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पिप्पी के मोज़ों में कबाड़ से जुगाड़ छापें ई-मेल
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बेकारअति उत्तम 
इस के लेख़क हैं रविशंकर व देबाशीष   

निरंतर की पुस्तक समीक्षा स्तंभ में हम इस अंक की भावना के अंतर्गत कुछ ऐसी नायाब पुस्तकें प्रस्तुत कर रहे हैं जो निश्चित ही भारत की नौनीहाल को समृद्ध करेंगी। यहाँ विभिन्न प्रकाशकों की इन पुस्तकों की समीक्षा नहीं वरन् परिचय दे रहे हैं।

Joy of making Indian toysपहले बात दो ऐसी एक्टीविटी पुस्तकों की जो कम कीमत में, या कहें तो बिना कीमत में, खिलौने बनाना सिखाती हैं, ऐसे खिलौने जिन्हें बच्चे बेफिक्र हो जोड़ व तोड़ सकें। घरेलू खिलौनों द्वारा बच्चों में विज्ञान के प्रसार के लिये इन पुस्तकों के लेखकों को राष्ट्रीय पुरस्कार व ख्याति मिली है। ये खिलौने सामान्य चीजों से बने हैं, पर इस कारण से इन्हें फैक्टरियों में निर्मित महंगे खिलौनों से दोयम न समझें। क्योंकि ये खिलौने प्रयोग और रचनात्मकता की जो भावना जगाते हैं वह अद्वितीय है, साथ ही इनमें से कई विज्ञान के नियमों को सरलता से समझाने में भी काम आ सकते हैं।

भारत में ऐसे खिलौनों के प्रयोग की पुरानी संस्कृति रही हैं पर दुःख की बात है कि महंगे खिलौनों की बहुतायत से ये भुलाये जा रहे हैं। हमारे पारंपरिक खिलौनों से बच्चे स्वयं कुछ करते हुए सीखते हैं - और इस तरह का उनका अर्जित ज्ञान स्थायी होता है। इन पुस्तकों में दिए गए क्रियाकलापों तथा व्यावहारिक ज्ञान के लिए किसी तरह के खर्चीले साधनों की आवश्यकता नहीं होती और रोज़ाना इस्तेमाल में आने वाली चीजें और आमतौर पर बेकार हो चुकी वस्तुएं जैसे कि बोतलों के ढक्कन, स्ट्रॉ, अख़बारी काग़ज, पैकिंग के पुस्टे इत्यादि की सहायता से ज्ञान-विज्ञान की बातें आसानी से समझाने का प्रयास किया जाता है।

 पहली पुस्तक भोपाल की संस्था एकलव्य द्वरा प्रकाशित कबाड़ से जुगाड़ - Little Science : विज्ञान के कुछ सस्ते सरल और रोचक खिलौने। पुणे स्थित अरविंद गुप्ता अपने इस प्रयोग के लिये विख्यात हैं। वे बेकार हो चुकी दैनिक प्रयोग की वस्तुओं के जरिए वैज्ञानिक खिलौने बनाने में सिद्धहस्त हैं। इस पुस्तक में चित्रमय विधियों द्वारा ये सिखाया गया है। उदाहरण के लिए इसमें कैमरा फ़िल्म की प्लास्टिक की डिब्बी, प्लास्टिक की थैली, साइकिल की स्पोक, टूटी चप्पल की रबर शीट के टुकड़े तथा रबर या प्लास्टिक के पाइप के जरिए पानी के पम्प बनाने की आसान विधि बताई गई है। इस चित्रमय विधि को पढ़कर बच्चे आसानी से स्वयं ही अपना एक पानी का पम्प बना सकते हैं और जान सकते हैं कि पानी का पम्प आखिर कैसे काम करता है। यह पुस्तक द्विभाषी है - यानी अंग्रेज़ी व हिन्दी दोनों में है जिससे इसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है। 70 पृष्ठों की इस पुस्तक का मूल्य है मात्र 20 रुपये (ISBN क्रं 81-87171-03-0, संस्करण 2002, चित्र अविनाश देशपांडे)। ये पुस्तक विद्या आनलाईन पर पीडीएफ प्रारूप में मुफ्त भी उपलब्ध है।

दूसरी पुस्तक है नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा प्रकाशित जॉय आफ मेकिंग इंडीयन टॉय्ज़। इसके लेखक सुदर्शन खन्ना नेशनल इंस्टीट्यूट आफ डिजाइन, अहमदाबाद में काम करते हैं। अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक में 101 हस्तनिर्मित खिलौने हैं जो खेल खेल में विज्ञान भी सिखाते हैं। 125 पृष्ठों की इस पुस्तक की छपाई उम्दा है व चित्र बेहतरीन। इसकी कीमत है 40 रुपये तथा इसे आप नेशनल बुक ट्रस्ट की वेबसाईट से भी खरीद सकते हैं (ISBN क्रं 81-237-2244-3)। नीचे दिये चित्र में आप इसी पुस्तक में दी गई कलाबाज़ कैप्सूल बनाने की विधि पढ़ सकते हैं (विवरण अंग्रेज़ी से अनुवादित है)। पुस्तक का हिन्दी संस्करण भी उपलब्ध है पर उसकी कीमत 90 रुपये है। हिन्दी अनुवाद अरविंद गुप्ता का ही किया हुआ है।


Acrobat Capsule


खेल खेल में विज्ञान से जुड़ी किताबों के अलावा अरविंद गुप्ता ने ढ़ेरों अन्य पुस्तकों को अंतर्जाल पर मुफ्त उपलब्ध कराया है जिनमें हिन्दी व मराठी पुस्तकें भी शामिल हैं। उन के जालस्थल पर नज़र डालें और उन्हें धन्यवाद कहें।

एकलव्य का एक और प्रकाशन है - खिलौनों का खज़ाना Toy Treasures। इसमें जापानी ओरिगामी विधि से यानी काग़ज के टुकड़ों को काट-जोड़-चिपका कर इत्यादि तरीके से दर्जनों खिलौनों को कैसे बनाना यह बताया गया है। आसान सी उड़ने वाली मछली हो या जटिल बातूनी कौआ - चित्रों के जरिए इन्हें बनाने का तरीका बड़ी स्पष्टता से समझाया गया है। इसके लेखक भी अरविंद गुप्ता हैं। यह पुस्तक भी हिन्दी व अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में छपी है। (ISBN क्रं 81-87171-37-5, पृष्ठ संख्या 36, मूल्य - रू 20/-, संस्करण 2001) ये पुस्तक पीडीएफ प्रारूप में मुफ्त भी उपलब्ध है।

केवल 8 रुपए मूल्य की एक और पुस्तक है - नज़र का फेर - दृष्टिभ्रम के खेल। आओ माथा पच्ची करें श्रेणी की यह आठवीं पुस्तक है। इस छोटी सी पुस्तिका में दृष्टिभ्रम पैदा करने वाले ड्राइंग, रेखांकनों, रेखाचित्रों व कलाकृतियों को समेटा गया है। इनके जरिए बच्चे द्वि-त्रिआयाम के बारे में तो समझते ही हैं, कलाकृति के पर्सपेक्टिव को शीघ्र समझ सकते हैं (ISBN क्रं 81-87171-58-8, पृष्ठ संख्या 20, संस्करण 2004)।

और अंत में बात चैन्नई स्थित तुलिका प्रकाशन द्वारा प्रकाशित दो पुस्तकों की।

Samandar Aur Meinसमंदर और मैं संध्या राव की मूल अंग्रज़ी पुस्तक का बढ़िया हि्न्दी अनुवाद है। ये एक ऐसे लड़के की कहानी है जो दिसंबर 2004 में आये सुनामी से प्रभावित हुआ पर शायद ये ऐसे किसी भी बालक की कहानी हो सकती है को प्रकृति की गोद में पल बढ़ रहा हो। पुस्तक में मनमोहक स्थिर चित्र हैं, रेत शंख और तट रेखा के रंग क्रेयान से मिलकर मानों उस मर्म पर मरहम लगाते हैं जिनका इस त्रासदी में सब कुछ सागर की गर्त में समा गया।

ये कहानी भले गमग़ीन करती है पर अच्छी बात ये है कि पुस्तक का रुख आशावादी और प्रेरणास्पद है। चित्रों से शायद क्रंकीट के जंगलों में रहते बच्चे नौका, पानी, रेत और समंदर के संबंधों को समझ सकें और प्रकृति का सम्मान करना सीखें। पुस्तक की भाषा कई जगह अस्पष्ट है पर छपाई बेहतरीन है। छ वर्ष या ज्यादा उम्र के बच्चों पर केंद्रित ये 24 पृष्ठ के इस पुस्तक की कीमत है 100 रुपये। चिकने कागज़ की छपाई के लिहाज़ से न देखें तो कीमत ज़्यादा तो है। (ISBN क्रं 81-8146-114-2)

a target="_blank" href="http://www.tulikabooks.com/classics.htm#pippi">Pippi Lambemojeपिप्पी लंबेमोज़े ऐस्ट्रिड लिंडग्रन की नामचीन स्वीडिश पुस्तक पिप्पी लाँगसट्रम्प का संध्या राव द्वारा किया हिन्दी अनुवाद है। ऐस्ट्रिड का भारत के लिये भले नया नाम हों पर उनकी कम ही किताबें हैं जिन पर फिल्म नहीं बनीं। स्वीडन में छोटे बड़े सभी उनकी रचनाओं को पसंद करते रहे हैं। सरल भाषा, उम्दा विचार, हंसी मजाक और गंभीरता, ऐस्ट्रिड के लेखन में ये सभी रंग प्रचुरता से मिलते हैं। वे मानतीं थीं कि वे सिर्फ बच्चों के लिये ही लिखना चाहती हैं क्योंकि सिर्फ बच्चे ही पढ़ते समय चमत्कार कर सकते हैं।

ये पुस्तक ऐस्ट्रिड ने अपनी बीमार बेटी को कहानियाँ सुनाने के लिये लिखी। किताब से न केवल पुराने स्वीडन की संस्कृति का पता चलता है बल्कि ये भी कि पिप्पी बच्ची होने पर भी कितनी स्वतंत्र है। साठ साल पहले लिखी ये किताब आज भी बड़ी सार्थक है, भले ही भारतीय पाठक कई बातों को पचा ना पायें। 50 रुपये की इस किताब में 102 पेज हैं और अनेक सुंदर रेखांकन हैं (ISBN क्रं 81-86895-91-4)।

प्रकाशकों से संपर्क की जानकारी

एकलव्य
ई-7, एचआईजी 453,
अरेरा कॉलोनी,
भोपाल - 462016.
  नैशनल बुक ट्रस्ट
ए-5, ग्रीन पार्क,
नई दिल्ली - 110016.
http://www.nbtindia.org.in
  तुलिका पब्लिशर्स
13 पृथ्वी एवैन्यू,
अभिरामपुरम, चैन्नई - 600018.
http://www.tulikabooks.com
टिप्पणियाँ (2)add
चिचालकर गुरुजी की याद
written by अफ़लातून on मई 30, 2007

जुगाड़ या मनोरंजक न भी हों , परन्तु कबाड़ कलात्मक भी हो सकता है । एकलव्य की किताबों के बारे में पढ़ते हुए याद आया कि कलाकार स्व. विष्णु चिंचालकर बच्चों के मेलों में जा कर ऐसी चीजों के जरिए सौन्दर्यबोध के संस्कार दिया करते थे - बतौर एक मिशन ।
समीक्षा और चुनाव के लिए साधुवाद ।

अच्छी सूचनाएँ
written by हरिराम on मई 31, 2007

अच्छी सूचनाएँ दी गईं हैं। इन पुस्तकों को भारत सरकार के राजभाषा विभाग की पुस्तक सूची में शामिल किया जाना चाहिए।

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