बर्गन का वो पागलखाना

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द साईंटिफ़िक इंडीयन ने हाल ही में विज्ञान फंतासी कथा लेखन प्रतियोगिता आयोजित की थी। इस में आदित्य सुदर्शन की लिखी कहानी द असाईलम एट बर्गन को प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ। दिल्ली के रहने वाले आदित्य फिलहाल नेशनल लॉ स्कूल, बंगलौर में कानून की पढ़ाई कर रहे हैं। इस कहानी का परिश्रमपूर्वक हिन्दी रूपांतरण किया है रमण कौल ने। आशा है यह प्रयास आप सराहेंगे।

फर शुरू हुए दो घंटे हो चुके थे। मैं ने किताब से नज़र हटा कर खिड़की से बाहर देखा। शाम होने को थी, बादल थे, पर अभी उजाला था — मुझे मालूम था आधी रात टलने तक ऐसा ही रहना है। बाहर देहात तीव्र गति से गुज़र रहा था — चीड़ और शंकुवृक्ष नीची पहाड़ियों को घेरे थे, नॉर्वे की ग्रीष्म ऋतु की ठंडी धूप से नहाए हुए से। जैसे जैसे रेलगाड़ी ऊँचाई को जाने लगी, पहाड़ी दीवारों से चिपके बर्फ के पैबन्द भी दिखने लगे – गहरे हरे रंग की पृष्ठभूमि पर सफेद चमकते हुए। मैं कुछ मिनट ऐसे ही देखता रहा, फिर वह कर्कष सौन्दर्य अखरने लगा; मैं ने जैकेट को ज़ोर से लपेटा और दोबारा किताब पढ़ने लगा।

‘माफ कीजिए आप वह ब्रेन सर्जन हैं क्या?’

मेरे सामने वाली सीट पर बैठा आदमी अधेड़, गंजा और थोड़ा सा मोटा था। मैं ने मुस्करा कर जवाब दिया –

‘हाँ’

‘मैंने आप के बारे में सुना है – अखबार पर ट्रान्सप्लांट के बारे में जो खबर थी उस में। ओ, आप भारत से हैं, हैं न?’

मेरी मुस्कान चौड़ी हुई। मुझे इस बात की आदत हो गई थी कि मेरे काम से ज़्यादा रुचि मेरी नस्ल में जताई जाती हो, कई बार तो मेरे सहकर्मियों द्वारा भी। मैं ने हाँ में सिर हिलाया और फिर किताब की ओर लौट कर अपना पन्ना खोजने लगा।

**********

इंटरसिटी एक्सप्रेस पर ओस्लो से बर्गन का सफर छः घंटे से कुछ कम है, और जब हम स्टेशन पहुँचे सात से ऊपर बज चुके थे। मैं प्लैटफॉर्म पर उतरा, शाम की ठंडी हवा की चुभन का सामना करते हुए। इस देश के हर प्लैटफॉर्म की तरह यह वाला भी सुनसान और खुले आकाश तले था। मैं ने मटमैले आकाश पर एक दृष्टि डाली और नॉर्वे के जाड़े के बारे में सोच कर ठिठुर उठा — जब रेलवे प्लैटफॉर्मों पर बर्फ के ढेर लग जाते हैं और स्कैंडिनेवियाई अपने ऊनी कपड़ों में कांपते खड़े होते हैं, अपनी बहादुरी पर गर्व करते हुए। बेकार मौसम जैसी कोई चीज़ नहीं होती, यहाँ कहावत है, बस बेकार कपड़े ज़रूर होते हैं। जून में दिल्ली आ कर देखो फिर पता चलेगा, मैं ने मुस्कुरा कर सोचा – घर का खयाल आते ही गर्माहट सी महसूस हुई।

मेरी नज़रें घूमते हुए घने पर्वतों से घिरे दीवार नुमा पहाड़ों पर गई जिन की जड़ें नीचे शहर में थीं और वे फैल कर ऊपर आ रहे थे। अपने कन्धे पर मुझे किसी के हाथ का अहसास हुआ।

स्टेशन से मैं पैदल ही निकल पड़ा और शहर से गुज़रते हुए फ्युनिक्युलर पहुँचा। बर्गन अपने फ्युनिक्युलर के लिए प्रसिद्ध है – यह एक केबल रेलवे है जो पहाड़ के ऊपर तक ले जाती है, जहाँ से आप पूरे शहर को और उस की शानदार बन्दरगाह को देख सकते हैं। बारहवीं और तेरहवीं शताब्दी में बर्गन नॉर्वे की राजनीतिक और आर्थिक राजधानी थी, और अभी भी पश्चिमी तट पर यही सब से महत्वपूर्ण बन्दरगाह थी। पर फिर भी नार्वे के शहर जल्दी नींद के आगोश में चले जाते हैं और मैं खाली सड़कों पर दुकानों के बन्द दरवाज़ों और शटरों के सामने से गुज़ते हुए फ्युनिक्युलर के प्रवेश द्वार तक पहुँचा। वहाँ केबल के निचले सिरे पर सवारियों की एक उत्सुक भीड़ जमा थी। केबल कार आहिस्ता आहिस्ता अपने पड़ाव की तरफ आ रही थी, और जैसे वह रुकी केबल का तनाव ढीला हुआ। जब कार के दरवाज़े खुले, मैं घुस कर पीछे की ओर निकल गया जहाँ से मोटे शीशे में से मैं पीछे छूटते पहाड़ का सुन्दर दृष्य देख सकता था। जैसे केबल-गाड़ी ने गति पकड़ी खिड़कियों से ठंडी हवा आई, और हम ऊपर की ओर चढ़ते गए, जहाँ से मुझे सुरंग का सिरा अपने एकदम नीचे दिखा। ऊपर चढ़ने के कई मिनटों बाद तक चढ़ाई के आनन्द की अनुभूति रही।

रेलवे का अन्तिम पड़ाव पहाड़ की चोटी पर एक हरे भरे मैदान में था, जिस से शहर नज़र आता था। वहाँ खड़े हो कर बन्दरगाह का प्रवेश दिखाई दे रहा था, दक्षिण में मालवाहक जहाज़ों से पटा हुआ। उत्तरी सिरे पर बारहवीं सदी का एक किला समुद्र में निकला हुआ दिख रहा था। उस से भी उत्तर में बर्गन के प्राचीनतम गिरजे की घंटियों ने आठ बजाए, जिस की इस शाम को चीरती आवाज़ ने मुझे सहसा रोमांचित कर दिया। मेरी नज़रें घूमते हुए घने पर्वतों से घिरे दीवार नुमा पहाड़ों पर गई जिन की जड़ें नीचे शहर में थीं और वे फैल कर ऊपर आ रहे थे। अपने कन्धे पर मुझे किसी के हाथ का अहसास हुआ।

‘सॉरी आप को इन्तज़ार कराया।’

मैं डॉक्टर को देखने के लिए मुड़ा। वे बिल्कुल वैसी ही शक्ल जैसी फोटो में देखी थी – लंबे, तगड़े, चौड़ा माथा और गहरी नीली आँखें जो अब एकटक मेरी आँखों में देख रही थीं।

‘कोई बात नहीं, डाक्टर साक्स। आप का निमन्त्रण मिलना मेरे लिए इज़्ज़त की बात थी।’

‘द प्लेजर इज़ माइन। हमें यहाँ से पैदल जाना होगा। उम्मीद है आप ज़्यादा थके नहीं होंगे।’ उन की आवाज़ में चिन्ता सच्ची थी।

‘न, बिल्कुल नहीं।’, मैं झूठ बोला।

**********

एक संकरे रास्ते से होते हुए वे वन्य पर्वत क्षेत्र की ओर बढ़े।

‘गाड़ी के लायक चौड़ा नहीं है यह रास्ता।’ डॉक्टर ने क्षमायाचक स्वर में कहा।

मैं ने इशारा किया कि कोई फर्क नहीं पड़ता। अब अन्धेरा हो रहा था; ऊपर की कैनोपी से सांझ का सूरज छिप रहा था। हम कोई आधा घंटा चुपचाप चलते रहे, फिर मुझे दूर पागलखाने की इमारत की सफेद दीवारें दिखाई दीं। चारों तरफ घिरे जंगल में वह कुछ अटपटी सी लग रहा थी।

‘मैं ने डिनर तैयार रखने के लिए बोल रखा है।’

वे दुनिया भर से लाए गए थे – फ्राँसिस, टूलूज़ का मोची जो मज़े के लिए अपने ग्राहकों के जूतों में बिच्छू डाल देता था, जेरमी, टेनेसी का बैंक कर्मचारी जिस ने अपनी अपाहिज पत्नी को मार दिया था ताकि उस की देखभाल न करनी पड़े

गर्म खाने की बात सुन कर मेरे कदम थोड़े तेज़ हुए। जल्द ही हम पास पहुँचे और इमारत पूरी दिखने लगी। इमारत विशाल थी, लंबी चौडी और कई कोणों वाली, विशुद्ध कार्यशीलता के आधार पर बनी हुई। हालाँकि हम अभी घुसे नहीं थे, मुझे मालूम था कि ऊपर की मंज़िलों का कभी कभार ही इस्तेमाल होता होगा, जबकि निचली मंज़िलें, जहाँ सब से खतरनाक रोगी रहते होंगे, सब तहखानों के रूप में होंगी – ज़मीन के नीचे। पागलखाने की प्रसिद्धि काफी हद तक उस के रोगियों के कारण ही थी। वे दुनिया भर से लाए गए थे – फ्राँसिस, टूलूज़ का मोची जो मज़े के लिए अपने ग्राहकों के जूतों में बिच्छू डाल देता था, जेरमी, टेनेसी का बैंक कर्मचारी जिस ने अपनी अपाहिज पत्नी को मार दिया था ताकि उस की देखभाल न करनी पड़े, कुर्त्ज़, जर्मन आदमखोर जिस ने सफलतापूर्वक अपने शिकार के लिए इंटरनेट पर विज्ञापन दिया था, और तन्ज़ानिया की न्गाइयो बहनें जिन्होंने पकड़े जाने से पहले दो महीने तक हर हफ्ते एक शिशु को दम घोट कर मारने में सफलता प्राप्त की थी। कानून की इन्सानियत का यह आलम था कि जो उस की नज़र में पागल थे उन का वह कुछ नहीं बिगाड़ सकता था, इस कारण जिन की अच्छी पहुँच थी वे बर्गन के इन पहाड़ों में भेज दिए जाते थे, जहाँ डॉक्टर साक्स की देखरेख में उन का इलाज होता था, इस उम्मीद में कि शायद वे ठीक हो जाएँगे।

डॉक्टर का इलाज असरदार रहा हो, यह बात साफ नहीं थी पर बिल्कुल नाकामी का भी सबूत नहीं था, और जिन लोगों का इलाज हो रहा था उन्होनें फिर शिकायत का मौका नहीं दिया था। पर उस से भी ज़्यादा साक्स का अपना नाम ही था जिस ने इस पागलखाने की प्रसिद्घि बढ़ाई थी – उन से बड़ा तो इस क्षेत्र में कोई था भी नहीं। उन की दूर दूर तक शोहरत उस आदमी के रूप में थी जिस ने कम उम्र होते हुए भी, मनोचिकित्सा को छद्म-विज्ञान के अधर से निकाल कर उसे वे नियम और यन्त्र दिए थे जिस से वह एक सम्मानजनक और सफल चिकित्सा शाखा बन सकती थी। इस कारण, मेरी हाल की विजयों के बावजूद, बर्गन में इस डाक्टर द्वारा बुलाए जाने पर मुझे सुखद आश्चर्य हुआ था, और इस बुलावे के कारण का रहस्यमय अभाव भी मुझे उसे स्वीकार करने से नहीं रोक सका था।

पागलखाने के ग्राउंड फ्लोर का एक हिस्सा डाक्टर की रिहाइश में तबदील किया गया था, जब कि बाकी कर्मचारी मुख्य इमारत के साथ जुड़े कमरों में रहते थे। हम रिसेप्शन और मेडिकल वार्डों से गुज़र कर एक सफेद दीवारों वाले कॉरिडोर से होते हुए एक छोटे आरामदेह, लाल कालीन वाले कमरे में पहुँचे। कोने में एक लकड़ी का बुकशेल्फ था, और उस के सामने एक नीची मेज़, खाने से लदी हुई। भोजन के दौरान मैं ने बातचीत छेड़ी।

‘अब मुझे बताइए, डॉक्टर साक्स’, मैं ने उन के कमरे के आराम का लुत्फ उठाते हुए सहजता से कहा, ‘इस सम्मान के योग्य मैं किस कारण बना?’

यह कहते हुए मेरा ध्यान पहली बार इस ओर गया कि डॉक्टर साक्स की तबीयत सही नहीं लग रही थी। उन की आंखें नीन्द की कमी के कारण लाल थीं और मुँह के आकार के कारण चेहरे के गड्ढे साफ नज़र आ रहे थे। उन्होंने हल्के स्वर में उत्तर दिया –

‘मामला व्यक्तिगत है। समझाने में समय लगेगा।’

मैं ने कुछ नहीं कहा। जब वे दोबारा बोले तो उन में एक स्पष्ट परिवर्तन आ गया था। वे आगे की ओर झुके, आँखों में एक विचित्र अनिवार्यता की चमक थी, और थकन का कोई निशान न था –

‘एक साल पहले मैं ने यह जाना कि मैं यहाँ के कार्य में नाकाम हूँ।’

बिना रुके वे बोलते गए। वे तेज़ी से पर साफ शब्दों में बोल रहे थे।

ऐसी अटकलें अक्सर लगाई गई हैं कि पागलपन मस्तिष्क का एक दोष है, और इस परिकल्पना को साबित करने के लिए बहुत बेवकूफी वाले काम हुए है

‘मैं अब तक हमेशा यह समझता रहा कि पागलपन हालात की पैदाइश होता है – यानी इन बदकिस्मत लोगों के मस्तिष्क की गहराई में कोई ताकत होती है’, उन्होंने तहखाने की ओर इशारा किया, ‘जो इन्हें यह सब करने के लिए मजबूर करती है। इस लिए मैं ने उस ताकत का स्रोत खोजने का बीड़ा उठाया। मैं ने उन के साथ कितने ही घंटे बिताए, अपने विज्ञान की हर तकनीक का इस्तेमाल किया उनसे पूछताछ करने में, खोजबीन करने में। पहले-पहल मुझे लगा कि यह तकनीक काम कर रही है। पर मैं ग़लत था।’

पल भर के लिए उन की नज़रें मेरी आँखों पर एक अजीब तीव्रता से गड़ गईं। फिर वे आगे बोले –

‘कई बार कुछ ऐसा हुआ जो नहीं होना चाहिए था – पागलपन का संक्षिप्त पर अवर्णनीय दौरा। बात बाहर तो नहीं निकली पर मैं समझ गया कि यह बीमारी मनोवैज्ञानिक नहीं थी, और मेरा इलाज इस के सामने बेकार था। मैं टूट गया; आप नहीं समझ पाएँगे, मेरे जीवन का सारा कार्य ध्वस्त हो गया। पर मैं ने निश्चय किया कि मैं इस समस्या से नए सिरे से सुलटूँगा। मैं ने कई महीने तक इस का अध्ययन किया। फिर पिछले महीने ही मुझे जवाब मिला।’

वे रुके, मुझे लगा मेरे बोलने की उम्मीद में।

‘क्या जवाब?’

डॉक्टर हल्के से मुस्कुराए, जैसे एक गहरे रहस्य का रसास्वादन कर रहे हों –

‘जवाब आप की निपुणता के दायरे में है। जिस पागलपन से मैं दोचार हूँ, वह सही और ग़लत का अन्तर बता सकने की असमर्थता है। मुझे मालूम है कि ऐसी अटकलें अक्सर लगाई गई हैं कि पागलपन मस्तिष्क का एक दोष है, और इस परिकल्पना को साबित करने के लिए बहुत बेवकूफी वाले काम हुए हैं। पर अब मैं इस में सफल हुआ हूँ, और इस के लिए मैं आप को धन्यवाद देता हूँ।’

‘क्यों?’

‘क्यों कि पेनफील्ड मानचित्र पर आप के द्वारा किए गए कार्य से मुझे यह जवाब मिला है।’

एक का बायाँ हाथ कटा था पर वह दावे से कहता था कि जब मैं उस की नाक को हाथ लगाता था तो उस के ग़ैरहाज़िर अंगूठे में अहसास होता था। दूसरा जिस की दाईं टांग एक हादसे में कट गई थी, कहता था कि उसे कामोन्माद का अहसास उस खोई हुई टांग तक होता था।

यह मुझे कुछ रोचक लगा। पेनफील्ड मानचित्र, जिसे कैनेडियन खोजकर्ता विल्डर पेनफील्ड ने खोज निकाला है, शिराविज्ञान की सर्वाधिक रोचक खोजों में से एक समझा जाता है। इस के अनुसार शरीर का एक मानचित्र मस्तिष्क में बना होता है, ताकि जब शरीर के किसी भाग को उत्तेजित किया जाता है, वह संकेत मस्तिष्क के मानचित्र के संबन्धित क्षेत्र में चला जाता है। यह मानचित्र काफी रोचक है, क्योंकि इस में हाथ चेहरे के पास है, पैर गुप्तांगों के पास हैं, और कान स्तनों के पास – यानी कुछ भी आशा के अनुरूप नहीं। इस क्षेत्र में मेरा अपना कार्य, जिस के चलते मेरा नाम गुमनामी के अन्धेरे से निकल पाया था, उन विषमताओं का वर्णन करता था जिन का सामना मैं ने अपने मरीज़ों का अध्ययन करते किया था। एक का बायाँ हाथ कटा था पर वह दावे से कहता था कि जब मैं उस की नाक को हाथ लगाता था तो उस के ग़ैरहाज़िर अंगूठे में अहसास होता था। दूसरा जिस की दाईं टांग एक हादसे में कट गई थी, कहता था कि उसे कामोन्माद का अहसास उस खोई हुई टांग तक होता था। मैं ने यह प्रदर्शित किया था कि इन रोगियों में मस्तिष्क के वे हिस्से जो सामान्यतः हाथ या पाँव से संकेत लेते थे किसी तरह पड़ौस के क्षेत्र से सिग्नल लेते थे, यानी चेहरे से या गुप्तांग से। पर पेनफील्ड मानचित्र का मानुषिक समझ से, या भावना से, या पागलपन से कोई लेना देना नहीं है, और मैं ने डॉक्टर को यह बात बताई।

‘यह सही है कि मानचित्र का कोई सम्बन्ध नहीं है।’ उन्होंने बेसब्री से जवाब दिया, ‘पर इस विषय पर आप के किए गए कार्य का महत्व आप की कल्पना से ज़्यादा है। देखिए, मस्तिष्क के केवल कुछ ही भाग ऐसे नहीं हैं, जो आस पास के संकेत पकड़ सकते हैं, बल्कि हर भाग ऐसा कर सकता है।’

धीरे धीरे मुझे इस बात की समझ, एक पहचाने ढ़ंग से, आने लगी। पर फिर भी यह कुछ ज़्यादा ही हवाई लग रहा था।

‘आप का मतलब, फ्रंटल कोर्टेक्स..’

‘हाँ’ उन के स्वर में विजय सुनाई दी मुझे।  ‘मस्तिष्क का फ्रंटल कोर्टेक्स हमारी नैतिक समझ की बुनियाद है। किसी कारणवश उन लोगों में, जो सही ग़लत का अन्तर नहीं कर पाते, मस्तिष्क के इस भाग तक का रास्ता ही नहीं खुला होता, उन के अत्यन्त घृणित व्यवहार के बावजूद। पर यदि मस्तिष्क के हर भाग तक उस के पडौस द्वारा पहुँचा जा सकता है, तो फिर फ्रंटल कोर्टेक्स तक क्यों नहीं?’

‘पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित कर के?’ पर मुझे जवाब पहले ही मालूम था।

‘हाँ, पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित कर के। और पेरीटल कोर्टेक्स, जैसे आप को पता ही होगा, सब से पाश्विक भावना से उत्तेजित होता है – और वह है भय।’

कई मिनटों तक हम दोनों में से कोई नहीं बोला। उस छोटे से कमरे में खामोशी ऐसी गूँजी कि मुझे सहसा उठ कर जाने की तीव्र इच्छा हुई। मैं बस फ्युनिक्युलर पर फिर चढ़ कर पहाड़ से नीचे शहर की गलियों में पहुँचना चाहता था। डाक्टर फिर बोले, हल्के से, जैसे कि उन्होंने मेरी बेचैनी को भांप लिया हो –

‘बाहर चलें?’

हम फिर उस सफेद पुते हुए कॉरिडोर से गुज़रे, और फिर उसी रास्ते से होते हुए बाहर पहाड़ की ठंडी हवा में पहुँचे जहाँ पर्वत हमें फिर घेरे खड़ा था। पर अब चारों तरफ अन्धियारा छाया था और मुझे ताकने पर भी वह रास्ता नहीं दिखा जिस से हम आए थे। डॉक्टर ने पागलखाने की दीवार में एक छोटे से द्वार की ओर इशारा किया –

‘मुझे यकीन है आप मेरे नए इलाज के परिणाम देखने को उत्सुक होंगे।’

पागलखाने के निचले तल सब से पुराने थे। बहुत पहले इस जगह तहखानों का जाल बिछाया गया था, जिस का उद्देश्य अब किसी को याद नहीं था, पर यह पुराने तहखाने अब इस पागलखाने के कुछ नामी गिरामी बाशिन्दों का सुलभ आवास बन गए थे। रोगियों की संख्या इतनी ही थी कि हर किसी के लिए अपनी अलग कोठरी थी, और यह कोठरियाँ साथ साथ सटी न हो कर तहखाने के अलग अलग हिस्सों में थीं।

बल्ब लगातार झूल रहा था, और उस से कमरे में अजीब सी परछाइयाँ नृत्य कर रही थीं।

मैं ने देखा कि इस पुरानी भूलभुलइया की पत्थर की दीवारें और मज़बूत बनाई गई थीं और कई रास्ते बन्द कर दिए गए थे, ताकि जो कॉरिडोर थे वे किसी अनजान आगन्तुक को भटकाने के स्थान पर राह दिखा सकें। हमें उत्तर की ओर गहराई में जाते एक लंबे संकरे कॉरिडोर, जो हमें इमारत के केन्द्रीय भाग की ओर ले जा रहा था, में चलते कई मिनट हो गए थे जब डॉक्टर ने रुक कर मेरे बाईं ओर इशारा किया।

‘देखो।’

उन के इशारे की ओर मुड़ते हुए मैं ने उन के स्वर की उत्तेजना को भांपा। मेरे बाईं ओर, दीवार की गहराई में एक बड़ा, खाली सा कमरा था, जिस में केवल एक छत से लटकते बल्ब की रौशनी थी। बल्ब लगातार झूल रहा था, और उस से कमरे में अजीब सी परछाइयाँ नृत्य कर रही थीं। एक कोने में एक आदमी की दुबकी बैठी सूरत दिख रही थी, पर उस के नैन नक्श धुंधलके में छिपे थे। जब बल्ब की बिखरी रौशनी उस के चेहरे पर पड़ी तो मैं ने ध्यान से देखने की कोशिश की। उस आदमी के गाल गोल और चिकने थे। नाक चपटी और मोटी थी, होंठ बिना किसी आकार के, जिस से मुझे हल्की सी याद आ रही थी अखबारों में कई महीने पहले देखे एक चित्र की। पर फिर मेरा ध्यान उस के गाल, नाक या होठों से हट गया, क्योंकि इन सब गौरतलब नैन नक्शों के बीच उस आदमी की आँखें थीं जो मुझे घूर रही थीं – बड़ी भूरी आँखें जो भय से चौड़ी खुली थीं, स्पष्ट, दयनीय भय से।

मैं ने घूम कर देखा, डॉक्टर मुझे देख कर मुस्कुरा रहे थे।

‘उस की कोठरी साउंडप्रूफ है। और हम एक शीशे की चादर से उसे देख रहे हैं, जो दूसरी ओर से अपारदर्शी है।’

‘पर वह क्या देख रहा है?’ मुझे अभी भी उस की पगलाई, घूरती आँखें दिख रही थीं।

जिस पल वह होश में होता है, वह इन्हीं खौफों की मायावी दुनिया में रहता है, इस कारण उस का मस्तिष्क अब सत्य और माया में अन्तर नहीं कर पाता।

‘इसे कैसे बेहतर समझाया जाए, यह मुझे नहीं मालूम। उसे लगता है कि अप्राकृतिक प्राणी – भूत, प्रेत, पिशाच – उस के पीछे पड़े हुए हैं। शायद आप को और मुझे यह बचकानी चीज़ें लगेंगी, पर उस के लिए यही चीज़ें हैं जिन से उसे सब से ज़्यादा डर लगता है। देखो, मेरे जैसे प्रशिक्षित व्यक्ति के लिए यह जानना मुश्किल नहीं है कि किसी को किस चीज़ से डर लगता है। और अक्सर वैसी ही चीज़ की नकल बना लेना संभव हो जाता है, यानी एक ऐसी दुनिया जिस में केवल भय का वास हो और कुछ नहीं। और फिर सारी इन्द्रियाँ उसी पर केन्द्रित कर देना ताकि रेटिना को और कोई चित्र ही न मिले, कानों के पर्दों को कोई और ध्वनि ही न प्राप्त हो। ताकि इस से दूर हटना असंभव हो जाए।’

‘क्या उसे मालूम है कि यह सब सच नहीं है?’

‘वह नहीं जानता; यही तो इस की खासियत है। जिस पल वह होश में होता है, वह इन्हीं खौफों की मायावी दुनिया में रहता है, इस कारण उस का मस्तिष्क अब सत्य और माया में अन्तर नहीं कर पाता।’

‘पर इस से क्या हासिल होगा?’

‘यह बिल्कुल आसान है, हालाँकि मानना पड़ेगा कुछ असभ्य है। भय पैदा करता है यह। यह मस्तिष्क के पेरीटल कोर्टेक्स को उत्तेजित करता है – बलपूर्वक और निरन्तर।’ डॉक्टर के चेहरे पर एक अजीब, टेढ़ी मुस्कान थी – ‘आखिर एक सोते व्यक्ति को जगाने के लिए फुसफुसाने से तो काम नहीं चलेगा न। और काम भी कर रहा है यह, तुम्हें नहीं लग रहा?’, उन का स्वर ऊँचा हुआ, विजय के उन्माद से कांपता हुआ, ‘कई बार इन पुरुषों और स्त्रियों की मृत नैतिक शक्ति जागृत हुई है, और समय के साथ, मुझे पक्का यकीन है, पूरी तरह जागेगी। मैं ने इन रोगियों को घृणा का प्रदर्शन करते देखा है, जैसे नैतिक रूप से आदमी बुराई से घृणा करता है, जो अहसास इन्होंने पहले कभी नहीं दिखाया था। ऐसा होने पर वे कई बार हिंसक रूप धारण कर लेते हैं। कई बार बस रो देते हैं।’

वे रुके, और मैं ने पूछा ‘यही इलाज आप अपने सभी दूसरे रोगियों का भी करते हैं क्या?’

‘मुख्यतः, हाँ। पर हाँ, हर एक आदमी एक चीज़ से जितना डरता है, दूसरा आदमी उसी चीज़ से या उतना ही नहीं डरता। इसलिए हर व्यक्ति को विभिन्न प्रकार से उत्तेजित किया जाता है।’

फिर मुझे अपनी ओर बुलाया – ‘पर आइए मैं आप को दिखाता हूँ; चलिए टूर समाप्त करते हैं।’

उन अन्धेरी कोठरियों में हम ने कितने घंटे बिताए, मुझे नहीं मालूम। हम एक कोठरी से दूसरी के पास जाते रहे, और हर कोठरी में हम ने कैदियों और उन के चेहरों को देखा, सब एक ही तरीके से डरे हुए और अनदेखी भयानक चीज़ों से दुबके हुए। उस भूलभुलैया में मुझे घुमाते हुए डॉक्टर साक्स उस उत्सुक बालक की तरह लग रहे थे जो अपना नया खिलौना दिखा रहा हों। आखिरकार टूर खत्म हुआ, और हम दोबारा बाहर गए जहाँ नार्वे का स्थाई सूरज अब घने जंगल के पीछे लगभग बुझ सा गया था। हम अन्धेरे में पागलखाने के मुख्य प्रवेशद्वार के सामने खड़े थे।

वे मेरी ओर मुड़े –

‘आप को रात के लिए अपना कमरा दिखाने से पहले, चलिए एक वाइन की बोतल खोली जाए?’

डॉक्टर के क्वार्टर की गर्माहट में मैं ने फिर चैन की सांस ली। मैं ने उन की वाइन की पसन्द पर उन की तारीफ की – बहुत ही उम्दा लैंब्रुशियो वाइन थी। उन के कमरे की सजावट पर भी, और पागलखाने के उन के प्रबन्धन पर भी मैं ने कुछ तारीफ के शब्द कहे। फिर मेरे मस्तिष्क में कुछ कौंधा।

‘डॉक्टर साक्स, यह बात तो समझ में आई कि मेरे पेनफील्ड मानचित्र के अध्ययन से आप को कुछ लाभ हुआ, पर आप ने कहा न कि आप कुछ व्यक्तिगत मामले पर मुझ से बात करना चाहते हैं?’

वे मुझे बोलते हुए एकटक देख रहे थे। उन्होंने हल्के से हाँ में सिर हिलाया –

‘हाँ, आप सही कह रहे हैं। आप से मुझे कुछ काम है। इस का सरोकार है तो मुझ से, पर आप से भी है।’

‘क्या मतलब?’

‘मैं ने आप के करियर का बड़ी रुची से अध्ययन किया है। आप ने कुछ स्मरणीय कार्य किये हैं, और कुछ बड़ी सफलताएँ प्राप्त की हैं, हालाँकि अभी आप जवान हैं।’

‘धन्यवाद।’

‘फिर भी’, अब वे धीमे बोलने लगे, जैसे कि तोल तोल कर बोल रहे हों ‘आप के हिस्से असफलताएँ भी खूब आई हैं।’

‘हाँ,. बिल्कुल। वैसे ही जैसे हर सर्जन के हिस्से आती हैं, अगर गुस्ताखी न हो तो।’, मैं हंसा, पर हंसी ज़बरदस्ती सी लगी।

‘सही है। पर आप के जितनी फिर भी नहीं।’

‘आप का मतलब क्या है?’ मैं ने उत्सुकता का अभिनय करते हुए फिर पूछा, पर अपने स्वर की तीव्रता को नहीं छिपा पाया।

‘आप वे खतरे उठाते हैं जो आप की जगह दूसरे हों तो शायद न उठाएँ। आप को अपना वह वाला रोगी याद होगा, वह मुंबई का व्यापारी, कोई छः साल पहले?’

‘ठीक से तो नहीं, पर…’

‘या वह कटक का कलाकार, उसी साल।’

‘क्यों…’

‘या फिर वह बंगलौर का उद्योगपति, दो साल पहले। वे सब मनुष्य न रह कर वनस्पति बन कर रह गए, रह गए न? और हाँ, वह जो बच्चे का ट्रान्सप्लांट किया था आप ने पिछले ही साल। वह आपरेशन करना नहीं चाहिए था न?’

‘सफल हुआ था वह।’ मैं तेज़ी से बोला, अब मुझे ग़ुस्सा आ रहा था।

‘हाँ, उस बार तो सफल हुआ। पर जब आप ने छः महीने पहले फिर किया तब तो नहीं हुआ।’

मैं ने बोलने की कोशिश की पर बोल नहीं सका, जैसे मेरे गले को कुछ चीर रहा हो। मुझे भय घेर रहा था, और मेरी उंगलियाँ कुर्सी के बाज़ुओं को कस रही थी। मुझे लगा मेरी सांस थम रही है, दम घुट रहा है। मेरी नज़रें बगल में रखे वाइन के गिलास की ओर गईं और अचानक वह मुझे धुन्धला दिखने लगा।.

मैं ने बोलने की कोशिश की पर बोल नहीं सका, जैसे मेरे गले को कुछ चीर रहा हो। मुझे भय घेर रहा था, और मेरी उंगलियाँ कुर्सी के बाज़ुओं को कस रही थी।

डॉक्टर मेरी ओर झुके, उन की गहरी नीली आँखें मेरी आँखों में कुछ खोज रही थीं।

‘मैं ने आप के करियर का बहुत करीब से अध्ययन किया है। और मुझे हमेशा सन्देह रहा है कि आप का स्वास्थ्य ठीक नहीं है। पर अब मुझे पक्का यकीन हो गया है।’

मैं ने एक निर्जीव दृष्टि डाली उन पर।

‘देखिए, नीचे जब हम हर कोठरी में जा रहे थे, तो मैं आप को ध्यान से देख रहा था। आप ने देखा कि हम उन दरिन्दों का क्या हाल कर रहे थे, आप ने मुझ से उस के बारे में सुना, और बार बार खुद होते देखा। आप हैरान तो हुए, पर एक बार भी – समझ रहे हैं न आप – एक बार भी आप हिचके नहीं।’

मैं अपने पैरों पर लड़खड़ाते हुए उठा और डॉक्टर की ओर जाने की कोशिश की, जो मेरे सामने कुछ ही फीट की दूरी पर बैठे थे। पर मेरी टाँगें जवाब दे गईं, और मैं ने स्वयं को उस कालीनी फर्श पर ज़ोर से गिरते महसूस किया। मैं जहाँ गिरा, वहाँ से मैं पलटा और देखा डॉक्टर की छाया मेरे ऊपर खड़ी थी।

‘एक आदमी जो बिना सोचे उन लोगों पर प्रयोग करता है, जो उस पर सहायता के लिए निर्भर होते हैं, एक आदमी जो बार बार त्रासदीपूर्ण असफलता मिलने पर भी ऐसा करे, सही ग़लत में अन्तर नहीं कर पाता। यानी एक पागल आदमी।’

अब वह मेरे ऊपर करीब से झुके थे, और हालाँकि मुझे अब अपने चारों ओर छाए अन्धेरे में एक धुन्धली हरकत के सिवा कुछ नज़र नहीं आ रहा था, फिर भी मुझे अपने चेहरे पर उन की गर्म सांसों की अनुभूति से लग रहा था कि वह मेरे बहुत करीब थे।  फिर वे बोले –

‘मैं आपका इलाज करूँगा, और आप ठीक हो जाएँगे। आपको मेरे इलाज की ज़रूरत है।’ वे रुके; फिर काफी धीरे से बोले –

‘पर उस से भी ज़्यादा, आप को समझ में आ रहा होगा, कि मुझे आप जैसे रोगी की ज़रूरत है। क्योंकि यदि मैं आप का इलाज कर सका – तो सोचिए, ज़रा सोचिए – मुझे यकीन होगा कि मेरे अपने लिए आशा की किरण है।’

3 प्रतिक्रियाएं

  1. खत्म होते होते रोएँ खड़े हो गए। इसके अनुवाद के लिए धन्यवाद।

  2. यह विज्ञान फंतासी की अपेक्षा हॉरर लगती है।

  3. विज्ञान से संबंधित इस कहानी का हिन्दी में अनुवाद – एक सराहनीय कार्य…