सूचना संचयन की इन्द्रधनुषी तकनीक

रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में किया जाता है डेटा स्टोर

Rainbow Technique

दु

निया के सर्वकालिक प्रभावशाली व्यक्तियों की कतार में ईसा मसीह, बुद्ध और न्यूटन जैसे नामों के बाद प्रिंटिग प्रेस के जनक जोहैन्न गुटनबर्ग का नाम आठवें स्थान पर है। महान गौरव दिलवाने वाली इस चौदहवीं सदी की खोज की सफ़लता का आधार था कागज़ – एक महीन, सस्ता, सुलभ माध्यम – जिसे अंकित और जिल्दबंद कर के बनतीं थीं किताबें और उनकी प्रतिलिपियां। मुद्रण मशीन ने दुनिया को बदल कर रख दिया।

समय ने करवट बदली और बीसवीं सदी में भविष्योन्मुखी विचारक पेपरलेस ऑफ़िस या कागजमुक्त दफ़्तरों की कल्पना करने लगे। दस्तावेज़ों को सहेजने के लिए कागज़ का स्थान वैद्युत-चुंबकीय या अर्धचालक (सेमिकंडक्टर) आधारित इलेक्ट्रॉनिक माध्यम लेने लगे। लेकिन इक्कीसवीं सदी में अब फ़िर संभव है की कागज़ या उस जैसा कोई सस्ता माध्यम ही इलेक्ट्रानिक सूचना क्रांति में भी एक नए युग का सूत्रपात कर दे।

रेनबो तकनीक की ख़ासियत यह है कि डेटा न केवल कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर संग्रहित किया जा सकता बल्कि यह संग्रहण रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में किया जाता है।

अगर एक भारतीय छात्र का शोध सफल सिद्ध हुआ तो संभव है कि कंप्यूटर जगत में और क्रांतिकारी परिवर्तन आयें। किसी फ़्लॉपी डिस्क, सीडी या डी.वी.डी के स्थान पर सामान्य कागज़ जैसे माध्यम पर सूचना के भंडारण की यह नई तकनीक खोजी है सैनुल अबिदीन ने। सैनुल केरल के मालापुरम संभाग में कुट्टिपुरम के एम.ई.एस अभियांत्रिकी महाविद्यालय में एम.सी.ए अंतिम वर्ष के छात्र हैं। इनकी इस तकनीक को “रेनबो टेक्नोलॉजी” नाम दिया गया है। यह कार्य करने में उन्हें 6-7 माह लगे और अभी भी कार्य प्रगति पर है।

रेनबो तकनीक के बारे में विशेष बात यह ही नहीं है कि डेटा यानि सूचना कागज़ जैसे सामान्य माध्यम पर जमा की जा सकती है – वरन यह भी की यह जमा की जाती है रंगबिरंगी आकृतियों के रूप में। ये तकनीक शून्य और एक के माध्यम से सूचना को रखने की द्बिचर अंकीय (बायनरी डिजिटल) तकनीक से आधारभूत रूप से निश्चित ही भिन्न है। पर ऐसा अनोखा विचार उन्हें सूझा कैसे, सैनुल कहते हैं, “मानव की आंख में 16 बिलियन कोशिकाएं [रॉड और कोन – छडी और शंकू के आकार की] प्रकाश और रंगों के माध्यम से वस्तुओं को पहचानती हैं। तो मैंने सोचा कि हम इसका बिल्कुल उलट कर के सूचना को रंगों के माध्यम से क्यों ना प्रदर्शित करें।”

होनहार बिरवान

सैनुल अबिदीन केरल के मालापुरम संभाग में कुट्टिपुरम के एम.ई.एस अभियांत्रिकी महाविद्यालय में एम.सी.ए अंतिम वर्ष के छात्र हैं। संप्रति वे स्वैच्छिक प्रोग्रामर के रूप में कार्यरत हैं। सैनुल मूलतः केरल में कोट्टकल के करीब करिंगप्पर, मलप्पुरम के निवासी हैं। इनके पिता का नाम है श्री नन्नट बाप्पू (हुसैन) और मां का नाम श्रीमती कुंजीमोल है। सैनुल की बहन का नाम सुमैबा है और भाई का नाम सहीर अब्बास है। सेमिनार और कक्षाएं, मित्रों से गपबाजी और पठन-पाठन इनके शौक हैं।

निरंतर सैनुल के अद्भुत खोज के लिये उनकी प्रशंसा करता है और पाठकों से अनुरोध करता है कि वे इस होनहार बिरवान का हौसला ज़रूर बढ़ायें। सैनुल से संपर्क करने का ईमेल पता है mysainu at yahoo dot com, उनके महाविद्यालय का ईमेल पता है mca at mesengg dot com ।

इस नई तकनीक का हर पहलू बहुत दिलचस्प है। इसकी कई विशेषताओं में से एक है की विशाल सूचना भंडारण के तेज उपकरण बिल्कुल सस्ते बनाए जा सकते हैं। अर्थात हमारे कंप्यूटरों मे लगी हार्ड-डिस्क से कई गुना बडी क्षमता और तेजी के उपरकण बनाना संभव है – बनाए जा रहे हैं। इन उपकणों पर किसी भी प्रकार की सूचना – दृश्य, श्रव्य, दस्तावेज़ या आंकडों की फ़ाईलों को इस तकनीक से सहेजा जा सकता है। इस राष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत तकनीक पर पेटेंट लिया जा रहा है।

रेनोबो टेक्नॉलोजी से बनी डिस्क को आर.वी.डी RVD यानि रेनबो वर्सेटाईल डिस्क कहा जाता है। सामान्यत: एक आर.वी.डी पर 90 जीबी से 450 जीबी तक सूचना संग्रहित की जा सकती है – जबकी एक सामान्य डी.वी.डी की क्षमता मात्र 4.7 जीबी होती है। एक आर.वी.डी को बनाने में 50 पैसे से 1 रुपये की लागत आती है। जबकी एक सीडी को बनाने में लगने वाला पेट्रोलियम सह-उत्पाद पोली कार्बोनेट 400 से 450 रुपये प्रति किलो का पडता है। एक सीडी बनाने मे 16 ग्राम पॉली कार्बोनेट लगता है – अत: कम कीमत में गुणवत्ता प्रदान करना संभव नही होता। जबकी 131 गुना अधिक भंडारण क्षमता देने वाली आर.वी.डी सामान्य कागज़ से बनाई जा सकती है।

रेनबो टेक्नॉलोजी में सबसे पहले किसी भी फ़ार्मेट (संरूपण) के डाटा को एक साझा फ़ार्मेट में बदला जाता है। इस साझा फ़ार्मेट को “रेनबो फ़ार्मेट” कहा जाता है। इस फ़ार्मेट को ऐसे बनाया गया है की इसे बिंब यानि इमेज के रूप में छापा जा सकता है। इस के लिए अलग अलग ज्यामितीय आकारों, रंगों और अन्य आकारों का संयोजन किया जाता है। हर आकार और रंग का संयोजन एक संपूर्ण नमूना होता है – सूचना की एक पूरी बानगी होती है। इस हेतु इमेज प्रोसेसिंग और पैटर्न मैचिंग जैसी आधूनिक तकनीकी का पूरा प्रयोग होता है। जो सूचना इस प्रकार परिवर्तित कर ली जाती है उसे कागज़ पर उतार दिया जाता है। इस प्रकार सूचना का संग्रहण संभव हो पाता है। सूचना को पढने के लिए इस से उलट किया जाता है।

रेनोबो टेक्नॉलोजी से बनी डिस्क आर.वी.डी पर 90 से 450 जीबी तक सूचना संग्रहित की जा सकती है, जबकि सामान्य डी.वी.डी की क्षमता मात्र 4.7 जीबी होती है।

सामान्यजन के लिये “कागज़” शब्द ही लेखन के साधन की छवि बनाता है सूचना संग्रहण के माध्यम की नहीं, पर सेनुल ने यह करिश्मा कर दिखाया है, यहाँ तक कि उनका मानना है कि “रेनबो तकनीक कागज के अलावा हर उस माध्यम का प्रयोग कर सकती है जिस पर रंग उकेरे जा सकें”। यानि कि कागज़ ही नहीं कपड़ा जैसे अन्य माध्यमों का भी उपयोग शायद संभव हो। सैनुल स्पष्ट कहते हैं, “ध्यान रहे की यह कागज़ आधारित तकनीक नही है। मैं सूचना के प्रदर्शन की तरकीब की बात कर रहा हूं। हम सूचना संग्रहण के लिए पेपर या किसी और माध्यम का प्रयोग कर सकते हैं। पुर्नप्रयोग मे लाई जा सकने वाली सामग्री के लिए हमें परिष्कृत तरीके लगाने होंगे।”

इसमें संदेह नहीं कि यह कार्य जटिल है। इस तकनीक का एक दिलचस्प पहलू है ज्यामितीय आकारों और रंगों के प्रयोग से सूचना का प्रदर्शन जो हमें इजिप्ट के हेरोग्लिफ़्स और लोगोग्राम्स की याद दिलवाता है। पर रेनबो फ़ार्मेट के दूसरे फ़ार्मेट्स की तुलना में क्या नफा नुकसान हैं? सैनुल बताते हैं, “इस तकनीक का लाभ है अधिक भंडारण क्षमता और नुकसान है जटिल इमेज प्रोसेसिंग और पैटर्न मैचिंग जुगतों की जरूरत।”

हर रेनबो फ़ार्मेट के कुछ हिस्से होते हैं – मसलन हेडर, बॉडी, फ़ुटर, पैरिटी, रेनबो बाऊंड्री मैपर आदि। हेडर में चित्र का आकार रखा जाता है। चित्र खींचने में प्रयोग की गई जुगत, त्रुटी परिक्षण तंत्र आदि भी स्थापित किए जाते हैं। हालांकी परिवेश में प्रकाश की मात्रा में भिन्नता के चलते रंगों की आभा देने में समस्या आती है किन्तु उसे काफ़ी हद तक मैपिंग फ़ंक्शन्स यानि प्रतिचित्रण जुगतों के माध्यम से ठीक किया जा सकता है। सैनुल स्वीकारते हैं कि “रंगों का उडना और उनका सटीक ना होना” बड़ी चुनौती बन कर उभरी पर कुछ संचितकरण तरकीब से वे इस पर काबू पा सके।

रेनबो टेक्नॉलोजी के माध्यम से मुख्यत: चार प्रकार के उपकरण बनाए जा सकते हैं। वे हैं आर.वी.डी, निर्वर्त्य या डिस्पोज़ेबल उपकरण, डाटाबैंक और रेनबो कार्ड। ये सभी तेज गति के अधिक क्षमता के उपकरण हैं। डिस्पोजेबल उपकरण भविष्य में किसी पत्रिका या पुस्तक के साथ भेजी जाने वाली सी.डी या डी.वी.डी का स्थान भी ले सकते हैं।

रेनबो कार्ड अलग अलग आकार और क्षमता के बनाए जा सकते हैं और ये डी.वी.डी का स्थान ले सकते हैं। एक वर्ग इंच के रेनबो कार्ड में 5 जीबी से अधिक डाटा संग्रहित किया जा सकता है। एक ब्रिटिश कंपनी नें रेनबो कार्ड के उत्पादन में रुचि दिखाई है।

डाटाबैंक की क्षमता कल्पनातीत जान पडती है। 125.603 पेटाबाईट क्षमता के डाटाबैंक बनाना संभव है। इस प्रकार यह स्पष्ट है की रेनबो तकनीक छोटी बडी हर प्रकार की जरूरतों के लिए प्रयोग में लाई जा सकती है।

रेनबो टेक्नॉलोजी एकाधिक रूप से नई ज़मीन पर बनी है। सैनुल मानते हैं कि “अधिक क्षमता, कम कीमत, पर्यावरणानुकूलता और आसानी ” इस खोज को दिलचस्प बनाती है।

“हर शिक्षण संस्था में एक शोध विभाग होना चाहिए जो एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में कार्य करे और जिसके अपने उत्पाद हों”

एक छात्र के द्वारा रेनबो जैसी जटिल और अनोखी तकनीक के इजाद से भारतीय तकनीकी महाविद्यालयों की काबलियत के प्रति समाज की उम्मीद भी सुदृढ़ होती है और हमें हमारे युवाओं के सुनहरे भविष्य के प्रति आश्वस्त भी करती है। हमने सैनुल से पूछा कि उनके विचार में हमारी शैक्षणिक संस्थाओं में शोध और विकास को बढावा देने के लिए क्या किया जाना चाहिए। सैनुल का कहना है, “मुझे हमेशा माता-पिता और गुरुओं का प्रोत्साहन मिला। हर शिक्षण संस्था में एक शोध विभाग होना चाहिए जो एक स्वतंत्र कंपनी के रूप में कार्य करे और जिसके अपने उत्पाद हों। छात्रों को अपने मनपसंद प्रोजेक्ट्स पर काम करने की स्वतंत्रता हो और आर्थिक तथा तकनीकी सुविधाएं मिलें ताकि विचार उत्पाद में बदल सके। इस प्रकार होने वाली आय का लाभ संस्था को भी मिलना चाहिये।”

सैनुल और नई परियोजनाओं पर भी काम कर रहे हैं – जिनके नाम हैं एक्स्प्रेस्सा, ई-फ़ोन व रोबो-बेबी। एक्स्प्रेस्सा क्षेत्रीय भाषाओं के लिए बनाया जा रहा एक साफ़्टवेयर है। लिखित सामग्री को इस के माध्यम से श्रव्य बनाया जा सकता है और पार्श्व संगीत भी जोडा जा सकता है। इस तरह से मोबाईल फ़ोन के माध्यम से इन्टरनेट पर उपलब्ध सामग्री को सुना जा सकता है। तो क्या भविष्य में वे केवल शोधकार्य करते रहने चाहते हैं या अपनी कंपनी भी शुरु करना चाहेंगे? “दोनों!”, सैनुल चहककर कहते हैं, “मैं मित्रों के साथ मिल कर केर्लोनटेक नामक प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की स्थापना कर रहा हूं।” और अपने साथी युवाओं क्या संदेश देना चाहेंगे वे, “अध्ययनरत रहें। अपने परिवेश का विश्लेषण करें और उस पर प्रश्न भी। अपने प्रश्नों के उत्तर स्वयं ढूंढें और उन्हें पहले से गढे हुए उत्तरों से तौलें। कई नए रहस्य उजागर होंगे। और हाँ, जीवन में मानवीयता को स्थान दें।”

एक प्रतिक्रिया

  1. एक युवा शोधकर्ता और और उसके शोध के बारे मे सरल शब्दों मे जानकारी देने के लिये बहुत धन्यवाद्.