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	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; Blog</title>
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	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
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		<title>टेरापैड: ब्लॉगिंग से आगे की सोच?</title>
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		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:43:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[टैक दीर्घा]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

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		<description><![CDATA[<strong>टेरापैड</strong> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। जानिये <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> क्या कहते हैं इस नये ब्लॉग प्लैटफॉर्म के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शायद नहीं। या शायद हाँ। चिट्ठाकारों के लिए अब बहुत से अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं और इनमें नित्य प्रति इजाफ़ा होता जा रहा है। एक नया,  आल-इन-वन किस्म का ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म &#8211; टेरापैड जारी किया गया है जो कि न सिर्फ मुफ़्त है (यदि आप विज्ञापनों से नहीं चिढ़ते हैं तो, चूंकि इसकी मुफ़्त सेवा विज्ञापन समर्थित है), ढेरों अन्य सुविधाओं से भी लेस है।</p>
<p><a href="http://www.terapad.com" target="_blank"><img title="Terapad" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/terapad.jpg" border="0" alt="Terapad" hspace="6" vspace="5" width="350" height="235" align="right" /> टेरापैड</a> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। यदि आप टेरापैड के जरिए अपना चिट्ठा लिखने की सोच रहे हैं तो आपको प्रमुखतः इसमें निम्न अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी जो अन्य ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म में अनुपलब्ध हैं:</p>
<ul>
<li>पेपॉल रेडी शॉप &#8211; इसका अर्थ है, आप अपने ब्लॉग को ई-बे जैसा शॉपिंग माल मिनटों में बना सकते हैं।</li>
<li>पूरा सीएसएस नियंत्रण &#8211; माने कि बोरिंग ब्लॉगर व सीमित वर्डप्रेस टैम्प्लेटों से पूरा छुटकारा। आप अपने ब्लॉग को मनचाहा रूपाकार दे सकते हैं।</li>
<li>प्रोब्लागिंग औजार- (ये क्या है भई? हमें भी नहीं पता)</li>
<li>WTSIWYG संपादन सुविधा &#8211; यह तो सभी में है, परंतु इसमें यह उन्नत किस्म का है।</li>
<li>सामग्री प्रबंधन &#8211; आप अपने चिट्ठा पोस्टों के अतिरिक्त भी अन्य सामग्री डाल सकते हैं।</li>
<li>समाचार व आरएसएस फ़ीड जोड़ सकते हैं (यह कोई नई सुविधा नहीं है)</li>
<li>इमेज गैलरी</li>
<li>पाठकों की आवाजाही पर निगाह &#8211; (यह तो सबसे जरूरी वस्तु है)</li>
<li>परिचर्चा फोरम (वाह! क्या बात है)</li>
<li>नौकरी तथा कर्मकुण्डली खोज- बेरोजगारों के लिए बढ़िया है।</li>
<li>कैलेण्डर</li>
<li>मुफ़्त मासिक 10 गीबा बैंडविड्थ  /  तथा कुल 2 गीबा डाटा</li>
</ul>
<p>चलिए अब कुछ खामियों की बातें भी करें। वैसे तो कुछेक ही हैं, पर हैं तो :</p>
<p>एक ही स्थल पर बहुत सी चीजें एक आम चिट्ठाकार के लिए अनावश्यक ही होंगी। इसका इंटरफ़ेस अनावश्यक रूप से अव्यवस्थित है और सारा मामला घालमेल प्रतीत होता है। इसका यूजर इंटरफेस छोटे-छोटे कार्यों के लिए अवांछित नेविगेशन मांगता है जो खीझ भरा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आपको नया ब्लॉग पोस्ट बनाने के लिए कड़ी तब तक दिखाई नहीं देती जब तक कि आप कोई श्रेणी बना कर उसे क्लिक नहीं करते! कौन नया चिट्ठाकार इसे समझ सकेगा भला?</p>
<p>एक नया व्यापारिक जोखिम जिसे गूगल खरीद लेगा? बहुत संभव है, परंतु फिर इसके उपयोक्ता आधार को करोड़ों में भी तो पहुँचना चाहिए। संभावना तो कम ही नजर आती है!</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2201&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
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		<title>मीडिया ही घोंट रहा है ब्लॉग का गला</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0405-cover-story</link>
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		<pubDate>Sat, 09 Apr 2005 07:46:53 +0000</pubDate>
		<dc:creator>मार्क ग्लेसर</dc:creator>
				<category><![CDATA[आमुख कथा]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Mediaah]]></category>
		<category><![CDATA[TOI]]></category>

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		<description><![CDATA[बड़े अखबार समूह टाइम्स आफ इंडिया की कानूनी धमकियों के कारण पत्रकार <strong>प्रद्युम्न माहेश्वरी </strong>को अपना लोकप्रिय ब्लॉग मीडियाह बंद करना पड़ा। इससे भारतीय ब्लॉग जगत में विक्षोभ की लहर दौड़ी और एक इंटरनेट याचिका भी दायर हो गई। क्या भारत में मीडिया और ब्लॉग का सहअस्तित्व संभव हो पायेगा? विवेचना कर रहे हैं <strong>मार्क ग्लेसर</strong>।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser"><img width="135" vspace="2" hspace="2" height="140" border="0" align="right" alt="मीडिया ही घोंट रहा है ब्लॉग का गला" src="http://www.nirantar.org/images/stories/coverstory.gif" />भारत के एक बड़े समाचार-पत्र समूह <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/">टाइम्स ऑफ इंडिया </a> की कानूनी धमकियों से <a href="http://mediaah.blogspot.com/">मीडियाह ब्लॉग</a> बंद हुआ। इससे भारतीय ब्लॉग जगत में विक्षोभ की लहर दौड़ी और एक <a href="http://www.petitiononline.com/mediaahp/petition.html">इंटरनेट याचिका</a> भी दायर हो गई। माहेश्वरी ने जुलाई 2003 में अपना ब्लॉग शुरू किया था। यह भारतीय मीडिया उद्योग पर पूर्वाग्रहरहित नज़र डालता जिनमें चुटीले भाष्य, गॉसिप और अफवाहें भी होतीं।</p>
<p>         क्या मीडिया की आलोचना इस उपमहाद्वीप पर साकार रूप ले पायेगी? प्रश्न कर रहे हैं <a href="http://www.ojr.org/ojr/people/markglaser/">  मार्क ग्लेसर </a>। </div>
<p> <img width="120" vspace="5" hspace="5" height="120" border="0" align="left" alt="Times of India vs Mediah" title="Times of India vs Mediah" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/times.gif" /> <font size="3"><strong>भा</strong></font>रत में प्रकाशन उद्योग की समृद्धि मीडिया में आलोचना की प्रखरता का परिचायक नहीं है। <a href="http://rni.nic.in/">भारतीय समाचार पत्रों के रजिस्ट्रार </a> के मुताबिक मार्च 2003 तक उपमहाद्वीप पर 55,780 अखबार थे जिनमें पिछले साल 3820 नये प्रकाशन पंजीकृत हुए और प्रसार संख्या में 23 प्रतिशत वृद्धि हुई। और <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Times_of_india">विकीपीडिया </a> के अनुसार, बेनेट कोलमेन के स्वामित्व वाला <a href="http://timesofindia.indiatimes.com/">टाइम्स ऑफ इंडिया</a> 20 लाख की प्रसार संख्या एवं 74 लाख पाठक वर्ग के साथ अंग्रेजी भाषा के समाचार पत्रों में अग्रणी है। </p>
<p>लेकिन इस सफलता के साथ ही खबरों का गला घोंटा जा रहा है क्योंकि बड़े मेगा-मीडिया कर्पोरेशनों ने न केवल समाचार पत्रों पर नियंत्रण पा लिया है बल्कि वे एक दूसरे के समूहों के अंशधारक भी हैं। इसलिए जब जाने माने मीडिया आलोचकों में से एक, प्रद्युम्न माहेश्वरी, ने अपने ब्लॉग <a href="http://mediaah.blogspot.com/">मीडियाह </a> पर टाइम्स ऑफ इंडिया की आलोचना की तो टाइम्स ने इसे मानहानी लेख करार दे कर पर सात पृष्ठ की कानूनी चेतावनी के जरिए उन्हें कुचल देना चाहा। धमकी ने असर दिखाया और माहेश्वरी ने अपना जालस्थल बंद कर दिया, क्योकि वे पुणे के महाराष्ट्र हेराल्ड दैनिक को चलाते हैं और उनके पास कानूनी लड़ाई लड़ने लायक संसाधन नहीं हैं। </p>
<p> <img width="100" vspace="5" hspace="5" height="130" border="0" align="right" alt="Pradyumn Maheshwari" title="Pradyumn Maheshwari" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0405/pradyuman.jpg" />उनतालीस वर्षीय माहेश्वरी ने जुलाई 2003 में अपना ब्लॉग शुरू किया था। यह भारतीय मीडिया उद्योग पर पूर्वाग्रहरहित नज़र डालता जिनमें चुटीले भाष्य, गॉसिप और अफवाहें भी होतीं। उनका इरादा पुणे में मध्यम वर्गीय पत्रकारों के लिए <a href="http://www.poynter.org/">पायन्टर</a> सरीखी संस्था बनाना था। 8000 की संख्या के पाठक वर्ग के साथ, ब्लॉग के मीडिया जगत में प्रसिद्ध हो जाने से उनकी अपनी महत्वाकांक्षाएँ जागृत हो गईं। उन्होंने हेराल्ड में 2003 में काम शुरू किया और उस पर संपूर्ण ऊर्जा लगाने हेतु अपना ब्लॉग बंद कर दिया। माहेश्वरी कहते हैं &quot;जालस्थल मेरे लिए आर्थिक रूप से लाभदेय नहीं था, उसे व्यवसायिक बनाने के विचार आने के बाद भी ऐसा कर नहीं पाया, शायद यह समय से आगे का कदम होता या शायद मैं अति आदर्शवादी था। मुझे लगा कि मीडिया उद्योगों से पैसा और विज्ञापन मुझे प्रभावित करेंगे।&quot; </p>
<p>साल भर बाद माहेश्वरी ने जनवरी 2004 में ब्लॉग पुनः शुरू किया। टाइम्स ऑफ इंडिया द्वारा रायटर से टीवी से संबद्ध सौदे के बारे में एक आलेख लिखने पर उन्हें टाइम्स ऑफ इंडिया से पहली कानूनी धमकी मिली। हालाँकि एक दूसरे समाचार पत्र ने भी इस मुद्दे को उछाला पर माहेश्वरी लड़ने को तैयार नहीं थे। उन्होंने चिट्ठा वापस ले कर माफी माँग ली। पर उस माफ़ीनामे से भी टाइम्स उखड़ गया और उन्होंने माहेश्वरी को ब्लॉग बंद करने को कहा ताकि कोई पत्र के विरुद्ध कोई ज़हर न फैला सके। </p>
<p>फिर मार्च 7 को उन्हें एक पहले से भी लम्बा कानूनी नोटिस मिला जिसमें उन्हें टाइम्स से संबद्ध 19 आलेख हटाने या फिर कानूनी परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहने को कहा गया था। माहेश्वरी के अनुसार टाइम्स को <a href="http://medianet.indiatimes.com/">मीडियानेट </a> आलोचना बुरी लगी थी। संपादकीय पृष्ठों के व्यापारीकरण के तहत मीडियानेट में व्यवसाय टाइम्स के संपादकीय भाग में चित्र व खबरें <a href="http://ww1.mid-day.com/news/city/2004/may/83022.htm">खरीद सकते</a> हैं। </p>
<p>&quot;टाइम्स ऑफ इंडिया से संपर्क के मेरे सारे प्रयासों की अवज्ञा की गई। कार्यकारी निदेशक श्री रवि धारीवाल से बात करने पर उन्होनें इस मसले पर अनभिज्ञता जाहिर की। हालांकि उन्होंने मीडियाह ब्लॉग पढ़ा था। &quot; </p>
<p>कानूनी नोटिस दिल्ली के अधिवक्ता के.के.मदान की तरफ से आया था जिन्होनें सिर्फ कानूनी कार्यवाही की पुष्टि की और हमारी अँतराष्ट्रीय फोनकाल को काट दिया। कानूनी नोटिस माहेश्वरी को स्पष्ट धमकी देता है, &quot;आप हमारे मुव्वक्किल, उनके कर्मचारियों और उनके ग्राहको के विरुद्ध आपराधिक षड़यंत्र में निरंतर संलग्न हैं जिससे हमारे मुव्वक्किल और उनके कर्मचारियों को गंभीर हानि एवं प्रतिष्ठा हनन हुआ है। स्पष्ट है कि आपके आलेख मेरे मुव्वक्किल की प्रतिष्ठा के प्रतिकूल हैं और यह किसी के द्वारा छद्म षड़यंत्र के तहत जानबूझकर किया गया है। मेरे मुव्वक्किल को कोई भी आपराधिक या दीवानी रूप से कानूनी कार्यवाही का अधिकार है।&quot; </p>
<p>बहुतों का सोचना है कि ब्लॉगजगत ने ए.जे.लिबलिंग की कहावत झूठ साबित की है कि &quot;प्रेस की स्वतंत्रता उसके मालिक के पास गिरवी होती है।&quot; </p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">भारतीय ब्लॉगजगत ने कमर कसी </h3>
<p>जहाँ माहेश्वरी टाइम्स से अदालत में दोचार होने से कतरा रहे थे वहीं भारतीय ब्लॉगजगत ने ऐसा कोई संकोच नहीं किया। एक गुमनाम ब्लॉगर ने झटपट <a href="http://mediaha.blogspot.com/">मीडिआहा </a> ब्लॉग की स्थापना की जिसमें टाइम्स ऑफ इंडिया से संबद्ध प्रद्युम्न के 19 आलेख व टाइम्स का कानूनी नोटिस उपलब्ध है। के.के.सुरजीत नामक ब्लॉगर, जो कि एक छात्र हैं, ने एक <a href="http://savemediaah.blogspot.com/">ब्लॉग </a> शुरु किया तथा एक इंटरनेट <a href="http://www.petitiononline.com/mediaahp/petition.html">याचिका </a> मीडियाह के पक्ष में दायर कर दी जिस पर दो सौ से ज्यादा हस्ताक्षर हो गये हैं। एक अन्य चिट्ठाकार ने अपने ब्लॉग पर एक विरोध जताता <a href="http://o3.indiatimes.com/quetzal/archive/2005/03/13.aspx">चिट्ठा </a> भी लिखा। मज़े की बात है कि यह ब्लॉग टाइम्स की ही ब्लॉग होस्टिंग सेवा ओथ्री पर चलता है। </p>
<p>मुम्बई के रोहित गुप्ता, जो एक स्वतंत्र लेखक व ईंजीनियर हैं, कहते हैं &quot;टाइम्स ऑफ इंडिया की इस मामले में सफलता इस उम्मीद पर कायम थी कि माहेश्वरी मीडिया मुगलों पर पलटवार न कर पायेंगे। यहीं उनकी बदलते समय व ब्लॉगजगत के प्रति उदासीनता उजागर होती है। माहेश्वरी को खुद के लिए लड़ने की ज़रूरत नहीं &#8212; यह भारतीय मूल के ब्लॉगरों की स्वातंत्र्य की बात है, सो उनकी लड़ाई हम लड़ेंगे।&quot; गुप्ता को त्सुनामी से जूझने के लिए त्सुनामी ब्लॉग बनाने का अनुभव है। उन्हें उम्मीद है भारतीय ब्लॉगजगत मीडिया वर्ग को झिंझोड़ कर रख देगा। </p>
<div id='pullQuoteR'>भारतीय मीडियाजगत को यह अहसास देर से हुआ है कि ब्लॉगजगत में उनके कामकाज को प्रभावित करने का माद्दा है।</div>
<p>गुप्ता ने ईमेल में लिखा &quot;चाहे यह दूर की कौड़ी हो, पर अगर मेरी दूरदृष्टि सही है तो यह इतिहास में &quot;भारतीय ब्लॉगजगत के विद्रोह&quot; के रूप में दर्ज होगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने सिर्फ यह दिखाया है कि एक सम्मानीय अखबार के स्तर से लड़कपन की धौंसबाजी तक का सफर उन्होंने कैसे किया है। अगर ब्लॉगर इकट्ठे होकर त्सुनामी जैसी अब तक की सबसे भीषण प्राकृतिक आपदा के प्रभावितों के लिए मानवीय मदद प्रदान कर सकते हैं तो वे टाइम्स ऑफ इंडिया जैसी इन्सानी नैतिक इंडियातों से आसानी से निपट सकते हैं।&quot; पीटर ग्रिफिन, जो मुंबई में स्वतंत्र लेखक है, एक प्रभावशाली समूह ब्लॉग <a href="http://akshargram.com/nirantar/">सीएसएफ </a> के अंशदाता हैं। इस ब्लॉग ने मीडियाह के बंद होने के मुद्दे पर टाइम्स की नाक में दम कर रखा है। ग्रिफिन कहते हैं भारतीय मीडियाजगत को यह अहसास देर से हुआ है कि ब्लॉगजगत में उनके कामकाज को प्रभावित करने का माद्दा है। </p>
<div id="section-teaser" style="margin:10px;padding: 10px; float: right; width: 250px;background:#E5E5E5">
<h3>ब्लॉग को बंद करना प्रद्युम्न का अपना निर्णय</h3>
<p><em><strong>पुनश्चः</strong> इस लेख के प्रकाशन के बाद हमें एक अनाम पाठक से यह पत्र मिला जो हम जस का तस छाप रहे हैं। निम्नलिखित मूल अंग्रेज़ी पत्र से अनुदित है।</em></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>संपादक जी,</p>
<p>निरंतर के अप्रेल अंक की आमुख कथा पढ़ी। टाइम्स आफ इंडिया के एक मुलाज़िम और प्रद्युम्न के परिचित के तौर पर मैं इस विवाद का साक्षी रहा हूँ और यह कह सकता हूँ कि मामला दूध का दूध और पानी का पानी नहीं है जैसा कि प्रतीत होता है। डेविड और गोलियाथ का संघर्ष बड़ा रूमानी है, पर सचाई यह है कि मीडियाह ब्लॉग इसके पहले के दौर में साल भर टिका और किसी की भी निंदा करने से पीछे न रहा। पर अपने नये अवतार में इसने टाइम्स की बुराई किसी और की तुलना में ज्यादा की, दरअसल ज्यादातर दिनों टाइम्स की ही की।</p>
<p>उनका (प्रद्युम्न का) यह सब करने का सबब मीडियानेट होना भी दुनिया को मतलबी नज़रों से देखने जैसा है। प्रकाशन जगत के हमारे प्रतियोगियों ने मीडियानेट को पहले ही ख़त्म कर दिया है। इस पर हमारे समूह में भी चर्चा हुई। पर टाइम्स ने कभी ध्यान नहीं दिया। पहाड़ तब टूटा जब उन्होंने (प्रद्युम्न ने) टाइम्स आफ इंडिया के कतिपय वरिष्ठ लोगों पर व्यक्तिगत टिप्पणी शुरु कीं जिन्हें हटाने का कानूनी नोटिस जारी हुआ। मैं सोचता हूँ (मैं अंदाज़ लगा कर कह रहा हूँ) कि हमारा विधि विभाग इन प्रविष्टियों को हटाने मात्र से ही संतुष्ट हो जाता और जिंदगी पहले सी चलती रहती। मेरे ख्याल से प्रद्युम्न को टाइम्स पर निशाना साधने में मज़ा आ रहा था क्योंकि हमने दूसरे किसी मीडिया समूह के लोगों के जीनव से जुड़ी उनकी कोई टीप नहीं पढ़ी।</p>
<p>वैसे उनका दोष भी नहीं है। मुझे बताया गया है कि मुम्बई में लोग टाइम्स आफ इंडिया को बुराई का साम्राज्य मानते हैं। आपके पाठकों के लिये ऐसी ही परिचित कंपनी शायद माईक्रोसॉफ्ट हो। जब रवैया ऐसा हो तो लगता है मैं कुछ भी क्यों न करूं, जब तक दूसरों की बखिया उधेड़ रहा हूँ दुनिया मेरा साथ देगी। (मीडियाह ब्लॉग से) मिड डे अखबार के चेयरमैन कि गुज़ारिश पर एक प्रविष्टि पहले भी हटायी जा चुकी है। क्या कारण है कि मिड डे की प्रार्थना काम कर जाती है और वही काम करवाने के लिये टाइम्स को कानूनी रास्ता अख़्तियार करना पड़ता है? मिड डे के खिलाफ ब्लॉगजगत लामबंद क्यों नहीं है? प्रद्युम्न को मिड डे की प्रविष्टि हटाने की &quot;गुज़ारिश&quot; नागवार क्यों नहीं गुज़री?</p>
<p>चलो जो भी हुआ, अपने ब्लॉग को बंद करना प्रद्युम्न का निर्णय था। दूसरे चिट्ठों पर चस्पा कानूनी नोटिस में, जहाँ तक मैंने पढ़ा है, साईट को बंद करने की बात का कहीं भी ज़िक्र नहीं है।</p>
<p>भवदीय,</p>
<p><strong>एक पाठक जो अपना नाम ज़ाहिर नहीं करना चाहते।</strong></p>
</p></div>
<p>ग्रिफिन मेल में लिखते हैं कि &quot;टाइम्स आफ इंडिया जैसी संस्था, जिसका उद्देश्य सूचना एवं विचारों का प्रसार है, का इस तरह से विचारों के दमन करना दुखःदायी है। अगर वे सोचते हैं कि ब्लॉगजगत ऐसी हरकत नज़रअन्दाज़ कर देगा तो वे सामूहिक ताकत को बेहद कम कर के आंक रहे हैं। दूसरी ओर अगर वे सोचते है कि कम प्रसार संख्या वाले एक ब्लॉग से टाइम्स समूह जैसे आकार वाली संस्था को खतरा है तो यह हास्यास्पद होगा, यह वैसा ही है कि कोई हाथी एक चूहे से डर कर भागे।&quot; </p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">खेल खत्म या फिर एक नई शुरुआत? </h3>
<p>यदि महेश्वरी की कोई गलती थी तो वह यह कि वे रोचक लेखन द्वारा अपने पाठकों को और अपनी माफियों और कहा वापस लेकर खफा मीडिया संस्थाओं दोनों को खुश करने का प्रयास कर रहे थे। एक समय पर तो अपनी लिखी बातों को कानूनी कार्यवाही से बचाने के लिए उन्होंने अपने लेखन में सितारों (**) का प्रयोग भी आरम्भ किया था। टाइम्स के कानूनी कागज एक जगह इसी लेखन शैली की बात कुछ ऐसे करते हैं &quot;आप को विभिन्न बड़े मीडिया संस्थाओं के खिलाव बदनामी का मुहिम चलाने की आदत है और जब कोई इस बात का विरोध करता है तो आप झट से उनका गुस्सा शांत करने के लिए माफी माँग लेते हैं।&quot; </p>
<p>वाकई महेश्वरी अपने सजाल को बंद करने के विषय पर अनिश्चित थे, उन्होंने अपने चिट्ठों पर लिखी हर राय का सूक्ष्मता से अध्ययन किया। साथ ही इस लेख के लेखक को यह भी कहा कि वह अपनी नौकरी जाने के भय से सजाल बंद नही कर रहे, परंतु फिर उन्होंने कहा कि मैं उनके संस्थान के नाम का अपने लेख में ज़िक्र न करूं। </p>
<p>एक बात तो पक्की है। माहेश्वरी चिट्ठों से ज्यादा देर दूर नहीं रहेंगे। वह वापिसी के बारे में सोच रहे हैं इस आशा के साथ कि इस बार उसके सिर पर किसी संगठन का हाथ होगा। इस कानूनी पचड़े से पहले ही माहेश्वरी ने मीडिया ब्लॉगर्स एसोसिएशन (एम.बी.ए.) में अर्जी भी दी थी व अब वह उसके सदस्य हैं। राबर्ट कॉक्स, जो कि इस एसोसिएशन के सह-संस्थापक हैं, ने मुझे बताया है कि वे भारतीय कानून से परिचित नहीं पर फिर भी मीडियाह की जितनी हो सके, मदद करेंगे। </p>
<p>कॉक्स ने ईमेल द्वारा कहा, &quot;एम.बी.ए. मीडियाह की उतनी मदद के लिए राजी है जितनी की न्यूयार्क में बैठे बम्बई के लिए हो सकती है। द टाइम्स ऑफ इंडिया और मीडिआह मामले की बानगी हमने अमरीका में भी देखी है कि मीडिया कम्पनियाँ चिट्ठाकारों को डराने धमकाने के लिए गुंडागर्दी को कानूनी चाशनी में ढालने के तरीके अपनाती हैं। मेरे अपने अनुभव में पिछले साल एक व्यंग्य के कारण न्यूयार्क टाइम्स, नेशनल डीबेट ब्लॉग बंद करवाना चाहती थी और हाल में ही एक और मामले में एम.बी.ए के सदस्य माइकल बेटस को  <em>द टल्सा वर्लड </em> द्वारा उनके जनसुलभ सजाल की कड़ियाँ व उनके लेखों से संक्षिप्तियाँ अपने चिट्ठे पर डालने के &#8216;जुर्म&#8217; में धमाकाया गया था।&quot; </p>
<div id='pullQuoteL'>द टाइम्स ऑफ इंडिया और मीडिआह मामले की बानगी हमने अमरीका में भी देखी है कि मीडिया कम्पनियाँ चिट्ठाकारों को डराने धमकाने के लिए गुंडागर्दी को कानूनी चाशनी में ढालने के तरीके अपनाती हैं।</div>
<p>कानूनी सलाह के बाद महेश्वरी मानते हैं कि उनकी स्थिति किसी संगठन या समूह का हिस्सा बनकर ज्यादा अच्छी है बजाए इसके कि वे सीधे अकेले ही टाइम्स ऑफ इंडिया का सामना करें। </p>
<p>महेश्वरी कहते हैं कि अब वे अपने नाम की बजाय, संगठन के नाम से सजाल बनाएंगे। &quot;(कानूनी) सुरक्षा अकेले की जगह संगठन की ज्यादा अच्छी है। पर मैं एक बात बिल्कुल नहीं चाहता था कि मुझे अपनी 19 प्रविष्टियाँ मिटानी पड़ें या फिर उनके लिए माफी मांगनी पड़े। मुझे काफी लोगों ने कहा है कि मुझे माफी नहीं माँगनी चाहिए थी, और मैं भी सोचता हूँ कि मैं किसी ऐसी बात के लिए माफी क्यों माँगू जिसे कि मैं एक निष्पक्ष व रचनात्मक आलोचना समझता हूँ।&quot; </p>
<p>मीडियाह दुबारा शुरु करने के बारे में उन्होंने कहा कि वह तो अब तभी आरम्भ होगी जब टाइम्स अपना मुकदमा वापिस ले लेगा। </p>
<p>महेश्वरी कहते हैं, &quot;जो भी हुआ मैं इससे काफी दुःखी व पीड़ित रहा। चुंकि इसमें मेरी मेहनत लगी है इसलिए यह ज्यादा पीड़ादायी है। इतने सारे लोगों को एक ही ध्येय के लिए एकजुट देख कर अच्छा लगता है, पर साथ ही मैं इस से ज्यादा संबध नहीं रखना चाहता क्यूँकि मैं यह नही चाहता कि मुझे टाइम्स ऑफ इंडिया को बदनाम करता देखा जाए। अपनी सारी जिंदगी इसी धंधे मे बिताने के बाद मैं सिर्फ मीडिया के निष्पक्ष आलोचक के रूप में देखा जाना चाहता हूँ। अभी तो फिर से सामान्य जिंदगी शुरु करना चाहता हूँ&quot; </p>
<p class="note"> <a href="http://www.ojr.org/ojr/stories/050315glaser/">मूल अंग्रेज़ी आलेख</a> से अनुवादित, हिंदी रूपांतरणः <a href="http://rojnamcha.blogspot.com/">अतुल अरोरा </a> और <a href="http://pnarula.com/">पंकज नरूला </a>। इसी विषय पर निरंतर का संपादकीय: <a href="http://www.nirantar.org/0405-nazariya">धौंस नहीं सहेंगे चिट्ठों के सिपाही</a> भी पढ़ें। </p>
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		<title>वेबलॉग नीतिशास्त्र</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-saransh</link>
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		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 06:46:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

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		<description><![CDATA[सारांश में पेश करते हैं पुस्तकाँश या पुस्तक समीक्षा। निरंतर के पहले अंक में हमें प्रसन्नता है <strong>रेबेका ब्लड</strong> की पुस्तक &#34;द वेबलॉग हैन्डबुक&#34; के अंश का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करते हुए। रेबेका 1996 से अंर्तजाल पर हैं, उनका ब्लॉग रेबेकाज़ पॉकेट खासा प्रसिद्ध है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चिट्ठे ऑनलाइन जगत के विद्रोही स्वर हैं। सुदूर फैले अपने पाठकों में सूचनाओं को छान-फटक कर करीने से परोसने की नई तरक़ीब, इसकी सबसे बड़ी शक्ति तो है ही, इसने मुख्यधारा के मास मीडिया से इतर अपना एक अलग, खास, महत्वपूर्ण स्थान भी बना लिया है। बगैर किसी का आभार उपकार लिए, चिट्ठे अपने विशेष अंदाज़ में अपनी अलग कसौटियों सहित सूचनाओं और उन पर की गई टिप्पणियों का खासा प्रसार कर रहे हैं।</p>
<p><img title="Saransh" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" border="0" alt="रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग से अंश" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="right" />चिट्ठा नेटवर्क का सामर्थ्यवान प्रभाव ही शायद इस बात की वास्तविक वजह हो सकती है जिसके कारण मुख्यधारा के समाचार संगठनों ने भी इस दृग्विषय की तफ्तीश करना प्रारंभ किया है, तथा संभवत: यही चिट्ठों को पत्रकारिता का रूप मानने वाली चर्चा का सबब भी है। चिट्ठाकार नियंत्रण तथा प्रभाव के संदर्भ में भले ही न सोचते हों, परंतु व्यवसायिक मीडिया जरूर यह सोचता है। मास मीडिया की सबसे बड़ी चाह होती है विस्तृत पाठक-श्रोता-दर्शक। विज्ञापनों से प्राप्त राजस्व, जो व्यावसायिक प्रकाशनों या प्रसारणों के लिए जीवन जल होते हैं, पाठक-श्रोता‍-दर्शक की संख्या पर निर्भर करता है। व्यापार के दृष्टिकोण से विज्ञापकों के लिए दर्शक जुटाना ही विषय-सामग्री का मुख्य कार्य होता है, भले ही माध्यम कागज़ हो या टेलीविज़न।</p>
<p>पत्रकारों &#8212; जो समाचारों की रपट देते हैं &#8212; को भली प्रकार यह पता रहता है कि अपने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने को उत्सुक व्यापार जगत तथा सत्ता के दलालों पर निर्भर उनके तंत्र में दुरुपयोग की संभावनायें निहित हैं। उनके नैतिक आर्दश की रचना पत्रकारिता के दायित्व के दायरा तय करता और एक स्पष्ट आचार संहिता पेश करता है जिससे समाचारों की ईमानदारी बनी रह सके।</p>
<p>चिट्ठों की, जो अव्यावसायिक लोगों द्वारा सृजित किए जाते हैं, ऐसी कोई संहिता नहीं होती और प्राय: चिट्ठाकारों को व्यक्तिगत रूप से अपने अव्यवसायी स्तर का गुमान रहता है। “हमें किसी फालतू सत्य परीक्षक की दरकार नहीं” यह अवधारणा आम रूप से दिखती है, गोया कि अशुद्धता कोई गुण हो।</p>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है।</div>
<p>मुझे एक मौलिक धारणा प्रस्तावित करने की अनुमती दें: चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। भले ही समाचार स्रोत विज्ञापनदाताओं के प्रति कृतज्ञता रखें तथा रिपोर्टर के लिए भी बेहद ज़रूरी होता हो कि अपने स्रोतों से अच्छे संबंध बनाए रखें ताकि काम चलता रहे; परंतु चुँकि वे भी मूलतः व्यवसाय ही हैं &#8212; जहाँ तनख्वाह देनी होती है, विज्ञापकों को प्रसन्न रखना होता है तथा पाठक-श्रोता-दर्शक को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बनाए रखना होता है &#8212; व्यावसायिक समाचार संगठनों का निहित स्वार्थ होता है कि वे कतिपय मानकों को संभालें रखें जिससे पाठक उनके प्रकाशनों के खरीददार बने रहें और विज्ञापन दाता उन्हें विज्ञापनों से नवाज़ते रहें। केवल न्यूनतम खर्च तथा कोई महत्वपूर्ण व्यवसायिक लाभ की उम्मीद न होने के कारण चिट्ठों के पास ऐसी कोई प्रेरणादायक चीज़ें नहीं होतीं।</p>
<p>वही चीज़ें जो व्यावसायिक समाचार निर्गमों की विश्वसनीयता से समझौता प्रतीत हों, वह किसी स्तर की पत्रकारिता के मापदण्डों के लिए प्रेरणादायक होती हैं। और वही चीज़ें जो चिट्ठों को वैकल्पिक समाचार स्रोत के रूप में इतना महत्वपूर्ण बनाती है, यानि पर्यवेक्षकों की कमी तथा तमाम नतीजों से मुक्ति, उनकी ईमानदारी तथा उनके मूल्यों से समझौता भी कर सकती हैं। इस बात के पूरे चिन्ह दृष्टव्य हैं कि जैसे-जैसे इनकी संख्या में वृद्धि होगी और माध्यम के बारे में जागरूकता फैलेगी चिट्ठे और ज़्यादा असर छोड़ेंगे। यह सही नहीं है, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं कि, जाल (नेटवर्क) ग़लत जानकारियों को फैलाता रहेगा या फिर कि आम जानकारी में सत्य हमेशा ही छन कर बाहर आएगा। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं चूँकि लोगों को उन्हें फैलाने में आनंद आता है। वास्तविक दुनिया हो या ऑनलाइन, भूल-सुधार विरले ही ध्यान आर्कषित करते हैं, उनमें वो मज़ा जो नहीं होता।</p>
<p><img title="Weblog Handbook" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/weblog_handbook.jpg" border="0" alt="Weblog Handbook" hspace="8" vspace="8" width="250" height="307" align="left" />चिट्ठों की दुनिया में नीतिशास्त्र की लगभग कोई चर्चा नहीं है: स्वतन्त्र व्यक्ति को यह बताया जाना कि उन्हें क्या करना चाहिए, खासा नागवार गुजरता है। परंतु मैं छ: नियम प्रस्तावित करूँगी जो मेरे विचार में हर प्रकार के ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए नैतिक आचरण स्थापित करता है<sup><strong>1</strong></sup>। मुझे उम्मीद है कि चिट्ठा समुदाय यहाँ बताए गए नियमों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगा; आने वाले समय में, और अनुभवों के साथ हो सकता है समुदाय नए नियमों को शामिल करने या फिर हमारे मानकों की संहिता बनाने की ज़रूरत महसूस करे। कम से कम मैं यह तो आशा रखती हूँ कि ये सिद्धान्त हमारी जिम्मेदारियों तथा हमारे समग्र व्यवहार के समाज पर प्रभाव के बारे में परिचर्चा की प्रेरणा देंगे।</p>
<p>पत्रकारिता आचार संहिता का उद्देश्य होता है कि समाचार रपटों में सत्य और परिशुद्धता कायम रहे। तुलनात्मक रूप से, यहाँ पर दिया गया प्रत्येक सुझाव चिट्ठाकारी के हर पहलू में पारदर्शिता -‍- जो चिट्ठों के विलक्षण गुणों तथा उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है &#8212; लाएगा। यह उम्मीद करना अवास्तविक होगा कि प्रत्येक चिट्ठाकार संसार की अपक्षपाती छवि सामने रखे, परंतु यह अपेक्षा रखना बहुत ही विवेकी है कि वे अपने स्रोत, पूर्वाग्रह तथा व्यवहार के बारे में स्पष्टता बनाए रखें।</p>
<p>मेरे बेहतर प्रयासों के बावजूद उन चिट्ठाकारों जो अपनी इस खोज में लगे हैं कि उन्हें पत्रकार माना जाना चाहिए को इन नियमों के पालन की अधिक आवश्यकता है। हो सकता है कि समाचार संस्थाएँ किसी दिन किसी चिट्ठे (या किसी चिट्ठा-प्रविष्टि) को विश्वस्त स्रोत के रूप में इंगित करें, परंतु यह तभी होगा जब चिट्ठे समग्र रूप से यह प्रर्दशित करने में सक्षम होंगे कि उनकी जानकारियों के संग्रहण और वितरण में ईमानदारी है तथा उनके ऑनलाइन व्यवहार में अनुरूपता है।</p>
<p>कोई भी चिट्ठाकार जो अपने लिए एक व्यवसायिक पत्रकार की सुविधाएँ और सुरक्षाएँ की उम्मीद रखता है उसे इन सिद्धातों से भी आगे जाना होगा। अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं; अंतत: व्यक्तिगत व्यवसायिकता और मानक आचार संहिताओं का सावधानी पूर्वक अनुसरण ही समाज और क़ानून के सामने उसका स्तर बना पाएगा। शेष सभी के लिए, मुझे विश्वास है, कि निम्न मानक यथेष्ट होंगे:</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">1. सिर्फ उसी चीज़ को वास्तविकता के रूप में प्रकाशित करें जिस की सचाई पर आपको विश्वास हो।</h3>
<p>यदि आपका कथन अनुमान है तो ऐसा स्पष्ट करें। यदि आपके पास ऐसे कारण हैं जिससे आपको विश्वास हो कि कुछ ग़लत है तो या इसे पोस्ट ही न करें या अपने कारणों को दर्ज करें। यदि आप कोई दावा कर रहे हैं तो नेक इरादे से करें; इसे तभी सत्य घोषित करें जब आपकी पूर्ण जानकारी में ऐसा हो।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">2. यदि संदर्भित सामग्री ऑनलाइन मौजूद हो तो उसकी कड़ी भी दें।</h3>
<p>संदर्भित वस्तुओं की कड़ी देने से पाठकों को इस बात की सुविधा मिलती है कि वे आपके कथन की परिशुद्धता तथा परिज्ञान को जाँच सकें। सामग्रियों का संदर्भ देना परंतु कुछ चुनी हुई कड़ियाँ ही देना जिससे आप सहमत होते हैं जोड़ तोड़ करने जैसा होगा। ऑनलाइन पाठकों को, जहाँ तक संभव हो, संपूर्ण सत्य पाने का हक है &#8212; अंर्तजाल के ऐसे इस्तेमाल से, पाठकों को सूचनाओं का निष्क्रिय नहीं, वरन् सूचना का सक्रिय ग्राहक बनने की शक्ति प्रदान करता है। यही नहीं, स्रोत सामग्रियों की कड़ियाँ देना ही वह ज़रिया है जिससे हम जानकारियों तथा ज्ञान का एक विशाल, नई और एकीकृत नेटवर्क बना रहे हैं।</p>
<p>किन्हीं विरले अवसरों पर जब लेखक संदर्भ देना तो चाहता है, परंतु नैतिकता के नाते ट्रैफिक को उन जालस्थलों पर जाने नहीं देना चाहता (उदाहरण के लिए, कोई द्वेष भरा जालस्थल) तो उसे उस जालस्थल का नाम या पता (यू.आर.एल) टंकित करना चाहिए (परंतु लिंक नहीं) तथा अपने इस निर्णय के कारणों का भी खुलासा करना चाहिए। इससे प्रेरित पाठकों को वह आवश्यक जानकारी मिल जाएगी जो जालस्थल को खोजने के लिए उन्हें ज़रूरत है ताकि वे स्वयं अपना निर्णय ले सकें। ऐसी व्यूह रचना लेखक को अपनी पारदर्शिता (और इस प्रकार उसकी ईमानदारी) बनाए रखने की अनुमती तो देता ही है, साथ ही ऐसे प्रयोजनों को समर्थन को अस्वीकृत भी करता है जिसे वह घृणित मानें।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">3. गलत जानकारियों को सार्वजनिक रूप से सुधारें।</h3>
<p>यदि आप को पता चलता है कि आपने किसी ऐसी सामग्री की कड़ी दी है जो कि सही नहीं है तो इसे नोट करें तथा ज़्यादा सही रपट की कड़ी दें। यदि आपका स्वयं का कोई कथन गलत सिद्ध हो जाता है तो अपने गलत कथन तथा सत्य की टीप लिखें। आदर्श परिस्थिति में ऐसे सुधार आपके ताज़ातरीन चिट्ठों में, मूल प्रविष्टि में जोड़े गए टीप के रूप में प्रकाशित होने चाहिएँ। (यह याद रखें कि चिट्ठा प्रविष्टियों को जब एक बार पोस्ट कर दिया जाता हैं, खोज इंजिन उन्हें याद रख लेते हैं तथा चिट्ठे में मौजूद असत्यता को फैलाते रहते हैं भले ही आप कुछ दिनों बाद जानकारी सुधार देते हैं।) यदि आप अपनी पिछली प्रविष्टियों में कोई सुधार नहीं करना चाहते हैं तो कम से कम बाद की प्रविष्टियों में टीप अवश्य डालें।</p>
<p>चिट्ठों में सुधार का एक बहुत ही सुस्पष्ट तरीका बोइंग बोइंग चिट्ठे के अंशदाताओं में से एक, कोरी डॉक्टोरोव अपनाते हैं। वे अपनी लिखी हुई गलतियों को मिटाने के बजाए, वहीं पर काट देते हैं तथा सही जानकारी वहीं पर आगे जोड़ देते हैं। पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि बिल कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है। (एच.टी.एम.एल में इसे ऐसे करें: पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि &lt;strike&gt;बिल&lt;/strike&gt; कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है।)</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">4. प्रत्येक प्रविष्टि को यह मान कर लिखें कि उसे बदला नहीं जा सकेगा; किसी भी प्रविष्टि में भले ही आप कुछ अतिरिक्त जोड़ लें परंतु उसे नए रूप में लिखें या मिटाएँ नहीं।</h3>
<p>चिट्ठों को सोच-समझ कर पोस्ट करें। यदि आप प्रत्येक प्रविष्टि पर दृढ़ता पूर्वक अपना प्रयास व्यय करेंगे, तो आप अपनी व्यक्तिगत तथा पेशेवर ईमानदारी को बनाए रख सकेंगे।</p>
<div id="pullQuoteR">प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है।</div>
<p>प्रविष्टियों में परिवर्तन करना या उन्हें मिटाना जाल की ईमानदारी को नष्ट करता है। अंर्तजाल को इस तरह रुपाकार दिया गया है कि सभी जुड़े रहें; वस्तुत: चिट्ठों की स्थाई कड़ी अन्यों को जुड़ने का आमंत्रण है। कोई भी जो उस दस्तावेज़ पर टिप्पणी करता है या उद्धत करता है, वह उस दस्तावेज़ के अपरिवर्तित स्वरूप पर निर्भर करता है। प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर कहीं भी किसी भी जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है। यदि परिशिष्ट जोड़ना प्रायोगिक नहीं है, जैसे कि कोई निबंध जिसमें ढेरों गलतियाँ हों, तो परिवर्तनों की तारीख तथा परिवर्तन की प्रकृति के संक्षिप्त विवरणों सहित टीप देना चाहिए।</p>
<p>यदि आप समझते हैं कि यह कुछ ज़्यादा ही कर्तव्यनिष्ठता है, तो ज़रा उस लेखक की स्थिति पर विचार करें जो एक ऑनलाइन दस्तावेज़ को किसी निश्चित घोषणा के लिए इंगित करता है। यदि यह दस्तावेज़ परिवर्तित हो जाता है या मिटा दिया जाता है &#8212; और खासकर यदि परिवर्तनों की टीका नहीं दी जाती है &#8212; तो उस लेखक के विचार बेवकुफ़ाना बन जाएंगे। किताबें बदलती नहीं हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख अपरिवर्तनीय होते हैं। कागज पर नए संस्करणों को ऐसे ही बतलाया जाता है।</p>
<p>साझा ज्ञान का जो जाल हम बना रहे हैं वह कभी भी किसी नवीनता से ज्यादा नहीं माने जाएंगे जब तक कि हम अपने प्रकाशनों का स्थायी लेख-प्रमाण तैयार कर इनकी ईमानदारी की सुरक्षा नहीं करते। जाल को लाभ तभी होता है जब ऐसी प्रविष्टियाँ को भी, जो बदलते माहौल में अप्रासंगिक हो जातीं हैं, ऐतिहासिक लेख-प्रमाण मान कर जस का तस छोड़ दिया गया हो। उदाहरणार्थ: एक चिट्ठाकार एक ऑनलाइन आलेख की अशुद्धियों के बारे में शिकायत करता है; लेखक उन अशुद्धियों को सुधार लेता है (तथा उनकी टीप भी दर्ज करता है!); अतः चिट्ठाकार की प्रविष्टि तो अर्थहीन हो गई है &#8212; या कि नहीं? प्रविष्टि को मिटा देने से कुछ ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि वह घटना बस हुई ही नहीं &#8212; जबकि वह घटी है। लेख-प्रमाण ज्यादा शुद्ध होगा और इतिहास की उपयोगिता बेहतर अगर चिट्ठाकार अपनी मूल प्रविष्टि के नीचे यह टीप जोड़ें कि लेखक ने सुधार कर दिए हैं और, चिट्ठाकार के ज्ञान के अनुसार, अब आलेख सही है।</p>
<p>इतिहास को फिर से लिखा जा सकता है, परंतु इसे लौटाया नहीं जा सकता। अंर्तजाल पर शब्दों को बदलना या मिटाना तो संभव है, परंतु संभावना सदैव अच्छी नीति हो यह ज़रूरी नहीं। प्रकाशन से पहले सोच-विचार करें तथा जो भी आप लिखते हैं उस पर कायम रहें। यदि आप बाद में यह निर्णय लेते हैं कि आप किसी विषय पर गलत थे, तो उसकी टीप दर्ज करें और आगे बढ़ें।</p>
<p>मैं यह सुनिश्चित करती हूँ कि मैं ऐसे किसी भी विचार को पोस्ट न करूं जिस पर कायम रहने की चाह न हो, भले ही बाद में उन विचारों से असहमत हो जाऊँ। किसी विषय के बारे में चाहे मैं कितनी भी कूपित या उत्तेजित रहूँ, मैं विचारशील और सधा काम करती हूँ। यदि एकाध दिनों में मेरे विचारों में परिवर्तन होते हैं तो मै बस उन्हें दर्ज कर लेती हूँ। यदि किसी बात पर क्षमा माँगने की आवश्यकता हो, तो वैसा करती हूँ।</p>
<p>यदि आपको बाद में पता चले कि आपने कोई गलत जानकारी पोस्ट कर दी है, तो आप अपने चिट्ठे पर सार्वजनिक रूप से इस बारे में लिखें। गलत लिखी गई प्रविष्टि को मिटा देने से आपके पाठकों द्वारा पहले ही पढ़कर ग्रहण की गई मिथ्या जानकारी को सुधारने का कोई जरिया नहीं होगा। एक अतिरिक्त चरण में मूल प्रविष्टि में सुधार करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि भविष्य में गूगल सही जानकारी प्रसारित करेगा।</p>
<p>इस नियम का एकमात्र अपवाद तब है जब आप असावधानीवश अन्य किसी की व्यक्तिगत जानकारी जाहिर कर देते हैं। यदि आपको पता चलता है कि आपने कोई गोपनीयता भंग की है या किसी परिचित का ज़िक्र कर के उसे परेशान किया है, तो यह उचित ही है कि ऐसी अपमानजनक प्रविष्टियों को पूरी तरह मिटा दिया जाए, पर आप यह लिखें कि आपने ऐसा किया है।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">5. अपने कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स को प्रकट करें।</h3>
<p>अधिकांश चिट्ठाकार अपने कार्य तथा व्यावसायिक इंटरेस्ट्स के प्रति पारदर्शी होते हैं। यह कम्प्यूटर प्रोग्रामर की निपुणता है कि किसी पत्रिका में नवीनतम आपरेटिंग सिस्टम के गुणों के बारे में प्रकाशित आलेख पर उसके द्वारा दिए गए विश्लेषणों को विशिष्ट महत्ता प्राप्त होती है। चूंकि चिट्ठों के पाठक आस्था के बल पर बनते हैं, यह प्रत्येक चिट्ठाकार का कर्तव्य है कि जब भी उचित हो वह आर्थिक (या अन्य विशेष विरोधों को) इंटरेस्ट्स को जाहिर करे। एक उद्यमी को किसी प्रस्तावित संसदीय बिल या व्यापारिक विलयन के प्रभाव के विषय में खास अन्तर्दृष्टि हो सकती है; यदि उसे किसी घटना के फलस्वरूप किसी प्रकार का सीधा लाभ पहुँचने वाला हो, तो उसे अपनी टिप्पणी में ऐसा लिखना चाहिए। किसी सेवा या उत्पाद से प्रभावित चिट्ठाकार को अपने चिट्ठे में उस सेवा की हर अनुसंशा के साथ यह बात बतानी चाहिए कि उस कंपनी के शेयर उसके पास हैं। यदि किसी चिट्ठाकार को समीक्षा/परीक्षण के लिए कोई सीडी प्राप्त होती है तो उसे यह बताना चाहिए; उसके पाठक स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि चिट्ठाकार की अनुकूल समीक्षा उसकी रुचि पर आधारित है या फिर मुफ़्त सीडी प्राप्त करते रहने की इच्छा पर।</p>
<p>अपनी महत्वपूर्ण कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स का तुरंत ज़िक्र करें और फिर जो बताना है वह लिखें; इससे आपके पाठकों के पास आपकी टीका का आकलन करने हेतु सभी आवश्यक जानकारी उपलब्ध होगी।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">6. संदेहास्पद, पूर्वाग्रही स्रोतों की टीप दें।</h3>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि किसी भी पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है।</div>
<p>जब कोई गंभीर आलेख किसी अत्यंत पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत से आता है तो चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि वह उस साइट के स्वरूप की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है। सूचनाओं की तलाश में चिट्ठाकारों को कभी-कभी बहुत ही रोचक, भली प्रकार से लिखे आलेख ऐसे जालस्थलों पर मिल जाते हैं जो बहुत ही पूर्वाग्रही संगठनों द्वारा या कट्टर व्यक्तियों द्वारा चलाए जाते हैं। पाठकों को यह जानने का अधिकार है कि एक आलेख जो प्रथम तिमाही में किए गए गर्भपात के चिकित्सकीय दुष्परिणामों को बताता है वह किसी जीवन का पक्षधर (प्रो-लाइफ), चुनाव का पक्षधर (प्रो-चॉइस) या हर तरह के चिकित्सकीय मध्यस्थताओं का विरोध करने वाले जालस्थल से आया है। इसराईली फिलस्तीनी संघर्ष पर विचारपूर्वक किया गया योग पढ़ने के लायक होगा भले ही वह फिलस्तीनी मुक्ति संघटन के किसी सदस्य द्वारा या किसी यहूदी आन्दोलनकारी द्वारा लिखा गया हो &#8212; परंतु पाठक को अधिकार है कि उसे स्रोत के बारे में पता चले।</p>
<p>यह मान लेना न्यायोचित है कि चतुर भ्रमणशील पाठक के पास इन स्रोतों के स्वभाव के आकलन के पर्याप्त ज्ञान और प्रेरक कारण हैं; परंतु सभी पाठक ऐसा कर पाने में सक्षम हों ऐसा मानना विवेकपूर्ण नहीं होगा। पाठक, कुछ हद तक, अंर्तजाल पर भ्रमण करने के लिए मार्गदर्शन हेतु चिट्ठों पर निर्भर होते हैं। थोड़े मनचले या अति गंभीर एजेंडे वाले स्रोतों से आलेख प्रस्तुत कर देने में बुराई नहीं है; परंतु ऐसे स्रोतों के स्वभाव के बारे में नहीं बताना अनैतिक होगा चूँकि पाठकों के पास ऐसी जानकारी नहीं होती जिससे कि वे आलेख की योग्यता का मूल्यांकन कर सकें।</p>
<p>यदि आप शंकाग्रस्त हैं कि आपके पाठक इसके सन्दर्भ के आधार पर आलेख को पूरी तरह नकार देंगे तो फिर सोचिए कि आप इसकी कड़ी दे ही क्यों रहे हैं। यदि आलेख की योग्यता के विषय में आपको दृढ़ विश्वास है, तो कारण बताएँ और यह बात आलेख को स्वयं साबित करने दें, लेकिन इसके स्रोत के बारे में स्पस्ट रूप से बताएँ। यदि उन्हें एक बार भी यह पता चल जाए कि आपने आलेख का स्रोत छिपाया है &#8212; या स्पष्ट नहीं किया &#8212; जिसके सभी तथ्यों के प्रकाश में संभवतः वे अलाहदा मूल्यांकन करते, आपके पाठक हमेशा के लिए आप पर से भरोसा खो देंगे।</p>
<p><em><a name="1"></a>1: बिन्दु 1 तथा बिन्दु 5 के लिए मैं डेव विनर की आभारी हूँ स्क्रिप्टिंग न्यूज पर <a href="http://scriptingnews.userland.com/backissues/2002/02/04#integrity">वेबलॉगिंग के संदर्भ में ईमानदारी</a> पर उनकी चर्चा के लिए। हालांकि हमारे विचारों में बहुत ज्यादा भिन्नताएँ हैं, इस विषय में उनकी धारणाएँ मेरे स्वयं के विचारों के लिए पंख प्रदान करती हैं।</em></p>
<p class="note">रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक <a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/ASIN/073820756X/ref=nosim/rebeccaspocke-20">द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग</a> से, स्वत्वाधिकार 2002, सर्वाधिकार सुरक्षित; हिन्दी रुपांतरण रेबेका ब्लड की पुर्वानुमति से प्रकाशित। <strong>अनुवादः <a href="http://raviratlami.blogspot.com/">रविशंकर श्रीवास्तव</a> एवं <a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष चक्रवर्ती</a>। प्रस्तुत पुस्तकांश का बिना पुर्वानुमति अंर्तजाल अथवा पुस्तक रूप में पुनः प्रकाशन नहीं किया जा सकता।</strong> रेबेका की पुस्तक की प्रति जीतने के लिए इसी अंक में <a href="http://www.nirantar.org/0305/samasya-purti">समस्या पूर्ति</a> स्तंभ की प्रतियोगिता में भाग लें।</p>
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		<title>बलॉगिंग विथ परपस</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-nazariya</link>
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		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 12:12:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
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		<description><![CDATA[जिह्वा ने जब अपना प्रसिद्ध चिट्ठा बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी। क्या चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस? क्या वे समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते? <strong>नज़रिया स्तंभ</strong> में पढ़िये संपादक की कलम से निरंतर का परिचय और चिट्ठा जगत पर नुक्ता चीनी के साथ पाईए परिचय आमुख कथा का।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारीः सच या मिथक?</h3>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" border="0" alt="नज़रिया" hspace="8" vspace="8" width="135" height="140" align="left" />कुछ समय पहले मैंने ब्लॉग को बहुत गंभीरता से न लेने कि हिमायत करते हुए अपने <a href="http://nullpointer.debashish.com/the-blog-matrix">अंग्रेज़ी चिट्ठे</a> में लिखा था कि ब्लॉग से सामाजिक बदलाव या जनजागरण जैसे असर की अपेक्षा रखना इस माध्यम को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना है। &#8220;मैंने आज नाश्ते मे दलिया खाया&#8221; या फिर &#8220;मैंने आज बॉस की बेटी को किस किया&#8221; नुमा नितांत आत्मकेंद्रित चिट्ठों कि भरमार से मेरी यह राय पुख्ता हुई। मन ही मन यह चाहते हुए कि &#8220;बलॉगिंग विथ परपस&#8221; यानि उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी हकीकत बने मैंने आहिस्ता आहिस्ता यह प्रयास किया कि राजनैतिक समाचारों पर टिप्पणी के अलावा सामाजिक तथ्यों पर भी लिखुं, मूलतः बंगाली होने और अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के बावजूद हिन्दी बेल्ट में अधिकांशतः रहने के कारण सोचता हिन्दी में था, अतः हिन्दी ब्लॉग शुरु किया। पर जैसी चिट्ठाकारी आप और मैं करते आए हैं यह उस रूप से ज्यादा अलग नहीं है जो समीक्षक ब्लॉगिंग को महज़ पत्रकारिता का ही नया आयाम करार दे कर गढ़ चुके थे।</p>
<div id="pullQuoteR">एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया।</div>
<p>एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया। विचारों की हिकारत से कुकुरमुत्तों की नाई <a href="http://blogkela.blogspot.com/">केले</a> उग आए। असर ऐसा था कि मुझे कई दफा ये लगा कि अपना चिट्ठा बंद ही कर दूँ, महीनों लिखने का जी नहीं करता। जिह्वा उपनाम से लिखने वाले बंगलौर निवासी लेखक ने जब अपना बेहद <a href="http://www.jivha.com/">प्रसिद्ध चिट्ठा</a> बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी, &#8220;आखिरकार ये मेरा ही है, जो चाहे सो करूँ&#8221; की भावना के साथ पटाक्षेप हुआ। <a href="http://www.jish.nu/">जिश मुर्खजी</a> ने कलम रखी तो सुझाव दिया,&#8221;ब्राउज़र के बाहर भी एक दुनिया है, उसका ज़ायका लो&#8221; भारतीय समाज पर ब्लॉग के असर के प्रश्न पर अर्थशास्त्री और ब्लॉगर अतानु दे <a href="http://www.nirantar.org/0305-samvaad">कह उठे</a>, &#8220;मज़ाक कर रहे हो क्या! भारत को कौन बदल सकता है?&#8221; ये नाकारात्मक रूख मेरी इस भावना को बलवती करते रहे हैं कि चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस, वे शायद समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते। ब्लॉगिंग आखिरकार कोई सामाजिक आंदोलन तो है नहीं, यह बस &#8220;तू मुझे लिंक कर और मैं तुझे&#8221; की ब्लॉग की मूल भावना पर ही झूल रहा है। अब तक ब्लॉगिंग के गिने चुने रूख ही मुखर हुए हैं,कड़ियों के संकलन,निजी वाकये या 9/11 जैसी आपदाओं पर आपबीतियाँ, समाचारों पर टिप्पणियाँ जैसे चिट्ठे जो शायद किसी और पेशे से जुड़े गैरलेखकों की सृजनात्मकता का पक्ष रखते हैं और दूसरे काफी संजीदा से चिट्ठे जो अक्सर लेखक के अपने ही पेशे से ताल्लुक रखते हों।</p>
<p><a href="http://tsunamihelp.blogspot.com/">त्सुनामी हेल्प ब्लॉग</a> को कारगर होते देख मेरी यह भावना काफी बदली है। इस एक ब्लॉग ने सेवाभावना को सर्वोपरि रख कर अनेकानेक पृथक दलों को एकीकृत किया और शायद यह स्थापित भी किया कि ब्लॉगिंग सिर्फ पत्रकारिता या निजी डायरी लेखन नहीं है। निरंतर के पहले अंक की आमुख कथा में मुम्बई स्थित सलाहकार दीना मेहता ने मेरे आग्रह पर इसी विषय से जुड़ा <a title="भारतीय ब्लॉगिंग: टिप्पिंग प्वाईंट पर" href="http://www.nirantar.org/0305-cover-story/" target="_blank">एक अन्वेषी लेख</a> लिखा है जो चिट्ठाकारी के बदलते परिवेश पर विश्लेषणात्मक दृष्टिपात कर रहा है। यदि लेखिका का पूर्वानुमान सही निकले तो दिन दूर नहीं जब उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी एक सचाई बनेगी और लोग चिट्ठाकारी को पेशे के रूप में अपना सकेंगे।</p>
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<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">साझे प्रयासों की एक और कड़ी</h3>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/old_logo.gif" border="0" alt="Nirantar" hspace="8" vspace="8" width="189" height="60" align="right" />ब्लॉग यानि कि चिट्ठा वर्तमान दौर में अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। दुनिया भर में चिट्ठों की लोकप्रियता बढ़ी है तथा हर घड़ी नए ब्लॉग जन्म ले रहे हैं। हिन्दी में ब्लॉग लेखन का सिलसिला शुरु हुये दो साल हुये हैं। इस साल भारतीय भाषाओं मे ब्लॉग लेखन में भी तेजी आई साथ ही विषयों में विविधता तथा गहराई बढ़ी है। लेखन के अलावा जो एक बात सशक्त रूप से उभरी वह है हिन्दी चिट्ठाकारों का पारस्परिक व्यवहार और चिट्ठाकार समुदाय का जन्म। <a href="http://www.akshargram.com/">अक्षरग्राम</a> और <a href="http://www.myjavaserver.com/~hindi">चिट्ठा विश्व</a> से लेकर <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya">सर्वज्ञ</a>, <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/anugunj">अनुगूँज</a>, <a href="http://bunokahani.blogspot.com">बुनो कहानी</a> जैसे कितने ही साझे प्रयासों के शक्तिशाली उदाहरण सामने हैं। निरंतर इसी की एक कड़ी है।</p>
<p>यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि आने वाले समय में चिट्ठाकारी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी चिट्ठाकारी भी इसका अपवाद नही होगी। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक ब्लॉग पत्रिका की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही थी। पत्रिका का कलेवर ऐसा सोचा जा रहा था जिससे चिट्ठाकार बन्धु अपना रचना कौशल निखार सकें साथ ही गैर ब्लॉग लेखकों के लिए ब्लॉगजगत की छवि प्रस्तुत की जा सके। इसी उद्देश्य को लेकर शुरु की जा रही है यह हिन्दी जगत (और संभवतः विश्व की) की पहली ब्लॉग पत्रिका &#8212; निरंतर। शुरुआती दिनों में जब हिन्दी चिट्ठाकारी का स्वरूप, शैली, शिल्प सब कुछ निर्माण के दौर में है, उम्मीद है कि निरन्तर का प्रकाशन इस काम में मील का पत्थर साबित होगा। यह प्रयास सामूहिक है। सबकी भागीदारी के बिना इस ऐतिहासिक काम को अंजाम देने की सोचना दिवास्वप्न होगा। सभी से आशा एवं अनुरोध है कि अपने सुझाव व सहयोग के माध्यम से निरंतर से जुडे रहें। साथियों के सहयोग के लिये बढे हाथों की गर्मजोशी ही निरंतर की सफलता की कहानी कहेगी।</p>
<p>निरंतर के संपादक मंडल के सभी साथियों <a href="http://pnarula.com">पंकज नरूला</a>, <a href="http://jitu.info">जितेन्द्र चौधरी</a>,  <a href="http://fursatiya.blogspot.com">अनूप शुक्ला</a>, <a href="http://raviratlami.blogspot.com">रविशंकर श्रीवास्तव</a>, <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com">अतुल अरोरा</a> और <a href="http://kaulonline.org">रमण कौल</a> का मैं आभार व्यक्त करता हूँ सहयोग, समर्थन, धैर्य और भागीदारी के लिए।</p>
<p>आपका मित्र<br />
<a href="http://www.debashish.com">देबाशीष चक्रवर्ती</a></p>
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