चिठ्ठाकारी को ज़्यादा गँभीरता से न लें

ब्लॉग नैशविल गोष्ठी ~ एक रपट

करीबन दो साल हो चुके हैं मुझे ब्लॉगिंग करते और ब्लॉगमंडल को मात्र व्यक्तिगत वृतांतवर्णन के दौर से होकर व्यापक जनसमूह से सार्थक चर्चा का विस्तार लेते देखते। अपनी देखी फिल्मों पर ब्लॉग लिखने से मैं जिन राजनैतिक, सामाजिक मुद्दो को महत्वपूर्ण समझता था उन पर लिखने लगा, यद्यपि अभी भी यदा कदा फिल्मों पर लिखता हूँ। हाल में मैंने नैशविल में ब्लॉग नैशविल नामक एक ब्लॉग गोष्ठी में भाग लिया। तीन कारणों ने मुझे नैशविल तक चार घँटे ड्राईव करने को प्रेरित किया। पहला, यह मुफ्त थी, दूसरे कई नामवर ब्लॉगर, जैसे कि ग्लेन रेनॉल्ड , डैन गिलमोर ,डेव वाईनर, आर.एस.एस फीड के जन्मदाता, हेनरी कोपलैंड और रेबेका मैककिनन इसमें शिरकत करने वाले थे। तीसरा (और शायद सबसे ज़रूरी) कारण था कि मेरी ब्लॉगर महिला मित्र अपनी आगामी परीक्षा के बावजूद मेरा साथ देने को तैयार हो गयीं।

ब्लॉग नैशविल गोष्ठी में पहले सत्र की चर्चा का दृश्यएनोनीब्लॉगिंग पर पहली चर्चा में तो मैं भाग नही ले पाया। दूसरे सत्र में मैंने ब्लॉग पंडितों और स्थानीय पत्रकारों की खासी मौजूदगी वाली ब्लॉगिंग और पत्रकारिता चर्चा में भाग लिया। ब्लॉगिंग के विभिन्न आयामों पर आधारित सत्रों में से एक ने मुझे सर्वाधिक आकर्षित किया। यह था ब्लॉग ऍड्स वाले हेनरी कोपलैंड का (ब्लॉग से) पैसे बनाने का सत्र। ब्लॉगिंग और उससे मुद्रा अर्जन को गंभीरता पूर्वक लेने वालों की बड़ी संख्या देखना हैरानी की बात लगी क्योंकि मैंने ब्लॉगिंग को हमेशा अल्पकालिक मनोरंजन का जरिया समझा है जिसके जरिए विचारो के आदान प्रदान और पठन पाठन का दायरा बढता है। गूगल विज्ञापनों से क्षुद्र प्राप्ति के पूर्व तो मुझे कभी पैसे बनाने का ख्याल आया भी नहीं। भूतपूर्व सी.एन.एन कर्मी रेबेका मैककिनन का वैश्विक ध्वनियाँ सत्र मेरे हिसाब से सर्वाधिक विषय परक था। रेबेका ने असंख्य अमेरिकी चिठ्ठों के मध्य पूरे विश्व के क्षेत्रीय चिठ्ठो का संकलन बनाने का बीड़ा उठाया है। मैंने तुरंत इसमें भारतीय पृष्ठ जोड़ने का दायित्व लिया। गर्व है कि इसमें हिंदी का संकलन भी जुड़ गया है।

एक ईरानी चिठ्ठाकार हुसैन देराक्सन द्वारा ब्लॉगमँडल बनाने पर प्रस्तुत सत्र ने उस विधि से अवगत कराया जिसमें एक समूह का इस प्रकार क्रमवार विकास हो सकता है कि उसके माध्यम से राजनैतिक और सामाजिक परिवर्तन तक लाये जा सके। हालाँकि हम भारतीयों को कहीं अधिक वैचारिक एवं संवाद की स्वतंत्रता प्राप्त है पर हमारे इस शक्ति के उपयुक्त प्रयोग का प्रभाव नजर नहीं आता। चिठ्ठे की सबसे बड़ी ताकत सामान्य जनता को आवाज देना है और कोई भी प्रकाशक बन कर क्रांति का सूत्रपात कर सकता है। अगर पढ़ने और सुनने वाले लोग हैं तो मुझे विश्वास है कि भारत में प्रचूर आवाज़ें छुपीं है जो हमारे देश चलाने के तौर तरीकों पर महत्वपूर्ण प्रभाव छोड़ सकती हैं। हिंदी चिठ्ठा समूह जो हाल ही में सक्रिय हुआ है, हुसैन के प्रयासों की बेहतर अनुशंसा करेगा। मैं उनके कुछ सुझावों को क्रमवार रखता हूँ

  • तकनीकी रूप से सक्षम देश में रहने वाले, या ऐसे लोग जो संस्कृति से जुड़े हैं, ब्लॉग शुरू करें।
  • ब्लॉग बनाने की सरल विधि का भरपूर प्रचार करें। नये चिठ्ठाकारों को प्रोत्साहित करें। अधिक पाठक उन्हें ज्यादा लिखने को उकसायेगा। उनका विषयानुसार वर्गीकरण पाठकों को उनकी रूचि के अनुसार चुनाव में मदद देगा।
  • अधिक प्रचार हेतु तकनीकी लोगों की अपेक्षा मशहूर हस्तियों को चिठ्ठाकारी में घसीटिये।
  • स्थानीय कंप्यूटर प्रोगामरों को स्थानीय जरूरत के हिसाब से तकनीकें खोजने को प्रोत्साहित करें, जैसे कि यह ब्लॉग देखिए।
आदर्श उद्देश्यों के बीच भी लोगों को तमाशे पसंद हैं।

भारतीय चिठ्ठाकार हुसैन के प्रयासों से सीख ले सकते हैं। भारत में कंप्यूटर के सीमित प्रभाव और सूचना प्रसारण के ढाँचे को कोसने से पहले जरा ईरान के सीमित संसाधनों के बारे में सोचिए। वे राजनैतिक सहयोग और संसाधनों के मामने में हमसे भी गये बीते हैं। परंतु चिठ्ठों के प्रभाव से वहाँ समीकरण बदल रहे हैं। हुसैन का ब्लॉग ईरान में निषिध्ध है और वे नित नये डोमेन और ईमेल संस्करणों के जरिए अपने पाठकों तक पहुँचते हैं। अगला सत्र डेव वाईनर का था, सम्मानजनक मतविभिन्नता पर, जो मेरे हिसाब से सत्र के उद्देश्य के विपरीत था। सत्र में राजनैतिक स्तर के मतभेद जबरदस्त व्यक्तिगत मतभेदो के स्तर तक पहुँच गये। मेरे ख्याल से इस सत्र के बारे में अन्य चिठ्ठो पर भरपूर लिखा जायेगा, जो दर्शाता है कि आदर्श उद्देश्यों के बीच भी लोगों को तमाशे पसंद हैं।

नैशविल के इन सत्रों से मुझे साकार होती एक क्रांति नजर आयी। चिठ्ठाकारी अपने व्यक्तिगत विचार लिखने से कुछ ज्यादा है। अगर ढंग से दोहन हो सके तो यह सामुहिक बौद्धिक संपदा हमारे बुनियादी दृष्टिकोण में आमुलचूल परिवर्तन ला सकती है। एक गुमनाम से विधि प्राध्यापक के चिठ्ठे के प्रतिदिन लाखों आगंतुकों की सोच कर ही पत्राकारिता कि कंपकपी छूट रही है। चिठ्ठाकारी पत्राकारिता को स्थानापन्न नही कर सकती पर उस पर अंकुश रखने का एक सटीक माध्यम अवश्य है। इतना अवश्य है कि यह सूचना के आदान प्रदान का एक नया माध्यम भी है चाहे उसमें से कुछ प्रसार करने के योग्य न भी हो। इस प्रतिस्पर्धा के युग में अगर आप सरल एवं सटीक रूप से लिखेंगे तो आपको पाठक अवश्य मिलेंगे चाहे आप किसी भी विषय पर लिखें। पर चिठ्ठाकारी को ज़्यादा गँभीरता से न लें, विपणन के विचार और विश्वास जीतने की इच्छा को ताक पर रखिये और लेखन तथा विभिन्न विचारधारा रखने वाले वृहद लोगों से संवाद का आनंद लीजिए और देखिये कैसे आपकी जिज्ञासा और सहनशक्ति बढती है। जैसा कि जान कॉक्स ने कहा भी है, “चिठ्ठाकारी एक आनंद है, इसे ऐसा ही रहने दो और बाकी सब अपने आप होता जायेगा”, इस बात से भला कौन असहमत होगा।

पैट्रिक्स जिन्होंने ब्लॉग नैशविल गोष्टी में हिस्सेदारी की ने यह रपट खास निरंतर के लिये लिखी। आशा है कि भारतीय अंग्रेज़ी चिट्ठाकारों की निरंतर पर भागीदारी भी बढ़ेगी और वसुधैव कुटुम्बकम की भावना ब्लॉगमंडल में भी सर चढ़कर बोलेगी। मूल अंग्रेज़ी में लिखी रपट का हिन्दी रूपांतरण किया अतुल अरोरा ने।

जाल पर दो नयी पत्रिकायें


हिंदी की दो नयी पत्रिकायें प्रकाशित होने की जानकारी मिली है। सारिका सक्सेना द्वारा संचालित शब्दांजलि साहित्यिक पत्रिका है। वहीं से कुछ अन्य हिंदी की कड़ियों की जानकारी भी मिली। दूसरी पत्रिका है रति सक्सेना की काव्य पत्रिका कृत्य। दोनों पत्रिकाओं के प्रकाशन मंडल को हम उनके प्रवेशांक के लिये बधाई देते हैं तथा पत्रिका की निरंतर प्रगति की मंगल कामना करते हैं।

अंतर्जाल पर हिन्दी के बढ़ते चरण

अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। एक समय था जब इंटरनेट पर हिन्दी बहुत कम देखने को मिलती थी परन्तु आज स्थिति तेजी से बदल रही है। होशंगाबाद, मध्यप्रदेश में इसी विषय को लेकर एक ई-गोष्ठी 15 मई 2005 को स्थानीय ई‍ पब्लिक लाइब्रेरी में संपन्न हुई। गोष्ठी के संयोजक एवं संचालक जगदीश व्योम ने इस अवसर पर कहा कि विश्वजाल पर हिन्दी की उपस्थिति के बारे में अधिकांश लोग सुनते तो रहते हैं पर देखते बहुत कम हैं। इसे सार्वजनिक रूप से देखा और दिखाया जाना चाहिये। किसी भी गाँव या शहर के साहित्यकार अंतर्जाल पर अपनी कविताओं के माध्यम से आ सकते हैं, यह इस गोष्ठी में दिखाया गया। हिन्दी प्रेमी कर्मवीरों द्वारा किए जाने वाले महत्वपूर्ण कार्यों की भी चर्चा की गई जिन्होंने ब्लॉगर द्वारा हिन्दी प्रयोग के नए द्वार खोले हैं। इस आशय से डॉ॰ व्योम द्वारा तैयार किया गया होशंगाबाद के कवियों के आनलाईन काव्य संकलन नर्मदा तीरे का लोकार्पण किया गया। गोष्ठी की मुख्य अतिथि थीं होशंगाबाद की उप जिलाधीश अलका श्रीवास्तव और मुख्य अतिथि थे प्रतिभूति कागज कारखाना के प्रबंधक राकेश कुमार। गोष्ठी में प्रवासी भारतीयों अश्विन गाँधी, पूर्णिमा वर्मन, देबाशीष एवं उनकी पूरी टीम आदि की सराहना की गई। इन्हीं सब के प्रयास से अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रयोग सुलभ होता जा रहा है। गूगल मेल पर हिन्दी में ईमेल की सुविधा, ब्लॉगर पर हिन्दी का आसान प्रयोग होने से हिन्दी प्रयोग के क्षेत्र में नई क्रान्ति का सूत्रपात हुआ है। नर्मदा तीरे जैसे काव्य संकलन अन्य हिन्दी प्रेमियों को अंतर्जाल की ओर आकर्षित करेंगे। इस अवसर पर अनुभूति, अभिव्यक्ति, अक्षरग्राम, निरंतर, कविता सागर, हिन्दी साहित्य, हाइकु दर्पण आदि जालस्थलों को सभी ने देखा और इनकी भरपूर सराहना की।

आलेखः जगदीश व्योम

न्यूज़गेटर द्वारा फ़ीड-डेमन का अधिग्रहण

न्यूज़गेटर द्वारा फ़ीड-डेमन का अधिग्रहण: 17 मई को न्यूजगेटर ने लोकप्रिय फ़ीडडेमन आर.एस.एस एग्रीगेटर और सी.एस.एस संपादन तंत्र टॉपस्टाइल के निर्माता ब्रैडबरी सॉफ़्टवेयर का अधिग्रहण कर लिया है। फ़ीडडेमन को अब न्यूज़गेटर के ऑनलाइन तुल्यकालन प्लेटफ़ॉर्म के साथ मिला दिया जायेगा और ये उत्पाद अब न्यूज़गेटर के अदा किये हुये पंजीकृत प्लॉन के साथ उपलब्ध होगा। साथ में, इन उत्पादों के निर्माता निक ब्रैडबरी भी न्यूज़गेटर से जुड़ जायेंगे। ऐसा माना जा रहा है कि ये इन दोनों कम्पनियों का बड़ा चतुराई भरा निर्णय है। आर.एस.एस काफ़ी तेज़ी से प्रगति कर रहा है और माना जा रहा है कि छोटी कम्पनियों को अब काफ़ी बड़ी लागत वाली कम्पनियों जैसे कि याहू, ब्लॉगलाइन्स, माइक्रोसॉफ़्ट, गूगल आदि से जुड़ना ही पड़ेगा। इस अधिग्रहण के बारे में एक रोचक इंटरव्यू यहां पढ़ा जा सकता है।

फीड के लिये गूगल एडसेन्स बनी हकीकत

निरंतर के मई अंक में इस बारे में हमने जानकारी दी थी। पिछले कुछ सप्ताह एडसेन्स संबन्धित विज्ञापनों के वितरण को मुट्ठी भर आर.एस.एस फ़ीड पर परीक्षण करने के बाद, गूगल अब अपने साथी प्रकाशकों के लिये बीटा कार्यक्रम चालू कर रहा है। गूगल के एडवर्ड तंत्र पर विषय सम्बन्धी वितरण के लिये प्रकाशित किये जाने वाले विज्ञापन अब सीधे क्षमल फ़ीड पर दिखेंगे। हालांकि गूगल ने हाल ही में एक ऐसी सुविधा का भी परीक्षण किया है जो कि प्रकाशकों को सीधे विषय संबन्धित साईट पर ले जायेगा फिर भी प्रकाशक फ़ीड के द्वारा विज्ञापन को सीधे नहीं देख पायेंगे या फ़ीड के आधार पर वितरित विज्ञापनों के लिये बोली नहीं लगा सकेंगे।

सर्च इंजनों का बादशाह अब सौ से अधिक पंजीकृत और चालू धारकों वाले प्रकाशकों के आवेदनों को स्वीकार कर रहा है। एक बार इसकी स्वीकृति मिलने के बाद प्रकाशक सीधे गूगल के एड कोड को उनके फ़ीड टेम्पलेट में चिपका सकते हैं। टेक्स्ट एड वाले विज्ञापनों को ग्राफिक या चित्र के रूप में रखा जायेगा जिससे कि गूगल ये सुनिश्चित कर सकता है कि विज्ञापन का मसौदा तभी तैयार हो जब पाठक फ़ीड पढ़ रहे हों बजाय इसके कि जब ये इसका अभिधारण हो रहा हो। अब गूगल का मामला हो तो तकनीक तो गूढ़ होगी ही।

Blo.gs की बिक्री

खबर है चिट्ठों की जानकारी देने वाले जालस्थल Blo.gs को किसी अज्ञात व्यक्ति को बेच दिया गया है और इसके खाते सम्बन्धी अधिकार 13 जून के आसपास हस्तांतरित किये जायेंगे। Blo.gs हाल ही में नवीनीकृत वेबलॉगों की एक निर्देशिका है और अपडेट होने पर लगभग हर आम ब्लॉग इसको पिंग करता है। आश्चर्य नहीं होना चाहिये अगर जो व्यक्ति इसे खरीद रहा है वो Blo.gs को किसी ब्लॉग सर्च इंजन में न बदल दे। लगता है कि अंतर्जाल ही ब्लॉग है और ब्लॉग ही अंतर्जाल।

फ़ीडटैग़र

लगता है ब्लॉगलाइन्स को अब नयी स्पर्धा का सामना करना पड़ेगा। ये नया प्रतिद्वन्दी हैं फ़ीडटैगर जो कि एक (“एक और” कहना ज्यादा उचित होगा) आर.एस.एस एग्रीगेटर या संग्रहक है जो कि टैग का बहुतायत में इस्तेमाल करता है। चूंकि फ़ीडटैगर एजैक्स (AJAX) यानि एसिंक्रोनस जावास्क्रिप्ट व एक्स.एम.एल नामक नयी तकनीक पर आधारित है, इसलिए इसकी गति बहुत तेज है। एजैक्स तो बिलाशक वेब की दुनिया में क्रांति ला रहा है। इसका उदाहरण है पिछले कुछ महीनों में ही इसका इस्तेमाल करके बनाये गये कुछ काफ़ी अच्छे वेब प्रयोग जैसे कि गूगल नक्शे, फ़्लिकर, गूगल मेल, बैकपैक, टिडलीविकी, और अब फ़ीडटैगर। लगता है कि अंतर्जाल अब पहले सा नहीं रहने वाला!

आई.बी.एम ने कर्मचारियों को दी चिट्ठाकारी करने की छूट

जब आप ये समाचार समाचार पढ़ रहे होंगे, तब तक शायद इस नामी कंपनी ने कार्पोरेट स्तर पर शुरू की गयी अपनी मुहीम में अपने लगभग 1,30,000 कर्मचारियों को चिट्ठाकारी करने की अनुमति प्रदान कर भी दी होगी। ये प्रस्ताव हाल में प्रकाशित आई.बी.एम की तिमाही आर्थिक रपट के बाद लाया गया है जिसके प्रकाशित होने के बाद करीब 15,000 कर्मचारियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा था जिसमें तकरीबन 13,000 तो केवल यूरोप से ही थे। इस कदम के नेपथ्य में शायद कम्पनी की यह उम्मीद है कि चिट्ठाकारी उनके घाटे को कम कर सकती है यदि इससे उनके कर्मचारी आनलाइन जाकर अपने नियोक्ता के उत्पादों व तकनीकों की बिक्री बढ़ाने में मदद कर सकें।

कर्माचरियों इस बात का प्रशिक्षण दिया जायेगा कि चिट्ठाकारी क्या है और उससे क्या क्या मसौदा डालना उचित है। कम्पनी ने विकी नामक एक सरल तकनीक को भी लगाया है जिसके माध्यम से समूह आपस में मिलकर काम कर सकते हैं व जानकारी को बांट सकते हैं। विकी आई.बी.एम के लेख सहयोगी सॉफ़्टवेयर के जितने विस्तृत नहीं हैं लेकिन वो नैगमिक विभागों के लिये काफ़ी महत्वपूर्ण हैं जहां वो कभी कभी माइक्रोसॉफ़्ट एक्सेल तालिका के विकल्प के रुप में भी उभर जाते है। इस मुहिम का आधिकारिक उद्देश्य है कि ऑनलाइन समूहों व बहसों में कम्पनी के तकनीकी विशेषज्ञों को शामिल करके आई.बी.एम की स्पर्धात्मक स्थिति को सूचना प्रौद्योगिकी बाजार में सुधारा जाय। वो सब तो ठीक है, पर यह चिट्ठाकारी के बहाने कहीं वे अपने हर मुलाजिम को अपने सेल्स विभाग में तो नहीं खींच रहे? पाठक निःसंदेह ऐसे चिट्ठों की राय को अब ज़्यादा नाप तौल कर आत्मसात करेंगे।

चिट्ठाकारी में बढ़ोत्तरी रूकी

ईमार्केटर के द्वारा किये एक सर्वेक्षण के अनुसार अमेरिका में हुये चुनावों के बाद चिट्ठाकारी की अप्रत्याशित वृद्धि में कमी आयी है। इस जांच के अनुसार केवल 4 प्रतिशत अमेरिकी कम्पनियों के चिट्ठे जनता के लिये खुले हैं और इससे भी कम कम्पनियां अब ऐसी चालू साइटें बना रहीं हैं जिन पर उपलब्ध कड़ियों व प्रतिक्रिया चिन्हों को कई सारे पाठक चिट्ठों से संबद्ध करते हैं। कम्पनी का ये भी दावा है कि कई सारे अमेरिकी प्रयोगकर्ताओं को तो ये भी नहीं पता है कि चिट्ठा क्या होता है। और हमें लगता था कि अमरीकी हमसे हर बात में दो चार कदम आगे ही रहते हैं।

घृणा का संदेश फ़ैलाने पर सिक्सअपार्ट की निंदा

एक यहूदी चिट्ठाकार द्वारा उनके चिट्ठे पर यहूदियों के खिलाफ लिखने वाले एक प्रयोगकर्ता को टाइपपैड से प्रतिबंधित करने के मामले पर ब्लॉग कम्पनी सिक्स अपार्ट की काफ़ी निंदा हुई है। चिट्ठाकार रिचर्ड सिल्वरस्टाइन सिक्स अपार्ट से नाराज़गी जताते हुए लिखते हैं कि टाइपपैड के कर्मचारी उनके प्रति बिल्कुल भी सहानुभूति नहीं दिखा रहे हैं। उनको बताया गया कि टाइपपैड केवल सर्वव्यापक स्पैम के अलावा और किसी चीज़ को प्रतिबंधित नहीं करता है। वो ये भी लिखते हैं को टाइपपैड के इस कर्मचारी ने इस मामले में अपनी भावनाओं को सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने के लिये उन पर व्यक्तिगत रूप से काफ़ी रोष जताया है।

और अंततः…

तीसमारखाँ ब्लॉगर

ब्लॉगेब्रिटी ने विश्व के सबसे बड़े चिट्ठाकारों की सूची जारी की है। तीन किस्मों में बाँटा गया है उनको अ, ब, स, न जाने क्यों? जो नामचीन हिंदुस्तानी इसमें शामिल हैं उन्हें तो खैर हम वैसे भी जानते ही थे, सिक्स अपार्ट के वीपी अनिल दाश (A सूची में), अमित मल्होत्रा (B सूची में तथा गौतम घोष और राजेश जैन (C सूची में)। “अ ब स” में ही गोया सारी दुनिया सिमट गयी है।

टिप्पणीयाँ अब बंद हैं।