रम कर सकता था। भविष्य में रोटी नहीं अच्छी शराब की चिंता थी।</div>
<p>मैंने कभी इस पर गौर नहीं किया था। इतना ज़रूर याद है कि एक बोतल शुरु में चार पाँच दिन में खाली होती थी, बाद में दोतीन दिन में इधर दो एक दिन में। कम पीने में यकीन नहीं था। कोशिश यही थी कि भविष्य में और अच्छी ब्रांड नसीब हो। शराब के मामले में मैं किसी का मोहताज नहीं रहना चाहता था, न कभी रहा। इसके लिये मैं कितना भी श्रम कर सकता था। भविष्य में रोटी नहीं अच्छी शराब की चिंता थी।</p>
<p>&#8220;आप जीना चाहते हैं तो अपनी आदतें बदलनी होंगी।&#8221; डॉक्टर ने दो टूक शब्दों में आगाह किया,&#8221;ज़िंदगी या मौत में से आपको एक का चुनाव करना होगा।&#8221;</p>
<p>डॉक्टर की बात सुनकर मुझे हँसी आ गई। मूर्ख से मूर्ख आदमी भी ज़िंदगी या मौत में से ज़िंदगी का चुनाव करेगा।</p>
<p>&#8220;आप हँस रहे हैं, जबकि मौत आपके सर मंडरा रही है।&#8221; डॉक्टर को मेरी मुस्कुराहट बहुत नागावार गुज़री।</p>
<p>&#8220;सॉरी डॉक्टर ! मैं अपनी बेबसी पर हँस रहा था। मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि यह दिन भी देखना पड़ेगा।&#8221;</p>
<p>&#8220;आप यकायक पीना छोड़ नहीं पायेंगे। इतने बरसों बाद कोई भी नहीं छोड़ सकता। शाम को एकाध, हद से हद दो पेग ले सकते हैं। डॉक्टर साहब ने बताया कि &#8220;विदड्राअल सिम्पटम्स&#8221; ( मदिरापान न करने से उत्पन्न होने वाले लक्षण) झेल न पाउँगा।</p>
<p>इस वक्त मेरे सामने नयी बोतल रखी थी और कानों में डॉक्टर निगम के शब्द कौंध रहे थे। मुझे जलियाँवाला बाग की खूनी बैसाखी याद आ रही थी। लग रहा था कि रास्ते बन्द हैं सब, कूचा ए कातिल के सिवा। चालीस बरस पहले मैंने अपना वतन छोड़ दिया था और एक यही बैसाखी का दिन होता था जो वतन की याद ताज़ा कर जाता था।</p>
<p>बचपन में ननिहाल में देखी बैसाखी की &#8220;छिंज&#8221; याद आ जाती। चारों तरफ़ उत्सव का महौल, भांगड़ा और नगाड़े। मस्ती के इस आलम में कभी कभार खूनी फ़साद हो जाते,रंजिश में खून तक हो जाते। हम सब लोग हवेली की छत से सारा दृश्य देखते। नीचे उतरने की मनाही थी। अक्सर मामा लोग आँख तरेरते हुये छत पर आ जाते और माँ और मौसी तथा मामियों को भी मुंडेर से हट जाने के लिये कहते। बैसाखी पर जैसे पूरे पंजाब का खून खौल उठता था। जालंधर, हिसार, दिल्ली,मुंबई और इलाहाबाद में मैंने बचपन की ऐसी ही अनेक यादों को सहेज कर रखा हुआ था। आज थर्मामीटर मुझे चिढ़ा रहा था। गिलास, बोतल और बर्फ़ की बकट मेरे सामने जैसे मुर्दा पड़ी थीं।</p>
<p>मैंने सिगरेट सुलगाया और एक झटके से बोतल की सील तोड़ दी।</p>
<p>&#8220;आखिर कितना पियोगे रवीन्द्र कालिय?&#8221; सहसा मेरे भीतर से आवाज़ उठी।</p>
<p>&#8220;बस यही एक या दो पेग&#8221;। मैंने मन ही मन डॉक्टर की बात दोहराई।</p>
<p>&#8220;तुम अपने को धोखा दे रहे हो।&#8221; मैं अपने आप से बातचीत करने लगा।,&#8221; शराब के मामले में तुम निहायत लालची इंसान हो। दूसरे से तीसरे पेग तक पहुँचने में तुम्हें देर न लगेगी। धीरे धीरे वही सिलसिला फ़िर शुरु हो जायेगा।&#8221;</p>
<div id="pullQuoteR">बोतल छूने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। भीतर एक वैराग्य भाव उठ रहा था। वैराग्य, नि:सारता और दहशत का मिला जुला भाव।</div>
<p>मैंने गिलास में बर्फ़ के दो टुकड़े डाल दिये, जबकि बर्फ़ मदिरा ढालने के बाद डाला करता था। बर्फ़ के टुकड़े देर तक गिलास में पिघलते रहे। बोतल छूने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। भीतर एक वैराग्य भाव उठ रहा था। वैराग्य, नि:सारता और दहशत का मिला जुला भाव। कुछ वैसा आभास भी हो रहा था जो भरपेट खाने के बाद भोजन को देख कर होता है। एक तृप्ति का भी एहसास हुआ। क्षण भर के लिये लगा कि अब तक जम कर पी चुका हूँ पंजाबी में जिसे छक कर पीना कहते हैं। आज तक कभी तिशना लब न रहा था। आखिर यह प्यास कब बुझेगी ? जी भर चुका है, फ़कत एक लालच शेष है।</p>
<p>मेरे लिये यह निर्णय की घड़ी थी। नीचे मेरी बूढ़ी माँ थीं,पचासी वर्षीया। जब से पिता का देहांत हुआ था, वह मेरे पास थीं। बड़े भाई कैनेडा में थे और बहन इंग्लैंड में। पिता जीवित थे तो वह उनके साथ दो बार कैनेडा हो आईं थीं। एक बार तो दोनों ने माईग्रेशन ही कर लिया था, मन ही नहीं लगा तो लौट आये। दो एक बरस पहले भाभी भाई तीसरी बार कैनेडा ले जाना चाहते थे, मगर वय को देखकर वीज़ा न मिला।</p>
<p>मेरे नाना की ज्योतिष में गहरी दिलचस्पी थी। माँ के जन्म लेते ही उनकी कुंडली देखकर उन्होंने भविष्यवाणी कर दी थी कि बिटिया लंबी उम्र पायेगी और किसी तीर्थस्थान पर ब्रह्मलीन होगी। हालात जब मुझे प्रयाग ले आये और माँ साथ रहने लगीं तो अक्सर नाना की बात याद कर मन को धुकधुकी होती। पिछले ग्यारह बरसों से माँ मेरे साथ थीं। बहुत स्वाभिमानी थीं और नाज़ुकमिजाज़। आत्मनिर्भर। ज़रा सी बात से रूठ जातीं, बच्चों की तरह। मुझसे ज्यादा उनका संवाद ममता से था। मगर सास बहू का रिश्ता ही ऐसा होता है कि सब कुछ सामान्य होते हुये भी असामान्य हो जाता है। मैं दोनों के बीच संतुलन बनाये रखता। माँ को कोई बात खल जाती तो तुरंत सामान बांधने लगतीं, यह तय करके कि अब शेष जीवन हरिद्वार में बितायेंगी। चलने फ़िरने से मजबूर हो गईं तो मेहरी से कहतीं, मेरे लिये कोई कमरा तलाश दो, अलग रहूँगी, यहां कोई मेरी नहीं सुनता। अचानक मुझे लगा कि अगर मैं न रहा तो इस उम्र में माँ की बहुत फ़जीहत हो जायेगी। वह जब तक जीं, अपने अंदाज़ से जीं ; अंतिम दिन भी स्नान किया और दान पुण्य करती रहीं, यहाँ तक कि डॉक्टर का अंतिम बिल भी वह चुका गयीं, यह भी बता गयीं कि उनके अंतिम संस्कार के लिये पैसा कहाँ रखा है। मुझे स्वस्थ होने की दुआएँ दे गईं और खुद चल बसीं।</p>
<p>गिलास में बर्फ़ के टुकड़े पिघलकर पानी हो गये थे। मुझे अचानक माँ पर बहुत प्यार उमड़ा। मैं गिलास और बोतल का जैसे तिरस्कार करते हुये सीढियाँ उतर गया। माँ लेटी थीं। वह एम.एस.सुब्बलक्ष्मी के स्वर में विष्णु सहस्र्नाम का पाठ सुनते सुनते सो जातीं। कमरे में बहुत धीमे स्वर में विष्णुसहस्र्नाम का पाठ गूँज रहा था और माँ आँखें बंद किये बिस्तर पर लेटी थीं। मैंने उनकी गोद में बच्चों की तरह सिर रख दिया। वह मेरे माथे पर हाथ फ़ेरने लगीं, फ़िर डरते डरते बोलीं, &#8220;किसी भी चीज़ की अति बुरी होती है।&#8221; मैं माँ की बात समझ रहा था कि किस चीज़ की अति बुरी होती है। न उन्होंने बताया न मैंने पूछा। मद्यपान तो दूर, मैंने माँ के सामने कभी सिगरेट तक न पी थी। किसी ने सच ही कहा है कि माँ से पेट नहीं छिपाया जा सकता। मैं माँ की बात का मर्म समझ रहा था, मगर समझ कर भी शाँत था। आज तक मैंने किसी को भी अपने जीवन में हस्तक्षेप करने की छूट नहीं दी थी, मगर माँ आज यह छूट ले रही थीं,और मैं शाँत था। आज मेरा दिमाग सही काम कर रहा था, वरना अब तक मैं भड़क गया होता। मुझे लग रहा था, माँ ठीक ही तो कह रहीं हैं। कितने वर्षों से मैं अपने को छलते आ रहा हूँ। माँ की गोद में लेटे लेटे मैं अपने से सवाल जवाब करने लगा, और कितना पियोगे रवीन्द्र कालिया? यह रोज़ की मयगुसारी एक तमाशा बन कर रह गई है, इसका कोई अंत नही है। अब तक तुम इसे पी रहे थे, अब यह तुम्हें पी रही है।</p>
<p>माँ एकदम खामोश थीं। वह अत्यंत स्नेह से मेरे माथे, मेरे गर्म माथे को सहला रही थीं। मुझे लग रहा था जैसे ज़िंदगी मौत को सहला रही है। (क्रमशः)</p>
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		<title>पिप्पी के मोज़ों में कबाड़ से जुगाड़</title>
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		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:48:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Children]]></category>
		<category><![CDATA[Eklavya]]></category>
		<category><![CDATA[NBT]]></category>
		<category><![CDATA[Toys]]></category>
		<category><![CDATA[Tulika]]></category>

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		<description><![CDATA[पुस्तक समीक्षा में <strong>रवि रतलामी</strong> व <strong>देबाशीष</strong> लाये हैं बच्चों के लिये नायाब पुस्तकें जिनमें शामिल हैं खेल खेल में विज्ञान सिखाने वाली &#34;कबाड़ से जुगाड़&#34; तथा &#34;जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़&#34;, ज्ञानवर्धक पुस्तकें&#160; &#34;खिलौनों का खज़ाना&#34; और &#34;नज़र का फेर&#34; तथा कथा कहानी के शौकीनों के लिये &#34;समंदर और मैं&#34; तथा &#34;पिप्पी लंबेमोज़े&#34;।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>निरंतर की पुस्तक समीक्षा स्तंभ में हम इस अंक की भावना के अंतर्गत कुछ ऐसी नायाब पुस्तकें प्रस्तुत कर रहे हैं जो निश्चित ही भारत की नौनीहाल को समृद्ध करेंगी। यहाँ विभिन्न प्रकाशकों की इन पुस्तकों की समीक्षा नहीं वरन् परिचय दे रहे हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Joy of making Indian toys" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/joy-of-making-indian-toys.jpg" border="0" alt="Joy of making Indian toys" hspace="10" vspace="5" width="182" height="250" align="right" />पहले बात दो ऐसी एक्टीविटी पुस्तकों की जो कम कीमत में, या कहें तो बिना कीमत में, खिलौने बनाना सिखाती हैं, ऐसे खिलौने जिन्हें बच्चे बेफिक्र हो जोड़ व तोड़ सकें। घरेलू खिलौनों द्वारा बच्चों में विज्ञान के प्रसार के लिये इन पुस्तकों के लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कार व ख्याति मिली है। ये खिलौने सामान्य चीजों से बने हैं, पर इस कारण से इन्हें फैक्टरियों में निर्मित महंगे खिलौनों से दोयम न समझें। क्योंकि ये खिलौने प्रयोग और रचनात्मकता की जो भावना जगाते हैं वह अद्वितीय है, साथ ही इनमें से कई विज्ञान के नियमों को सरलता से समझाने में भी काम आ सकते हैं।</p>
<p>भारत में ऐसे खिलौनों के प्रयोग की पुरानी संस्कृति रही हैं पर दुःख की बात है कि महंगे खिलौनों की बहुतायत से ये भुलाये जा रहे हैं। हमारे पारंपरिक खिलौनों से बच्चे स्वयं कुछ करते हुए सीखते हैं &#8211; और इस तरह का उनका अर्जित ज्ञान स्थायी होता है। इन पुस्तकों में दिए गए क्रियाकलापों तथा व्यावहारिक ज्ञान के लिए किसी तरह के खर्चीले साधनों की आवश्यकता नहीं होती और रोज़ाना इस्तेमाल में आने वाली चीजें और आमतौर पर बेकार हो चुकी वस्तुएं जैसे कि बोतलों के ढक्कन, स्ट्रॉ, अख़बारी काग़ज, पैकिंग के पुस्टे इत्यादि की सहायता से ज्ञान-विज्ञान की बातें आसानी से समझाने का प्रयास किया जाता है।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/kabaad-sejugaad.gif" border="0" alt=" " hspace="10" vspace="5" width="193" height="176" align="left" />पहली पुस्तक भोपाल की संस्था <strong>एकलव्य</strong> द्वरा प्रकाशित <strong>कबाड़ से जुगाड़ &#8211; Little Science : विज्ञान के कुछ सस्ते सरल और रोचक खिलौने</strong>। पुणे स्थित<strong> अरविंद गुप्ता </strong>अपने इस प्रयोग के लिये विख्यात हैं। वे बेकार हो चुकी दैनिक प्रयोग की वस्तुओं के जरिए वैज्ञानिक खिलौने बनाने में सिद्धहस्त हैं। इस पुस्तक में चित्रमय विधियों द्वारा ये सिखाया गया है। उदाहरण के लिए इसमें कैमरा फ़िल्म की प्लास्टिक की डिब्बी, प्लास्टिक की थैली, साइकिल की स्पोक, टूटी चप्पल की रबर शीट के टुकड़े तथा रबर या प्लास्टिक के पाइप के जरिए पानी के पम्प बनाने की आसान विधि बताई गई है। इस चित्रमय विधि को पढ़कर बच्चे आसानी से स्वयं ही अपना एक पानी का पम्प बना सकते हैं और जान सकते हैं कि पानी का पम्प आखिर कैसे काम करता है। यह पुस्तक द्विभाषी है &#8211; यानी अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में है जिससे इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। 70 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य है मात्र 20 रुपये (ISBN क्रं 81-87171-03-0, संस्करण 2002, चित्र अविनाश देशपांडे)। ये पुस्तक विद्या आनलाईन पर <a href="http://www.vidyaonline.net/download/LITTLESCIENCE.pdf" target="_blank">पीडीएफ प्रारूप में</a> मुफ्त भी उपलब्ध है।</p>
<p>दूसरी पुस्तक है <strong>नेशनल बुक ट्रस्ट</strong> द्वारा प्रकाशित <strong><em>जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़</em></strong>। इसके लेखक <strong>सुदर्शन खन्ना</strong> नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन, अहमदाबाद में काम करते हैं। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक में 101 हस्तनिर्मित खिलौने हैं जो खेल खेल में विज्ञान भी सिखाते हैं। 125 पृष्ठों की इस पुस्तक की छपाई उम्दा है व चित्र बेहतरीन। इसकी कीमत है 40 रुपये तथा इसे आप नेशनल बुक ट्रस्ट की वेबसाईट से भी <a href="http://www.nbtindia.org.in/BookDetail.asp?Book_ID=2903" target="_blank">खरीद सकते हैं</a> (ISBN क्रं 81-237-2244-3)। नीचे दिये चित्र में आप इसी पुस्तक में दी गई कलाबाज़ कैप्सूल बनाने की विधि पढ़ सकते हैं (विवरण अंग्रेज़ी से अनुवादित है)। पुस्तक का <a href="http://www.nbtindia.org.in/BookDetail.asp?Book_ID=3038" target="_blank">हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध</a> है पर उसकी कीमत 90 रुपये है। हिन्दी अनुवाद अरविंद गुप्ता का ही किया हुआ है।</p>
<hr />
<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none;" title="Acrobat Capsule" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/Acrobat_Capsule.jpg" border="0" alt="Acrobat Capsule" width="490" height="376" align="middle" /></p>
<hr />
<div id="pullQuoteR">खेल खेल में विज्ञान से जुड़ी किताबों के अलावा अरविंद गुप्ता ने ढ़ेरों अन्य पुस्तकों को अंतर्जाल पर मुफ्त उपलब्ध कराया है जिनमें हिन्दी व मराठी पुस्तकें भी शामिल हैं। <a href="http://arvindguptatoys.com/" target="_blank">उन के जालस्थल</a> पर नज़र डालें और उन्हें धन्यवाद कहें।</div>
<p>एकलव्य का एक और प्रकाशन है &#8211; <strong>खिलौनों का खज़ाना Toy Treasures</strong>। इसमें जापानी ओरिगामी विधि से यानी काग़ज के टुकड़ों को काट-जोड़-चिपका कर इत्यादि तरीके से दर्जनों खिलौनों को कैसे बनाना यह बताया गया है। आसान सी उड़ने वाली मछली हो या जटिल बातूनी कौआ &#8211; चित्रों के जरिए इन्हें बनाने का तरीका बड़ी स्पष्टता से समझाया गया है। इसके लेखक भी अरविंद गुप्ता हैं। यह पुस्तक भी हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में छपी है। (ISBN क्रं 81-87171-37-5, पृष्ठ संख्या 36, मूल्य &#8211; रू 20/-, संस्करण 2001) ये पुस्तक <a href="http://www.vidyaonline.net/download/ToyTreasure.pdf" target="_blank">पीडीएफ प्रारूप में </a> मुफ्त भी उपलब्ध है।</p>
<p>केवल 8 रुपए मूल्य की एक और पुस्तक है &#8211; <strong>नज़र का फेर &#8211; दृष्टिभ्रम के खेल</strong>। आओ माथा पच्ची करें श्रेणी की यह आठवीं पुस्तक है। इस छोटी सी पुस्तिका में दृष्टिभ्रम पैदा करने वाले ड्राइंग, रेखांकनों, रेखाचित्रों व कलाकृतियों को समेटा गया है। इनके जरिए बच्चे द्वि-त्रिआयाम के बारे में तो समझते ही हैं, कलाकृति के पर्सपेक्टिव को शीघ्र समझ सकते हैं (ISBN क्रं 81-87171-58-8, पृष्ठ संख्या 20, संस्करण 2004)।</p>
<p>और अंत में बात चैन्नई स्थित<strong> तुलिका प्रकाशन</strong> द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों की।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Samandar Aur Mein" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/samandar-aur-mein.jpg" border="0" alt="Samandar Aur Mein" hspace="10" vspace="5" width="200" height="200" align="right" /><strong>समंदर और मैं</strong> संध्या राव की मूल अंग्रज़ी पुस्तक का बढ़िया हि्न्दी अनुवाद है। ये एक ऐसे लड़के की कहानी है जो दिसंबर 2004 में आये सुनामी से प्रभावित हुआ पर शायद ये ऐसे किसी भी बालक की कहानी हो सकती है को प्रकृति की गोद में पल बढ़ रहा हो। पुस्तक में मनमोहक स्थिर चित्र हैं, रेत शंख और तट रेखा के रंग क्रेयान से मिलकर मानों उस मर्म पर मरहम लगाते हैं जिनका इस त्रासदी में सब कुछ सागर की गर्त में समा गया।</p>
<p>ये कहानी भले गमग़ीन करती है पर अच्छी बात ये है कि पुस्तक का रुख आशावादी और प्रेरणास्पद है। चित्रों से शायद क्रंकीट के जंगलों में रहते बच्चे नौका, पानी, रेत और समंदर के संबंधों को समझ सकें और प्रकृति का सम्मान करना सीखें। पुस्तक की भाषा कई जगह अस्पष्ट है पर छपाई बेहतरीन है। छ वर्ष या ज्यादा उम्र के बच्चों पर केंद्रित ये 24 पृष्ठ के इस पुस्तक की कीमत है 100 रुपये। चिकने कागज़ की छपाई के लिहाज़ से न देखें तो कीमत ज़्यादा तो है। (ISBN क्रं 81-8146-114-2)</p>
<p><a href="http://www.tulikabooks.com/classics.htm#pippi" target="_blank"><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px 10px;" title="Pippi Lambemoje" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/pippi-lambe-moje.jpg" border="0" alt="Pippi Lambemoje" hspace="10" vspace="5" width="154" height="200" align="left" /></a><a href="http://www.tulikabooks.com/classics.htm#pippi" target="_blank"><strong>पिप्पी लंबेमोज़े</strong></a> ऐस्ट्रिड लिंडग्रन की नामचीन स्वीडिश पुस्तक पिप्पी लाँगसट्रम्प का<strong> संध्या राव</strong> द्वारा किया हिन्दी अनुवाद है। ऐस्ट्रिड का भारत के लिये भले नया नाम हों पर उनकी कम ही किताबें हैं जिन पर फिल्म नहीं बनीं। स्वीडन में छोटे बड़े सभी उनकी रचनाओं को पसंद करते रहे हैं। सरल भाषा, उम्दा विचार, हंसी मजाक और गंभीरता, ऐस्ट्रिड के लेखन में ये सभी रंग प्रचुरता से मिलते हैं। वे मानतीं थीं कि वे सिर्फ बच्चों के लिये ही लिखना चाहती हैं क्योंकि सिर्फ बच्चे ही पढ़ते समय चमत्कार कर सकते हैं।</p>
<p>ये पुस्तक ऐस्ट्रिड ने अपनी बीमार बेटी को कहानियाँ सुनाने के लिये लिखी। किताब से न केवल पुराने स्वीडन की संस्कृति का पता चलता है बल्कि ये भी कि पिप्पी बच्ची होने पर भी कितनी स्वतंत्र है। साठ साल पहले लिखी ये किताब आज भी बड़ी सार्थक है, भले ही भारतीय पाठक कई बातों को पचा ना पायें। 50 रुपये की इस किताब में 102 पेज हैं और अनेक सुंदर रेखांकन हैं (ISBN क्रं 81-86895-91-4)।</p>
<table border="0" width="90%" align="center">
<tbody>
<tr>
<td colspan="5" align="center">
<h3>प्रकाशकों से संपर्क की जानकारी</h3>
</td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>एकलव्य</strong><br />
ई-7, एचआईजी 453,<br />
अरेरा कॉलोनी,<br />
भोपाल &#8211; 462016.</td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>नैशनल बुक ट्रस्ट</strong><br />
ए-5, ग्रीन पार्क,<br />
नई दिल्ली &#8211; 110016.<br />
<a href="http://www.nbtindia.org.in" target="_blank">http://www.nbtindia.org.in</a></td>
<td style="width: 5%;"></td>
<td style="width: 30%;" valign="top"><strong>तुलिका पब्लिशर्स</strong><br />
13 पृथ्वी एवैन्यू,<br />
अभिरामपुरम, चैन्नई &#8211; 600018.</p>
<p><a href="http://www.tulikabooks.com" target="_blank">http://www.tulikabooks.com</a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2147&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		</item>
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		<title>लाल परी &#8211; भाग 4</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0507-vatayan-kahani-lalpari</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0507-vatayan-kahani-lalpari#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:45:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>प्रत्यक्षा सिन्हा</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Interactive Story]]></category>

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		<description><![CDATA[वातायन में आप पढ़ रहे हैं <strong>विश्व की पहली इंटरैक्टिव धारावाहिक कथा &#34;लाल परी&#34;</strong>। पिछले तीन भागों में, जैसा आपने चाहा था, नाटकियता थी और अरू और केडी की मस्त चैट। यदि आप पिछले भाग में लेखिका <strong>प्रत्यक्षा </strong>द्वारा लाई अप्रत्याशितता से हैरान थे तो कहानी का ये चौथा और अंतिम भाग शायद आपको बाल नोंचने पर मजबूर कर दे। इस अंक में पढ़िये इस रोचक कथा का पटाक्षेप।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p class=note>(<strong><a target="_blank" title="Lal Pari - Part 3" href="http://www.nirantar.org/1207-vatayan-lalpari">गतांक</a> से जारी</strong>)</p>
<p><img width="240" vspace="5" hspace="5" height="170" border="0" align="right" alt="लाल परी" title="लाल परी" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-redfairy.jpg" />उँगलियाँ अब थक चुकी थीं टाईप करते करते। मैं सीधा लेट गई। अस्पताल में हूँ न। जल्दी थक जाती हूँ। कूल्हे में ऑपरेशन हुआ है। कभी पहले वहाँ एक इंजेक्शन पडा था। वो हिस्सा पहले नर्म हुआ फिर सख्त। फिर दर्द का दायरा बढने लगा। शुरु में आदतन ध्यान नहीं दिया। हम भारतीय स्त्रियाँ हमेशा अपने स्वास्थ्य को नज़रांदाज़ करने वाली। शुतुरमुर्ग। न ध्यान दो तो शायद तकलीफ अपने आप गायब हो जाये। कोई जादू का हमेशा इंतज़ार। पर, न जी। ऐसा कोई जादू नहीं हुआ। उससे क्या? हम ढीठ स्त्रियाँ कभी सीखती हैं भला। कुत्ते की दुम कभी सीधी भी हुई है क्या। वर्षों के संस्कार, दबने कुचलाने के, ऐसा लहू में पेवस्त हो गया है कि अब उसके बिना जी नहीं मानता। क्या कहते हैं उसे जो खुद को पीडा दे। हाँ मेसोचिस्ट। </p>
<p>हाथियों में सुना है कि कोई स्मृति विरसे में आती जाती है अगले पीढियों में, कई कई पीढियों में। कहते हैं न, हाथी जैसी याददाश्त। तो हम स्त्रियाँ भी कोई कम नहीं। हम भी ढोती हैं पीडाओं की स्मृति, चिपका रखती हैं छाती से नन्हे छौने सा, बन्दर का चिपका बच्चा। हाँ तो हम भी उसी कौम से हैं सो करते रहे नज़र अंदाज़। जब तकलीफ हद से बाहर हुई तो पति नाम के जीव को बताया। कुछ दिन और बीत गये। दर्द बढ़कर फुनगी पर टिक गया। कभी जाये ही न। आखिर भरती हो गये अस्पताल में। </p>
<div id='pullQuoteR'>हाथियों में कोई स्मृति विरसे में आती जाती है अगले पीढियों में। हम स्त्रियाँ भी कोई कम नहीं। हम भी ढोती हैं पीडाओं की स्मृति, चिपका रखती हैं छाती से नन्हे छौने सा।</div>
<p>अब यहाँ अकेले हैं। साथ में एक अटेंडेंट, माने दूर की ननद सुमित्रा। चुप्पी सुमित्रा। बिलकुल बोलती नहीं। मेरे ज़रूरत भर का कर के मगन हो जाती है किसी गुलशन नन्दा टाईप किताब में। टोक टोक कर आजिज कर दिया पर वही ढाक के तीन पात। आखिर थकहार कर छोड दिया। अभी तो हफ्ता दस दिन और रहना है। पति दौरे पर हैं। फोन करते रहते हैं। घर पर बूढ़ी झुरझुर सास हैं। पड़ी रहती हैं अपने कमरे में। फूलमणि करती है देखभाल। आदिवासी फूलमणि। गोदने वाली फूलमणि। खिल खिल हँसती है फूलमणि। घर टिका है उसपर। कहाँ कहाँ दिमाग भटकता है मेरा। पर चुप पड़े पड़े भी क्या करूँ। सुमित्रा पढ रही है, सोफे पर अडस कर। कूल्हे में दर्द हो रहा है, बेतरह। घँटी बजाती हूँ। </p>
<p> नर्स आती है मुस्कुराती हुई, &quot;क्या हुआ आँटी? दर्द हो रहा है क्या?&quot;</p>
<p> मुझे ये वाली नर्स अच्छी लगती है। जेसी, केरल की है। मुस्कुराती है बात करती है। यहाँ नर्स का युनिफॉर्म सफेद नहीं है। गुलाबी सफेद धारियों वाला ट्यूनिक और पैंट। </p>
<p>&quot;एक पेनकिलर दे दो जेसी&quot;</p>
<p>&quot;थोडा रुक जाना आँटी। अभी डॉक्टर आयेगा राउंड पर&quot;</p>
<p> चादर ठीक कर देती है। दवाइयों की शीशी तरतीब से सजा देती है। साथ साथ लगातार बात कर रही है। मैं उतनी देर सूरजमुखी के फूल सी खिल जाती हूँ।</p>
<p>घर पर बेटा है। बारहवीं का इम्तहान देगा। </p>
<p> बेटा, मतलब कान फोड संगीत, रेड हॉट चिली पेपर और बैक स्ट्रीट ब्वाय्ज़, धोनी और युवराज के बडे बडे पोस्टर्स, कान में इयरफोन जैसे कान का ही हिस्सा हो, <br />
       बेटा मतलब बेतरतीब कमरा, उलटपुलट कपडे, बिखरी किताबें ढेर की ढेर,<br />
       बेटा मतलब हाय मॉम बॉय मॉम,<br />
       बेटा मतलब बर्गर, पित्ज़ा,फूटलॉंग,<br />
       बेटा मतलब पढाई पढाई और फिर पढाई। </p>
<p>   एक बेटी भी है।     </p>
<p>    बैगलोर में मेडिकल की पढाई,<br />
       हाथ पैर की वैक्सिंग,<br />
       फेशियल और लोरियाल,<br />
       क्लच में फँसे स्ट्रीक्ड बाल,<br />
       कमर पर टैटू,<br />
       नाभी में नथनी,<br />
       पैरों में रंगीन धागे,<br />
       उजला कोट और स्टेथोस्कोप,<br />
       सपने सपने और फिर सपने।</p>
<p> और पति नाम के जीव को कैसे भूला जा सकता है। पति माने फिट फाट पर थोड़े उडते बाल। दौरे और मीटिंग़्स, लगातार फोन &#8211; खाना खाते वक्त, सुबह टहलते वक्त, ओफ़िस जाते वक्त, सुबह के वक्त, शाम के वक्त, रात के वक्त, मुझसे बात करते वक्त, मुझसे प्यार करते वक्त।</p>
<div id='pullQuoteR'>मेरी आँखें चैट खुमार में मुन्दती हैं। कूल्हे का दर्द बुझ जाता है। चेहरे पर दिव्य मुस्कान बिखर जाती है।</div>
<p>और इन सब के बीच टँगी मैं। बीस साला नहीं पचास साला। किटी पार्टी और ब्रिज, रंगे बाल और ढलकती जवानी। कोई दोस्त नहीं कोई यार नहीं पर कहने को ऐश ही ऐश क्योंकि आखिर मालकिन हूँ एक आलीशान मकान की, घूमती हूँ फोर्ड फियेस्टा में, बीबी हूँ एक वीपी की, माँ हूँ दो होनहार बच्चों की। वक्त ही वक्त है मेरे पास पर अरमेना कोई नहीं।</p>
<p>इसलिये, हाँ हाजरीन, इसलिये लिखती हूँ कहानियाँ। पहले लिखती थी रोने धोने की कहानियाँ। अब लिख रही हूँ एक नये ज़माने की मॉडर्न कहानी। इसलिये सीखा है कम्प्यूटर। पति अच्छे हैं। ला दिया है लैपटॉप। तो, भाइयों अरु तो कोई नहीं पर लाल परी मैं ही हूँ। सचमुच चैट करती हूँ ताकि कहानी का मसाला तीखा तेज़ हो। चैट का नशा छा रहा है आजकल। डरती हूँ कहीं पूरी तरह से न डूब जाऊँ इसमें। और ये जो खिर्के, नैना, जतीन वगैरह हैं, न न कोई असल नहीं है। सब पतिदेव के ऑफिस से चुने हुये कैरिकेचर्स हैं। समझ रहे हैं न आप। कैरिकेचर मतलब किसी एक शारिरिक या फिर मानसिक गुण को खींचो रबर की तरह कि शेप बिगड जाये पर इतना भी नहीं कि असल खो जाये कहीं।</p>
<p> तो लालपरी तो मैं हूँ पर कूल ड्यूड कौन है? खिर्के, या जतिन या फिर बग्गा द यूनिवर्सल बाबा, या क्या पता नैना नैनकटारी ही हो या फिर वो जो हैंडसम डॉक्टर आता है रोज़ ग्यारह बजे राउंड पर बिना नागा, हैंडसम तो है पर शायद साईनस से पीडित है, हर वक्त सिनकता सुड़कता रहता है। वो भी तो कूल ड्यूड हो सकता है। मैं लैप टॉप बूट करती हूँ। लॉग इन करती हूँ। मेरी उँगलियाँ की बोर्ड पर फिसल रही हैं। कूल्हे का दर्द जलता बुझता है।</p>
<p>   &quot;हाय लाल परी, मेरी जान कहाँ हो तुम&quot;</p>
<p> मेरी आँखें चैट खुमार में मुन्दती हैं। कूल्हे का दर्द बुझ जाता है। दवाइयों की महक, बैंडेज़ और पस, आईवी की सूई, कैथेटर की जलन, सब विलीन हो जाता है। मेरे चेहरे पर दिव्य मुस्कान बिखर जाती है।</p>
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		<title>जापानी हायकू का उल्लेखनीय भावानुवाद</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Feb 2007 08:08:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अनूप शुक्ला</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Haiku]]></category>

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		<description><![CDATA[जापानी साहित्य की एक प्रमुख विधा हायकू तीन पंक्तियों में लिखी जाने वाली कविता है। कुल सत्रह अक्षरों में पूर्ण अर्थ संप्रेषित करना हायकू की कसौटी होती है। <strong>अनूप शुक्ला</strong> ने हाल ही में श्रीमती <strong>डा.अंजलि देवधर</strong> द्वारा किये मूल जापानी से अंग्रेजी में अनुदित 32 महत्वपूर्ण कवियों की 100 उत्कृष्ट हायकू कविताओं के हिंदी में उल्लेखनीय अनुवाद पढ़ा और काफी प्रभावित हुये।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="width:250px;float:right;padding:10px;margin:10px;background:#E5E5E5">
<h3>डा. अंजलि देवधर के जापानी -अंग्रेजी -हिंदी हायकू अनुवाद से कुछ हायकू</h3>
<p>लड़खड़ाती अनाथ गौरैया,<br />
        आओ और खेलो!<br />
        मैं हमेशा तुम्हारा साथी हूं।<br />
      <strong>  -कोबायासी इस्सा</strong>  </p>
<p>एक स्त्री<br />
        एक टब में नहाती हुई<br />
        एक कौए की चाह बन गई!<br />
      <strong>  -ताकाहामा कियोशी</strong>  </p>
<p>एक मक्खी बैठी<br />
        स्तन पर<br />
        जिसे सोता शिशु भूल गया चूसना।<br />
      <strong>  -हीनो सोजो</strong>  </p>
<p>टिमटिमाती बत्तियां<br />
        जुगनुऒं की<br />
        अल्प आयु की भविष्य-व्यक्ता हैं।<br />
      <strong>  -कावाबाता बोशा</strong>  </p>
<p>एक पतझड़ की सांझ<br />
        एक घंटा विश्राम का<br />
        एक झणिक जीवन में<br />
      <strong>  -योसा बुसान</strong>  </p>
<p>ओस की बूंद<br />
        बैठी एक पत्थर पर<br />
        एक हीरे के समान<br />
      <strong>  -कावाबाता बोशा</strong>  </p>
<p>गौरैया खेल रही<br />
        छुपा-छुपा<br />
        चाय के फूलों के बीच में।<br />
      <strong>  -कोबायाशी ईस्सा</strong>  </p>
<p>एक नया वर्ष आरम्भ हुआ<br />
        खिल जाने से<br />
        एक तुषारायित गुलाब के।<br />
      <strong>  -मिजुहारा शुओशी</strong> </p>
</p></div>
<p>
<div class=dropCap>प्र</div>
<p>त्येक भाषा के साहित्य में देशकाल और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधायें प्रचलित होती रही हैं। जापानी साहित्य की ऐसी ही एक प्रमुख विधा हायकू है। अपने छंद विधान के कारण हायकू विश्व की दूसरी भाषाऒं में भी प्रचलित हो रहे हैं। हिंदी में भी हायकू नव्यतम काव्य विधा के रूप में पर्याप्त लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं। </p>
<p>हायकू को काव्य विधा के रूप में प्रचलित करने का श्रेय जाता है प्रमुख जापानी साहित्यकार मात्सुओ बासो (1644 &#8211; 1694) को। बासो से शुरू होकर हायकू जापनी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ और कालान्तर में विश्व साहित्य की निधि बन चुका है। </p>
<p>हायकू तीन पंक्तियों में 17 अक्षरों में लिखी जाने वाली कविता है। पहली पंक्ति में 5, दूसरी पंक्ति में 7 और तीसरी पंक्ति में पांच अक्षर होते हैं। कुल सत्रह अक्षरों में पूर्ण अर्थ संप्रेषित करना हायकू की कसौटी होती है। इस तरह हायकू गागर में सागर भरने की क्षमता की पहचान का पैमाना होता है। </p>
<p>जापानी कविता में हायकू काव्य में प्रमुखत: प्रक्रति से संबंधित भाव व्यक्त किये जाते रहे। हिंदी में भी हायकू कविता विधा में कवितायें लिखी जा रही हैं। मूल जापानी के हायकू के अनुवाद भी हिंदी में उपलब्ध हो रहे हैं जिसके द्वारा हायकू के बारे में जानकारी मिलती है। </p>
<p>जापानी कविता हायकू का ऐसा ही उल्लेखनीय अनुवाद का कार्य श्रीमती डा.अंजलि देवधर ने किया है। उन्होंने मूल जापानी से अंग्रेजी में अनुदित 32 महत्वपूर्ण कवियों की 100 उत्कृष्ट हायकू कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है। वसन्त, ग्रीष्म, पतझड़, शरद और नववर्ष की इन उत्कृष्ट हायकू कविताऒं का चयन और अंग्रेजी अनुवाद नगोया, जापान के प्रोफेसर युजुरु मियुरा ने किया है।</p>
<p>जापानी से अंग्रेजी में अनुवाद और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद टटल प्रकाशन अमेरिका द्वारा किया गया। </p>
<p>जापानी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने में इन हायकू कविताऒं के 5-7-5 का छ्न्द विधान का निर्वाह नहीं हो पाया भाषा भी थोड़ी क्लिष्ट हो गई लेकिन कविताऒं का भावानुवाद करने का कठिन कार्य करने के लिये डा.अंजलि देवधर करने के लिये बधाई की हकदार हैं। उसके इस कार्य से हिंदी भाषियों की जापानी काव्य विधा हायकू की जानकारी मिलना सम्भव हो सका। </p>
<p>डा. अंजलि देवधर ने अपनी पुस्तक को अपने पति डा.श्रीधर देवधर को आभार स्वरूप अर्पित किया है जिनकी दी धनराशि से यह पुस्तक छपी। उत्कृष्ट हायकू का हिंदी में भावानुवाद प्रस्तुत करके डा.अंजलि देवधर ने उल्लेखनीय काम किया है। </p>
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