बर्गन का वो पागलखाना

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आदित्य सुदर्शन

  

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'अब मुझे बताइए, डॉक्टर साक्स', मैं ने उन के कमरे के आराम का लुत्फ उठाते हुए सहजता से कहा, 'इस सम्मान के योग्य मैं किस कारण बना?'

यह कहते हुए मेरा ध्यान पहली बार इस ओर गया कि डॉक्टर साक्स की तबीयत सही नहीं लग रही थी। उन की आंखें नीन्द की कमी के कारण लाल थीं और मुँह के आकार के कारण चेहरे के गड्ढे साफ नज़र आ रहे थे। उन्होंने हल्के स्वर में उत्तर दिया -

'मामला व्यक्तिगत है। समझाने में समय लगेगा।'

मैं ने कुछ नहीं कहा। जब वे दोबारा बोले तो उन में एक स्पष्ट परिवर्तन आ गया था। वे आगे की ओर झुके, आँखों में एक विचित्र अनिवार्यता की चमक थी, और थकन का कोई निशान न था -

'एक साल पहले मैं ने यह जाना कि मैं यहाँ के कार्य में नाकाम हूँ।'

बिना रुके वे बोलते गए। वे तेज़ी से पर साफ शब्दों में बोल रहे थे।

ऐसी अटकलें अक्सर लगाई गई हैं कि पागलपन मस्तिष्क का एक दोष है, और इस परिकल्पना को साबित करने के लिए बहुत बेवकूफी वाले काम हुए है

'मैं अब तक हमेशा यह समझता रहा कि पागलपन हालात की पैदाइश होता है - यानी इन बदकिस्मत लोगों के मस्तिष्क की गहराई में कोई ताकत होती है', उन्होंने तहखाने की ओर इशारा किया, 'जो इन्हें यह सब करने के लिए मजबूर करती है। इस लिए मैं ने उस ताकत का स्रोत खोजने का बीड़ा उठाया। मैं ने उन के साथ कितने ही घंटे बिताए, अपने विज्ञान की हर तकनीक का इस्तेमाल किया उनसे पूछताछ करने में, खोजबीन करने में। पहले-पहल मुझे लगा कि यह तकनीक काम कर रही है। पर मैं ग़लत था।'

पल भर के लिए उन की नज़रें मेरी आँखों पर एक अजीब तीव्रता से गड़ गईं। फिर वे आगे बोले -

'कई बार कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था - पागलपन का संक्षिप्त पर अवर्णनीय दौरा। बात बाहर तो नहीं निकली पर मैं समझ गया कि यह बीमारी मनोवैज्ञानिक नहीं थी, और मेरा इलाज इस के सामने बेकार था। मैं टूट गया; आप नहीं समझ पाएँगे, मेरे जीवन का सारा कार्य ध्वस्त हो गया। पर मैं ने निश्चय किया कि मैं इस समस्या से नए सिरे से सुलटूँगा। मैं ने कई महीने तक इस का अध्ययन किया। फिर पिछले महीने ही मुझे जवाब मिला।'

वे रुके, मुझे लगा मेरे बोलने की उम्मीद में।

'क्या जवाब?'

डॉक्टर हल्के से मुस्कुराए, जैसे एक गहरे रहस्य का रसास्वादन कर रहे हों -

'जवाब आप की निपुणता के दायरे में है। जिस पागलपन से मैं दोचार हूँ, वह सही और ग़लत का अन्तर बता सकने की असमर्थता है। मुझे मालूम है कि ऐसी अटकलें अक्सर लगाई गई हैं कि पागलपन मस्तिष्क का एक दोष है, और इस परिकल्पना को साबित करने के लिए बहुत बेवकूफी वाले काम हुए हैं। पर अब मैं इस में सफल हुआ हूँ, और इस के लिए मैं आप को धन्यवाद देता हूँ।'

'क्यों?'

'क्यों कि पेनफील्ड मानचित्र पर आप के द्वारा किए गए कार्य से मुझे यह जवाब मिला है।'

एक का बायाँ हाथ कटा था पर वह दावे से कहता था कि जब मैं उस की नाक को हाथ लगाता था तो उस के ग़ैरहाज़िर अंगूठे में अहसास होता था। दूसरा जिस की दाईं टांग एक हादसे में कट गई थी, कहता था कि उसे कामोन्माद का अहसास उस खोई हुई टांग तक होता था।

यह मुझे कुछ रोचक लगा। पेनफील्ड मानचित्र, जिसे कैनेडियन खोजकर्ता विल्डर पेनफील्ड ने खोज निकाला है, शिराविज्ञान की सर्वाधिक रोचक खोजों में से एक समझा जाता है। इस के अनुसार शरीर का एक मानचित्र मस्तिष्क में बना होता है, ताकि जब शरीर के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है, वह संकेत मस्तिष्क के मानचित्र के संबन्धित क्षेत्र में चला जाता है। यह मानचित्र काफी रोचक है, क्योंकि इस में हाथ चेहरे के पास है, पैर गुप्तांगों के पास हैं, और कान स्तनों के पास - यानी कुछ भी आशा के अनुरूप नहीं। इस क्षेत्र में मेरा अपना कार्य, जिस के चलते मेरा नाम गुमनामी के अन्धेरे से निकल पाया था, उन विषमताओं का वर्णन करता था जिन का सामना मैं ने अपने मरीज़ों का अध्ययन करते किया था। एक का बायाँ हाथ कटा था पर वह दावे से कहता था कि जब मैं उस की नाक को हाथ लगाता था तो उस के ग़ैरहाज़िर अंगूठे में अहसास होता था। दूसरा जिस की दाईं टांग एक हादसे में कट गई थी, कहता था कि उसे कामोन्माद का अहसास उस खोई हुई टांग तक होता था। मैं ने यह प्रदर्शित किया था कि इन रोगियों में मस्तिष्क के वे हिस्से जो सामान्यतः हाथ या पाँव से संकेत लेते थे किसी तरह पड़ौस के क्षेत्र से सिग्नल लेते थे, यानी चेहरे से या गुप्तांग से। पर पेनफील्ड मानचित्र का मानुषिक समझ से, या भावना से, या पागलपन से कोई लेना देना नहीं है, और मैं ने डॉक्टर को यह बात बताई।  

'यह सही है कि मानचित्र का कोई सम्बन्ध नहीं है।' उन्होंने बेसब्री से जवाब दिया, 'पर इस विषय पर आप के किए गए कार्य का महत्व आप की कल्पना से ज़्यादा है। देखिए, मस्तिष्क के केवल कुछ ही भाग ऐसे नहीं हैं, जो आस पास के संकेत पकड़ सकते हैं, बल्कि हर भाग ऐसा कर सकता है।'

धीरे धीरे मुझे इस बात की समझ, एक पहचाने ढ़ंग से, आने लगी। पर फिर भी यह कुछ ज़्यादा ही हवाई लग रहा था।

'आप का मतलब, फ्रंटल कोर्टेक्स..'

'हाँ' उन के स्वर में विजय सुनाई दी मुझे।  'मस्तिष्क का फ्रंटल कोर्टेक्स हमारी नैतिक समझ की बुनियाद है। किसी कारणवश उन लोगों में, जो सही ग़लत का अन्तर नहीं कर पाते, मस्तिष्क के इस भाग तक का रास्ता ही नहीं खुला होता, उन के अत्यन्त घृणित व्यवहार के बावजूद। पर यदि मस्तिष्क के हर भाग तक उस के पडौस द्वारा पहुँचा जा सकता है, तो फिर फ्रंटल कोर्टेक्स तक क्यों नहीं?'

'पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित कर के?' पर मुझे जवाब पहले ही मालूम था।

'हाँ, पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित कर के। और पेरीटल कोर्टेक्स, जैसे आप को पता ही होगा, सब से पाश्विक भावना से उत्तेजित होता है - और वह है भय।'

कई मिनटों तक हम दोनों में से कोई नहीं बोला। उस छोटे से कमरे में खामोशी ऐसी गूँजी कि मुझे सहसा उठ कर जाने की तीव्र इच्छा हुई। मैं बस फ्युनिक्युलर पर फिर चढ़ कर पहाड़ से नीचे शहर की गलियों में पहुँचना चाहता था। डाक्टर फिर बोले, हल्के से, जैसे कि उन्होंने मेरी बेचैनी को भांप लिया हो -

'बाहर चलें?'
 
हम फिर उस सफेद पुते हुए कॉरिडोर से गुज़रे, और फिर उसी रास्ते से होते हुए बाहर पहाड़ की ठंडी हवा में पहुँचे जहाँ पर्वत हमें फिर घेरे खड़ा था। पर अब चारों तरफ अन्धियारा छाया था और मुझे ताकने पर भी वह रास्ता नहीं दिखा जिस से हम आए थे। डॉक्टर ने पागलखाने की दीवार में एक छोटे से द्वार की ओर इशारा किया -

'मुझे यकीन है आप मेरे नए इलाज के परिणाम देखने को उत्सुक होंगे।'

पागलखाने के निचले तल सब से पुराने थे। बहुत पहले इस जगह तहखानों का जाल बिछाया गया था, जिस का उद्देश्य अब किसी को याद नहीं था, पर यह पुराने तहखाने अब इस पागलखाने के कुछ नामी गिरामी बाशिन्दों का सुलभ आवास बन गए थे। रोगियों की संख्या इतनी ही थी कि हर किसी के लिए अपनी अलग कोठरी थी, और यह कोठरियाँ साथ साथ सटी न हो कर तहखाने के अलग अलग हिस्सों में थीं।

बल्ब लगातार झूल रहा था, और उस से कमरे में अजीब सी परछाइयाँ नृत्य कर रही थीं।

मैं ने देखा कि इस पुरानी भूलभुलइया की पत्थर की दीवारें और मज़बूत बनाई गई थीं और कई रास्ते बन्द कर दिए गए थे, ताकि जो कॉरिडोर थे वे किसी अनजान आगन्तुक को भटकाने के स्थान पर राह दिखा सकें। हमें उत्तर की ओर गहराई में जाते एक लंबे संकरे कॉरिडोर, जो हमें इमारत के केन्द्रीय भाग की ओर ले जा रहा था, में चलते कई मिनट हो गए थे जब डॉक्टर ने रुक कर मेरे बाईं ओर इशारा किया।

'देखो।'

उन के इशारे की ओर मुड़ते हुए मैं ने उन के स्वर की उत्तेजना को भांपा। मेरे बाईं ओर, दीवार की गहराई में एक बड़ा, खाली सा कमरा था, जिस में केवल एक छत से लटकते बल्ब की रौशनी थी। बल्ब लगातार झूल रहा था, और उस से कमरे में अजीब सी परछाइयाँ नृत्य कर रही थीं। एक कोने में एक आदमी की दुबकी बैठी सूरत दिख रही थी, पर उस के नैन नक्श धुंधलके में छिपे थे। जब बल्ब की बिखरी रौशनी उस के चेहरे पर पड़ी तो मैं ने ध्यान से देखने की कोशिश की। उस आदमी के गाल गोल और चिकने थे। नाक चपटी और मोटी थी, होंठ बिना किसी आकार के, जिस से मुझे हल्की सी याद आ रही थी अखबारों में कई महीने पहले देखे एक चित्र की। पर फिर मेरा ध्यान उस के गाल, नाक या होठों से हट गया, क्योंकि इन सब गौरतलब नैन नक्शों के बीच उस आदमी की आँखें थीं जो मुझे घूर रही थीं - बड़ी भूरी आँखें जो भय से चौड़ी खुली थीं, स्पष्ट, दयनीय भय से।



 
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