जून 2005 का कच्चा चिट्ठा

तरुण जोशी

किसी को भी आश्चर्य होगा यह देखकर कि निठल्ले भी चिन्तन करते हैं वह भी आक्रोश के साथ। पर जब तरुण जोशी के चिट्ठे का दीदार किया मानना भी पड़ा। फिर हमें लगा कि ठेलुहों की तर्ज पर निठल्लों के लिये भी कहा जा सकता है कि

एक ढूँढो हजार मिलते हैं
बच के निकलो टकरा के मिलते हैं।

प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पन्त तथा कथा लेखिका शिवानी के अंचल, उत्तरांचल में पैदा हुये और पले-बड़े-पढ़े तरुण ने लगता है किस्सागोई के गुर मनोहरश्याम जोशी से लिये हैं। इन्होंने एम.सी.ए. करने के दौरान कॉलेज में एडवेंचर क्लब की स्थापना की, कालेज तथा क्लब की पत्रिका की शुरुआत की। शेरो शायरी के शौक के कारण कालेज में ‘गालिब’ के रूप में बदनाम हुये (नाम भी तो हुआ)। पढ़ाई के उपरांत पाँच साल दिल्ली में जीविकोपार्जन किया, फिर उड़ चले अमेरिका। तब से न्यूजर्सी में टिके हैं।

पहाड़ तरुण के दिल में पहले प्यार की तरह बसे हुये हैं। इसके अलावा घूमना, ट्रैकिंग, सिनेमा, संगीत तथा क्रिकेट के शौकीन जोशी जी हाल-फिलहाल तक अमेरिका में क्रिकेट खेलते रहे हैं। ब्लागिंग की अपनी शुरुआत के बारे में तरुण लिखते हैं

पिछले साल की शुरूआत मे इस नाचीज को ‘ब्‍लॉग’ के ‘ ब्‍ ‘ तक का इल्‍म न था। फिर इक दिन कुछ हुआ यों कि सर्फ करते करते रेडिफ डॉट कॉम के ‘ब्‍लॉग’ बटन पे क्लिक कर दिया, बस फिर क्‍या था घर जाने से पहले अपने नाम का भी एक ब्‍लॉग था इंटरनेट की इस मायावी दुनिया में…नाम रखा गया ‘माय लोनली प्‍लेनेट’। साथ ही इस बात का भी एहसास हुआ कि भले ही इस दुनिया मे एक नाम के दो या दो से ज्‍यादा लोग हो जायें लेकिन इंटरनेट की इस मायावी दुनिया मे ये संभव नहीं। बहरहाल, थोड़ी सी कोशिशों के बाद हमें नाम मिल ही गया। 4-5 महीने इसी जगह ‘इधर उधर’ की हाँकते रहे, ‘मेरा पन्‍ना’ था सो जो जी मे आया ‘तत्‍काल’ कह दिया। ‘कुछ बतकही’ ‘ज्ञान विज्ञान’ की करी तो कभी लिखा ‘रोजनामचा’। ‘अपनी बात’ की ‘अभिव्‍यक्ति’ कभी ‘प्रसंग’ मे की तो कभी ‘कविता सागर’ में। कभी की ‘नुक्ता चीनी’ और कभी ‘ठलुआ’ गिरी। जब कभी ‘कही अनकही’ छोड़ देने का मन किया तो बैठे रहे ‘फुरसतिया’ में। ऐसा नहीं है कि हमेशा ही कुछ कहते रहे, कभी छुट्टियों में कहीं ‘नौ दो ग्‍यारह’ हो गये तो अपने ब्‍लॉग पर भी ‘निरवता’ छायी रहती। अगर कुछ नही किया तो वो था ‘चिट्ठा चर्चा’ और ना ही कभी कीं ‘कुछ बातें मेरे जीवन’ की।

मज़े की बात कि निठल्ला चिन्तन के जन्म की कहानी बताने के पहले तरण सात पोस्ट लिख चुके थे। मुंगेरीलाल के हसीन सपने भले पूरे हो गये हों, कहानी अभी जारी है। प्रिटी वूमेन को चिट्ठी लिखने वाले जोशी जी का अंदाज़ बाकायदा निठल्ला है तथा वे इसको पुख्ता करने में वायदाखिलाफी से भी गुरेज नहीं करते (अपने अंग्रेजी चिट्ठे पर प्रकाशित कुमायूँनी होली का हिंदी अनुवाद अभी तक नहीं लिखा)। तरुण के आगमन से हिंदी चिट्ठाजगत समृद्ध हुआ है। आशा है तरुण की लेखनी तथा तकनीकी कौशल से चिट्ठाजग और विकास करेगा तथा फिलहाल सारा समय सिविलाइजेशन तथा ब्लॉगिंग में लगाने के कारण नाराज रहे परिवारीजन अपनी नाराजगी को गर्व में तब्दील कर लेंगे।

आलोक कुमार

हिन्दी का पहला चिट्ठा नौ दो ग्यारह लिखने वाले आलोक कुमार पढ़ाई से सिविल इञ्जीनियर, पेशे से प्रोग्रामर और शौक से लेखक हैं। जन्म हुआ जोधपुर में, उसके बाद दिल्ली, लिसोथो, गुवाहाटी, दिल्ली, चण्डीगढ़, पुणे, रायपुर, चेन्नई, जामनगर, मुम्बई, बंगलोर और संप्रति मनीला में हैं। ब्लॉग के लिए “चिट्ठा” शब्द का ईज़ाद करने वाले आलोक का हिन्दी चिट्ठा वर्ष 2003 में ईंडीब्लॉग अवार्ड्स से भी नवाज़ा जा चुका है।

आलोक जाल पर देवनागरी के प्रसार और स्वतन्त्र तन्त्रांश के कई कार्यों से जुड़े रहे हैं पर नहीं चाहते कि उन पर “हिन्दीवाला” होने का ठप्पा लगाया जाए। उनका मानना है कि भाषा के साथ, संस्कृति जुड़ी होती है, और सामाजिक सम्बन्ध भी। आलोक मानते हैं कि जाल पर दो चीज़ें करना ज़रुरी है, पहला, जाल पर भारतीय भाषाओं के स्थलों के पढ़ने और बनाने का सरलीकरण, और दूसरा भारतीय भाषाओं में अधिक से अधिक काम की सामग्री को पैदा करना। उनका मत है कि इन दोनो ही कार्यों कि जिम्मेवारी सरकार की नहीं, हमारी है।

आलोक के चिट्ठे की खासियत यही है कि चिट्ठे बहुत ही संक्षिप्त होते हैं, दो टूक बात कह कर पल में नौ दो ग्यारह हो जाते हैं। आलोक तकनीकी विषयों पर हिन्दी चिट्ठाजगत के प्रकाश स्तंभ हैं, अपने जालस्थल देवनागरी से वे जाल पर हिन्दी के शौकीनों का पथ प्रर्दशन करते रहते हैं और हिन्दी का प्रचार भी। यह स्थल जाल पर हिन्दी का प्रयोग सिखाने वाले स्त्रोतों में मील का पत्थर है। आलोक देवनागरी नाम से एक याहू ग्रुप के भी कर्ताधर्ता हैं और साथ ही डीमॉज़ निर्देशिका में हिन्दी का परचम लहराने वाले शख्स भी।

जाल पर भारतीय भाषाओं, खास तौर पर हिन्दी, का नाम रोशन करने और इसका सम्मान बढ़ाने वाले आलोक चिट्ठों की दुनिया से कभी भी नौ दौ ग्यारह न हो यही हमारी कामना है। हमारी शुभकामनायें!

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