मिर्जा ने झेला रैबिट फूड

दो

पहर के दो बजे थे। दोपहर का खाना खा एक झपकी का आनंद ले रहा था। बाहर सड़क पर अलसाया सन्नाटा पसरा था। तभी कॉलबेल की चीत्कार ने नींद मे खलल डाल दिया। श्रीमती जी के दरवाजा खोलने की कोई संभावना न थी क्योकि वे सबेरे से बाथरुम में वाइपर न लगाने पर क्रुद्ध थीं। झक मारकर खुद उठा तो बाहर मिर्जा साहब खड़े थे। चेहरा एकदम गुस्से से लालपीला। बिना दुआ सलाम किये सीधे अँदर घुस गये और लगे भाभी भाभी चिल्लाने। मिर्जा का इस तरह प्रोटोकाल का उल्लंघन बहुत ही संगीन किस्म की परिस्थितियो में होता है, खासकर जब छुट्टन मिंया की हरकतें नाकाबिले बर्दाश्त हो जाती है। हाईकमान यानि मिर्जा की बेगम तक दरयाफ्त पहुँचाने के लिए उन्हें हमारी बेगम का चैनल ही सबसे मुफीद मालुम पड़ता है।

मिर्जा ने हाँक लगायी “भाभीजान, सबेरे का कुछ खाना बचा है क्या?” यह पैंतरा हमारे लिए अझेल था। भला छुट्टन के रहते मिर्जा की हालत स्वामी जैसी क्योंकर होने लगी। दरअसल मिर्जा छुट्टन को बर्दाश्त ही इसलिए करते थे कि वह नामुराद खाना बड़ा लजीज बनाता था। हम पूछ ही बैठे कि मिर्जा क्या हुआ, छुट्टन ठीक तो है? मिर्जा तमक कर बोले, “अमाँ! उस मुस्टंडे को भला कुछ क्यूँ होने लगा?” मैने देखा श्रीमती जी मुझे घूर कर देख रही थी। इशारा साफ था कि कोई और नासमझी भरा सवाल न पूछा जाये। श्रीमती जी ने कहा, “भाईसाहब क्यो शर्मिंदा करते हैं, भला हम आपको बासी खाना क्यों खिलाऐंगे? अब भले ही छुट्टन के जैसा जायकेदार खाना न बनता हो तो भी आलू के परांठे चलेंगे क्या?” मैं तो कुर्बान हो गया श्रीमती जी की इस अदा पर। एक तीर से तीन शिकार, मिर्जा को बुरा भी नही लगा, आलू के परांठो से काम भी चल गया और छुट्टन के बारे में सवाल भी इशारो में ही दाग दिया।

मिर्जा की बेगम ने छुट्टन को हुक्म सुनाया कि अब खाने में सिर्फ हरी सब्जियाँ ही बने और साहब को सिर्फ सलाद खिलाए। छुट्टन मियाँ उस दिन से बाजार से मूली लाते थे तो कच्चे पत्ते धोकर मिर्जा की प्लेट मे रख देते थे और मूली के पराँठे खुद खाते थे।

तीर बिल्कुल निशाने पर लगा था। मिर्जा का रिकार्ड चालू हो गया। “अरे भाभीजान, आपके हाथ के आलू के परांठे भी हमारे लिए नियामत हैं। उस खबीस छुट्टन का बस चले तो रातोदिन हमें रैबिट फूड खिला खिला कर हलकान कर दे। “रैबिट फूड क्या होता है? क्या खरगोश का कवाब वगैरह?”, मैं फिर नासमझी में पूछ बैठा। मिर्जा मिर्च के आचार के साथ परांठे के कौर निगलते हुए गरजे “अमाँ बड़े अहमक हो, हालीवुड होमीसाईड नही देखी। देख लेना समझ जाओगे।” खैर मिर्जा ने नही बताया तो नही बताया कि रैबिट फूड क्या जँजाल है। पर चार परांठे भी खा गये और मेरे यहाँ छुट्टन और अपनी बेगम की साझा सरकार की तानाशाही नीतियों पर अपना विरोध भी दर्ज कर गये। जाते जाते कह गये, “भाभीजान, अगली बार आपकी सहेली का फोन आये तो कह देना कि सबकुछ बर्दाश्त हो सकता है पर रैबिट फूड नही। अगर यह सब ज्यादा दिन चला तो सब छोड़छाड़ कर लखनऊ चला जाऊँगा। भूलभुलैया में गाईड का काम कर लूँगा पर रैबिटफूड नही खाऊँगा।”

मिर्जा तो चले गये, पर यह सवाल हमारे झाड़फनूस में टाँग गये कि यह रैबिट फूड क्या बला है। श्रीमती जी ने हुक्म सुनाया कि शाम को स्वामी से हालीवुड होमीसाईड की डी.वी.डी लेकर आओ। दरअसल किस्सा ए रिमोट के बाद से मिर्जा को छुट्टन के साथ एक्शन पिक्चरे देखने में गश आता है। स्वामी हालीवुड का मुरीद है। मिर्जा को स्वामी के साथ पिक्चरे देखने से दो फायदे होते हैं, स्वामी का बिंदास सीन बाई सीन अंग्रेजी तर्जुमा और हाट सीन देखे जाने की चुगली छुट्टन द्वारा कनाडा पहुँचाये जाने का कोई डर नही। तो जनाब शाम को स्वामी से हालीवुड होमीसाईड की डीवीडी ली। दो बार देखने के बाद समझ मे आया कि मिर्जा के दर्द का उस सीन से जरुर ताल्लुक है जिसमें हैरीसन फोर्ड एक हत्याकांड की जाँचपड़ताल के दौरान एक पुलिसिए से बर्गर मँगाते हैं। यहाँ जो हैरीसन फोर्ड के पात्र का नाम है। आप भी यह संवाद देखिए।

जो: देखो यह क्या है? तुम्हे इसमें सलाद दिख रही हैं? किसी ने इस कमरे मे मुझे सलाद कहते सुना क्या?

पुलिसवाला: सॉरी…

जो: क्या सॉरी? आजकल अकादमी में क्या सिखाते हैं? लो देखो! इसमें हरे पत्ते भी है। यह रैबिट फूड बाहर फेंक कर दूसरा सैंडविच लाओ मेरे लिए।

पुलिसवाला: जी जनाब!

जो: और सुनो, इस बार रैबिट फूड न उठा लाना।

अब मामला कुछ कुछ समझ आ रहा था। पूरी गुत्थी सुलझाने के लिए मिर्जा की बेगम और छुट्टन से दरयाफ्त जरूरी थी। शाम को मेमसाहब ने कनाडा कॉल लगायी तो आधा माला साफ हो गया। दरअसल करेला नीम चढा था यानि मिर्जा एक तो महाचटोरे और तिस पर वज्रआलसी। कोलेस्ट्राल नही बढ़ता तो क्या होता। डाक्टर भी मिर्जा की बेगम का चमचा निकला। सीधे बेगम मिर्जा की बेगम को मिर्जा के खाने पर लगाम लगाने को कह दिया। मिर्जा की बेगम ने छुट्टन को हुक्म सुनाया कि अब खाने में सिर्फ हरी सब्जियाँ ही बने और साहब को सिर्फ सलाद खिलाए। छुट्टन मियाँ उस दिन से बाजार से मूली लाते थे तो कच्चे पत्ते धोकर मिर्जा की प्लेट मे रख देते थे और मूली के पराँठे खुद खाते थे। कच्ची गोभी, उबले भुट्टे, और कच्चे टमाटर खा खाकर मिर्जा का जीना हराम हो गया था।

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