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स्पाउस - शादी का सच: दुहराया वक्तव्य

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रवि रतलामी

  

पेंगुइन इंडिया द्वारा शोभा डे की अंग्रेज़ी पुस्तक ‘स्पाउसस्पाउस’ का हिन्दी अनुवाद अभी हाल ही में प्रकाशित किया गया है। अनुवाद वैसे तो ठीक-ठाक है, परंतु साफ़ झलकता है कि पुस्तक एक ‘अनुवाद’ ही है। 150 रुपयों की पुस्तक को पेंगुइन ने बढ़िया गेटअप और अच्छे, मित्रवत्-पठन प्रारुप में जारी किया है। काग़ज रिसायकल्ड लगता है, मगर है उम्दा श्रेणी का।

रहा सवाल पुस्तक की ‘सामग्री’ का, तो डेल कॉर्नेगी और दीपक चोपड़ा के लिखे व्यक्ति-सुधार वाले पुस्तक जब लाखों में बिक सकते हैं, तो शोभा डे की विवाह-सुधार की पुस्तक क्यों नहीं। शायद यही कारण रहा होगा शोभा डे के पास इस पुस्तक को लिखने का - जिनका अपना खुद का प्रथम विवाह घोर असफल रहा था।

स्पाउस के हर पृष्ठों पर आपको प्रवचन मिलेंगे। अपने प्राक्कथन में ही शोभा डे खुद की कहानी कुछ यूँ लिखती हैं-
“सालों पहले, डे (शोभा की दूसरी शादी के, वर्तमान पति) ने एक बार कहा था कि सलवार-कमीज़ एकदम रसहीन पोशाक है। ‘यह तुम पर कोई असर नहीं छोड़ती,’ एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम के लिए निकलने के कुछ पल पहले उन्होंने इसे ख़ारिज करते हुए कहा। फिर क्या था! मैं तुरंत अपने कमरे में गई और साड़ी पहन आई। उस दिन के बाद मैंने सलवार-कमीज़ नहीं पहनी! हमारे मित्र अजीब बात मानते हैं। वे अकसर इस ‘विरोधाभास’ पर टिप्पणी करते हैं कि वे मुझ जैसी महिला से यह उम्मीद नहीं करते कि मैं पुरुषों की इस पसंद से इत्तफ़ाक रखूं कि उनकी पत्नी को कैसा लगना चाहिए। सच कहूँ तो, उनकी ‘हैरानी’ से मुझे हैरानी होती है! मेरे खयाल से ऐसा करना तो बहुत स्वाभाविक बात है। और इसमें कोई शर्मिंदगी भी नहीं है। अहम की लड़ाइयों को अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों के लिए सहेज कर रखें। एक सलवार-कमीज़ के लिए अपनी शाम बर्बाद न करें।”

ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है - सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के

यह बात तो हर पति-पत्नी को मालूम होती है। परंतु शामें इसी तरह की बहुत सी अन्य छोटी-छोटी बातों से ही बर्बाद होती रहती हैं। रिश्ते किसी किताब में लिखे नियमों व उसमें दर्शाए गए उदाहरणों से नहीं बनते-बिगड़ते। अगर ऐसा होता तो हर विवाह बंधन आदर्श बंधन होता चूँकि इस तरह की सैकड़ों किताबें बाजार में पहले भी बिकती रही हैं। विवाह बंधन के समय ही पति-पत्नी को एक दूसरे के प्रति प्रतिबद्ध और दयालु रहने की कसमें खिलाई जाती हैं। परंतु विवाह टकराव का दूसरा नाम बन जाता है। यही वजह है कि तमाम विश्व में समाज सुधारकों, वैवाहिक-परामर्शदाताओं का धंधा कभी मंदा नहीं पड़ा।

शोभा एक कदम आगे जाकर आपको सीधे-सीधे उपदेश देने लगती हैं। पूरी किताब में ऐसे फूहड़ उपदेशों की भरमार है। कुछ उपदेश आपकी खातिर उद्घृत करते हैं, और कोष्ठक में शोभा से स्पष्टीकरण मांगते हैं -

  • अगर लड़ना ही है, तो कायदे से लड़ें। (कायदा पारिभाषित करेंगी शोभा जी?)
  • झगड़ा साफ़ और उसी मुद्दे पर हो। (झगड़ा गंदा भी होता है, या गंदा ही होता है? झगड़ा साफ़ भी होता है यह तो अब पता चला। चलिए, आपकी दूसरी राय मान लेते हैं कि झगड़ा जब चालू करेंगे तो पुरखों की बातों को फिर शामिल नहीं करेंगे!)
  • मुद्दों को उलझाएँ नहीं। झगड़ा पैसों को लेकर है, तो उसे पैसों पर ही रखें। बच्चों, सास-ससुर, कुत्ते या पड़ोसियों को इसमें न घसीटें। (ऊपर की पंक्ति में दी गई समझाइश अस्पष्टथी अतः यह पंक्ति वैसे भी जरूरी थी!)
  • मन में एक रूपरेखा बना लें और एजेंडे के अनुसार ही चलें। एक झगड़े में उतनी ही बात तय हो सकती है। (आह! क्या बात है। पति-पत्नी का झगड़ा पति-पत्नी का नहीं, भारत-पाकिस्तान का हो गया। योजना बनाओ, प्लान बनाओ, एजेंडा बनाओ फिर झगड़ो। वाह! शोभा जी वाह! क्या बात है। आपकी मौलिक विचारधारा के कायल हो गए हम।)
  • झगड़ा पूरा निबटाएँ - कुछ अनकहा न छोड़ें। कोई नतीजा निकलने तक झगड़ा करें, फिर वह किसी के भी पक्ष में क्यों न हो। (वाह! पति-पत्नी के आपसी रिश्ते सुधारने के लिए एक और मौलिक तरीका। झगड़ा तभी बंद करें जब किसी एक का सिर न फूट जाए या पत्नी मायके न चली जाए या पति पता नहीं क्या कर ले!)
  • अपने झगड़ों की योजना बनाएँ, यह मुश्किल तो है, पर असंभव नहीं। (हा हा हा ... झगड़ों की योजना... सचमुच शोभा जी, आदमी अगर ठान ले तो कुछ भी संभव नहीं। परंतु यहाँ अच्छा होता कि आप अपनी कुछ योजनाओं की रूपरेखा उदाहरण स्वरूप देतीं, तो पाठकों का भला होता। वे दुनिया की एक नई तकनीक, एक नया विषय सीख लेते!)
  • झगड़ों को निजी रखें। सबके बीच झगड़ने से बुरा कुछ नहीं हो सकता।
  • अपने नियम तय कर लें और कभी भी मर्मस्थल पर चोट न करें। (परंतु आपने अभी ऊपर कहा है कि झगड़ा पूरा होते तक, परिणाम मिलते तक करें - यह दुहरी बात क्यों?)
  • जरूरी हो तो रोएँ। आँसुओं को रोकना बेमानी है- किसलिए रोकें? (जरूरी? कैसे पता पड़ेगा कि अब रोना जरूरी है? कोई नियम कायदा कानून है क्या?)
  • कभी आपा न खोएँ। बेकाबू होते ही आप अस्पष्ट और तर्कहीन हो जाते हैं। आपका पक्ष भी कमजोर हो जाता है।
  • जब नियंत्रण खोने का खतरा हो, तो गिनती करें या कोई मंत्र पढ़ने लगें। जरूरी नहीं है कि कुछ धार्मिक मंत्र-प्रार्थना ही हो। पहाड़ा पढ़ सकते हैं। मूल बात यह है कि आप अपना ध्यान झगड़े से हटा कर किसी और चीज़ पर लगाएँ। (और, सामने वाले को जीतने का भरपूर मौका दे दें?)

जाहिर है, ऐसे बेकार के उपदेशों से किस का भला हो सकता है - सिवाय इस किताब की बिक्री के आंकड़ों के?

पर उपदेश कुशल बहुतेरे। ‘उपदेश’, ‘कायदे’ का भी तो हो! ‘स्पाउस’ पढ़कर अपना वैवाहिक रिश्ता सुधारने के बारे में सोचने से तो अच्छा है कि उस पैसे से मियाँ-बीवी कोई फ़िल्म देख आएँ और कम से कम अपनी एक शाम तो सुहानी बना ही लें।



रवि रतलामी
About the author:

जन्मतिथि: 5 अगस्त 1958

जन्मस्थान: राजनांदगांव (छत्तीसगढ़)

विद्युत अभियांत्रिकी में स्नातक, MVP. कम्प्यूटरों व इंटरनेट पर हिन्दी के प्रयोग में अगुआ तथा पथप्रदर्शक. लिनक्स तंत्र के हिन्दीकरण में महत्वपूर्ण योगदान. अंग्रेज़ीहिन्दी में चिट्ठा, स्तम्भतकनीकी लेखन.

संप्रति: विद्युत मंडल से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पश्चात् तकनीकी सलाहकार व स्वतंत्र लेखन.

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टिप्पणियाँ (1)add
आप का काम काबिले तारिफ है
written by एक मुसाफिर on अप्रेल 14, 2007

पर किताब में कुछ तो अलग है वरना वो ही घिसी कहान‍ी होती है जनाब

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