बर्गन का वो पागलखाना

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आदित्य सुदर्शन

  

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द साईंटिफ़िक इंडीयन ने हाल ही में विज्ञान फंतासी कथा लेखन प्रतियोगिता आयोजित की थी। इस में आदित्य सुदर्शन की लिखी कहानी द असाईलम एट बर्गन को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। दिल्ली के रहने वाले आदित्य फिलहाल नेशनल लॉ स्कूल, बंगलौर में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। इस कहानी का परिश्रमपूर्वक हिन्दी रूपांतरण किया है रमण कौल ने। आशा है यह प्रयास आप सराहेंगे।

सफर शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मैं ने किताब से नज़र हटा कर खिड़की से बाहर देखा। शाम होने को थी, बादल थे, पर अभी उजाला था -- मुझे मालूम था आधी रात टलने तक ऐसा ही रहना है। बाहर देहात तीव्र गति से गुज़र रहा था -- चीड़ और शंकुवृक्ष नीची पहाड़ियों को घेरे थे, नॉर्वे की ग्रीष्म ऋतु की ठंडी धूप से नहाए हुए से। जैसे जैसे रेलगाड़ी ऊँचाई को जाने लगी, पहाड़ी दीवारों से चिपके बर्फ के पैबन्द भी दिखने लगे - गहरे हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद चमकते हुए। मैं कुछ मिनट ऐसे ही देखता रहा, फिर वह कर्कष सौन्दर्य अखरने लगा; मैं ने जैकेट को ज़ोर से लपेटा और दोबारा किताब पढ़ने लगा।

'माफ कीजिए आप वह ब्रेन सर्जन हैं क्या?'

मेरे सामने वाली सीट पर बैठा आदमी अधेड़, गंजा और थोड़ा सा मोटा था। मैं ने मुस्करा कर जवाब दिया -

'हाँ'

'मैंने आप के बारे में सुना है - अखबार पर ट्रान्सप्लांट के बारे में जो खबर थी उस में। ओ, आप भारत से हैं, हैं न?'

मेरी मुस्कान चौड़ी हुई। मुझे इस बात की आदत हो गई थी कि मेरे काम से ज़्यादा रुचि मेरी नस्ल में जताई जाती हो, कई बार तो मेरे सहकर्मियों द्वारा भी। मैं ने हाँ में सिर हिलाया और फिर किताब की ओर लौट कर अपना पन्ना खोजने लगा।

**********

इंटरसिटी एक्सप्रेस पर ओस्लो से बर्गन का सफर छः घंटे से कुछ कम है, और जब हम स्टेशन पहुँचे सात से ऊपर बज चुके थे। मैं प्लैटफॉर्म पर उतरा, शाम की ठंडी हवा की चुभन का सामना करते हुए। इस देश के हर प्लैटफॉर्म की तरह यह वाला भी सुनसान और खुले आकाश तले था। मैं ने मटमैले आकाश पर एक दृष्टि डाली और नॉर्वे के जाड़े के बारे में सोच कर ठिठुर उठा -- जब रेलवे प्लैटफॉर्मों पर बर्फ के ढेर लग जाते हैं और स्कैंडिनेवियाई अपने ऊनी कपड़ों में कांपते खड़े होते हैं, अपनी बहादुरी पर गर्व करते हुए। बेकार मौसम जैसी कोई चीज़ नहीं होती, यहाँ कहावत है, बस बेकार कपड़े ज़रूर होते हैं। जून में दिल्ली आ कर देखो फिर पता चलेगा, मैं ने मुस्कुरा कर सोचा - घर का खयाल आते ही गर्माहट सी महसूस हुई।

मेरी नज़रें घूमते हुए घने पर्वतों से घिरे दीवार नुमा पहाड़ों पर गई जिन की जड़ें नीचे शहर में थीं और वे फैल कर ऊपर आ रहे थे। अपने कन्धे पर मुझे किसी के हाथ का अहसास हुआ।

स्टेशन से मैं पैदल ही निकल पड़ा और शहर से गुज़रते हुए फ्युनिक्युलर पहुँचा। बर्गन अपने फ्युनिक्युलर के लिए प्रसिद्ध है - यह एक केबल रेलवे है जो पहाड़ के ऊपर तक ले जाती है, जहाँ से आप पूरे शहर को और उस की शानदार बन्दरगाह को देख सकते हैं। बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में बर्गन नॉर्वे की राजनीतिक और आर्थिक राजधानी थी, और अभी भी पश्चिमी तट पर यही सब से महत्वपूर्ण बन्दरगाह थी। पर फिर भी नार्वे के शहर जल्दी नींद के आगोश में चले जाते हैं और मैं खाली सड़कों पर दुकानों के बन्द दरवाज़ों और शटरों के सामने से गुज़ते हुए फ्युनिक्युलर के प्रवेश द्वार तक पहुँचा। वहाँ केबल के निचले सिरे पर सवारियों की एक उत्सुक भीड़ जमा थी। केबल कार आहिस्ता आहिस्ता अपने पड़ाव की तरफ आ रही थी, और जैसे वह रुकी केबल का तनाव ढीला हुआ। जब कार के दरवाज़े खुले, मैं घुस कर पीछे की ओर निकल गया जहाँ से मोटे शीशे में से मैं पीछे छूटते पहाड़ का सुन्दर दृष्य देख सकता था। जैसे केबल-गाड़ी ने गति पकड़ी खिड़कियों से ठंडी हवा आई, और हम ऊपर की ओर चढ़ते गए, जहाँ से मुझे सुरंग का सिरा अपने एकदम नीचे दिखा। ऊपर चढ़ने के कई मिनटों बाद तक चढ़ाई के आनन्द की अनुभूति रही।

रेलवे का अन्तिम पड़ाव पहाड़ की चोटी पर एक हरे भरे मैदान में था, जिस से शहर नज़र आता था। वहाँ खड़े हो कर बन्दरगाह का प्रवेश दिखाई दे रहा था, दक्षिण में मालवाहक जहाज़ों से पटा हुआ। उत्तरी सिरे पर बारहवीं सदी का एक किला समुद्र में निकला हुआ दिख रहा था। उस से भी उत्तर में बर्गन के प्राचीनतम गिरजे की घंटियों ने आठ बजाए, जिस की इस शाम को चीरती आवाज़ ने मुझे सहसा रोमांचित कर दिया। मेरी नज़रें घूमते हुए घने पर्वतों से घिरे दीवार नुमा पहाड़ों पर गई जिन की जड़ें नीचे शहर में थीं और वे फैल कर ऊपर आ रहे थे। अपने कन्धे पर मुझे किसी के हाथ का अहसास हुआ।

'सॉरी आप को इन्तज़ार कराया।'

मैं डॉक्टर को देखने के लिए मुड़ा। वे बिल्कुल वैसी ही शक्ल जैसी फोटो में देखी थी - लंबे, तगड़े, चौड़ा माथा और गहरी नीली आँखें जो अब एकटक मेरी आँखों में देख रही थीं।

'कोई बात नहीं, डाक्टर साक्स। आप का निमन्त्रण मिलना मेरे लिए इज़्ज़त की बात थी।'

'द प्लेजर इज़ माइन। हमें यहाँ से पैदल जाना होगा। उम्मीद है आप ज़्यादा थके नहीं होंगे।' उन की आवाज़ में चिन्ता सच्ची थी।

'न, बिल्कुल नहीं।', मैं झूठ बोला।

**********


एक संकरे रास्ते से होते हुए वे वन्य पर्वत क्षेत्र की ओर बढ़े।

'गाड़ी के लायक चौड़ा नहीं है यह रास्ता।' डॉक्टर ने क्षमायाचक स्वर में कहा।

मैं ने इशारा किया कि कोई फर्क नहीं पड़ता। अब अन्धेरा हो रहा था; ऊपर की कैनोपी से सांझ का सूरज छिप रहा था। हम कोई आधा घंटा चुपचाप चलते रहे, फिर मुझे दूर पागलखाने की इमारत की सफेद दीवारें दिखाई दीं। चारों तरफ घिरे जंगल में वह कुछ अटपटी सी लग रहा थी।

'मैं ने डिनर तैयार रखने के लिए बोल रखा है।'

वे दुनिया भर से लाए गए थे - फ्राँसिस, टूलूज़ का मोची जो मज़े के लिए अपने ग्राहकों के जूतों में बिच्छू डाल देता था, जेरमी, टेनेसी का बैंक कर्मचारी जिस ने अपनी अपाहिज पत्नी को मार दिया था ताकि उस की देखभाल न करनी पड़े

गर्म खाने की बात सुन कर मेरे कदम थोड़े तेज़ हुए। जल्द ही हम पास पहुँचे और इमारत पूरी दिखने लगी। इमारत विशाल थी, लंबी चौडी और कई कोणों वाली, विशुद्ध कार्यशीलता के आधार पर बनी हुई। हालाँकि हम अभी घुसे नहीं थे, मुझे मालूम था कि ऊपर की मंज़िलों का कभी कभार ही इस्तेमाल होता होगा, जबकि निचली मंज़िलें, जहाँ सब से खतरनाक रोगी रहते होंगे, सब तहखानों के रूप में होंगी - ज़मीन के नीचे। पागलखाने की प्रसिद्धि काफी हद तक उस के रोगियों के कारण ही थी। वे दुनिया भर से लाए गए थे - फ्राँसिस, टूलूज़ का मोची जो मज़े के लिए अपने ग्राहकों के जूतों में बिच्छू डाल देता था, जेरमी, टेनेसी का बैंक कर्मचारी जिस ने अपनी अपाहिज पत्नी को मार दिया था ताकि उस की देखभाल न करनी पड़े, कुर्त्ज़, जर्मन आदमखोर जिस ने सफलतापूर्वक अपने शिकार के लिए इंटरनेट पर विज्ञापन दिया था, और तन्ज़ानिया की न्गाइयो बहनें जिन्होंने पकड़े जाने से पहले दो महीने तक हर हफ्ते एक शिशु को दम घोट कर मारने में सफलता प्राप्त की थी। कानून की इन्सानियत का यह आलम था कि जो उस की नज़र में पागल थे उन का वह कुछ नहीं बिगाड़ सकता था, इस कारण जिन की अच्छी पहुँच थी वे बर्गन के इन पहाड़ों में भेज दिए जाते थे, जहाँ डॉक्टर साक्स की देखरेख में उन का इलाज होता था, इस उम्मीद में कि शायद वे ठीक हो जाएँगे।

डॉक्टर का इलाज असरदार रहा हो, यह बात साफ नहीं थी पर बिल्कुल नाकामी का भी सबूत नहीं था, और जिन लोगों का इलाज हो रहा था उन्होनें फिर शिकायत का मौका नहीं दिया था। पर उस से भी ज़्यादा साक्स का अपना नाम ही था जिस ने इस पागलखाने की प्रसिद्घि बढ़ाई थी - उन से बड़ा तो इस क्षेत्र में कोई था भी नहीं। उन की दूर दूर तक शोहरत उस आदमी के रूप में थी जिस ने कम उम्र होते हुए भी, मनोचिकित्सा को छद्म-विज्ञान के अधर से निकाल कर उसे वे नियम और यन्त्र दिए थे जिस से वह एक सम्मानजनक और सफल चिकित्सा शाखा बन सकती थी। इस कारण, मेरी हाल की विजयों के बावजूद, बर्गन में इस डाक्टर द्वारा बुलाए जाने पर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था, और इस बुलावे के कारण का रहस्यमय अभाव भी मुझे उसे स्वीकार करने से नहीं रोक सका था।

पागलखाने के ग्राउंड फ्लोर का एक हिस्सा डाक्टर की रिहाइश में तबदील किया गया था, जब कि बाकी कर्मचारी मुख्य इमारत के साथ जुड़े कमरों में रहते थे। हम रिसेप्शन और मेडिकल वार्डों से गुज़र कर एक सफेद दीवारों वाले कॉरिडोर से होते हुए एक छोटे आरामदेह, लाल कालीन वाले कमरे में पहुँचे। कोने में एक लकड़ी का बुकशेल्फ था, और उस के सामने एक नीची मेज़, खाने से लदी हुई। भोजन के दौरान मैं ने बातचीत छेड़ी।



 
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