विज्ञापन एजेन्सी में एक दिन

फेयरनेस क्रीम से कॉन्डोम तक का प्रचार करतीं विज्ञापन कंपनियों की कार्यशैली

भारतीय ब्लॉगमंडल में सेंकड़ों चिट्ठाकार हैं, शायद ज्यादातर तकनीकी क्षेत्र से जुड़े हैं। सबके पेशे अलग और जिंदगी भी। इन्हीं में से चन्द्रू पेशेवर विज्ञापन कॉपीराईटर हैं। तो जायज था कि निरंतर उनसे पूछे कि कैसा है उनका यह कार्य, कैसे काम करती हैं विज्ञापन कंपनियाँ जो गोरेपन की क्रीम से लेकर कॉन्डोम तक की प्रचार सामग्री तैयार करती है, समाज के हर आयु वर्ग, हर तबके की रुचि, भौगोलिक स्थिति और मनःस्थिति का ख्याल रखते हुए। बताने की बात नहीं कि यह बयां करना चन्द्रू के लियें बायें हाथ का खेल था। प्रस्तुत लेख में चन्द्रू ने कम शब्दों में विज्ञापन जगत की विहंगम छवि प्रस्तुत की है। लेख पढ़ने के बाद हमारे हीरो को शुभकामनायें देना नहीं भूलियेगा।

न्य व्यावसायिक जन्तुओं की तरह ही, विज्ञापन लेखकों की दिनचर्या भी तयशुदा होती है। पर, तय होती भी नहीं। “नया”, “मुफ्त”, “अब और भी बेहतर”, “जीतिये” जैसी शब्दावली रचने वाले लोग भी आखिरकार मेरे आपके जैसे साधारण इंसान ही तो हैं। इस संक्षिप्त भूमिका के साथ आईये मैं आपका गाइड बनके घुमा लाता हूँ एक आम विज्ञापन एजेन्सी के दफ्तर में, और बताता हूँ कि जहाँ आप के देखे और पसन्द किये टी.वी. और प्रेस के इश्तेहार बनते हैं, वहाँ क्या होता है पर्दे के पीछे…और आगे…और अगल बगल में भी।

चलिए पहले देखते हैं कि एक विज्ञापन एजेन्सी होती कैसी है, और वहाँ कौन लोग काम करते हैं। विज्ञापन एजेन्सी दरअसल एक ऐसे लोगों का समूह है जो एक विक्रयकर्ता के लिए विज्ञापन तैयार करते हैं। साधारण शब्दों में कहें तो एजेंसी की भुमिका होती है विक्रेता का प्रवक्ता या सेल्समैन होने की। हज़ारों सालों से विज्ञापनों की माँग रही है, बात काम की हो या आराम की, या जीवन के किसी और आयाम की। पुराविज्ञों को ३००० ई.पू. से, बेबीलोनिया के प्राचीन खंडहरों तक में इश्तिहारों के सबूत मिले हैं।

विज्ञापन बनाने के सब से पहले जाने गए तरीकों में था “आउटडोर डिसप्ले” यानी किसी इमारत की दीवार पर लुभावना सा इश्तिहार। पुराविज्ञों को ऐसे कई संकेत मिले हैं, खासकर रोम और पॉम्पेइ के खंडहरों में। रोम में खुदाई में मिला है एक किराए की जगह का विज्ञापन, और पॉम्पेइ की एक दीवार पर पुता था एक और विज्ञापन जो किसी दूसरे शहर की सराय का था। विज्ञापन के व्यवसाय का आधुनिक स्वरूप १८४१ में आरंभ हुआ, फिलाडेल्फिया पेन्सिलवेनिया में, जब वोलनी बी पामर नाम के एक व्यक्‍ति ने विज्ञापन लगाने वाली जगह को सस्ते दामों में खरीद कर विज्ञापन दाताओं को ऊँचे दामों पर बेचना शुरू किया। तब से विज्ञापन एजेन्सियों की रचना और उन के काम काज में ज्यादा अन्तर नहीं आया है।

आज की आधुनिक विज्ञापन एजेन्सी में मुख्यतः तीन विभाग होते हैं – क्रियेटिव, यानी रचनात्मक विभाग, क्लाइंट सर्विसिंग, यानी ग्राहक-सेवा विभाग और मीडिया बाइंग, यानी माध्यम क्रय विभाग। रचनात्मक विभाग पर, जहाँ कॉपीराइटर यानी विज्ञापन लेखक बैठते हैं, ज़िम्मेदारी होती है विज्ञापन बनाने की। ग्राहक सेवा विभाग, जैसे कि नाम से ही पता चलता है, ग्राहकों से संपर्क करता है, वर्तमान ग्राहकों से निबटता है और नए ग्राहक बनाता है। और मीडिया विभाग सौदे करता है विभिन्न समाचार और मनोरंजन माध्यमों से, जो विज्ञापन को लोगों तक पहुँचाते हैं, जैसे कि पत्रिकायें, समाचार पत्र, टी.वी आदि।

इस के साथ समाप्‍त होता है विज्ञापन एजेन्सी के हमारे दौरे का पहला भाग। अब आइए इधर चल कर देखें यह कॉपीराइटर पूरा दिन क्या करते रहते हैं।

दिन की पहली ब्रीफ विज्ञापन एजेन्सी में सब से पूजनीय चीज़ होती है। यूँ समझिए कि बाइबल, गीता और कुरान को साथ मिला दिया गया हो।

हमारा यह गबरू हीरो, जो बस 23 साल का है, अपना दिन शुरू करता है अपनी भरोसे की सवारी, यानी हीरो हॉण्डा सीबीज़ी पर। सरपट भागती बसों और रेंगती साइकिलों को पछाड़ता हुआ वह दफ्तर पहुँचता है साढ़े नौ की हाज़िरी लगाने के लिए। हाज़िरी की रस्म के साथ ही हमारा हीरो नज़र डालता है ताज़ातरीन अखबार पर, दूसरी एजेन्सियों के दूसरे कॉपीराइटरों की रचनात्मकता तलाशते हुए। फिर बेसब्री से इन्तज़ार होता है दिन की पहली “ब्रीफ” यानी संक्षिप्‍त विवरण का। यह जो ब्रीफ है न, यह विज्ञापन एजेन्सी में सब से पूजनीय चीज़ होती है। यूँ समझिए कि बाइबल, गीता और कुरान को साथ मिला दिया गया हो। इस बैठक में रचनात्मक दल को, जिस में कॉपीराइटर, कला निर्देशक और रचना-निर्देशक होते हैं, यह बताया जाता है कि ग्राहक विज्ञापन से क्या चाहता है। ब्रीफ में जिन मुख्य बातों पर प्रकाश डाला जाता है, वह हैं – ग्राहक कौन है, वह क्या उत्पाद या सेवा बेचना चाहता है, किसे बेचना चाहता है, और विज्ञापन के ज़रिये अपने ग्राहक तक क्या सन्देश पहुँचाना चाहता है।

हमारे हीरो को अभी अभी पहला ब्रीफ मिला है। ज़रा चुपके से देखें क्या लिखा है इस में। क्या बात है! यह तो दिलचस्प लग रहा है। यह ब्रीफ है अइवो नाम के रेस्तराँ के लिए, जहाँ बेचा जाता हैं, उम्म्म्म्, ऐसा खाना जो डाइटिंग के लिए भी सही है और स्वाद में पिज्ज़ा जैसा। अपने कॉपीराइटर की तो अभी से लार टपक रही है। उसके सपनों का ब्रीफ जो है।

अब आता है दिन का सब से मुश्किल हिस्सा, यानी विज्ञापन के लिए आइडिया खोजना। आइडिया ढ़ूँढने के लिए हमारा हीरो पहले कुछ जाँचे परखे फारमूले अपनाता है। पहला कदम है ब्रीफ को समझना। इसलिए वह हर इसे कई बार पढ़ता है, बार बार, अक्षरशः। ब्रीफ के मुख्य हिस्से समझने के बाद, वह कल्पना करता है कि वह उस उत्पाद को खरीदने वाला एक ग्राहक है, और इस बात पर विचार करता है कि वह इस विज्ञापन में क्या देखना पसन्द करेगा। फिर देखता है वह पुरस्कार समारोहों की पुस्तकों में, पत्रिकाओं में और विज्ञापनों पर लिखी गई अन्तर्राष्ट्रीय पुस्तकों में, कि किसी ऐसे ही किसी उत्पाद का विज्ञापन पहले भी तो नहीं बना। इस से उसे कुछ इशारे मिलते हैं कि किस तरह का विज्ञापन लिखा जाना चाहिए, और किस तरह का नहीं, यानी ऐसा नहीं जो पहले ही लिखा गया हो, या स्पष्ट हो।

सामने ड्राइंग का सामान फैलाए और पेन्सिल का सिरा मुंह में दबाए बैठा है कला-निर्देशक, यानी आर्ट डाइरेक्टर। एक पते की बात सुनें, आर्ट डाइरेक्टर महिला हों तो ज़रा होशियार रहना चाहिए।

पहलेपहल कॉपीराइटर अपने मन में विज्ञापन की तस्वीर बनाने लगता है। किसी भी विज्ञापन के चार मुख्य भाग होते हैं – हेडलाईन यानि शीर्षक, विज़ुअल, बॉडी कॉपी यानि मुख्य मसौदा और लोगो व साईनआफ यानि अन्तिम पंक्‍ति। अब कॉपीराइटर अब विचार करता है कि वर्तमान ब्रीफ के लिए कैसा विज्ञापन सही रहेगा – केवल चित्र के सथ लोगो, केवल शीर्षक के साथ लोगो, या दोनों का मिश्रण। इस विज्ञापन के लिए उसने तय किया है कि शीर्षक और चित्र सही रहेगा, सन्देश पहुँचाने का मुख्य काम शीर्षक का रहेगा।

अब हम ज़रा अपने दोस्त को कुछ एकान्त देते हैं, उसे अपने दिमाग के घोड़े को तेज़ दौड़ाने के लिए ज़रा सी शान्ति चाहिए। चलिए तब तक इस तरफ चल कर देखते हैं उस के सहकर्मी क्या कर रहे हैं। ये महाशय हमारे हीरो के सीनियर है, कॉपी सुपरवाइज़र। अपने तजुर्बे के बल पर कई प्रमोशनें मिलने के बाद ही यह इस पद पर पहुँचा है। इस का काम है हमारे हीरो को रास्ता दिखाना, और कुछ तजुर्बे की बातें बताना। अब वह देखो, कोने में सामने ड्राइंग का सामान फैलाए और पेन्सिल का सिरा मुंह में दबाए बैठा है कला-निर्देशक, यानी आर्ट डाइरेक्टर। एक पते की बात सुनें, आर्ट डाइरेक्टर महिला हों तो ज़रा होशियार रहना चाहिए।

अब तक हमारा हीरो जाग उठा है अपनी निद्रा से, मेरा मतलब… अपने चिन्तन से। उस की आँखों में चमक है और चाल में फुर्ती। बंदे को समस्या का समाधान मिल गया है, यानी विज्ञापन का आइडिया। इस के बाद जो होता है, वह किसी नौसिखिये व्यक्ति को बाज़ारी झगड़े सा लगेगा। कॉपीराइटर अपनी बात पर अड़ रहा होगा और उसके सहकर्मी अपनी अपनी बात पर। पर विज्ञापन की कल्पना का अनकटा हीरा ऐसे ही तराशा जाता है एजेन्सी में। शीघ्र ही समझौता हो जाता है। कला निर्देशक विज्ञापन का खाका बनाता है और इसे भेजा जाता है गर्भगृह में, यानी मुख्य बॉस के केबिन में।

बॉस का काम है इस बात का अन्तिम निर्णय लेना कि ग्राहक के लिए किस तरह का विज्ञापन उत्तम रहेगा। वह ग्राहक के दृष्टिकोण से विज्ञापन को देखता है, साथ में जोड़ता है अपना तजुर्बा और निश्चित करता है कि ग्राहक का उत्पाद किस से प्रसिद्ध होगा और किस से नहीं। अब हमारे हीरो की बैठक होती है ग्राहक के संग, साथ होते हैं कॉपी सुपरवाइज़र और आर्ट डाइरेक्टर। काफी माथा पच्ची होती है, गर्मा गर्मी होती है और आखिरकार आइडिया पास होता है। ग्राहक के हाँ कहने पर पूरा विज्ञापन प्रस्तुत किया जाता है।

हमारा हीरो यानि आपका गाईड घर लौटता है, थक कर चूर पर जीत की खुशी से भरपूर।

मूल अंग्रेज़ी लेख से हिंदी रुपांतरणः रमण कौल

टैग:

एक प्रतिक्रिया

  1. चन्द्रू जी,

    अगर मैं सही हूँ तो एक कॉपीराइटर, विज्ञापन की रीढ़ है।

    मेरा नवोदय का एक लंगोटिया यार संजय, जो कि आई.आई.एम.सी. दिल्ली का उत्पाद है, वर्षों पहले दिल्ली में एक बार समयाभाव के चलते मैं उससे मिलने उसके विज्ञापन एजेंसी के आफिस तक पहूँच गया। आधे घंटे के इंतजार के बाद, मुझसे मिलने के लिए बॉस को मुझे संबंधी बताकर एक घंटे की छुट्टी लेकर वह बाहर आया। किसी आवश्यक प्रोजेक्ट के कॉपीराइटर के काम में वह व्यस्त था। उस दिन दोस्ती निभी जरुर, और आज, बिसरी बातें आपके जीवंत लेख को पढ़कर फिर याद आ गयी ।

    रमण जी ने हिंदी रुपांतरण में इसे बखुबी प्रस्तुत किया है ।