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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; Biz Stone</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>हल्की फुल्की, सकारात्मक और मज़ेदार</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha</link>
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		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 14:54:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Biz Stone]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

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		<description><![CDATA[ट्विटर के सह संस्थापक बिज़ स्टोन की लिखी "हू लेट द ब्लॉग्स आउट" मज़ेदार किताब है, ब्लॉगिंग की दुनिया में कुछ दिन बिता चुके नौसिखियों और निपुण चिट्ठाकारों के लिये बेहद काम की। ब्लॉग पर आवक कैसे बढ़ायें, ब्लॉगिंग से पैसा कैसे कमायें, ब्लॉग की वजह से नौकरी कैसे न गवायें जैसे कई काम के टिप हैं पुस्तक में। पढ़िये देबाशीष द्वारा समीक्षा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" style="margin: 2px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/vaatayan_samiksha.gif" alt="वातायनः पुस्तक समीक्षा" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="left" /></p>
<div class="dropCap">बि</div>
<p>ज़ स्टोन <a href="http://www.bizstone.com/">ब्लॉगिंग</a> करते हैं। काफी ब्लॉगिंग करते हैं। जवाँ हैं (&#8220;ईमेल उम्र में मुझसे बड़ा है, यूँ समझिए कि 1948 में मैं पांचवीं में था, लगाइए हिसाब।&#8221;), बॉस्टन के रहने वाले हैं और उनके बिल्ले का नाम ब्रूस है। एक किताब पहले लिख चुके हैं, और &#8220;<a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/redirect?path=ASIN/0312330006&amp;link_code=as2&amp;camp=1789&amp;tag=nirantar-20&amp;creative=9325">हू लेट द ब्लॉग्स आउट</a>&#8221; उनकी दूसरी पुस्तक है। <a href="http://www.xanga.com/">ज़ांगा डॉट कॉम</a> से जुड़े थे तथा संप्रति गूगल में वरिष्‍ठ विशेषज्ञ हैं। दरअसल, बिज़ की पुस्तक में &#8220;मैं&#8221; शब्द बहुत बार आता है। शायद इसलिये भी पुस्तक का लहज़ा आत्मकथात्मक है। बिज़ का खुद ही मानना है, &#8220;यू आर वॉट यू ब्लॉग&#8221;।</p>
<p>बिज़ की पुस्तक रोचक है। किसी भी ब्लॉगर के लिये यह प्रेरणादायक साबित हो सकती है। बिज़ नये ब्लॉगरों के लिये उम्दा रोल मॉडल न सही, पर एक सामान्य इन्सान जिसका कोई खास शैक्षणिक आधार न हो, जिसे दो दो पुस्तक लिखने की बढ़िया डील और गूगल में शानदार नौकरी, संक्षेप में कहें तो रोटी कमाने का ज़रिया, ब्लॉग से ही मिला हो तो प्रेरणा न ग्रहण न करने का सवाल ही नहीं उठता।</p>
<p>244 पृष्ठों की &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; में कथन शैली हल्की फुल्की बातचीत की है पर कुछ अध्याय संजीदगी भी लिये हैं (<a href="http://www.nirantar.org/0405-saransh/">यह पुस्तकांश</a> तो आप निरंतर पर पढ़ भी चुके हैं)। शेष के अध्याय &#8220;बिज़नेस ब्लॉगिंग&#8221; तथा &#8220;पॉलिटिक्स एंड प्युपिल्स&#8221; काफी अहम लेख हैं। किताब में यत्र तत्र विभिन्न हस्तियों की उक्तियां भी दी गई हैं। किस प्रकार ब्लॉगर स्वयं अपने रिवाज और नियम बना लेते हैं उस पर बिज़ ने लैरीवेल को उद्धत किया है</p>
<blockquote><p>मुझे पता चला कि जब वे केलिफॉर्निया विश्वविद्यालय बना रहे थे तो उन्होंने पहले साल कोई साइडवॉक (पैदल चालन के लिये पटरी) नहीं बनाई। अगले साल वे वापस आये और घास पर गायों के पदचिह्नों से बनी पगडंडियों को खोजा और वहीं साईडवॉक बना दीं। <em>(पृष्ठ 67)</em></p></blockquote>
<p><img class="alignleft" style="margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/biz.jpg" alt="" hspace="2" vspace="2" width="192" height="200" align="right" />पुस्तक में गूगल संबंधित विषयों जैसे कि <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a>, गूगल <a href="http://www.google.com/adsense">एडसेंस</a>, गूगल का आन्तरिक ब्लॉग निकाय से लेकर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Google_bomb">गूगल बॉम्बिंग</a> तक का उल्लेख है। पूछना नहीं चाहिये क्यों? बिज़ ज़ाहिर तौर पर अपनी नौकरी से अभिभूत हैं। पुस्तक में सोशियल बुकमार्किंग जैसे काफी सामयिक विषयों पर भी चर्चा है। पुस्तक का मिज़ाज़ काफी सकारात्मक है इसलिये ब्लॉगिंग की कमियों पर कोई रोशनी नहीं डाली गई है, उदाहरणतः कॉमेन्ट या रेफरर स्पैमिंग की दिक्कतों का उल्लेख नहीं है।</p>
<p>बिज़ की किताब में कई बढ़िया किस्से भी शुमार हैं। जैसे कि डेबी स्वेनसन नामक एक महिला द्वारा केसी नाम की काल्पनिक कैंसर मरीज़ पर बनाया ब्लॉग जिसका पर्दाफाश समूह ब्लॉग <a href="http://www.metafilter.com/">मेटाफिल्टर</a> ने तब किया जब अच्छी खासी ठीक हो रही बताई जा रही केसी की सहसा मौत की घोषणा डेबी ने उसके ब्लॉग में की। इसके अलावा ट्रेफिक जीव‍विज्ञान की संकल्पना और ब्लॉगरों का चीटिंयों के साथ तुलना भी बड़ी रोचक है। गौर फरमायें-</p>
<blockquote><p>जिस तरह से चीटिंयो ने भोजन की खोज की और इसे घर तक लाने के लिये स्वसंगठन किया वैसा ही ब्लॉगरों के व्यवहार का मूलभूत तरीका है। यह सब फीडबैक परिपथ और कुछ साधारण नियमों पर आधारित है। बिल्ले के भोजन की जगह ब्लॉगर अंर्तजाल पर समाचार लेखों और रोचक जालपृष्ठों की खाक छानते फिरते हैं। जब किसी ब्लॉगर को कुछ रोचक मिलता है तो वह उसे लिंक करती हैं। यहाँ ये हाईपरलिंक (कड़ी) <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pheromone">फीरोमोन</a> संकेतों की पगडंडी हैं। जब कोई अन्य ब्लॉगर इस कड़ी को क्लिक करता है और स्वयं से लिंक करता है तो ये पगडंडी सुदृढ़ होती जाती है। <em>(पृष्ठ 204)</em></p></blockquote>
<p>सही भी तो है, जैसा कि बिज़ कहते हैं, &#8220;कड़ियां ब्लॉगमंडल की मुद्रा है।&#8221;</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/biz_book.jpg" alt="" hspace="2" vspace="2" width="294" height="174" align="right" />यह पुस्तक नये ब्लॉगरों के लिये तो संभवतः उपयुक्त नहीं क्योंकि इसे कदम-दर-कदम गाइड किताब की शैली में नहीं लिखा गया है। पुस्तक अन्तर्जाल के शुरुआती दिनों से ब्लॉगिंग के प्रखर होने के सफरनामे पर केंद्रित है, ऐसे में अचानक ही &#8220;अपना ब्लॉग कैसे बनायें&#8221; नुमा लेख प्रवाह में व्यवधान ही डालते हैं। तिस पर गूगल विज्ञापन अपने ब्लॉग्स पर डालने की चर्चा मय जावास्क्रिप्ट कोड अगर किसी आनलाईन लेख में दिये हो तो बात ज्यादा जमती है। HTML के प्रयोग वाला लेख भी शुरुआती किताब के लिये ज्यादा उपयुक्त होता। हालांकि भारत का किताब में इक्का दुक्का बार ज़िक्र है पर यह पुस्तक मूलतः गैर एशियाई पाठकों को अधिक जंचेगी (अब हमें क्या पता कि <a href="http://www.tivo.com/">TiVo</a> क्या बला है?)। मेल्कम ग्लैडवेल की पुस्तक &#8220;<a href="http://www.gladwell.com/tippingpoint/">टिप्पिंग प्वाइंट</a>&#8221; का ज़िक्र अब तमाम जगह इतना हो चुका है कि लगता है विवेचक हर दृग्विषय का संबंध इससे जोड़ेंगे, ब्लॉगिंग से इसका साम्य कई जगह विश्लेषित किया जा चुका है।</p>
<p>कुल मिलाकर &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; मज़ेदार किताब है, एक ही बैठक में पढ़ लेने लायक और ब्लॉगिंग की दुनिया में कुछ दिन बिता चुके नौसिखियों और निपुण चिट्ठाकारों के लिये बेहद काम की। ब्लॉग पर आवक कैसे बढ़ायें, ब्लॉगिंग से पैसा कैसे कमायें, ब्लॉग की वजह से नौकरी कैसे न गवायें जैसे कई काम के टिप हैं पुस्तक में। मौका मिले तो ज़रूर पढ़ें और लायें अपनी ब्लॉगिंग में निखार!
<p class=note>बिज़ की पुस्तक &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; के लेख &#8220;व्हाइ वुड ऍनीवन वांट टू ब्लॉग&#8221; का हिन्दी रूपान्तर आप <a href="http://www.nirantar.org/0405-saransh/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</p>
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		<title>कोई भला चिट्ठा क्यों लिखना चाहेगा?</title>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 13:04:14 +0000</pubDate>
		<dc:creator>बिज़ स्टोन</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>
		<category><![CDATA[Biz Stone]]></category>

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		<description><![CDATA[चिट्ठाकारी आसान है और नियमित चिट्ठा लेखकों को पुस्तक प्रकाशन के अनुबंध या स्वतंत्र लेखन कार्य द्वारा अर्थलाभ मिलना भी कोई असंभव काम नहीं है। सारांश में पढ़ें <strong>बिज़ स्टोन</strong> की पुस्तक &#34;<strong>हू लेट द ब्लॉग्स आउट</strong>&#34; से एक चुने हुये लेख &#34;वाई वुड एनीवन वाँट टू ब्लॉग?&#34; का <strong>रमण कौल</strong> द्वारा किया हिन्दी रूपांतर।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser"><a href="http://www.bizstone.com/">बिज़ स्टोन</a> को कोई महापंडित कहता है तो कोई बेवक़ूफ। बिज़ के अपने शब्दों में, &quot;वे सब सही कहते हैं&quot;। &quot;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&quot; और &quot;ब्लॉगिंग&quot; पुस्तकों के लेखक बिज़, गूगल में <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a> पर काम करते हैं। यहाँ प्रस्तुत है &quot;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&quot; के लेख &quot;व्हाइ वुड ऍनीवन वांट टू ब्लॉग&quot; का हिन्दी रूपान्तर। इस किताब की देबाशीष द्वारा की समीक्षा आप <a href="http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</div>
<blockquote>
<p>&quot;मेरा ब्लॉग न होता तो मैं भी किसी भूले बिसरे बाल-अभिनेता जैसा होता, जिसे हर दसेक साल में &quot;कहाँ गए वह लोग?&quot; जैसे किसी कार्यक्रम में याद किया जाता। मैं परेशां और फटेहाल होता। पर ब्लॉग लिखने से मैंने कथावाचन का नया शौक पा लिया है, और शायद एक दूसरा पेशा भी। मैं खुश हूँ कि मैं अपने परिवार का गुजर बसर कुछ ऐसे काम द्वारा कर पाता हूँ जिससे मुझे प्रेम है।&quot; &#8211;  <a href="http://www.wilwheaton.net/">विल वीटन</a></p>
</blockquote>
<p><font size="5">मे</font>री बहन एक छोटे से घर में अपने दो ग्रेहाउंड कुत्तों, तीन बिल्लियों और अपने पति के साथ रहती है। बढ़िया शाकाहारी बनैना ब्रेड बनाती है वह। जब मैं उसके घर जाता हूँ, कुत्ते कुछ बौखला से जाते हैं। बारी बारी से मुझे घूरते हैं। नज़र रखते हैं कि कहीं मैं अपने छिपे हुए पंख खोल कर किसी बिल्ली को न ले उड़ूँ।</p>
<p><img vspace="2" hspace="2" border="0" align="left" alt="बिज़ स्टोन द्वारा लिखित पुस्तक हू लेट द ब्लॉग्स आउट से अंश" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" />ऐसा ही एक अवसर है जब मैं उन के घर में बनैना ब्रेड का आनन्द ले रहा हूँ और मैण्डी (यानी मेरी बहन) और गैरो (मेरे जीजा) के साथ बतिया रहा हूँ। गैरो को तो मैंने चिट्ठाकारी का रस्ता दिखा दिया है &#8212; वह अब अपने बैंड के लिए ब्लॉग लिखता है। हम बात छेड़ते हैं कि कैसे मैण्डी शायद कभी अपना व्यवसाय शुरू करेगी, हो सकता है जडी बूटियों से संबन्धित ही कुछ करे। उसे औषधीय बूटियों में बड़ी रुचि है, और बहुत जानकारी रखती है उन के बारे में। पर देर नहीं लगती बातचीत का रुख चिट्ठों की तरफ मुड़ने में। यूँ समझो कि मुझे इस की बीमारी है।</p>
<p>&quot;मैण्डी, तुम्हें अपना ब्लॉग शुरू करना चाहिए।&quot;</p>
<p>वह नाक सिकोड़ती है, कहती है कि वह कभी यह नहीं कर सकती। उसे यह विचार ही नहीं सुहाता कि पराये लोग पढ़ें कि वह क्या कर रही है, या उस के बारे में जानें। पराये लोगों की तो बात ही छोड़ो, वह कहती है, उससे भी बुरा तो यह है कि उसके परिचित लोग अंर्तजाल पर जाकर उस के बारे में पढ़ सकेंगे। ब्लॉगिंग जिसके &quot;पल्ले नहीं पड़ती&quot; वह ऐसे ही बात करता है।</p>
<p>मुझे ग़लत न समझें, प्राईवेसी ब्लॉगमंडल में एक वाजिब परेशानी है। पर मेरी बहन चिट्ठों के बारे में यह नहीं समझती कि ब्लॉग वैसा ही बनता है जैसा आप उसे बनाते हैं। कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि मैण्डी अपने चिट्ठे पर कुछ व्यक्तिगत लिखे। यह उसका पेशेवराना उपक्रम भी बन सकता है। पर यह बात उसे जँचती नहीं। उस की नाक की सिकुडन अभी भी गई नहीं है, और अब तो उसने एक आँख भी आधी भींच ली है। कुछ लोगों को ज़रा ज़्यादा ही प्रोत्साहन की ज़रूरत होती है। या शायद यह मेरे कई दिनों से न नहाने का असर हो।</p>
<p>यदि मैण्डी जडी बूटियों (हर्बोलॉजी) पर चिट्ठा शुरू करती है तो उसे हर्ब्लॉग का नाम दे सकती है। बढ़िया। यह कई स्तरों पर काम करता है। चलिए मानते हैं कि मैण्डी अंततः जड़ी बूटियों से जुड़ा एक छोटा मोटा कारोबार करना चाहती है। ब्लॉग से उसे इस उद्यम में मदद मिल सकती है। देखते हैं उसका बूटी ब्लॉगिंग का कारनामा किस तरह से रंग ला सकता है।</p>
<div id='pullQuoteR'> मेरी बहन चिट्ठों के बारे में यह नहीं समझती कि ब्लॉग वैसा ही बनता है जैसा आप उसे बनाते हैं। कोई ज़रूरी थोड़े ही है कि मैण्डी अपने चिट्ठे पर कुछ व्यक्तिगत लिखे। यह उसका पेशेवराना उपक्रम भी बन सकता है।</div>
<p>वह अपना ब्लॉग सीधी सी सम्पादकीय नीति से शुरू करती हैः रोज़ कुछ घंटे इंटरनेट पर घूम कर जड़ी बूटियों, रेसिपीयों, इलाजों और उत्पादों से सम्बन्धित जालपृष्ठ देखना, उन की कड़ियाँ देना और अपनी राय, विवेचना और विचार रखना। यदि वह अपने ब्लॉग की प्रविष्टियों पर टिप्पणियों की अनुमति देती है तो उसके पाठक प्रतिक्रिया के ज़रिए उसकी सम्पादकीय नीति को स्पष्ट करने में मदद कर सकते हैं।</p>
<p><a target="_blank" title="Who lets the blogs out at Amazon" href="http://www.amazon.com/exec/obidos/redirect?path=ASIN/0312330006&amp;link_code=as2&amp;camp=1789&amp;tag=nirantar-20&amp;creative=9325"><img width="290" vspace="5" hspace="5" height="361" border="0" align="left" title="Who let the Blogs out by Biz Stone" alt="Who let the Blogs out by Biz Stone" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/story_big_bizstone.jpg" /></a>       अपने दोस्तों-रिश्तेदारों को ब्लॉग के बारे में बता कर वह उस पर आवाजाही की शुरुआत कर सकती है। इससे भी बढिया, यदि उसके दोस्तों के ब्लॉग हैं तो वह उन से कह सकती है कि वे उस के ब्लॉग की कड़ी डालें। छोटे मोटे टेक्स्ट आधारित विज्ञापनों पर भी वह बीसेक डॉलर खर्च कर सकती है, पर ज़रूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि यदि वह अपनी सम्पादकीय दृष्टि जड़ी बूटियों पर केन्द्रित रखे, तो मैण्डी का ब्लॉग वैसे ही वेब पर खोज करने वालों को आकर्षित करेगा। यह अच्छा है, क्योंकि उन्हें जड़ी बूटियों की सूचना चाहिए और वही उसके पास है।</p>
<p>      समर्पित पाठक संख्या को बढ़ाने के साथ साथ मेरी बहन धीरे धीरे अपने औषधि-पदार्थों और होम्योपैथी के ज्ञान को सान लगा सकती है। मानिए कि एक साल तक वह यही करती रहती है। यानी कि साल भर का ज्ञान उसके ब्लॉग में समाया होगा, और उससे भी महत्वपूर्ण बात, उसकी पाठक संख्या हर महीने बढ़ती जाएगी। अच्छी खासी आवाजाही और एक विशेष विषय-वस्तु के चलते मैण्डी अपने ब्लॉग पर विषय सम्बन्धित विज्ञापन डाल सकती है, और ठीकठाक पैसा बना सकती है। साथ ही वह जड़ी बूटी की वेब-गुरू बनने के पथ पर भी लगभग अग्रसर है। जब लोग जाल पर किसी समझदार बूटी विशेषज्ञ को खोजने निकलेंगे तो मैण्डी के ब्लॉग पर तो पहुँचेंगे ही (हो सकता है कोई सम्पादक ही लेखक खोज रहा हो?)। अन्ततः मैण्डी को चिट्ठाकारी के कई फायदे पता चलेंगे &#8211; कुछ व्यावसायिक तो कुछ व्यक्तिगत। </p>
<h1>चिट्ठाकारी के फायदे</h1>
<p>इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि आपका चिट्ठा आपके किसी शौक, आपके काम, या राजनीति पर केन्द्रित है, या आप दिन भर क्या करते हैं इस पर। चिट्ठाकारी है सूचना का आदान प्रदान और जितना आप शोध करेंगे, विचार विनिमय करेंगे, उतनी ही आप की अपनी रुचि के क्षेत्र में निपुणता बढ़ेगी, चाहे वह क्षेत्र &quot;मेरी रुचियाँ&quot; ही क्यों न हो। हर प्रविष्टि जो आप छापेंगे आपके जीवन कार्य में जुड़ जाएगा और वह कार्य आपके मन की एक खिड़की है। चाहे आप केवल अपनी पसन्दीदा जालपृष्ठों की सूची ही क्यों न छापें, आप की चुनी हुई कड़ियाँ ही आप का व्यक्तित्व प्रदर्शित करती हैं। चिट्ठाकारी खोजने, सोचने और लिखने का रोज़मर्रा का अभ्यास है। इस अभ्यास के कई लाभ हैं।</p>
<h1>चिट्ठाकारी आप को सयाना बनाती है</h1>
<p>इंटरनेट पर सूचना के अथाह भंडार के चलते, चिट्ठाकार को कोई भी कड़ी सुझाते समय समझदारी से चुनाव करना पड़ता है। फिर उस चिट्ठाकार को उस कड़ी के चिट्ठाकारी के योग्य होने के कारणों को प्रभावशाली टिप्पणी द्वारा समझाना पड़ता है। अपने आप में तो यह इतना मुश्किल नहीं है, पर रोज़ ऐसा करने से विश्लेषणात्मक मस्तिष्क की ख़ासी कसरत होती है क्योंकि न सिर्फ हमें रुचिकर लगने वाली चीज़ें चुननी पड़ती हैं बल्कि वे हमें रुचिकर क्यों लगती हैं यह भी बतलाना पड़ता है। फिर हमें ये विचार संक्षिप्त विवरण के साथ पाठक तक पहुँचाने होते हैं।</p>
<p>चिट्ठाकारी एक सूचना-संतृप्त जीवन शैली है, चिन्तन और अभिव्यक्ति से भरपूर। पहले पहल तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि चिट्ठाकार मूड के हिसाब से दिन में दो चार प्रविष्टियाँ लिख मारने से ज़्यादा कुछ नहीं कर पाते, पर कुल मिला कर जो प्रभाव होता है वह आदमी को &quot;स्मार्टता&quot; है। हैं, ऐसा कोई शब्द है भी? देखा मैं कैसे इन चीज़ों के बारे में सोचता हूँ? आप शर्तिया कह सकते हैं कि मैं एक चिट्ठाकार हूँ।</p>
<p>चिट्ठाकारी और चिट्ठामंडल कई चीज़ों के मिले जुले असर का ही दूसरा नाम है। लाखों चिट्ठे अंर्तजाल को अक्लमन्द बना रहे हैं, और हज़ारों चिट्ठे आप को। केवल अक्लमन्द ही नहीं, कामयाब भी। एक उदाहरण देता हूँ। </p>
<h1>ब्लॉग से पुस्तक प्रकाशन तक</h1>
<p>मैंने ज़िक्र किया था कि संभव है कि कोई लेखक खोजने वाला सम्पादक मैण्डी के चिट्ठे तक जा पहुँचे। यह संभावना की सीमाओं से बाहर तो नहीं है।</p>
<p>गए दिनों में पुस्तक छपने का सौदा किसी किसी को ही मिलता था। या तो आप साहित्यिक पंडित होते, या लेखकों के उच्च सम्प्रदाय के सदस्य, या फिर अपने क्षेत्र में उन्मादपूर्ण नैपुण्य से भरे। फिर आप को दरकार होती एक एजेंट की, एक प्रचारक की और अपने काम का एक भंडार जिस से आप साबित करते कि आप में वह सब कुछ है जिस से आप चुनिन्दा, कुलीन, गर्वशील, प्रकाशित गुट का हिस्सा बन सकते हैं।   </p>
<p>अब, आप को चाहिए बस एक चिट्ठा और थोड़ा सा दम। चिट्ठाकारी लोगों का टाँका किताबी सौदों से जैसे तैसे भिड़ा ही देती है। यदि आप का सपना रहा है कि बार्न्ज़-ऍण्ड-नोब्ल के शेल्फ पर कहीं आप का नाम हो और आप अपने दोस्तों से यह कहने की तमन्ना रखते हों, &quot;यार आज नहीं आ सकता, मेरा संपादक सर पर सवार है,&quot; तो चिट्ठाकारी आप का पहला कदम है। अभी, इस समय, वेब पर चिट्ठाकारों को किताबें लिखने के ठेके मिल रहे हैं। चिट्ठे से पुस्तक तक के सफल सफर का राज़ क्या है?</p>
<h1>दीवाने हो जाइए</h1>
<p>मुझे अपना पहला पुस्तक लिखने का ठेका ऐसे ही मिला। पाँच साल पहले मैं तब चिट्ठाकारी का दीवाना हो गया जब मैं ने यह जाना कि यह कितना आसान है और मुझे अहसास हुआ कि एक क्रान्ति पनप रही है। मैं चिट्ठाकारी के बारे में इतना बोलता था कि मेरे दोस्त मुझे पागल समझने लगे; मेरे मुँह खोलते ही लोग अक्सर आँखों से इशारे करते थे। पर देखो तो, अब मैं लेखक हूँ। यह दीवानगी जैसा लगाव आप के भी काम आ सकता है। इस दीवानेपन का यूँ तो इलाज है, पर लगाम न लगाई जाए तो आप को खासी दिहाड़ी दिला सकता है।</p>
<div id='pullQuoteR'>  जो लोग बारीकियों में गुम हो जाते हैं, स्वाभाविक चिट्ठाकार होते हैं। इसलिए, यदि आप को किसी चीज़ का फितूर है और उसे लोगों के साथ बाँटने की इच्छा है, तो बड़ा सही समय है चिट्ठा शुरू करने का।</div>
<p>जूली पॉवेल ने भी अपने पागलाना बर्ताव को किताबी ठेके में बदल दिया। क्वीन्ज़ न्यूयार्क में वह बदकिस्मती के दौर से गुज़र रही थी, तो जूली ने कहा, &quot;इसकी माँ की ***&quot; (मुझे लगता है उसने वाकई ऐसा कहा, क्योंकि वह गालियाँ बहुत बकती है) और फैसला किया एक साल में जूलिया चाइल्ड और सिमोन बैक की लिखी पुस्तक &quot;मास्टरिंग द आर्ट ऑफ फ्रेंच कुकिंग&quot; के 1961 के पहले संस्करण में छपे हर व्यञ्जन को पकाने की अपनी दीवानी योजना पर ब्लॉगावेज़ (ब्लॉग दस्तावेज़) बनाने का।   <a href="http://blogs.salon.com/0001399/">जूली/जूलिया परिकल्पना</a> का जन्म हुआ। 365 दिन में पाँच सौ छत्तीस व्यञ्जन। &quot;एक युवती और एक रद्दी सा उपनगरीय रसोईघर। शादी, नौकरी, बिल्लियों का पोषण, सब दाँव पर।&quot; ख़ैर, इस &quot;दिन की सरकारी कामचोर, रात की बाग़ी रसोइयन&quot; ने एक जाने माने प्रकाशन गृह के मन में सहानुभूति जगा दी। जो लोग बारीकियों में गुम हो जाते हैं, स्वाभाविक चिट्ठाकार होते हैं। न सिर्फ इसलिए कि वे हर दिन और कभी तो दिन में कई बार चिट्ठा लिखेंगे, पर इसलिए भी कि वे अपने पुरालेखों, परिचय, अभिकल्पों, खाकों से छेड़छाड़ करना, बदलते रहना, जोड़ना, घटाना पसन्द करते हैं। इसलिए, यदि आप को किसी चीज़ का फितूर है और उसे लोगों के साथ बाँटने की इच्छा है, तो बड़ा सही समय है चिट्ठा शुरू करने का। बाद में जब आप वह किताब लिखने के ठेके पर दस्तखत करेंगे, तब धन्यवाद देंगे मुझे। शायद कुछ इस तरह &#8211; &quot;यह पुस्तक समर्पित है बिज़ को।&quot; </p>
<h1>अपना चिट्ठा आप बनो</h1>
<p><a href="http://www.thebaghdadblog.com/home/">सलाम पैक्स</a> ईराक से चिट्ठा लिखते थे, जब चारों तरफ बम फूट रहे थे। बमबारी, लड़ाई, आतिशबाज़ी हमेशा बढ़िया तरीका तो नहीं है, पर यह सलाम के लिए चल निकला। ज़ाहिर है लोग वहाँ पर वास्तव में क्या हो रहा है यह सुनना चाहते थे, न कि सिर्फ टीवी समाचारों में यह सुनना कि अमरीका कितना महान है। दरअसल सलाम को तो गुड़ की डली ही मिल गई, क्योंकि उसकी किताब उसके चिट्ठे का ही छपा हुआ रूप है। यदि आप ऐसा कारनामा कर दिखाएँ तो सोने पे सुहागा, क्योंकि सारा काम तो किया कराया है। धत् तेरे की! मुझे क्यों नहीं आया यह ख्याल।</p>
<p>मान लीजिए आप किसी युद्धरत, बम बरसाए शहर में फंस गए हैं, तन पर जो कपड़े हैं वही रह गया है आप के पास, और चिट्ठा लिखने की सनक हो रही है, तो घबराइए मत। कुछ ऐसा जुगाड़ कर सकते हैं कि बस एक ईमेल खाते या एक सेलफोन से चिट्ठाकारी की जाए। ऑडियो-ब्लॉगर से आप की आवाज़ फोन से सीधे MP3 फाइल के रूप में प्रकाशित होती है। हाँ अगर आप दुश्मन के फौजियों से छिप कर भाग रहे हों तो ऑडियो-ब्लॉगिंग न करें, क्योंकि वह सुन सकते हैं और आप को गोली मार सकते हैं। चिट्ठाकार ज़िन्दा रहे तो बेहतर चिट्ठा लिख सकता है। </p>
<p>किताबी ठेके के बारे में मत सोचिए, बस चिट्ठा लिखते जाइए। <a href="http://smartypants.diaryland.com/">मिमी स्मार्टीपैंट्स</a> ने वही तो किया, और वह इतनी भी दीवानी नहीं थी कि हार्पर-कॉलिन्ज़ यूके के किताबी ठेके को ठुकरा देती। &quot;मैं इस किताब के चक्कर में दोषभावना से घिरी हूँ, क्योंकि कितने ही योग्य लेखक अपनी पुस्तकें छपवाने कि लिए संघर्ष करते हैं, कष्ट झेलते हैं, और कई लोग गुमनामी में पापड़ बेलते हैं शानदार उपन्यास लिख लिख के। मैं अपने छोटे मोटे जालस्थल पर दोपहर के अन्तराल में बक बक करती हूँ, जो लिखती हूँ वह किताब भी नहीं है, और आस्मान से टपक पड़ता है किताब का ठेका।&quot; </p>
<p>मिमी भी उसी राह पर चली जिस पर सलामः उस की पुस्तक भी उस के चिट्ठे का छपा हुआ रूप है। मित्रों, इस गुड़ की डली को मैं जितना मीठा कहूँ उतना कम हैः आप का सम्पादक सारा काम करे और आप बटोरें चेक। पर ज़्यादा सयानापन नहीं अभी, क्या! अभी अपने चिट्ठा पर काफी ज़ोरदार मेहनत करना है आपको। </p>
<h1>ड्रीम टीम का हिस्सा बनिए</h1>
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<div id='pullQuoteR'>सामूहिक चिट्ठा बहुत अच्छा तरीका है ज्ञान बटोरने का। कुछ चीज़ें आप को पता होती हैं, कुछ आप के दोस्तों को। कई चिट्ठाकार, मतलब काम हल्का।</div>
<p>मैग, मैट और पॉल, तीन सयाने और चिट्ठों के कारीगर बन्दे हैं, जो मिल जुल कर बढ़िया काम करते हैं। एक प्रकाशक जिस ने उन की किताब छापी, पहचान गया कि इस तिगड़ी में दम है, और उन का सामूहिक ज्ञान एक सूचनात्मक ग्रन्थ में बदला जा सकता है। कुछ चीज़ें आप को पता होती हैं, कुछ आप के दोस्तों को। मिल जुल कर जो ज्ञान होता है, वह अकेले के ज्ञान से ज़्यादा होता है। यह तो सीधी सी बात है, है न? सामूहिक चिट्ठा बहुत अच्छा तरीका है इस तरह से ज्ञान को बटोरने का। करना इतना है कि एक बन्दा चिट्ठा शुरू करे, फिर सेटिंग्स वाले नियन्त्रण पटल में जा कर दूसरों को आमन्त्रित करे। कई चिट्ठाकार, मतलब काम हल्का।</p>
<h1>अपनी राह खुद निकालें</h1>
<p><a href="http://wilwheaton.net/">विल वीटन</a> अदाकार से चिट्ठाकार बने हैं। पहले चिट्ठे के द्वारा, और अब अपनी पुस्तकों द्वारा वीटन को वह आत्मीय सम्पत्ति मिल गई है जिस के मारे वह ऑडिशन पर जाया करते थे। वीटन को तीन पुस्तकों का ठेका मिला, और सिनात्रा की तरह ही उस ने यह काम मेरे तरीके से किया। मेरा मतलब, उस के तरीके से। मेरा मतलब.., खैर आप समझ गए। बजाय इन्तज़ार करने के कि प्रकाशक उसके पास आएँ, वीटन ने अपना &quot;तथा-कथित अन्तरिक्ष युग में जीवन पर पाँच लघु, पर सत्य कथाओं&quot; का समूह &quot;डान्सिंग बेयरफुट&quot; स्वयं छापा, और अपने चिट्ठे का प्रयोग किया द्वारा उस की बिक्री बढ़ाने के लिए। अपने घर की बैठक से उस ने पाँच महीनों में तीन हज़ार से अधिक प्रतियाँ ग्राहकों से पैसा ले कर रवाना कीं, और यह कोई मामूली करामत नहीं है। एक अन्दर की बात बताता हूँ &#8211; प्रकाशकों को बिकने वाली पुस्तकें अच्छी लगती हैं। अब वह बड़ा-सा लेखक है &#8211; एजेंट, पब्लिसिस्ट, सब ताम झाम के साथ। शाबाश विल, लगे रहो।</p>
<h1>आप टिकट नहीं खरीदेंगे तो लाटरी कैसे जीतेंगे</h1>
<p>चिट्ठाकारी आसान है, और इसको अपनी ज़िन्दगी में शामिल कर लेना मुश्किल नहीं है। आप न चाहें तो अपनी व्यक्तिगत बातें बताने की आवश्यकता नहीं है। शुरू हो जाइए, कुछ भी गढ़ लीजिए। उसे संवारिए। कुछ बढ़ाइए, कुछ चढ़ाइए। साल भर बाद मैं आप की तेज़ी से बिकती किताब &quot;झूठों भरा साल&quot; खरीद रहा होऊँगा, 12.95 डॉलर में। अच्छी लिखी है।</p>
<p>यदि आप अपने चिट्ठे पर लगे रहेंगे, तो किताबी ठेके या अन्य स्वच्छंद लेखन कार्य के रूप में मिलने वाला आर्थिक लाभ असम्भव नहीं है। यदि आप टिकट नहीं खरीदेंगे तो लाटरी कैसे जीतेंगे। मैण्डी मुझ पर जितनी चाहे नाक सिकोड़े, पर वह तब समझेगी कि मेरी बात सही थी जब वह डाउनटाउन बॉस्टन में बार्न्ज़-ऍण्ड-नोब्ल की दुकान पर अपनी किताबें आटोग्राफ कर रही होगी, क्योंकि लाखों लोग उस के ऐसे उपन्यासों के दीवाने होंगे जो उसने एक शक्की जड़ी बूटी विशेषज्ञ के बारे में लिखी होंगी, जो अपने जड़ी बूटी विज्ञान से प्रेरित जासूसी से अपराधों के भेद खोलता है। फिर मैं उस से कुछ पैसे भी उधार ले पाऊँगा।</p>
<p class=note><em>हू लेट द ब्लॉग्स आउट?</em> से अंश सेंट मार्टिन प्रेस की पूर्वानुमति से प्रकाशित। समस्त प्रकाशनाधिकार लेखक के पास सुरक्षित। प्रस्तुत पुस्तकांश का बिना पुर्वानुमति अंर्तजाल पर अथवा पुस्तक रूप में पुनः प्रकाशन नहीं किया जा सकता। इस मूल अंग्रेज़ी आलेख का हिन्दी रूपांतरण किया  <a href="http://kaulonline.com/"> रमण कौल</a> ने। इस किताब की देबाशीष द्वारा की समीक्षा आप <a href="http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</p>
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