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पत्र : वहशीपन से देश महान नहीं बनता |
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इस के लेख़क हैं देबाशीष चक्रवर्ती
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संपादक के नाम पत्रवहशीपन से देश महान नहीं बनता
संपादक महोदय,
गुजरात के मुख्यमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के वीजा हेतु आवेदन किया था, जहाँ उन्हें किसी संस्था के उद्घाटन हेतु कैलीफॉर्निया जाना था। पर कुछ बुद्धिजीवियों जिनमें अधिकतर भारतीय थे ने विदेश मंत्रालय से उनको वीजा देने पर अपना विरोध दर्ज कराया। मंत्रालय संभवतः इस यात्रा के विरोध दर्शाते ईमेल संदेशों जो कि कैलीफॉर्निया विश्वविद्यालय भी भेजे गये थे से दबाव में आ गया। अंततः वीजा का आवेदन रद्द हो गया।
वैसे तो वीजा देना न देना राष्ट्र विशेष का विशेषाधिकार है परंतु हमें एक चुने हुए जनप्रतिनिधि को वीजा रद्द होने से निराशा हुई। हम विदेश मंत्रालय को इस अदूरदर्शी कदम पर लिखना चाहते थे क्योंकि हजारो लाखों गुजराती अमेरिका की आर्थिक एवं बौद्धिक संपदा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। पर इससे पहले कि हम कुछ लिखें, बीबीसी पर बजरंग दल के सदस्यों द्वारा अहमदाबाद स्थित पेप्सी कोला के गोदाम में आग लगाने एवं तोड़फोड़ की खबर आयी। ऐसी हरकत से सिर्फ भारत के दुश्मन ही खुश हो सकते हैं। यह कदम राजनैतिक बचकानापन दर्शाता है। यह हिंसा गुजरात में चरमपंथियों के लगाममुक्त होने की आशंकाओं को ही बल देती है। ऐसा उद्दंड व्यवहार हिंदुओं एवं साथ साथ भारत को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है।
बजरंग दल द्वारा अहमदाबाद स्थित पेप्सी कोला के गोदाम में आग लगाने एवं तोड़फोड़ की हरकत से सिर्फ भारत के दुश्मन ही खुश हो सकते हैं। यह हिंसा गुजरात में चरमपंथियों के लगाममुक्त होने की आशंकाओं को ही बल देती है। ऐसा उद्दंड व्यवहार हिंदुओं के साथ साथ भारत को शर्मसार करने के लिए पर्याप्त है।  हमारे महान देश का नेतृत्व इतना रीढविहीन एवं अदूरदर्शी कैसे हो सकता है जो गुंडो को राजनैतिक परिदृश्य पर छाने की खुली छूट देता है। एक राष्ट्र जो महान बनने की और एक राजनैतिक दल जो दूसरों का विश्वास जीतने की आकांक्षा रखता है उसे नये सिरे से अनुशासन, शालीनता और सभ्यता का पाठ सीखना होगा। इस तोड़फोड़ और आगजनी से हम वहशियों के स्तर तक गिर जायेंगे और फिर हमें दुनिया से सम्मान मिलने की उम्मीद नहीं रखनी चाहिए। गुजरात सरकार ने हिंदुओं को एकबार शर्मसार किया है और इन शरारती तत्वों को सजा न देकर वह दुबारा ऐसा करेगी और दुनियाभर में अपने समर्थक खो देगी। मुझे पूरे विश्व में अपने हिंदु होने पर गर्व है परंतु ऐसे आदिमकालीन सोच वालों के साथ खुद को संबद्ध देखकर शर्मसार हूँ।
मुझे पश्चिम में रहते चालीस वर्ष हो गये पर सर्वाधिक अपमान पिछले चार वर्षों में गुजरात के दंगो से महसूस हुआ। जो हिंदु क्षणिक हिंसा और भीड़तंत्र में विश्वास करते हैं भारत और हिंदुओं के सबसे बड़े शत्रु हैं। जिनको देश का नेतृत्व करने की चाह है, बेहतर है कि वे अपने वहशीपन पर अँकुश लगाना सीख लें अन्यथा वे और अधिक चुनाव हारेंगे और देश और अधिक अपना सम्मान खोयेगा। सस्ती लोकप्रियता से लोग महान और देश मजबूत नही बनता। हमें विश्व नागरिकों की तरह शीघ्र ही व्यस्क हो जाना चाहिए।
भवदीय
डॉ प्रद्युम्न सिंह चौहान
(आर्केडिया विश्वविद्यालय, अमरिका में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक) |
देबाशीष चक्रवर्ती |
| About the author: |
| देबाशीष चक्रवर्ती हिन्दी के शुरुवाती चिट्ठाकारों में से एक हैं। वे पुणे स्थित एक सॉफ्टवेयर सलाहकार हैं। देबाशीष इंटरनेट पर Geocities के दिनों से सक्रिय रहे हैं, अक्टूबर 2002 में अपना अंग्रेज़ी ब्लॉग नल प्वाइंटर और नवंबर 2003 में हिन्दी चिट्ठा नुक्ताचीनी आरंभ किया। देबाशीष DMOZ पर संपादक रहे हैं। उन्होंने हिन्दी व भारतीय भाषाओं एक जालस्थल चिट्ठा विश्व भी शुरु किया था, यह हिन्दी चिट्ठों का पहला एग्रीगेटर था। उन्होंने वर्डप्रेस, इंडिक जूमला तथा आई जूमला जैसे अनेक अनुप्रयोगों के हिन्दीकरण में योगदान दिया। 2005 में उन्होंने इस पत्रिका निरंतर का प्रकाशन अन्य साथी चिट्ठाकारों के साथ आरंभ किया। देबाशीष ने इंडीब्लॉगीज नामक वार्षिक ब्लॉग पुरुस्कारों की स्थापना भी की है। उन्हें बुनो कहानी तथा अनुगूंज जैसे सामुदायिक प्रयासों को शुरु करने का भी श्रेय जाता है। संप्रति ब्लॉग लेखन के अलावा हिन्दी पॉडकास्ट पॉडभारती पर सक्रीय हैं और यदाकदा अंग्रेज़ी व हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान देते रहते हैं। |
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