तूतू मैंमैं

लिखो कविता, जीतो इनाम!

नीचे दिखाये चित्र और दिए गए शीर्षक को ध्यान से देखिए और रच डालिए एक छोटी सी कविता। कविता ज्यादा बड़ी न हो तो अच्छा, चार लाईना हो तो उत्तम, हाइकू हो तो क्या कहनें! शीर्षक मुख्यतः भाव के लिए है, पर आप इसे कविता में प्रयोग कर सकते हैं। यदि आपकी रचना निरंतर संपादक मंडल को पसंद आ गई तो आप जीत सकेंगे रेबेका बल्ड की पुस्तक “द वेबलॉग हैंडबुक” की एक प्रति। कविता इस पोस्ट पर अपने टिप्पणी (कमेंट) के रूप में ही प्रेषित करें।

प्रतियोगिता के नियमः

  • कविता इस पोस्ट पर अपने टिप्पणी (कमेंट) के रूप में ही प्रेषित करें। ईमेल या निरंतर रचना भेजने के फॉर्म द्वारा प्रविष्टि स्वीकार्य नहीं होगी।
  • रचना मौलिक व पूर्व अप्रकाशित होनी चाहिए।
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  • संपादक मंडल का निर्णय साधारण अथवा विवाद की स्थिति में अंतिम व सर्वमान्य होगा।
  • किसी भी प्रविष्टि की प्राप्ति न होने या न जीतने पर पुस्तक आगामी अंकों में वितरित होगी।
  • संपादक मंडल व उनके परिवार के सदस्य इस प्रतियोगिता में भाग नहीं ले सकते।
  • एक बार पुरस्कृत विजेता को अगले ६ माह तक पुनः पुरस्कृत नहीं किया जा सकेगा। हालांकि पूर्व विजेताओं के भाग लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं है।
  • पुस्तक केवल भारत स्थित पते पर ही वितरित की जा सकेगी। प्रतियोगिता में पुस्तक वितरण का व्यय जितेन्द्र चौधरी वहन करते हैं। निरंतर उनका हृदय से आभारी है।
  • क्षमा करें, डाक में पुस्तक खो जाने या पुस्तक अप्राप्ति कि जिम्मेवारी निरंतर नहीं ले सकता।
  • रचना भेजने की अंतिम तिथि हैः 20 जून, 2005

पिछली प्रतियोगिता के परिणाम

निरंतर के मई 2005 अंक की समस्या पूर्ति की विजेता सुश्री प्रत्यक्षा घोषित की गई हैं। बधाई प्रत्यक्षा! सभी प्रतियोगियों का धन्यवाद! आप से भविष्य में भी भागीदारी की अपेक्षा रहेगी। प्रत्यक्षा पुस्तक प्राप्त करने के लिये आप patrikaa at gmail dot com पर अपना भारत का पता सूचित कर देवें।

3 प्रतिक्रियाएं

  1. प्यार

    कितना मासूम सा चेहरा है,
    अन्धा है यह प्यार हमारा।
    कब से चिल्ला के कह रहा हूँ,
    तू ही तो है सच्चा यार हमारा।
    Submitted by भूपेन्द्र पंत (not verified) on Wed, 2005-06-01 05:08.

  2. कौन बड़ा?

    आँखों में आँखों को डाल,
    और नाक से नाक लड़ा
    तू तू मैं मैं करते ये दो,
    देख रहे हैं कौन बड़ा।
    Submitted by तरूण (not verified) on Tue, 2005-06-21 13:11.

  3. संपादकजी,

    परदा मत गिराईये, मंच पर मुझे भी कविता पाठ करना है।

    क्षणिक जीत की उत्कंठ चाह में,
    कुछ पुछ्छविहीन करते हैं लङाई ।
    मनुषत्व प्राप्ति की कठिन राह में,
    प्रेम,धैर्य,बंधुत्व खोते मेरे भाई ।
    Submitted by prem on Fri, 2005-06-24 15:11.