वर्डप्रेस: बेमोल, फिर भी अनमोल

वर्डप्रेस की लोकप्रिय मुक्त सोर्स थीम मांजी के जनक ख़ालेद अबु अल्फ़ा का नज़रिया

अंतर्जाल बड़ा रोचक स्थान है। यहाँ लोगों का सिर्फ एक ही धर्म है। अंतर्जाल पर पनपे हैं ढेरों सॉफ्टवेयर और टनों पंक्तियों के कोड, जिन पर किसी का अधिकार नहीं है और सभी का अधिकार है भी। मुक्त सोर्स परियोजनाओं में अनगिनत जाने पहचाने लोगों का पसीना होता है और बिना किसी लालच व पारिश्रमिक के बनाये गये इन उत्पादों का मोल विशालकाय कंपनियों के नामचीन उत्पादों से कहीं ज्यादा है क्योंकि इन उत्पादों के आसपास पनपते हैं समुदाय, जो स्थान, उम्र, धर्म, लिंग या भाषा से बंधे नहीं हैं।

आखिर क्या वजह है कि लोग ऐसी परियोजनाओं में समय लगाते हैं? कैसे मीलों दूर बैठे लोग आपसी समन्वय रख पाते हैं। कैसा लगता है इनमें हिस्सेदारी करना? यह सारे सवाल हमने किये वर्डप्रेस की लोकप्रिय मुक्त सोर्स थीम मांजी के जनक ख़ालेद अबु अल्फ़ा से। लेबनान में जन्में ख़ालेद दिन में तो इमारतों में बिजली के निकायों की रचना करते हैं पर उनकी रूह बसती है कला, रेखांकन तथा वेब डिज़ाईन के कार्य में। मांजी के सफरनामे को पढ़कर आपको शायद इन सवालों का जवाब मिल सकें और हो सकता है मिले ऐसी ही किसी परियोजना में शामिल होने की प्रेरणा भी।

मैं

ने करीब दस महीने पहले वर्डप्रैस पर काम शुरु किया। यह वही समय था जब मूवेबल टाईप ने अपने आप को बेचकर उसकी प्रारम्भिक सफलता के जिम्मेवारों को धता बताया था। प्लगइन बनाने वालों से लेकर, बीटा टेस्टिंग करने वालों तक, मूवेबल टाईप के काफी अच्छे होने के बावजूद इसका प्रयोग करते रहना निहायत गलत लगा। मैंने भी इधर उधर देखना शुरु किया और कुछ साफ्टवेयर परखने का का निर्णय किया जैसे टेक्स्ट-पैटर्न, वर्डप्रैस और एक और जिसका नाम भी मुझे याद नहीं। उस समय चारों ओर लोगों के मूवेबल टाइप से वर्डप्रैस पर पाले बदलने की खबरें आ रही थी।

मुझे अभी भी याद है कि उस रात मैंने मूवेबल टाइप के टैग सीखे ही थे और उसी रात ही इसके बदलाव के लिए सॉफ्टवेयर देखना शुरु कर दिया था। उस समय टेक्स्ट-पैट्रन के लाइसेंस के बारे में पूरी तरह से साफ नहीं था और मैं एक बार फिर से मूवेबल टाईप वाली गलती नहीं करना चाहता था। इसी लिए मैं वर्डप्रैस की तरफ मुड़ा क्यूँकि एक तो इसे लगाना बड़ा आसान था और जैसे ही स्क्रिप्टों की शहजादी ने वर्डप्रैस को अपनाया मुझे इस से बड़ा आशावासन नहीं चाहिए था।

माईकल का कुबरिक थीम जारी करना एक बड़ा बदलाव था। उनका काम इतना बढ़िया था कि हर दूसरे ब्लॉगर के पास कुबरिक ही हुआ करती। इस में गलत कुछ नहीं है पर विविधता से ही नई चीजें आती है, और इसी लिए विकल्पों का होना बहुत ज़रुरी है। दूसरा और मुख्य कारण यह था की मैं वर्डप्रैस समुदाय में अपना योगदान देना चाहता था। मुझे लगा कि एक ऐसा समुदाय जिसे कितने ही लोगों ने घंटों बैठ कर संवारा है मेरा ध्यान पाने के योग्य है। यही मुक्त-सोर्स समुदाय की खासियत है, आप जितना चाहें उतना समय इसे दे सकते हैं।

बहरहाल, मैं वर्डप्रैस समुदाय को कुछ वापिस देना चाहता था। पर लगता था कि यह वैब स्टैंडर्ड क्या बला हैं? क्या कारण है कि लोग टेबल का प्रयोग नहीं करना चाहते? मैंने काफी पढ़ा और निष्कर्ष यह निकला कि भई मैं प्रोग्रामर तो हूँ नहीं, मुझे बहुत कुछ सीखना है। मैं एक सुन्दर बढ़िया डिज़ाइन तो बना सकता था पर मेरा कोड निहायत ही भद्दा होता। तो मैंने अपने दैनिक काम से ही एक नुक्ता निकाला। आर्किटेक्ट कल्पना करते हैं व इंजीनियर्स उसे पूरी तरह से बनाते हैं। पर यहाँ मैंने इसका उलट किया, यहाँ मैं आर्किटेक्ट बन बैठा। वर्डप्रैस फोरम पर सी.एस.एस के गुरु रुट से मैंने सम्पर्क किया और उस से पूछा कि क्या उसे इस काम में दिलचस्पी है। उस ने हामी भरी और हम शुरू हो गए। पहले तो वह बस प्रेक्षण और छोटे मोटे बदलाव करना चाहता था, पर जब मैं ने डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर दी (मांजी का मूल नमूना देखें) तो यह साफ हुआ कि मुझे बुनियादी बनावट से दूर रह बाद में आकर परिवर्तन करने चाहिए।

मुक्त-सोर्स समुदाय की यही खासियत है कि आप जितना चाहें उतना ही समय इसे दे सकते हैं।

जब हमने काम शुरू किया जब वर्डप्रेस 1.3 ऍल्फा या कुछ ऐसे ही वर्जन में था। थीम परिवर्तक उन्हीं दिनों चालू हुआ था, इसलिए मैं ने एक विकास चिट्ठा बनाया और कार्य शुरू हो गया। जब उत्पादन कार्य शिखर पर था, तो मुझे याद है एक रविवार हम ने पूरे 14 घंटे लगाए जब तक कि सारा ढाँचा नहीं बन गया। पूरे दिन में हम कहाँ से चले और कहाँ पहुँचे, यह देख कर हैरानी हो रही थी। दुर्भाग्य से रूट को तब छोड़ कर जाना पड़ा जब 80 फीसदी काम पूरा हो चुका था। इसलिए कोडिंग को पूरा करने का काम मुझ पर आन पड़ा। इसी दौरान डेविड प्रिन्स साथ आ मिले और कुछ कामों को निबटाने में मदद की। आखिर में जॉशुआ भी आ मिले, क्योंकि वह मांजी के शुरुवाती विमोचन के समय से ही बढ़िया प्रतिक्रिया दे रहे था। वर्डप्रेस 1.5 के लिए क्लासिक और डिफॉल्ट के अतिरिक्‍त मांजी पहली थीम थी।

मांजी

वर्डप्रेस की जो बात मुझे बढ़िया नहीं लगती वह है इसका प्रबन्धन पटल।

वर्डप्रेस को लगातार बेहतर बनाया जा रहा है। थीम बनाने के बाद मैं यह सोचने लगा कि वर्डप्रेस की जो बात मुझे बढ़िया नहीं लगती वह है प्रबन्धन पटल। इसलिए मैंने ऐसे सभी लोगों से संपर्क साधा जो इस के लिए कुछ करने के इच्छुक थे। कुछ समय बाद माइकल को भी वही ख्याल आया, इसलिए मैं ने उससे संपर्क किया और उसे भी साथ मिलने को कहा, और वह खुशी खुशी आ गया। मैट (मुलनवेग) तक खबर कुछ मिलावट के साथ पहुँची और वह समझा हम कुछ अलग से कर रहे हैं। उसे समझाया कि ऐसा नहीं है तो वह भी साथ हो लिया। उसके बाद जोएन भी आ मिला, और कुछ घुमक्कड़ (खासकर रायन बोरेन) भी आते जाते कुछ न कुछ भागीदारी करते रहते हैं। प्रबन्धन पटल का एक नमूना तो बन गया है, पर हर बार जब यह वितरित किया जाता है, इस में बदलाव हो जाते हैं। फिर भी मैं यह कहूँगा कि दल के सारे सदस्य व्यक्त किये गये विचारों से उत्तेजित हैं और इसे प्रयोग करने के लिए बेताब हो रहे हैं।

जब हमारा काम पूरा होगा तो मुझे लगता है किसी के पास वर्डप्रेस प्रयोग न करने का कोई कारण नहीं होगा, यह अन्तर्जाल पर सब से सुन्दर और कार्यशील चिट्ठा-लेखन यन्त्र होगा। बेमोल, और फिर भी अनमोल।

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