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बलॉगिंग विथ परपस

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देबाशीष चक्रवर्ती

  

उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारीः सच या मिथक

नज़रियाकुछ समय पहले मैंने ब्लॉग को बहुत गंभीरता से न लेने कि हिमायत करते हुए अपने अंग्रेज़ी चिट्ठे में लिखा था कि ब्लॉग से सामाजिक बदलाव या जनजागरण जैसे असर की अपेक्षा रखना इस माध्यम को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना है। "मैंने आज नाश्ते मे दलिया खाया" या फिर "मैंने आज बॉस की बेटी को किस किया" नुमा नितांत आत्मकेंद्रित चिट्ठों कि भरमार से मेरी यह राय पुख्ता हुई। मन ही मन यह चाहते हुए कि "बलॉगिंग विथ परपस" यानि उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी हकीकत बने मैंने आहिस्ता आहिस्ता यह प्रयास किया कि राजनैतिक समाचारों पर टिप्पणी के अलावा सामाजिक तथ्यों पर भी लिखुं, मूलतः बंगाली होने और अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के बावजूद हिन्दी बेल्ट में अधिकांशतः रहने के कारण सोचता हिन्दी में था, अतः हिन्दी ब्लॉग शुरु किया। पर जैसी चिट्ठाकारी आप और मैं करते आए हैं यह उस रूप से ज्यादा अलग नहीं है जो समीक्षक ब्लॉगिंग को महज़ पत्रकारिता का ही नया आयाम करार दे कर गढ़ चुके थे।

एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया।

एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया। विचारों की हिकारत से कुकुरमुत्तों की नाई केले उग आए। असर ऐसा था कि मुझे कई दफा ये लगा कि अपना चिट्ठा बंद ही कर दूँ, महीनों लिखने का जी नहीं करता। जिह्वा उपनाम से लिखने वाले बंगलौर निवासी लेखक ने जब अपना बेहद प्रसिद्ध चिट्ठा बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी, "आखिरकार ये मेरा ही है, जो चाहे सो करूँ" की भावना के साथ पटाक्षेप हुआ। जिश मुर्खजी ने कलम रखी तो सुझाव दिया,"ब्राउज़र के बाहर भी एक दुनिया है, उसका ज़ायका लो" भारतीय समाज पर ब्लॉग के असर के प्रश्न पर अर्थशास्त्री और ब्लॉगर अतानु दे कह उठे, "मज़ाक कर रहे हो क्या! भारत को कौन बदल सकता है?" ये नाकारात्मक रूख मेरी इस भावना को बलवती करते रहे हैं कि चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस, वे शायद समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते। ब्लॉगिंग आखिरकार कोई सामाजिक आंदोलन तो है नहीं, यह बस "तू मुझे लिंक कर और मैं तुझे" की ब्लॉग की मूल भावना पर ही झूल रहा है। अब तक ब्लॉगिंग के गिने चुने रूख ही मुखर हुए हैं,कड़ियों के संकलन,निजी वाकये या 9/11 जैसी आपदाओं पर आपबीतियाँ, समाचारों पर टिप्पणियाँ जैसे चिट्ठे जो शायद किसी और पेशे से जुड़े गैरलेखकों की सृजनात्मकता का पक्ष रखते हैं और दूसरे काफी संजीदा से चिट्ठे जो अक्सर लेखक के अपने ही पेशे से ताल्लुक रखते हों।

त्सुनामी हेल्प ब्लॉग को कारगर होते देख मेरी यह भावना काफी बदली है। इस एक ब्लॉग ने सेवाभावना को सर्वोपरि रख कर अनेकानेक पृथक दलों को एकीकृत किया और शायद यह स्थापित भी किया कि ब्लॉगिंग सिर्फ पत्रकारिता या निजी डायरी लेखन नहीं है। निरंतर के पहले अंक की आमुख कथा में मुम्बई स्थित सलाहकार दीना मेहता ने मेरे आग्रह पर इसी विषय से जुड़ा एक अन्वेषी लेख लिखा है जो चिट्ठाकारी के बदलते परिवेश पर विश्लेषणात्मक दृष्टिपात कर रहा है। यदि लेखिका का पूर्वानुमान सही निकले तो दिन दूर नहीं जब उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी एक सचाई बनेगी और लोग चिट्ठाकारी को पेशे के रूप में अपना सकेंगे।




साझे प्रयासों की एक और कड़ी

Nirantarब्लॉग यानि कि चिट्ठा वर्तमान दौर में अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। दुनिया भर में चिट्ठों की लोकप्रियता बढ़ी है तथा हर घड़ी नए ब्लॉग जन्म ले रहे हैं। हिन्दी में ब्लॉग लेखन का सिलसिला शुरु हुये दो साल हुये हैं। इस साल भारतीय भाषाओं मे ब्लॉग लेखन में भी तेजी आई साथ ही विषयों में विविधता तथा गहराई बढ़ी है। लेखन के अलावा जो एक बात सशक्त रूप से उभरी वह है हिन्दी चिट्ठाकारों का पारस्परिक व्यवहार और चिट्ठाकार समुदाय का जन्म। अक्षरग्राम और चिट्ठा विश्व से लेकर सर्वज्ञ, अनुगूँज, बुनो कहानी जैसे कितने ही साझे प्रयासों के शक्तिशाली उदाहरण सामने हैं। निरंतर इसी की एक कड़ी है।

यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि आने वाले समय में चिट्ठाकारी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी चिट्ठाकारी भी इसका अपवाद नही होगी। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक ब्लॉग पत्रिका की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही थी। पत्रिका का कलेवर ऐसा सोचा जा रहा था जिससे चिट्ठाकार बन्धु अपना रचना कौशल निखार सकें साथ ही गैर ब्लॉग लेखकों के लिए ब्लॉगजगत की छवि प्रस्तुत की जा सके। इसी उद्देश्य को लेकर शुरु की जा रही है यह हिन्दी जगत (और संभवतः विश्व की) की पहली ब्लॉग पत्रिका -- निरंतर। शुरुआती दिनों में जब हिन्दी चिट्ठाकारी का स्वरूप, शैली, शिल्प सब कुछ निर्माण के दौर में है, उम्मीद है कि निरन्तर का प्रकाशन इस काम में मील का पत्थर साबित होगा। यह प्रयास सामूहिक है। सबकी भागीदारी के बिना इस ऐतिहासिक काम को अंजाम देने की सोचना दिवास्वप्न होगा। सभी से आशा एवं अनुरोध है कि अपने सुझाव व सहयोग के माध्यम से निरंतर से जुडे रहें। साथियों के सहयोग के लिये बढे हाथों की गर्मजोशी ही निरंतर की सफलता की कहानी कहेगी।

निरंतर के संपादक मंडल के सभी साथियों पंकज नरूला, जितेन्द्र चौधरी, अनूप शुक्ला, रविशंकर श्रीवास्तव, अतुल अरोरा और रमण कौल का मैं आभार व्यक्त करता हूँ सहयोग, समर्थन, धैर्य और भागीदारी के लिए।

आपका मित्र
देबाशीष चक्रवर्ती


देबाशीष चक्रवर्ती
About the author:
देबाशीष चक्रवर्ती हिन्दी के शुरुवाती चिट्ठाकारों में से एक हैं। वे पुणे स्थित एक सॉफ्टवेयर सलाहकार हैं। देबाशीष इंटरनेट पर Geocities के दिनों से सक्रिय रहे हैं, अक्टूबर 2002 में अपना अंग्रेज़ी ब्लॉग नल प्वाइंटर और नवंबर 2003 में हिन्दी चिट्ठा नुक्ताचीनी आरंभ किया। देबाशीष DMOZ पर संपादक रहे हैं। उन्होंने हिन्दी व भारतीय भाषाओं एक जालस्थल चिट्ठा विश्व भी शुरु किया था, यह हिन्दी चिट्ठों का पहला एग्रीगेटर था। उन्होंने वर्डप्रेस, इंडिक जूमला तथा आई जूमला जैसे अनेक अनुप्रयोगों के हिन्दीकरण में योगदान दिया। 2005 में उन्होंने इस पत्रिका निरंतर का प्रकाशन अन्य साथी चिट्ठाकारों के साथ आरंभ किया। देबाशीष ने इंडीब्लॉगीज नामक वार्षिक ब्लॉग पुरुस्कारों की स्थापना भी की है। उन्हें बुनो कहानी तथा अनुगूंज जैसे सामुदायिक प्रयासों को शुरु करने का भी श्रेय जाता है। संप्रति ब्लॉग लेखन के अलावा हिन्दी पॉडकास्ट पॉडभारती पर सक्रीय हैं और यदाकदा अंग्रेज़ी व हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान देते रहते हैं।
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