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HIW: खुद कंप्यूटर सीखते हैं बच्चे छापें ई-मेल
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बेकारअति उत्तम 
इस के लेख़क हैं देबाशीष चक्रवर्ती   

संवाद"होल इन द वॉल" द्वारा डॉ सुगाता मित्रा ने यह सिद्ध किया कि बच्चे बिना शिक्षकों व औपचारिक प्रशिक्षण के स्वयं कंप्यूटर सीख सकते हैं। इससे ये भी स्पष्ट होता है कि बेहद कम कीमत में करोड़ों भारतियों तक सूचना प्रोद्योगिकी की मशाल पहुंचाना कोई दिवास्वप्न नहीं है।

डॉ सुगाता ने ये प्रयोग 1999 में शुरु किया कालकाजी दिल्ली के झोंपड़ पट्टी इलाके में। इसकी सफलता से प्रभावित होकर अगले कियोस्क शिवपुरी, मध्यप्रदेश तथा मदनतुसी, उत्तरप्रदेश में स्थापत किये गये। वे इसे मिनिमम इवेसिव एजूकेशन पुकारते हैं जिसका पर्याय है शिक्षका के बिना या कम से कम रोकटोक के साथ तैयार ज्ञानार्जन का माहौल जिसमें बच्चे अपनी नैसर्गिक जिज्ञासा का पूर्ण उपयोग कर अधिकाधिक सीख सकें। ग्रामीण भारत में अब इसके 23 से ज़्यादा कियॉस्क हैं। 2004 में ये प्रयोग कंबोडिया में भी दोहराया गया।

सुगाता भौतिकी में पीएचडी हैं। कॉग्निटिव साईंस तथा शिक्षा तकनलाजी में २५ से अधिक ईजाद का श्रेय उन्हें जाता है। 2005 में वे देवांग मेहता पुरस्कार से नवाज़े गये हैं। डॉ मित्रा कंप्यूटर शिक्षा से जुड़ी संस्था एनआईआईटी में प्रमुख वैज्ञानिक हैं। निरंतर ने डॉ सुगाता मित्रा से और जानकारी ली इस अनूठे प्रयोग के बारे में। प्रस्तुत है इसी वार्तालाप के महत्वपूर्ण अंश।

होल इन द वॉल (HIW) प्रयोग में प्रयुक्त कंप्यूटरों का हार्डवेयर कंफीगरेशन क्या होता है? आप खुले वातावरण की उष्मा, धूल ब आद्रता तथा ग्रामीण इलाकों में बिजली की समस्या से कैसे निबटते हैं? क्या किसी विशेष सॉफ्टवेयर का भी प्रयोग होता है?

पर्सनल कंप्यूटर, जो दुनिया भर में घरों और दफ्तरों में प्रयोग होते हैं, चाहरदिवारी के अंदर के कंडीशंड व नियंत्रित वातावरण में काम करने के लिये ही डिजाइन किये गये हैं। ऐसे कंप्यूटरों को ग्रामीण भारत या कंबोडिया जैसे इलाकों में, जहाँ वातानूकूलन व बढ़िया विद्युत सप्लाई का अभाव है, बाहरी वातावरण में नहीं रखा जा सकता।

A HIW Kioskइस प्रयोग के दौरान हमनें एक ऐसे अहाते (एंक्लोज़र) का डिजा़इन बनाया जिससे साधारण पर्सनल कंप्यूटर भी बाहरी वातावरण में कार्य कर पाते हैं। इस अहाते में एक छोटा झोंपड़ीनुमा ईंटों का ढाँचा होता है जिसकी एक ओर, दीवार में बनी आयताकार काँच से ढंकीं खिड़कियों से, कंप्यूटर के स्क्रीन दिखाई देते हैं। बाहरी मौसम में घरों और दफ़्तरों में प्रयुक्त होने वाले पारंपरिक माउस कुछ ही दिन टिक पाते हैं। हमने टोबू नामक एक नये सॉलिड स्टेट माउस की रचना की जिसमें कोई घूमने वाला पुर्ज़ा नहीं होता। इस माउस में एक प्लास्टिक प्लेट पर धातु के छः छोटे गोले बने होते हैं। इन्हें "टच बटन" कहा जाता है और इनसे काम लेने के लिये बस इन्हें अंगुली से छूना भर होता है। इन गोलों में से चार कर्सर को दायें बायें तथा ऊपर नीचे की दिशाओं में घुमाते हैं और दो लेफ्ट वा राइट "क्लिक" के काम आते हैं। उपरोक्त चार टच बटनों के संयोजन से से कर्सर को तिरछा भी घुमाया जा सकता है।

दीवार में बने आयताकार छेद से मॉनीटर के नीचे कीबोर्ड तथा टोबू माउस दोनों बाहर निकले रहते हैं। इन पर रखा पर्सपेक्स (एक प्रकार का पारदर्शी थर्मोप्लासटिक एक्रीलिक रेसिन) से बना एक ढक्कन धूल से इनकी रक्षा करता है। इस छज्जेनुमा ढक्कन के नीचे हाथ डालकर प्रयोगकर्ता माउस व कीबोर्ड का प्रयोग करता है। छोटे हाथों के प्रवेश के लिये इसकी चौड़ाई पर्याप्त होती है। हर खिड़की पर एक धातु का ढक्कन रहता है जिसे कार्यसमय में खोल दिया जाता है और खुली अवस्था में यह सुरज की किरणों से कंप्यूटर को छाया भी प्रदान करता है। इस ढक्कन की ऊंचाई जानबूझकर कम रखी गई है ताकि बड़े इसका आसानी से प्रयोग न कर सकें। हर खिड़की के सामने बैठने के लिये एक बेलनाकार रॉड बनी रहती है, यह भी दीवार से कुछ ही दूरी पर होती जिससे लंबे कद के लोग आसानी से न बैठ सकें। ऐसे डिजाईन द्वारा हम ये चाहते हैं कि केवल 13 साल से कम उम्र के बच्चे ही इन कंप्यूटरों का प्रयोग कर सकें।

हर प्लेग्राउंड कंप्यूटर में वेब कैमरा व माइक्रोफोन होता है। चार घंटों का बैटरी बैकअप भी मुहैया कराया जाता है। अहाते में लगे सेंसरों और संबंधित सॉफ्टवेयर से हम तापमान, आद्रता, बिजली की अवस्था, कंप्यूटर पर चलाये अनुप्रयोग और खोली गई वेबसाईट्स, कंप्यूटर का इस्तेमाल करते बच्चों के चित्र व आवाज़ जैसी जानकारियों पर दूर से नज़र रखते हैं। इसके अलावा हमारा साफ्टवेयर ये ध्यान रखता है कि किसी ज़रूरी अनुप्रयोग को हटाया न जाय, डेस्कटॉप आइकंस को न बदला जाय तथा सिस्टम प्रयोग न किये जा रहे अनुप्रयोगों को स्वतः बंद करे और कंप्यूटर के हैंग हो जाने पर खुद ब खुद रिस्टार्ट भी हो जाये।

सूर्य की रौशनी से कंप्यूटर स्क्रीन चमकें नहीं इसलिये इस पूरी व्यवस्था को आमतौर पर इस प्रकार स्थापित किया जाता है कि स्क्रीन का रुख उत्तर पूर्व दिशा की ओर हो।

HIW अवधारणा में शिक्षक हैं ही नहीं। क्या ये प्राथमिक शिक्षा तक ही सीमति रहेगी या फिर इसे उच्च शिक्षा क्षेत्र में भी अपनाया जा सकता है?

ये व्यवस्था प्राइमरी तथा प्री प्राइमरी स्तर के लिये ही उपयुक्त है। पर सहयोगी (कोलैबोरेटिव) तथा स्वतःनियामित (सेल्फ रेगुलेटेड) शिक्षण की ये संकल्पना किसी भी आयु समूह पर आजमायी जा सकती है।

Dr Sugata Mitraक्या इस तरह की शिक्षा असल जिंदगी में नौकरी दिला पायेगी?

कंप्यूटर में प्रवीणता किसी भी नौकरी के लिये आवश्यक है।

इस प्रोजेक्ट को वर्ल्ड बैंक तथा भारत सरकार से ग्रॉँट मिली है। पर इस विचार का क्रियान्वयन कैसे होगा? सरकार को किस किस्म के बजट की दरकार होगी। क्या आपको ये लगता है कि पारंपरिक शिक्षा पर खर्च के साथ साथ सरकार ऐसी योजनाओं पर भी खर्चना चाहेगी?

मेरा विचार है कि दोनों तरीकों का सहअस्तित्व होना ज़रूरी है। सर्व शिक्षा अभियान के पास अभिनव कार्यों के लिये फंड हैं और वे भारत के दूरदराज़ इलाकों में होल इन द वॉल कंप्यूटर लगाने पर खर्च कर रही है।

हमारे देश में HIW जैसे अभिनव प्रयोग निजि क्षेत्र से ही आते हैं। क्या वजह हैं कि ऐसी सरकारी संस्थायें, जिन पर इसी अपेक्षा से साथ करदाताओं के पैसे लुटाये जाते हैं, इस प्रकार का कोई अभिनव विचार नहीं रच पातीं?

मैं नहीं समझता कि ये पूर्णतः सही है। अंतरिक्ष कार्यक्रम जैसे ऐसे अनेक महत्वपूर्ण विचार हैं जिनका सरकार ने विकास किया है। लेकिन, सरकार में गति और नये विचारों को बाजा़र तक ले जाने की क्षमता की कमी है।

क्या इंटरनेट शिक्षकों की जगह ले सकेगा? इंटरनेट पर पोर्नोग्राफी जैसे खतरों से बच्चों को कैसे बचाया जा सकेगा?

सार्वजनिक होल इन द वॉल कंप्यूटरों में ऐसे ज़्यादातर खतरे मौजूद नहीं हैं। कंप्यूटर की स्क्रीन पर आते जाते वयस्कों की नज़र पड़ती रहती है और चुंकि प्रयोग समूहों में ही होता है अतः दुरुपयोग, चोरी या वैंडेलिस्म से रक्षा करने के लिये सामाजिक नियंत्रण मौजूद होता है। प्रयोग के चार वर्षों के दौरान ग्रामीण भारत तथा कंबोडिया में स्थापित ऐसे १०० कंप्यूटरों में केवल चार कंप्यूटर वैंडेलिस्म की वजह से क्षतिग्रस्त हुये और कुल उपलब्ध समय का 0.3% समय ही पोर्नोग्राफी तक पहुँचने में जाया हुआ।

हमारे गाँवों को क्या मिलना चाहिये क्या नहीं वाली शहरी सोच ही गलत है। उन्हें भी केबल टीवी, इंटरनेट और रेवलॉन चाहिये।

HIW प्रयोग के निष्कर्षों में से एक था कि बच्चे विभिन्न तत्वों के लिये रूपकों (मेटाफर) का प्रयोग करने लगे जैसे कि आवरग्लास को डमरु पुकारना। एनआईआईटी ऐसी शिक्षण पद्धति से जुड़ी है जहाँ लोगों को पारिभाषिक शब्दावली (टर्मिनोलॉजी) सिखाने की फीस ली जाती है। क्या टर्मिनोलॉजी सीखना हमारे शिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा नहीं है?

हो सकता है। यहाँ वे कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख रहे हैं। ये ज्ञान क्रियात्मक (फंक्शनल) है। ये कार चलाना सीखने जैसा है, इस बात का कोई महत्व नहीं होता कि आप ये जानें कि कार्बोरेटर क्या होता है या कि गीयर किस तरह काम करते हैं।

HIW प्रयोग ने शायद यही साबित किया है कि एक अपारंपरिक, अनौपचारिक शिक्षा व्यवस्था जो खेल खेल में पढ़ा दे, बेहतर काम करती है। पर आपक क्यों सोचते हैं कि केवल कंप्यूटर द्वारा ही यह उद्देश्य हासिल होगा। क्या ये फक़्त सफ़ेदपोश नौकरियों के लिये कंप्यूटर की जानकारी रखने वाले लोगों को तैयार करने जैसा नहीं है?

हो सकता दूसरे मार्ग भी हों। मैं सिर्फ यही दिखाने का प्रयास कर रहा हूँ कि कंप्यूटर का प्रयोग करना सीखना सभी बच्चे खुद ब खुद (सेल्फ इंस्ट्रक्शन) कर सकते हैं। मैं सोचता हूं कि हर नागरिक को कंप्यूटर लिटरेट होना चाहिये चाहे उनका पेशा कुछ भी हो। जिस तरह अंकगणित का हर किसी को ज्ञान होना चाहिये, केवल सफ़ेदपोशों को नहीं।

HIW के मूल में संभवतः एडूटेन्मेंट है और आजकल बच्चों के टीवी कार्यक्रम भी अपने आप को इसी प्रारूप में पेश करते हैं। केबल युग के बच्चों के टीवी कार्यक्रमों को आप कितने नंबर देंगे?

अच्छे टीवी कार्यक्रम भी हैं और बुरे भी। एडूटेन्मेंट जितना अधिक हो उतना अच्छा। उदाहरण के तौर पर नैटजीयो, डिस्कवरी आदि बेहद अच्छे हैं।

एक बात बड़ी अजीब लगती है। ग्रामीण भारत में अब भी मूलभूत सुविधायें मयस्सर नहीं हैं। आम तौर पर शिक्षा और स्वस्थ्य सुविधाओं का अकाल है। पर यहाँ हम डिजिटल डिवाईड को पाटने की बात कर रहे हैं। क्या ये वाकई एक शहरी सपना नहीं है? क्या वास्तवकि भारत से इसका कोई सरोकार है?

गाँव वालों से पूछिये। मैं सोचता हूँ कि हमारे गाँवों को क्या मिलना चाहिये क्या नहीं वाली शहरी सोच ही गलत है। उन्हें भी केबल टीवी, इंटरनेट और रेवलॉन चाहिये :) पर हम शहरी लोग ये सोचते हैं कि ये सब बस हमें ही मिलना चाहिये उन्हें नहीं।

क्या HIW अन्य देशों में भी अपनाया गया है? परिणाम कैसे रहे?

जी हाँ, कंबोडिया तथा दक्षिण अफ्रीका में, परिणाम भारत जैसे ही मिले।

HIW प्रयोग में टार्गेट समूह के लिये आयु तथा शिक्षा की न्यूनतम योग्यतायें क्या रहती हैं?

आयु वर्गः 6 से 15 वर्ष। शैक्षणिक योग्यता आवश्यक नहीं है, अनपढ़ भी कंप्यूटर का प्रयोग करना सीख सकते हैं।

अंतर्जाल पर भारतीय भाषाओं में आजकल काफी सामग्री उपलब्ध है। आप इस दौर को किस तरह देखते हैं? भविष्य कैसा दिखता है आपको?

इंटरनेट का एक छठवां हिस्सा भारतीय भाषाओं में ही होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि मानव जनसंख्या का एक छठवां हिस्सा भारतीयों से बना है।

भारतीय सामग्री तो भारतियों द्वारा ही बनाई जायेगी। जितनी (इंटरनेट की) पहुँच बढ़ेगी उतनी सामग्री में भी बढ़ोतरी होगी। अंततः इंटरनेट का एक छठवां हिस्सा भारतीय भाषाओं में ही होगा, ठीक उसी तरह जैसे कि मानव जनसंख्या का एक छठवां हिस्सा भारतीयों से बना है।

आपका कॉम्पलेक्स सिस्टम्स के बारे में एक लेख पढ़ा। क्या आप 'सोशियल बुकमार्किंग साईट्स" तथा "ब्लॉग अन्काँर्फ्रेस" को इस प्रतिमान का हिस्सा मानेंगे?

हाँ, ये सभी सेल्फ आर्गनाईज़िंग कॉम्पलेक्स सिस्टम्स हैं। मैंने इस विषय पर दो पेपर लिखे हैं।

भारत सरकार द्वारा वन लैपटॉप पर चाईल्ड (OLPC) ग्रांट को ठुकरा देने पर आपकी क्या राय है?

मुझे उनके तर्क मालूम नहीं हैं। पर मुझे लगता है कि किसी भी चीज़ को उसका असर मापे बिना अपनाना या दुत्कारना नहीं चाहिये।

आजकल आप क्या कर रहे हैं?

फिलहाल शिक्षा टेक्नलॉजी और सेल्फ आर्गनाईज़िंग सिस्टम्स आदि पर काम कर रहा हूँ।


देबाशीष चक्रवर्ती
About the author:
देबाशीष चक्रवर्ती हिन्दी के शुरुवाती चिट्ठाकारों में से एक हैं। वे पुणे स्थित एक सॉफ्टवेयर सलाहकार हैं। देबाशीष इंटरनेट पर Geocities के दिनों से सक्रिय रहे हैं, अक्टूबर 2002 में अपना अंग्रेज़ी ब्लॉग नल प्वाइंटर और नवंबर 2003 में हिन्दी चिट्ठा नुक्ताचीनी आरंभ किया। देबाशीष DMOZ पर संपादक रहे हैं। उन्होंने हिन्दी व भारतीय भाषाओं एक जालस्थल चिट्ठा विश्व भी शुरु किया था, यह हिन्दी चिट्ठों का पहला एग्रीगेटर था। उन्होंने वर्डप्रेस, इंडिक जूमला तथा आई जूमला जैसे अनेक अनुप्रयोगों के हिन्दीकरण में योगदान दिया। 2005 में उन्होंने इस पत्रिका निरंतर का प्रकाशन अन्य साथी चिट्ठाकारों के साथ आरंभ किया। देबाशीष ने इंडीब्लॉगीज नामक वार्षिक ब्लॉग पुरुस्कारों की स्थापना भी की है। उन्हें बुनो कहानी तथा अनुगूंज जैसे सामुदायिक प्रयासों को शुरु करने का भी श्रेय जाता है। संप्रति ब्लॉग लेखन के अलावा हिन्दी पॉडकास्ट पॉडभारती पर सक्रीय हैं और यदाकदा अंग्रेज़ी व हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान देते रहते हैं।
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टिप्पणियाँ (1)add
CLP (Computer Literacy Programm)
written by Amar Chand on सितम्बर 17, 2008

Dear Sir, I agree with youm your topic is very good for Computer Literacy Programm, 6 Lacs Viillage in India. so, Computer leteracy programme started all village. I ma ready for you help.

I am Computer Faculty, I had worked in JNV (Undre Minstry of HRD) in summer vacation. I had conducted the programm for rural area school (Boys & girls). Under CLP.

I am ready for your programm in rural areas school Computer Literacy.

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