यायावरी शरद आया है

समय

हिमानी

यह समय भी तुम्हारी तरह है
जब चाहती हूँ कि
थम जाये
ठहर जाये
मुझे छोड़ आगे निकल जाता है
बिल्कुल तुम्हारी तरह

और जब कभी चाहती हूँ रहना तन्हा
चाहती हूँ कि समय को पँख लग जाये
कुछ लम्हे जल्द ही बीत जाये
तो रुक जाता है
बीते नही बीतता
बिल्कुल तुम्हारी तरह

पर ठीक भी है
समय और तुम्हें अपने अनुसार
बाँधना कहाँ तक है उचित

पर फिर ऐसा क्यों, कि
मैं तो
समय और तुम्हार अनुसार ही
बँधी

तुम दोनों ही मुझे अपनी गति में बाँधना चाहते हो
और बाँध ही चुके हो

ऐसा बहुत ही कम होता है
कि जब समय और तुम
दोनों ही मेरे साथ होते हो

बस वही क्षण होते हैं
जब तुम दोनों मेरे होते हो
बिल्कुल मेरी तरह
शुक्र है इस थोड़े से समय की बदौलत
मेरा सारा समय बीत जाता है

या शायद
मैं
समय और तुम में बीत जाती हूँ

 

यायावरी शरद आया है

राकेश खंडेलवाल


यायावरी शरद आया है, कुछ पल नीड बनाये
और आपके पथ में प्रतिदिन, नव पाथेय सजाये
दीपित होकर अमा, पूर्णिमा जैसे, गीत सुनाये
दीप जलें नित आशाओं के, पल न अँधेरा छाये

रंग धनक के सँवरें निशिदिन अँगनाई में आकर
हो साकार कामना, तुलसी चौरे ज्योति जगाये
पुरबाई नित करे आरती, मंगल गाय पछुआ
आशीषों के फूल आपके सर पर विधि बरसाये

टिप्पणीयाँ अब बंद हैं।