मुखपृष्ठ arrow निरंतर arrow अंक-9 (दिसंबर 2006)


दो बूँदें

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डॉ जगदीश व्योम

  

दो बूँदें मुक्ताकाश में विचरण करती हुईं पुष्प पाँखुरी पर स्थित थीं। पवन ने उन्हें देखा और पहली बूँद से निवेदन किया कि वह उसे वारिधि तक पहुँचा सकती है। बूँद ने कुछ सोचा और एक पुराने कवि की ये पंक्तियाँ उसे याद आ गईं, वह बोली-

"जैहै बनि बिगरि न वारिधता वारिधि की
बूँदता विलैहै बूँद विवस विचारी की...।"

उसने सागर में विलय की अनिच्छा विनम्रता से प्रकट कर अपने स्वाभिमानी होने का बोध करा दिया।

पवन ने दूसरी बूँद से वही अनुरोध किया। यह भी कहा कि समुद्र ने ही उससे ऐसा करने के लिये कहा है। पवन का अनुरोध सुन दूसरी बूँद का भी स्वाभिमान जाग उठा और उसने भी एक आधुनिक कवि की पंक्तियों का सहारा लेकर अपने मन की बात कह डाली-

"कह देना ! समन्दर से, हम ओस के मोती हैं
दरिया की तरह तुझसे, मिलने नहीं आएँगें ।"

पवन बेचारा दूसरी बूँद का यह उत्तार सुनकर हक्का-बक्का रह गया।

इस पूरे दास्तान को झाड़ी में छिपा एक जुगुनू बड़े ध्यान से सुन रहा था। वह सोचने लगा, "कितनी स्वाभिमानिनी हैं दोनों बूँदें...मगर समुद्र में न मिलने की बात दोनों ने कितने अलग-अलग ढँग से कही है। एक में विनम्रता है और दूसरी में अहंकार...दोनों स्वाभिमानी हैं फिर भी दोनों में इतना अन्तर आखिर क्यों?...क्या अवस्था का अन्तर है...? परिवेश का अन्तर है...? संस्कृति का अन्तर है...? पीढ़ी अन्तराल है...? या कुछ और कारण है...?"

जुगुनू बेचारा देर तक यही सोचता रह गया।



डॉ जगदीश व्योम
About the author:
जन्म: 1 मई 1960, शंभूनगला, फर्रुखाबाद, उ.प्र.
शिक्षा: एम.ए.हिंदी साहित्य में, एम.एड., पीएचडी
शोधकार्य: लखनऊ विश्वविद्यालय से 'कनउजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण' पर।

भारत की लगभग सभी पत्र पत्रिकाओं में शोध लेख, कहानी, बालकहानी, हाइकु, नवगीत आदि का अनवरत प्रकाशन। आकाशवाणी दिल्ली, मथुरा, सूरतगढ़, ग्वालियर, लखनऊ, भोपाल आदि केंद्रों से कविता, कहानी, वार्ताओं का प्रसारण। शोधग्रंथ 'कनउजी लोकगाथाओं का सर्वेक्षण और विश्लेषण' के लिए 'प्रकाशिनी हिंदी निधि,कन्नौज' द्वारा सम्मानित। 'नन्हा बलिदानी' बाल उपन्यास के लिए पांच पुरस्कार। संप्रति केंद्रीय विद्यालय एस.पी.एम, होशंगाबाद, म.प्र. में पी.जी.टी. हिंदी पद पर कार्यरत।
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टिप्पणियाँ (1)add
संस्कृति का अन्तर
written by bhawnak2002 on फ़रवरी 12, 2007

व्योम जी 'दो बूँद' पढी बहुत अच्छा लगी आपको साधुवाद। शायद संस्कृति का ही अन्तर था संस्कृति हमारे व्यक्तित्व का आईना जो होती है।

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