<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?>
<rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>निरंतर -हिन्दी ब्लॉगज़ीन &#124; Nirantar - Hindi Blogzine &#187; Blogging</title>
	<atom:link href="http://www.nirantar.org/tag/blogging/feed" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>http://www.nirantar.org</link>
	<description>Nirantar - World&#039;s first Hindi Blogzine</description>
	<lastBuildDate>Sat, 07 Jan 2012 15:50:48 +0000</lastBuildDate>
	<language>en</language>
	<sy:updatePeriod>hourly</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>1</sy:updateFrequency>
	<generator>http://wordpress.org/?v=3.3.1</generator>
		<item>
		<title>140 अक्षरों की दुनिया: माइक्रोब्लॉगिंग</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0708-tech-deergha-microblogging</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0708-tech-deergha-microblogging#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 15 Jul 2008 07:54:11 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>
		<category><![CDATA[Microblogging]]></category>
		<category><![CDATA[SMS]]></category>
		<category><![CDATA[Twitter]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0708tech-deerghamicroblogging/</guid>
		<description><![CDATA[ब्लॉगिंग के बाद इंटरनेट पर एक और विधा ने जोर पकड़ा है। जी हाँ ट्विटर, पाउंस और प्लर्क के दीवाने अपने बलॉग छोड़ दीवाने हो चले हैं माईक्रोब्लॉगिंग के। <strong>पैट्रिक्स </strong>और <strong>देबाशीष </strong>कर रहे हैं इस लोकप्रिय तकनीक की संक्षिप्त पड़ताल जिसमें लोग फकत 140 अक्षरों में कभी अपने मोबाईल, कभी डेस्कटॉप तो कभी जालस्थल द्वारा अपना हालेदिल लिखे चले जाते हैं।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p align="center"><img title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/story-big-twitter.jpg" border="0" alt="Microblogging" hspace="3" vspace="3" width="490" height="302" align="middle" /></p>
<div class="dropCap">आ</div>
<p>प अभी क्या कर रहे हैं? ये बड़ा ही सीधा सवाल है जिसका जवाब देना भी बेहद आसान होता है। अंतरजाल पर दुनिया के हजारों लोग इसी सवाल का जवाब देते अघाते नही और <strong>ट्विटर </strong>की दुनिया में उनके इस सवाल का इंतज़ार कभी दस तो कभी हजारों <strong>फॉलोवर्स </strong>को रहता है। इससे पहले कि आप ट्विटर को कोई धार्मिक संप्रदाय समझ बैठें जिसके अनुयायी भेद भरे संदेश साझा करते हैं, हम आपको इसका राज़ बता ही देते हैं।</p>
<div id="boxR">
<h3>क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?</h3>
<p><img title="Microblogging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/dchucks-on-twitter.jpg" border="0" alt="Microblogging" hspace="2" vspace="2" width="198" height="154" align="middle" /></p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग (Microblogging) पारंपरिक ब्लॉगिंग का एक अलाहदा रूप है जिसमें संक्षिप्त टेक्स्ट संदेश भेजे जा सकते हैं। संदेश की सीमा अक्सर 140 अक्षरों की होती है जिसे आप अपने मोबाईल फ़ोन, इंस्टैंट मैसेंजर, ईमेल या जालघर द्वारा भेज सकते हैं। 2006 में प्रारंभ, ट्विटर सर्वाधिक प्रसिद्ध माइक्रोब्लॉगिंग सेवा है, अगला नंबर गूगल द्वारा अधिग्रहित <strong>जायकू </strong>का है।</p>
<p>ज्यों ज्यों माइक्रोब्लॉगिंग की लोकप्रियता में इज़ाफ़ा हो रहा है इसके अति साधारण रूप में नये नग जोड़े जाने की कवायद चल रही है। डिग के संस्थापक केविन रोज़ द्वारा स्थापित <strong>पाउंस </strong>में फाइल शेयरिंग व कार्यक्रम न्यौते भेजने कि सुविधा जोड़ी गई तो हाल ही में शुरु किये गई प्लर्क के जालघर में अंतरापृष्ठ को एक टाईम लाईन का स्वरूप दे कर विडियो व अन्य मीडिया जोड़ने की सुविधा दी गई है।</p>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग का जादू इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है कि फ़ेसबुक से लेकर लिंक्ड-इन तक को, स्टेटस अपडेट के बहाने ही सही, माइक्रोब्लॉगिंग की सुविधा मुहैया करानी पड़ी है। तो यह बिलावजह नहीं है कि माइक्रोब्लॉगिंग नामचीन शख्सियतों को भी लुभा रही है तभी तो ब्लॉगअड्डा ने अमिताभ बच्चन के बलॉग के बाद खास उनके लिये माइक्रोब्लॉगिंग की <a href="http://www.masala.com/4133-micro-blogging-just-for-the-big-b" target="_blank">सुविधा भी शुरु</a> की है। <a href="http://twitter.com/bbc" target="_blank">बीबीसी</a> व <a href="http://twitter.com/ajenglish" target="_blank">अलज़जीरा</a> जैसे नामचीन समाचार संस्थानों स लेकर अमरीका के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार <a href="http://twitter.com/barackobama" target="_blank">बराक ओबामा</a> तक ट्विटर पर हैं।</div>
<p>ट्विटर एक अलग किस्म की <strong>इंस्टैंट मैसेजिंग</strong> सेवा है, कई इसे <strong>माइक्रोब्लॉगिंग </strong>(देखें बॉक्सः क्या है माइक्रोब्लॉगिंग?) कहकर पुकारते हैं। फर्क़ यह है कि आप ट्विटर पर केवल 140 या उससे कम अक्षरों में ही संदेश भेज सकते हैं जो आपके फॉलोवर्स (ट्विटर की ज़बान में आपके संदेश पाने की हामी भरने वाले को फॉलोवर कहा जाता है) को तुरंत मिल जाता है। इसी तरह आप भी अपनी पसंद के लोगों को फॉलो कर सकते हैं। और इस तरह बन जाता है एक बढ़िया सामाजिक तंत्र या सोशियल नेटवर्क जिसकी बात आजकल हर वेंचर कैपिटलिस्ट किया करता है। मज़े की बात यह है कि ट्विटर सेवा मोबाईल पर भी चलती है यानी आप अपने सेल फोन द्वारा भी संदेश भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर के अलावा अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवायें भी आहिस्ता आहिस्ता अपनी पैठ बना रही हैं। विपणन व सोशियल मीडिया में रुचि रखने वाले <strong>गौरव मिश्रा</strong>, जो <a href="http://www.gauravonomics.com/" target="_blank">गौरवानॉमिक्स</a> नामक चिट्ठा लिखते हैं, ट्विटर के अलावा जायकू, पाउंस, प्लर्क, क्युपि, चित्र व एसएमएस गपशप जैसी सेवायें आजमा चुके हैं। ट्विटर के प्रयोक्ता इसे विविध माध्यमों से भी इस्तेमाल करते हैं, कई लोग अपने मोबाईल द्वारा भारत के शॉर्टकोड 5566511 पर संदेश भेजते हैं तो कई टीव्हिर्ल (Twhirl)  या ट्विटरफॉक्स (TwitterFox) जैसे डेस्कटॉप क्लायंट या ब्राउज़र एक्सटेंशन का प्रयोग करते हैं।<img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Gaurav Mishra" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/gaurav-mishra-quote.jpg" border="0" alt="Gaurav Mishra" hspace="5" vspace="5" width="225" height="123" align="left" /></p>
<p>140 अक्षरों की सीमा ट्विटर पर अनचाही बातों और बड़बोलेपन पर बाँध तो लगाती ही है, साथ ही न्यूनतम शब्दों में वही बात कहने का हुनर भी सिखा देती है जो आप अपने ब्लॉग पर 1000 शब्द खर्च करे बिना कह नहीं पाते। और यकीन मानिये 140 अक्षर कम नहीं होते क्योंकि ट्विटर पर अक्सर लोग बेतकल्लुफ और निजी बातें लिखते हैं। कई बार ये बातें रिमाईंडर, निजी नोट, त्वरित विचार या आवश्यक खबर होती है। किसी व्यक्ति को फॉलो करते करते आपको उसकी शख्सियत का इल्म होने लगता है, मसलन उसे कैसी फिल्में पसंद है, वो क्या पढ़ता है, कहाँ खाना खाता है, उसके आफिस में क्या चल रहा है, वगैरह। पर ट्विटर पर लोग इतनी निजी बातें क्यों करने लगते हैं जो वो साधारणतः अपने ब्लॉग पर नहीं करते। <a href="http://www.b5media.com/" target="_blank">बी 5 मीडिया</a> व <a href="http://www.inquisitr.com/" target="_blank">इंक्यूज़िटर</a> के संस्थापक <strong><a href="http://www.duncanriley.com/" target="_blank">डंकन रियली</a></strong> &#8220;नेटवर्क व त्वरित वार्तालाप&#8221; को इसकी वजह मानते हैं, &#8220;ट्वीट काफी सीमित पाठकवर्ग पर केंद्रित होते हैं और इनका छोटा आकार इनका प्रारूप निजी बना देता है&#8221;, वे कहते हैं। गौरव कहते हैं, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग ने ब्लॉगिंग के साथ वही किया जो एक समय ब्लॉगिंग ने पारंपरिक प्रकाशन के साथ किया था। माइक्रोब्लॉगिंग के एसएमएस और चैट से साम्य ने इसे अनौपचारिक कलेवर दे दिया है&#8221;</p>
<p>ट्विटर पर अधिकांश लोग पहले चिट्ठाकारी से जुड़े फिर इस माध्यम से। प्रकाशन की सरलता ने लाखों लोगों को अपने ब्लॉग पर जो चाहे वो लिखना सिखाया। पर लंबे गद्य लेखन से कई ब्लॉगर उकता जाते हैं। ब्लॉग का प्रारूप अमूमन ऐसा होता है कि कम शब्दों में लिखना श्रेष्ठ नही होता। वर्डप्रेस की असाईड्स और टंबल ब्लॉग जैसे माध्यमों ने यहाँ निजात ज़रूर दी, जहाँ एक लाईना पोस्ट लिखना संभव था, टेबल ब्लॉग पर तो आप केवल एक विडियो या चित्र भी पोस्ट कर सकते थे, बिना एक भी शब्द लिखे। पर तात्कालिकता ने ट्विटर को मकबूलियत दिला दी। कहना न होगा कि कई दफा किसी बात को तुरंत कहना ज़्यादा जरुरी होता है और ट्विटर ने इसी जरुरत को पूरा किया।</p>
<div id="boxL">
<h3>नया रूप, नई बातें</h3>
<p>माइक्रोब्लॉगिंग के पदार्पण और ट्विटर की मकबूलियत से कुछ नये शब्दों का सृजन भी हुआ है, नोश फ़रमायें</p>
<ul>
<li><strong>ट्वीटः </strong>माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि</li>
<li><strong>ट्विटररः </strong>ट्विटर प्रयोक्ता</li>
<li><strong>ट्विटोस्फ़ीयरः </strong>ट्विटर संसार</li>
<li><strong>मिसट्वीटः</strong> ऐसी माइक्रोब्लॉग प्रविष्टि जिस पर आपको खेद हो। ट्विटर पोस्ट हटाने की सुविधा तो देता है पर संपादित करने या वापस लेने की नहीं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी शब्दों के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Twitter%20Glossary" target="_blank">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</p>
<h3>ट्विटर मैशअप</h3>
<p>जाल पर ट्विटर जैसी तो सेंकड़ों सेवायें हैं पर इसके जैसा नाम किसी का नही है। ट्विटर से जुड़े निम्नलिखित मैशअप खासे लोकप्रिय हैं</p>
<ul>
<li><a href="http://twittermap.com/twittervision" target="_blank"><strong>ट्विटरविज़नः</strong></a> यह विश्व के नक्शे के द्वारा ट्विटर पर विभिन्न जगहों से भेजे जा रहे संदेशों के बारे में बताता है।</li>
<li><a href="http://www.twitterholic.com/" target="_blank"><strong>ट्विटरहॉलिकः</strong></a> 100 सवार्धिक फॉलोवर्स वाले प्रयोक्ताओं की पायदान।</li>
<li><a href="http://summize.com/" target="_blank"><strong>सम्माईज़ः </strong></a> ट्विटर का खोज इंजन, जुलाई 2008 में इस सेवा को ट्विटर ने खरीद लिया है।</li>
<li><a href="http://iconfactory.com/software/twitterrific" target="_blank"><strong>ट्विटेरिफिक</strong></a> , <strong>ट्विटरफॉक्स </strong>जैसे अनेक तंत्रांश व ब्राउज़र एक्सटेंशन आपको ट्विटर पर संदेश अपने कंप्यूटर से भेजने की सुविधा देते हैं।</li>
</ul>
<p>ऐसे और भी मैशअप के बारे में जानिये <a href="http://twitter.pbwiki.com/Mashups" target="_blank">इस विकीपृष्ठ</a> पर।</div>
<p>ट्विटर के आने के बाद से कई अनियमित चिट्ठाकार तो खुश हुये ही, अनेक नियमित लेखकों ने भी अपने ब्लॉग लेखन में कमी की बात स्वीकारी है। अपने ब्लॉग पर लंबी उबाउ पोस्ट लिखने से ट्विटर पर नन्हा सा अपडेट देना कई लोगों को भाने लगा है। शायद इसकी वजह है ट्विटर पर अपना संदेश छोड़ना बेहद आसान है और इसमें समय बेहद कम लगता। इन संदेशों को प्राप्त करने वाले तुरंत लेखक को उसके प्रयोक्ता नाम के सामने खास @ चिन्ह लगाकर अपना जवाब भी दे सकते हैं। डंकन इस बात से सहमत हैं कि अनके निजी ब्लॉग पर लेखन कम हुआ है पर अपने मुख्य ब्लॉग पर उन्हें ट्विटर की बदौलत ज्यादा लिखने का मौका मिला है। ट्विटर को मुख्यतः ब्रेकिंग न्यूज़ या रोचक बातें तुरंत बताने के लिये प्रयोग करते हैं और यही खबरें बाद में उनके ब्लॉग पर विस्तार से लिखने का मसाला बन जाती हैं।</p>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px 25px;" title="Duncan Riley" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/duncan-riley-quote.jpg" border="0" alt="Duncan Riley" hspace="5" vspace="5" width="225" height="124" align="right" />हालांकि ट्विटर पर सब अच्छा ही है ऐसी बात तो नहीं है। खास तौर पर हालिया महीनों में जब ये सेवा अनिश्चित रूप से कई बार बंद पड़ गई और जब कभी पुनः शुरु की जाती तो अनेक फीचर्स बंद कर दिये जाते। यह अंदेशा गलत न होगा कि ट्विटर की खटारा हालत का फ़ायदा हाल ही में प्रारंभ एक अन्य माइक्रोब्लॉगिंग सेवा <strong>प्लर्क </strong>को मिला है। डंकन यह बात मानते हैं कि लोगों ने अन्य सेवाओं का रुख किया है। &#8220;पर तकनीकी दिमाग वाले लोगों को प्लर्क उतना पसंद नहीं आ रहा। फ्रेंडफीड की बढ़त जारी है और हर रोज़ इससे नये लोग जुड़ते जा रहे हैं&#8221;, डंकन कहते हैं।</p>
<p>बात सिर्फ माइक्रोब्लॉगिंग की ही की जाय तो ढेर सारे लोगों को फॉलो करने वाले प्रयोक्ताओं को संदेशों की बाढ़ से निबटना सीखना होता है। कुछ प्रयोक्ता ऐसे भी होते हैं जो पचासों बार अपने बारे में संदेश भेजते हैं और सारी बातें व्यक्तिगत ही हों तो असंबद्ध व्यक्ति के लिये यह सरदर्दी का सबब भी बन सकते हैं।</p>
<p>ट्विटर पर अपने बारे में बताने की उत्कंठा भी कई बार हदें पार कर जाती हैं। देखा जाय तो तो ब्लॉगिंग करने वालों का इस इच्छा से पहले भी नाता पड़ चुका होता है। समय पर ट्वीट न करने पर फॉलोवर्स की संख्या कम होने का अंदेशा रहता है, संदेश भेजते समय भी सोचना होता है कि क्या यह संदेश साझा करने लायक है या नहीं। जैसे जैसे आपके फॉलोवर्स की संख्या बढ़ती जाती है यह मानसिक दबाव भी बढ़ता चला जाता है।</p>
<p>तो ट्विटर पारंपरिक चिट्ठाकारी से कितना अलग है? गौरव मानते हैं कि माइक्रोब्लॉगिंग काफी अलग विधा है, &#8220;माइक्रोब्लॉगिंग और ब्लॉगिंग दोनों साथ जी सकते हैं। मैंने वर्डप्रेस के माइक्रोब्लॉगिंग आधारित प्रोलोग थीम के इस्तेमाल के बाद यह पाया कि ट्विटर महज़ एक अलहदा इंटरफेस वाली सेवा नहीं है।&#8221;। वाकई यह तुलना गैरवाजिब है। पारंपरिक ब्लॉगिंग का अपनी आकर्षण और पाठक वर्ग है, आखिरकार दुनिया में ऐसी सेंकड़ों बातें हैं जो 140 अक्षरों में समेटी नहीं जा सकती। किसी भी सर्जनात्मक विधा की ही तरह पारंपरिक निबंधात्मक ब्लॉगिंग का अंत होना असंभव ही है। मसलन, किसी ट्विटरर को उसके माइक्रोब्लॉग के आधार पर पुस्तक लिखने का प्रस्ताव मिले इस बात के आसार कम ही हैं।</p>
<p>ट्विटर की बेतकल्लुफ बातचीत के माध्यम के रूप में एक अलहदा जगह बन ही गई है, बातें जो हम दफ्तर में कॉफी मशीन के पास या नुकक्ड़ पर यार दोस्तों के साथ करते हैं। ट्विटर की सादगी उसकी पहचान है और इसने आनलाईन संपर्क के एक नये और खास माध्यम के रूप में अपनी जगह बना ली है।</p>
<div id="section-teaser">
<h2>और भी सेवायें हैं ट्विटर के सिवा</h2>
<p>जी हाँ, ट्विटर पर पूर्णतः निर्भर होना कितनी खराब बात है यह इसके प्रयोक्ताओं ने हाल ही में सीख लिया जब अत्यधिक प्रयोक्ताओं की संख्या से निबटने में ट्विटर का रूबी आधारित तंत्राँश नाकामयाब रहा। नतीजन ट्विटर सेवा अक्सर बंद रहती या इसके अनेक फ़ीचर बंद पड़े रहते। ट्विटर के अनेक विकल्प हैं जिनमें से कुछ की जानकारी निम्नलिखित हैः</p>
<table border="0" cellspacing="2" cellpadding="2" width="100%" bgcolor="#f2ecec">
<tbody>
<tr>
<td align="center">
<table border="0" width="99%" bgcolor="#ffffff">
<tbody>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank">पाउंस</a> इस माइक्रोब्लॉगिंग माध्यम में अतिरिक्त सुविधायें भी हैं। मैसेजिंग यानि संदेश भेजने पाने के अलावा प्रयोक्ता अपने परिचितों के साथ इसके द्वारा कड़ियाँ, फाईलें और इवेंट्स साझा कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.pownce.com/" target="_blank"><img title="Pownce" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/pownce_logo.jpg" border="0" alt="Pownce" hspace="2" vspace="2" width="150" height="46" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank">टंबलर</a> यह बेहद सरल और कुशल माइक्रोब्लॉगिंग  प्लैटफॉर्म है। इसके द्वारा भी ढेरों किस्म की चीज़ें, जैसे चित्र, उद्धरण, कड़ियाँ, गपशप और विडियो आदि प्रकाशित की जा सकती हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.tumblr.com/" target="_blank"><img title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/tumblr-logo.gif" border="0" alt="Tumblr" hspace="2" vspace="2" width="127" height="36" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank">जाईकू</a> इसे ट्विटर का सबसे बड़ा प्रतिस्पर्धी माना जाता है। सुविधाओं के मामले में दोनों में काफी समानता है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.jaiku.com/" target="_blank"><img title="Jaiku" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/jaiku.gif" border="0" alt="Jaiku" hspace="2" vspace="2" width="79" height="62" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank">प्लर्क</a> इसमें भी ट्बलर जैसे अनेकों चीजें साझा करने की सुविधा है पर इसकी खास बात है इसका टाईमलाईन प्रारूप जो इसे बिल्कुल अनोखा बनाता है। प्लर्क में ट्विटर के फॉलोवर की जगह कर्मा प्वाइंट्स के ज़रिये लोकप्रियता मापी जाती है।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.plurk.com/" target="_blank"><img title="Plurk" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/plurk.png" border="0" alt="Plurk" hspace="2" vspace="2" width="130" height="58" /></a></td>
</tr>
<tr bgcolor="#f2ecec">
<td style="width: 70%; text-align: left;" align="justify"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank">एसएमएस गपशप</a> यह वेबारू द्वारा निर्मित माइक्रोब्लॉगिंग प्लैटफार्म है जहाँ आप किसी समूह के सदस्य बनकर या अपना समूह बनाकर एसएमएस भेज व प्राप्त कर सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.smsgupshup.com" target="_blank"><img title="SMS Gupshup" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/smsgupshup.gif" border="0" alt="SMS Gupshup" hspace="2" vspace="2" width="140" height="38" /></a></td>
</tr>
<tr>
<td style="width: 70%;"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank">वकाओ</a> एसएमएस गपशप जैसे ही सुविधा के साथ ही टैगिंग व श्वेत श्याम चित्र भेजने की सुविधा भी। वकाओ से ट्विटर पर भी संदेश भेजे जा सकते हैं।</td>
<td style="width: 30%;" align="center" valign="middle"><a href="http://www.vakow.com" target="_blank"><img title="Tumblr" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0708/vakow.gif" border="0" alt="Vakow" hspace="2" vspace="2" width="111" height="37" /></a></td>
</tr>
</tbody>
</table>
</td>
</tr>
</tbody>
</table>
</div>
<p class=note><b>छपते छपते</b>: इस लेख को अंतिम रूप देते समय (बमार्फत <a title="Twitter Summize Deal confirmed" href="http://gigaom.com/2008/07/15/twitter-summize-deal-confirmed/" target="_blank">ओम मलिक</a>) खबर पक्की हुई है कि ट्विटर ने अपनी ही पर आधारित खोज ईंजन <a href="http://www.summize.com">सम्माईज़</a> को खरीद लिया है। सौदे की कीमत 80 लाख डॉलर से अधिक आँकी जा रही है।<br />
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2176&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0708-tech-deergha-microblogging/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>7</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>टेरापैड: ब्लॉगिंग से आगे की सोच?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 May 2007 09:43:36 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रविशंकर श्रीवास्तव</dc:creator>
				<category><![CDATA[टैक दीर्घा]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0507tech-deerghaterrapad/</guid>
		<description><![CDATA[<strong>टेरापैड</strong> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। जानिये <strong>रविशंकर श्रीवास्तव</strong> क्या कहते हैं इस नये ब्लॉग प्लैटफॉर्म के बारे में।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>शायद नहीं। या शायद हाँ। चिट्ठाकारों के लिए अब बहुत से अच्छे विकल्प उपलब्ध हैं और इनमें नित्य प्रति इजाफ़ा होता जा रहा है। एक नया,  आल-इन-वन किस्म का ब्लॉगिंग प्लेटफ़ॉर्म &#8211; टेरापैड जारी किया गया है जो कि न सिर्फ मुफ़्त है (यदि आप विज्ञापनों से नहीं चिढ़ते हैं तो, चूंकि इसकी मुफ़्त सेवा विज्ञापन समर्थित है), ढेरों अन्य सुविधाओं से भी लेस है।</p>
<p><a href="http://www.terapad.com" target="_blank"><img title="Terapad" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0207/terapad.jpg" border="0" alt="Terapad" hspace="6" vspace="5" width="350" height="235" align="right" /> टेरापैड</a> कुछ ऐसी सेवाओं व विशेषताओं को आपके लिए लेकर आया है जो आपकी पारंपरिक चिट्ठाकारी की दशा व दिशा को बदल सकता है। यदि आप टेरापैड के जरिए अपना चिट्ठा लिखने की सोच रहे हैं तो आपको प्रमुखतः इसमें निम्न अतिरिक्त सुविधाएँ मिलेंगी जो अन्य ब्लॉग प्लेटफ़ॉर्म में अनुपलब्ध हैं:</p>
<ul>
<li>पेपॉल रेडी शॉप &#8211; इसका अर्थ है, आप अपने ब्लॉग को ई-बे जैसा शॉपिंग माल मिनटों में बना सकते हैं।</li>
<li>पूरा सीएसएस नियंत्रण &#8211; माने कि बोरिंग ब्लॉगर व सीमित वर्डप्रेस टैम्प्लेटों से पूरा छुटकारा। आप अपने ब्लॉग को मनचाहा रूपाकार दे सकते हैं।</li>
<li>प्रोब्लागिंग औजार- (ये क्या है भई? हमें भी नहीं पता)</li>
<li>WTSIWYG संपादन सुविधा &#8211; यह तो सभी में है, परंतु इसमें यह उन्नत किस्म का है।</li>
<li>सामग्री प्रबंधन &#8211; आप अपने चिट्ठा पोस्टों के अतिरिक्त भी अन्य सामग्री डाल सकते हैं।</li>
<li>समाचार व आरएसएस फ़ीड जोड़ सकते हैं (यह कोई नई सुविधा नहीं है)</li>
<li>इमेज गैलरी</li>
<li>पाठकों की आवाजाही पर निगाह &#8211; (यह तो सबसे जरूरी वस्तु है)</li>
<li>परिचर्चा फोरम (वाह! क्या बात है)</li>
<li>नौकरी तथा कर्मकुण्डली खोज- बेरोजगारों के लिए बढ़िया है।</li>
<li>कैलेण्डर</li>
<li>मुफ़्त मासिक 10 गीबा बैंडविड्थ  /  तथा कुल 2 गीबा डाटा</li>
</ul>
<p>चलिए अब कुछ खामियों की बातें भी करें। वैसे तो कुछेक ही हैं, पर हैं तो :</p>
<p>एक ही स्थल पर बहुत सी चीजें एक आम चिट्ठाकार के लिए अनावश्यक ही होंगी। इसका इंटरफ़ेस अनावश्यक रूप से अव्यवस्थित है और सारा मामला घालमेल प्रतीत होता है। इसका यूजर इंटरफेस छोटे-छोटे कार्यों के लिए अवांछित नेविगेशन मांगता है जो खीझ भरा हो जाता है। उदाहरण के लिए, आपको नया ब्लॉग पोस्ट बनाने के लिए कड़ी तब तक दिखाई नहीं देती जब तक कि आप कोई श्रेणी बना कर उसे क्लिक नहीं करते! कौन नया चिट्ठाकार इसे समझ सकेगा भला?</p>
<p>एक नया व्यापारिक जोखिम जिसे गूगल खरीद लेगा? बहुत संभव है, परंतु फिर इसके उपयोक्ता आधार को करोड़ों में भी तो पहुँचना चाहिए। संभावना तो कम ही नजर आती है!</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2201&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0207-tech-deergha-terrapad/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>आइए वर्डप्रेस अपनाएँ – भाग 2</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01#comments</comments>
		<pubDate>Fri, 01 Jul 2005 15:42:12 +0000</pubDate>
		<dc:creator>रमण कौल</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Wordpress]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=2910</guid>
		<description><![CDATA[रमण कौल के लेख के दूसरे भाग में जानें ब्लागर से वर्डप्रेस में ब्लाग आयातित करना, थीम परिवर्तन और प्लगइन संस्थापन]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">वर्डप्रेस पर <a href="http://kaulonline.com/">रमण कौल</a> के लेख का यह दूसरा भाग है। लेख के इस भाग में हम आप को बताएँगे कि आप ब्लॉगर से बनाई प्रविष्टियाँ वर्डप्रेस में कैसे आयातित कर सकते हैं। इस के इलावा बात करेंगे थीम परिवर्तन की, प्लग-इन इन्सटॉल करने की और कार्यान्वित करने की। आप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्‍त कर सकते हैं इस लेख के अन्त में टिप्पणी के रूप में या patrikaa एट gmail डॉट कॉम पर सम्पादक को लिखे पत्र के रूप में।</div>
<p><img class="alignleft" style="margin: 1px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" alt="निधि" hspace="1" vspace="1" width="135" height="140" align="right" /><span style="font-size: large;">पि</span>छले अंक में <a href="http://nirantar.org/0605-nidhi">आपने पढ़ा</a> कि वर्डप्रेस को क्यों चुनें, और कैसे स्थापित करें। संभावना है कि आप ने अपना नया चिट्ठा वर्डप्रेस पर स्थापित करने के बारे में विचार किया होगा। यदि आप पहले से किसी चिट्ठे का प्रबन्धन कर रहे हैं (ब्लॉगस्पॉट या किसी अन्य तन्त्र पर) और यदि वर्डप्रेस के कई गुणों के चलते आपने उसे प्रयोग करने का निश्चय कर लिया है तो एक समस्या यह रहेगी कि पुरानी प्रविष्टियों का क्या किया जाए। एक विकल्प तो यह है कि आप पुरानी प्रविष्टियाँ पुराने स्थान पर ही रहने दें और वर्डप्रेस नई प्रविष्टियों के साथ आरंभ करें। या फिर यदि आप चाहते हैं कि पुरानी प्रविष्टियों को वर्डप्रेस पर लाया जाए तो आगे पढ़ें।</p>
<h2>प्रविष्टियों का ब्लॉगर से वर्डप्रेस पर स्थानान्तरण</h2>
<p>वर्डप्रेस के नए संस्करण के साथ एक PHP स्क्रिप्ट है जो ब्लॉगर से प्रविष्टियों को वर्डप्रेस में आयातित करने के लिए बनाई गई है। जब आप ने वर्डप्रेस को अपने सर्वर पर स्थापित किया तो उस के साथ यह फाइल भी स्थापित हो गई है।  इस फाइल का नाम है import-blogger.php और यह आपके सर्वर के /wp-admin/ फोल्डर में रखी हुई है। यानी, यदि आप का चिट्ठा www.xyz.com/blog पर है तो यह स्क्रिप्ट चलाने के लिए आप को अपने ब्राउज़र में http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php पर जाना पड़ेगा। पर अभी नहीं। पहले आप को कुछ काम अपने ब्लॉगर पर करना है। घर बदलने से पहले सामान पैक करेंगे या नहीं? नहीं करेंगे तो सामान टूटी फूटी हालत में पहुँचेगा।</p>
<h2>ब्लागर पर प्रविष्टियों की &#8220;पैकिंग&#8221; और नई जगह भेजना</h2>
<p>हमें करना यह है कि अपने प्रविषटियों से सम्बन्धित सारी सूचनाएँ, यानी तारीख, मसौदा, आदि एक ऐसी सारणी के आकार में बनानी है जिसे वर्डप्रेस समझ सके। हम ब्लॉगर को यह निर्देश देंगे कि यह सारणी हमारे सर्वर पर छाप दे। इस के लिए निम्नलिखित निर्देशों का पालन करें</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 10px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/bl1.jpg" alt="" hspace="1" vspace="1" width="428" height="496" align="right" /></p>
<ul>
<li>अपने ब्लॉगर के खाते में लॉग-इन कीजिए।</li>
<li>अब अपने चिट्ठे का नियन्त्रण पटल खोल कर Settings, Publishing पर क्लिक करें। फिर Switch to FTP को चुनें।</li>
<li>अगले पन्ने पर आप को उस बेब सर्वर का पता देना पड़ेगा जिस पर आप ने अपना वर्डप्रेस चिट्ठा स्थापित किया है। उदाहरणतः xyz.com/blog/ । सारी सूचनाएँ भरने के बाद Save Settings पर क्लिक करना न भूलें। नीचे दिए सारे बदलाव पूरे करने से पहले Republish पर क्लिक न करें।</li>
<li>अब Formatting पर क्लिक करें। Date language यदि आप ने हिन्दी रखी हुई है तो उसे English US में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में अन्तिम विकल्प)। इस के अतिरिक्त Timestamp format को mm/dd/yyyy hh:mm:ss AM/PM प्रारूप में बदलें (ड्रॉप डाउन सूची में पहला विकल्प)। फिर Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>Archiving पर जा कर Archive Frequence को Monthly कर दें (यदि पहले से नहीं है)। Save Settings पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Templates पर जाएँ। यहाँ आप भारी बदलाव करने जा रहे हैं इसलिए पहले अपने टेंपलेट के मसौदे को किसी टेक्सट फाइल में कॉपी कर के किसी सुरक्षित जगह पर संचित करें। अब ब्लॉगर पर अपने टेंपलेट का सारा मसौदा हटा कर केवल नीचे दी हुई पंक्ति उस में डाल दें,&lt;$BlogItemDateTime$&gt;|||&lt;$BlogItemAuthorNickname$&gt;|||&lt;$BlogItemBody$&gt;|||&lt;$BlogItemNumber$&gt;|||&lt;$BlogItemSubject$&gt;और Save Template Changes पर क्लिक करें।</li>
<li>अब Republish पर क्लिक करें। यह काम सफलतापूर्वक होने का अर्थ है कि आप का लगभग सारा काम हो गया है, यानी सामान पैक हो कर नई जगह पहुँच गया है। अब खोलने और सजाने भर की देर है।</li>
<li>अपने सर्वर पर FTP के द्वारा जा कर सुनिश्चित करें कि आप की फाइलें पहुँच गई हैं। उन के नाम कुछ इस तरह होंगे &#8211; 2005_01_01_wordpress.php। यदि आप को ऐसी कोई फाइल नहीं दिखती तो आप को यह सारा काम दोबारा करना पड़ेगा।</li>
</ul>
<h2>वर्डप्रेस पर प्रविष्टियों का आयात</h2>
<p>बाकी का काम आसान है। अपने ब्राउज़र में नीचे दी गई पंक्‍ति टाइप कर के चला दें</p>
<pre>http://www.xyz.com/blog/wp-admin/import-blogger.php</pre>
<p>आप की प्रविष्टियाँ आप के वर्डप्रेस चिट्ठे में आयातित हो जाएँगी।</p>
<p>यह कार्य सफलता के साथ हो जाने पर आप चाहें तो ब्लॉगर पर जाकर आप वहाँ किए गए बदलाव पलट सकते हैं ताकि आप का ब्लॉगर चिट्ठा भी ज़िन्दा रहे।</p>
<p>एक बात और, ऊपर बताई गई import-blogger.php फाइल वर्डप्रेस की अधिकृत स्क्रिप्ट फाइल है और यह फाइल यह लेख लिखे जाने के समय तक प्रविष्टियाँ तो ब्लॉगर से वर्डप्रेस में आयातित करती है, पर टिप्पणियाँ नहीं। यदि आप के चिट्ठे पर बहुत अधिक टिप्पणियाँ हैं और आप उन्हें बिना अधिक मेहनत किए आयातित करना चाहते हैं तो <a href="http://www.skeltoac.com/2005/03/12/from-blogger-to-wordpress-2/">ऍण्डी स्केल्टन</a> की तरकीब का इस्तेमाल करें। उम्मीद है वर्डप्रेस के अगले संस्करण में यह कार्यशीलता भी जुड़ जाएगी।</p>
<h2>वर्डप्रेस में अभिकल्प परिवर्तन यानी नई थीम लगाना</h2>
<p>अब सामान नए घर में आ गया तो शायद आप कुछ साज-सजावट की सोच रहे होंगे। वर्डप्रेस में विभिन्न डिज़ाइनों या थीमों को कार्यान्वित करना काफी आसान है। थोड़ी सी मेहनत है तो वह है थीम ढ़ूढने और डाउनलोड-अपलोड करने में। सब से पहले देखें कि पहले से उपस्थित थीम को कैसे कार्यान्वित किया जाए।</p>
<p>अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित अभिकल्पों की सूची मिल जाएगी। सक्रिय अभिकल्प के सामने लिखा होगा &#8220;सक्रिय अभिकल्प&#8221; और शेष अभिकल्पों के सामने लिखा होगा &#8220;चुनें&#8221;। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। पृष्ठ के ऊपर जालस्थल देखें पर क्लिक करें और देखें कि यह अभिकल्प आप के चिट्ठे पर कैसा लगता है। चाहें तो वापस जा कर कोई और अभिकल्प चुन सकते हैं।</p>
<p>वर्डप्रेस के इंस्टालेशन के साथ केवल दो या तीन अभिकल्प आते हैं, इसलिए यदि आप को कोई और अभिकल्प प्रयोग करना है तो वह आप को अलग से इन्सटाल करना पड़ेगा। वर्डप्रेस का आधिकारिक थीम पृष्ठ <a href="http://wordpress.org/extend/themes/">यहाँ</a> है। जो थीम आप को अच्छी लगे, उस के &#8220;डाउनलोड&#8221; पर क्लिक कीजिए। ज़िप फाइल को खोल कर जो फोल्डर बनेगा, उसे ज्यों का त्यों अपने सर्वर के wp-content/themes/ फोल्डर में अपलोड कर दीजिए। अब आप वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँगे, और &#8220;प्रदर्शन&#8221; पर क्लिक करेंगे तो आप को उपस्थित अभिकल्पों की सूची में नया अभिकल्प भी नज़र आएगा। इसे &#8220;चुनें&#8221; पर क्लिक कर के आप सक्रिय कर सकते हैं।</p>
<p>यदि वर्डप्रेस के आधिकारिक थीम पृष्ठ पर दिए गए अभिकल्प आप को काफी नहीं लगते, तो <a href="http://codex.wordpress.org/Using_Themes/Theme_List">यहाँ</a>, <a href="http://www.alexking.org/index.php?content=software/wordpress/themes.php">यहाँ</a>, <a href="http://themes.wordpress.net/theme-viewer.php">यहाँ</a> और <a href="http://www.bloggingpro.com/wordpress-theme-gallery/">यहाँ</a> देखिए, या फिर <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+themes">गूगल भैया</a> से पूछिए।</p>
<h2>वर्डप्रेस में प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन</h2>
<p>वर्डप्रेस में अतिरिक्त कार्यशीलता प्लग-इन के माध्यम से जोड़ी जाती है। एक प्लग-इन जो बहुत लाभदायक है वह है &#8220;स्पैम-कर्मा&#8221;। यदि आप के चिट्ठे के ऊपर टिप्पणियों द्वारा लोग अपना जुए का या सेक्स का कारोबार बढाना चाहते हैं तो आप को कोई तो हथियार चाहिए उन्हें रोकने के लिए। प्लग-इन का स्थापन और कार्यान्वयन थीम के स्थापन और कार्यान्वयन जैसा ही है। अपनी साइट पर वर्डप्रेस के नियन्त्रण पटल पर जाएँ, यानी xyz.com/blog/wp-admin पर। यहाँ &#8220;प्लग-इन&#8221; पर क्लिक करें। आप को सभी उपस्थित प्लग-इन्ज़ की सूची मिल जाएगी। आप जो अभिकल्प कार्यान्वित करना चाहते हैं, उस के सामने &#8220;सक्रिय करें&#8221; पर क्लिक करें। बस, हो गया। नए प्लग इन खोजने और डाउनलोड करने के लिए <a href="http://wordpress.org/extend/plugins/">यहाँ</a>, <a href="http://codex.wordpress.org/Plugins">यहाँ</a>, <a href="http://www.bloggingpro.com/archives/category/wordpress-plugins/">यहाँ</a> जाएँ या <a href="http://www.google.com/search?hl=en&amp;q=wordpress+plugin">गूगल</a> से पूछें।</p>
<p class="note">यह लेख 2005 में लिखा गया था और नवीनतम वर्डप्रेस हेतु लागू नहीं होता. अब वर्डप्रेस में आयात प्रक्रिया काफी कम कष्टकर और सरल कर दी गई है. &#8211; संपादक</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2910&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0705-nidhi-01/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>1</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>टेक्नोराती नये रूप में</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0705-halchal</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0705-halchal#comments</comments>
		<pubDate>Thu, 30 Jun 2005 19:57:01 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[हलचल]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Technorati]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=3015</guid>
		<description><![CDATA[एक और नया ब्लॉग एग्रीगेटर, टेकनोराती का नया सलोना रूप, ब्लॉगरों के लिये कानूनी गाईड और माईक्रोसॉफ्ट ने ब्लॉग पर लगाई सेंसर की बाँध. ये तथा अन्य ताजा खबरें सारे ब्लाग संसार से हमारे नियमित स्तंभ हलचल में.]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser">ब्लॉग जगत से संबंधित माह की प्रमुख घटनाओं की जानकारी देता है हलचल। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया, समाचार तथा उनकी कड़ी संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम।</div>
<p><strong>टेक्नोराती नये रूप में</strong></p>
<p><img src="http://www.nirantar.org/images/stories/halchal.gif" alt="हलचल" hspace="2" vspace="2" align="right" />टेक्नोराती ने अपने जालस्थल पर भारी रद्दोबदल किया है और तकरीबन दो सप्ताह तक <a href="http://beta.technorati.com/">बीटा वर्शन</a> रखने के बाद <a href="http://www.technorati.com/">नया रूप</a> आम लोगों के लिये जारी कर दिया है। नये डिज़ाईन में नये चिट्ठाकारों को ध्यान में रखकर बदलाव लाये गये हैं साथ ही टैग प्रकार्य में सुधार हुये हैं। नई सुविधाओं का ज़िक्र <a href="http://www.sifry.com/alerts/archives/000314.html">यहाँ</a> है। टेक्नोराती ने जापान के लिये भी <a href="http://www.technorati.jp/home.html">अलाहदा जालस्थल</a> शुरु किया है। वाकई मनोरम जालस्थल!</p>
<p><strong>एक और नया ब्लॉग एग्रीगेटर</strong></p>
<p><a href="http://www.alexking.org/">एलेक्स किंग</a> और <a href="http://dotnot.org/blog/index.php">स्कॉट सैंडर्स</a> ने अंतर्जाल आधारित <a href="http://www.feedlounge.com/">फीडलाउन्ज</a> नामक एक नया ब्लॉग एग्रीगेटर जारी किया है। <img class="alignleft" style="margin: 10px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/illo2.gif" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="220" height="220" align="right" />यह नये ज़माने का एग्रीगेटर है जिसमें गति और जानदार इंटरफेस का संगम है जो आपको डेस्कटॉप एप्पलीकेशन का एहसास दिलाये और जाल आधारित तंत्रों का फायदा भी दे। <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/AJAX">एजैक्स</a>, टैगिंग, कीबोर्ड कमांड, सब है फीडलाउन्ज में। लगता है कि एजैक्स, डेस्कटॉप और अंतर्जाल आधारित एप्पलीकेशन के बीच का फासला मिटा कर रहेगा।</p>
<p><strong>स्क्वैक बॉक्स अब स्पेस पर</strong></p>
<p>सी.एन.बी.सी का स्क्वैक बॉक्स कार्यक्रम अब एम.एस.एन स्पेस पर हाज़िर है, शायद यह एम.एस.एन का जवाबी हमला है <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a> पर। ब्लॉग का शीर्षक है  <a href="http://spaces.msn.com/members/squawkblog/PersonalSpace.aspx?_c=">&#8220;स्क्वैक ब्लॉग&#8221;</a> और टीवी क्रयक्रम की तरह ही यह मूलतः आधारित है निवेश से जुड़े विषयों पर। अब तक लोगों और संस्थाओं के ब्लॉग तो हमने सुने पढ़े थे पर किसी टी.वी कार्यक्रम का अपना ब्लॉग होने का शायद यह पहला मौका होगा।</p>
<p><strong>ब्लॉगलाईंस का बड़ा भंडार</strong></p>
<p>आस्क जीव्स ने हाल ही में <a href="http://biz.yahoo.com/prnews/050608/sfw022.html?.v=13">घोषणा</a> कि लोकप्रिय एग्रीगेटर <a href="http://www.bloglines.com/">ब्लॉगलाईंस</a> के पास अब ५००० लाख चिट्ठों और समाचार प्रविष्टियों का भंडार है। हर दिन ब्लॉगलाईंस तकरीबन २० लाख नये स्रोतों को जोड़ता है, बुनाई पर आधारित ब्लॉग से लेकर लोकप्रिय समाचार पत्रों की फीड तक। इतनी जानकारी और पढ़ने का वक्त इतना कम!</p>
<p><strong>ब्लॉगरों के लिये कानूनी गाईड</strong></p>
<p><img class="alignright" style="margin: 2px; border: 0pt none;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0705/blog.JPG" border="0" alt="" hspace="2" vspace="2" width="119" height="154" align="right" />जैसे जैसे ब्लॉगिंग का प्रचलन बढ़ता जा रहा है कानूनी पेचीदगियाँ भी बढ़ती जा रही हैं। हम पढ़ते रहते हैं कि कैसे कई ब्लॉगरों को चिट्ठाकारी की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा। अब एक ऐसी <a href="http://www.eff.org/bloggers/lg/">कानूनी गाईड</a> बनाई गई है जो अमरीका स्थित चिट्ठाकारों के लिये काम की साबित हो सकती है। इसमें इंटलेक्चुअल प्रापर्टी, आनलाईन मानहानी कानून जैसे विषयों पर जानकारी समाहित है।</p>
<p><strong>माईक्रोसॉफ्ट ने ब्लॉग पर लगाई सेंसर की बाँध</strong></p>
<p><a href="http://news.bbc.co.uk/1/hi/technology/4088702.stm">खबर है</a> कि माईक्रोसॉफ्ट की एम.एस.एन साईट चीन में ऐसी ब्लॉग प्रविष्टियों पर रोक लगा रही है जिनमें &#8220;स्वतंत्रता&#8221;, &#8220;जनतंत्र&#8221;, &#8220;मानवाधिकार&#8221;, &#8220;ताईवान की स्वतंत्रता&#8221; या &#8220;प्रदर्शन&#8221; जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया हो। माईक्रोसॉफ्ट का कहना है कि जैसा देस वैसा भेस, हम तो जिस देश में काम करते हैं वहाँ के कानून का पालन करते हैं। चीनी चिट्ठाकारों पर वैसे भी संकट के बादल छाये हैं, उन्हें सरकार के पास अपना ब्लॉग रजिस्टर करवाना पड़ता है। पर <a href="http://www.theaustralian.news.com.au/common/story_page/0,5744,15521940%255E2703,00.html">खबरें</a></p>
<p><strong>टाईपपैड पर टिप्पणियों पर नियंत्रण</strong></p>
<p>सिक्स अपार्ट ने अपने नये कदमों की <a href="http://www.sixapart.com/typepad/news/2005/05/upcoming_enhanc.html">घोषणा</a> की है जिससे कीमत अदा करने वाले टाईपपैड प्रयोक्ताओं को कमेंट व ट्रैकबैक पर प्राप्त होते स्पैम से मुक्ति मिल सकती है। प्रयोक्ताओं को अब  कमेंट व ट्रैकबैक को प्रकाशन से पहले देखने और उपयुक्त पाने पर ही प्रकाशित करने की सुविधा मिलेगी।</p>
<h2>और चलते चलते&#8230;</h2>
<p><strong>बिना लिखे कैसे लिखें ब्लॉग?</strong></p>
<p>बड़ा आसान हैं! सामग्री की चोरी कीजिये। सामग्री चोरी का मुद्दा नया नहीं है, इसके पीछे लोकप्रियता और गूगल एडसेंस जैसे माध्यमों से पैसे बनाने के रास्ते खुल सकते हैं। ऐसी ही एक सुविधा <a href="http://www.emediawire.com/releases/2005/6/emw249892.htm">ब्रेट फूगल</a> नामक एक व्यक्ति ने &#8220;ब्लॉग पॉवर&#8221; के नाम से बनाई है। इसे ऐसा नया ब्लॉगिंग सॉफ्टवेयर बताया जा रहा है जो किसी को भी आसानी से और फुर्ती से कीवर्ड आधारित खोज कर पराई आर.एस.एस फीड से अपने ब्लॉग में आटोमैटिक रूप से प्रकाशित करने की सुविधा देता है। सीनाजोरी के साथ चोरी के लिये भी तंत्रांश, क्या बात है!</p>
<p class="note">समाचार संकलन व पुनर्लेखनः देबाशीष चक्रवर्ती</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=3015&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0705-halchal/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>हल्की फुल्की, सकारात्मक और मज़ेदार</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha#comments</comments>
		<pubDate>Wed, 01 Jun 2005 14:54:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[वातायन]]></category>
		<category><![CDATA[Biz Stone]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://www.nirantar.org/?p=2658</guid>
		<description><![CDATA[ट्विटर के सह संस्थापक बिज़ स्टोन की लिखी "हू लेट द ब्लॉग्स आउट" मज़ेदार किताब है, ब्लॉगिंग की दुनिया में कुछ दिन बिता चुके नौसिखियों और निपुण चिट्ठाकारों के लिये बेहद काम की। ब्लॉग पर आवक कैसे बढ़ायें, ब्लॉगिंग से पैसा कैसे कमायें, ब्लॉग की वजह से नौकरी कैसे न गवायें जैसे कई काम के टिप हैं पुस्तक में। पढ़िये देबाशीष द्वारा समीक्षा।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p><img class="alignright" style="margin: 2px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/vaatayan_samiksha.gif" alt="वातायनः पुस्तक समीक्षा" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="left" /></p>
<div class="dropCap">बि</div>
<p>ज़ स्टोन <a href="http://www.bizstone.com/">ब्लॉगिंग</a> करते हैं। काफी ब्लॉगिंग करते हैं। जवाँ हैं (&#8220;ईमेल उम्र में मुझसे बड़ा है, यूँ समझिए कि 1948 में मैं पांचवीं में था, लगाइए हिसाब।&#8221;), बॉस्टन के रहने वाले हैं और उनके बिल्ले का नाम ब्रूस है। एक किताब पहले लिख चुके हैं, और &#8220;<a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/redirect?path=ASIN/0312330006&amp;link_code=as2&amp;camp=1789&amp;tag=nirantar-20&amp;creative=9325">हू लेट द ब्लॉग्स आउट</a>&#8221; उनकी दूसरी पुस्तक है। <a href="http://www.xanga.com/">ज़ांगा डॉट कॉम</a> से जुड़े थे तथा संप्रति गूगल में वरिष्‍ठ विशेषज्ञ हैं। दरअसल, बिज़ की पुस्तक में &#8220;मैं&#8221; शब्द बहुत बार आता है। शायद इसलिये भी पुस्तक का लहज़ा आत्मकथात्मक है। बिज़ का खुद ही मानना है, &#8220;यू आर वॉट यू ब्लॉग&#8221;।</p>
<p>बिज़ की पुस्तक रोचक है। किसी भी ब्लॉगर के लिये यह प्रेरणादायक साबित हो सकती है। बिज़ नये ब्लॉगरों के लिये उम्दा रोल मॉडल न सही, पर एक सामान्य इन्सान जिसका कोई खास शैक्षणिक आधार न हो, जिसे दो दो पुस्तक लिखने की बढ़िया डील और गूगल में शानदार नौकरी, संक्षेप में कहें तो रोटी कमाने का ज़रिया, ब्लॉग से ही मिला हो तो प्रेरणा न ग्रहण न करने का सवाल ही नहीं उठता।</p>
<p>244 पृष्ठों की &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; में कथन शैली हल्की फुल्की बातचीत की है पर कुछ अध्याय संजीदगी भी लिये हैं (<a href="http://www.nirantar.org/0405-saransh/">यह पुस्तकांश</a> तो आप निरंतर पर पढ़ भी चुके हैं)। शेष के अध्याय &#8220;बिज़नेस ब्लॉगिंग&#8221; तथा &#8220;पॉलिटिक्स एंड प्युपिल्स&#8221; काफी अहम लेख हैं। किताब में यत्र तत्र विभिन्न हस्तियों की उक्तियां भी दी गई हैं। किस प्रकार ब्लॉगर स्वयं अपने रिवाज और नियम बना लेते हैं उस पर बिज़ ने लैरीवेल को उद्धत किया है</p>
<blockquote><p>मुझे पता चला कि जब वे केलिफॉर्निया विश्वविद्यालय बना रहे थे तो उन्होंने पहले साल कोई साइडवॉक (पैदल चालन के लिये पटरी) नहीं बनाई। अगले साल वे वापस आये और घास पर गायों के पदचिह्नों से बनी पगडंडियों को खोजा और वहीं साईडवॉक बना दीं। <em>(पृष्ठ 67)</em></p></blockquote>
<p><img class="alignleft" style="margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/biz.jpg" alt="" hspace="2" vspace="2" width="192" height="200" align="right" />पुस्तक में गूगल संबंधित विषयों जैसे कि <a href="http://www.blogger.com/">ब्लॉगर</a>, गूगल <a href="http://www.google.com/adsense">एडसेंस</a>, गूगल का आन्तरिक ब्लॉग निकाय से लेकर <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Google_bomb">गूगल बॉम्बिंग</a> तक का उल्लेख है। पूछना नहीं चाहिये क्यों? बिज़ ज़ाहिर तौर पर अपनी नौकरी से अभिभूत हैं। पुस्तक में सोशियल बुकमार्किंग जैसे काफी सामयिक विषयों पर भी चर्चा है। पुस्तक का मिज़ाज़ काफी सकारात्मक है इसलिये ब्लॉगिंग की कमियों पर कोई रोशनी नहीं डाली गई है, उदाहरणतः कॉमेन्ट या रेफरर स्पैमिंग की दिक्कतों का उल्लेख नहीं है।</p>
<p>बिज़ की किताब में कई बढ़िया किस्से भी शुमार हैं। जैसे कि डेबी स्वेनसन नामक एक महिला द्वारा केसी नाम की काल्पनिक कैंसर मरीज़ पर बनाया ब्लॉग जिसका पर्दाफाश समूह ब्लॉग <a href="http://www.metafilter.com/">मेटाफिल्टर</a> ने तब किया जब अच्छी खासी ठीक हो रही बताई जा रही केसी की सहसा मौत की घोषणा डेबी ने उसके ब्लॉग में की। इसके अलावा ट्रेफिक जीव‍विज्ञान की संकल्पना और ब्लॉगरों का चीटिंयों के साथ तुलना भी बड़ी रोचक है। गौर फरमायें-</p>
<blockquote><p>जिस तरह से चीटिंयो ने भोजन की खोज की और इसे घर तक लाने के लिये स्वसंगठन किया वैसा ही ब्लॉगरों के व्यवहार का मूलभूत तरीका है। यह सब फीडबैक परिपथ और कुछ साधारण नियमों पर आधारित है। बिल्ले के भोजन की जगह ब्लॉगर अंर्तजाल पर समाचार लेखों और रोचक जालपृष्ठों की खाक छानते फिरते हैं। जब किसी ब्लॉगर को कुछ रोचक मिलता है तो वह उसे लिंक करती हैं। यहाँ ये हाईपरलिंक (कड़ी) <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Pheromone">फीरोमोन</a> संकेतों की पगडंडी हैं। जब कोई अन्य ब्लॉगर इस कड़ी को क्लिक करता है और स्वयं से लिंक करता है तो ये पगडंडी सुदृढ़ होती जाती है। <em>(पृष्ठ 204)</em></p></blockquote>
<p>सही भी तो है, जैसा कि बिज़ कहते हैं, &#8220;कड़ियां ब्लॉगमंडल की मुद्रा है।&#8221;</p>
<p><img class="alignright" style="margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0605/biz_book.jpg" alt="" hspace="2" vspace="2" width="294" height="174" align="right" />यह पुस्तक नये ब्लॉगरों के लिये तो संभवतः उपयुक्त नहीं क्योंकि इसे कदम-दर-कदम गाइड किताब की शैली में नहीं लिखा गया है। पुस्तक अन्तर्जाल के शुरुआती दिनों से ब्लॉगिंग के प्रखर होने के सफरनामे पर केंद्रित है, ऐसे में अचानक ही &#8220;अपना ब्लॉग कैसे बनायें&#8221; नुमा लेख प्रवाह में व्यवधान ही डालते हैं। तिस पर गूगल विज्ञापन अपने ब्लॉग्स पर डालने की चर्चा मय जावास्क्रिप्ट कोड अगर किसी आनलाईन लेख में दिये हो तो बात ज्यादा जमती है। HTML के प्रयोग वाला लेख भी शुरुआती किताब के लिये ज्यादा उपयुक्त होता। हालांकि भारत का किताब में इक्का दुक्का बार ज़िक्र है पर यह पुस्तक मूलतः गैर एशियाई पाठकों को अधिक जंचेगी (अब हमें क्या पता कि <a href="http://www.tivo.com/">TiVo</a> क्या बला है?)। मेल्कम ग्लैडवेल की पुस्तक &#8220;<a href="http://www.gladwell.com/tippingpoint/">टिप्पिंग प्वाइंट</a>&#8221; का ज़िक्र अब तमाम जगह इतना हो चुका है कि लगता है विवेचक हर दृग्विषय का संबंध इससे जोड़ेंगे, ब्लॉगिंग से इसका साम्य कई जगह विश्लेषित किया जा चुका है।</p>
<p>कुल मिलाकर &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; मज़ेदार किताब है, एक ही बैठक में पढ़ लेने लायक और ब्लॉगिंग की दुनिया में कुछ दिन बिता चुके नौसिखियों और निपुण चिट्ठाकारों के लिये बेहद काम की। ब्लॉग पर आवक कैसे बढ़ायें, ब्लॉगिंग से पैसा कैसे कमायें, ब्लॉग की वजह से नौकरी कैसे न गवायें जैसे कई काम के टिप हैं पुस्तक में। मौका मिले तो ज़रूर पढ़ें और लायें अपनी ब्लॉगिंग में निखार!
<p class=note>बिज़ की पुस्तक &#8220;हू लेट द ब्लॉग्स आउट&#8221; के लेख &#8220;व्हाइ वुड ऍनीवन वांट टू ब्लॉग&#8221; का हिन्दी रूपान्तर आप <a href="http://www.nirantar.org/0405-saransh/">यहाँ पढ़ सकते हैं</a>।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2658&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0605-vatayan-samiksha/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>क्या आप टैगिंग करते हैं?</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0505-nidhi</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0505-nidhi#comments</comments>
		<pubDate>Mon, 23 May 2005 07:11:59 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[निधि]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Dewey]]></category>
		<category><![CDATA[Folksonomy]]></category>
		<category><![CDATA[Lebkowsky]]></category>
		<category><![CDATA[mainLead]]></category>
		<category><![CDATA[Tagging]]></category>
		<category><![CDATA[Technorati]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0505nidhi/</guid>
		<description><![CDATA[टैगिंग जानकारी की जमावट और लोगों को जोड़ने का एक नया क्राँतिकारी माध्यम है जो अराजकता से व्यवस्था की सृष्टि कर मानवीय भावनाओं का प्रतीक भी बन चला है। <strong>देबाशीष चक्रवर्ती</strong> के आलेख द्वारा प्रवेश कीजिये कीवर्ड के साम्राज्य में और अंदाज़ा लगाईये टैगिंग के भविष्य का।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<div id="section-teaser" style="margin-top: 0px; padding-top: 0px"><img hspace="5" height="140" width="135" vspace="5" border="0" align="right" title="Nidhi" alt="Nidhi" src="http://www.nirantar.org/images/stories/nidhi.gif" /></p>
<p>टैग हैं बड़े काम की चीज़!  टैगिंग अलाहदा रुपों में हमारे जीवन में सदा शामिल रही है, रसोईघर के डिब्बों के लेबल से लेकर पुस्तकालय के डेवी डेसिमल कोड तक। यही टैग, डिलिशियस और फ्लिकर हम तक अंतर्जाल पर नये रूप में ले आये। अब हलचल मची है टेक्नोराती की बेहतरीन पहल के कारण, जो है इन दोनों माध्यमों और ब्लॉग पर टैग आधारित खोज। पढ़िये इस नये अन्वेषण व टैगिंग की परतें खोलता देबाशीष चक्रवर्ती का जानकारी परक आलेख और कूद पड़िये आप भी टैगिंग के मैदान में।</p>
</p></div>
<p>&nbsp;</p>
<p><img hspace="5" vspace="5" border="0" align="left" title="Tagging" alt="Tagging" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/tag.jpg" />
<div class=dropCap>मा</div>
<p>नवीय फितरत का रूख तय नहीं होता। जैसे बयार रेगिस्तान के कैनवस पर सहसा उत्पन्न चित्र उकेरती है इंसानी मन भी नए रुप धरने और नयी राह की तलाश में रहता है सदा। अंतर्जाल पर मानवीय उपलब्धियों कि गाथा ऐसे ही बनी है। जड़ से गतिशील जाल पृष्ठों का सफर भी यों ही तय हुआ है। 5 वर्ष पहले जो जनाब अपनी पालतू बिल्ली और बागान में खिले एकाकी बटन गुलाब की तस्वीर बाज़ार से स्कैन करा अपने होम&zwj;पेज पर तबियत से सजा कर मित्रों व परिचितों के डायल अप की कछुआ पदचाप अपने गेस्टबुक पर सुनना चाहते थे वो आज अपने ब्लॉग, मोब्लॉग<sup>1</sup> (Moblog), आडब्लॉग और अब व्लॉग (Vlog) से दुनिया के सेंकड़ों लोगों से ब्रॉडबैन्डीय वार्तालाप करते थक जाते हैं।</p>
<p>बातचीत की इस चाह ने वैश्विक वार्तालाप और सोशियल नेटवर्किंग<sup>2</sup> को जन्म दे दिया है। यूज़नेट, याहू ग्रुप्स, मैसेंजर, आर्कुट के बाद अब एक नया आंदोलन शुरु हुआ है, टैगिंग का। <a href="http://del.icio.us/">डिलिशियस</a> और <a href="http://www.flicker.com/">फ्लिकर</a> के बाद अब हलचल मची है <a href="http://www.technorati.com/tag/">टेक्नोराती</a> की बेहतरीन पहल के कारण, वह है टैग के आधार इन दोनों माध्यमों और ब्लॉग पर मिलीजुली खोज। जब आप टेक्नोराती पर किसी टैग की खोज करते हैं तो यह डिलिशियस, <a href="http://furl.net/">फर्ल</a> तथा फ्लिकर से जानकारी ले कर मुहैया कराता है। और हर नये अन्वेषण पर अंतर्जाल में ब्लॉग चर्चाओं का प्रचलन काफी पुराना है, सो टैगिंग भी हर चिट्ठाकार की ज़बान पर है। और शुरुवाती संकेतों के आधार पर यह तो कहना पड़ेगा कि टैग हैं बड़े काम की चीज़ (ज़ाहिर बात है महोदय, वरना न हम ये आलेख लिखते और न आप यह पढ़ रहे होते)।</p>
<h1>बात मुख़्तसर सी है&#8230;</h1>
<div id='pullQuoteR'>टैगिंग अलाहदा रुपों में हमारे जीवन में सदा शामिल रही है, रसोईघर के डिब्बों के लेबल से लेकर पुस्तकालय के डेवी डेसिमल कोड तक।</div>
<p>हैरान न हों अगर मैं कहूँ कि आप न केवल टैगिंग के बारे में सदा से जानते थे बल्कि आपने उसका अनेकानेक बार प्रयोग भी किया है। अपने रसोईघर के डिब्बों पर नज़र डालें! वो जो लेबल आप देख रहे हैं आपकी माताजी और पत्नी इसका प्रयोग न जाने कब से कर रहे हैं। स्वयं अपने जॉब वेबसाईट पर अपने बायोडेटा के साथ अपने विशेष गुणों को दर्शाते कीवर्ड प्रविष्ट किये होंगे (आप अगर कुँवारे या कुँवारी हैं तो संभवतः ये हथकंडा आपने शादी डॉट कॉम नुमा साईटों पर अवश्य ही आजमाया होगा)। अगर आप ब्लॉगर पर ब्लॉगिंग करते हैं तो अपने प्रोफाईल पृष्ठ पर अपने शहर, प्रदेश, रुचियों को दर्शाते शब्दों पर गौर फरमायें (अगर आपका प्रोफाईल सार्वजनिक नहीं हैं तो <a href="http://www.blogger.com/profile/924053">यहाँ देखें</a>)। सब के सब कड़ियों की शक्ल में तैनात हैं। कड़ी खड़खड़ाने की देर है कि दोस्ती का हाथ बढ़ाते सभी मिलते जुलते प्रोफाईल हाज़िर। अजी ज्यादा दूर क्या जाना! आपके नज़दीकी पुस्तकालय में किताबें भी तो श्रेणियों में जमीं हैं, ये लोग वर्षों से <a href="http://en.wikipedia.org/wiki/Dewey_Decimal_Classification">डेवी की डेसीमल वर्गीकरण पद्धति</a> का प्रयोग कर रहे हैं। और तो और, कई चिट्ठों में चिट्ठे भी वर्गीकृत होते हैं।</p>
<p>मामला साफ है हुज़ुरे आला। यह सभी उदाहरण टैग के ही हैं। टैगिंग ऐसे अलाहदा रुपों में हमारे जीवन में हमेशा सम्मिलित रही है। एक तरह से देखा जाये तो टैग हाईपरलिंक या कड़ी की तरह ही हैं, पर यह हैं एक ऐसी खास कड़ी जो, गूगल खोज की तरह, खड़खड़ाते ही टैग के आधार पर मिलते जुलते तमाम चिटठा प्रविष्टियाँ खोज कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर दे। तो लीजिये समझ समझ के समझने के लिये एक समझदारी का काम करते हैं और लिखते हैं परिभाषा टैगिंग कीः </p>
<blockquote><p>टैग एक विशेष कीवर्ड है जो किसी वर्ग या विषय का द्योतक है। जब जाल पर उपस्थित किसी दस्तावेज़ (जो कि अक्सर ब्लॉग प्रविष्टि होती है पर यह लेख, संगीत, चित्र, वीडियो कुछ भी हो सकता है) को किसी लेबल या लेबलों से चिन्हित कर दिया जाता है, जिससे लोग इस दस्तावेज़ को टैग द्वारा खोज सकें, तो इसे टैगिंग कहा जाता है। उद्देश्य यह कि टैग के सहारे विषय से सम्बद्ध दस्तावेज़ों की खोज आसान करना।</p></blockquote>
<h1>ये पब्लिक है, ये सब जानती है</h1>
<p><img hspace="5" height="134" width="300" vspace="5" border="0" align="left" alt="John Lebkowsky Quote" title="John Lebkowsky Quote" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/jon-lebkowsky-quote.jpg" />आपको शायद अंदाज़ा होगा कि टैगिंग का इतना जोर शोर से क्यों ज़िक्र हो रहा है जाल पर। शायद इसलिये कि यह किसी आइंस्टीनी व्यक्ति या बड़ी कंपनी ने नहीं वरन् आम लोगों ने ईजाद किया है। टैग क्या होंगे, कितने होंगे, यह सब आप और हम ही तय करते हैं। जैसा कि <a title="Weblogskey" target="_blank" href="http://www.weblogsky.com/"><strong>वेबलॉग्सकी</strong></a>  के रचयिता <strong>जॉन लेबकॉस्की</strong> कहते हैं, </p>
<blockquote><p>&quot;हालांकि टैगिंग का जन्म निजी वर्गीकरण या श्रेणियों के अनुसार सूचना को व्यवस्थित करने के झटपट माध्यम के रूप में हुआ पर डिलिशियस तथा फ्लिकर जैसे जालस्थलों पर जहाँ आपकी व्यक्तिगत वर्गीकरण योजना अन्य मेम्बरान देख सकते थे हम साझे वर्गीकरण का उद्भव देख रहे हैं। तो अब पेशेवर लोगों द्वारा तैयार कड़े वर्गीकरण के अलावा हमारे पास है सामुदायिक साझे ज्ञान पर आधारित तरल और लगातार विकसित हो रहा वर्गीकरण।&quot;</p></blockquote>
<p>देखा जाये तो टैगिंग कोई बहुत बड़ा तकनीकी आविष्कार भी नहीं है। आखिर ये है भी तो इंसान की एक सी चीज़ों इकठ्ठा करने की चाह को व्यक्त करने का एक तरीका। याद कीजिये आपके माचिस के लेबलों, गोलियों, चूड़ियों के टुकड़ों और बबल गम स्टिकरों के संग्रह। टैगिंग संभवतः इसी चाहत का डिजिटल रूप है। </p>
<p>समाज शास्त्री इस दृग्विषय को <a href="http://www.adammathes.com/academic/computer-mediated-communication/folksonomies.html">फोक्सोनॉमी</a> पुकारने लगे हैं, ये है पब्लिक यानि सामान्य, गैर निपुण लोगों की वर्गीकरण पद्धति। कीवर्ड के सहारे कोलेबोरेटिव (सहयोगी ) वर्गीकरण या सामाजिक बुकमार्किंग का दूसरा नाम है फोक्सोनॉमी। फोक्सोनॉमी के कई रूप हैं, <a href="http://del.icio.us/">डिलिशियस</a> और <a href="http://www.simpy.com/">सिम्पी</a> जैसे सामाजिक बुकमार्किंग जालस्थल, <a href="http://www.flicker.com/">फ्लिकर</a> जैसे फोटो साझा करने के स्थल, साझे लक्ष्य तय करने वाला जालस्थल <a href="http://43things.com/">43 थिंग्स</a>, समाचार साझा करने वाला आरएसएस एग्रीगेटर 24आईज़ आदि। फोक्सोनॉमी की खास बात है साझे काम से उपजता सामाजिक जुड़ाव। पर सिर्फ किसी वस्तु कि लेबल कर लेना भर टैगिंग नहीं है। मसलन, लेबल बनाने की सुविधा गूगल मेल में भी है पर ये फोक्सोनॉमी नहीं है क्योंकि ये लेबल सार्वजनिक नहीं होते हैं। मतलब यह है कि महज़ वर्गीकरण ही फोक्सोनॉमी नहीं है, वर्गीकरण साझा होना चाहिये। शायद प्राईवेट बुकमार्क्स भी इसी श्रेणी में आते हों।</p>
<h1>एक दुनिया बिना नियमों की</h1>
<div id='pullQuoteR'>किसी का इस्राईल, किसी और का फलस्तीन है। किसी का स्वतंत्रता संग्रामी किसी अन्य के लिये आतंकवादी हो सकता है। टैगिंग ऐसे मामलों मे गफलत पैदा कर सकते हैं।</div>
<p>ब्लॉगिंग की ही तरह टैगिंग के क्षेत्र में भी कोई स्थापित नियम नहीं हैं, जो हैं सो स्वयमेव बनते जा रहे हैं। ज़ाहिर है परम्परावादी आशंकित है कि इससे व्यवस्था में अराजकता न फैल जाये। पर वास्तविक परिणाम बता रहे हैं कि बिंदास लेबलिंग की इस अव्यवस्था से ही व्यवस्था पनप रही है। डिलिशियस पर प्रयोक्ता अपने पसंदीदा जालस्थलों को टैग करते हैं। आगंतुकों के लिये टैग आधारित खोज उन्हें किसी भी विषय से संबंधित जानकारियों और वार्तालापों से रूबरू कराती है, साथ ही वे यह भी जान सकते हैं कि समुदाय में कौन से जालस्थल ज्यादा लोकप्रिय हैं। फ्लिकर पर टैग चित्रों का वर्गीकरण करते हैं। एमेज़ॉन द्वारा प्रायोजित 43 थिंग्स पर लोग अपने लक्ष्य, संकल्प और योजनायें पोस्ट कर समान महत्वाकाक्षाओं के लोगों से मेल बढ़ा सकते हैं। नियम भले न हों पर अच्छे टैगर यह ध्यान रखते हैं कि टैग विषय को चिन्हित करने के लिये सर्वाधिक उपयुक्त हों, अपने हर चित्र को यदि आप &quot;फोटो&quot; टैग दें तो उसे ढुंढना भूसे के ढेर में से सुई तलाशने जैसा ही होगा। टैग जितना सही होगा खोज उतनी ही परिशुद्ध होगी।</p>
<p>टैगिंग के बारे एक और आशंका जतायी जाती है इसके गलत प्रयोग के बारे में। किसी का इस्राईल, किसी और का फलस्तीन है, किसी का स्वतंत्रता संग्रामी किसी अन्य के लिये आतंकवादी हो सकता है। टैगिंग ऐसे मामलों मे गफलत पैदा कर सकते हैं। द वेबलॉग हैन्डबुक की लेखिका तथा जाल पर नीतिगत व्यवहार की वकालत करती रहीं <strong>रेबेका बल्ड</strong> के साथ हुए एक <a href="http://www.rebeccablood.net/archive/2005/01.html#11technorati">वाकये</a>, जब मार्टिन लूथर किंग दिवस पर टेक्नोराती पर <a href="http://www.technorati.com/tag/MLK">MLK</a> टैग की खोज के दौरान उन्हें लूथर किंग पर आपत्तिजनक पोस्टर चित्र दिखा, <img hspace="5" height="147" width="300" vspace="5" border="0" align="right" title="Ben Hammersley Quote" alt="Ben Hammersley Quote" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/ben-hammersley-quote.jpg" />के बाद से उन्हें लगता है कि टेक्नोराती जैसे जालस्थलों को इसका ध्यान रखना चाहिये। हालांकि पत्रकार और लेखक <strong><a href="http://www.benhammersley.com/">बेन हैमर्सले</a></strong> इसे समस्या नहीं मानते, </p>
<blockquote><p>&quot;वर्गीकरण का मतलब सहमति नहीं है। कोई अगर लूथर किंग से संबंधित जातिवादी दस्तावेज, जो शायद आपत्तिजनक हों, &quot;मार्टिन लूथर किंग&quot; नाम से टैग करता है तो यह गलत वर्गीकरण तो नहीं है। मैं भले यह पसंद न करूं पर संबंध नकार तो नहीं सकता। और मैं होता भी कौन हूँ कि दूसरों के वर्गीकरण सेंसर कर अपने राजनैतिक विचारों का ही प्रतिपादन करूँ?&quot;</p></blockquote>
<p>पर जिस तरह से टैगिंग की प्रसिद्घि बढ़ रही है क्या ये माध्यम भी स्पैमर्स से बचा रह पायेगा? किसी न किसी दिन तो ब्लॉग, सेक्स जैसे किसी मकबूल टैग पर आप क्लिक करेंगे और आप पर शरीर के अंगों को बढ़ाने की दवाओं की फेहरिस्त जबरिया थोप दी जायेगी। जॉन लेबकॉस्की इस बारे में कोई अनुमान लगाने को तैयार नहीं। &quot;मैं उन्हें कोई आईडिया नहीं देना चाहता&quot;, वे स्पष्ट कहते हैं। </p>
<h1>क्या टैगिंग दुनिया बदल देगी?</h1>
<p>क्या ब्लॉगिंग ने बदल दी है दुनिया? दरअसल, ऐसे सवालों के जवाब देना दुष्कर है। अभी तो इसे परिपक्व होना है। रेबेका कहती हैं, </p>
<blockquote><p>&quot;टैगिंग एक रोचक विचार है पर दिक्कतें भी कम नहीं। सबसे बड़ी समस्या है अप्रत्याशित नतीजों की और यह कि टेक्नोराती असंगत और अपमानजनक वस्तुओं को छानने की जिम्मेवारी किस हद तक उठाने को तैयार है। मैंने तो शुरुवात में ही इस का प्रयोग करना बंद कर दिया क्योंकि यह काम ही नहीं करते थे। मूलतः टेक्नोराती मूवेबल टाईप ब्लॉग से श्रेणियाँ उठाकर प्रविष्टयों को टैग कर रहा था, मेरे विचार से कीवर्ड ज्यादा उचित होते इस काम के लिये। चुंकि मेरी साईट मैं स्वयं बनाती हूँ अतः मैं टैग भी यों ही डालती थी पर टेक्नोराती एक भी टैग पहचान नहीं पाया। इससे ऐसा लगता है कि यह सब बातें बस बढ़ा चढ़ा कर पेश की जा रही हैं। जब तक ये लोग तकनीकी समस्याओं से निजात नहीं पा लेते, कुछ सॉफ्टवेयर निर्माताओं के अलावा शायद ही कोई इनका प्रयोग करे।&quot;</p></blockquote>
<p><img hspace="5" height="116" width="300" vspace="5" border="0" align="left" alt="Rebecca Blood Quote" title="Rebecca Blood Quote" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0505/rebecca-blood-quote.jpg" />तो क्या ब्लॉग की श्रेणियाँ टैग नहीं हो सकतीं? रेबेका जैसे <a href="http://www.corante.com/many/archives/2005/01/14/technorati_tags_take_2.php">कई कहते हैं</a> नहीं, क्योंकि प्रथम तो ब्लॉग की श्रेणियाँ ही ज्यादा नहीं होतीं और ज्यादातर हर ब्लॉग पर एक जैसी ही होती हैं, जैसे राजनीति, संगीत या तकनालाजी। दूजे ये बड़े ही व्यापक शब्द हैं और खोज में खास सहायता कर पायेंगे ऐसा लगता तो नहीं है। </p>
<p>बहरहाल, आप टेगिंग पसंद करें या नापसंद इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। बेन का भी यही विचार है, </p>
<blockquote><p>&quot;मेरा ख्याल है कि टैगिंग काफी गंभीर और बड़ी खोज है। वर्गीकरण हमेशा से टेड़ी खीर रही है। जब ढेर सारी चीजें वर्गीकृत करनी हों तो सामान्य पद्धतियां असक्षम हो जाती हैं। अंतर्जाल जैसे आकार के लिये किसी पद्धति में दरकार सारे गुण टैगिंग में हैं। हालांकि यह अभी पूर्णतः परिपक्व नहीं हुआ है पर इसके आधार पर कई रोचक एप्पलीकेशन्स बन सकते हैं।&quot;</p></blockquote>
<p>तो हो सकता है कि कुछ सालों में अपने कंप्युटर पर आप फोल्डरों में जानकारी रखने की बजाए उन्हें टैग करें और डेस्कटॉप पर फोल्डरों के शार्टकट की जगह हों टैग की कड़ियाँ। हर पल बदलते अंतर्जाल के असर क्या रंग लायें क्या पता। मेरा कहा माने जनाब! टैगिंग से दोस्ती बनाये रखने में ही समझदारी है। ठीक कहा न ललिता जी? </p>
<div id="section-teaser" style="padding: 10px; background-color: #e3f4e3; font-size: 110%; text-align: left">
<h1>टैग की दुनिया</h1>
<p>टैग बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं बस कोशिश करें कि लापरवाही से न बनाये जायें। टैग का विषय से सबंधित होना उतना ही ज्ररूरी जितना कि भोजन में नमक का होना। उदाहरण के लिये इस आलेख के लिये टैग बनाना हो तो &quot;टैगिंग&quot; जैसे एकाकी कीवर्ड या फिर &quot;टैगिंग परिचय&quot; जैसे संयुक्त कीवर्ड का प्रयोग किया जा सकता है। ऐसे सभी टैगों को आप कॉमा द्वारा पृथक कर लिख सकते हैं (संयुक्त कीवर्ड वाले टैग के गिर्द कोटेशन चिन्ह लगाना न भूलें)।</p>
<p>ये तो हुई टैग लिखने की बात। टैग बनाने के लिये डिलिशियस तथा फ्लिकर पर तो सुविधायें दी ही गईं हैं। यदि आप इन्हें अपने ब्लॉग की प्रविष्टि से साथ देना चाहते हों तो इन्हे स्वयं ही बनाना होगा। निराश न हों कई लोग आपकी मदद के लिये तरीके ईजाद कर चुके हैं। टेक्नोराती पर भी  <a href="http://www.technorati.com/help/tags.html">काफी जानकारी</a> सुलभ है।  <a href="http://movabletype.org/">&quot;मूवेबल टाईप</a>&quot; ब्लॉग पर टेक्नोराती टैग बनाने के लिए एक सुविधा  <a href="http://www.johnsjottings.com/archives/2005/01/14/technorati_tags_in_movable_type.html">जॉन</a> ने बनायी हैं। अगर आप अपनी प्रविष्टि के साथ कीवर्ड डालते रहे हैं तो यह सर्वथा उपयुक्त है। ब्लॉगर वाले  <a href="http://oddiophile.com/index.php?p=29">यहाँ उपलब्ध</a><a href="http://www.bookmarklets.com/">बुकमार्कलेट</a> का प्रयोग कर सकते हैं। ये बुकमार्कलेट आपके द्वारा प्रविष्ट कीवर्ड के आधार पर आपको टेकनोराती के प्रारूप में टैग की कड़ियां बना कर देता जिसे आप अपनी ब्लॉग प्रविष्टि में जस का तस चस्पा कर सकते हैं। एक और तरीका  <a href="http://www.drunkandretired.com/2005/01/technorati-tags.html">इधर</a> है। </p>
<p>वर्डप्रेस वाले हैरान न हों, ऐसा ही प्लगइन उनके लिये  <a href="http://dev.wp-plugins.org/wiki/TechnoTag">यहाँ</a> और  <a href="http://metalllama.host.sk/index.php/archives/2005/01/15/technorati-tags-plugin-for-wordpress/">यहाँ</a> उपलब्ध हैं। अगर बात टेक्नोराती पर टैग खोजने की है तो उनके जालस्थल ले अलावा इस  <a href="http://rich.headsnet.com/archives/2005/01/14/63">बुकमार्कलेट</a> का भी प्रयोग कर के देखें।</p>
<p>वैसे इन औजारों कि बिना भी टेक्नोराती के टैग बनाना कोई तोप नहीं है। आप इसे सामान्य कड़ियों जैसा ही लिखते हैं। कड़ी ज़रुरी नहीं कि टेक्नोराती के जालस्थल की हो, बस खास ध्यान ये रखना है कि इसमें rel=&quot;tag&quot; ज़रूर दिया गया हो, इस प्रकार सेः&lt;a xhref= &quot;http://technorati.com/ tag/[टैग का नाम]&quot; rel=&quot;tag&quot;&gt;[टैग का नाम]&lt;/a&gt; </p>
<p>&quot;टैग का नाम&quot; कुछ भी हो सकता है, पर जैसा कि हमने पहले कहा है,टैग जितना सही होगा खोज उतनी ही परिशुद्ध होगी। एक बार टैग बन गया तो टेक्नोराती को इसके बारे में सूचित करने के लिये जालस्थल को स्वयं  <a href="http://technorati.com/ping.html">पिंग</a> कर दें (ब्लॉगर के सिवा, ज्यादातर ब्लॉगिंग औजार पिंग करने की सुविधा देते हैं, ज्यादा जानकारी  <a href="http://technorati.com/developers/ping/">यहाँ</a> है।)। </p>
<p>यदि आप हर पोस्ट के साथ टैग नहीं देना चाहते तो आपके ब्लॉग की कैटेगरी यानी श्रेणियाँ भी टैग की शक्ल अख़्तियार कर सकती हैं। टेक्नोराती पर  <a href="http://technorati.com/help/tags.html">जानकारी</a> दी गई है कि कैसे मूवेबल टाईप, टाईपैड, वर्डप्रेस इत्यादि के प्रयोक्ता अपनी क्षमल फीड में कुछ और जानकारी डालकर श्रेणियाँ को टैग का रूप दे सकते हैं। </p>
</p></div>
<hr />
<ol>
<li>मोब्लॉग, आडब्लॉग और व्लॉग क्रमशः मोबाईल ब्लॉग (मोबाईल फोन से ब्लॉगिंग करने की सुविधा युक्त), आडियो ब्लॉग (जिसमें ब्लॉग प्रविष्टि छोटी आडियो फाइल के रुप में होती है, जिसे आप सुन सकते हैं), तथा विडियो ब्लॉग (जिसमें ब्लॉग प्रविष्टि व्हिडियो फाइल के रुप में होती है, जिसे आप सिनेमा क्लिप की तरह देख सकते हैं) के लिये सामान्यतः प्रयोग किये जाने वाले संक्षिप्त रुप हैं।</li>
<li>सोशियल नेटवर्क ब्लॉग्स के लिये प्रयुक्त होने वाला वैकल्पिक शब्द है। ब्लॉग अंतर्जाल पर विचारों को महामारी के रूप में व्यापक करने वाले सामाजिक औजार हैं। ये लेखकों की व्यक्तिगत शैलीयों से जुड़े संवाद के माध्यम हैं जो समान रुचियों वाले लोगों और समूहों के मध्य डिजिटल बातचीत कराते हैं।</li>
</ol>
<p></p>
<div style="margin-top: 0px; padding-top: 0px" id="section-teaser">
<p><strong>अपडेटः</strong> इस आलेख के प्रकाशन के बाद जॉन लेबकॉस्की ने बताया कि टैगिंग पर ही केंद्रित उनके विशेष ब्लॉग <a href="http://tagsonomy.com/">&quot;यू आर इट&quot;</a> का प्रकाशन आरंभ हो चुका हैं।</p>
</p></div>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2178&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0505-nidhi/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>वेबलॉग नीतिशास्त्र</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-saransh</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0305-saransh#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 06:46:46 +0000</pubDate>
		<dc:creator>निरंतर पत्रिका दल</dc:creator>
				<category><![CDATA[सारांश]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/0305saransh/</guid>
		<description><![CDATA[सारांश में पेश करते हैं पुस्तकाँश या पुस्तक समीक्षा। निरंतर के पहले अंक में हमें प्रसन्नता है <strong>रेबेका ब्लड</strong> की पुस्तक &#34;द वेबलॉग हैन्डबुक&#34; के अंश का हिन्दी रूपांतर प्रस्तुत करते हुए। रेबेका 1996 से अंर्तजाल पर हैं, उनका ब्लॉग रेबेकाज़ पॉकेट खासा प्रसिद्ध है।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<p>चिट्ठे ऑनलाइन जगत के विद्रोही स्वर हैं। सुदूर फैले अपने पाठकों में सूचनाओं को छान-फटक कर करीने से परोसने की नई तरक़ीब, इसकी सबसे बड़ी शक्ति तो है ही, इसने मुख्यधारा के मास मीडिया से इतर अपना एक अलग, खास, महत्वपूर्ण स्थान भी बना लिया है। बगैर किसी का आभार उपकार लिए, चिट्ठे अपने विशेष अंदाज़ में अपनी अलग कसौटियों सहित सूचनाओं और उन पर की गई टिप्पणियों का खासा प्रसार कर रहे हैं।</p>
<p><img title="Saransh" src="http://www.nirantar.org/images/stories/excerpts.gif" border="0" alt="रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग से अंश" hspace="2" vspace="2" width="135" height="140" align="right" />चिट्ठा नेटवर्क का सामर्थ्यवान प्रभाव ही शायद इस बात की वास्तविक वजह हो सकती है जिसके कारण मुख्यधारा के समाचार संगठनों ने भी इस दृग्विषय की तफ्तीश करना प्रारंभ किया है, तथा संभवत: यही चिट्ठों को पत्रकारिता का रूप मानने वाली चर्चा का सबब भी है। चिट्ठाकार नियंत्रण तथा प्रभाव के संदर्भ में भले ही न सोचते हों, परंतु व्यवसायिक मीडिया जरूर यह सोचता है। मास मीडिया की सबसे बड़ी चाह होती है विस्तृत पाठक-श्रोता-दर्शक। विज्ञापनों से प्राप्त राजस्व, जो व्यावसायिक प्रकाशनों या प्रसारणों के लिए जीवन जल होते हैं, पाठक-श्रोता‍-दर्शक की संख्या पर निर्भर करता है। व्यापार के दृष्टिकोण से विज्ञापकों के लिए दर्शक जुटाना ही विषय-सामग्री का मुख्य कार्य होता है, भले ही माध्यम कागज़ हो या टेलीविज़न।</p>
<p>पत्रकारों &#8212; जो समाचारों की रपट देते हैं &#8212; को भली प्रकार यह पता रहता है कि अपने अपने एजेंडे को आगे बढ़ाने को उत्सुक व्यापार जगत तथा सत्ता के दलालों पर निर्भर उनके तंत्र में दुरुपयोग की संभावनायें निहित हैं। उनके नैतिक आर्दश की रचना पत्रकारिता के दायित्व के दायरा तय करता और एक स्पष्ट आचार संहिता पेश करता है जिससे समाचारों की ईमानदारी बनी रह सके।</p>
<p>चिट्ठों की, जो अव्यावसायिक लोगों द्वारा सृजित किए जाते हैं, ऐसी कोई संहिता नहीं होती और प्राय: चिट्ठाकारों को व्यक्तिगत रूप से अपने अव्यवसायी स्तर का गुमान रहता है। “हमें किसी फालतू सत्य परीक्षक की दरकार नहीं” यह अवधारणा आम रूप से दिखती है, गोया कि अशुद्धता कोई गुण हो।</p>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है।</div>
<p>मुझे एक मौलिक धारणा प्रस्तावित करने की अनुमती दें: चिट्ठों की सबसे बड़ी ताकत &#8212; सेंसर, मध्यस्थता और नियंत्रण रहित इसकी आवाज़ &#8212; इसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। भले ही समाचार स्रोत विज्ञापनदाताओं के प्रति कृतज्ञता रखें तथा रिपोर्टर के लिए भी बेहद ज़रूरी होता हो कि अपने स्रोतों से अच्छे संबंध बनाए रखें ताकि काम चलता रहे; परंतु चुँकि वे भी मूलतः व्यवसाय ही हैं &#8212; जहाँ तनख्वाह देनी होती है, विज्ञापकों को प्रसन्न रखना होता है तथा पाठक-श्रोता-दर्शक को आकर्षित कर उन्हें अपने साथ बनाए रखना होता है &#8212; व्यावसायिक समाचार संगठनों का निहित स्वार्थ होता है कि वे कतिपय मानकों को संभालें रखें जिससे पाठक उनके प्रकाशनों के खरीददार बने रहें और विज्ञापन दाता उन्हें विज्ञापनों से नवाज़ते रहें। केवल न्यूनतम खर्च तथा कोई महत्वपूर्ण व्यवसायिक लाभ की उम्मीद न होने के कारण चिट्ठों के पास ऐसी कोई प्रेरणादायक चीज़ें नहीं होतीं।</p>
<p>वही चीज़ें जो व्यावसायिक समाचार निर्गमों की विश्वसनीयता से समझौता प्रतीत हों, वह किसी स्तर की पत्रकारिता के मापदण्डों के लिए प्रेरणादायक होती हैं। और वही चीज़ें जो चिट्ठों को वैकल्पिक समाचार स्रोत के रूप में इतना महत्वपूर्ण बनाती है, यानि पर्यवेक्षकों की कमी तथा तमाम नतीजों से मुक्ति, उनकी ईमानदारी तथा उनके मूल्यों से समझौता भी कर सकती हैं। इस बात के पूरे चिन्ह दृष्टव्य हैं कि जैसे-जैसे इनकी संख्या में वृद्धि होगी और माध्यम के बारे में जागरूकता फैलेगी चिट्ठे और ज़्यादा असर छोड़ेंगे। यह सही नहीं है, जैसा कि कुछ लोग दावा करते हैं कि, जाल (नेटवर्क) ग़लत जानकारियों को फैलाता रहेगा या फिर कि आम जानकारी में सत्य हमेशा ही छन कर बाहर आएगा। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं चूँकि लोगों को उन्हें फैलाने में आनंद आता है। वास्तविक दुनिया हो या ऑनलाइन, भूल-सुधार विरले ही ध्यान आर्कषित करते हैं, उनमें वो मज़ा जो नहीं होता।</p>
<p><img title="Weblog Handbook" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/weblog_handbook.jpg" border="0" alt="Weblog Handbook" hspace="8" vspace="8" width="250" height="307" align="left" />चिट्ठों की दुनिया में नीतिशास्त्र की लगभग कोई चर्चा नहीं है: स्वतन्त्र व्यक्ति को यह बताया जाना कि उन्हें क्या करना चाहिए, खासा नागवार गुजरता है। परंतु मैं छ: नियम प्रस्तावित करूँगी जो मेरे विचार में हर प्रकार के ऑनलाइन प्रकाशकों के लिए नैतिक आचरण स्थापित करता है<sup><strong>1</strong></sup>। मुझे उम्मीद है कि चिट्ठा समुदाय यहाँ बताए गए नियमों पर गंभीरतापूर्वक विचार करेगा; आने वाले समय में, और अनुभवों के साथ हो सकता है समुदाय नए नियमों को शामिल करने या फिर हमारे मानकों की संहिता बनाने की ज़रूरत महसूस करे। कम से कम मैं यह तो आशा रखती हूँ कि ये सिद्धान्त हमारी जिम्मेदारियों तथा हमारे समग्र व्यवहार के समाज पर प्रभाव के बारे में परिचर्चा की प्रेरणा देंगे।</p>
<p>पत्रकारिता आचार संहिता का उद्देश्य होता है कि समाचार रपटों में सत्य और परिशुद्धता कायम रहे। तुलनात्मक रूप से, यहाँ पर दिया गया प्रत्येक सुझाव चिट्ठाकारी के हर पहलू में पारदर्शिता -‍- जो चिट्ठों के विलक्षण गुणों तथा उसकी सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है &#8212; लाएगा। यह उम्मीद करना अवास्तविक होगा कि प्रत्येक चिट्ठाकार संसार की अपक्षपाती छवि सामने रखे, परंतु यह अपेक्षा रखना बहुत ही विवेकी है कि वे अपने स्रोत, पूर्वाग्रह तथा व्यवहार के बारे में स्पष्टता बनाए रखें।</p>
<p>मेरे बेहतर प्रयासों के बावजूद उन चिट्ठाकारों जो अपनी इस खोज में लगे हैं कि उन्हें पत्रकार माना जाना चाहिए को इन नियमों के पालन की अधिक आवश्यकता है। हो सकता है कि समाचार संस्थाएँ किसी दिन किसी चिट्ठे (या किसी चिट्ठा-प्रविष्टि) को विश्वस्त स्रोत के रूप में इंगित करें, परंतु यह तभी होगा जब चिट्ठे समग्र रूप से यह प्रर्दशित करने में सक्षम होंगे कि उनकी जानकारियों के संग्रहण और वितरण में ईमानदारी है तथा उनके ऑनलाइन व्यवहार में अनुरूपता है।</p>
<p>कोई भी चिट्ठाकार जो अपने लिए एक व्यवसायिक पत्रकार की सुविधाएँ और सुरक्षाएँ की उम्मीद रखता है उसे इन सिद्धातों से भी आगे जाना होगा। अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जुड़े हैं; अंतत: व्यक्तिगत व्यवसायिकता और मानक आचार संहिताओं का सावधानी पूर्वक अनुसरण ही समाज और क़ानून के सामने उसका स्तर बना पाएगा। शेष सभी के लिए, मुझे विश्वास है, कि निम्न मानक यथेष्ट होंगे:</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">1. सिर्फ उसी चीज़ को वास्तविकता के रूप में प्रकाशित करें जिस की सचाई पर आपको विश्वास हो।</h3>
<p>यदि आपका कथन अनुमान है तो ऐसा स्पष्ट करें। यदि आपके पास ऐसे कारण हैं जिससे आपको विश्वास हो कि कुछ ग़लत है तो या इसे पोस्ट ही न करें या अपने कारणों को दर्ज करें। यदि आप कोई दावा कर रहे हैं तो नेक इरादे से करें; इसे तभी सत्य घोषित करें जब आपकी पूर्ण जानकारी में ऐसा हो।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">2. यदि संदर्भित सामग्री ऑनलाइन मौजूद हो तो उसकी कड़ी भी दें।</h3>
<p>संदर्भित वस्तुओं की कड़ी देने से पाठकों को इस बात की सुविधा मिलती है कि वे आपके कथन की परिशुद्धता तथा परिज्ञान को जाँच सकें। सामग्रियों का संदर्भ देना परंतु कुछ चुनी हुई कड़ियाँ ही देना जिससे आप सहमत होते हैं जोड़ तोड़ करने जैसा होगा। ऑनलाइन पाठकों को, जहाँ तक संभव हो, संपूर्ण सत्य पाने का हक है &#8212; अंर्तजाल के ऐसे इस्तेमाल से, पाठकों को सूचनाओं का निष्क्रिय नहीं, वरन् सूचना का सक्रिय ग्राहक बनने की शक्ति प्रदान करता है। यही नहीं, स्रोत सामग्रियों की कड़ियाँ देना ही वह ज़रिया है जिससे हम जानकारियों तथा ज्ञान का एक विशाल, नई और एकीकृत नेटवर्क बना रहे हैं।</p>
<p>किन्हीं विरले अवसरों पर जब लेखक संदर्भ देना तो चाहता है, परंतु नैतिकता के नाते ट्रैफिक को उन जालस्थलों पर जाने नहीं देना चाहता (उदाहरण के लिए, कोई द्वेष भरा जालस्थल) तो उसे उस जालस्थल का नाम या पता (यू.आर.एल) टंकित करना चाहिए (परंतु लिंक नहीं) तथा अपने इस निर्णय के कारणों का भी खुलासा करना चाहिए। इससे प्रेरित पाठकों को वह आवश्यक जानकारी मिल जाएगी जो जालस्थल को खोजने के लिए उन्हें ज़रूरत है ताकि वे स्वयं अपना निर्णय ले सकें। ऐसी व्यूह रचना लेखक को अपनी पारदर्शिता (और इस प्रकार उसकी ईमानदारी) बनाए रखने की अनुमती तो देता ही है, साथ ही ऐसे प्रयोजनों को समर्थन को अस्वीकृत भी करता है जिसे वह घृणित मानें।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">3. गलत जानकारियों को सार्वजनिक रूप से सुधारें।</h3>
<p>यदि आप को पता चलता है कि आपने किसी ऐसी सामग्री की कड़ी दी है जो कि सही नहीं है तो इसे नोट करें तथा ज़्यादा सही रपट की कड़ी दें। यदि आपका स्वयं का कोई कथन गलत सिद्ध हो जाता है तो अपने गलत कथन तथा सत्य की टीप लिखें। आदर्श परिस्थिति में ऐसे सुधार आपके ताज़ातरीन चिट्ठों में, मूल प्रविष्टि में जोड़े गए टीप के रूप में प्रकाशित होने चाहिएँ। (यह याद रखें कि चिट्ठा प्रविष्टियों को जब एक बार पोस्ट कर दिया जाता हैं, खोज इंजिन उन्हें याद रख लेते हैं तथा चिट्ठे में मौजूद असत्यता को फैलाते रहते हैं भले ही आप कुछ दिनों बाद जानकारी सुधार देते हैं।) यदि आप अपनी पिछली प्रविष्टियों में कोई सुधार नहीं करना चाहते हैं तो कम से कम बाद की प्रविष्टियों में टीप अवश्य डालें।</p>
<p>चिट्ठों में सुधार का एक बहुत ही सुस्पष्ट तरीका बोइंग बोइंग चिट्ठे के अंशदाताओं में से एक, कोरी डॉक्टोरोव अपनाते हैं। वे अपनी लिखी हुई गलतियों को मिटाने के बजाए, वहीं पर काट देते हैं तथा सही जानकारी वहीं पर आगे जोड़ देते हैं। पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि बिल कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है। (एच.टी.एम.एल में इसे ऐसे करें: पाठक एक झलक में ही देख लेता है कि &lt;strike&gt;बिल&lt;/strike&gt; कोरी ने पहले क्या लिखा था और यह कि उन्होंने प्रविष्टि को ऐसी जानकारी से अपडेट किया है जो उन्हें ज्यादा सही लगता है।)</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">4. प्रत्येक प्रविष्टि को यह मान कर लिखें कि उसे बदला नहीं जा सकेगा; किसी भी प्रविष्टि में भले ही आप कुछ अतिरिक्त जोड़ लें परंतु उसे नए रूप में लिखें या मिटाएँ नहीं।</h3>
<p>चिट्ठों को सोच-समझ कर पोस्ट करें। यदि आप प्रत्येक प्रविष्टि पर दृढ़ता पूर्वक अपना प्रयास व्यय करेंगे, तो आप अपनी व्यक्तिगत तथा पेशेवर ईमानदारी को बनाए रख सकेंगे।</p>
<div id="pullQuoteR">प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है।</div>
<p>प्रविष्टियों में परिवर्तन करना या उन्हें मिटाना जाल की ईमानदारी को नष्ट करता है। अंर्तजाल को इस तरह रुपाकार दिया गया है कि सभी जुड़े रहें; वस्तुत: चिट्ठों की स्थाई कड़ी अन्यों को जुड़ने का आमंत्रण है। कोई भी जो उस दस्तावेज़ पर टिप्पणी करता है या उद्धत करता है, वह उस दस्तावेज़ के अपरिवर्तित स्वरूप पर निर्भर करता है। प्रमुखता से परिशिष्ट जोड़ देना अंर्तजाल पर कहीं भी किसी भी जानकारी को सुधारने का श्रेष्ठ तरीका है। यदि परिशिष्ट जोड़ना प्रायोगिक नहीं है, जैसे कि कोई निबंध जिसमें ढेरों गलतियाँ हों, तो परिवर्तनों की तारीख तथा परिवर्तन की प्रकृति के संक्षिप्त विवरणों सहित टीप देना चाहिए।</p>
<p>यदि आप समझते हैं कि यह कुछ ज़्यादा ही कर्तव्यनिष्ठता है, तो ज़रा उस लेखक की स्थिति पर विचार करें जो एक ऑनलाइन दस्तावेज़ को किसी निश्चित घोषणा के लिए इंगित करता है। यदि यह दस्तावेज़ परिवर्तित हो जाता है या मिटा दिया जाता है &#8212; और खासकर यदि परिवर्तनों की टीका नहीं दी जाती है &#8212; तो उस लेखक के विचार बेवकुफ़ाना बन जाएंगे। किताबें बदलती नहीं हैं, समाचार पत्रों में प्रकाशित लेख अपरिवर्तनीय होते हैं। कागज पर नए संस्करणों को ऐसे ही बतलाया जाता है।</p>
<p>साझा ज्ञान का जो जाल हम बना रहे हैं वह कभी भी किसी नवीनता से ज्यादा नहीं माने जाएंगे जब तक कि हम अपने प्रकाशनों का स्थायी लेख-प्रमाण तैयार कर इनकी ईमानदारी की सुरक्षा नहीं करते। जाल को लाभ तभी होता है जब ऐसी प्रविष्टियाँ को भी, जो बदलते माहौल में अप्रासंगिक हो जातीं हैं, ऐतिहासिक लेख-प्रमाण मान कर जस का तस छोड़ दिया गया हो। उदाहरणार्थ: एक चिट्ठाकार एक ऑनलाइन आलेख की अशुद्धियों के बारे में शिकायत करता है; लेखक उन अशुद्धियों को सुधार लेता है (तथा उनकी टीप भी दर्ज करता है!); अतः चिट्ठाकार की प्रविष्टि तो अर्थहीन हो गई है &#8212; या कि नहीं? प्रविष्टि को मिटा देने से कुछ ऐसा निष्कर्ष निकलता है कि वह घटना बस हुई ही नहीं &#8212; जबकि वह घटी है। लेख-प्रमाण ज्यादा शुद्ध होगा और इतिहास की उपयोगिता बेहतर अगर चिट्ठाकार अपनी मूल प्रविष्टि के नीचे यह टीप जोड़ें कि लेखक ने सुधार कर दिए हैं और, चिट्ठाकार के ज्ञान के अनुसार, अब आलेख सही है।</p>
<p>इतिहास को फिर से लिखा जा सकता है, परंतु इसे लौटाया नहीं जा सकता। अंर्तजाल पर शब्दों को बदलना या मिटाना तो संभव है, परंतु संभावना सदैव अच्छी नीति हो यह ज़रूरी नहीं। प्रकाशन से पहले सोच-विचार करें तथा जो भी आप लिखते हैं उस पर कायम रहें। यदि आप बाद में यह निर्णय लेते हैं कि आप किसी विषय पर गलत थे, तो उसकी टीप दर्ज करें और आगे बढ़ें।</p>
<p>मैं यह सुनिश्चित करती हूँ कि मैं ऐसे किसी भी विचार को पोस्ट न करूं जिस पर कायम रहने की चाह न हो, भले ही बाद में उन विचारों से असहमत हो जाऊँ। किसी विषय के बारे में चाहे मैं कितनी भी कूपित या उत्तेजित रहूँ, मैं विचारशील और सधा काम करती हूँ। यदि एकाध दिनों में मेरे विचारों में परिवर्तन होते हैं तो मै बस उन्हें दर्ज कर लेती हूँ। यदि किसी बात पर क्षमा माँगने की आवश्यकता हो, तो वैसा करती हूँ।</p>
<p>यदि आपको बाद में पता चले कि आपने कोई गलत जानकारी पोस्ट कर दी है, तो आप अपने चिट्ठे पर सार्वजनिक रूप से इस बारे में लिखें। गलत लिखी गई प्रविष्टि को मिटा देने से आपके पाठकों द्वारा पहले ही पढ़कर ग्रहण की गई मिथ्या जानकारी को सुधारने का कोई जरिया नहीं होगा। एक अतिरिक्त चरण में मूल प्रविष्टि में सुधार करने से यह सुनिश्चित किया जा सकेगा कि भविष्य में गूगल सही जानकारी प्रसारित करेगा।</p>
<p>इस नियम का एकमात्र अपवाद तब है जब आप असावधानीवश अन्य किसी की व्यक्तिगत जानकारी जाहिर कर देते हैं। यदि आपको पता चलता है कि आपने कोई गोपनीयता भंग की है या किसी परिचित का ज़िक्र कर के उसे परेशान किया है, तो यह उचित ही है कि ऐसी अपमानजनक प्रविष्टियों को पूरी तरह मिटा दिया जाए, पर आप यह लिखें कि आपने ऐसा किया है।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">5. अपने कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स को प्रकट करें।</h3>
<p>अधिकांश चिट्ठाकार अपने कार्य तथा व्यावसायिक इंटरेस्ट्स के प्रति पारदर्शी होते हैं। यह कम्प्यूटर प्रोग्रामर की निपुणता है कि किसी पत्रिका में नवीनतम आपरेटिंग सिस्टम के गुणों के बारे में प्रकाशित आलेख पर उसके द्वारा दिए गए विश्लेषणों को विशिष्ट महत्ता प्राप्त होती है। चूंकि चिट्ठों के पाठक आस्था के बल पर बनते हैं, यह प्रत्येक चिट्ठाकार का कर्तव्य है कि जब भी उचित हो वह आर्थिक (या अन्य विशेष विरोधों को) इंटरेस्ट्स को जाहिर करे। एक उद्यमी को किसी प्रस्तावित संसदीय बिल या व्यापारिक विलयन के प्रभाव के विषय में खास अन्तर्दृष्टि हो सकती है; यदि उसे किसी घटना के फलस्वरूप किसी प्रकार का सीधा लाभ पहुँचने वाला हो, तो उसे अपनी टिप्पणी में ऐसा लिखना चाहिए। किसी सेवा या उत्पाद से प्रभावित चिट्ठाकार को अपने चिट्ठे में उस सेवा की हर अनुसंशा के साथ यह बात बतानी चाहिए कि उस कंपनी के शेयर उसके पास हैं। यदि किसी चिट्ठाकार को समीक्षा/परीक्षण के लिए कोई सीडी प्राप्त होती है तो उसे यह बताना चाहिए; उसके पाठक स्वयं यह निर्णय ले सकते हैं कि चिट्ठाकार की अनुकूल समीक्षा उसकी रुचि पर आधारित है या फिर मुफ़्त सीडी प्राप्त करते रहने की इच्छा पर।</p>
<p>अपनी महत्वपूर्ण कंफ्लिक्ट आफ इंटरेस्ट्स का तुरंत ज़िक्र करें और फिर जो बताना है वह लिखें; इससे आपके पाठकों के पास आपकी टीका का आकलन करने हेतु सभी आवश्यक जानकारी उपलब्ध होगी।</p>
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px">6. संदेहास्पद, पूर्वाग्रही स्रोतों की टीप दें।</h3>
<div id="pullQuoteR">चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि किसी भी पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है।</div>
<p>जब कोई गंभीर आलेख किसी अत्यंत पूर्वाग्रही या संदेहास्पद स्रोत से आता है तो चिट्ठाकार का उत्तरदायित्व है कि वह उस साइट के स्वरूप की साफ साफ जानकारी दे जहाँ से वह मिला है। सूचनाओं की तलाश में चिट्ठाकारों को कभी-कभी बहुत ही रोचक, भली प्रकार से लिखे आलेख ऐसे जालस्थलों पर मिल जाते हैं जो बहुत ही पूर्वाग्रही संगठनों द्वारा या कट्टर व्यक्तियों द्वारा चलाए जाते हैं। पाठकों को यह जानने का अधिकार है कि एक आलेख जो प्रथम तिमाही में किए गए गर्भपात के चिकित्सकीय दुष्परिणामों को बताता है वह किसी जीवन का पक्षधर (प्रो-लाइफ), चुनाव का पक्षधर (प्रो-चॉइस) या हर तरह के चिकित्सकीय मध्यस्थताओं का विरोध करने वाले जालस्थल से आया है। इसराईली फिलस्तीनी संघर्ष पर विचारपूर्वक किया गया योग पढ़ने के लायक होगा भले ही वह फिलस्तीनी मुक्ति संघटन के किसी सदस्य द्वारा या किसी यहूदी आन्दोलनकारी द्वारा लिखा गया हो &#8212; परंतु पाठक को अधिकार है कि उसे स्रोत के बारे में पता चले।</p>
<p>यह मान लेना न्यायोचित है कि चतुर भ्रमणशील पाठक के पास इन स्रोतों के स्वभाव के आकलन के पर्याप्त ज्ञान और प्रेरक कारण हैं; परंतु सभी पाठक ऐसा कर पाने में सक्षम हों ऐसा मानना विवेकपूर्ण नहीं होगा। पाठक, कुछ हद तक, अंर्तजाल पर भ्रमण करने के लिए मार्गदर्शन हेतु चिट्ठों पर निर्भर होते हैं। थोड़े मनचले या अति गंभीर एजेंडे वाले स्रोतों से आलेख प्रस्तुत कर देने में बुराई नहीं है; परंतु ऐसे स्रोतों के स्वभाव के बारे में नहीं बताना अनैतिक होगा चूँकि पाठकों के पास ऐसी जानकारी नहीं होती जिससे कि वे आलेख की योग्यता का मूल्यांकन कर सकें।</p>
<p>यदि आप शंकाग्रस्त हैं कि आपके पाठक इसके सन्दर्भ के आधार पर आलेख को पूरी तरह नकार देंगे तो फिर सोचिए कि आप इसकी कड़ी दे ही क्यों रहे हैं। यदि आलेख की योग्यता के विषय में आपको दृढ़ विश्वास है, तो कारण बताएँ और यह बात आलेख को स्वयं साबित करने दें, लेकिन इसके स्रोत के बारे में स्पस्ट रूप से बताएँ। यदि उन्हें एक बार भी यह पता चल जाए कि आपने आलेख का स्रोत छिपाया है &#8212; या स्पष्ट नहीं किया &#8212; जिसके सभी तथ्यों के प्रकाश में संभवतः वे अलाहदा मूल्यांकन करते, आपके पाठक हमेशा के लिए आप पर से भरोसा खो देंगे।</p>
<p><em><a name="1"></a>1: बिन्दु 1 तथा बिन्दु 5 के लिए मैं डेव विनर की आभारी हूँ स्क्रिप्टिंग न्यूज पर <a href="http://scriptingnews.userland.com/backissues/2002/02/04#integrity">वेबलॉगिंग के संदर्भ में ईमानदारी</a> पर उनकी चर्चा के लिए। हालांकि हमारे विचारों में बहुत ज्यादा भिन्नताएँ हैं, इस विषय में उनकी धारणाएँ मेरे स्वयं के विचारों के लिए पंख प्रदान करती हैं।</em></p>
<p class="note">रेबेका ब्लड द्वारा लिखित पुस्तक <a href="http://www.amazon.com/exec/obidos/ASIN/073820756X/ref=nosim/rebeccaspocke-20">द वेबलॉग हैन्डबुकः प्रेक्टिकल एडवाईस आन क्रियेटिंग एंड मेन्टेनिंग योर ब्लॉग</a> से, स्वत्वाधिकार 2002, सर्वाधिकार सुरक्षित; हिन्दी रुपांतरण रेबेका ब्लड की पुर्वानुमति से प्रकाशित। <strong>अनुवादः <a href="http://raviratlami.blogspot.com/">रविशंकर श्रीवास्तव</a> एवं <a href="http://nuktachini.debashish.com/">देबाशीष चक्रवर्ती</a>। प्रस्तुत पुस्तकांश का बिना पुर्वानुमति अंर्तजाल अथवा पुस्तक रूप में पुनः प्रकाशन नहीं किया जा सकता।</strong> रेबेका की पुस्तक की प्रति जीतने के लिए इसी अंक में <a href="http://www.nirantar.org/0305/samasya-purti">समस्या पूर्ति</a> स्तंभ की प्रतियोगिता में भाग लें।</p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2171&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0305-saransh/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
		<item>
		<title>बलॉगिंग विथ परपस</title>
		<link>http://www.nirantar.org/0305-nazariya</link>
		<comments>http://www.nirantar.org/0305-nazariya#comments</comments>
		<pubDate>Tue, 29 Mar 2005 12:12:32 +0000</pubDate>
		<dc:creator>देबाशीष चक्रवर्ती</dc:creator>
				<category><![CDATA[नज़रिया]]></category>
		<category><![CDATA[Blog]]></category>
		<category><![CDATA[Blogging]]></category>
		<category><![CDATA[Collaboration]]></category>

		<guid isPermaLink="false">http://localhost/wp27nirantar/%e0%a4%ac%e0%a4%b2%e0%a5%89%e0%a4%97%e0%a4%bf%e0%a4%82%e0%a4%97-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%a5-%e0%a4%aa%e0%a4%b0%e0%a4%aa%e0%a4%b8/</guid>
		<description><![CDATA[जिह्वा ने जब अपना प्रसिद्ध चिट्ठा बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी। क्या चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस? क्या वे समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते? <strong>नज़रिया स्तंभ</strong> में पढ़िये संपादक की कलम से निरंतर का परिचय और चिट्ठा जगत पर नुक्ता चीनी के साथ पाईए परिचय आमुख कथा का।]]></description>
			<content:encoded><![CDATA[<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारीः सच या मिथक?</h3>
<p><img class="alignleft" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/editorial.gif" border="0" alt="नज़रिया" hspace="8" vspace="8" width="135" height="140" align="left" />कुछ समय पहले मैंने ब्लॉग को बहुत गंभीरता से न लेने कि हिमायत करते हुए अपने <a href="http://nullpointer.debashish.com/the-blog-matrix">अंग्रेज़ी चिट्ठे</a> में लिखा था कि ब्लॉग से सामाजिक बदलाव या जनजागरण जैसे असर की अपेक्षा रखना इस माध्यम को बढ़ा चढ़ा कर पेश करना है। &#8220;मैंने आज नाश्ते मे दलिया खाया&#8221; या फिर &#8220;मैंने आज बॉस की बेटी को किस किया&#8221; नुमा नितांत आत्मकेंद्रित चिट्ठों कि भरमार से मेरी यह राय पुख्ता हुई। मन ही मन यह चाहते हुए कि &#8220;बलॉगिंग विथ परपस&#8221; यानि उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी हकीकत बने मैंने आहिस्ता आहिस्ता यह प्रयास किया कि राजनैतिक समाचारों पर टिप्पणी के अलावा सामाजिक तथ्यों पर भी लिखुं, मूलतः बंगाली होने और अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने के बावजूद हिन्दी बेल्ट में अधिकांशतः रहने के कारण सोचता हिन्दी में था, अतः हिन्दी ब्लॉग शुरु किया। पर जैसी चिट्ठाकारी आप और मैं करते आए हैं यह उस रूप से ज्यादा अलग नहीं है जो समीक्षक ब्लॉगिंग को महज़ पत्रकारिता का ही नया आयाम करार दे कर गढ़ चुके थे।</p>
<div id="pullQuoteR">एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया।</div>
<p>एक साल पहले तक चिट्ठा संसार का माहौल ऐसा ही दिखता था, राजनैतिक कमेन्ट्रियों पर कमेन्ट्स के ईंटगारे से बनी अट्टालिकाएँ। इन चिट्ठों के रचनाकार मुद्दों से ज्यादा बड़े बन गए, इन के कार्टेल मे शामिल होना या चिट्ठे पर टिप्पणी करना फेशनेबल हो गया। विचारों की हिकारत से कुकुरमुत्तों की नाई <a href="http://blogkela.blogspot.com/">केले</a> उग आए। असर ऐसा था कि मुझे कई दफा ये लगा कि अपना चिट्ठा बंद ही कर दूँ, महीनों लिखने का जी नहीं करता। जिह्वा उपनाम से लिखने वाले बंगलौर निवासी लेखक ने जब अपना बेहद <a href="http://www.jivha.com/">प्रसिद्ध चिट्ठा</a> बंद किया तो उनकी उकताहट छुपती न थी, &#8220;आखिरकार ये मेरा ही है, जो चाहे सो करूँ&#8221; की भावना के साथ पटाक्षेप हुआ। <a href="http://www.jish.nu/">जिश मुर्खजी</a> ने कलम रखी तो सुझाव दिया,&#8221;ब्राउज़र के बाहर भी एक दुनिया है, उसका ज़ायका लो&#8221; भारतीय समाज पर ब्लॉग के असर के प्रश्न पर अर्थशास्त्री और ब्लॉगर अतानु दे <a href="http://www.nirantar.org/0305-samvaad">कह उठे</a>, &#8220;मज़ाक कर रहे हो क्या! भारत को कौन बदल सकता है?&#8221; ये नाकारात्मक रूख मेरी इस भावना को बलवती करते रहे हैं कि चिट्ठाकार मूलतः अपने मेट्रिक्स में कैद आत्ममुग्ध अंर्तमुखी लेखक ही हैं बस, वे शायद समाज के सत्य से रूबरू ही नहीं होना चाहते। ब्लॉगिंग आखिरकार कोई सामाजिक आंदोलन तो है नहीं, यह बस &#8220;तू मुझे लिंक कर और मैं तुझे&#8221; की ब्लॉग की मूल भावना पर ही झूल रहा है। अब तक ब्लॉगिंग के गिने चुने रूख ही मुखर हुए हैं,कड़ियों के संकलन,निजी वाकये या 9/11 जैसी आपदाओं पर आपबीतियाँ, समाचारों पर टिप्पणियाँ जैसे चिट्ठे जो शायद किसी और पेशे से जुड़े गैरलेखकों की सृजनात्मकता का पक्ष रखते हैं और दूसरे काफी संजीदा से चिट्ठे जो अक्सर लेखक के अपने ही पेशे से ताल्लुक रखते हों।</p>
<p><a href="http://tsunamihelp.blogspot.com/">त्सुनामी हेल्प ब्लॉग</a> को कारगर होते देख मेरी यह भावना काफी बदली है। इस एक ब्लॉग ने सेवाभावना को सर्वोपरि रख कर अनेकानेक पृथक दलों को एकीकृत किया और शायद यह स्थापित भी किया कि ब्लॉगिंग सिर्फ पत्रकारिता या निजी डायरी लेखन नहीं है। निरंतर के पहले अंक की आमुख कथा में मुम्बई स्थित सलाहकार दीना मेहता ने मेरे आग्रह पर इसी विषय से जुड़ा <a title="भारतीय ब्लॉगिंग: टिप्पिंग प्वाईंट पर" href="http://www.nirantar.org/0305-cover-story/" target="_blank">एक अन्वेषी लेख</a> लिखा है जो चिट्ठाकारी के बदलते परिवेश पर विश्लेषणात्मक दृष्टिपात कर रहा है। यदि लेखिका का पूर्वानुमान सही निकले तो दिन दूर नहीं जब उद्देश्यपूर्ण चिट्ठाकारी एक सचाई बनेगी और लोग चिट्ठाकारी को पेशे के रूप में अपना सकेंगे।</p>
<hr />
<h3 style="padding-top: 10px; padding-bottom: 10px; font-size: 15px;">साझे प्रयासों की एक और कड़ी</h3>
<p><img class="alignright" style="border: 0pt none; margin: 8px;" src="http://www.nirantar.org/images/stories/0305/old_logo.gif" border="0" alt="Nirantar" hspace="8" vspace="8" width="189" height="60" align="right" />ब्लॉग यानि कि चिट्ठा वर्तमान दौर में अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। दुनिया भर में चिट्ठों की लोकप्रियता बढ़ी है तथा हर घड़ी नए ब्लॉग जन्म ले रहे हैं। हिन्दी में ब्लॉग लेखन का सिलसिला शुरु हुये दो साल हुये हैं। इस साल भारतीय भाषाओं मे ब्लॉग लेखन में भी तेजी आई साथ ही विषयों में विविधता तथा गहराई बढ़ी है। लेखन के अलावा जो एक बात सशक्त रूप से उभरी वह है हिन्दी चिट्ठाकारों का पारस्परिक व्यवहार और चिट्ठाकार समुदाय का जन्म। <a href="http://www.akshargram.com/">अक्षरग्राम</a> और <a href="http://www.myjavaserver.com/~hindi">चिट्ठा विश्व</a> से लेकर <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya">सर्वज्ञ</a>, <a href="http://www.akshargram.com/sarvagya/anugunj">अनुगूँज</a>, <a href="http://bunokahani.blogspot.com">बुनो कहानी</a> जैसे कितने ही साझे प्रयासों के शक्तिशाली उदाहरण सामने हैं। निरंतर इसी की एक कड़ी है।</p>
<p>यह कहना अतिशयोक्तिपूर्ण न होगा कि आने वाले समय में चिट्ठाकारी की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी। हिन्दी चिट्ठाकारी भी इसका अपवाद नही होगी। हिन्दी ब्लॉग जगत में एक ब्लॉग पत्रिका की आवश्यकता काफी समय से महसूस की जा रही थी। पत्रिका का कलेवर ऐसा सोचा जा रहा था जिससे चिट्ठाकार बन्धु अपना रचना कौशल निखार सकें साथ ही गैर ब्लॉग लेखकों के लिए ब्लॉगजगत की छवि प्रस्तुत की जा सके। इसी उद्देश्य को लेकर शुरु की जा रही है यह हिन्दी जगत (और संभवतः विश्व की) की पहली ब्लॉग पत्रिका &#8212; निरंतर। शुरुआती दिनों में जब हिन्दी चिट्ठाकारी का स्वरूप, शैली, शिल्प सब कुछ निर्माण के दौर में है, उम्मीद है कि निरन्तर का प्रकाशन इस काम में मील का पत्थर साबित होगा। यह प्रयास सामूहिक है। सबकी भागीदारी के बिना इस ऐतिहासिक काम को अंजाम देने की सोचना दिवास्वप्न होगा। सभी से आशा एवं अनुरोध है कि अपने सुझाव व सहयोग के माध्यम से निरंतर से जुडे रहें। साथियों के सहयोग के लिये बढे हाथों की गर्मजोशी ही निरंतर की सफलता की कहानी कहेगी।</p>
<p>निरंतर के संपादक मंडल के सभी साथियों <a href="http://pnarula.com">पंकज नरूला</a>, <a href="http://jitu.info">जितेन्द्र चौधरी</a>,  <a href="http://fursatiya.blogspot.com">अनूप शुक्ला</a>, <a href="http://raviratlami.blogspot.com">रविशंकर श्रीवास्तव</a>, <a href="http://lifeinahovlane.blogspot.com">अतुल अरोरा</a> और <a href="http://kaulonline.org">रमण कौल</a> का मैं आभार व्यक्त करता हूँ सहयोग, समर्थन, धैर्य और भागीदारी के लिए।</p>
<p>आपका मित्र<br />
<a href="http://www.debashish.com">देबाशीष चक्रवर्ती</a></p>
<img src="http://www.nirantar.org/?ak_action=api_record_view&id=2212&type=feed" alt="" />]]></content:encoded>
			<wfw:commentRss>http://www.nirantar.org/0305-nazariya/feed</wfw:commentRss>
		<slash:comments>0</slash:comments>
		</item>
	</channel>
</rss>

