खो गए ओ घन कहाँ तुम

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सूना जीवन

दीपा जोशी

खो गए ओ घन कहाँ तुम
हो कहाँ किस देश में पथरा गई कोमल धरा
चिर विरह की सेज में।

थी महक जिसमें समाई
तुम्हारे अचल प्रेम की
हुई तृषित वही वसुधा
विरहिणी के भेस में।

हो गए जो विरल घन तुम
सुधा निस्पंद हो गई
बसा पुलक धन उर में
चिर नींद में है सो गई।

लौट आओ तुम नीरधर
बन लघु पुराण विशेष
कह रहीं सूनी आँखें
बेसुध सुधा का संदेश।

अभिप्सा

अरूण कुलकर्णी

यह मेरा स्वल्प सा जीवन
रंगीन, सुगंधित, आह्लादित
सूरज की सुनहरी किरणों से
अभी अभी हुआ विकसित॥

ले आया है नये उमंग
भरा है नयी आशाओं से
अपने ही मन में दबी
अप्रकट इच्छाओं से॥

चाहता तो हूँ
कि बन जाऊँ प्रभु के गले का हार
या चढ़ जाऊँ उसके चरणों में
और कर दूँ किसी की पूजा साकार॥

या कर दूँ सुशोभित
किसी सुंदरी के घुंघराले बाल
या बन जाऊँ
किसी गुलद्स्ते की शान॥

अपने ही रंगों से कर दूँ
किसी तितली को आकर्षित
या किसी भ्रमर की गुंजन सुनकर
कर दूँ उसे अपना खजाना अर्पित॥

चाहता हूँ हवा के झोंकों पर
दिन भर नृत्य करना
उसी की संथ लहरों पर
अपने परागकण लुटाना॥

कभी कभी होता हूँ चिंतित मगर
ऐसी डरावनी कल्पनाओं से
मेरी अप्रकट इच्छाओं से विपरीत
ऐसी किसी संभावानाओं से॥

यह भी हो सकता है
कि चढ़ जाना पडे किसी मृत शरीर पर
या रह जाना पडे
किसी कब्र पर विराजमान होकर॥

या बनना पडे
किसी दुष्ट राजनेता के गले का हार
या गिरना पडे सूखकर
पौंधे तले निराधार॥

फिर चलता है मन में द्वंद्व
क्या उचित है ऐसी अप्रकट इच्छाओं को पालना
या डरावनी कल्पनाओं से बिना कारण ही मुरझाना
यह तो नही है धर्म मेरा
कि सोचूं, कौन है भोक्ता
मेरे सौंदर्य या सुगंध का
बल्कि सोचूं कि कैसे निरासक्त होकर
वितरण करूं अपने परिमल का॥

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