आस्था की तुष्टि से संतोष मिलता है

पूछिये फुरसतिया सेघर, दफ्तर, सड़क हर जगह मुसीबतें आतीं हैं, सेंकड़ों सवाल उठ खड़े हो जाते हैं। अब सर खुजलाते खुजलाते हमारे रडार पर एक महारथी की काया दिखी तो उम्मीद कि किरणें जाग उठीं। अब कोई पप्पू फेल न होगा। (प्रभु, अब तक कहाँ थे आप?) भक्तगण! प्रश्न चाहे किसी भी विषय पर हों, साहित्यिक हों या हों जीवन के फलसफे पर, सरल हो या क्लिष्ट, नॉटी हो या शिष्ट, विषय बादी हों या मवादी, कौमार्य हो या शादी, पूछ डालिये बेझिझक। सारे जवाब यहाँ दिये जायेंगे, फुरसत से। ससूरा गूगलवा भला अब किस काम का, पूछिये फुरसतिया से!

तरुण पूछते हैं कि रात के बाद सबेरा होता है या सबेरे के पहले रात?

यार, पहला सवाल पूछा वो भी निठल्ला! यह तो मुर्गी पहले या अंडे वाली बात हुई। एक घर में एक मेहमान कुछ ज्यादा दिन टिक गया। घर के बच्चे ने कहा, "अंकलजी,आप इतने अच्छे हैं। क्या आप फिर नहीं आयेंगे?" मेहमान बोला, "क्यों नहीं आयेंगे बेटा? जरूर आयेंगे। तुम ऐसा क्यों सोचते हो कि मैं नहीं आऊंगा।" बच्चा बोला, "आप आयेंगे तो तब जब आप जायेंगे"। तो यही हाल रात-सबेरे का है। एक का आना दूसरे के जाने से जुड़ा है। आप किसको पहले देखना चाहते हैं यह आप पर है। वैसे मैं तो यही मानता हूं कि हर रात के बाद सबेरा आता है। किसी भी सबेरे तक पहुंच कर रात के बारे में सोचना समय बरबाद करना है।

जितेन्द्र पूछते हैं आजकल हसीनों में शर्मोहया क्यों नहीं है? वो शरमाना, वो लजाना कहाँ गायब हो गया है?

आज के ‘डेटिंग’ के जमाने में तुम शर्म खोज रहे हो। बड़े बेशर्म हो! यह तो कुछ ऐसा ही है कि ‘फ्लडलाइट’ के जमाने में लालटेन की या ‘लेटेस्ट’ लैपटाप में 5.25" की फ्लापी ड्राइव खोजी जाये।

किन हसीनाओं से मिल रहे हो आजकल मियाँ? क्या वे तुम्हारे कहने पर भी ब्लाग लिखने को तैयार नहीं हैं जो तुमको वे बेशर्म, बेहया लग रही हैं? वैसे हर ज़माने में खूबसूरती और इज़हारे मुहब्बत के प्रतिमान अलग होते है। आज के ‘डेटिंग’ के जमाने में तुम शर्म खोज रहे हो। बड़े बेशर्म हो! यह तो कुछ ऐसा ही है कि ‘फ्लडलाइट’ के जमाने में लालटेन की या ‘लेटेस्ट’ लैपटाप में 5.25" की फ्लापी ड्राइव खोजी जाये या इस ‘नेटयुग’ में संदेशों के लिये कबूतरों का इंतजार किया जाये। याद है, पहले कभी किसी की तिरछी नजर जिदगी भर कुछ यूँ धंसी रहती थी-

तिरछी नजर का तीर है मुश्किल से निकलेगा,
गर दिल से निकलेगा तो दिल के साथ निकलेगा।

अब जमाना बदल रहा है। महिलायें अब नैन झुका के नहीं, मिला के बात करने लगी हैं। मामला बराबरी का है। ऐसे में लजाने, शर्माने, हाय दैया कहकर लाल हो जाने वाली हसीनाओं की खोज करना समय चक्र को पीछे करना है। फिर भी अगर हुड़क रहा हो जी किसी नाज-नखरे, शर्मो-हया से लथपथ हसीना से दीदार का, तो हिंदी फिल्मों के हीरो की तरह चले जाओ किसी सुदूर ग्रामीण अंचल में छुट्टी बिताने। शायद मिल जायें। पर पत्नी से पूछ लेना। कहीं ऐसा न हो कि बाथरूम की जगह पूरा घर साफ करना पड़ जाये, हर रोज़।

देवाशीष का सवाल है, पूजा के समय भगवान को प्रसाद व भोग चढ़ाया जाता है, यह जानते हुये भी कि अंतत: खाना इन्सान को ही है। आखिर क्यों?

भइयै, इस बारे में हमने नारदजी से बात की। सवाला कि कितना पहुंचता है प्रसाद भगवान के पास? वे बोले, "जितना चढ़ता है उसका यही कोई 15%"। हमारा कौतूहल बढ़ा, पूछ बैठे, "बाकी कहां जाता है?" वे सकुचाकर बोले, "बिचौलिये खा जाते हैं"। हमें बड़ी चिंता हुई। सोचा कि भगवान भी क्या भारत की आम जनता हो गये हैं, जिनके लिये चले प्रसाद का कुछ अंश ही उन तक पहुंच पाता है, शेष बीच वाले खा जाते हैं। लोगों का यह जानते हुये भी प्रसाद चढ़ाना, कि खाना उन्हीं को है कुछ इसी तरह है ज्यों जनता के कल्याण के नाम पर नेता-अधिकारी ऐसी योजनायें बनाते हैं जिनसे अंतत: स्व‍-कल्याण ही हो।

हरिशंकर परसाई जी ने "सुदामा के चावल" में बताया है कि असल में सारा चावल तो द्वारपाल नोच-खसोट कर खा गये थे। कृष्ण के पास सुदामा खाली हाथ पहुंचे थे।

यह लोककथा प्रचलित है कि सुदामा के चावल खाकर कृष्ण ने उनको मालामाल कर दिया। हरिशंकर परसाई जी ने "सुदामा के चावल" में बताया है कि असल में सारा चावल तो द्वारपाल नोच-खसोट कर खा गये थे। कृष्ण के पास सुदामा खाली हाथ पहुंचे थे। पूरा वाकया सुनने पर कृष्ण ने इस सच को छुपाने के लिये सुदामा को मालामाल किया था कि सुदामा उनके दरबार में लूट लिये गये। उन्होंने कहा था, "तुम नवें आदमी हो जो अपने को सुदामा बताकर आया है। मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो? पर यह धन मैं इस अनुरोध के साथ दे रहा हूं कि मेरे दरबार में जो धांधली फैली है वह बाहर मत कहना। यह एक मित्र को मेरा उपहार नहीं है। सच को दबाने का सौदा है यह।" बाद में सौदा पट जाने पर "दो मुट्‌ठी चावल- दो लोक" वाली कहानी फैला दी गयी।

वैसे माहाराज, अपने से ताकतवर को पूजने का पुराने समय से ही रिवाज रहा है। मानव पहले प्रकृति से रहस्यों से अनजान था तो शुरु में अग्नि, वायु, जल आदि को पूजता रहा। प्रसाद चढ़ाता रहा। ये देवता हमारे बीच के थे। प्रसाद सीधे पहुंच जाता रहा। बाद में मानव की जरूरतें बढ़ीं तो देवता ‘इम्पोर्ट’ किये गये। अवतरित हुये पापनाश के लिये – दुष्टों के संहार के लिये। पूजा-प्रसाद का तरीका वही रहा। सच बात तो यह है कि कहीं कुछ नहीं पहुंचता। यह तो हमारी रूढ़ सोच है कि यहां के चढ़ाया प्रसाद किसी भगवान तक पहुंचता है। यह हमारी आस्था है जिसकी तुष्टि से हमें संतोष मिलता है। अगर भगवान कहीं हैं और प्रसाद के पैमाने से भक्तों को सुख आवंटित करते हैं तो उनमें और घूस लेकर काम करने वाले अफसर में क्या अंतर है? हालांकि घनघोर आस्तिक भी मानते कहते हैं कि मुख्य चीज है भावना। कुछ लोग पूरी दुनिया में भगवान की सत्ता मानते हैं तथा कहते हैं-

जाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर,
या फिर वो जगह बता जहां खुदा न हो।

जितेन्द्र का एक और सवाल: लोग कहते हैं कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता। आपका जहां कितना मुकम्मल है?

यार जीतेन्दर, पूरा जहां तो अपन ने देखा नहीं अभी तक, पर यह जानते हैं कि हमें पल्लवित करने के लिये अपनी सुविधाओं को स्थगित करने वाले मां-बाप-भाई मिले, हमको अपना मानसपुत्र मानने वाले तथा अपने को दुनिया में किसी से भी हीन न समझने का उत्साह व आत्मविश्वास भरने वाले गुरु मिले, अपने से भी ज्यादा अपना समझने वाले दोस्त मिले, सारे मतभेद और विसंगतियों को अनदेखा करके चाहने वाली पतिगर्विता पत्नी मिली, बेहद प्यारे-बेऐब बच्चे मिले, लगभग अपनी शर्तों पर काम करने लायक परिस्थितियां मिलीं और अब तुम्हारे जैसे सिरफिरे सवाल पूछने वाले दोस्त मिले। लोग ‘बिग बैंग’ थ्योरी के आधार पर कहते हैं कि ब्रम्हांड प्रकाश की गति से फैल रहा है। जब कभी यह प्रसार रुकेगा ऊर्जा के चुकने पर तो ब्रम्हांड सोचेगा, यार काश मैं फुरसतिया के जहां जितना मुकम्मल हो पाता। हमारी बात ही शायद कृष्ण बिहारी ‘नूर’ ने अपने शेर में कही है-

मैं कतरा सही, मेरा अलग वजूद तो है,
हुआ करे जो समंदर मेरी तलाश में है।

 

फुरसतिया का अवतार ले कर हर महीने ऐसे ही रोचक सवालों के मज़ेदार जवाब देंगे अनूप शुक्ला। उनका अद्वितीय हिन्दी चिट्ठा "फुरसतिया" अगर आपने नहीं पढ़ा तो आज ही उसका रसस्वादन करें। आप अपने सवाल उन्हें anupkidak एट gmail डॉट कॉम पर सीधे भेज सकते हैं, विपत्र भेजते समय ध्यान दें कि subject में "पूछिये फुरसतिया से" लिखा हो। इस स्तंभ पर अपनी प्रतिक्रिया संपादक को भेजने का पता है patrikaa एट gmail डॉट कॉम

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