मोक्ष की दुकान बंद है

सशक्त कथाकार गोविंद उपाध्याय की लिखी कहानी

Moksha

श्म

शान की भयानकता बढ़ गई थी। हालाँकि समय बहुत नहीं हुआ था। दिसम्बर की कडा़के की सर्दी और ऊपर से आज सुबह से पानी बरस रहा था। जाड़ा गरम कपड़ों को चीर कर मांस से होता हुआ हड्डी तक पहुँच रहा था। महानगर के प्रदूषण का ग्राफ लगातार बढ़ता जा रहा था और तमाम दिन बारिश होने के बावजूद कोहरे का घनत्व इतना ज्यादा था कि बहुत पास की वस्तु भी मात्र परछाई नज़र आ रही थी।

“स्साले को भी आज ही मरना था…और अंतिम क्रिया भी सूर्यास्त के बाद…”, प्रशान्त ने खीझकर कहा।

“हां यार! देखो भला अच्छा खासा था और अचानक…। ठंड लग गई होगी ससुरे को…। वैसे भी वह धरती पर बोझ ही था…। मोक्ष मिल गया उसे …। लेकिन प्रशान्त भाई आपकी बात सही है कि मरा बहुत वाहियात समय है।” लड्डन ने प्रशान्त की तरफ देखा और फिस्स से हंस दिया। वह खामोश सा सबकी सुन रहा था। प्रशान्त, लड्डन, करमकांडी चिरकुट मिसिर, तेजपाल, विष्ट …और वह स्वयं…। भैरोघाट के एक टीन शेड के नीचे खड़े थे। भैरोघाट में इस समय भी तीन-चार मुर्दे जल रहे थे। ठंड से दांत बजाते मौसम में एक चिता ही थी जिसे वे सब घेरे हुये ठंड से बचने का प्रयास कर रहे थे। चिता अपने समापन पर थी फिर भी सबको गरम किये थी।

सबसे ताज्जुब की बात यह थी कि चिरकुट मिसिर जैसा कर्मकांडी ब्राह्मण भी ठंड के आगे बेबस सा चिता की आग से अपने को गरमा रहा था। लड्डन बोला भी था,”अरे मिसिरजी, पाप ओढ़ रहे हो…। हम लोग तो ठहरे पुराने पापी, एक पाप और सही…। पर तुम चिता से देह छुआ रहे हो ..। घोर नरक…।”

मिसिरजी खिसियाये से बोले,”ससुर ना तपबे तो आज हमरौ नकुआ संघे मोक्ष हुई जाई।” और सब खिलखिलाकर हंस पड़े।

नकुआ यानि नक्कू चौधरी। नक्कू मामा। रघुवीर चौधरी का एकमात्र साला। चौधराइन के मायके का एक मात्र रिश्तेदार।

रघुवीर चौधरी लेबर कालोनी के दूसरी गली के पहले ब्लाक में दो मकानों के मालिक हैं। छह मकानों का ब्लाक है। तीन क्वार्टर नीचे, तीन ऊपर। चौधरी जी का क्वाटर कोने का है तो उन्होंने ब्लाकों के बीच की जगह भी अपने अधिकार क्षेत्र में ले रखी है। जहाँ एक बड़ा सा टिन का छप्पर है और उसमें दो जर्सी गायें जुगाली करती मिल जायेंगी। शांति नगर लेबर कालोनी। कभी इस महानगर में रहने वाले मजदूरों के लिये बनायी गयी होगी। परन्तु अब ये क्वार्टर किसी भी मजदूर की औकात के बाहर की चीज है। आज एक क्वार्टर की कीमत दस-पंद्रह लाख है।

रघुवीर चौधरी पचास के चपेटे के सिंगल हड्डी यानि इकहरे बदन के पंचफुटिया आदमी हैं। बातों को शहद में डुबाकर बोलते हैं। सांवले रंग पर आदर्शवाद की ओढ़नी (तम्बू कहना ज्यादा सही होगा) ताने, देश की दुर्दशा का रोना रोते कहीं भी मिल जायेंगे। चौधरी साहब सरकारी महकमे में बड़े बाबू थे, बहुमुखी प्रतिभा के धनी, ट्रेड यूनियन की दुकान भी चलाते थे। विभाग के ठीक-ठाक नेताओं में उनकी गिनती थी। शांति नगर हायर सेकेंडरी बालिका विद्यालय के प्रबंध समिति में भी उनका दांत धंसा था। संयुक्त मंत्री सरीखे पद के द्वारा विद्यालय पर कब्जा करने की रणनीति बनाने में व्यस्त थे। अक्सर इस वित्त विहीन विद्यालय के अध्यापक उनकी जर्सी गायों की सेवाटहल में दिखाई पड़ते।

लेकिन हमें रघुवीर चौधरी के व्यक्तित्व से कुछ भी लेना देना नहीं है। इस कहानी का पात्र तो नक्कू चौधरी हैं। नक्कू चौधरी थे भी और नहीं भी…। दरअसल नक्कू चौधरी रघुवीर चौधरी के साले थे। रघुवीर चौधरी को दहेज में क्या क्या मिला था यह तो आज तारीख में कोई नहीं जानता, परन्तु नक्कू चौधरी जरूर आये थे साथ में। आगे चलकर नक्कू चौधरी, ‘नक्कू मामा’ के नाम से जाने गये।

नक्कू मामा की बहन यानि रघुवीर चौधरी की अर्धांगिनी चौधरी साहब से तीन इंच लम्बी ही होंगी। दोहरा बदन, मैदे के माफिक गोरा रंग और तीखे नैन नक्श। हर चीज में चौधरी साहब से इक्कीस। पैंतीस-अड़तीस बसंत पार करते-करते चौधराइन ने तीन बेटियों के बाद चौथी सन्तान के रूप में एक बेटा भी पैदा कर ही दिया था। इसके बावजूद उनकी जवानी अभी भी कसी-कसी थी। चौधराइन हमेशा तरोताजा लगती। शायद यही कारण था कि रघुवीर चौधरी ने नक्कू मामा जैसा व्यक्तित्व झेल लिया था।

नक्कू मामा विशेषताओं की खान थे। नक्कू मामा अपनी बहन के विपरीत चार फुट से थोड़ा ही ज्यादा सांवले रंग के, नाक से बोलने वाले ढेड़ पसलिया मरगिल्ले से इंसान थे। एक पैर में पक्षाघात का असर था इसलिये भचककर चलते थे। दाहिना पैर जिस जोश से आगे फेंकते उस हिसाब से वह पड़ता न था। नक्कू मामा की भाषा या तो उनकी बहन समझतीं थीं या फिर उनकी तीनों भांजियां। नक्कू मामा को उनकी बहन और भांजियां दिलोजान से चाहतीं थीं लेकिन मुहल्ले में यही प्रसिद्ध था कि कहने को तो साला है लेकिन हैसियत नौकरों जैसी भी नहीं।

हो सकता है कि चौधरी के प्रभुत्व से लोगों को ईर्ष्या हो और वे ऐसे ही बोलते हों। नक्कू मामा सामान्यत: कोई काम नहीं करते थे। पर बालिका विद्यालय के अध्यापक चौधराइन का कृपा पात्र बनने के लिये नक्कू मामा की मक्खन पालिश करते रहते और नक्कू मामा निर्लिप्त भाव से अध्यापकों की सेवा ग्रहण करते रहते जो कि साधारणतया खाने-पीने की चीजों के रूप में होती।

नक्कू मामा को गुस्सा नहीं आता था। आखिर गुस्सा करें भी तो किस पर! ढाई साल का भांजा तक तो अपना गुस्सा उन्हीं पर उतारता और भांजे के छोटे-छोटे हाथों के हर थप्पड़ के साथ नक्कू मामा की खिलखिलाहट तेज हो जाया करती – “मानों न नउर मानों” (मारो न और मारो)।

“क्या सोच रहे हो?” चिरकुट मिसिर ने उसे चुपचाप बैठा देखकर पूछा। वह चौंका, “कुछ नहीं पंडितजी बस नक्कू मामा के बारे में…। कभी गुस्सा नहीं आता था उन्हें।”

“बात तो तुम्हारी ठीकै है। बस एक बार नक्कू मामा नाराज हुये थे। उनका दबा हुआ स्वाभिमान जागा था। सही किस्सा क्या था यह कहना मुश्किल है।” चिरकुट मिसिर ने पान मसाला की नई पुड़िया फाड़ी और मुंह में कूड़े की तरह उड़ेल ली। मसाले को मुंह के अंदर चारों तरफ जीभ से नचाया और फिर गाल के एक तरफ दबाकर तृप्ति की डकार ली।

महाराजजी घी चपोड़ कर रोटी खीर के साथ सपड़-सपड़ उड़ा रहे थे और बगल में बैठे नक्कू मामा मट्ठे के लिये भी तरसे मंहगे। ऊ का कहते हैं, “घर के लरिका खुखरी चाटें अउर समधियाने के चाटें राब”

“हां तो मैं कह रहा था एक दिन हो गये नक्कू मामा नाराज। अब नाराजगी की बात तो थी ही। शांति नगर हायर सेकेंडरी स्कूल बालिका विद्यालय में वार्षिक महोत्सव चल रहा था। कोई वेदांती महाराज आये थे। चार दिन से तीनों समय वेदों पर प्रवचन चल रहा था। वेदान्ती महाराज के भोजन की व्यवस्था चौधरी साहब के घर पर थी। अब वेदान्ती महाराज और नक्कू मामा साथ-साथ भोजन करते थे। एक तरफ महाराजजी घी चपोड़-चपोड़ कर रोटी खीर के साथ सपड़-सपड़ उड़ा रहे थे और बगल में बैठे नक्कू मामा मट्ठे के लिये भी तरसे मंहगे। ऊ का कहते हैं घर के लरिका खुखरी चाटें अउर समधियाने के चाटें राब। बस नक्कू मामा के दिल में लग गई बात। वेदान्ती महाराज को विदाई वाले दिन अकेले भोजन करना पड़ा। नक्कू मामा अपना एक मात्र चीकट सा झोला उठाये और फुर्र हो गये। अब घर में खोजाई शुरू। विद्यालय के अध्यापक उनकी खोज में लगाये गये। एक घड़ी रात को आधा किलोमीटर दूर एक मंदिर में लेटे मिले। रघवीर चौधरी ने लाख समझाया लेकिन नक्कू मामा टस से मस नहीं हुये। अंत में चौधराइन के आंसू काम आये। चौधराइन जार-जार रोईं और वे बहन के आंसू न झेल पाये। नक्कू मामा लौट आये घर।” चिरकुट मिसिर ने मुंह में भर आये पीक को खाली किया।

तब तक विष्ट ने बातों का सूत्र अपनी तरफ खींच लिया। “नक्कू मामा की उम्र बाइस -तेइस की हो गई थी। अरे भाई चौधरी की बड़ी बेटी हमारी बिटिया की उमर की है। पंद्रह बरस की। उससे डेढ़ बरस पहले ब्याह हुआ था चौधरीजी का और शादी के समय नक्कू मामा थे सात-आठ साल के। यानि नक्कू मामा तेइस से पचीस के बीच रहे होंगें।” विष्ट ने एक बार सबकी तरफ देखा और किसी को बोलता न पाकर अपनी गणना पर सबकी मौन स्वीकृति मान ली।

“यार देखने में तो वह चौधरी की बड़ी बिटिया के बराबर का ही लगता था”, लड्डन ने गला खखारा।

“क्या बात करते हो यार! वह चौधरी की बिटिया का लद्दू था। दिन भर लादे घूमता था।” विष्ट ने सिर हिलाते हुये कहा।

चिता की आग अब मद्दिम पड़ने लगी थी। ठंड से अंगुलियों का खून एक बारगी जमने लगा था। विष्ट ने बिना लाग-लपेट के कहा, “पास में ही ठेका है, चलो मार लिया जाये।”

“राम-राम! श्मशान में भी भोग”, मिसिर ने कान पर हाथ रख लिया। “अबे चुप पंडित की दुम। मुर्दे की चिता ताप रहे हो लेकिन सोमरस को भोग की वस्तु बताते हो” विष्ट गुर्राया। लड्डन ऐसे मामले में हमेशा की तरह कन्फ्यूज्ड था। बोला, ” यार, वो देखो सामने वाली चिता में आग ठीक है”। दस पंद्रह लोग उस चिता के पास खडे़ थे। “यार वहां जाना ठीक नहीं है।” वह अपने को रोक न सका। “वे स्कूल कमेटी के लोग हैं। यहां भी बकवास ही कर रहे होंगे – आदर्शवाद की चासनी में लपेट कर। चलना है तो चलो और मुंह बंदकर झेलो सामाजिक उत्थान व भारतीय समाज में निरंतर पतन की व्याख्यान मालायें।”

तब तक मिसिरजी चिता की आग को एक बार टूटे बांस से हिलाडुलाकर काफी हद तक जिंदा कर चुके थे। आग से चिंगारियां झांकने लगी थी। अचानक जैसे विष्ट को कुछ याद आया, “यार, चिरकुट, वो नक्कू मामा का प्यार मोहब्बत वाला किस्सा तो सुना दो।”

मिसिरजी खों-खों करके हंस दिये, “नक्कू मामा की उमर जवानी की दहलीज पर खड़ी होकर दहाड़ें मार-मार कर रो रही थी। लेकिन कोई ऐसा नहीं था जो उनकी जवानी के आंसू पोंछता। शुभचिंतक, अभिवावक, रिश्तेदार सबकुछ तो मात्र उनकी बहन ही थीं। चौधराइन के लिये नक्कू मामा ही एक समस्या थे। फिर शादी ब्याह की सोचना तो बहुत दूर की बात थी। गांव से कोई रिश्तेदार आया था। बैठे-बैठाले बातों की अनौपचारिकता में नक्कू मामा की शादी की बात चला दी। अब नक्कू मामा का काला चेहरा ऐसा गुलाबी हुआ कि पूछो मत। विद्यालय के खिलावन सिंह बैठे थे वहीं पर। उनकी घाघ नजरों ने ताड़ लिया की नक्कू मामा इस समय हवा-हवाई हो रहे हैं। फिर क्या था, यदा-कदा जहां कहीं नक्कू मामा टकराते, वह विवाह का प्रसंग छेड़ देते और नक्कू मामा का नकियाना शुरू हो जाता। कउन साला समझ पाता कि वो क्या बोल रहे हैं। बस आंखों व चेहरे के बनते -उभरते भावों को देखकर ही मजा आ जाता।”

घड़ी सात से थोडा़ आगे सरक गई थी। सामने वाली चिता पर खड़े स्कूल कमेटी के लोग दिखाई नहीं दे रहे थे। लगता था कि अंतिम क्रिया शुरू हो गयी थी। उसने सबका ध्यान दिलाया। विष्ट मोटी गाली के साथ चल दिया और बाकी सब उसके साथ चल दिये।

नक्कू मामा की चिता तैयार थी। शायद कर्मकांड आर्य समाजी ढंग से होना था। वेद मंत्रों के साथ अंतिम संस्कार शुरू हो गया। सबको हवन सामग्री दे दी गई। मिसिर जी उसके कानों में फुसफुसाये, “अगर क्रिया कर्म में पइसा न खर्चना हो तो आर्य समाजी विधि सबसे उत्तम है…”। मिसिर जी तारीफ कर रहे थे या बुराई वह समझ न सका।

चिता घी, हवन सामग्री के सहारे धुंधुवाकर सुलग उठी और देखते-देखते नक्कू मामा स्वाहा हो गये। वह और उसकी चौकड़ी सीढ़ी से नीचे उतरने लगी। बरसात का चिपचिपापन चारो तरफ फैला था। हां आसमान अब जरूर साफ लग रहा था।

उसके स्कूटर के पीछे विष्ट बैठ गया, “गुरू घर चलोगे या …”, वह गंभीर था, “ठहाके की तरफ..”। वे दोनों ही खिलखिला दिये।

“साला आदमी भी क्या चीज है। ऐसे जीता है जैसे कभी मरना ही नहीं है और फिर ऐसे मर जाता है जैसे कभी जिया ही नहीं था।”

मन के अंदर अभी भी मरघट वाली उदासी सहमी हुई सी बैठी थी। एक अजीब से वैराग्य भाव उभरने लगा था। शराब जब दिमाग पर कब्जा करने लगी तो वैराग्य भाव और तीखा हो गया। वह विष्ट की तरफ देखकर बोला, “साला आदमी भी क्या चीज है। ऐसे जीता है जैसे कभी मरना ही नहीं है और फिर ऐसे मर जाता है जैसे कभी जिया ही नहीं था।”

विष्ट ने नशे में बोझिल आंखों को कस कर मूंदा। उसने भी आंखें बंद कर लीं। शांति नगर लेबर कालोनी में दूसरी गली के पास वाली पुलिया पर बैठा वह काला सा लड़का जिसका दाहिना पैर पक्षाघात से ठीक से उठ नहीं पाता था, जो नाक से अस्पष्ट शब्द उच्चारता था और जो कुल जमा बाइस-तेइस साल की उमर का होने के बावजूद पूरे मोहल्ले भर का मामा था, अब नहीं दिखेगा!

घर पहुंचा तो दस बज गये थे। एक डर था उसके मन में। पत्नी अभी नहाने के लिये कहेगी। यह सोचते ही वह कांप उठा। जाड़े ने भी कसम खा ली थी इस शहर में रिकार्ड बनाने की। कोहरे में अपना हाथ तक दिखना बंद हो गया था। अब बस यही इच्छा थी कि पत्नी अपने कर्मकांडों को झिलाये बिना गरम बिस्तर में घुस जाने दे। परन्तु दिन में कम से कम दो बार पूजा करने वाली पत्नी से यह उम्मीद…। वह कालबेल पर हाथ रखते ही ठंड के मारे कांपने लगा।

दरवाजे के कालबेल पर हाथ रखते ही पत्नी ने दरवाजा खोल दिया था। गेट खुलने और स्कूटर रखने की आवाज ने उसके आने की सूचना दे दी थी पत्नी को। “क्या करना है?”, उसने पत्नी की तरफ देखकर बोलना चाहा। “अरे जल्दी अंदर आ जाइये नहीं तो कमरा ठंडा हो जायेगा।” पत्नी की आवाज पर उसे विश्वास नहीं हुआ।

उसने कपड़े उतारे। गाउन पहना और गरम रजाई के अंदर हो गया। पत्नी अपने घरेलू कामों में लग गई। वह आंखे बंद किये आज दिन भर की आपाधापी के बारे में सोच रहा था। चिरकुट मिसिर का चिता की आग को उलट-पुलट कर हाथ व शरीर गरम करना, श्मशान में चिता जलने के बाद विष्ट के साथ ठेके पर दारू पीना और अब पत्नी द्वारा अपने सारे कर्मकांड की बात भूलकर अनायास बिना नहाये रजाई में घुसने की अनुमति दे देना। लगता है कि आज मोक्ष की दुकान बंद है। वह अपनी सोच पर मुस्करा उठा।

4 प्रतिक्रियाएं

  1. बड़ी सहजता, रोचकता और प्रवाह के साथ गंभीर चित्रण किया गया है आपने इस कथा में, बहुत बधाई.

    चिता अपने समापन पर थी फिर भी सबको गरम किये थी.

    और

    अगर क्रिया करम में पइसा न खर्चना हो, तो आर्य समाजी वोधी सबसे उत्तम है.

    बहुत बढ़ियां. आशा है आपको आगे भी निरंतर पढ़ने को मिलेगा, गोविंद जी.

  2. “मोक्ष की दुकान” शिर्षक से ही व्यंग्य की पैनी धार शुरू हो गयी !

  3. उपाध्यायजी आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी
    पर आपसे एक शिकायत है कि आपका लिखा नेट पर बहुत ही कम उपलब्ध है
    कृपा कर अपना खुद का ब्लोग अतिशीघ्र शुरू करेँ जिससे आपके पाठकगण आपकी रचनाओँ से और ज्यादा परिचित होँ

  4. आप की प्रस्तुती बहुत अच्छी लगी । बधाई ।