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जापानी हायकू का उल्लेखनीय भावानुवाद

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अनूप शुक्ला
  

प्रत्येक भाषा के साहित्य में देशकाल और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार अभिव्यक्ति की अनेकानेक विधायें प्रचलित होती रही हैं। जापानी साहित्य की ऐसी ही एक प्रमुख विधा हायकू है। अपने छंद विधान के कारण हायकू विश्व की दूसरी भाषाऒं में भी प्रचलित हो रहे हैं। हिंदी में भी हायकू नव्यतम काव्य विधा के रूप में पर्याप्त लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं।

हायकू को काव्य विधा के रूप में प्रचलित करने का श्रेय जाता है प्रमुख जापानी साहित्यकार मात्सुओ बासो (1644 - 1694) को। बासो से शुरू होकर हायकू जापनी कविता की युगधारा के रूप में प्रस्फुटित हुआ और कालान्तर में विश्व साहित्य की निधि बन चुका है।

हायकू तीन पंक्तियों में 17 अक्षरों में लिखी जाने वाली कविता है। पहली पंक्ति में 5, दूसरी पंक्ति में 7 और तीसरी पंक्ति में पांच अक्षर होते हैं। कुल सत्रह अक्षरों में पूर्ण अर्थ संप्रेषित करना हायकू की कसौटी होती है। इस तरह हायकू गागर में सागर भरने की क्षमता की पहचान का पैमाना होता है।

जापानी कविता में हायकू काव्य में प्रमुखत: प्रक्रति से संबंधित भाव व्यक्त किये जाते रहे। हिंदी में भी हायकू कविता विधा में कवितायें लिखी जा रही हैं। मूल जापानी के हायकू के अनुवाद भी हिंदी में उपलब्ध हो रहे हैं जिसके द्वारा हायकू के बारे में जानकारी मिलती है।

जापानी कविता हायकू का ऐसा ही उल्लेखनीय अनुवाद का कार्य श्रीमती डा.अंजलि देवधर ने किया है। उन्होंने मूल जापानी से अंग्रेजी में अनुदित 32 महत्वपूर्ण कवियों की 100 उत्कृष्ट हायकू कविताओं का हिंदी में अनुवाद किया है। वसन्त, ग्रीष्म, पतझड़, शरद और नववर्ष की इन उत्कृष्ट हायकू कविताऒं का चयन और अंग्रेजी अनुवाद नगोया, जापान के प्रोफेसर युजुरु मियुरा ने किया है। जापानी से अंग्रेजी में अनुवाद और अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद टटल प्रकाशन अमेरिका द्वारा किया गया।

जापानी से अंग्रेजी और अंग्रेजी से हिंदी में अनुवाद करने में इन हायकू कविताऒं के 5-7-5 का छ्न्द विधान का निर्वाह नहीं हो पाया भाषा भी थोड़ी क्लिष्ट हो गई लेकिन कविताऒं का भावानुवाद करने का कठिन कार्य करने के लिये डा.अंजलि देवधर करने के लिये बधाई की हकदार हैं। उसके इस कार्य से हिंदी भाषियों की जापानी काव्य विधा हायकू की जानकारी मिलना सम्भव हो सका।

डा. अंजलि देवधर ने अपनी पुस्तक को अपने पति डा.श्रीधर देवधर को आभार स्वरूप अर्पित किया है जिनकी दी धनराशि से यह पुस्तक छपी। उत्कृष्ट हायकू का हिंदी में भावानुवाद प्रस्तुत करके डा.अंजलि देवधर ने उल्लेखनीय काम किया है।

 
डा. अंजलि देवधर के जापानी -अंग्रेजी -हिंदी हायकू अनुवाद से कुछ हायकू

 

लड़खड़ाती अनाथ गौरैया,
आओ और खेलो!
मैं हमेशा तुम्हारा साथी हूं।
-कोबायासी इस्सा

एक स्त्री
एक टब में नहाती हुई
एक कौए की चाह बन गई!
-ताकाहामा कियोशी

एक मक्खी बैठी
स्तन पर
जिसे सोता शिशु भूल गया चूसना।
-हीनो सोजो

टिमटिमाती बत्तियां
जुगनुऒं की
अल्प आयु की भविष्य-व्यक्ता हैं।
-कावाबाता बोशा

एक पतझड़ की सांझ
एक घंटा विश्राम का
एक झणिक जीवन में
-योसा बुसान

ओस की बूंद
बैठी एक पत्थर पर
एक हीरे के समान
-कावाबाता बोशा

गौरैया खेल रही
छुपा-छुपा
चाय के फूलों के बीच में।
-कोबायाशी ईस्सा

एक नया वर्ष आरम्भ हुआ
खिल जाने से
एक तुषारायित गुलाब के।
-मिजुहारा शुओशी



अनूप शुक्ला
लेखक परिचय:
जन्म: 16 सितंबर, 1963
शिक्षा: बी.ई़.(मेकेनिकल), एम ट़ेक (मशीन डिज़ाइन)
संप्रति: भारत सरकार रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत आयुध निर्माणी में राजपत्रित अधिकारी।
लेखन: इंटरनेट पर नियमित लेखन। आपका हिन्दी चिट्ठा फुरसतिया खासा लोकप्रिय है। अनूप निरंतर पत्रिका के मुख्य संपादक हैं और चिट्ठा चर्चा करते रहते हैं।
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