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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; AIDS</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>भारत में एड्सः शतुरमुर्ग सा रवैया</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0806-cover-bharat-mein-aids</link>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 06:42:29 +0000</pubDate>
		<dc:creator>डॉ सुनील दीपक</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[Condom]]></category>

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		<description><![CDATA[एड्स को हमारे जीवन में आये पच्चीस साल हो गये। भारत अब विश्व की सर्वाधिक एचआईवी संक्रमित जनसंख्या वाला देश बन गया है। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले। पढ़िये <strong>डॉ सुनील दीपक</strong> की आमुख कथा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 6px; margin-bottom: 6px;" title="AIDS wall painiting/Truckers are considered a vul" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aids.jpg" border="0" alt="AIDS wall painiting/Truckers are considered a vulnerable group." vspace="6" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स से हमें क्या लेना देना। मुझे कभी एड्स नहीं हो सकता। यह तो पैसे बनाने की अंर्तराष्ट्रीय साजिश है, इस से ज़्यादा भयावह तो हेपिटाईटिस रोग है। हमसे ज़्यादा एड्स पीड़ित तो अफ्रीका में हैं। यही मानते हैं न आप? अब चौंकिए! <a href="http://www.unaids.org">यूएनएड्स</a> की हालिया रपट के मुताबिक विश्व भर में 2005 के अंत तक 386 लाख एचआईवी संक्रमित लोग हैं, सिर्फ एशिया में ही 83 लाख ऐसे लोग हैं और इस की दो तिहाई संख्या भारत में बसती है। जी हाँ, हम दक्षिण अफ्रीका से आगे निकल चुके हैं। भारत अब विश्व की सर्वाधिक एचआईवी संक्रमित जनसंख्या वाला देश बन गया है।</p>
<p>हम चाहें तो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (<a href="http://www.nacoonline.org">नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम</a>) यानि भारानी और स्वास्थ्य मंत्रालय के हमेशा के तर्क &#8211; यानि कि ये आँकड़े गलत हैं, भारत के लिये संख्या 52.1 लाख है 57 लाख नहीं &#8211; से मतैक्य रखें या फिर समझदारी का परिचय देते हुए कम से कम यह स्वीकारें कि समस्या तो है और इस के प्रति शतुरमुर्गनुमा रवैया नहीं अपनाया जा सकता। भारानी ने माना है कि उसके आँकड़ों में 19 से 49 आयुवर्ग के ही लोग शुमार हैं, माता से बच्चों को या वृद्धों में हुए संक्रमण की जानकारी इसमें शामिल नहीं। जुलाई 2003 में भारानी की परियोजना निदेशक डा.मीनाक्षा दत्ता घोष ने कहा था एड्स भारत में केवल कुछ दलों या शहरों में रहने वालों तक सीमित नहीं है, यह अब आम जनता और गाँवों में भी फैल रही है। भारानी और यूएनएड्स दोनों ही यह मानते हैं कि भारत में 80 से 85 प्रतिशत संक्रमण असुरक्षित विषमलैंगिक (<a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Heterosexual">हेट्रोसेक्शुअल</a>) यौन संबंधों से फैल रहा है। इसके बाद दूसरा बड़ा कारण है इंजेक्शन द्वारा नशा करने वालों में संक्रमित सुई का प्रयोग। रक्त बैंको पर चुंकि अब काफी नियंत्रण रखा जाता है इसलिए रक्तदान से संक्रमण का फैलाव बहुत कम हुआ है।</p>
<h3>कौन हैं निशाने पर?</h3>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="How AIDS spreads in India" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-transmission-pie.jpg" border="0" alt="How AIDS spreads in India" hspace="2" vspace="2" width="250" height="149" align="right" />सेक्स वर्कर्स (यौन कर्मियों) को एड्स का बहुत खतरा है। हालाँकि कुछ राज्यों में वेश्यावृति को कानूनी मान्यता मिली है पर उससे जुड़े बहुत से काम जैसे ग्राहक खोजना और वेश्याघर चलाना गैरकानूनी हैं। इस वर्ष मार्च में लेखक ने काठमाण्डू में यौनकर्मियों की एक सभा में भाग लिया। पता चला कि उनमें से बहुत सी स्त्रियाँ शादीशुदा हैं, पति और बच्चों के साथ रहती हैं पर गरीबी और कमाई का अन्य कोई ज़रिया न होना उन्हें इस कार्य की ओर लाता है। एड्स की बात हुई तो उनमें से एक छोटी उम्र की युवती बोली, &#8220;सब लोग हमें ही दोष देते हैं कि हम यह बीमारी फैला रहे हैं। हमें कहा जाता है कि हम बिना कॉन्डोम के ग्राहक को न स्वीकारें। पर ग्राहकों के सामने हमारी क्या चलती है? यह मालूम भी हो कि अगर बीमारी हो गयी तो मुझे कोई सहारा नहीं देगा, घर से बाहर निकाल फेकेंगे, पर क्या करुँ? बच्चे भूखे हों तो एक प्लेट खाने के लिए बिक जाती हूँ, मैं किसी को कैसे मजबूर करुँ कि कॉन्डोम पहनो!&#8221;</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Statewise figures of AIDS" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-state-distribution.jpg" border="0" alt="Statewise figures of AIDS" hspace="2" vspace="2" width="250" height="247" align="left" />अनुमानतः मुम्बई में 15,000 यौनकर्मी हैं और 2003 में उनमें से 70 प्रतिशत के शरीर में एचआईवी वायरस था। सूरत में किये गये एक अन्य शोध ने दिखाया कि वहाँ की यौनकर्मियों में 1992 में 17 प्रतिशत के शरीर में एचआईवी वायरस था जिनकी मात्रा 2001 में बढ़ कर 43 प्रतिशत हो गयी थी।</p>
<p>ट्रक चालक भी एड्स की बीमारी के लिए अधिक खतरे वाला गुट माने जाते हैं। भारत की सड़कों का जाल विश्व में उच्च स्थान पर है और अनुमान लगाया गया कि भारत में 20 से 50 लाख तक लोग हैं जिनमें लम्बे रास्ते पर ट्रक चलाने वाले, उनकी सहायता करने वाले और क्लीनर शामिल हैं। 1999 में हुई एक शोध ने दिखाया था कि ट्रक चलाने वालों में 86 प्रतिशत हर यात्रा में सड़कों के जाल से जुड़े विभिन्न यौनकर्मियों से यौन संबंध बनाते हैं। उनमें एड्स के बारे में जानकारी तो अच्छी पायी गयी थी पर उनमें से केवल 11 प्रतिशत ही कॉन्डोम का प्रयोग करते थे।</p>
<p>चिंताजनक बात यह है कि संक्रमण का परिद्श्य अब बदल रहा है। एड्स का शिकंजा अधिक प्रचलित प्रदेशों (जैसे आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, मणिपुर और नागालैंड) और कुछ तबकों (यौनकर्मी, ट्रकचालक और नशा करने वाले) की बजाय आम जनता में बढ़ता जा रहा है। लांसेट के शोध के अनुसार दक्षिण भारत के राज्यों में एचआईवी के मामलों में एक तिहाई कमी आई है जबकि उत्तर भारत में वृद्धि हुई है।</p>
<h3>एड्स और मानवाधिकार</h3>
<div id="pullQuoteR">एड्स विधेयक के संसद के मानसून सत्र में पास होने की संभावना थी हमें यह जानकारी मिली है कि मौजूद सत्र में भी यह विधेयक नहीं लाया जा सकेगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विधेयक संसद को अभी तक नहीं भेजा है।</div>
<p>भारत सरकार एड्स के विषय पर एक नया कानून बना रही है जो कि दुनिया का इस तरह का पहला कानून होगा। इस विधेयक के संसद के मानसून सत्र में पास होने की संभावना थी परंतु निरंतर मित्र के हवाले से हमें यह जानकारी मिली है कि संसद के मौजूदा मानसून सत्र में भी यह विधेयक नहीं लाया जा सकेगा। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने विधेयक संसद को अभी तक नहीं भेजा है। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन (नाको) के संबंधित अधिकारियों ने इस संबंध बताया कि लॉयर्स कलेक्टिव ने इस विधेयक का जो प्रारूप नाको के पास भेजा था, उस पर मंत्रालय और भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आई.सी.एम.आर) में विचार-विमर्श हुआ। इसके उपरांत उस ड्राफ्ट को संशोधन संबंधी सुझावों के साथ वापस लायर्स कलेक्टिव के पास वापस भेजा गया है। इसके उपरांत इसे विधायी विभाग के पास भेजा जाएगा।</p>
<p>मतलब यह कि संसद के आगामी शीतकालीन सत्र में ही इस विधेयक को लाए जाने की आशा की जा सकती, हालाँकि यह भी आवश्यक नहीं कि उस सत्र में यह पारित हो ही जाएगा। संभव है कि विधेयक पर विचार के लिए इसे संसदीय स्थायी समिति के पास भेज दिया जाए, जहाँ इस पर कई महीने तक विचार-विमर्श होगा। संकेत तो यही हैं कि यह विधेयक अगले वर्ष के अंत से पहले पारित नहीं हो सकेगा।</p>
<p>विधेयक का मुख्य उद्देश्य है एचआईवी संक्रमित लोगों के साथ सामाजिक जीवन के हर क्षेत्र में हो रहे भेदभाव का विरोध, निजी क्षेत्र के संस्थान भी इसे के दायरे में शामिल होंगे। इस विधेयक को लाने की कार्यवाही शुरु हुये 4 साल हो चुके हैं, वकीलों के स्वयंसेवी संगठन लॉयर्स कलेक्टिव एचआईवी एड्स घटक (LCHAU) ने इसका प्रारुप तैयार किया, गनीमत है कि अंततः इसको संसद में पेश करने की नौबत आ सकी। इस प्रस्तावित बिल के अनुसार भारत सरकार एड्स पर काबू पाने के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की तर्ज पर एक राष्ट्रीय अभियोग बनायेगी जो राष्ट्रीय एड्स नीति को लागू करेगी।</p>
<p>संक्रमित लोगों की परेशानियों का वाकई कोई अंत नहीं। संक्रमित बच्चों को शालाओं से निकाले जाने से लेकर, नौकरी से बरखास्तगी, इलाज करने से मना करना जैसे मसलों से हमारा समाज अपरिचित नहीं। कार्यक्षेत्र में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव कोई कोरी फिल्मी कल्पना नहीं है (इसी अंक में पढ़ें &#8211; <a href="http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-per-films/">एड्स और फिल्में: अच्छी शुरुवात</a>) वकीलों के दल की कोओर्डिनेटर शोभना कुमार मानती हैं कि इस बीमारी को कलंक की तरह देखा जाता है इसलिए बीमारी से ग्रस्त व्यक्तियों के मानव अधिकारों की भी अवहेलना होती है। भारतीय जन स्वास्थ्य अभियान के डा.रवि नारायण कहते हैं, &#8220;एड्स के बारे में जनता को सही जानकारी न होने से और स्वास्थ्य कर्मचारियों को इस विषय पर ठीक से प्रशिक्षण न मिलने के कारण इस बीमारी के बारे में बहुत सी गलतफहमियाँ हैं जिनसे लोग एड्स रोगियों से गलत व्यवहार करते हैं। इसकी छवि लोगों में डर तथा घृणा बढ़ाती है जिसके डर से लोग जाँच और इलाज करवाने से डरते हैं।&#8221;</p>
<p>पुणे स्थित एडवोकेट असीम सरोदे ने निरंतर को बताया कि किसी कानून का अभाव भी भेदभाव का कारण है। वैसे उच्च तथा उच्चतम न्यायालयों के पुराने निर्णयों के आधार पर किसी भी एड्स संक्रमित व्यक्ति को कार्य से नहीं निकाला जा सकता यदि वह पूर्ण क्षमता से कार्य कर सकने में समर्थ हो। असीम कई पीड़ित लोगों को मुफ्त कानूनी मदद देते रहे हैं। उनका अनुभव यही रहा कि नियोक्ता कभी भी एड्स को वजह बताकर किसी को नौकरी से नहीं निकालते, वजहें कुछ और बताई जाती हैं जैसे कि अक्षमता या सहयोगियों से मनमुटाव। संप्रति बीमा कंपनियाँ भी इस रोग से संबंधित कोई पॉलिसी नहीं दे रहीं हैं पर यह बिल आने के बाद शायद स्थिति सुधरे। असीम का मानना है कि बिल के पास होने में कई बाधायें हैं क्योंकि पास होने के बाद इससे सरकारी कार्य और खजाने दोंनों पर बोझ काफी बढ़ने वाला है।</p>
<p>प्रस्तावित विधेयक संक्रमित लोगों को बराबरी, स्वायत्तता, स्वास्थ्य, जानकारी, प्रिवेसी और सुरक्षित कार्यस्थल के अधिकार दिलायेगा। किसी भी व्यक्ति के साथ नौकरी, स्वास्थ्य, यात्रा और बीमा के मुद्दे पर उसके एचआईवी संक्रमित होने की वजह से भेदभाव नहीं किया जा सकेगा। साथ ही संक्रमित व्यक्ति की जानकारी गोपनीय रखने की गारंटी भी मिलेगी। बिल में &#8220;अपने जीवनसाथी को सूचित रखने&#8221; और &#8220;संक्रमण न फैलाने&#8221; के दायित्व जैसे प्रावधान भी जोड़े गये हैं। हालांकि कई यह मानते हैं कि शिक्षा की बजाय कानून से ऐसे मुद्दे सुलझाना नामुमकिन है। उन्हें अंदेशा है कि जिन संस्थानों पर संक्रमित लोगों को निकाल बाहर न करने का कानूनी जोर डाला जायेगा वे उचित मानसिकता के अभाव में उनके प्रति बैर पाले बैठे रहेंगे।</p>
<h3>यौन संबंध और भारतीय मानसिकता</h3>
<div id="pullQuoteR">दुनिया खजुराहो और वात्स्यायन के कामसूत्र के कारण हमें यौनशास्त्र का विशेषज्ञ मानती है। शायद वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि हमारे समाज में यौन विषय पर बात करना कितना कठिन है!</div>
<p>कोणार्क, खजुराहो और वात्स्यायन के कामसूत्र की प्रसिद्धि के कारण दुनिया हमें यौनशास्त्र का विशेषज्ञ मानती है। शायद वे इस बात से अनभिज्ञ हैं कि हमारे समाज में यौन विषय पर बात करना कितना कठिन है! ज़ाहिर हैं कि यौन विषयों पर बेरोकटोक बातचीत के अभाव में लोगों तक एड्स की सही जानकारी पहुँचाना दुष्कर कार्य है। लेखक ने एक दफा अपने चिकित्सक सहयोगी से एक चुटकुला सुना था, &#8220;एक आदमी क्लिनिक में आया, बोला कि डॉक्टर साहब मेरी पत्नी फ़िर से गर्भवती हो गयी है। आप ने तो कहा था कि अगर कॉन्डोम का उपयोग करुँगा तो और बच्चे नहीं होंगे, फ़िर यह कैसे हो गया? डॉक्टर ने पूछा कि क्या उसने कॉन्डोम का ठीक से प्रयोग किया था। &#8220;हाँ डॉक्टर साहब&#8221;, व्यक्ति बोला, &#8220;जैसा आप ने दिखाया था मैंने ठीक वैसा ही किया। मैं अपनी पत्नी के साथ सोने से पहले एक केला ले कर उस पर कॉन्डोम चढ़ा देता था।&#8221; यह चुटकला हमारे मुल्क की उस मानसिकता को दर्शाता है जहाँ किसी बात को सीधे नहीं, घुमा फिरा कर ही कहने को ही सभ्यता समझा जाता है।</p>
<p>मानव शरीर के बारे में लज्जा और यौन विषयों को अश्लील समझना केवल अनपढ़ या कम पढ़े लिखे लोगों की बात हो, यह नहीं है। शालाओं व कॉलेजों में जब बात पुरुष और नारी के जननाँगों पर पहुँची तो शिक्षक खिसिया कर यही कहते हैं कि इसकी पढ़ाई छात्र स्वयं ही कर लें। शालाओं में यौन शिक्षा प्रारंभ हुई है, पर समाज का रवैया ज्यों का त्यों है। कुछ समय पहले ही अभिनेत्री खुशबू के विवाह पूर्व यौन संबंधों के बयान पर कितना फसाद हुआ था! लगता है कि यौन संबंधों की बात करते ही हमारी संस्कृति के लिये खतरा पैदा हो जाता है। भारतीय जीवन में यौन विषयों का महत्व समझने के लिए रेलगाड़ी से यात्रा करना ही काम आता है। रास्ते भर दीवारों पर रंगे विज्ञापन महज़ दो ही विषयों पर होते हैं, &#8220;खोयी मर्दानगी प्राप्त करें&#8221; और &#8220;शादी के रिश्ते&#8221;। गाड़ी के भीतर शौचालयों की दीवारों पर उकरी ग्राफीटी समाज में व्याप्त अधकचरे यौनज्ञान का ही तो प्रतिबिम्ब हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Age-wise AIDS data for India 2005" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-age-distribution.jpg" border="0" alt="Age-wise AIDS data for India 2005" hspace="2" vspace="2" width="250" height="204" align="right" />भारत में यौन आचरणः सन 2001 में भारत में पहला राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहेवियर सर्वे) हुआ जिसमें विभिन्न प्रदेशों में करीब 85,000 लोगों से उनके यौन आचरण संबंधी प्रश्न पूछे गये। भाग लेने वाले 50 प्रतिशत से अधिक लोग 25 से 39 वर्ष आयु वर्ग के थे, महिलाओं और पुरुषों की सँख्या भी लगभग बराबर थी। इस सर्वेक्षण में पाया गया कि</p>
<ul>
<li>पाँच राज्यों, बिहार, उत्तरप्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश और पश्चिम बंगाल, में करीब 60 प्रतिशत लोगों ने एड्स का नाम सुना था। देश के बाकी हिस्सों में यह जानकारी 70 से 80 प्रतिशत लोगों को थी। आम तौर पर स्त्रियों और ग्रामीण लोगों में जानकारी कम थी।</li>
<li>उपरोक्त पाँच राज्यों में एड्स यौन सम्पर्क से हो सकती है यह जानकारी केवल 55 प्रतिशत को थी, ग्रामीण इलाकों में जानकारी और भी कम थी जबकि केरल में यह जानकारी करीब 98 प्रतिशत लोगों को थी।</li>
<li>कॉन्डोम से एड्स से बचा जा सकता है यह जानकारी बिहार और पश्चिम बँगाल में करीब 30 प्रतिशत लोगों को थी। बिहार और उड़ीसा में 30 प्रतिशत लोगों को कॉन्डोम क्या होता है यह मालूम ही नहीं था।</li>
<li>उत्तरप्रदेश, असम, बिहार, उड़ीसा, मध्यप्रदेश और कर्नाटक में 90 प्रतिशत लोग मानते थे कि एड्स मच्छर के काटने से फैल सकती है।</li>
<li>पहले यौन संबंध के समय पर औसत उम्र मध्यप्रदेश में सबसे कम थी, यानि 17 वर्ष और गोवा में सबसे अधिक थी, यानि 22 वर्ष।</li>
<li>आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र में 10 प्रतिशत से अधिक लोगों ने माना कि उनका पिछले महीनों में अपने पति या पत्नी से अलग, कम से कम एक अन्य व्यक्ति से यौन सम्पर्क हुआ था। अन्य राज्यों में उनकी सँख्या कम थी। ऐसे यौन संबंधों में कॉन्डोम का इस्तेमाल करने वाले उड़ीसा में सबसे कम थे, यानि केवल 16 प्रतिशत, जबकि गोआ में सबसे अधिक थे, 81 प्रतिशत।</li>
</ul>
<h3>एड्स और सामाजिक जागरूकता</h3>
<p>समाज में एड्स से बचने के लिए यौन संबंधों की बात करना आवश्यक है। 2001 में भारत में हुये राष्ट्रीय आचरण सर्वेक्षण (नेशनल बिहेवियर सर्वे) के परिणामों से स्पष्ट समझ आता है कि देश में बहुत से भागों में आम जनता को एड्स संबंधी ठीक जानकारी नहीं है। उपरोक्त सर्वेक्षण में यह भी मालूम हुआ था कि अगर टेलीविज़न, रेडियो और समाचार पत्र तथा पत्रिकाओं से जानकारी दी जाए तो करीब 92 प्रतिशत जनता तक यह जानकारी पहुँच सकती है। पर यह जानकारी देने के लिए क्या प्रयास किये जा रहे हैं?</p>
<div id="pullQuoteR">भारत में कॉन्डोम को हमेशा से परिवार नियोजन के साधन के रूप में प्रचलित किया गया है ना कि सुरक्षित यौन संबंधों के लिए।</div>
<p>अगर भारानी के जालस्थल पर देखें तो वहाँ पर विगत वर्षों में एड्स पर बने बहुत से टेलीविज़न विज्ञापन देख सकते हैं। इनमें अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान और तबु जैसे जाने माने फिल्मी कलाकारों के भी विज्ञापन हैं। अधिकतर एड्स से ग्रस्त लोगों के मानव अधिकारों की रक्षा और उनसे भेद भाव न करने के बारे में हैं पर &#8220;असुरक्षित यौन संबंध&#8221; कह कर उससे आगे की कोई बात इन विज्ञापनों में नहीं दिखती। जालस्थल पर डॉक्टर और एड्स ग्रसित लोगों से सवाल पूछने की सुविधा है। निरंतर ने जालस्थल पर दिये फॉर्म से जानकारी माँगी कि क्या किसी एड्स ग्रसित व्यक्ति से विवाह किया जा सकता है। एक हफ्ते के बाद किसी असंबद्ध ईमेल पते से इसी जालस्थल के ही अनेक पृष्ठ अटैचमेंट के रूप में भेज दिये गये, ईमेल कई लोगों को सामूहिक रूप से भेजा गया था पर पत्र में कुछ भी नहीं लिखा था। निरंतर ने इसी पते पर पुनः दरियाफ्त की पर कोई जवाब न आया। ऐसा रवैया मीडिया पर हावी है, स्पष्ट कहने का साहस किसी में नहीं (इसी अंक में पढ़ें: <a href="http://www.nirantar.org/0806-cover-aids-aur-media/">सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?</a>)</p>
<p>एड्स नियंत्रण कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय शिक्षा परिषद ने &#8220;विद्यालय में एड्स शिक्षा&#8221; के नाम से शिक्षकों के प्रशिक्षण के लिए एक लघु पुस्तिका तैयार की थी। इसमें यौन विषयों पर बात करने की कठिनाई को स्वीकारा गया है। &#8220;जिम्मेदार यौन आचरण एड्स शिक्षा का महत्वपूर्ण अंग है जिसमें शिक्षकों को वह स्रोत बनना चाहिए जो छात्रों को यौन और यौनता (sexuality) जैसे नाजुक विषयों के बारे में जानकारी देनी चाहिये। अधिकतर शिक्षक अपनी घबराहट और लज्जा की वजह से इन विषयों पर बात करने के लिए बात नहीं कर पाते। प्रशिक्षण से घबराहट और लज्जा को जीता जा सकता है&#8230;&#8221;। पर यह पुस्तिका यह नहीं बताती कि इन विषयों पर बात करने की हिम्मत रखने वाले शिक्षकों को जब जनता &#8220;अश्लील और भारतीय संस्कृति के विरुद्ध&#8221; कह कर मारने दौड़े और &#8220;मसाले&#8221; की तलाश में घूमने वाले पत्रकार उनके व्यक्तिगत जीवन के बारे में चटखारे ले कर खबरें भेजें तो वे क्या करें!</p>
<p>विदेशों में बसे भारतीय समुदायों में इस बारे में कोई दुविधा नहीं कि यौन संबंधों के बिना एड्स से बचने की बात नहीं की जा सकती। ऐसे कुछ जानकारी देने वाले पोस्टरों के उदाहरण देखना चाहें तो केनेडा के दक्षिण एशियन एलाअंस के <a href="http://www.asaap.ca/low/home/posters.html">जालपृष्ठ</a> पर देख सकते हैं। कुछ समय पहले लेखक ने एक अंतर्राष्ट्रीय प्रशिक्षण कोर्स का संचालन किया जिसका विषय था समुदाय में यौन संबंधों जैसे नाजुक विषयों पर कैसे बात की जाये। इस पाठ्यक्रम में दुनिया के विभिन्न देशों के लोग आये थे जिसके दौरान ब्राजील से आये डॉ मनज़ानो ने अपने क्लिनिक में प्रयोग करने वाले एड्स पर कुछ पोस्टर दिखाये। एक पोस्टर में कॉन्डोम कैसे इस्तमाल करें, कैसे चढ़ायें, कैसे और कब उतारें, सब कुछ स्पष्ट दिखाया और समझाया गया था। एक अन्य पोस्टर में यौन संबंधों के दौरान एड्स के खतरे की बात थी और उसमें विषमलैंगिक और समलैंगिक यौन संबंधों की बात को स्पष्टता से दिखलाया और समझाया गया था। इंडोनेशिया, मिस्र, पाकिस्तान और भारत जैसे देशों के प्रतिनिधियों ने कहा कि इस तरह के पोस्टर उनके देशों मे लगायें से तो पुलिस पकड़ कर ले जायेगी।</p>
<p>भारत सरकार की एड्स नीति की आलोचना की गयी है कि यह केवल &#8220;अधिक खतरे वाले गुटों&#8221; जैसे यौनकर्मी और ट्रक चलाने वाले, की ओर जानकारी को प्रोत्साहन दे रही है, जबकि अब यह बीमारी शहरों से बाहर, आम जनता में फैल रही है। आम जनता से एड्स की बात करने के लिए यौन विषयों से जुड़ी हमारी सामाजिक वर्जनाओं से टकराने की हिम्मत किसमें होगी ?</p>
<p>भारत में कॉन्डोम को हमेशा से परिवार नियोजन के साधन के रूप में प्रचलित किया गया है ना कि सुरक्षित यौन संबंधों के लिए। यहाँ कन्डोम के प्रचार के विरुद्ध एक कड़ी राजनीतिक और धार्मिक लॉबी है क्योंकि यह धारणा है कि यह स्वच्छन्द सम्भोग को बढ़ावा देता है। पर जहाँ भी सही पहल की गयी नतीजे सही आये हैं। कलकत्ता के सोनागाची क्षेत्र में बीमारी के बारे में जानकारी देना और कॉन्डोम इस्तमाल करने के बारे में बताने का अच्छा असर हुआ है। 1992 में केवल 27 प्रतिशत यौनकर्मी कॉन्डोम का इस्तमाल करती थीं, जबकि 2001 में कॉन्डोम का इस्तमाल बढ़ कर 81 प्रतिशत हो गया।</p>
<h3>भारतीय संस्कृति और समलैंगिक यौन संबंध</h3>
<p>जब कनाडा में रहने वाली भारतीय मूल की फिल्म निर्माता दीपा महता ने अपनी फिल्म &#8220;फायर&#8221; में समलैंगिक स्त्रियों की बात उठाई थी तो इस फिल्म के विरुद्ध कुछ प्रदर्शन हुए थे और कुछ लोगों ने कहा था कि समलैंगिक संबंध भारतीय संस्कृति का हिस्सा ही नहीं हैं। पर यह बात केवल फिल्मों तक ही सीमित हो, दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। यह सच है कि समलैंगिक यौन संबंधों का एड्स के भारत में फैलने में महत्वपूर्ण योग नहीं है फिर भी उनको नकारना मूखर्ता होगी। सन 2001 से लखनऊ की नाज़ फाउँडेशन ऐसे ही कुछ लोगों के अज्ञानात्मक रवैये से वहाँ की पुलिस से जूझ रही है। समलैंगिक यौनकर्मियों के बीच एड्स के विषय में जानकारी देने और सुरक्षित यौन संबंध की बात करने वाली नाज़ फाउँडेशन के कई काम करने वाले जेल जा चुके हैं।</p>
<p>यह समलैंगिक संबंधों के बारे में समाज के एक वर्ग के विचारों की बात उठाती है जिस पर गम्भीरता से विचार होना चाहिये। इसके लिए पुलिसवालों की अज्ञानता के साथ भारत के विक्टोरियन समय के कानूनों की भी गलती है जो कि समलैंगिक संबंधों को &#8220;अप्राकृतिक&#8221; और दंडनीय मानते है। नाज फाऊँडेशन के <a href="http://www.nfi.net">जालस्थल</a> पर एड्स संबंधी बहुत सी प्रशिक्षण सामग्री हिंदी में भी उपलब्ध है।</p>
<p>एड्स जैसे अफ्रीका में फैला है वैसे ही अनेक देशों में शिक्षित वयस्क लोगों की पूरी पीढ़ी ही खत्म हो गयी है, खेतों में काम करने वाले किसान खत्म हो गये हैं, बस बच्चे और बूढ़े रह गये। ईश्वर न करे यदि अगर वैसा हाल भारत में होने लगे तो शायद हमारे समाज में भी यौन विषयों की चर्चा के इर्दगिर्द खड़ी की संकोच की दीवारें तोड़नी पड़ेंगी। पर जब तक भारतीय समाज में इस खतरे की वास्तविक पहचान नहीं जागेगी, शायद इस विषय पर खुल कर बात करना केवल दिवास्वप्न ही रहेगा? डा. नारायण कहते हैं, &#8220;एड्स से लड़ने के लिए महिलाओं और नौजवानों को सबसे आगे बढ़ना चाहिए। स्वास्थ्य कर्मियों, रोगग्रस्त लोगों के संगठन, स्वास्थ्य और सामाजिक परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील लोग, आदि सब को मिल कर काम करना पड़ेगा ताकि सभी जरुरतमंद लोगों को बीमारी के इलाज के लिए एआरवी दवाएँ मिल सकें।&#8221;</p>
<h3>शतुरमुर्ग बने रह कर क्या होगा?</h3>
<p>संसार के अलग अलग देशों ने अपने अपने अंदाज़ में इस समस्या से निबटने के तरीके बनाये पर हर किसी के अनुभव से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। संसार भर में  युवाओं के यौन व्यवहार में परिवर्तन लाने से लाभ हुये हैं, जैसे कंबोडिया व थाईलैंड ने देह व्यापार में कमी लाकर, जिंबाब्वे ने पहले सेक्स संबंध बनाने की उम्र में देरी लाकर और युगांडा ने बहुविवाह के खिलाफ रूख बनाकर सफलता अर्जित की है। काँडोम के प्रयोग को बल देने का कदम तो हर मुल्क में लाभ दे चुका है। अनुभवों से सीख लेना अत्यावश्यक है, जैसे युगांडा में यह जाना गया कि जो बच्चे प्राथमिक शिक्षा पूर्ण नहीं करते उनके बड़े होकर संक्रमित होने की आशंका तिगुनी हो जाती है, कितना ज़रूरी हो जाता है किसी भी सरकार के लिये अपना शिक्षा बजट बढ़ाना क्योंकि ये एड्स की खिलाफत करने में एक परोक्ष अस्त्र साबित होगा।</p>
<div id="pullQuoteR">एड्स एक असाधारण घटना है, तो ज़ाहिर है कि हमारा इसके प्रति रवैया भी असाधारण होना चाहिये। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले।</div>
<p>एड्स एक असाधारण घटना है, तो ज़ाहिर है कि हमारा इसके प्रति रवैया भी असाधारण होना चाहिये। एड्स को हमारे जीवन में आये पच्चीस साल हो गये। इस से निबटने के लिये मजबूत रीढ़ वाले नेतृत्व की दरकार है जो इससे आपदा नियंत्रण की तौर पर नहीं वरन योजनाबद्ध तरीके से लोहा ले। प्रगति हो रही है, पर बहुत कुछ करना शेष है। यूएनएड्स के आंकड़ों के अनुसार युवा वर्ग को एचआईवी से बचे रहने के लिये अपनी जीवनशैली में बदलाव और ज़रूरी जानकारी होने के लिये लिये किये जा रहे प्रयास अभी भी नाकाफी हैं। गुप्त रोगों को छुपाये रखना और उनका इलाज न कराने से एड्स का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। एआरवी दवाएँ भी महज़ 20 फीसदी लोगों तक ही पहुँच पा रही हैं। इन दवाओं की कीमत कम करने के लिये सरकारी कोशिशों की नितांत आवश्यकता है।</p>
<p>एड्स का एक बड़ा दुष्प्रभाव है कि समाज को भी संदेह और भय का रोग लग जाता है। यौन विषयों पर बात करना हमारे समाज में वर्जना का विषय रहा है, जासूस विजय जैसे प्रयासों से स्थिति की शक्ल बदल रही है। निःसंदेह शतुरमुर्ग की नाई इस संवेदनशील मसले पर रेत में सर गाड़े रख अनजान बने रहना कोई हल नहीं है। इस भयावह रोग से निबटने का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक बदलाव लाना भी है, एड्स पर प्रस्तावित विधेयक को अगर भारतीय संसद कानून की शक्ल दे सके तो यह भारत ही नहीं विश्व के लिये भी एड्स के खिलाफ छिड़ी जंग में महती सामरिक कदम सिद्ध होगा।</p>
<p class="note"><strong>अतिरिक्त सामग्री व सहयोग</strong>- देबाशीष चक्रवर्ती<br />
<strong>हार्दिक आभारः</strong> मनीषा मिश्र, UNAIDS, सृजन शिल्पी तथा उषा राय, पत्रकार।<br />
तथ्य <a href="http://www.avert.org/indiaaids.htm">भारतीय एचआईवी व एड्स स्टैटिस्टिक्स</a> तथा UNAIDS के 2006 के आँकड़ों पर आधारित।</p>
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		<title>एड्स पर फिल्में : अच्छी शुरुवात</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:08:20 +0000</pubDate>
		<dc:creator>अविजित मुकुल किशोर</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[films]]></category>

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		<description><![CDATA[एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी हिंदी फीचर फिल्मों की गिनती करने के लिये तो हाथों की उँगलियाँ की भी जरुरत नहीं क्योंकि अभी तक केवल दो ही ऐसी फिल्में बनी हैं। पढ़ें <strong>अविजित मुकुल किशोर</strong> की खरी खरी।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aidsmovies.jpg" border="0" alt="एचआईवी-एड्स के विषय पर बनी फिल्म" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">एच</div>
<p>आईवी-एड्स के विषय पर बनी हिंदी फीचर फिल्मों की गिनती करने के लिये तो हाथों की उँगलियाँ की भी जरुरत नहीं क्योंकि अभी तक केवल दो ही ऐसी फिल्में बनी हैं &#8211; ओनीर की &#8220;माई ब्रदर निखिल&#8221; और रेवथी की &#8220;फ़िर मिलेंगे&#8221;। इन फिल्मों के ज़िक्र से इस विषय से सम्बंधित तमाम सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलू आँखों के तैर जाते हैं। इसके अलावा, फिल्म निर्माताओं की विचारपद्धति को समझना भी आवश्यक है &#8211; कि वे किसे &#8220;दर्शक&#8221; कहते हैं और कैसी फिल्में दिखाने लायक समझते हैं।</p>
<div id="pullQuoteR">जितने विज्ञापन देखने को आते हैं &#8211; शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में &#8211; यौन सम्बंध को &#8220;अनैतिक सम्बंध&#8221; ही कहा जा रहा है!</div>
<p>हमारी फिल्मों में रोग का अक्सर फिल्म की पृष्ठभूमि में प्रयोग किया जाता है। &#8220;आनंद&#8221; से ले कर &#8220;कल हो न हो&#8221; तक कैंसर के रोगियों के पात्रों वाली कई फिल्में बनी हैं। इसी तरह &#8220;आह&#8221; से ले कर &#8220;आलाप&#8221; तक क्षय रोग पर फिल्में बनी हैं। इन सभी में रोग केवल पात्रों की व्यथा और कहानी में ट्रेजेडी डालने के लिए प्रयोग किया गया है। रोग के विषय, उसके सामाजिक प्रभाव या लोगों को उसके बारे में जागरुक करने के इरादे से कम ही फिल्में बनी हैं।</p>
<p>विदेशी फिल्मों की बात करें तो &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; जैसी कई फिल्मों ने न केवल एड्स का विषय उठाया वरन कई सामाजिक समस्याओं को भी सामने लाये। &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; इस विषय पर बनी पहली फिल्मों में से है और इसमें एक एचआईवी-बाधित पुरुष के साथ, संक्रमित और समलैंगिक होने की वजह से, दफ्तर में हुए भेद भाव को दिखाया गया है। फिर ऐसी कई फिल्में जैसे कि &#8220;एन्ड द बैंड प्लैड आन&#8221; और &#8220;लाँगटाईम कम्पैनियन&#8221; सामाजिक दायित्व के साथ बनाई गयीं और ये व्यवसायिक दृष्टि से भी सफल रहीं। यह कह पाना मुश्किल है कि फिल्मों की वजह से समाज का रुख बदला या फिर समाज स्वयं इन विषयों पर बात करने को तैयार हो चला था जिससे ये फिल्में सफल हो पायीं। शायद दोनों ही बातों में कुछ न कुछ तथ्य है।</p>
<p>एचआईवी-एड्स के बारे में बात करना शुरु करें तो बस ऐसी बातें अपना मुँह उठाये बाहर झाँकने लगती हैं जिन्हें समाज अपनी पूरी ताकत से छुपा के रखना चाहता है। एक समय पर भारत सरकार ने कॉण्डोम के विज्ञापन दूरदर्शन और रेडियो पर बंद करवा दिये थे क्योंकि इनसे यौनता को एक मान्यता मिलती थी और उनका मानना था कि इस से &#8220;अनैतिकता&#8221; फ़ैल सकती है। आज तक इस विषय में जितने विज्ञापन देखने को आते हैं &#8211; शहर की दीवारों पर, अस्पतालों में और गैर सरकारी संस्थाओं के दफ्तरों में &#8211; यौन सम्बंध को &#8220;अनैतिक सम्बंध&#8221; ही कहा जा रहा है! कुछ साल पहले हमारे मंत्रियों ने बिल गेट्स की संस्था द्वारा एचआईवी की रोकथाम हेतु पेश की जा रही भारी भरकम रकम को यह कह कर ठुकरा दिया था कि &#8220;उनके आँकड़े हमारे यहाँ एचआईवी को बढ़ा चढ़ा कर दिखाते हैं, हमारे यहाँ ऐसी कोई बड़ी समस्या नहीं है।&#8221; भारत में हमने हाल ही में इस सब विषयों पर बात करना शुरु किया है। यौन और सामाजिक नैतिक मूल्य का अधिकतर छत्तीस का आँकड़ा ही रहता है। बॉलीवुड में ये फिल्में बनी और पर्दे पर दिखाई गयीं यह सराहने लायक बात है। &#8220;मेरा भाई निखिल&#8221; समलैंगिकता के विषय में बात करने वाली संभवतः सबसे पहली फिल्म है (दीपा मेहता की &#8220;फायर&#8221; को नहीं गिन रहा क्योंकि वह विदेशी प्रोडक्शन था।) कम बजट की यह फिल्म गोआ के एक युवक के जीवन पर आधारित है। इसमें कोई बड़े स्टार नहीं हैं सिवाय जूही चावला के, जिन्होंने मुख्य पात्र निखिल की बहन की भूमिका बहुत खूबसूरती से निभायी है।</p>
<div id="pullQuoteR">हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है।</div>
<p>&#8220;फ़िर मिलेंगे&#8221; इसकी अपेक्षा एक संपूर्ण मसाला फिल्म है। इसमें सलमान खान, अभिषेक बच्चन और शिल्पा शेट्टी जैसे बड़े सितारे हैं। हालांकि फिल्म में दफ्तर में होने वाले भेदभाव का विषय सीधा &#8220;फिलाडेल्फिया&#8221; से उठाया गया है पर इसका एक दृश्य बहुत पसंद आया जिसमें शिल्पा शेट्टी अभीनित चरित्र के बॉस अपने वकील से कहते हैं कि उन्हें शिल्पा की काबिलियत पर कोई शक नहीं, पर उसके कुचरित्र से शिकायत है। एचआईवी-एड्स की बात भी यहीं आ कर फँस जाती है। समाज में क्या बात करना उचित समझा जाता है क्या नहीं, इसकी ओर ध्यान देने का समय बहुत पहले ही आ गया था।</p>
<p>इन फिल्मों ने यह विषय उठाया और सिनेमाघरों के माध्यम से समाज तक पहुँचाया, यह प्रशँसनीय बात है। एक और महत्वपूर्ण बात है कि हिंदी में ऐसे विषयों पर बात करने के लिए शब्दों की कमी खलती है। यौन विषयक बातों को हम जाने अनजाने ही नैतिक मूल्यों से जोड़ने लगते हैं और बात वहीं अटक जाती है। &#8220;समलैंगिक&#8221; शब्द कितना खराब लगता है, पर और क्या कहें, इसके समानार्थी के रूप में इस्तेमाल होते शब्द गाली जैसे लगते हैं। इन फिल्मों में भी एचआईवी और यौन से सम्बंधित शब्दों के लिए अधिकतर अँग्रेजी शब्दों का ही प्रयोग किया गया है।</p>
<hr />
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		<title>एड्स से कैसे बचा जाए</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:05:54 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[Prevention]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/%e0%a4%8f%e0%a4%a1%e0%a5%8d%e0%a4%b8-%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%88%e0%a4%b8%e0%a5%87-%e0%a4%ac%e0%a4%9a%e0%a4%be-%e0%a4%9c%e0%a4%be%e0%a4%8f/</guid>
		<description><![CDATA[एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य स्रोत हैं - यौन संबंध, रक्त द्वारा तथा माँ से शिशु को संक्रमण। यानी एड्स से कोई भी सुरक्षित नहीं। पर क्या एड्स से बचा जा सकता है? जी बिल्कुल! बचाव के तरीके जानने के लिये पढ़ें <strong>रमण कौल</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स से बचाव की बात करने से पहले इस बात पर एक और नज़र डाली जाए कि यह बीमारी फैलती कैसे है। एड्स के संक्रमण के तीन मुख्य कारण हैं &#8211; यौन द्वारा, रक्त द्वारा, माँ-शिशु संक्रमण द्वारा। अब करते हैं बचाव की बात।</p>
<h1>यौन द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p>आप यौन द्वारा एचआइवी के शिकार न बनें, इस के लिए आप को इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>यदि आप अविवाहित हैं या आप का कोई स्थाई और विश्वसनीय यौन संगी नहीं है तो सेक्स को जितना हो सके, जब तक हो सके, टालना बेहतर है।</li>
<li>सेक्स साथियों में बदलाव न करें तो बेहतर है। एक वफ़ादार साथी से नाता रखें और उस से वफ़ा करें, यानी उसी से सेक्स करें।</li>
<li>यदि आप के पास अपने या अपने साथी के एचआइवी रहित होने का सौ प्रतिशत प्रमाण नहीं है तो सेक्स के समय कंडोम (जैसे निरोध, कोहिनूर, आदि) का प्रयोग करें &#8211; नियमित रूप से और सही विधि से।</li>
</ul>
<p><img title="Use Condom" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-1.jpg" border="0" alt="Use Condom" hspace="3" vspace="3" width="155" height="119" align="right" />बाज़ार में पुरुषों के प्रयोग हेतु कंडोम मिलते हैं, और स्त्रियों के प्रयोग हेतु भी। पुरुषों वाले कंडोम अधिक प्रचलित भी हैं और अधिक उपलब्ध भी &#8212; इस कारण यहाँ हम उन्हीं की बात करेंगे। यदि आप को इस बात की संभावना लगती है कि आप का किसी से यौन संबन्ध होने की संभावना है तो अपने पास कंडोम अवश्य रखें। किसी से सेक्स के लिए राज़ी होने से पहले उसे कंडोम प्रयोग के लिए राज़ी कर लें। कंडोम प्रयोग करते समय इन बातों का ध्यान रखना आवश्यक है</p>
<ul>
<li>पैकेट खोलते समय ध्यान से खोलें। आप के नाखून से कंडोम में छेद हो सकता है। छेद वाला कंडोम प्रयोग करना कंडोम प्रयोग न करने के बराबर है।</li>
<li>कंडोम को शिश्न पर चढ़ाने से पूर्व उसे पूरा न खोलें। उस का आगे का सिरा दबाएँ ताकि उस में हवा न फंसी रहे, उस के बाद उसे शिश्न पर चढ़ाते हुए पूरी तरह खोलें। कुछ चित्र <a href="http://www.rubbertree.org/condom.html" target="_new">यहाँ</a> देखें</li>
<li>यौन क्रिया पूरी होने पर शिश्न की अनुत्तेजित स्थिति आने से पहले ही कंडोम को सावधानी से उतारें, और सावधानी से फेंकें, ताकि द्रव्य इधर उधर न गिरे और किसी के संपर्क में न आए। कंडोम को कभी भी पुनः प्रयोग न करें।</li>
</ul>
<h1>रक्त द्वारा संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Blood transfusion" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-2.jpg" border="0" alt="Blood transfusion" hspace="3" vspace="3" width="108" height="111" align="left" />रक्तदान के समय एड्स का संक्रमण न हो इस के लिए रक्तदाता के खून की जाँच होना आवश्यक है। यह भी आवश्यक है कि रक्त लेने और देने के लिए जिन सूइयों का प्रयोग हो रहा है, वे नई हों और अप्रयुक्त हों। चूँकि रक्त-आधान अस्पतालों या प्रशिक्षित कर्मचारियों द्वारा ही किया जाता है, आज के युग में रक्तदान के द्वारा असावधानी होने पर एचआइवी का संक्रमण होने की संभावना कम है &#8212; ऐसा हो तो घोर अपराध ही कहा जाएगा।</p>
<p><img title="Use of Syringes" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-3.jpg" border="0" alt="Use of Syringes" hspace="3" vspace="3" width="156" height="103" align="right" />रक्त द्वारा संक्रमण होने की अधिक संभावना तब रहती है जब रोगी, या उस के साथी स्वयं गलत तरीके से सूइयों का प्रयोग करते हैं और उन की अदला बदली करते हैं। आम तौर पर ऐसा तब होता है जब इंजेक्शन द्वारा नशीले पदार्थों का सेवन करने वाले जूठी सूइयों का प्रयोग करते हैं। स्वास्थ्य कर्मचारियों, जो कई रोगियों के बीच काम करते हैं, के लिए भी रक्त द्वारा रोग संक्रमण का खतरा बना रहता है। यदि आप स्वयं को या दूसरों को इंजेक्शन द्वारा दवाइयाँ दे रहे हैं तो इन बातों का ध्यान रखें</p>
<ul>
<li>हर बार नई, अप्रयुक्त या संक्रमण रहित सूई का प्रयोग करें।</li>
<li>एक व्यक्ति पर प्रयोग की गई सूई दूसरे व्यक्ति पर प्रयोग न करें।</li>
<li>इंजेक्शन करते समय संपर्क संबन्धी सावधानियाँ बरतें, जैसे फेंके जाने वाले दस्ताने पहनना, इंजेक्शन से पहले और बाद में साबुन और पानी से हाथ धोना, आदि।</li>
</ul>
<h1>माँ-शिशु संक्रमण से बचाव</h1>
<p><img title="Pregnant Woman" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/aids-safety-4.jpg" border="0" alt="Pregnant Woman" hspace="3" vspace="3" width="34" height="80" align="right" />यदि एक एच॰आइ॰वी॰ युक्त स्त्री गर्भवती हो जाती है तो नवजात शिशु के संक्रमित होने की संभावना काफी बढ़ जाती है &#8212; यह संक्रमण गर्भ, प्रसव या स्तनपान द्वारा हो सकता है। एचआइवी युक्त स्त्रियाँ एचआइवी युक्त शिशुओं को न जनें, इस के लिए इन बातों का ध्यान रखना होगा।</p>
<ul>
<li>अवांछित गर्भ को टाला जाए, जिस के लिए कंडोम और अन्य गर्भ निरोधक साधनों का प्रयोग किया जा सकता है।</li>
<li>गर्भ और प्रसव के दौरान माता को एंटीरेट्रोवाइरल दवाइयाँ दी जाएँ, जिस से शिशु के संक्रमित होने का खतरा कम हो जाता है।</li>
<li>यदि अन्य हालात इजाज़त दें ते शिशु का जन्म सी-सेक्शन द्वारा कराया जाए। इस से माता के द्रव्यों से बच्चे का संपर्क कम हो जाता है और संक्रमण का खतरा भी।</li>
<li>यदि अन्य स्वीकार्य विकल्प उपलब्ध हों, तो शिशु को स्तनपान न कराया जाए।</li>
</ul>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; width: 99%;">
<h1>जानकारी ही बचाव है!</h1>
<h3>एड्स है क्या?</h3>
<p>एड्स शब्द बना है एक्वार्यड इम्यूनो डेफिशियेन्सी सिन्ड्रोम से और इसका कारण होता है एक अतिसूक्ष्म कीटाणू ह्यूमन इम्यूनोडेफीशीयेन्सी सिन्ड्रोम यानि एचआईवी। एड्स स्वयं कोई बीमारी नही है पर एड्स से पीड़ित मानव शरीर संक्रामक बीमारियों, जो कि बैक्टीरिया और वायरस आदि से होती हैं, के प्रति अपनी प्राकृतिक प्रतिरोधी शक्ति खो बैठता है क्योंकि एचआईवी रक्त में मौजूद प्रतिरोधी पदार्थ लिफ्मोसाईट्स पर हमला करता है। एड्स पीड़ित के शरीर में प्रतिरोधक क्षमता के क्रमशः क्षय होने से कोई भी अवसरवादी संक्रमण, यानि आम सर्दी जुकाम से ले कर टी.बी. जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना कठिन हो जाता हैं।</p>
<h3>क्या एड्स का इलाज संभव है ?</h3>
<p>ऐसी दवाईयाँ अब उपलब्ध हैं जिन्हें ए.आर.टी यानि एंटी रेट्रोवाईरल थेरपी दवाईयों के नाम से जाना जाता है। सिपला की ट्रायोम्यून जैसी यह दवाईयाँ महँगी हैं, प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 15000 रुपये होता है, और ये हर जगह आसानी से भी नहीं मिलती। इनके सेवन से बीमारी थम जाती है पर समाप्त नहीं होती। अगर इन दवाओं को लेना रोक दिया जाये तो बीमारी फ़िर से बढ़ जाती है, इसलिए एक बार बीमारी होने के बाद इन्हें जीवन भर लेना पड़ता है। अगर दवा न ली जायें तो बीमारी के लक्षण बढ़ते जाते हैं और एड्स से ग्रस्त व्यक्तियों की मृत्यु हो जाती है।</p>
<div id="pullQuoteR">सिपला जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा।</div>
<p>एक अच्छी खबर यह है कि सिपला और हेटेरो जैसे प्रमुख भारतीय दवा निर्माता एचआईवी पीड़ितों के लिये शीघ्र ही पहली थ्री इन वन मिश्रित फिक्स्ड डोज़ गोलियाँ बनाने जा रहे हैं जो इलाज आसान बना सकेगा (सिपला इसे वाईराडे के नाम से पुकारेगा)। इन्हें यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन से भी मंजूरी मिल गई है। इन दवाईयों पर प्रति व्यक्ति सालाना खर्च तकरीबन 1 लाख रुपये होगा, संबल यही है कि वैश्विक कीमत से यह 80-85 प्रतिशत सस्ती होंगी।</p>
<h3>एड्स कैसे फैलता है ?</h3>
<p>एचआईवी केवल एक मानव से दूसरे मानव को फैल सकती है। पीड़ित व्यक्ति के शरीर के सभी द्रव्यों जैसे रक्त, स्तनदुग्ध, वीर्य, आदि में फैल जाता है। कोई अन्य व्यक्ति अगर इन द्वव्यों के संपर्क में आता है तो यह वायरस उसके शरीर में प्रवेश कर सकता है। यह वायरस स्वस्थ त्वचा को पार नहीं कर सकता इसलिए बाहरी शरीर से संपर्क में आने पर इससे कुछ खतरा नहीं होता। इसके फैलने का सबसे आसान तरीका है यौन संपर्क। इसके अतिरिक्त संक्रमित व्यक्ति का रक्त किसी और को देने से, संक्रमित सुई या सिरिंज का इस्तेमाल करने से और संक्रमित माँ के दूध से उसके बच्चों में भी फैल सकता है।</p>
<h3>एड्स के लक्षण क्या हैं ?</h3>
<p>एचआईवी शरीर में प्रवेश के बाद धीरे धीरे फैलना शुरु करता है। जब वायरस की मात्रा शरीर में बहुत बढ़ जाती है, उस समय बीमारी के लक्षण प्रकट होते हैं। एड्स के लक्षण प्रकट होने में आठ से दस साल या अधिक भी लग सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को, जिसके शरीर में एड्स का वायरस हों पर एड्स के लक्षण प्रकट न हुए हों, एचआईवी पॉसिटिव यानि एचआईवी वायरस सहिक कहा जाता है। ऐसे व्यक्ति भी एड्स फैला सकते हैं।</p>
<p>एड्स के लक्षण बहुत विभिन्न तरह के हो सकते हें, क्योंकि शरीर में कीटाणुओं से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है, इसलिए विभिन्न संक्रामक बीमारियाँ हो सकती हैं, हर संक्रामक बीमारी के अपने लक्षण होते हैं। एड्स के प्रमुख लक्षण हैं वजन में 10 प्रतिशत से अधिक की कमी और एक माह से ज़्यादा से चल रहा बुखार या डायरिया। अप्रधान संकेतों में एक महीने से ज्यादा लगातार चल रही खाँसी, खुजली वाली त्वचा की बीमारियाँ, बार बार होती दाद, मुँह और गले में छाले आदि शामिल हैं। एचआईवी की उपस्थिति का पता लगाने हेतु मुख्यतः एंज़ाइम लिंक्ड इम्यूनोएब्ज़ॉर्बेंट एसेस यानि एलिसा टेस्ट किया जाता है।</p>
<h3>किसको एड्स का खतरा अधिक है?</h3>
<p>खतरा सभी को है पर किशोरवयः व नौजवान लोगों को खतरा अधिक है क्योंकि आम तौर पर इस उम्र में यौन और नशीले पदार्थों जैसे नये अनुभवों की तलाश अधिक रहती है। युवाओं में एक अन्य वर्ग है जिनको एड्स का खतरा अधिक है, वह है यौन कर्मियों का, यानि वे लोग जो वेश्यावृत्ति से जुड़े हैं। अनुमानतः भारत में करीब 20 लाख यौनकर्मी हैं जिनमें से 20 प्रतिशत 15 वर्ष से कम आयु के हैं और 50 प्रतिशत 18 वर्ष से भी कम आयु के हैं।</p></div>
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		<item>
		<title>सीधी बात कहने का क्या किसी में दम नहीं?</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Aug 2006 12:03:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[AIDS]]></category>
		<category><![CDATA[BBC]]></category>
		<category><![CDATA[doordarshan]]></category>
		<category><![CDATA[media]]></category>

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		<description><![CDATA[हमारे समाज में खुले तौर पर यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम,&#160; हिचक साफ दिखती है। हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। पढ़िये <strong>रवि श्रीवास्तव</strong> का आलेख।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: center;"><img class="aligncenter" style="border: 0pt none; margin-top: 5px; margin-bottom: 5px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/story-big-aids-advt.jpg" border="0" alt="Image" vspace="5" width="500" height="250" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">ए</div>
<p>ड्स के बारे में एक तथ्य से शायद हर पढ़ा लिखा परिचित हो, और वह है &#8220;जानकारी ही बचाव है&#8221;। अलबत्ता जानकारी क्या होनी चाहिये यह बिना लागलपेट परोसने में हर माध्यम की घिग्घी बंध जाती है। हमारे समाज में खुले तौर पर और वह भी यौन विषयों पर बात करना टेढ़ी खीर है। चाहे टीवी हो, रेडियो या फिर प्रिंट माध्यम, यह हिचक साफ दिखती है। भारत के एक लोकप्रिय हिन्दी दैनिक में सरकारी विज्ञापन की बानगी देखें,</p>
<blockquote><p>“कॉन्डोम जरूरी है। कई बार टीवी पे देखा है। अखबारों में पढ़ा है। लेकिन कभी, किसी ने मुझे खुल कर, इसके बारे में कुछ नहीं समझाया। एक दिन जब मैं कॉन्डोम के बारे में छुप कर पढ़ रहा था तो बड़े भैया ने देख लिया। उन्हें सब झट से समझ आ गया। उन्होंने मुझे कॉन्डोम के बारे में अच्छी तरह समझाया। एचआईवी / एड्स और सेक्स के बारे में भी खुल कर बात की। दाद देनी पड़ेगी भैया की। उनकी हिम्मत की। काश सबको ऐसे ओपन-माइंडेड भैया मिलें!”</p></blockquote>
<div id="pullQuoteR">&#8220;मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।&#8221;</div>
<p>हम इस क्रियेटिव माध्यम की कुव्वत या रचनाधर्मिता कि बात अलग रखें तो बात अभी भी चाहरदिवारी के अंदर ही है। पढ़ने वाला अगर जागरूक न हो तो कॉन्डोम क्या है और इसका सही प्रयोग कैसे किया जाता है यह जानकारी इन महंगे विज्ञापन से नहीं मिलती (इसी अंक में पढ़ें &#8211; एड्स से कैसे बचा जाय)। सरकार ने बात करना शुरु किया पर असल जानकारी पाने का जिम्मा &#8220;ओपन-माइंडेड भैया&#8221; पर डाल दिया। तमाम मीडिया एड्स से बचने के ऐसे ही अस्पष्ट संदेशों से अटा पड़ा दीखता है। अलबत्ता यह पता नहीं कि ये विज्ञापन दर्शकों में एड्स के प्रति कोई जागरूकता जगा पाने में सक्षम भी हैं या नहीं।</p>
<p>एड्स जैसी अभूतपूर्व घटना के प्रति प्रतिक्रिया भी अभूतपूर्व होनी चाहिये। लोगों को जानकार बनाने के लिये हर संभव माध्यम और तरीके की भी सहायता लेनी चाहिये। और क्या संदेश कुछ मज़ाकिया ढंग से नहीं दिते जा सकते? थाईलैंड में एड्स एक्टीविस्ट और पूर्व काबिना मंत्री मेचाई वीरवैद्य, जो &#8220;काँडोम किंग&#8221; के नाम से लोकप्रिय हैं, ने हास्य, जिंगल जैसे अपरंपरागत तरीके से जागरूकता फैलाने का काम लिया। पर भारतीय विज्ञापन एजेंसिया भारत के पाठकों को रुख को देखते हुए ज्यादा रिस्क नहीं लेना चाहती, हास्य का शुमार तो दूर की बात है। <em>निरंतर</em> ने कई नामी विज्ञापन एजेंसियों से पूछा कि क्या वे हास्य विनोद को शामिल कर कोई कैंम्पेन बना चुके हैं या बनाने वाले हैं, पर केवल मुद्रा ने ही जवाब दिया और वह भी ना में।</p>
<div style="border: 1px solid #808080; margin: 10px; padding: 10px; background: #f4f4f4 none repeat scroll 0% 50%; width: 200px; float: right;">
<h3>&#8220;एक बढ़िया कार्यक्रम जो बढ़िया काम कर रहा है&#8221;</h3>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 5px;" title="Om Puri" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/om-puri.jpg" border="0" alt="Om Puri" hspace="3" vspace="3" width="125" height="118" align="left" />लोकप्रिय अभिनेता <strong>ओम पुरी</strong> टी.वी धारावाहिक &#8220;जासूस विजय&#8221; में दर्शकों के साथ पारस्परिक बातचीत के एक अंश की मेज़बानी करते नज़र आते हैं जिसमें दर्शक केस को सुलझाने में जासूस विजय को भी पछाड़ने का प्रयास करते हैं। एक लिहाज़ से वे कार्यक्रम के सूत्रधार भी हैं। ओम का परिचित और सम्माननीय व्यक्तित्व दर्शक और शो के मध्य संवाद स्थापित करने में मदद करता है।</p>
<p>ओम दर्शकों को एड्स और एच.आई.वी के बारे में खुलकर बोलने और अपने सवाल उन तक भेजने को भी उत्साहित करते हैं। &#8220;यह एक बढ़िया कार्यक्रम है जो बढ़िया कार्य कर रहा है।&#8221;, ओम पूरी कहते हैं, &#8220;मैं भारत में जहाँ भी गया, लोग जासूस विजय के बारे में जानते हैं। हाल ही में लद्दाख गया तो वहाँ देखा कि उत्सुक लोग हस्तचालित जनरेटर चलाकर भी यह कार्यक्रम देखते हैं&#8221;।</p></div>
<p>हालांकि यदाकदा कुछ ऐसे प्रयास हो जाते हैं जिनकी तारीफ करना भी ज़रूरी है। <em>निरंतर </em>एक ऐसे ही प्रयास की अनुशंसा करता है जो भारतीय राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण (नेशनल एड्स कंट्रोल प्रोग्राम) यानि भारानी ने दूरदर्शन और बीबीसी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के साथ संयुक्त रूप से निर्मित किया है।</p>
<p>एड्स के विज्ञापनों का श्रोता वर्ग चाहे जो भी हो संदेशों से दुरुहता कम होगी और बात सीधे सादे तरीके से कही जाय जो &#8220;शिक्षा देने&#8221; जैसी न लगे तो गले उतरना आसान होता है। भारानी ने शायद यही सोचकर 15‍‌‍‍‍‍‍ से 40 साल के आयुवर्ग पुरुषों के लिये एक ऐसे ही कार्यक्रम की परिकल्पना की (यह आयुवर्ग यौनिक रूप से ज्यादा सक्रीय होता है और इनको एड्स का खतरा सर्वाधिक है)। इसके फलस्वरूप <a title="BBC World Service Trust" href="http://www.bbc.co.uk/worldservice/trust/">बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट</a> ने  दूरदर्शन पर प्रसारण हेतु दो टी.वी कार्यक्रम &#8220;<a title="Jasoos Vijay website" href="http://www.jasoosvijay.com/" target="_blank"><strong>जासूस विजय</strong></a> &#8221; और &#8220;<a title="Haath se haath mila" href="http://www.haathsehaathmilaa.com/"><strong>हाथ से हाथ मिला</strong></a> &#8221; के रूप में शुरु किया देश का सबसे बड़ा एचआईवी एड्स सजगता कार्यक्रम।</p>
<p>जासूस विजय कार्यक्रम की रुपरेखा रोमांचक है, जिसमें ऐक्शन और ड्रामा के द्वारा एड्स की जानकारी, संक्रमण के मार्ग, गुप्त रोग की पहचान व इलाज और काँडोम के फायदों का संदेश दर्शकों तक पहुँचाया जाता है। और यह वाकई असरकारक रहा है, यह धारावाहिक हर महीने करीब 75 लाख लोगों द्वारा देखा जाता हैं। इतना ही लोकप्रिय है ट्रस्ट का बनाया दूसरा कार्यक्रम &#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; जिसे हर माह 40 लाख दर्शक देखते हैं। &#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; एक साप्ताहिक रियेलिटी शो के प्रारूप में प्रसारित होता है, हर कथा एक युवा सितारे पर केंद्रित होती है जिसने एड्स की जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। कार्यक्रम में बॉलीवुड के सितारों की भागीदारी भी उल्लेखनीय है।</p>
<p>पर मनोरंजक कारयक्रमों की वजह से कहीं निहित संदेश हंसी में ही इधर उधर तो नहीं हो जाते। बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के युवा कार्यक्रमों की निर्माता प्रियंका दत्त कहती हैं, &#8220;मनोरंजक कार्यक्रमों के द्वारा दोहरा फायदा है क्योंकि मनोरंजन के द्वारा शिक्षा मिले तो बात समझ भी बेहतर आती है और देर तक याद भी रहती है।&#8221; जासूस विजय सीरियल के मुख्य पात्र विजय को एच.आई.वी पॉसिटिव चित्रित किया गया है, इससे अनायास ही दर्शकों में संक्रमित लोगों के साथ भेदभाव न करने का संदेश पुख्ता रूप में चला जाता है।</p>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" title="Fardeen Khan with Yuva Start Hasina Kharbih in an episode of Haath Se Haath Mila." src="http://www.nirantar.org/images/stories/0806/haath-se-haath-mila.jpg" border="0" alt="Fardeen Khan with Yuva Start Hasina Kharbih in an episode of Haath Se Haath Mila." hspace="5" vspace="5" width="250" height="172" align="left" />&#8220;हाथ से हाथ मिला&#8221; मे बड़े पैमाने पर स्थानीय समुदाय के लिये कार्यक्रम आयोजित किये जाते हैं, हाल ही के एक एपिसोड में फिल्म स्टार फरदीन खान ने युवा सितारे हसीना खारबीह को शिलाँग मे रॉक कॉनसर्ट के आयोजन का चैलेंज दिया ताकी मेघालय के युवा एड्स के बारे में जानें।</p>
<p>पर क्या वाकई ये कार्यक्रम उपाय कारगर हैं। व्यूअरशिप ठीक है पर क्या इनके असर को मापा तोला भी गया है। 2005 में बी.बी.सी ने एड्स के ज्ञान, रवैये और व्यवहारों पर एक फील्ड स्टडी की। 2001 के राष्ट्रीय बिहेवियरल सेंटीनल सर्वेलेंस सर्वे के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे था। इस सर्वे से पता चला कि, आम तौर पर, टीवी देखने वाले लोगों में, न देखने वालों कि तुलना में एड्स और इससे बचाव के तरीकों के बारे में जागरूकता ज्यादा थी और बी.बी.सी वर्ल्ड सर्विस ट्रस्ट के इन कार्यक्रमों के दर्शकों मे यह जागरूकता कहीं अधिक पायी गई।</p>
<p>बी.बी.सी जासूस विजय की तर्ज पर और कार्यक्रमों पर विचार कर रहा है बस किसी प्रायोजक की तलाश है। संस्थान ने दोनों कार्यक्रमों से संबंधित वेबसाईट्स का निर्माण भी किया है जहाँ पर इन कार्यक्रमों के अलावा एड्स की भी जानकारी उपलब्ध है। एक खास बात है इन जालस्थलों पर उपलब्ध एड्स पर छोटी सी बुकलेट, प्रियंका ने बताया कि यह बुकलेट अब तक 56,000 से ज्यादा लोगों को डाक से भेजी जा चुकी है।</p>
<p class="note">अतिरिक्त सामग्री व सहयोग &#8211; देबाशीष चक्रवर्ती</p>
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