जुलाई का डर

वातायनः व्यंग्य

जु

लाई का महीना सदैव डराता आया है और लगता है हमेशा डराता आएगा। मैं जब बच्चा था, और स्कूल में पढ़ता था, तब इस जुलाई के महीने से भारी डरता था। मई और जून की पूरी दो महीनों की घनघोर छुट्टियाँ जब खत्म होने को आती थीं, तब जुलाई का महीना भयंकर रूप से डराता चला आता था। याद आने लगती थीं किताबें, कापियाँ और होम वर्क। याद आने लगते थे गुरूजनों की छड़ियाँ, उनके डांट फटकार और उनके द्वारा दिए जाने वाले दण्ड। ये सारी चीजें भयंकर रूप से डराती थीं, और मैं भगवान से प्रार्थना करता था – मनौतियाँ करता था कि हे ईश्वर! जुलाई के महीने को लेकर फिर मत आना। या फिर कुछ दो-चार दिनों की मोहलत और दे दे। परंतु जुलाई था कि डराता-धमकाता और अपने असर से सराबोर करता चला जाता अपने पीछे भुगतने को अगस्त, सितंबर इत्यादि को छोड़ता हुआ।

आज मैं बुजुर्ग और बड़ा हो गया हूँ, पर जुलाई के महीने का डर अब भी कायम है। और, आश्चर्य की बात यह है कि मैं अभी भी स्कूल और कॉलेजों से ही डरता हूँ। तब भी, अब जब मैं पढ़ता नहीं हूँ। जब मैं बच्चा था, तब मैं सोचा करता था कि मैं और मेरे जैसे मेरे सहपाठी ही हैं जो जुलाई के महीने से डरते हैं। पर उस वक्त की मेरी सोच कितनी संकीर्ण थी, इसका अंदाजा आज मुझे हो रहा है। उस वक्त हमें कल्पना ही नहीं हो पाती थी कि हमारे पालक भी जुलाई के महीने से डरते घबराते होंगे।

मई-जून की शानदार छुट्टियाँ बीतने के बाद जब जुलाई का महीना आता है तो पालकों का दिल धक-धक करने लगता है। स्कूल ड्रेस, किताबें, कॉपियाँ, बस्ते, ट्यूशन… ये सारी चिंतायें सारा समय डराने का काम करती रहती हैं।

मेरे जैसा हर पालक जुलाई के महीने से डरता घबराता होगा। मई-जून की शानदार छुट्टियाँ बीतने के बाद जब जुलाई का महीना आता है तो पालकों का दिल धक-धक करने लगता है। छोटे का फलां स्कूल में एडमीशन कराना है- उसके लिए एप्रोच जुगाड़नी है। बड़े को मेडिकल में भेजना है उसके लिए तगड़ा डोनेशन देना है। फिर स्कूल ड्रेस, किताबें, कॉपियाँ, स्कूल बस्ते, ट्यूशन, बच्चों के स्कूल आने जाने की व्यवस्था इत्यादि… इत्यादि… चीजें सारा समय डराने का काम करती रहती हैं।

जैसे-जैसे समय गुजरता जा रहा है, वैसे-वैसे ‘जुलाई के महीने के डराने वाले फ़ैक्टर’ के स्टैंडर्ड भी बढ़ते जा रहे हैं। पहले स्कूलों कॉलेजों में एडमीशन सामान्य सी चीज़ हुआ करती थी, और कहीं कोई मारा मारी नहीं थी। अब स्कूलों-कॉलेजों में एडमीशन हेतु प्री-टेस्ट होते हैं। मेरिट लिस्ट बनती है। लोग तीन-तीन, चार-चार स्कूलों कॉलेजों में एडमीशन फ़ॉर्म भरते हैं। डरते रहते हैं कि कहीं किसी भी जगह एडमीशन न मिला तो वे क्या करेंगे। कहीं किसी घटिया कॉलेज में भी एडमीशन मिल गया तो अपना अहोभाग्य समझते हैं।

डराने वाले ‘परसेंटेज’ भी दिनों दिन बढ़ते जा रहे हैं। अपने जमाने में, मेरे पिताश्री – जैसा कि वे बताते रहे – परीक्षा में द्वितीय श्रेणी आ पाएगी या नहीं इस भय से वे वर्ष भर ग्रस्त रहते थे, और जाहिर है, यह भय जुलाई में चढ़ता था और अप्रैल-मई में नतीजों के आने तक बरकरार रहता था। मैं परीक्षा में प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के लिए अपने विद्यार्थी जीवन के समय में भय ग्रस्त रहता था। अब मेरा भय जुलाई के महीने से इसलिए चालू हो जाता है कि मेरा पुत्र जो फलॉ कक्षा में पढ़ता है – परीक्षा में नब्बे प्रतिशत ला पाएगा या नहीं। नहीं तो उसके अंधकार मय भविष्य की कल्पना करना ही भयावह है।

कक्षा, परीक्षा और किताब-कापियाँ, स्कूल ड्रेस के अलावा भी कई ‘फ़ैक्टर’ हैं जुलाई महीने में डरने के। सरकारी तंत्र में काम करने वालों के लिए यह महीना अकसर ट्रांसफर रूपी तलवार लेकर आता है। कईयों के लिए जमा-जमाया खेल बिगाड़ता है जुलाई का महीना। इस ट्रांसफर रूपी तलवार का वार खत्म करने के लिए, इसकी धार कमजोर करने के लिए या इसका रूख बदलने के लिए लोग जी तोड़ मेहनत करते हैं। बड़े से बड़ा, बैकिंग वाला अफ़सर भी जुलाई के महीने में डरता घबराता रहता है कि कहीं इस दफा उसका ट्रांसफर हो जाए तो नई जगह पर नई सेटिंग बनाने में बहुत खर्चा हो जाएगा – और पुराना तो अभी वसूल ही नहीं हो पाया है।

भारतीय किसान तो सदियों से जुलाई से डरता घबराता आया है। कहीं अवर्षा, कहीं अति वर्षा, कहीं सूखा, कहीं बाढ़।

भारतीय किसान तो ख़ैर सदियों से जुलाई के महीने से डरता घबराता आया है। भगवान भला करे उन तथाकथित पर्यावरण वादियों, प्रगतिवादियों और अपने-अपने स्तर पर भ्रष्ट अफ़सरों-राजनीतिज्ञों का जिसके कारण आज भी भारतीय किसान ऊपर वाले के रहमोकरम पर, ऊपर वाले की जुलाई महीने की बरसात पर निर्भर है। इसीलिए वह साल-दर-साल जुलाई के महीने से डरता आया है। कहीं अवर्षा, कहीं अति वर्षा, कहीं सूखा, कहीं बाढ़ यानी डरने के तमाम कारण।

वैसे, अगर किसानों को अपवाद मान लें, तो बाकी सब लोगों के भय का रेडीमेड इलाज अब मार्केट में मिलने लगा है। बस रोकड़ा खर्चना होगा। मसलन – एडमीशन के लिए डोनेशन, अच्छे नंबरों के लिए ट्यूशन या पर्चा आउट, ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए राजधानी की यात्रा वगैरह-वगैरह। मगर, तब ख़ाली जेब का भय भी तो सताएगा। दुआ करता हूँ कि मेरे साथ साथ आप सभी के लिए अबकी यह जुलाई महीने का समय जरा जल्दी कट जाए।

एक प्रतिक्रिया

  1. बहुत बढ़िया रवि भाई, शानदार लिखें हैं। जुलाई फोबिया जो बरसों पहले मिट गया था उसकी याद ले कर आये हैं।