आमुख कथा

असली भारत के लिये असली शिक्षा

हमारी कर्मकाण्डी शिक्षा पद्धति वास्तविक भारत की ज़रूरत मुताबिक ढली ही नहीं है

हमारी शिक्षा पद्धति में बच्चे भारी बैग लिये फिरते हैं, जोर रहता हैं रटन विद्या और परीक्षाओं पर। यहाँ पाठ्यक्रम में बाहर से अर्जित ज्ञान, हुनर और काबलियतों को स्थान नहीं मिलता। शिक्षाविद व राष्ट्रीय शोध प्रोफेसर यश पाल मानते हैं कि आधुनिक औपचारिक शिक्षा तंत्र में प्रकृति और जीवन से सीखे हुनर को शामिल करना भी ज़रूरी है।

May 29th 2007, 5

HIW: खुद कंप्यूटर सीखते हैं बच्चे

May 29, 2007 | 1 Comment

image "होल इन द वॉल" द्वारा एनआईआईटी के सुगाता मित्रा ने सिद्ध किया कि बच्चे बिना औपचारिक प्रशिक्षण के स्वयं कंप्यूटर सीख सकते हैं। कम कीमत में करोड़ों भारतियों तक सूचना प्रोद्योगिकी पहुंचाना अब कोई दिवास्वप्न नहीं। निरंतर ने डॉ मित्रा से जानकारी ली इस अनूठे प्रयोग के बारे में। लेख पढ़ें »
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परिपक्व हो जायेंगे तब भोली भाली बातें करेंगे

June 1, 2005 | Leave comment

image आजकल के बच्चों मे बचपना क्यों नज़र नही आता? हिंदुस्तानी फिल्मों में इतने गाने क्यों होते हैं? नेताओं के स्वागत पोस्टर में नाम के आगे "मा." क्यों लिखा रहता है? भूख क्यों लगती है? सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से! लेख पढ़ें »
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जादुई तकनीक का वामनावतारः आईफ़ोन

February 9, 2007 | 1 Comment

image जनवरी में एप्पल ने कैमरा फ़ोन, पीडीए, मल्टीमीडिया प्लेयर व बेतार संचार प्रणाली से लैस आईफ़ोन के आगमन का शंखनाद किया। नये स्तंभ टेक दीर्घा में ईस्वामी जानकारी दे रहे हैं इस इलेक्ट्रॉनिक उपकरण की जिसकी "एक क्रांतिकारी और जादुई उत्पाद" के रूप में हर तरफ चर्चा है। लेख पढ़ें »
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ट्रैफ़िक जाम और सपने

August 1, 2005 | Leave comment

image सारांश में इस बार एक महिला लेखिका के प्रथम उपन्यास के अंश प्रकाशित करते हुए हमें हर्ष है। सामयिक प्रकाशन द्वारा प्रकाशित सुषमा जगमोहन के इस प्रयास "ज़िंदगी ई-मेल" का 28 जुलाई, 2005 को दिल्ली में विमोचन हुआ। सुषमा पेशे से पत्रकार हैं और उनकी रचनायें हंस, मधुमती व सखी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। लेख पढ़ें »
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आखिर ब्लॉग किस चिड़िया का नाम है?

May 23, 2005 | 1 Comment

image जब सेंकड़ों मस्तिष्क साथ काम करें तो जेम्स सुरोविकी के शब्दों में, "भीड़ चतुर हो जाती है"। गोया, इंसान को इंसान से मिलाने का जो काम धर्म को करना था वो टैग कर रहे हैं। निरंतर के संपादकीय में पढ़िये देबाशीष चक्रवर्ती और अतुल अरोरा का नज़रिया। लेख पढ़ें »
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शिक्षा में आईसीटीः वक्त का तकाज़ा

May 29, 2007 | 2 Comments

दस लाख पाठशालायें जहाँ 90 फीसदी बच्चे 12वीं तक स्कूल ही छोड़ देते हैं। सालाना 3,50,000 स्नातक जिनमें महज 15 फीसद ही नौकरी के लायक होते हैं। केवल मुट्ठी भर लोगों के लिये ही शानदार काम कर रहे हमारे शिक्षा तंत्र में सुधार कैसे लाया जाये बता रहे हैं शिक्षाविद व अर्थशास्त्री अतानू दे। लेख पढ़ें »
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सूचना संचयन की इन्द्रधनुषी तकनीक

November 4, 2006 | 1 Comment

image केरल के एक एमसीए के छात्र सैनुल ने रेनबो नामक ऐसी तकनीक का ईजाद किया है जिसमें डेटा न केवल कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर स्टोर यानि संग्रहित किया जा सकता बल्कि यह संग्रहण रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में किया जाता है। इस अधिक क्षमता, कम कीमत वाले पर्यावरणानुकूल और आसान माध्यम की रोचक जानकारी दे रहे हैं ईस्वामी। लेख पढ़ें »
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मोक्ष की दुकान बंद है

November 4, 2006 | 4 Comments

image "चिरकुट मिसिर का चिता की आग को उलट-पुलट कर हाथ व शरीर गरम करना, चिता जलने के बाद विष्ट के साथ ठेके पर दारू पीना और अब पत्नी द्वारा सारे कर्मकांड की बात भूलकर बिना नहाये रजाई में घुसने की अनुमति दे देना। लगता है कि आज मोक्ष की दुकान बंद है।" पढ़िये सशक्त कथाकार गोविंद उपाध्याय की लिखी कहानी। लेख पढ़ें »
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चिठ्ठाकारी को ज़्यादा गँभीरता से न लें

June 1, 2005 | Leave comment

image ब्लॉग नैशविल गोष्ठी पर एक रपट, अंतर्जाल पर हिन्दी के बढ़ते चरण, न्यूज़गेटर द्वारा फ़ीड-डेमन का अधिग्रहण, आई.बी.एम ने कर्मचारियों को दी चिट्ठाकारी करने की छूट, तीसमारखाँ ब्लॉगर और ऐसी ही और खबरें हलचल में। लेख पढ़ें »
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सुक्खी जैसा कोई नही

April 8, 2005 | 1 Comment

जितेन्द्र के बचपन के दोस्त सुक्खी बहुत ही सही आइटम हैं। उनकी जिन्दगी में लगातार ऐसी घटनायें होती रहती हैं जो दूसरों के लिये हास‍-परिहास का विषय बन जाती है। हास परिहास में पढ़िए सुने अनसुने लतीफ़े और रजनीश कपूर की नई कार्टून श्रृंखला "ये जो हैं जिंदगी"। लेख पढ़ें »
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निरंतर के लेखक

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