आ उठ, चल, बाहर जीवन है

वातायन: गीत कवितामानोशी चटर्जी हिन्दी में नियमित रूप से लेख व कविता लिखती हैं, यदा कदा अँग्रेज़ी में भी। रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर और बी.ऍड. करने के बाद मानोशी शिक्षण कार्य करती हैं। सम्प्रति टोरंटो, कनाडा में निवास। साहित्य के अतिरिक्त शास्त्रीय व ग़ज़ल गायन में रुचि है। आकाशवाणी से ग़ज़लें भी प्रसारित हुई हैं। अब वे मानसी नामक चिट्ठा भी लिखती हैं। प्रस्तुत कविता मानोशी ने विशेष निरन्तर के लिए भेजी है।

आ उठ, चल, बाहर जीवन है..

जीवन विषाद नहीं, सुख है
है मन का ये भ्रम जो दुख है
मधुर स्मृति से हो आलिंगन-बद्ध
राह में बैठ रोता मूरख है।

इक बिजली के कौंधने से ‘गर
डर कर काँप रहा बदन तर
छोड़ सहानुभूति स्वयं पर
आ उठ चल बाहर जीवन है।

चला पथरीली पगडंडी पर से
गुज़र रही कड़ी धूप सर से
डर न इस परीक्षा प्रहर से
छाँव लिये प्रतीक्षारत तरुवर है।

द्वार द्वार भटक रहा रे पागल
नाव छोटी तेरी, विराट सागर
मांगे जो पानी, मिले लवण जल
हाथ मे कुंड तेरे, मीठा जल है।

निराशा खडी है देख मुँह बाये
घेरने को तत्पर जो हो उपाय
हैं हर तरफ़ अन्धेरों के साये
मगर गुफ़ा के अन्तिम द्वार पर किरन है
आ उठ, चल, बाहर जीवन है।
आ उठ, चल, बाहर जीवन है…

मानोशी चटर्जी


पीलीभीत, उत्तर प्रदेश में जन्मीं पूर्णिमा वर्मन की साहित्यिक प्रतिभा ने जड़ें पकड़ीं इलाहबाद में। लेखन, अध्यापन, ग्राफिक रचना की राह चलते चलते वे संप्रति व्यस्त हैं अंर्तजाल की पत्रिकाओं अभिव्यक्ति और अनुभुति के संपादन में। पूर्णिमा का एक काव्य संग्रह भी प्रकाशित हो चुका है। शारजाह, संयुक्त अरब अमीरात स्थित पूर्णिमा का हाल ही में ब्लॉग लेखन की ओर भी रुझाव हुआ है।

आवारा वसंत

अबकी साल
वसंत यों ही आवारा घूमा
मेरी तरहा

कमरे से बगिया तक
बगिया से चौके में
चौके की खिड़की से
चमकीली नदिया तक
पटरी पटरी
दूर बहुत शिव की बटिया तक
मेरे ही संग ठोकर ठोकर रक्त रंगे ढाक के पावों
मौसम भी बंजारा घूमा
मेरी तरहा।

पटरी से पर्वत तक
पर्वत से मंदिर में
अष्टभुजा घाटी से
संतों की कुटिया तक
सीढ़ी पर
खुदे हुए नामों से मन के मिटे हुए नामों तक
धुआँ धुआँ आँखों आँखों में
हर एक पल रतनारा घूमा
मेरी तरहा।

पूर्णिमा वर्मन

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