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एड्स पर फिल्में : अच्छी शुरुवात छापें ई-मेल
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बेकारअति उत्तम 
इस के लेख़क हैं अविजित मुकुल किशोर   

एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी फिल्म

एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी हिंदी फीचर फिल्मों की गिनती करने के लिये तो हाथों की उँगलियाँ की भी जरुरत नहीं क्योंकि अभी तक केवल दो ही ऐसी फिल्में बनी हैं - ओनीर की "माई ब्रदर निखिल" और रेवथी की "फ़िर मिलेंगे"। इन फिल्मों के ज़िक्र से इस विषय से सम्बंधित तमाम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू आँखों के तैर जाते हैं। इसके अलावा, फिल्म निर्माताओं की विचारपद्धति को समझना भी आवश्यक है - कि वे किसे "दर्शक" कहते हैं और कैसी फिल्में दिखाने लायक समझते हैं।

हमारी फिल्मों में रोग का अक्सर फिल्म की पृष्ठभूमि में प्रयोग किया जाता है।

हमारी फिल्मों में रोग का अक्सर फिल्म की पृष्ठभूमि में प्रयोग किया जाता है। "आनंद" से ले कर "कल हो न हो" तक कैंसर के रोगियों के पात्रों वाली कई फिल्में बनी हैं। इसी तरह "आह" से ले कर "आलाप" तक क्षय रोग पर फिल्में बनी हैं। इन सभी में रोग केवल पात्रों की व्यथा और कहानी में ट्रेजेडी डालने के लिए प्रयोग किया गया है। रोग के विषय, उसके सामाजिक प्रभाव या लोगों को उसके बारे में जागरुक करने के इरादे से कम ही फिल्में बनी हैं।

विदेशी फिल्मों की बात करें तो "फिलाडेल्फिया" जैसी कई फिल्मों ने न केवल एड्स का विषय उठाया वरन कई सामाजिक समस्याओं को भी सामने लाये। "फिलाडेल्फिया" इस विषय पर बनी पहली फिल्मों में से है और इसमें एक एचआईवी-बाधित पुरुष के साथ, संक्रमित और समलैंगिक होने की वजह से, दफ्तर में हुए भेद भाव को दिखाया गया है। फिर ऐसी कई फिल्में जैसे कि "एन्ड द बैंड प्लैड आन" और "लाँगटाईम कम्पैनियन" सामाजिक दायित्व के साथ बनाई गयीं और ये व्यवसायिक दृष्टि से भी सफल रहीं। यह कह पाना मुश्किल है कि फिल्मों की वजह से समाज का रुख बदला या फिर समाज स्वयं इन विषयों पर बात करने को तैयार हो चला था जिससे ये फिल्में सफल हो पायीं। शायद दोनों ही बातों में कुछ न कुछ तथ्य है।

जितने विज्ञापन देखने को आते हैं - शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में - यौन सम्बंध को "अनैतिक सम्बंध" ही कहा जा रहा है!

एचआईवी-एड्स के बारे में बात करना शुरु करें तो बस ऐसी बातें अपना मुँह उठाये बाहर झाँकने लगती हैं जिन्हें समाज अपनी पूरी ताकत से छुपा के रखना चाहता है। एक समय पर भारत सरकार ने कॉण्डोम के विज्ञापन दूरदर्शन और रेडियो पर बंद करवा दिये थे क्योंकि इनसे यौनता को एक मान्यता मिलती थी और उनका मानना था कि इस से "अनैतिकता" फ़ैल सकती है। आज तक इस विषय में जितने विज्ञापन देखने को आते हैं - शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में - यौन सम्बंध को "अनैतिक सम्बंध" ही कहा जा रहा है! कुछ साल पहले हमारे मंत्रियों ने बिल गेट्स की संस्था द्वारा एचआईवी की रोकथाम हेतु पेश की जा रही भारी भरकम रकम को यह कह कर ठुकरा दिया था कि "उनके आँकड़े हमारे यहाँ एचआईवी को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं, हमारे यहाँ ऐसी कोई बड़ी समस्या नहीं है।" भारत में हमने हाल ही में इस सब विषयों पर बात करना शुरु किया है। यौन और सामाजिक नैतिक मूल्य का अधिकतर छत्तीस का आँकड़ा ही रहता है। बॉलीवुड में ये फिल्में बनी और पर्दे पर दिखाई गयीं यह सराहने लायक बात है। "मेरा भाई निखिल" समलैंगिकता के विषय में बात करने वाली संभवतः सबसे पहली फिल्म है (दीपा मेहता की "फायर" को नहीं गिन रहा क्योंकि वह विदेशी प्रोडक्शन था।) कम बजट की यह फिल्म गोआ के एक युवक के जीवन पर आधारित है। इसमें कोई बड़े स्टार नहीं हैं सिवाय जूही चावला के, जिन्होंने मुख्य पात्र निखिल की बहन की भूमिका बहुत खूबसूरती से निभायी है।

हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है।

"फ़िर मिलेंगे" इसकी अपेक्षा एक संपूर्ण मसाला फिल्म है। इसमें सलमान खान, अभिषेक बच्चन और शिल्पा शेट्टी जैसे बड़े सितारे हैं। हालांकि फिल्म में दफ्तर में होने वाले भेदभाव का विषय सीधा "फिलाडेल्फिया" से उठाया गया है पर इसका एक दृश्य बहुत पसंद आया जिसमें शिल्पा शेट्टी अभीनित चरित्र के बॉस अपने वकील से कहते हैं कि उन्हें शिल्पा की काबिलियत पर कोई शक नहीं, पर उसके कुचरित्र से शिकायत है। एचआईवी-एड्स की बात भी यहीं आ कर फँस जाती है। समाज में क्या बात करना उचित समझा जाता है क्या नहीं, इसकी ओर ध्यान देने का समय बहुत पहले ही आ गया था।

इन फिल्मों ने यह विषय उठाया और सिनेमाघरों के माध्यम से समाज तक पहुँचाया, यह प्रशँसनीय बात है। एक और महत्वपूर्ण बात है कि हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है। "समलैंगिक" शब्द कितना खराब लगता है, पर और क्या कहें, इसके समानार्थी के रूप में इस्तेमाल होते शब्द गाली जैसे लगते हैं। इन फिल्मों में भी एचआईवी और यौन से सम्बंधित शब्दों के लिए अधिकतर अँग्रेजी शब्दों का ही प्रयोग किया गया है।


 


अविजित मुकुल किशोर
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