दिल्ली अभी दूर, पर चलते रहना है ज़रूर

आधे-अधूरे और बेमन से किए गए यूनिकोड समर्थन के प्रयास

निधिगत सप्‍ताह भारत सरकार के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरणों और फ़ॉण्टों का एक संग्रह मुफ़्त वितरण के लिए प्रस्तुत किया। इंटरनेट पर हिन्दी के दीवानों के लिए यह समाचार चिर-प्रतीक्षित था। सरकार द्वारा उठाया गया यह कदम हिन्दी के प्रयोक्‍ताओं की आशाओं को पूरा करेगा या उन पर पानी फेरेगा, यह जानने के लिए विनय जैन ने इन उपकरणों का परीक्षण किया। पढें, निरन्तर के लिए लिखी उनकी यह विवेचना।

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भा

रत सरकार के संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने अभी हाल ही में हिन्दी सॉफ़्टवेयर उपकरणों और फ़ॉण्टों का एक संग्रह मुफ़्त वितरण के लिए प्रस्तुत किया है। यह संग्रह डाउनलोड के लिए टी.डी.आइ.एल की वेबसाइट पर भी उपलब्ध है। सरकार की तरफ़ से ऐसा कुछ आये तो उसकी एक विशेष अहमियत होती है।जिस अभूतपूर्व पैमाने पर यह वितरण किया जा रहा है उससे आशा और बलवती हुई। फिर, देर से आये तो दुरुस्त क्यों नहीं आयेंगे। कुछ ऐसी ही अपेक्षाओं के साथ मैंने यह संग्रह टी.डी.आइ.एल की वेबसाइट से डाउनलोड किया। डाउनलोड में कुछ समस्याएँ रहीं, जैसे एक-दो बार डाउनलोड का रुक जाना, पर टी.डी.आइ.एल के सर्वर पर भारी लोड होने के संदेह का लाभ दें तो इतना मुश्किल भी नहीं रहा। यहाँ ये बता देना उचित होगा कि मैं इंटरनेट से ब्रॉडबैंड के जरिये जुड़ा हूँ।

पहली झलक में मुझे यह संग्रह और इसके घटक कैसे लगे, यह लिख रहा हूँ। बहुत संभव है कि दूसरों के अनुभव मुझसे अलग रहे हों।

फ़ॉण्ट ढेर सारे, पर थके हारे

पूरे पैकेज का सबसे आकर्षक भाग है ढेर सारे फ़ॉण्ट – यूनिकोड और कीमैप-आधारित टी.टी.एफ़, दोनों तरह के। इसका प्रचार भी बाकी घटकों से अधिक किया जा रहा है। पर अफ़सोस कि एक भी फ़ॉण्ट मुझे ऐसा नहीं लगा जिसमें हिंदी के मानक फ़ॉण्टों में से एक बनने की क्षमता हो। ज़्यादातर फ़ॉण्टों की गुणवत्ता मध्यम या निचले दर्जे की है।

पूरे पैकेज का सबसे आकर्षक भाग है ढेर सारे यूनिकोड और कीमैप-आधारित टी.टी.एफ़ फ़ॉण्ट। पर ज़्यादातर फ़ॉण्टों की गुणवत्ता मध्यम या निचले दर्जे की है।

इसके अलावा अधिकतर टाइपफ़ेस सरल पाठ (text) के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इस वितरण से एक आम वेब-विकासक को कुछ खास फ़ायदा नहीं होने वाला। चित्रों या रेखांकनों के लिए भले ही इनका प्रयोग कर लिया जाए, वेब पन्नों पर उपयोग के रास्ते अभी भी बंद हैं। वे तभी खुल सकते हैं जब कुछ मानक फ़ॉण्ट (जैसे अंग्रेज़ी में एरियल/हेल्वेतिका, वरडाना, या टाइम्स हैं) हर प्लेटफ़ॉर्म पर उपलब्ध हों।

टी.टी.एफ़ युग से लेकर यूनिकोड तक इतने सालों में भी हिंदी कम्प्यूटिंग के पास एक भी मानक या सर्वमान्य टाइपफ़ेस नहीं है। यूनिकोड के बाद स्थिति बदलनी चाहिए थी। पर पूरा प्रयास अलग दिशा में जा रहा है। एक आधिकारिक संस्था के लिए प्राथमिकता यह होनी चाहिए कि वह कुछ मानक टाइपफ़ेस तय करे और फिर और फिर उन मानकों को सर्वमान्य बनाने के लिए काम करे। फिर उनकी सर्वव्यापकता सुनिश्चित करना भी महत्वपूर्ण है। मेरे विचार में, टाइपफ़ेसों के फैलाव का सबसे अच्छा तरीका है उन्हें ऑपरेटिंग प्रणालियों के साथ उपलब्ध करवाना।

बेहतर होता यदि फ़ॉण्ट विकासकों ने एक या दो टाइपफ़ेसों पर पूरा ध्यान दिया होता और साधारण स्टाइल वाले पर श्रेष्ठ गुणवत्ता के फ़ॉण्ट बनाये होते। और फिर, इस वितरण के साथ-साथ, सरकार ने ऑपरेटिंग प्रणाली बनाने वाली कम्पनियों से बात करके उन फ़ॉण्टों को सीधे ओएस के जरिये उपलब्ध कराया होता। यह काम अब भी हो सकता है।

बहरहाल आइये, संग्रह के कुछ अन्य मुख्य सॉफ़्टवेयरों की बात करें।

चित्रांकन – इन्तज़ार और अभी

चित्रांकन

चित्रांकन – हिंदी कम्प्यूटिंग जगत में अगर किसी चीज़ की बेसब्री से प्रतीक्षा थी तो वह था एक ओ.सी.आर (ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकॉग्निशन) सॉफ़्ट्वेयर, यानि ऐसा औजार जो स्कैन किए नागरी अक्षरों को चित्र-रूप से पाठ-रूप में बदल सके। यह अकेला सॉफ़्ट्वेयर हिंदी कम्प्यूटिंग में क्रांति लाने की क्षमता रखता है। पर अभी तक मैं इसे संस्थापित (इंस्टॉल) नहीं कर पाया हूँ। पहले तो संस्थापन फ़ाइल चल ही नहीं रही थी। सी-डैक को लिखा। इस बात का श्रेय उन्हें दूँगा कि सहायता समय पर (एक कार्य-दिवस में) मिल गई। पर अब संस्थापन स्थिति-प्रदर्शक 100% पर जाकर रुक जाता है। घंटों कुछ नहीं होता। आखिर रद्द करना पड़ता है।

(बाकी मित्रों की मदद के लिए बता दूँ कि अगर आप संस्थापना के समय यह संदेश देखें कि ‘chitrankan.ini is not present’ तो chitrankan.ini को अपने ड्राइव के रूट फ़ोल्डर (C:\, D:\ आदि) में डाल दें। और फिर से संस्थापक फ़ाइल चलाएँ।)

फ़ायरफ़ॉक्स हिंदी

फ़ायरफ़ॉक्स (ब्राउज़र) – अभी तक कोई तकलीफ़ नहीं। पर हिंदीकरण में सुधार की आवश्यकता मुँह बाए है। अटपटापन फिर भी स्वीकार किया जा सकता है, पर ‘शैली’ को ‘शैलि’ लिखने जैसी वर्तनी-अशुद्धियाँ बहुत अखरती हैं।

ईमेल प्रबंधक – चला नहीं

कोलम्बा (ईमेल प्रबंधक) – अच्छी तरह से संस्थापित तो हो गया, पर चला नहीं। कार्यक्रम चलाने पर एक कमांड विन्डो खुलती है और कुछ नहीं होता। थक कर अ-संस्थापित कर चुका हूँ।

ऑफ़िस का एक अच्छा विकल्प

ओपन ऑफ़िस

ओपन ऑफ़िस

ओपन ऑफ़िस – मँहगे मॉइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस का एक अच्छा विकल्प। अच्छी तरह से काम कर रहा है। हिंदी अनुवाद अस्पष्टताओं, गलतियों, और वर्तनी अशुद्धियों से भरा है। एक हिंदी शब्द-संसाधक में हिंदी वर्तनी-जाँच का न होना विडम्बना है या हास्यास्पद, नहीं कह सकता।

तुरत-संदेश वाहक – पंख कटा कबूतर

गैम (तुरत-संदेश वाहक) – यह एक ओपन सोर्स इंस्टैंट मैसेंजर क्लायंट है, जो खासा लोकप्रिय भी है। इस अकेले सॉफ़्ट्वेयर के जरिये आप अपनी याहू, एमएसएन, आइसीक्यू, एओएल व अन्य कई तुरत-संदेश सेवाओं का प्रयोग कर सकते हैं। संस्थापित हुआ लेकिन चलाने पर त्रुटि संदेश देकर बंद हो जाता है।

पी2पी संचालक

लाइमवायर (पी2पी संचालक) – पी2पी यानि ‘पियर से पियर’। ‘पियर’ नेटवर्क से जुड़े एक आम कम्प्यूटर को कहते हैं और पी2पी तकनीक हर पियर को आपस में सीधे जोड़ने का काम करती है। पी2पी सेवाओं का मुख्य उद्देश्य और उपयोग फ़ाइलों की अदला-बदली करना होता है। सीधे जुड़ाव और कुछ अन्य कॉम्प्लेक्स तकनीकों के प्रयोग की वजह से यह अदला-बदली बाकी तरीकों के मुकाबले तेज और आसान हो जाती है। चूँकि मैं इस सॉफ़्टवेयर में विशेष रुचि नहीं रखता, मैंने इसे संस्थापित नहीं किया।

ओपन ऑफ़िस, फ़ायरफ़ॉक्स, कोलम्बा, गैम, और लाइमवायर एक संगठित पैकेज के तौर पर डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं। पूरे संग्रह का सबसे बड़ा हिस्सा (करीब 240 एमबी) इसी पैकेज से बनता है।

तकनीकी शब्दकोश शब्दिका – यूनिकोड नहीं समझता

शब्दिका

शब्दिका (सी-डैक निर्मित) – यह प्रशासनिक, बैंकिंग, और तकनीकी शब्दावली का एक कोश है। इसकी कमजोरियों की सूची बहुत लंबी है। हिंदी शब्दों के लिए यह यूनिकोड की बजाय शुषा का प्रयोग करता है। किसी शब्दकोश में खोज सुविधा का न होना उसे वैसे ही अनुपयोगी बना देता है। कोई सहायता उपलब्ध नहीं है। इसके डाटा प्रारूप का मुक्त होना भी आवश्यक है ताकि कोई बाहरी शब्दावली इसमें आसानी से जोड़ी जा सके।

इन कुछ मूलभूत सुविधाओं और एक अच्छे इंटरफ़ेस के साथ यही कोश बहुत काम का बन सकता है। पर अभी तो यह अल्फ़ा स्तर का प्रयास लगता है।

परिवर्तन 2.0 – काम का है

परिवर्तन 2.0 (प्रिया इन्फ़ॉर्मैटिक्स द्वारा निर्मित) – यह सुविधा उपकरण बहुत काम का है पर मुश्किल इंटरफ़ेस की उसी समस्या से ग्रस्त है जिससे इस संग्रह के लगभग बाकी सभी सॉफ़्टवेयर, हालाँकि इसकी “रंगीनी” अनूठी है। यह सुविधा हिन्दी के विभिन्न कीमैपों के बीच परस्पर परिवर्तन संभव करती है। उदाहरण के लिए, राजस्थान पत्रिका या भास्कर की वेबसाइटों के स्वामित्व अधीन फ़ॉण्टों में लिखे पाठ को यूनिकोड में बदला जा सकता है। लगभग सभी हिंदी कीमैप समर्थित हैं।

पाठ-से-वाक सुविधा

परिवर्तन

वाचक (प्रोलॉजिक्स द्वारा निर्मित) – यह इस संग्रह में शामिल दो ‘पाठ-से-वाक’ (text-to-speech) रूपांतरण सॉफ़्टवेयरों में से एक है। बिना पूछे या बताये, यह आपके MS-Office कार्यक्रमों और इंटरनेट एक्सप्लोरर में खुद को जोड़ लेता है। ब्राउज़र प्लगिन तो काम भी नहीं करता।

एक और पाठ-से-वाक सुविधा (आइआइआइटी, हैदराबाद द्वारा निर्मित) – यह सुविधा कुछ-कुछ विंडोज़ 2000/XP के साथ उपलब्ध ‘Narrator’ जैसी है। अभी यह सॉफ़्टवेयर सिर्फ यूनिकोड पाठ (text) फ़ाइलों के साथ काम करता है, ब्राउज़र पाठ को नहीं पढ़ सकता। किसी महिला की आवाज में किए गए उच्चारण साफ और स्पष्ट हैं। मुझे लगता है कि अगर इस पर काम जारी रहा (सुधार और समर्थन दोनों दिशाओं में) तो दृष्टिहीनों, कमजोर नज़र वालों, और अनपढ़ व्यक्तियों के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। यह इस संग्रह के बेहतर घटकों में से है।

वर्तनी-जाँचक – यूनिकोड नहीं समझता

जीस्ट स्पेलचेकर यानि वर्तनी-जाँचक – इसे संस्थापित करने पर यह अपने आप को MS-Office कार्यक्रमों में उपकरण-पट्टी के तौर पर जोड़ लेता है। पर इसकी सबसे बड़ी, बल्कि इसे बेकार बना देने वाली हद तक बड़ी, कमजोरी है कि यह यूनिकोड पाठ पर काम नहीं करता।

दिल्ली दूर है

ये थे कुछ मुख्य सॉटवेयर और सुविधा-उपकरण जो कि इस संग्रह में शामिल हैं। इनके अलावा भी कुछ और सॉफ़्टवेयर हैं जिन्हें या तो मैं संस्थापित नहीं कर पाया या वे मुझे काम के नहीं लगे। इस पैकेज के मेरे अब तक के अनुभव का सार यह है कि अभी बहुत काम होना बाकी है। प्रयोक्ता-परीक्षण की कमी साफ नज़र आती है। नीयत और प्रयास बेशक सराहनीय हो सकते हैं, पर इसकी सफलता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी कदम नहीं लिए गए हैं। यह प्रस्तुति हड़बड़ी में की गई लगती है। उल्लेखनीय है कि सरकार ने कुछ महीनों पहले ही विभिन्न गैर सरकारी संस्थाओं से वितरित की जाने वाली सीडी हेतु सामग्री चाही थी। लगता है कई संस्थाओं ने दबाव में आकर अधकचरे उत्पाद ही दे दिये हैं। कोई हैरत नहीं होनी चाहिये अगर इस मंत्रालय के मुखिया जी की मातृभाषा तमिल, जिसे युद्धस्तर पर हिन्दी के प्रयास के साथ ही शुमार किया गया, की सीडी की भी यही हालत हो।

यूनिकोड समर्थन के प्रयास आधे-अधूरे और बेमन से किए गए लगते हैं। इसी तरह usability की दिशा में काम शून्य के आस-पास है।

नीति स्तर पर भी कई समस्याएँ हैं। मसलन, यूनिकोड समर्थन के प्रयास आधे-अधूरे और बेमन से किए गए लगते हैं। जब तक पूरी मशीनरी इस बात को पक्का मान कर नहीं चलती कि भविष्य की योजनाएँ यूनिकोड आधारित ही होनी चाहिए, कोई भी प्रयास न केवल हमें वहीं खड़ा रखेगा जहाँ हम हैं, बल्कि पीछे भी ले जा सकता है। इसी तरह प्रयोगिता (usability) की दिशा में काम शून्य के आस-पास है। अधिकतर शामिल सॉफ़्टवेयरों के इंटरफ़ेस एक आम आदमी को छोड़िये, कम्प्यूटर के अनुभवी प्रयोक्ताओं को भी सिरदर्द दे सकते हैं। एक और कमजोरी खुद हिंदीकरण में है। अनुवाद का स्तर बहुत अच्छा नहीं है। और वर्तनी की गलतियाँ जो बिल्कुल अस्वीकार्य होनी चाहिए, हर जगह पसरी पड़ी हैं। प्रस्तुति से पहले गहरा प्रयोक्ता-परीक्षण और अनुभवी हिंदी विशेषज्ञों द्वारा जाँच इन कमजोरियों को दूर कर सकती है।

इस प्रस्तुति के बाद का काम भी महत्वपूर्ण है। एक आइ.टी प्रोफ़ेशनल होने के बावजूद मुझे इस संग्रह को काम में लेने में मुश्किलें आई हैं। मैं सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूँ कि एक आम गैर-आइ.टी तकनीकी क्षेत्र का व्यक्ति जो बस कम्प्यूटर पर हिंदी में काम करना चाहता है, इन सॉफ़्टवेयरों के साथ कैसे जूझ रहा होगा। बहुत संभव है कि वह इन्हें प्रयोग करने का विचार ही रद्द कर दे। इस संभावना को कम करने के लिए यह जरूरी है कि सरकारी संस्थाओं द्वारा उसे इसके संस्थापन और प्रयोग में आवश्यक सहयोग और सहायता मिले। यह सहायता फ़ोन, ईमेल, डाक, वेबसाइट (सामान्य प्रश्नोत्तर) या व्यक्तिगत तौर पर उपलब्ध कराई जा सकती है।

साथ ही इस तरह का वितरण नियमित हो। कुछ समय बाद एक सुधरा और बड़ा पैकेज फिर वितरित किया जाना चाहिए। कम से कम वेबसाइट पर तो सुधारों और नये सॉफ़्टवेयरों का वितरण हमेशा चलते रहना चाहिए।

दिल्ली अभी दूर भले हो, चलते रहना जरूरी है।

2 प्रतिक्रियाएं

  1. विनय जी, साफ और आसान भाषा में लिखे इस लेख के लिये बहुत धन्यवाद. लेख का शीर्षक पढ कर मैने भी बहुत आशा से पढना प्रारम्भ किया, यह सोच कर कि शायद मुझे भी अपनी परेशानी का कोई उपाय मिल जाये. मेरे जैसे लोग जो भारत से बाहर अंग्रेज़ी न बोलने वाले देशों में रहते हैं और आम अंग्रेज़ी वाले कीब्रोड नहीं प्रयोग कर सकते उन्हें मानक, सरल फौंट की आवश्यकता है और भाषा की गलतियाँ खोजने वाले स्पैलचैकरस् की भी.

    सुनील दीपक, इटली

  2. आपका लेख अच्छा लगा। कोलम्बिया से मैं भी परेशान, मेरे कम्प्यूटर पर कोलम्बिया काम तो कर रहा था लेकिन चूंकि काफ़ी धीरे काम करता है इसलिये मैंने वापस मोज़िला मेल (हिन्दी) को प्रयोग करना शुरू कर दिया। वर्तनियों और गलत अनुवाद से मुझे भी काफ़ी धक्का लगा।

    ये एक विडम्बना ही है एक ऐसे देश में जहां ७०% लोग हिन्दी बोलते और समझते हैं, और कम से कम ५०% लिखना जानते हैं, अंग्रेजी की स्पेलिंग में कोई गलती नहीं होती है लेकिन हिन्दी में हज़ार गलतियां देखी जा सकती हैं। क्या शिक्षा दे रहे हैं हम?