भारतीय ब्लॉगिंग: टिप्पिंग प्वाईंट पर

व्यक्तिगत डायरी या टेकी बड़बड़ से बातचीत के व्यापक वातावरण में बदल चुके हैं भारतीय ब्लॉग

Aamukh Katha

Aamukh Katha

मै

ल्कम ग्लैडवेल “टिप्पिंग प्वाइंट” की परिभाषा इस प्रकार देते हैं, “यह वह चमत्कारी लम्हा है जब विचार, तौर तरीके या सामाजिक व्यवहार देहलीज़ पार करते हैं और जंगल की आग की तरह फैल जाते हैं”।

उनकी किताब इसी विचार पर आधारित है कि विचार और उत्पाद और संदेश और व्यवहार उसी तरह फैलते हैं जैसे कि वायरस। उन्होंने “टिप्पिंग प्वाइंट” के तीन नियम प्रतिपादित किये हैं‍ – थोड़े का नियम (द लॉ आफ द फ्यू), जुड़ाव का घटक (द स्टिकी फैक्टर) तथा संदर्भ शक्ति (द पॉवर आफ कन्टेक्स्ट)। यह लेख इस पुस्तक का समीक्षा नहीं है इसलिए मैं तफ़सील में इन कारकों की चर्चा नहीं करूंगी, पर ये इस बात का परीक्षण करने में कारगर होंगे कि भारतीय ब्लॉगिंग किस दिशा में जा रहा है, क्यों यह “टिप्पिंग प्वाइंट” की कगार पर है और इसका भविष्य कैसा है। इन में से एक कारक, द लॉ आफ द फ्यू कि विवेचना करते हुए ग्लैडवैल बहुत कम संक्रमित लोगों द्वारा फैली महामारी की बात करते हैं। वे इन्हें कनेक्टर, मैवेन तथा सेल्समैन पुकारते हैं। भारतीय ब्लॉगमंडल में कनेक्टर, मैवेन तथा सेल्समैन हमारे अपने समुच्चय (सेट) हैं। यह एक संकेत है जो इंगित करता है कि हम टिप्पिंग प्वाइंट कि कगार पर हैं।

मेरा दृढ़ विश्वास है कि ब्लॉगिंग अंर्तजाल पर महज़ आपकी अपनी डायरी या पत्रिका बना लेना ही नहीं है। यह उससे भी कहीं ज़्यादा है। कई चिट्ठाकार आपको ब्लॉगिंग की अपनी लत के बारे में बतायेंगे जो केवल एक लेख लिखने तक सीमित नहीं रहा। कितने ऐसे सक्रीय चिट्ठाकार इस बात से इंकार कर पायेंगे कि अपने दिन की शुरुआत वे अपने विगत चिट्ठे पर प्रतिक्रियाओं पर नज़र डाल कर करते हैं? या फिर यह जाँचकर कि किसी ने उनके चिट्ठे को लिंक किया है? या फिर अपने न्यूज़रीडर पर अपने समुदाय के अन्य चिट्ठाकारों के रोचक चिट्ठों को पढ़कर? या फिर उन चिट्ठों पर, जहाँ उन्होंने कोई टिप्पणी छोड़ी थी, वापस जाकर यह पता करते कि चर्चा का हश्र क्या हुआ? या फिर अपने ब्लॉग के आगंतुकों के आंकड़े देखकर यह पता लगाते कि जो वो लिख रहे हैं उसे कौन पढ़ रहे हैं?

ब्लॉगिंग लोगों के मध्य यथार्थ में होती बेतकल्लुफ बातचीत से ताल्लुक रखती है। यही चीज इसे जुड़ाव का ज़रिया (स्टिकी) बनाती है। इन बातचीतों के गिर्द समुदाय बनते जाते हैं। कभी तो आहिस्ता आहिस्ता और कभी मनमाने अनुक्रम में।

ब्लॉगिंग लोगों के मध्य बेतकल्लुफ बातचीत से ताल्लुक रखती है। यही चीज इसे स्टिकी बनाती है। इन बातचीतों के गिर्द समुदाय बनते जाते हैं, कभी तो आहिस्ता आहिस्ता और कभी मनमाने अनुक्रम में।

भारतीय ब्लॉगमंडल में हम ब्लॉगर समागम, ब्लॉग की रँकिंग, ब्लॉग पुरस्कारों तथा ब्लॉग निर्देशिकाओं और सेवाओं मे इस बात के पुख्ता सबूत देख सकते हैं। तथापि, असली जादू इस उद्गामी माध्यम से जन्म लेतीं उन बेतरतीब परिचर्चाओं और इस में निहित प्राकृतिक चयन (नैचुरल सिलेक्शन) में है। इस क्षेत्र में एक दूसरे के संग काम करने के तरीके खोजते सम्बद्ध समुदायों के इस महान मिलन से…कितने ही अन्य समूह सूर्य के गिर्द नवीन इलाकों में ग्रहीय धूल (प्लेनेटरी डस्ट) की भांति उपज रहे हैं जो हमारी खोयी मानवता को पुनः प्रखर कर रहे हैं”

यह कैसे काम करता है यह प्रर्दशित करने के लिए त्सुनामी हेल्प ब्लॉग (द साउथ-ईस्ट एशिया अर्थक्वेक एंड त्सुनामीज़ ब्लॉग) के साथ मेरे हाल के अनुभव से बेहतर उदाहरण मुझे भारतीय ब्लॉगमंडल से नहीं सूझ पड़ता। इसने मात्र कुछ ही घंटों में पूरे विश्व में सेंकड़ों स्वयंसेवकों को तैयार कर दिया तथा त्सुनामी मदद, राहत और स्वयंसेवकों के लिए सूचना के एकल स्रोत प्रदान किया। यह ब्लॉग माध्यम की शक्ति का बहुत बड़ा उदाहरण है।

Peter Griffinअपनी पुस्तक स्मार्ट मॉब्स में हॉवर्ड रीनगोल्ड कहते हैं कि यह तब उभरते हैं जब संचार और गणन तकनीकें सहयोग के मानवीय प्रतिभाओं को परिवर्धित करती हैं। त्सुनामी हेल्प ब्लॉग के साथ जो हुआ वह थी एक मैवेन तथा कनेक्टर पीटर ग्रिफिन द्वारा शुरू की गई चतुर जमघट (स्मार्ट मॉबिंग), जिसे दुनिया भर में सेल्समेन और कनेक्टरों द्वारा ज़ोर दिया गया और जो संक्रमण की तरह फैली और जिसके ऐसे आश्चर्यजनक परिणाम निकले जो इस ब्लॉग के संस्थापकों की कल्पना के परे था। इससे से यह स्थापित भी हुआ कि एक व्यक्ति कि तुलना में समूह ज्यादा चतुर होता है।

आज पारंपरिक भारतीय समाचार माध्यमों में ब्लॉग के विषय में चर्चा होती है। पहले भी लेख आते थे, परन्तु बहुत कम, जिनमें चिट्ठों को टेकी (तकनीकी) लोगों की बड़बड़ और युवा जगत की बातें मान कर खारिज कर दिया जाता था। आज इस रुख में बदलाव आ रहा है, दुख कि बात है कि त्सुनामी जैसी त्रासदा के बाद ही भारतीय टीवी और प्रेस यह जान पाया कि ब्लॉगिंग क्या है और इसके प्रति उनका सम्मान बढ़ा। तथापि, दिल्ली अभी दूर है।

भारतीय ब्लॉग अब किसी युवा की व्यक्तिगत डायरियों या टेकी की बड़बड़ से वार्तालाप के ज्यादा व्यापक माहौल में विकसित हो चुकी हैं।

भारतीय ब्लॉगिंग का भविष्य इस बात पर निर्भर है कि इस क्षेत्र से ज्यादा से ज्यादा कनेक्टर, मैवेन और सेल्समेन आ कर जुड़ें। ब्लॉगिंग की महामारी भले ही ग्लैडवेल के नियमों का अनुसरण ना करे पर इनमें में से किसी एक नियम पर ध्यान केंद्रित कर सकती है जिसका इस महामारी के उतार या चढ़ाव पर व्यापक असर हो। भारतीय ब्लॉग अब किसी युवा की व्यक्तिगत डायरियों या टेकी की बड़बड़ से वार्तालाप के ज्यादा व्यापक माहौल में विकसित हो चुकी हैं। व्यक्ति और समूह दोनों इस अद्भुत सामाजिक घटना से लाभान्वित हो रहे हैं। पत्रकार इस नए माध्यम का प्रयोग अपने विचारों के संप्रेषण और पाठकों की प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए कर रहे हैं। रेस्तरां के मालिक लोगों और ग्राहकों से ब्लॉग के माध्यम से बातचीत कर रहे हैं। भारतीय मीडिया पर एक व्यक्ति कि बेबाक राय विज्ञापन तथा विपणन के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर पढ़ी जाती है। बीपीओ उद्योग में रुचि रखने वाले चिट्ठाकारों का एक समूह ब्लॉग के मंच पर समुदाय गढ़ लेते हैं। कई और ऐसे समुदाय पनप रहे हैं। इस दृश्यता के कारण ही मुझे अमेरिका स्थित ग्राहकों से कई लाभदायक परियोजनाएं मिलीं, क्योंकि मेरा ब्लॉग मेरे विषय में किसी साधारण जालस्थल कि तुलना में कहीं ज्यादा जानकारी देता है।

हम ब्लॉगिंग के परिदृश्य में सामाजिक माध्यमों की और भी ज्यादा संसृति देखेंगे। कैफेराटी ने हाल ही में सर्वश्रेष्ठ एस.एम.एस काव्य के लिए एक पुरस्कार जीता, इससे यह और भी दमदार औज़ार बनेगा। विचारों को क्रिया में बदलते हुए। संचार की धारा और सहयोग में ईज़ाफा करते हुए, जैसा कि त्सुनामी हेल्प ब्लॉग ने शक्तिशाली रूप से किया।

वह दिन आएगा जब यह नया माध्यम पारंपरिक संचार माध्यमों को अपने पाठकों के साथ जुड़ने के नए तरीके ईजाद करने कि लिए प्रोत्साहित करेगा। जब यह लोगों, समूहों और संस्थाओं द्वारा कार्यस्थल और बाहर किए जाने वाले आयोजनों का तरीका बदल देगा। जब भारतीय संस्थाएँ ऐसी तकनीकें अपनाना चाहेंगी और चिट्ठाकारों को ब्लॉगिंग के लिए पारितोषिक भी देंगी।

मूल अंग्रेज़ी आलेख का हिन्दी रूपांतरण: देबाशीष चक्रवर्ती

एक प्रतिक्रिया

  1. देबाशीष भाई का अनुवाद बहुत ही प्रभावशाली है। इसका प्रमाण है कि भाषा कहीं भी दुरूह नही हो पायी है। लेख पढकर कुछ नये मन्त्र प्राप्त हुए।
    [Sat, 2005-03-12 14:34]