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बर्गन का वो पागलखाना

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आदित्य सुदर्शन
  

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मैं ने घूम कर देखा, डॉक्टर मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।

'उस की कोठरी साउंडप्रूफ है। और हम एक शीशे की चादर से उसे देख रहे हैं, जो दूसरी ओर से अपारदर्शी है।'

'पर वह क्या देख रहा है?' मुझे अभी भी उस की पगलाई, घूरती आँखें दिख रही थीं।

जिस पल वह होश में होता है, वह इन्हीं खौफों की मायावी दुनिया में रहता है, इस कारण उस का मस्तिष्क अब सत्य और माया में अन्तर नहीं कर पाता।

'इसे कैसे बेहतर समझाया जाए, यह मुझे नहीं मालूम। उसे लगता है कि अप्राकृतिक प्राणी - भूत, प्रेत, पिशाच - उस के पीछे पड़े हुए हैं। शायद आप को और मुझे यह बचकानी चीज़ें लगेंगी, पर उस के लिए यही चीज़ें हैं जिन से उसे सब से ज़्यादा डर लगता है। देखो, मेरे जैसे प्रशिक्षित व्यक्ति के लिए यह जानना मुश्किल नहीं है कि किसी को किस चीज़ से डर लगता है। और अक्सर वैसी ही चीज़ की नकल बना लेना संभव हो जाता है, यानी एक ऐसी दुनिया जिस में केवल भय का वास हो और कुछ नहीं। और फिर सारी इन्द्रियाँ उसी पर केन्द्रित कर देना ताकि रेटिना को और कोई चित्र ही न मिले, कानों के पर्दों को कोई और ध्वनि ही न प्राप्त हो। ताकि इस से दूर हटना असंभव हो जाए।'

'क्या उसे मालूम है कि यह सब सच नहीं है?'

'वह नहीं जानता; यही तो इस की खासियत है। जिस पल वह होश में होता है, वह इन्हीं खौफों की मायावी दुनिया में रहता है, इस कारण उस का मस्तिष्क अब सत्य और माया में अन्तर नहीं कर पाता।'

'पर इस से क्या हासिल होगा?'

'यह बिल्कुल आसान है, हालाँकि मानना पड़ेगा कुछ असभ्य है। भय पैदा करता है यह। यह मस्तिष्क के पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित करता है - बलपूर्वक और निरन्तर।' डॉक्टर के चेहरे पर एक अजीब, टेढ़ी मुस्कान थी - 'आखिर एक सोते व्यक्ति को जगाने के लिए फुसफुसाने से तो काम नहीं चलेगा न। और काम भी कर रहा है यह, तुम्हें नहीं लग रहा?', उन का स्वर ऊँचा हुआ, विजय के उन्माद से कांपता हुआ, 'कई बार इन पुरुषों और स्त्रियों की मृत नैतिक शक्ति जागृत हुई है, और समय के साथ, मुझे पक्का यकीन है, पूरी तरह जागेगी। मैं ने इन रोगियों को घृणा का प्रदर्शन करते देखा है, जैसे नैतिक रूप से आदमी बुराई से घृणा करता है, जो अहसास इन्होंने पहले कभी नहीं दिखाया था। ऐसा होने पर वे कई बार हिंसक रूप धारण कर लेते हैं। कई बार बस रो देते हैं।'

वे रुके, और मैं ने पूछा 'यही इलाज आप अपने सभी दूसरे रोगियों का भी करते हैं क्या?'

'मुख्यतः, हाँ। पर हाँ, हर एक आदमी एक चीज़ से जितना डरता है, दूसरा आदमी उसी चीज़ से या उतना ही नहीं डरता। इसलिए हर व्यक्ति को विभिन्न प्रकार से उत्तेजित किया जाता है।'

फिर मुझे अपनी ओर बुलाया - 'पर आइए मैं आप को दिखाता हूँ; चलिए टूर समाप्त करते हैं।'

उन अन्धेरी कोठरियों में हम ने कितने घंटे बिताए, मुझे नहीं मालूम। हम एक कोठरी से दूसरी के पास जाते रहे, और हर कोठरी में हम ने कैदियों और उन के चेहरों को देखा, सब एक ही तरीके से डरे हुए और अनदेखी भयानक चीज़ों से दुबके हुए। उस भूलभुलैया में मुझे घुमाते हुए डॉक्टर साक्स उस उत्सुक बालक की तरह लग रहे थे जो अपना नया खिलौना दिखा रहा हों। आखिरकार टूर खत्म हुआ, और हम दोबारा बाहर गए जहाँ नार्वे का स्थाई सूरज अब घने जंगल के पीछे लगभग बुझ सा गया था। हम अन्धेरे में पागलखाने के मुख्य प्रवेशद्वार के सामने खड़े थे।

वे मेरी ओर मुड़े -

'आप को रात के लिए अपना कमरा दिखाने से पहले, चलिए एक वाइन की बोतल खोली जाए?'

डॉक्टर के क्वार्टर की गर्माहट में मैं ने फिर चैन की सांस ली। मैं ने उन की वाइन की पसन्द पर उन की तारीफ की - बहुत ही उम्दा लैंब्रुशियो वाइन थी। उन के कमरे की सजावट पर भी, और पागलखाने के उन के प्रबन्धन पर भी मैं ने कुछ तारीफ के शब्द कहे। फिर मेरे मस्तिष्क में कुछ कौंधा।

'डॉक्टर साक्स, यह बात तो समझ में आई कि मेरे पेनफील्ड मानचित्र के अध्ययन से आप को कुछ लाभ हुआ, पर आप ने कहा न कि आप कुछ व्यक्तिगत मामले पर मुझ से बात करना चाहते हैं?'

वे मुझे बोलते हुए एकटक देख रहे थे। उन्होंने हल्के से हाँ में सिर हिलाया -

'हाँ, आप सही कह रहे हैं। आप से मुझे कुछ काम है। इस का सरोकार है तो मुझ से, पर आप से भी है।'

'क्या मतलब?'

'मैं ने आप के करियर का बड़ी रुची से अध्ययन किया है। आप ने कुछ स्मरणीय कार्य किये हैं, और कुछ बड़ी सफलताएँ प्राप्त की हैं, हालाँकि अभी आप जवान हैं।'

'धन्यवाद।'

'फिर भी', अब वे धीमे बोलने लगे, जैसे कि तोल तोल कर बोल रहे हों 'आप के हिस्से असफलताएँ भी खूब आई हैं।'

'हाँ,. बिल्कुल। वैसे ही जैसे हर सर्जन के हिस्से आती हैं, अगर गुस्ताखी न हो तो।', मैं हंसा, पर हंसी ज़बरदस्ती सी लगी।

'सही है। पर आप के जितनी फिर भी नहीं।'

'आप का मतलब क्या है?' मैं ने उत्सुकता का अभिनय करते हुए फिर पूछा, पर अपने स्वर की तीव्रता को नहीं छिपा पाया।

'आप वे खतरे उठाते हैं जो आप की जगह दूसरे हों तो शायद न उठाएँ। आप को अपना वह वाला रोगी याद होगा, वह मुंबई का व्यापारी, कोई छः साल पहले?'

'ठीक से तो नहीं, पर...'

'या वह कटक का कलाकार, उसी साल।'

'क्यों...'

'या फिर वह बंगलौर का उद्योगपति, दो साल पहले। वे सब मनुष्य न रह कर वनस्पति बन कर रह गए, रह गए न? और हाँ, वह जो बच्चे का ट्रान्सप्लांट किया था आप ने पिछले ही साल। वह आपरेशन करना नहीं चाहिए था न?'

'सफल हुआ था वह।' मैं तेज़ी से बोला, अब मुझे ग़ुस्सा आ रहा था।

'हाँ, उस बार तो सफल हुआ। पर जब आप ने छः महीने पहले फिर किया तब तो नहीं हुआ।'

मैं ने बोलने की कोशिश की पर बोल नहीं सका, जैसे मेरे गले को कुछ चीर रहा हो। मुझे भय घेर रहा था, और मेरी उंगलियाँ कुर्सी के बाज़ुओं को कस रही थी। मुझे लगा मेरी सांस थम रही है, दम घुट रहा है। मेरी नज़रें बगल में रखे वाइन के गिलास की ओर गईं और अचानक वह मुझे धुन्धला दिखने लगा।.

मैं ने बोलने की कोशिश की पर बोल नहीं सका, जैसे मेरे गले को कुछ चीर रहा हो। मुझे भय घेर रहा था, और मेरी उंगलियाँ कुर्सी के बाज़ुओं को कस रही थी।

डॉक्टर मेरी ओर झुके, उन की गहरी नीली आँखें मेरी आँखों में कुछ खोज रही थीं।

'मैं ने आप के करियर का बहुत करीब से अध्ययन किया है। और मुझे हमेशा सन्देह रहा है कि आप का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पर अब मुझे पक्का यकीन हो गया है।'

मैं ने एक निर्जीव दृष्टि डाली उन पर।

'देखिए, नीचे जब हम हर कोठरी में जा रहे थे, तो मैं आप को ध्यान से देख रहा था। आप ने देखा कि हम उन दरिन्दों का क्या हाल कर रहे थे, आप ने मुझ से उस के बारे में सुना, और बार बार खुद होते देखा। आप हैरान तो हुए, पर एक बार भी - समझ रहे हैं न आप - एक बार भी आप हिचके नहीं।'

मैं अपने पैरों पर लड़खड़ाते हुए उठा और डॉक्टर की ओर जाने की कोशिश की, जो मेरे सामने कुछ ही फीट की दूरी पर बैठे थे। पर मेरी टाँगें जवाब दे गईं, और मैं ने स्वयं को उस कालीनी फर्श पर ज़ोर से गिरते महसूस किया। मैं जहाँ गिरा, वहाँ से मैं पलटा और देखा डॉक्टर की छाया मेरे ऊपर खड़ी थी।

'एक आदमी जो बिना सोचे उन लोगों पर प्रयोग करता है, जो उस पर सहायता के लिए निर्भर होते हैं, एक आदमी जो बार बार त्रासदीपूर्ण असफलता मिलने पर भी ऐसा करे, सही ग़लत में अन्तर नहीं कर पाता। यानी एक पागल आदमी।'

अब वह मेरे ऊपर करीब से झुके थे, और हालाँकि मुझे अब अपने चारों ओर छाए अन्धेरे में एक धुन्धली हरकत के सिवा कुछ नज़र नहीं आ रहा था, फिर भी मुझे अपने चेहरे पर उन की गर्म सांसों की अनुभूति से लग रहा था कि वह मेरे बहुत करीब थे।  फिर वे बोले -

'मैं आपका इलाज करूँगा, और आप ठीक हो जाएँगे। आपको मेरे इलाज की ज़रूरत है।' वे रुके; फिर काफी धीरे से बोले -

'पर उस से भी ज़्यादा, आप को समझ में आ रहा होगा, कि मुझे आप जैसे रोगी की ज़रूरत है। क्योंकि यदि मैं आप का इलाज कर सका - तो सोचिए, ज़रा सोचिए - मुझे यकीन होगा कि मेरे अपने लिए आशा की किरण है।'



आदित्य सुदर्शन
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टिप्पणियाँ (3)add
बड़ी ही अलग कहानी
written by अनुराग मिशࠥ on मार्च 09, 2007

खत्म होते होते रोएँ खड़े हो गए। इसके अनुवाद के लिए धन्यवाद।

भयावह
written by अतुल शर्मा on अप्रेल 06, 2007

यह विज्ञान फंतासी की अपेक्षा हॉरर लगती है।

सराहनीय अनुवाद
written by Akhilesh Gupta अखिले on जुलाई 08, 2007

विज्ञान से संबंधित इस कहानी का हिन्दी में अनुवाद - एक सराहनीय कार्य...


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