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निरंतर के अनिरंतर प्रकाशन का एक मुख्य कारण सामग्री का अभाव रहा है। जिस तरह के खोजी, ज्ञानपरक, सामाजिक और तकनीकी लेख हम छापते हैं उनके लेखकों का टोटा पड़ा रहता है। निरंतर पर हम लेखकों को पारिश्रमिक देने का मन बना रहे हैं। पर किसी वेब पत्रिका के लिये यह विज्ञापनदाताओं और संरक्षकों के बिना करना असंभव है। अतः हर माह ज़रूरी राशि संजोने के लिये हम तुरंत प्रभाव से निरंतर पर बैनर एड शुरु करने जा रहे हैं। यदि आप या आपका संस्थान निरंतर को समर्थन देना चाहता हो तो हम तिमाही, छमाही और वार्षिक अवधि के लिये आपका बैनर एड सशुल्क निरंतर पर दिखायेंगे। इच्छुक व्यक्ति व संस्थान अधिक जानकारी के लिये हमें patrikaa at gmail dot com पर लिख सकते हैं।

परिचय

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देबाशीष चक्रवर्ती
  

निरंतर हिन्दी चिट्ठाकारों के एक समूह का अभिनव प्रयोग है। यह पहली ऐसी पत्रिका है जो न केवल गैरपेशेवर प्रकाशकों द्वारा निकाली जाती है बल्कि पाठकों को प्रकाशित लेखों पर त्वरित टिप्पणी करने का मौका भी देती है। इस तरह ये सिर्फ ज़ीन नहीं, विश्व की प्रथम ब्लॉगज़ीन बन सकी।


चिट्ठाकारी, पेशेवर लेखन और पत्रकारिता का संगम


अधिकाँश ब्लॉगर चिट्ठाकारी से जुड़ते अपनी राय से संसार को अवगत कराने के लिये। सब विभिन्न विषयों पर लिखते हैं, पर अधिकाँशतः चिट्ठों में समाज से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग न के बराबर ही होती है। चिट्ठाकार पेशेवर पत्रकार नहीं हैं, परंतु चिट्ठों ने रिपोर्टिंग को वह नया रुख दिया है कि मुख्यधारा की मीडिया (एम.एस.एम) को भी सिटिज़न जर्नलिज़्म जैसे शब्द की रचना करनी पड़ी और अपने कलेवर में इंटरेक्टिविटी के एलिमेंट को शुमार करना पड़ा। चिट्ठों और एम.एस.एम की तुलना होती रहती है, उनके मतभेद की भी बात होती है।

वर्ष २००५ की बात है। हिन्दी चिट्ठाजगत के कुछ समान राय वाले लोगों ने निरंतर की शुरुवात की। इसे ब्लॉगज़ीन पुकारा गया क्योंकि हर कथा पर पाठक त्वरित टिप्पणी कर सकता था। आधुनिक सी.एम.एस ने सामुदायिक भागीदारी के रास्ते खोल दिये। हम सभी ने जाल पर हिन्दी के बढ़ते प्रयोग को महसूस किया है और इसके उज्ज्वल भविष्य के प्रति आश्वस्त भी हैं। अगस्त २००५ में निरंतर का प्रकाशन ६ अंकों के उपरांत बंद करना पड़ा, मुख्य कारण था समयाभाव। १ साल बाद अगस्त २००६ में इसका प्रकाशन दुबारा शुरु हुआ।

अपने पहले अवतार की तुलना में निरंतर के कलेवर में थोड़े बदलाव हैं। यह अब ज़्यादा गंभीर पत्रिका है। इसका उद्देश्य है भारत की पहली सामुदायिक पत्रिका बनना, विचार यह है कि हर कथा के बनने में और इसके प्रकाशनोपरांत भी पाठकों का योगदान साफ झलके। हर कथा अंर्तजाल के हिन्दी पाठकों के कलेक्टिव विज़डम का निचोड़ हो, निरंतर की राय सिर्फ इसके संपादक मंडल की नहीं वरन पाठकों की राय से भी बनें। इसके लिये निरंतर मित्र समूह की स्थापना की जा रही है, निरंतर मित्र की संकल्पना के बारे में और जानकारी इस लेख में आगे दी गई है।

निरंतर के हर अंक में प्रकाशकों का प्रयास होगा कि वैश्विक भारत के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं पर दृष्टिपात करें। खरी बात कहें, जो किताबी नहीं वरन पाठकों और प्रकशकों की राय हो। भाषा जिसे हिन्दी के जानकार सराहें पर नौसिखियों को शब्दकोश न देखना पढ़े। अंदाज़ जो पारंपरिक और आधुनिक संप्रेषण का सुन्दर मेल हो।


निरंतर प्रकाशन दल


निरंतर की संरचना की खासियत केवल यह नहीं है कि सभी संपादक विश्व के विभिन्न कोने से साथ आ जुड़े हैं, बल्कि यह है कि विभिन्न विचारधाराओं के लोग साथ एक पत्रिका निकाल रहे हैं। निरंतर के मुख्य संपादक अनूप शुक्ला लोकप्रिय चिट्ठाकार हैं। अगस्त २००६ से निरंतर की कोर टीम में आ जुड़े हैं डॉ सुनील दीपक, ईस्वामी, प्रत्यक्षा और आलोक कुमार। पुरानी टीम के मेम्बरान यानि रविशंकर श्रीवास्तव, रमण कौल, पंकज नरूला, शशि सिंह, अतुल अरोरा और देबाशीष चक्रवर्ती यथावत है।


निरंतर का लोगो


Logoनिरंतर का लोगो गुड़गाँव स्थित ग्राफिक व वेब डिजायनर तथा छायाकार भावना बाहरी ने बनाया है। लोगो में कोणार्क के सूर्य मंदिर से प्रभावित रथचक्र को दर्शाया गया है जो चिरस्थाई गति और नैरन्तर्य का प्रतीक है। हमारा उद्देश्य था कि पत्रिका के नाम की सार्थकता के साथ ही और भारतीयता का सत्व भी अभिकल्पना में झलके। भावना ने वेब 2.0 की भावना के अनुरूप चक्र में ग्लास अफेक्ट का समावेश किया है। उर्जा व यौवन के तत्वों को सम्मिलित करने के लिये उन्होंने चमकीले पीले व नारंगी रंगों का प्रयोग किया है। कहना न होगा कि भावना का योगदान सराहनीय रहा।


निरंतर मित्र


नये विषयों पर राय रखने के साथ साथ रिपोर्टिंग करने के इच्छुक पाठक सिटिज़न जर्नलिज़्म को नये मायने दे सकते हैं निरंतर से जुड़कर। “निरंतर मित्र” पत्रिका के परोक्ष संवाददाता के रूप में तैनात रहेंगे और समय समय पर संपादक मंडल उनकी सहायता ले सकेगा। हो सकता है आप अपने इलाके, शहर या राज्य से संबंधित कोई आँकड़े, चित्र या पते इकट्ठा कर के दे सकें, किसी का साक्षात्कार ले सके या कोई छोटी रपट बना कर दे सकें। आप अनुवाद, प्रूफ रीडिंग, ग्राफिक्स बनाने में भी मदद कर सकते हैं और नई कथाओं के सुझाव भी दे सकते हैं। निरंतर मित्रों के नाम संबद्ध लेखों के साथ प्रकाशित किये जायेंगे। निरंतर में संरक्षकों के नाम समय समय पर प्रकाशित किये जायेंगे। निरंतर मित्र बनने के लिये आपको निम्नांकित समूह का सदस्य बनना होगा, यह मेलिंग लिस्ट संपर्क की सुविधा मात्र के लिये है।

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निरंतर संरक्षक


निरंतर संरक्षक के रूप में आप पत्रिका को आर्थिक मनोबल दे सकते हैं। आप हमें माहवार या सालाना तौर पर कोई भी राशि दे सकते हैं। लेखकों और समय समय पर आयोजित की जाने वाली प्रतियोगिताओं में पारितोषिक के रूप में वितरित करने हेतु आप पुस्तक या अन्य वस्तु भेंट कर सकते हैं। आप प्रकाशकों ओर लेखकों को हमारा परिचय देकर अपनी पुस्तकें भेंट करने के लिये आग्रह कर सकते हैं तथा अपने मित्रों, सहयोगियों और परिवार के सदस्यों को पत्रिका के बारे में जागरूक करने में हाथ बंटा सकते हैं। निरंतर में संरक्षकों के नाम समय समय पर प्रकाशित किये जायेंगे। निरंतर संरक्षक बनने के लिये आपको निम्नांकित समूह का सदस्य बनना होगा, यह मेलिंग लिस्ट संपर्क की सुविधा मात्र के लिये है। नये अंक आने पर निरंतर संरक्षकों को आगामी अंको की खास सूचना ईमेल पर समय समय पर दी जायेगी।

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निरंतर के अनोखे प्रयोग


हिन्दी ब्लॉगमंडल के अन्य एक अनोखे प्रयोग बुनो कहानी में हमने कोलैबोरेशन यानि सहयोग की भावना को बल देने के लिये मल्टी आथर कहानियों को रचने का तरीका पेश किया, जिसमें कहानी लिखना कोई शुरु करता है और कोई अन्य इसे आगे लिखता है। लेखकों में कहानी के प्लॉट संबंधी कोई चर्चा नहीं होती और न यह तय होता है कि कहानी कितने भागों में लिखी जायेगी। शायद इसीलिये यह स्वतः प्रवर्तित कार्य मनोरंजक भी है और चुनौतीपूर्ण भी। इसमें मौजूद सस्पेंस और अप्रत्याशितता के तत्वों को भी नकारा नहीं जा सकता।

निरंतर के पुनर्वतार में हमने ऐसा ही अनोखा प्रयोग पुनः किया। यह प्रयास था विश्व की पहली इंटरैक्टिव हिन्दी कहानी का एक नया स्तंभ। हिन्दी ब्लॉगजगत की सशक्त हस्ताक्षर प्रत्यक्षा ने इसे शुरु करने का बीड़ा उठाया। एक ऐसी ही कहानी जिसके खुले सिरे पाठक पिरोते हैं। कहानी के हर भाग के अंत में लेखिका पाठकों का मत माँगतीं है कि अगले भाग में कहानी क्या मोड़ ले। यानि बहुमत जिस पक्ष होता है ऊंट उसी करवट बैठता है।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


  • निरंतर के प्रकाशन में कौन लोग शामिल हैं?
    निरंतर के मुख्य संपादक हैं अनूप शुक्ला। पत्रिका का प्रकाशन व प्रबंध संपादन इसके संस्थापक देबाशीष चक्रवर्ती करते हैं। निरंतर के कोर संपादन टीम में शामिल हैं डॉ सुनील दीपक, रविशंकर श्रीवास्तव, रमण कौल, अतुल अरोरा, प्रत्यक्षा, शशि सिंह, ईस्वामी, पंकज नरूला और आलोक कुमार

  • निरंतर के प्रकाशन पर कितना खर्च आता है?
    डोमेन व होस्टिंग का कुल सालाना खर्च लगभग १००० रुपये है।

  • निरंतर किस साफ्टवेयर पर प्रकाशित होता है?
    निरंतर इंडिक जूमला नामक पी.एच.पी और माई एसक्यूएल आधारित एक मुक्त स्रोत तंत्रांश पर चलता है। पत्रिका के लिये यह आईजूमला नामक जूमला काँम्पोनेंट का प्रयोग करता है। निरंतर हिन्दी यूनीकोड को समर्थन देता है।

  • मैं भी अपनी पत्रिका निकालना चाहता हूँ। क्या निरंतर मुझे ये साफ्टवेयर दे सकता है?
    अच्छी बात है कि आप हिन्दी में पत्रिका निकालना चाहते हैं। इंडिक जूमला मुफ्त उत्पाद है जिसे यहाँ से प्राप्त किया जा सकता है। आईजूमला नामक जूमला काँम्पोनेंट निरंतर को विशेष अनुबंध के तहत दिया गया है, यह एक लाईसेंस्ड उत्पाद है और हम इसे पुनर्वितरित नहीं कर सकते। अपितु आप यह उत्पाद सीधे निर्माताओं से सशुल्क क्रय कर सकते हैं। पत्रिका के बारे में कोई तकनीकी जानकारी की दरकार हो तो हमारा दल आपकी सहायता के लिये हमेशा तैयार रहेगा।

  • मैं एक उत्पाद/निर्माता प्रकाशक हूँ। क्या आप मेरे उत्पाद/प्रकाशन की समीक्षा प्रकाशित करेंगे?
    अगर आपका उत्पाद/प्रकाशन हमें जंचे तो ज़रूर। निरंतर का झुकाव तकनीकी उत्पादों पर स्वाभाविक रूप से ज़्यादा है पर हम किसी भी सार्थक उत्पाद/प्रकाशन की समीक्षा करने को उत्सुक रहेंगे। अपने उत्पाद/प्रकाशन की जानकारी के साथ हमसे संपर्क करें।

  • क्या आप मेरे उत्पाद/प्रकाशन की "फेवरेवल" समीक्षा या एडवर्टोरियल प्रकाशित करेंगे?
    हम किसी उत्पाद की खामख्वाह तारीफ या निंदा दोनों से ही बचना चाहेंगे। यदि आपकी समीक्षा rational है और संपादकीय दल उससे इतफ्फाक़ रखें तो हम ऐसी समीक्षा प्रकाशन हेतु विचाराधीन रख सकते हैं। पर ऐसी स्थिति में भी हम अपनी समीक्षा की प्रक्रिया ज़रूर दोहरायेंगे।


देबाशीष चक्रवर्ती
लेखक परिचय:
देबाशीष चक्रवर्ती हिन्दी के शुरुवाती चिट्ठाकारों में से एक हैं। वे पुणे स्थित एक सॉफ्टवेयर सलाहकार हैं। इंटरनेट पर Geocities के दिनों से ही सक्रिय थे, अक्टूबर 2002 में अपना इंग्लिश ब्लॉग नल प्वाइंटर और नवंबर 2003 में हिन्दी ब्लॉग नुक्ताचीनी आरंभ किया। देबाशीष DMOZ पर संपादक रहे हैं। उन्होंने इंडिक ब्लॉगिंग पर एक पोर्टल चिट्ठा विश्व भी शुरु किया था, यह हिन्दी चिट्ठों का पहला एग्रीगेटर था, जो अब अपडेट नहीं होता। उन्होंने WordPress, इंडिक जूमला तथा आई जूमला जैसे अनेक अनुप्रयोगों के हिन्दीकरण में योगदान दिया। 2005 में उन्होंने प्रथम इस पत्रिका निरंतर का प्रकाशन साथी चिट्ठाकारों के साथ आरंभ किया। इसके अतिरिक्त उन्होंने इंडीब्लॉगीज नामक वार्षिक ब्लॉग पुरुस्कारों की स्थापना भी की। देबाशीष को बुनो कहानी तथा अनुगूंज जैसे सामुदायिक प्रयासों को शुरु करने का भी श्रेय जाता है। संप्रति ब्लॉगलेखन के अलावा हिन्दी पॉडकास्ट पॉडभारती पर सक्रीय हैं और यदाकदा हिन्दी विकिपीडिया पर योगदान देते रहते हैं।
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नेताजी का ऐतिहासिक भाषण
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1857 में हुई आज़ादी की पहली लड़ाई की 150वीं वर्षगाँठ इस वर्ष देश भर में मनाई जा रही है। इस मौके पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिए गए एक दुर्लभ भाषण को हम पहली बार हिन्दी में पेश कर रहे हैं। यह भाषण नेताजी ने सम्राट-कवि बहादुरशाह ज़फ़र की मज़ार पर हुए आज़ाद हिन्द फौज की आनुष्ठनिक कवायद और जलसे में 11 जुलाई, 1944 को दिया था। हिन्दी अनुवाद व प्रस्तुतिः अफ़लातून
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