विकास तय करने का भी अधिकार मिले: मेधा पाटकर

सामाजिक कार्यकर्ता व नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर से बातचीत

संवादआपने और हमने अपनी पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा है, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था, “बाँध आधुनिक भारत के मंदिर हैं”। बाँधों से समृद्धि की बात होती है तो कुछ लोग इससे असहमति जताते हैं। नर्मदा घाटी के लोगों की अगुवाई करने वाली मेधा पाटकर ने एक वृहद, अहिंसक सामाजिक आंदोलन का रूप देकर समाज के समक्ष सरदार सरोवर बाँध के डूब क्षेत्र के विस्थापितों की पीड़ा को उजागर किया। मेधा तेज़तर्रार, साहसी और सहनशील आंदोलनकारी रही हैं। उपवास, पुलिसिया डंडों और गिरफ्तारियों से उन्हें अक्सर रूबरू होना पड़ता है। मेधा के नर्मदा बचाओ आंदोलन से सरकार और विदेशी निवेशकों पर दबाव भी पड़ा, 1993 में विश्व बैंक ने मानावाधिकारों पर चिंता जताते हुए पूँजीनिवेश वापस ले लिया। उच्चतम न्यायालय की भी आँखें खुली, पहले रोक लगाई और फिर 2000 में हरी झंडी भी देखा दी।

मुंबई में पली बढ़ीं 51 वर्षीय मेधा के पिता वसंत खानोलकर स्वतंत्रता सेनानी और ट्रेड यूनियन के सक्रीय सदस्य रहे। अतः आंदोलन की शक्ति मेधा संभवतः परिवार से ही सीख गयी थीं। रुईया कॉलेज से बी.ए के पश्चात आपने टाटा इंस्टीट्युट ओफ सोशियल साईंसेस से “सामाजिक कार्य” विषय में एम.ए किया। गुजरात में जनजातियों का अध्ययन करते हुए उन्होनें नर्मदा के विषय पर समाज का ध्यान आकर्षित करना शुरु किया। मेधा और उनके साथियों को 1991 में प्रतिष्ठित राईट लाईवलीहुड पुरस्कार से नवाज़ा गया, जिसकी तुलना नोबल पुरस्कार से की जाती है। वे मुक्त वैश्विक संस्था “वर्ल्ड कमीशन ओन डैम्स” में शामिल रह चुकी हैं। 1992 में उन्हें गोल्डमैन पर्यावरण पुरस्कार भी मिला।

मेधा के पाँव में तो पहिये लगे हैं सो निरंतर को उनका फोन नंबर प्राप्त करने के लिये काफी पापड़ बेलने पड़े। प्रस्तुत है मेधा से निरंतर के प्रबंध संपादक देबाशीष चक्रवर्ती की टेलिफोन पर हुई बातचीत के अंश।

हम बचपन से सुनते पढ़ते आये हैं कि बाँध से समृद्धि आती है, जलविद्युत शक्ति से खुशहाली आयेगी, संचित जल से कृषि को लाभ होगा, बाढ़ टलेंगे। आप का आंदोलन बाँधों की खिलाफत करता रहा है। बाँधों से क्या नुकसान हैं और इनके विकल्प क्या हैं।

मेधा पाटकरबाँधों, खासतौर पर बड़े बाँधों, की वजह से क्षेत्र की रिहायशी और कृषि भूमि, जंगल और दूसरी जलधारायें डूब में आ जाती हैं। दूसरा कि इसमें जो ज़मीन जाती है और बाकी प्राकृतिक संपदायें नष्ट होती हैं वो कितने ही लोगों और समुदायों के जीवनोयापन का ज़रिया होते है। हैबीटैट (पशु व पौधों के प्राकृतिक-वास) का अद्वितीय नुकसान होता है। और इस समुदाय, उनकी संस्कृति, संस्थाओं, संबंधों और मुख्यतः जीविका के नुकसान की भरपाई करना किसी राज्य के बस की बात नहीं।

नुकसान भोगने वाले हर समुदाय का पुनर्वास यह तो [सरकारी] योजनाओं में भी नहीं आता और जहाँ आता भी है वहाँ इतनी ज़मीन नहीं होती कि हर एक समुदाय को दी जा सके, यह सब दिक्कतें तो हैं ही। वनों का जो नुकसान है वह केवल वन्य जीवन का ही नहीं होता, अंततः यह लैंड इरोज़न (भूक्षरण) का कारण बनता है। बॉन्डेज होने के कारण एक प्रकार से नदी का अन्त होने लगता है, उसके आगे चलते चलते कैचमेंट (जलग्रहण क्षेत्र) नष्ट होती जाती है, पानी का बहाव भी चिरस्थायी नहीं रहता है। जो पहले आठ महीने रहता था वो अब तीन महिने ही फ्लैशबैक बनके बह जाता है और चौथे महीने में नदी सूख जाती है। नदी फैलती जाती है और उसके कारण जो बाढ़ आते हैं उनका असर भी बढ़ता जाता है।

जहाँ तक विकल्पों की बात है, तो आपशन्स तो कई हैं। एक तो उस बिंदू से शुरु करें जहाँ से बारिश की पहली बूँद गिरती है और वहाँ से आप बाँधते बाँधते आईये, तो ये निश्चित है कि आपके बड़ी नदी में जाने तक आप इतना सारा पानी रोक पायेंगे कि किसी स्ट्रक्चरल ईंटरवेन्शन की ज़रूरत ही नहीं पड़ेगी नदी में, समुद्र तक जब नहीं जा पायेगा नदी का पानी, तो फिर अंदर आयेगा।

कुछ लोग कहते हैं कि बांध होते तो गुजरात की हाल की बाढ़ टल सकती थी?

सरकार ने घोषणा की कि डाउनस्ट्रीम में लोग अपनी सुरक्षा आप देखें क्योंकि बहाव का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। इसका मतलब यही है कि नदी का अपना खुद का वश छूट गया है।

सरासर गलत, ऐसी बातों के पीछे अज्ञानता और साजिश दोनों हैं। एक तो बाढ़ नर्मदा में नहीं आई, बाढ़ अन्य नदियों की कैचमेंट में आई, जैसे कि विश्वामित्र, और ये कैचमेंट सुरक्षित करने का कोई तरीका नहीं है और सरकार ने भी कभी उस के उपर ध्यान ही नहीं दिया। इसलिये पानी बह गया। कुछ पानी समुन्दर में सीधे गया, कुछ पानी उपनदियों से बड़ी नदियों में आया, इस में से एक नर्मदा है। लेकिन नर्मदा पर आया हुआ पानी पहले ही रोक दिया जो नर्मदा में आकर फिर वापस गुजरात में ले जाता है, नर्मदा तो गुजरात की सीमा पर है न, ये द्रावेड़ी प्राणायाम करने की ज़रूरत ही नहीं होती। दूसरा यह कि नुकसान केवल अपस्ट्रीम (उजान) में नहीं है डाउनस्ट्रीम में भी है। आप जिससे पानी रोकते हैं तो नीचे का हिस्सा सूख जाता है, कुएँ भी सूख जाते हैं, मछुआरों का मतस्यपालन करना आजकल मुश्किल है, नाव चलाने वालों का धंधा बैठ गया है। इन सब के साथ साथ नदी का अपना जो अनुशासन होता है वो भी खत्म होता है।

अभी तो सरकार ने भी घोषणा की है कि नर्मदा सागर परियोजना के कारण…विज्ञापनों में भी दिखाया…कि डाउनस्ट्रीम में लोग अपनी अपनी सुरक्षा [स्वयं] देखें क्योंकि बहाव का कोई भी अंदाज़ा नहीं लगा सकता। इसका मतलब यही है कि नदी का अपना खुद का वश छूट गया है। दूसरा मैं कहती हुँ कि नुकसान जो हैं केवल नदी के थाले (बेसिन) में भी नहीं होते हैं, कैचमेंट में भी नहीं कमांड (कमान क्षेत्र) में भी होते हैं। अभी जो बाढ़ आई उसका एक कारण है पानी की अपर्याप्त निकासी, जिसमें एक बड़ा हाथ नहरों के नेटवर्क का जिनसे बड़े पैमाने पर प्राकृतिक निकासी खत्म हो रही है।

पर क्या बाँधों से उस क्षेत्र के लोगों का फायदा नहीं होता?

बिल्कुल ही नहीं! क्योंकि महाराष्ट्र को तो अभी 110[मीटर] पर, इन्होंने तो मध्यप्रदेश में भी, महाराष्ट्र में भी ये कहा था कि चमक उठेगा महाराष्ट्र 110 बनने के बाद। बहुत सारी बिजली मिलेगी। मेरे पास एम.एस.ई.बी के मिनिट्स हैं जिसमें सरदार सरोवर का नाम तक नहीं है। पीक महीने जो थे मॉनसून के, उसमें भी, 110 मीटर बनने के बाद भी, महाराष्ट्र को तो बिजली मिली ही नहीं है और जब भी मिलेगी तब कोई नंदुरबार जिले को देने के लिये नहीं मिलेगी, वो तो जायेगी सीधी ग्रिड में। ग्रिड का जो डिस्ट्रीब्यूशन है वो आपको मालूम ही है कि कैसा है, ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन लॉसेस महाराष्ट्र में 45 प्रतिशत हैं, मध्यप्रदेश में 40 प्रतिशत, पर मूलतः जो दिल्ली का बंटवारा ही अन्यायी है, वहाँ ये सेंट्रलाईज़्ड पॉवर जेनेरेशन है सेंट्रलाईज़्ड प्रोजेक्ट्स से, बिल्कुल ही अनुचित डिस्ट्रीब्यूशन होता है, पानी का भी वही है।

तकनीकी रूप से असंभव नहीं है पर राजनैतिक और आर्थिक कारण भी हैं। इतने बड़ा सेंट्रलाईज़्ड स्ट्रक्चर जहाँ पानी पहले उद्योगों को फिर बड़े किसानों को मिलना है। और जब कैश क्रॉपिंग और वॉटर इंटेसिंव क्रॉपिंग की बात आ जाती है तो जो छोटे, ड्राईलैंड किसान हैं,मार्झिनल किसान हैं उनको कम से कम फायदा मिलता है। हमारे कुछ साथियों ने मिलकर स्टडी किया है कि मुख्य नहर से यदि उनकी नहर में पानी गया है भले ही वह बसाहट से ज्यादा दूर न हो पर एक तो पानी का टैरिफ उतना बढ़ जाता है उपर से नहर के पानी को कंट्रोल करने वाला अलग ही हो जाता है। ये सब चीज़ें अवश्यमभावी हैं, देखने से लगता है कि अरे ये तो खत्म करना संभव है, अपनी समझ से दूर करना संभव है पर यह भाखरा नांगल में भी नहीं हुई और सरदार सरोवर में नहीं हुई, कहीं पर भी नहीं हुईं। कहीं की भी सिँचाई बंद करना पड़ती है सरकार को बीच बीच में, इतना सारा वॉटर लॉगिंग और सेलिनाईज़ेशन है।

आप और अन्य कई एक्टिविस्ट मुक्त बाजार व्यवस्था और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का भी विरोध करते हैं। क्या आप लोग मॉडर्नाज़ेशन और टेक्नॉलॉजी के खिलाफ हैं?

कौन कहता है? मॉडर्नाज़ेशन और टेक्नॉलॉजी की परिभाषा क्या है। मॉडर्नाज़ेशन क्या है, एक ऐसा बदलाव जो होना ही है। हम लोग बदलाव के खिलाफ नहीं हैं लेकिन उसकी दिशा क्या होनी चाहिये? जो कल का था वो ट्रेडिशनल और जो आज का है वो माडर्न, इतनी संकीर्ण परिभाषा नहीं होनी चाहिये। मॉडर्नाज़ेशन का मतलब विकास है वगैरह वगैरह कई आदमी कह के गये हैं पर जब विकास का ढांचा बराबरी और न्याय जैसे सिद्धान्तों के आधार पर बने, तब ही आप इसे सही विकास कहेंगे। हम नहीं चाहते कि साधनों के वितरण में असमानता हो। ये जो मल्टीनेशनल और जो प्राईवेटाइज़ेशन है, ये लोगों के ही साधनों को प्रयोग करने का तरीका हैं। केवल सार्वजनिक ही नहीं, निजी संपत्ति भी कब्ज़े में ले ली, या ऐसे ही खरीद कर भी ले ली लेकिन ये सोचे बिना कि उस का असर क्या होता है।

इसलिये हम अनशन करते हैं। ऐसा भी नहीं कहते कि कोई कंपनी नहीं आये, लेकिन जो कंपनी केवल प्रॉफिट या उससे जुड़ा स्वार्थ है उतना ही देखती है वो लोगों को लूटती है, इसमें राज्य शासन भी लोगों की बजाय कंपनियों की सुरक्षा करने की अशिष्ट भूमिका निभा रहा है। ये बड़ी दुखद बात है, इस चीज से लड़ना है तो मिलजुलकर एक साथ लड़ना पड़ेगा।

आप लोगों ने सामुदायिक अधिकार की बात की है। पंचायती राज से तृणमूल स्तर तक लोगों को अधिकार मिलने की बात चलती है। फिर यह भी होता हे कि कोर्ट कोक को केरल में उत्पादन शुरु करने की इज़ाजत दे देती है, ग्रामसभा की आपत्तियों को दरकिनार कर देती है।

न्यायालय व्यक्ति और कार्पोरेट्स में भेद नहीं करतीं। हम इसका विरोध कर रहे हैं, हमारा सत्याग्रह चालू हो गया है क्योंकि हमारा मानना है कि यह न ही समझदारी है और न उचित, नागरिक नागरिक है कंपनी कंपनी है। और ग्रामसभा और जनजातीय सेल्फ रूल तक बात जाने के बाद फिर यह कहना की ग्रामसभा अपने निर्णय पर पुनर्विवार करे तो फिर मतलब ही क्या हुआ निर्णय का!

आपने एक बार ये भी कहा है कि न्यायालयों में ईंवेस्टीगेटिव अप्रोच (अनुसंधान करने का रवैया) की कमी है। पर कई बार तो पब्लिक ईंटरेस्ट पेटिशन्स पर न्यायपालिका के निर्णयों से आम आदमी को बड़ी खुशी होती है, लगता है कि जो काम हमारे चुने राजनेताओं को करना था वह कम से कम कोर्ट ने तो किया।

जूडिशियरी को संविधान का पालन तो करना ही चाहिये। न्यायपालिका के हाथ में वैसे बहुत है पर अगर वे कानून और संविधान का मूल भावना की परवाह कर केवल अक्षरशः पालन ही करें तो क्या लाभ।

आंदोलनों के रूख से अक्सर ऐसा लगता है जैसे कि ग्रामीण जनता के हर दुख व पानी की समस्या के लिये शहरी ही जिम्मेदार हैं। आम शहरी क्या कर सकता है?

गरीब चाहे शहरी हो या ग्रामीण दोनों की स्थिति एक जैसी है। शहर के भीतर भी ग्रामीण, जो सिर्फ काम के वक्त लाये जाते हैं, गौण जीवन जीने को विवश हैं।

हम जो अर्बनाईज़ेशन आधारित विकास कर रहे हैं जो एक प्रकार से भारत सरकार ने आज़ादी के बाद मंजूर किया है उसके साथ यही हो रहा है कि ईंटरलैंड के ग्रामीण संसाधनों को शहरों में लाया जा रहा हैं और शहरों में भी जो जीवन जी रहे हैं उसमें केवल 20 से 50% आबादी ही साधनों का वैसा उपयोग कर पा रही हैं जैसा वे चाहते हैं। शहर के भीतर भी ग्रामीण, जो सिर्फ काम के वक्त लाये जाते हैं, गौण जीवन जीने को विवश हैं।

गरीब चाहे शहरी हो या ग्रामीण दोनों की स्थिति एक जैसी है। असंगठित क्षेत्र और अवैद्य निवासियों जैसे लोगों के अधिकारों की तो बात ही नहीं होती। जहां तक पानी की बात है, क्रांपिंग पैटर्न क्या होगा, कृषि टेक्नोलॉजी क्या होगी यह तय करता है कि पानी की क्या स्थिति होगी। हर महानगर में 40% पानी व्यर्थ हो जाता है। वॉटर ईंटेंसिव क्रॉपिंग और पानी का आडंबर पूर्ण प्रयोग रोकना होगा। सिर्फ “जानकारी का अधिकार” काफी नहीं हैं, अधिकार यह भी मिलना चाहिये कि आप यह तय करें कि विकास कैसा हो।

आप सक्रिय राजनीति में क्यों नहीं शामिल होतीं? हर कोई आप जैसा प्रतिनिधि पाना चाहेगा।

राजनीति में हम भी शामिल है पर आंदोलन की राजनीति अलग तरह की है। जो राष्ट्रीय राजनीति है उसके अपने नियम है, अपना खेल है, उस पर आज पैसा और माफिया हावी है। उसके अंदर जाने के पहले दस बार सोचना चाहिये। उसके अंदर जाकर भी एकदम जादू हो जायेगा, हम ऐसा भी नहीं मानते। हम देखते हैं कि अक्सर विभिन्न पार्टियाँ जो कानून या नीतियों में बदलाव लाती है तो ये गरीबों के ठीक नुकसान के लिये होती हैं, ऐसे में संगठित शक्ति और आंदोलन ही सरकार पर दबाव बनाते है। पार्टी के भीतर के लोग रोज़गार, कृषि क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के लोगों के खिलाफ नीतियों के खिलाफ कम ही आवाज उठाते हैं, यह काम आंदोलन और संगठित शक्ति ही करती हैं।

2 प्रतिक्रियाएं

  1. मेधा पाटकर के विचारों पर बहस की गुंजाईश हमेशा ही रहती है ….मगर उनका संघर्ष जरूर ही अनुकरणीय है । विस्तार से टीपता हूं दोबारा आने के बाद

  2. सहमति और असहमति से परे कई मुद्दों पर सहमत हुआ जा सकता है ….पर अफ़सोस यह है कि जिस तरीके से मेधा पाटेकर काम कर रही है ….वह मात्र विरोध और अवरोध पर आधारित एकाकी मार्ग है ….जिस पर मेरी पूरी असहमति है !!!!